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दक्षिण कोरिया में नफरत की नई लहर: ऑनलाइन घृणा, बहुसांस्कृतिक समाज और सामाजिक एकता की कठिन परीक्षा

दक्षिण कोरिया में नफरत की नई लहर: ऑनलाइन घृणा, बहुसांस्कृतिक समाज और सामाजिक एकता की कठिन परीक्षा

कोरिया की चमकदार छवि के पीछे उभरता एक असहज सवाल

दक्षिण कोरिया को भारत में अक्सर तीन पहचानों के साथ देखा जाता है—तकनीक, के-ड्रामा और के-पॉप। सियोल की चमकती सड़कों, व्यवस्थित सार्वजनिक जीवन, वैश्विक ब्रांडों और सांस्कृतिक निर्यात की सफलता ने कोरिया की एक आधुनिक, आत्मविश्वासी और भविष्यवादी छवि बनाई है। लेकिन हर तेज़ी से बदलते समाज की तरह वहां भी एक ऐसी दरार उभर रही है, जो केवल इंटरनेट की भाषा का मामला नहीं, बल्कि समाज की आत्मा से जुड़ा प्रश्न बनती जा रही है। यह सवाल है—क्या कोरिया अपनी बढ़ती विविधता के साथ सह-अस्तित्व का नया सामाजिक अनुबंध बना पाएगा, या ऑनलाइन नफरत और सामाजिक अविश्वास उसकी एकता को गहरा नुकसान पहुंचाएंगे?

मार्च 2026 तक कोरियाई समाज में जिस मुद्दे ने गंभीर बहस को जन्म दिया है, वह है ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों जगह फैलती घृणासूचक भाषा, और उसका असर बहुसांस्कृतिक सह-अस्तित्व, स्थानीय समुदायों के रिश्तों और सामाजिक एकजुटता पर। यह केवल ट्रोलिंग, मीम या सोशल मीडिया की बदजुबानी भर नहीं रह गई है। कोरिया में अब इस बात पर बढ़ती चिंता है कि खास राष्ट्रीयताओं, चेहरों-मोहरे, भाषाई उच्चारण, सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों और यहां तक कि क्षेत्रीय पहचान को निशाना बनाकर जो मजाक, तंज और अपमान की भाषा इस्तेमाल हो रही है, वह धीरे-धीरे सामूहिक व्यवहार को प्रभावित कर रही है।

भारतीय पाठक इस परिस्थिति को समझने के लिए अपने आसपास की कई मिसालें याद कर सकते हैं। जैसे हमारे यहां सोशल मीडिया पर किसी समुदाय, भाषा, खान-पान या प्रवासी समूह को लेकर चलने वाले रूढ़िवादी चुटकुले कब पूर्वाग्रह में बदल जाते हैं, पता ही नहीं चलता। कभी उत्तर भारतीय बनाम दक्षिण भारतीय, कभी पूर्वोत्तर के लोगों को लेकर नस्ली टिप्पणियां, कभी बिहारी प्रवासी मजदूरों पर ताने, कभी किसी धर्म या जातीय समूह को लेकर वायरल कटाक्ष—यह सब दिखाता है कि नफरत अक्सर सीधे हिंसा की शक्ल में नहीं, बल्कि ‘मजाक’ या ‘राय’ के रूप में प्रवेश करती है। कोरिया में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि वहां यह बहस अब एक बड़े राष्ट्रीय प्रश्न—‘सामाजिक एकीकरण’—के रूप में सामने आ चुकी है।

कोरियाई समाज लंबे समय तक सांस्कृतिक रूप से अपेक्षाकृत समरूप माना जाता रहा। लेकिन अब वहां भी वास्तविकता बदल चुकी है। प्रवासी मजदूर, विदेशी छात्र, विवाह के माध्यम से आए जीवनसाथी, बहुसांस्कृतिक परिवारों के बच्चे और विभिन्न देशों से आए निवासी अब कोरिया के उद्योग, शिक्षा, सेवा क्षेत्र, कृषि, देखभाल अर्थव्यवस्था और स्थानीय जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में सवाल यह नहीं कि विविधता आई है या नहीं; सवाल यह है कि समाज ने उसे समझने, स्वीकारने और न्यायपूर्ण ढंग से व्यवस्थित करने की तैयारी कितनी की है।

