
सियोल की पहल क्यों चर्चा में है
दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल ने एक बार फिर यह संकेत दिया है कि भविष्य की औद्योगिक प्रतिस्पर्धा केवल बड़े पूंजी निवेश से नहीं, बल्कि सही साझेदारियों से तय होगी। सियोल महानगर सरकार और सियोल बिजनेस एजेंसी, जिसे संक्षेप में एसबीए कहा जाता है, ने 12 मध्यम आकार की कंपनियों के साथ मिलकर रोबोटिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई क्षेत्र के स्टार्टअप्स की तलाश शुरू की है। पहली नजर में यह एक सामान्य स्टार्टअप आमंत्रण जैसा लग सकता है, लेकिन असल महत्व इसके ढांचे में छिपा है। यह केवल आवेदन बुलाने या मंच सजाने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि तकनीक विकसित कर रही छोटी कंपनियों को वास्तविक औद्योगिक जरूरतों से जोड़ने की एक योजनाबद्ध कोशिश है।
कोरिया की टेक अर्थव्यवस्था में यह घोषणा इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि यहां लंबे समय से स्टार्टअप समर्थन का मतलब अक्सर फंड, साझा दफ्तर, मेंटरिंग या प्रदर्शन कार्यक्रम भर रह गया था। लेकिन रोबोट और एआई जैसे क्षेत्रों में केवल पूंजी से बाजार नहीं बनता। किसी मशीन को कारखाने में लगाना हो, किसी विजन एआई मॉडल से उत्पादन लाइन में खराब उत्पाद पहचानने हों, या किसी सेवा रोबोट को अस्पताल, मॉल या कार्यालय परिसर में तैनात करना हो, उसके लिए वास्तविक उपयोगकर्ता, डेटा, फील्ड टेस्ट और परिचालन सत्यापन जरूरी होता है।
भारतीय पाठकों के लिए इसे समझने का सबसे आसान तरीका यह है कि इसे किसी ऐसे मॉडल की तरह देखा जाए जिसमें केवल स्टार्टअप इंडिया जैसी उद्यमिता प्रेरणा नहीं, बल्कि उत्पादन आधारित पीएलआई, उद्योग साझेदारी और लाइव टेस्टबेड का मिश्रण हो। हमारे यहां भी अक्सर नई तकनीकी कंपनियां कहती हैं कि निवेश मिल जाए तो वे बढ़ेंगी, लेकिन असली चुनौती पहली भुगतान करने वाली ग्राहक कंपनी ढूंढना होती है। सियोल का यह कार्यक्रम सीधे उसी दर्द बिंदु पर चोट करता दिखता है।
दक्षिण कोरिया का औद्योगिक ढांचा भारत से अलग जरूर है, लेकिन समस्या दोनों जगह समान है। शुरुआती तकनीकी कंपनियों के पास अच्छे विचार और सक्षम इंजीनियर होते हैं, पर उन्हें ऐसे उद्योग भागीदार नहीं मिलते जो जोखिम लेकर उनके समाधान को परखें। सियोल और एसबीए का यह मॉडल इस मायने में अहम है कि यह सरकारी संस्था को अनुदान देने वाले प्राधिकरण के बजाय भरोसेमंद मध्यस्थ की भूमिका में रखता है। यही पहल भविष्य के ओपन इनोवेशन बाजार के लिए एक नई परीक्षा बन सकती है।
रोबोट और एआई अब अलग-अलग दुनिया नहीं रहे
खबर का एक बड़ा संकेत यह भी है कि रोबोट और एआई को अलग-अलग बाजारों के बजाय एक संयुक्त औद्योगिक समाधान के रूप में देखा जा रहा है। कोरिया में भी, और अब तेजी से भारत में भी, यह स्पष्ट हो चुका है कि रोबोट केवल हार्डवेयर नहीं और एआई केवल सॉफ्टवेयर नहीं है। असली व्यावसायिक सफलता वहां मिलती है जहां दोनों मिलकर किसी स्पष्ट समस्या का समाधान करते हैं। उदाहरण के लिए, गोदाम में चलने वाला स्वचालित रोबोट तभी उपयोगी है जब वह कैमरा विजन, मार्ग पहचान, अवरोध विश्लेषण और कार्य आदेश प्रणाली के साथ जुड़ सके। इसी तरह किसी उत्पादन इकाई में एआई आधारित गुणवत्ता जांच तभी सफल होती है जब कैमरे, सेंसर, कन्वेयर और मानव कार्यप्रवाह उसके अनुरूप व्यवस्थित हों।