आज कोरिया में यह चिंता इसलिए गहरी है क्योंकि वहां नफरत अब केवल व्यक्तिगत अभिव्यक्ति का विषय नहीं रही। यह रोजमर्रा की भाषा, एल्गोरिदम-चालित प्लेटफॉर्म, स्थानीय अफवाहों, रोजगार और संसाधनों पर असुरक्षा, और सामाजिक ध्रुवीकरण के साथ मिलकर एक संरचनात्मक समस्या बन रही है। इसीलिए ‘समाज को जोड़े रखना’—यानी सामाजिक एकता—अब वहां की सबसे बड़ी चुनौतियों में गिनी जा रही है।

कोरिया का बदलता सामाजिक चेहरा और बहुसांस्कृतिक यथार्थ

दक्षिण कोरिया में बहुसांस्कृतिक समाज की चर्चा आज कोई सैद्धांतिक बहस नहीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन की वास्तविकता है। फैक्ट्रियों, खेतों, पशुपालन, रेस्तरां, निर्माण क्षेत्र, बुजुर्ग देखभाल सेवाओं, विश्वविद्यालय परिसरों और स्थानीय बाजारों में प्रवासी पृष्ठभूमि वाले लोगों की मौजूदगी सामान्य दृश्य बन चुकी है। कुछ इलाकों में स्कूल की कक्षाओं, प्रशासनिक दफ्तरों, अस्पतालों और बाजारों में बहुभाषी वातावरण दिखाई देता है। यानी जो बदलाव कभी सियोल जैसे बड़े शहरों तक सीमित समझा जाता था, वह अब छोटे और मध्यम शहरों तक फैल चुका है।

यहां भारतीय संदर्भ विशेष रूप से उपयोगी है। भारत में विविधता हमारी ऐतिहासिक नियति रही है—भाषाएं, धर्म, जातीय समुदाय, खान-पान और आंचलिक पहचानें हमारे सामाजिक ढांचे का हिस्सा हैं। हम विविधता के साथ जीते तो हैं, पर यह भी सच है कि हमारे यहां सह-अस्तित्व हमेशा सहज नहीं होता; उसे लगातार लोकतांत्रिक अभ्यास, संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक संघर्षों के जरिए बचाना पड़ता है। कोरिया के लिए यह अनुभव अपेक्षाकृत नया है। वहां समाज अब उस मोड़ पर खड़ा है जहां उसे सांस्कृतिक समानता की पुरानी कल्पना से आगे बढ़कर विविध नागरिकता का नया ढांचा बनाना होगा।

कोरिया में बहुसांस्कृतिक परिवारों का अर्थ अक्सर उन परिवारों से लगाया जाता है जिनमें एक अभिभावक कोरियाई और दूसरा विदेशी पृष्ठभूमि का हो, या जिनमें प्रवासी पृष्ठभूमि से आए सदस्य शामिल हों। ऐसे परिवारों के बच्चे स्कूलों में पढ़ रहे हैं, स्थानीय बोलियों और मानक कोरियाई के बीच अपनी पहचान बना रहे हैं, और कभी-कभी अपने ही समाज में ‘अलग’ ठहरा दिए जाते हैं। यही वह बिंदु है जहां ‘सांस्कृतिक विविधता’ का सवाल बहुत मानवीय हो जाता है। यह अब केवल नीति-निर्माण नहीं, बल्कि बच्चों के आत्मसम्मान, युवाओं की सामाजिक स्वीकृति और परिवारों की सुरक्षा से जुड़ जाता है।

तेजी से बदलती जनसंख्या संरचना ने कोरिया के सामने वैसा ही सवाल रखा है जैसा दुनिया के कई देशों ने देखा है—जब अर्थव्यवस्था को बाहरी श्रम, नए सामाजिक समूहों और सांस्कृतिक विविधता की जरूरत हो, तब समाज की मानसिकता और संस्थाएं कितनी जल्दी बदल पाती हैं? अक्सर जवाब निराशाजनक होता है। आर्थिक ढांचा बदल जाता है, लेकिन सामाजिक कल्पना पीछे छूट जाती है। लोग विविधता को या तो ‘मदद के पात्र’ समूह के रूप में देखते हैं, या ‘समस्या पैदा करने वाले बाहरी’ के रूप में। इन दोनों नज़रों में इंसान गायब हो जाता है।

कोरिया में चिंता यह भी है कि विविधता के प्रति संवेदनशील नागरिक शिक्षा, मीडिया भाषा, स्थानीय प्रशासन और सामाजिक संवाद उस गति से विकसित नहीं हुए, जिस गति से समाज की रचना बदली है। अगर कोई प्रवासी निवासी सार्वजनिक नियम समझ नहीं पाता, तो समस्या अनुवाद, संवाद और प्रशासन की भी हो सकती है। लेकिन ऐसे मामलों में अक्सर दोष पूरी समुदाय पर डाल दिया जाता है। एक व्यक्ति की भूल को एक राष्ट्रीयता या सांस्कृतिक समूह का स्वभाव बना दिया जाता है। यहीं से सामान्यीकरण जन्म लेता है, और सामान्यीकरण से घृणात्मक भाषा को वैधता मिलने लगती है।

इस बदलती तस्वीर को समझना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि कोरिया के कई क्षेत्रों में बहुसांस्कृतिक आबादी अब ‘हाशिये’ का नहीं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था का आवश्यक स्तंभ है। यदि कोई शहर अपने उद्योग, श्रम, शिक्षा और सामाजिक सेवाओं में प्रवासी पृष्ठभूमि के लोगों पर निर्भर है, तो उन्हें अस्थायी उपस्थिति या संदेह की निगाह से देखना उस शहर के भविष्य को ही कमजोर करना होगा।

नफरत केवल भाषा नहीं, आर्थिक असुरक्षा और सामाजिक बेचैनी की अभिव्यक्ति भी

किसी भी समाज में नफरत हवा में पैदा नहीं होती। वह असुरक्षा, बेचैनी, अविश्वास और राजनीतिक-सामाजिक विफलताओं की जमीन पर पनपती है। कोरिया में भी विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा बहुसांस्कृतिक तनाव का कारण केवल ‘अपरिचय’ नहीं है। उससे बड़ा कारण है संसाधनों को लेकर पैदा हो रही प्रतिस्पर्धात्मक भावना। जब नौकरी कम लगे, घर महंगे हों, स्थानीय युवाओं में बेरोजगारी या भविष्य को लेकर चिंता हो, शिक्षा में प्रतिस्पर्धा तीखी हो और सामाजिक गतिशीलता कमजोर महसूस हो, तब लोग जटिल संरचनात्मक समस्याओं के बजाय किसी दिखाई देने वाले समूह को दोष देना आसान समझते हैं।

भारत में भी यह पैटर्न नया नहीं है। आर्थिक संकट या स्थानीय तनाव के समय प्रवासी मजदूरों, किरायेदार समुदायों, भाषा-भिन्न लोगों या छोटे व्यापारियों को निशाना बनाना कई बार देखा गया है। असल समस्या प्रशासनिक विफलता, रोजगार की कमी, अपर्याप्त कल्याणकारी व्यवस्था या असमान अवसरों की होती है, लेकिन गुस्सा उस पर निकलता है जो ‘दूसरा’ दिखता है। कोरिया के मामले में भी प्रवासी आबादी, बहुसांस्कृतिक परिवार और कुछ विशेष राष्ट्रीय पृष्ठभूमि वाले लोग इस तरह के सार्वजनिक रोष का आसान लक्ष्य बनते जा रहे हैं।

यही वजह है कि वहां के समाजशास्त्री और नीति-विशेषज्ञ बार-बार कह रहे हैं कि आज की बहुसांस्कृतिक खींचतान को केवल ‘संस्कृति संघर्ष’ कहकर समझना पर्याप्त नहीं होगा। इसे ‘संसाधन प्रतिस्पर्धा की भावना’ के रूप में देखना होगा। यानी लोगों को लगता है कि नौकरी, कल्याण, शिक्षा, सार्वजनिक सुविधाएं, स्थानीय सुरक्षा और अवसरों में उनका हिस्सा कम हो रहा है। यह भावना तथ्यात्मक रूप से हमेशा सही हो, जरूरी नहीं; लेकिन राजनीति और सोशल मीडिया में भावना अक्सर तथ्य से ज्यादा ताकतवर होती है।

समस्या तब और बढ़ती है जब संचार की कमी या प्रशासनिक उदासीनता के कारण छोटी-छोटी गलतफहमियां सामुदायिक तनाव में बदल जाती हैं। यदि किसी इलाके में बहुभाषी सार्वजनिक सूचना नहीं है, तो नियमों को लेकर भ्रम होगा। यदि स्कूलों में बहुसांस्कृतिक पृष्ठभूमि वाले बच्चों के लिए पर्याप्त परामर्श और समर्थन नहीं है, तो दूरी बढ़ेगी। यदि श्रम अधिकारों की जानकारी विदेशी मजदूरों तक ठीक से नहीं पहुंचती, तो शोषण और तनाव दोनों बढ़ेंगे। लेकिन सोशल मीडिया इन जटिल कारणों को जगह नहीं देता। वहां एक वीडियो, एक क्लिप, एक घटना पूरी आबादी के खिलाफ संदेह पैदा करने के लिए काफी होती है।