कोरियाई औद्योगिक संदर्भ में यह बात खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि वहां इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, लॉजिस्टिक्स, रिटेल और शहरी सेवाओं का एक सघन नेटवर्क मौजूद है। सियोल जैसी महानगरीय अर्थव्यवस्था में रोबोट की जरूरत केवल कारखानों तक सीमित नहीं रहती। डिलीवरी, इमारत प्रबंधन, हेल्थकेयर सहायता, बुजुर्ग देखभाल, होटल सेवाएं और स्मार्ट सिटी संचालन तक इसका विस्तार है। इसलिए जब सियोल प्रशासन रोबोट और एआई स्टार्टअप्स की तलाश की बात करता है, तो वह दरअसल शहरी अर्थव्यवस्था के अगले चरण की नींव रखने का संकेत देता है।
भारत में भी यह रुझान तेजी से उभर रहा है। बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, चेन्नई और गुरुग्राम जैसे तकनीकी केंद्रों में एआई स्टार्टअप्स की संख्या बढ़ रही है, लेकिन हार्डवेयर-समर्थित बुद्धिमान ऑटोमेशन का इकोसिस्टम अभी भी सीमित है। हमारे यहां ड्रोन, वेयरहाउस ऑटोमेशन, मेडिकल डिवाइसेज, स्मार्ट मैन्युफैक्चरिंग और कंप्यूटर विजन के कुछ अच्छे उदाहरण जरूर मिलते हैं, पर अधिकांश कंपनियां एक निर्णायक मोड़ पर आकर ठहर जाती हैं, क्योंकि उन्हें प्रयोगशाला से बाहर निकलने के लिए मजबूत औद्योगिक साझेदार नहीं मिलते।
यही वह जगह है जहां सियोल की यह पहल खास नजर आती है। यह मानकर चला जा रहा है कि तकनीकी उद्यमिता को केवल आइडिया प्रतियोगिता से नहीं, बल्कि वास्तविक संचालन वातावरण में परखा जाना चाहिए। ठीक वैसे ही जैसे किसी भारतीय फिल्म की सफलता केवल ट्रेलर देखकर तय नहीं होती, बल्कि सिनेमाघर में दर्शकों की प्रतिक्रिया से तय होती है, उसी तरह एआई और रोबोटिक्स की असली परीक्षा बाजार के वास्तविक उपयोग में होती है।
12 मध्यम आकार की कंपनियां ही इस मॉडल का असली केंद्र क्यों हैं
इस पहल का सबसे दिलचस्प पहलू यह नहीं कि स्टार्टअप्स बुलाए जा रहे हैं, बल्कि यह है कि 12 मध्यम आकार की कंपनियां पहले से इस कार्यक्रम का हिस्सा हैं। कोरियाई कारोबारी संदर्भ में इन्हें अक्सर बड़ी बहुराष्ट्रीय दिग्गज कंपनियों और छोटी कंपनियों के बीच की महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है। इन्हें हिंदी में मध्यम या मध्य-आकार की कंपनियां कहना अधिक उचित होगा। यही वर्ग कई बार नई तकनीक को जमीन पर उतारने में सबसे निर्णायक साबित होता है।
बड़ी कंपनियों के पास संसाधन बहुत होते हैं, लेकिन निर्णय प्रक्रिया लंबी और जटिल होती है। परीक्षण, अनुपालन, खरीद, सुरक्षा, एकीकरण और जोखिम प्रबंधन की कई परतों के कारण स्टार्टअप के लिए वहां प्रवेश आसान नहीं होता। इसके विपरीत, मध्यम आकार की कंपनियां अधिक चुस्त होती हैं। उन्हें उत्पादकता, लागत, गुणवत्ता और गति बढ़ाने के लिए व्यावहारिक समाधान जल्दी चाहिए होते हैं। वे प्रायः किसी विशेष उत्पादन प्रक्रिया, सेवा मॉडल या आंतरिक दक्षता में सुधार के लिए बाहरी तकनीक अपनाने को तैयार रहती हैं।
यही कारण है कि सियोल और एसबीए ने इस कार्यक्रम में सीधे मध्यम आकार की कंपनियों को जोड़ा है। इससे स्टार्टअप्स के सामने केवल मंच पर प्रस्तुति देने का अवसर नहीं, बल्कि संभावित पहले ग्राहक तक पहुंच का रास्ता खुलता है। किसी एआई स्टार्टअप के लिए यह बहुत बड़ा फर्क पैदा करता है। मान लीजिए कोई कंपनी कंप्यूटर विजन से निर्माण इकाई में दोष पहचानने की तकनीक विकसित कर रही है। वह निवेशकों के सामने स्लाइड दिखाकर कुछ हद तक प्रभावित कर सकती है, लेकिन यदि वह कहे कि उसकी तकनीक ने एक वास्तविक फैक्टरी में खराब उत्पाद पहचानने की दर बढ़ाई और लागत घटाई, तो उसका भरोसा कई गुना बढ़ जाता है।
रोबोटिक्स कंपनियों के लिए यह लाभ और भी बड़ा है। हार्डवेयर बनाने वाली कंपनी को उपकरण निर्माण, इंस्टॉलेशन, परीक्षण, रखरखाव, सुरक्षा मानकों और ऑन-ग्राउंड सपोर्ट की लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। यदि उसे शुरुआत में ही एक सहयोगी औद्योगिक भागीदार मिल जाए तो उत्पाद का परिष्कार तेज हो जाता है। यह कुछ वैसा ही है जैसे किसी नए क्रिकेटर को सिर्फ नेट प्रैक्टिस नहीं, बल्कि रणजी मैचों में नियमित अवसर मिल जाएं। वास्तविक मैच ही प्रतिभा को साबित करते हैं।
मध्यम आकार की कंपनियों को भी इससे फायदा है। वे अपनी सारी तकनीकी जरूरतें घर के भीतर विकसित नहीं कर सकतीं। तेज बदलाव वाले क्षेत्रों में बाहरी नवाचार से जुड़ना लागत बचत भर नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धा में टिके रहने की रणनीति है। इसलिए सियोल का यह मॉडल दोनों पक्षों के हितों को एक मंच पर लाने का प्रयास है।
स्टार्टअप नीति में बदलाव: अनुदान से आगे, असली जरूरत है परीक्षण और ग्राहक
पिछले कई वर्षों में एशिया के अनेक देशों की तरह दक्षिण कोरिया में भी स्टार्टअप नीति का बड़ा जोर फंडिंग, इनक्यूबेशन, प्रशिक्षण और नेटवर्किंग पर रहा है। लेकिन रोबोट और एआई जैसे क्षेत्रों ने यह दिखा दिया है कि उद्यमिता नीति की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं हो सकता कि कितनी कंपनियों को सहायता मिली। सवाल यह है कि उनमें से कितनी कंपनियां उत्पाद को बाजार में स्थापित कर पाईं, कितनी ने पायलट प्रोजेक्ट को भुगतान वाले अनुबंध में बदला, और कितनी ने दीर्घकालिक ग्राहक आधार बनाया।
यहीं यह कार्यक्रम नीतिगत बदलाव का संकेत देता है। यदि इसमें भाग लेने वाली कंपनियों को वास्तविक मांग-आधारित समस्याएं दी जाती हैं, और उनके समाधान को सीमित समय के पायलट से गुजरने का अवसर मिलता है, तो यह स्टार्टअप प्रोत्साहन नहीं, बल्कि बाजार प्रवेश अवसंरचना बन सकता है। यह फर्क बहुत महत्वपूर्ण है। स्टार्टअप सहायता और स्टार्टअप बाजार-निर्माण में जमीन-आसमान का अंतर है।
भारत में भी यह सवाल तेजी से उठ रहा है। क्या केवल हैकाथॉन, इनोवेशन चैलेंज और ग्रांट आधारित मॉडल पर्याप्त हैं? या फिर हमें ऐसे ढांचे चाहिए जिनमें रेलवे, अस्पताल, नगर निगम, लॉजिस्टिक्स कंपनियां, निर्माण इकाइयां और खुदरा नेटवर्क शुरुआती ग्राहक के रूप में सामने आएं? सियोल का मॉडल यही कहता प्रतीत होता है कि तकनीकी उद्यमिता को निवेशकों के मंच से निकालकर ऑपरेशन के मैदान में ले जाना होगा।
रोबोटिक्स में चुनौती और कठिन हो जाती है। किसी रोबोटिक समाधान को सफल बनाने के लिए सेंसर, कंट्रोल सिस्टम, सॉफ्टवेयर, सुरक्षा मानक, रखरखाव ढांचा और उपयोगकर्ता प्रशिक्षण सब कुछ साथ काम करना चाहिए। वहीं एआई क्षेत्र में डेटा की गुणवत्ता, मॉडल की विश्वसनीयता, ग्राहक कंपनी की कार्यप्रणाली के साथ अनुकूलन, और तैनाती के बाद प्रदर्शन की निगरानी जरूरी होती है। इसलिए सार्वजनिक संस्थाओं द्वारा समर्थित कार्यक्रमों की विश्वसनीयता इस बात से तय होगी कि वे इन सभी स्तरों पर कितनी गहराई से सहयोग कराते हैं।