यही वह जगह है जहां नफरत ‘राय’ की तरह खपत होने लगती है। लोग कहते हैं—“हम तो सिर्फ सच बोल रहे हैं”, “यह तो मजाक है”, “हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल कर रहे हैं।” लेकिन लोकतांत्रिक समाज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और किसी समूह को अमानवीय बना देने वाली भाषा के बीच फर्क करना जरूरी होता है। कोरिया में यह बहस अब केंद्र में है कि जब कोई भाषा बार-बार किसी समूह को कमतर, संदिग्ध, अशुद्ध, असभ्य या खतरनाक ठहराती है, तो उसका असर केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहता। वह भर्ती, मकान, स्कूल, सार्वजनिक व्यवहार और प्रशासनिक प्रतिक्रिया तक फैलता है।

भारत के लिए यह बहस भी प्रासंगिक है। हमारा संविधान विविधता को जगह देता है, लेकिन रोजमर्रा का सार्वजनिक जीवन अक्सर बराबरी से पीछे रह जाता है। कोरिया का अनुभव हमें यह याद दिलाता है कि आर्थिक चिंता और सामाजिक असुरक्षा के समय लोकतांत्रिक संवेदनशीलता को मजबूत करना और भी जरूरी हो जाता है, वरना बहुसंख्यक असुरक्षा के नाम पर अल्पसंख्यक या नए समुदायों को बलि का बकरा बनाना बहुत आसान हो जाता है।

एल्गोरिदम, मीम और वायरल क्रोध: ऑनलाइन घृणा कैसे बनती है सामाजिक सच

आज के डिजिटल दौर में नफरत का प्रसार केवल इसलिए तेज नहीं है कि लोग अधिक कटु हो गए हैं, बल्कि इसलिए भी कि प्लेटफॉर्म संरचनाएं तीव्र, उत्तेजक और विभाजनकारी सामग्री को पुरस्कृत करती हैं। कोरिया में इस पर गहरी चिंता व्यक्त की जा रही है कि छोटे, तीखे और चुभने वाले वाक्य, अपमानजनक मीम, सांस्कृतिक मजाक और किसी खास राष्ट्रीयता या रूप-रंग पर आधारित टिप्पणियां एल्गोरिदम के जरिए तेज़ी से फैलती हैं। जितनी अधिक प्रतिक्रिया, उतनी अधिक दृश्यता; जितनी अधिक दृश्यता, उतनी अधिक वैधता का भ्रम।

यह प्रक्रिया भारत में भी अनजानी नहीं। यहां भी हमने देखा है कि गंभीर मुद्दों की जगह कई बार संक्षिप्त, उग्र और भावनात्मक सामग्री जनमत को प्रभावित करने लगती है। पूरी रिपोर्ट पढ़ने के बजाय लोग 20 सेकंड के क्लिप, अधूरी तस्वीर या उकसाऊ कैप्शन से निष्कर्ष बना लेते हैं। कोरिया में भी यही हो रहा है। प्रसंग गायब हो जाता है, तथ्यों की जटिलता छंट जाती है, और बस एक उत्तेजक फ्रेम बचता है—“वे लोग ऐसे हैं”, “उनसे खतरा है”, “उनकी संस्कृति समस्या है”, “उन्हें विशेष सुविधा मिलती है”, “वे हमारे हिस्से पर कब्जा कर रहे हैं।”

खतरा यहीं खत्म नहीं होता। बार-बार किसी अपमानजनक भाषा को देखने से समाज की संवेदनशीलता कम होने लगती है। जो बात पहले चुभती थी, वह धीरे-धीरे ‘सामान्य मजाक’ लगने लगती है। फिर वही भाषा दोस्तों की बातचीत, स्कूलों के मजाक, कार्यस्थलों की टिप्पणियों और स्थानीय गपशप में प्रवेश कर जाती है। यानी ऑनलाइन नफरत का एक हिस्सा सामाजिक सामान्य व्यवहार बन जाता है। यही वह बिंदु है जहां डिजिटल सामग्री वास्तविक भेदभाव का आधार बनती है।

कोरिया में इस बात पर खास चिंता है कि ऑनलाइन घृणात्मक भाषा अब अक्सर बहिष्कार, उपभोक्ता व्यवहार और सामूहिक शत्रुता को भी प्रभावित करती है। किसी खास देश, संस्कृति या समूह को लेकर चलाया गया नकारात्मक अभियान बहुत जल्दी बहिष्कार की अपील, अपमानजनक हैशटैग, संगठित ट्रोलिंग या सामुदायिक निंदा में बदल सकता है। इसमें यह फर्क मिट जाता है कि किसी व्यक्ति ने क्या किया और पूरे समुदाय पर क्या आरोप लगाया जा रहा है। एक घटना से पूरी पहचान पर हमला होने लगता है।

भारत में भी सोशल मीडिया के इस स्वभाव को समझना बेहद जरूरी है। हमारे यहां राजनीतिक ध्रुवीकरण, धार्मिक तनाव, जातीय पूर्वाग्रह और क्षेत्रीय असमानताएं पहले से मौजूद हैं। ऐसे में कोरिया की यह कहानी केवल दूर देश की खबर नहीं, बल्कि डिजिटल सार्वजनिक क्षेत्र के वैश्विक संकट का हिस्सा है। एल्गोरिदम का ‘क्रोध-आधारित अर्थशास्त्र’ समाजों को इस दिशा में धकेलता है कि तर्कसंगत बातचीत के बजाय भावनात्मक आक्रोश अधिक बिके।

इसलिए कोरिया में यह तर्क मजबूत हो रहा है कि घृणासूचक भाषा का सवाल केवल ‘किसी की भावना आहत’ होने का नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा और सामुदायिक स्थिरता का मुद्दा है। अगर किसी बच्चे को अपनी मातृभाषा बोलने में शर्म आने लगे, किसी प्रवासी महिला को सरकारी दफ्तर जाने में डर लगे, किसी विदेशी मजदूर को शिकायत दर्ज कराने से हिचक हो, या किसी छात्र को अपनी पहचान छिपानी पड़े—तो इसका मतलब है कि समाज की अनौपचारिक सीमाएं कठोर हो चुकी हैं।

ऑफलाइन असर: स्कूल, कार्यस्थल, मोहल्ले और चुप्पी का विस्तार

डिजिटल नफरत की सबसे खतरनाक विशेषता यह है कि वह हमेशा खुले टकराव में नहीं बदलती। कई बार उसका सबसे गहरा प्रभाव चुप्पी, संकोच और आत्म-सेंसरशिप के रूप में सामने आता है। कोरिया में बहुसांस्कृतिक परिवारों के बच्चों, विवाह के जरिए आई प्रवासी महिलाओं, विदेशी छात्रों और मजदूरों के बीच यह चिंता बढ़ रही है कि सार्वजनिक जीवन में वे किस हद तक खुद बने रह सकते हैं। अगर कोई बच्चा स्कूल में अपनी दूसरी भाषा बोलने से बचे, यदि कोई कर्मचारी अपना उच्चारण छिपाने की कोशिश करे, यदि कोई पड़ोसी स्थानीय समुदाय के कार्यक्रमों से दूरी बनाए रखे—तो यह दिखाता है कि नफरत का असर हिंसा से पहले ही सामाजिक भागीदारी को सीमित कर चुका है।

यही स्थिति लोकतांत्रिक समाजों के लिए बेहद खतरनाक होती है। क्योंकि तब बहिष्कार आंखों से कम और व्यवहार में अधिक दिखाई देता है। कोई औपचारिक आदेश नहीं होता कि अमुक व्यक्ति यहां नहीं आएगा, अमुक परिवार यहां नहीं रहेगा, अमुक छात्र अलग बैठेगा—लेकिन माहौल ऐसा बन जाता है कि लोग खुद ही पीछे हटने लगते हैं। इससे अधिकारों तक पहुंच कम होती है, शिकायत दर्ज कराने का भरोसा टूटता है, और सामाजिक अलगाव बढ़ता है।

कोरिया में इस पर बढ़ती चर्चा हो रही है कि नफरत केवल अल्पसंख्यकों या प्रवासी पृष्ठभूमि वाले लोगों को ही आहत नहीं करती; यह बहुसंख्यक समाज को भी थका देती है। जब मोहल्लों में अफवाह, शक और सामूहिक आरोपों का माहौल बनता है, तो सामान्य नागरिक भी असुरक्षित और तनावग्रस्त महसूस करते हैं। दुकानों, स्कूलों, अपार्टमेंट परिसरों और स्थानीय समूहों में भरोसे का क्षरण होता है। और एक बार जब समाज किसी एक समूह को आसानी से बाहर धकेलना सीख लेता है, तो भविष्य में दूसरे समूहों के साथ भी वही हो सकता है। नफरत का स्वभाव फैलावकारी होता है; उसका लक्ष्य बदल सकता है, उसकी भाषा नए चेहरों पर चढ़ सकती है।

भारतीय समाज इस सत्य को भलीभांति समझ सकता है। हमने बार-बार देखा है कि किसी एक समुदाय के विरुद्ध सामान्यीकृत नफरत अंततः व्यापक सामाजिक अविश्वास को जन्म देती है। एक समय में जो भाषा किसी ‘दूसरे’ के लिए स्वीकार्य बनती है, वही भाषा बाद में राजनीतिक विरोधियों, प्रवासियों, क्षेत्रीय समूहों, गरीबों, महिलाओं या किसी भी असुरक्षित समुदाय पर लागू होने लगती है। इसलिए कोरिया की यह चिंता केवल नैतिक अपील नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिरता का प्रश्न है।

समाजशास्त्र और शिक्षा से जुड़े विशेषज्ञ कोरिया में इसे नागरिकता संकट के रूप में भी देख रहे हैं। उनका कहना है कि यदि लोग मतभेद को संवाद से नहीं, उपहास और कलंक से संभालने लगें, तो लोकतंत्र की रोजमर्रा की संस्कृति कमजोर पड़ने लगती है। सह-अस्तित्व का अर्थ यह नहीं कि सभी समान विचार रखें; इसका अर्थ यह है कि असहमति, विविधता और अपरिचय के बावजूद समाज गरिमा के न्यूनतम मानदंड बनाए रखे। अगर यह ढांचा ढहता है, तो उसकी कीमत स्कूलों, अदालतों, मीडिया, स्थानीय प्रशासन और सामुदायिक संबंधों को चुकानी पड़ती है।

गिम्हे का संदेश: सह-अस्तित्व कोई आदर्शवादी नारा नहीं, स्थानीय भविष्य की शर्त

दक्षिण कोरिया के गिम्हे जैसे शहरों में हाल के समय में ‘नफरत नहीं, सह-अस्तित्व’ का संदेश फिर से प्रमुखता से सामने आया है। यह संयोग नहीं है। गिम्हे उन इलाकों में गिना जाता है जहां बहुसांस्कृतिक आबादी और प्रवासी पृष्ठभूमि वाले निवासी स्थानीय जीवन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं। ऐसे शहरों में उद्योग, श्रम, शिक्षा, परिवार संरचना और सेवाएं अब विविध समुदायों के योगदान से चलती हैं। इसलिए वहां सामाजिक एकीकरण की विफलता का सीधा असर स्थानीय अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्वास्थ्य पर पड़ता है।

इसका भारतीय समानांतर समझना कठिन नहीं। देश के कई औद्योगिक और सेवा-आधारित शहर प्रवासी श्रमिकों के बिना नहीं चल सकते। महानगरों से लेकर टियर-2 शहरों तक, निर्माण, परिवहन, घरेलू काम, रेस्टोरेंट, लॉजिस्टिक्स, कृषि और छोटे उद्योग बाहरी श्रम पर टिके हैं। इसके बावजूद प्रवासी समुदायों को अक्सर स्थायी नागरिक साझेदार की तरह नहीं, बल्कि अस्थायी उपयोगिता की वस्तु की तरह देखा जाता है। कोरिया के स्थानीय शहरों के सामने भी लगभग यही नैतिक और प्रशासनिक चुनौती है।

गिम्हे के उदाहरण का असली अर्थ यही है कि सह-अस्तित्व कोई उदार भावुकता भर नहीं, बल्कि जनसंख्या में गिरावट, युवाओं के पलायन और स्थानीय अर्थव्यवस्था के दबावों के बीच क्षेत्रीय अस्तित्व की रणनीति भी हो सकता है। यदि कोई समाज नए निवासियों और बहुसांस्कृतिक परिवारों को केवल संदेह की दृष्टि से देखेगा, तो वह अपनी ही जनसांख्यिकीय और आर्थिक चुनौतियों को गहरा करेगा। खासकर ऐसे दौर में जब श्रम की जरूरत, देखभाल सेवाओं की मांग और स्थानीय बाजारों की स्थिरता नए सामाजिक समूहों के सहारे टिक रही हो।

लेकिन यहां एक अहम बात समझनी होगी—सह-अस्तित्व केवल पोस्टर, नारे या प्रतीकात्मक कार्यक्रमों से नहीं बनता। अगर प्रशासन में दुभाषिया सहायता नहीं होगी, सार्वजनिक सेवाएं बहुभाषी नहीं होंगी, स्कूलों में परामर्श तंत्र मजबूत नहीं होगा, श्रम कानूनों की जानकारी उपलब्ध नहीं होगी, मकान और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच सरल नहीं होगी, और भेदभाव के मामलों में शिकायत तंत्र विश्वसनीय नहीं होगा, तो ‘समावेशन’ का विचार खाली नारा बनकर रह जाएगा।

कोरिया में इसीलिए यह बात जोर पकड़ रही है कि सह-अस्तित्व को दया या बहुसंख्यक सद्भावना पर नहीं छोड़ा जा सकता। उसे संस्थागत रूप देना होगा। इसका अर्थ है—स्पष्ट नियम, पारदर्शी संचार, स्थानीय स्तर पर विवाद समाधान, स्कूलों में संवेदनशीलता, मीडिया में जिम्मेदार भाषा, और ऐसी प्रशासनिक संरचना जो विविध पृष्ठभूमि वाले निवासियों को बराबरी से संबोधित करे। गिम्हे जैसे शहर इसलिए महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि वे दिखाते हैं कि विविधता का सवाल राजधानी के बौद्धिक विमर्श तक सीमित नहीं, बल्कि स्थानीय शासन की व्यावहारिक परीक्षा बन चुका है।

सह-अस्तित्व की असली बुनियाद: सद्भावना नहीं, संस्थागत न्याय

कोरिया में उभरती बहस का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही है कि किसी समाज को जोड़कर रखने के लिए केवल ‘अच्छे इरादे’ काफी नहीं होते। सह-अस्तित्व तब टिकाऊ बनता है जब वह नियमों, अधिकारों, जवाबदेही और संवाद के विश्वसनीय ढांचे पर खड़ा हो। अगर किसी बहुसांस्कृतिक परिवार को स्कूल में कठिनाई हो, तो मदद कैसे मिलेगी? यदि किसी प्रवासी मजदूर के साथ भेदभाव हो, तो शिकायत किस मंच पर सुनी जाएगी? अगर किसी स्थानीय समुदाय में अफवाह फैल रही हो, तो उसे रोकने और तथ्य साझा करने की जिम्मेदारी किसकी होगी? यदि इन सवालों के स्पष्ट उत्तर नहीं हैं, तो नफरत खाली जगह भर देती है।

भारतीय लोकतंत्र के अनुभव से भी यह सबक निकलता है कि विविध समाजों में सद्भावना का महत्व तो है, लेकिन उसकी सीमाएं भी हैं। किसी शहर की शांति केवल इस बात पर निर्भर नहीं रह सकती कि बहुसंख्यक कितने उदार हैं; उसे कानून, संस्थाओं और समान व्यवहार के भरोसे पर भी टिकना होता है। जब संस्थाएं कमजोर पड़ती हैं, तो समाज में पूर्वाग्रहों को चुनौती देने की क्षमता भी घट जाती है। कोरिया में आज यही बहस प्रासंगिक है—क्या राज्य, स्थानीय प्रशासन, शिक्षा प्रणाली और डिजिटल प्लेटफॉर्म मिलकर ऐसी संरचना बना सकते हैं जो घृणासूचक भाषा को सामान्य सार्वजनिक व्यवहार बनने से रोके?

इसके लिए कुछ स्तरों पर समानांतर काम जरूरी होगा। पहला, नागरिक शिक्षा। स्कूलों और विश्वविद्यालयों में विविधता, गरिमा और डिजिटल साक्षरता पर गंभीर प्रशिक्षण आवश्यक है। दूसरा, मीडिया जिम्मेदारी। यदि सनसनीखेज शीर्षक और सांस्कृतिक रूढ़ियों को बढ़ावा दिया जाएगा, तो सामाजिक अविश्वास गहरा होगा। तीसरा, प्लेटफॉर्म जवाबदेही। एल्गोरिदम आधारित प्रसार को पूरी तरह तटस्थ मानना अब संभव नहीं; जिस सामग्री को संरचना बढ़ाती है, उसके सामाजिक परिणामों पर भी चर्चा जरूरी है। चौथा, स्थानीय शासन। बहुभाषी सूचना, सामुदायिक मध्यस्थता, अनुवाद सहायता, परामर्श सेवाएं और शिकायत निवारण तंत्र सह-अस्तित्व की मूल शर्तें हैं।

और पांचवां, सार्वजनिक भाषा की मर्यादा। यह किसी एक विचारधारा की मांग नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक समाज की न्यूनतम आवश्यकता है। यदि किसी समुदाय के बारे में लगातार अपमानजनक, अमानवीय या संदिग्ध भाषा बोले जाने लगे, तो अंततः पूरा लोकतांत्रिक वातावरण विषाक्त होता है। कोरिया के संदर्भ में यह चेतावनी इसलिए भी अहम है क्योंकि वहां समाज तीव्र तकनीकी संपर्क, त्वरित सूचना-प्रवाह और भावनात्मक ध्रुवीकरण के नए दौर में प्रवेश कर चुका है। यहां शब्दों का असर पहले से कहीं तेज है।

भारत के पाठकों के लिए कोरिया की यह कहानी एक दर्पण की तरह भी है। हम अक्सर कोरिया को सांस्कृतिक आकर्षण और तकनीकी दक्षता की नजर से देखते हैं, लेकिन वहां चल रही यह बहस हमें याद दिलाती है कि आधुनिकता अपने साथ नई तरह की नाजुकताएं भी लाती है। तेजी से बदलती अर्थव्यवस्था, डिजिटल प्लेटफॉर्म, पहचान की राजनीति और जनसांख्यिकीय बदलाव मिलकर किसी भी समाज को कठिन सवालों के सामने खड़ा कर सकते हैं। उन सवालों का जवाब भावनात्मक प्रतिक्रिया में नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण संस्थाओं और जिम्मेदार सार्वजनिक संस्कृति में मिलता है।

आखिर क्यों ‘सामाजिक एकता’ कोरिया का सबसे बड़ा सवाल बन गई है

दक्षिण कोरिया में आज ‘सामाजिक एकता’ केवल आदर्शवादी राजनीतिक शब्द नहीं, बल्कि व्यवहारिक राष्ट्रीय आवश्यकता बन चुकी है। कारण स्पष्ट हैं। समाज बदल रहा है, जनसंख्या का ढांचा बदल रहा है, श्रम और परिवार की संरचनाएं बदल रही हैं, स्थानीय शहरों की जरूरतें बदल रही हैं, और डिजिटल संचार की गति इंसानी संवेदनशीलता से कहीं तेज हो चुकी है। ऐसे दौर में यदि साझा नागरिकता की भावना कमजोर पड़ी, तो न केवल अल्पसंख्यक समूह बल्कि पूरी सामाजिक व्यवस्था अस्थिर हो सकती है।

कोरिया के लिए यह परीक्षा इसलिए कठिन है क्योंकि उसे एक साथ कई मोर्चों पर संतुलन बनाना है—अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच, आर्थिक जरूरत और सामाजिक समावेशन के बीच, सांस्कृतिक पहचान और लोकतांत्रिक बहुलता के बीच, तथा डिजिटल स्वतंत्रता और सामुदायिक सुरक्षा के बीच। यह आसान समीकरण नहीं। लेकिन यही आधुनिक राष्ट्र-राज्य की वास्तविक चुनौती है।

जो बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है, वह यह कि नफरत का मुकाबला केवल नैतिक अपील से नहीं होगा। यह तभी संभव है जब समाज स्पष्ट रूप से स्वीकार करे कि घृणासूचक भाषा का प्रभाव रोजगार, शिक्षा, आवास, प्रशासनिक पहुंच और स्थानीय जीवन के अवसरों पर पड़ता है। जब तक इसे सिर्फ ‘कुछ लोगों की खराब भाषा’ मानकर छोड़ा जाएगा, तब तक समस्या सतह के नीचे फैलती रहेगी।

भारत की तरह कोरिया भी अब उस मोड़ पर है जहां उसे यह तय करना होगा कि विविधता को बोझ माना जाए या भविष्य की शक्ति। यह फैसला केवल कानून से नहीं होगा; यह रोजमर्रा के सार्वजनिक व्यवहार, मीडिया की भाषा, राजनीति की जिम्मेदारी और संस्थाओं की निष्पक्षता से तय होगा। अगर समाज विविधता को बराबरी और गरिमा के साथ जगह देता है, तो वह अधिक लचीला, अधिक रचनात्मक और अधिक स्थिर बनता है। यदि वह नफरत को ‘राय’ और अपमान को ‘मजाक’ कहकर सामान्य कर देता है, तो उसकी कीमत आने वाली पीढ़ियां चुकाती हैं।

दक्षिण कोरिया की मौजूदा बहस हमें यही बताती है कि आधुनिक समाजों की असली परीक्षा उनकी आर्थिक चमक से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि वे अपने सबसे कमजोर, सबसे नए और सबसे ‘अलग’ दिखने वाले नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। और शायद यही कारण है कि आज कोरिया में सामाजिक एकता केवल एक नीति-वाक्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय भविष्य का केंद्रीय प्रश्न बन गई है।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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