यदि यह पहल केवल आवेदन संख्या, चयनित स्टार्टअप्स और मीडिया प्रचार तक सीमित रह गई, तो इसका प्रभाव सीमित होगा। लेकिन अगर कुछ कंपनियां वास्तविक औद्योगिक वातावरण में समाधान स्थापित कर पाती हैं और उसके बाद व्यावसायिक अनुबंध करती हैं, तो यह मॉडल कोरिया के नवाचार बाजार में एक मानक बन सकता है।
सियोल की औद्योगिक रणनीति: शहर को परीक्षण-स्थल से तकनीकी हब बनाना
सियोल पारंपरिक अर्थों में भारी विनिर्माण का शहर नहीं है, लेकिन यह प्रतिभा, सॉफ्टवेयर क्षमता, शहरी सेवा नेटवर्क और कारोबारी मांग का बड़ा केंद्र है। यही वजह है कि शहर-आधारित तकनीकी नीति यहां अलग अर्थ रखती है। रोबोटिक्स का अर्थ अब केवल फैक्टरी ऑटोमेशन नहीं रह गया है। आज शहरी जीवन से जुड़ी सेवाओं में इसकी भूमिका बढ़ रही है। वेयरहाउस लॉजिस्टिक्स, स्मार्ट बिल्डिंग, स्वास्थ्य सेवाएं, सार्वजनिक सुविधा प्रबंधन, रिटेल अनुभव और बुजुर्ग देखभाल जैसे क्षेत्रों में रोबोट और एआई का उपयोग बढ़ता जा रहा है।
सियोल सरकार की यह पहल इस बात का संकेत भी है कि वह तकनीक को उद्योग मंत्रालय की फाइलों तक सीमित विषय नहीं मानती, बल्कि शहरी शासन और आर्थिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा समझती है। यदि कोई शहर केवल स्टार्टअप्स को पंजीकृत करवा दे, कोवर्किंग स्पेस दे दे और सम्मेलन करवा दे, तो वह नवाचार का केंद्र नहीं बनता। नवाचार केंद्र बनने के लिए शहर को ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र बनना पड़ता है जहां विचार, पूंजी, ग्राहक, परीक्षण, नियमन और प्रतिभा एक-दूसरे से जुड़ सकें।
भारत के बड़े शहरों के लिए भी इसमें सीख है। बेंगलुरु प्रतिभा और सॉफ्टवेयर नवाचार का केंद्र है, हैदराबाद डेटा और उद्यम नेटवर्क का, पुणे विनिर्माण और इंजीनियरिंग का, गुरुग्राम कॉर्पोरेट मांग का, और चेन्नई औद्योगिक क्षमता का। यदि राज्य सरकारें और शहर प्रशासन इन संसाधनों को वास्तविक परीक्षण ढांचों से जोड़ें, तो भारत में भी रोबोटिक्स और एआई को व्यापक औद्योगिक दिशा मिल सकती है। फिलहाल कई पहलें मौजूद हैं, पर उनका विखंडन अधिक है।
सियोल की चुनौती भी कम नहीं है। शहर में जमीन और संचालन लागत अधिक है। रोबोटिक्स कंपनियों को बड़े परीक्षण क्षेत्र, वास्तविक साइट, सुरक्षा मंजूरी और निरंतर फील्ड सपोर्ट चाहिए। केवल यह तथ्य कि शहर में बहुत सी कंपनियां मौजूद हैं, अपने आप में पर्याप्त नहीं है। असली परीक्षा यह होगी कि प्रशासन इस कार्यक्रम को कितनी मजबूती से टेस्टबेड, पायलट डिजाइन, अनुबंध सुविधा और बाद की तैनाती से जोड़ता है।
यदि यह जुड़ाव सफल रहता है, तो सियोल केवल स्टार्टअप्स का शहर नहीं रहेगा, बल्कि तकनीकी सत्यापन का केंद्र बन सकता है। यही वह स्थिति है जहां कोई महानगर क्षेत्रीय और वैश्विक निवेशकों के लिए अधिक आकर्षक हो जाता है।
निवेश बाजार के लिए क्या संदेश है
रोबोटिक्स और एआई अभी भी निवेशकों के सबसे पसंदीदा क्षेत्रों में गिने जाते हैं, लेकिन निवेश का स्वभाव बदल चुका है। कुछ वर्ष पहले तक तकनीकी मौलिकता, टीम की क्षमता और संभावित बाजार का आकार मुख्य तर्क होते थे। अब निवेशक अधिक कठोर प्रश्न पूछते हैं। क्या उत्पाद के लिए भुगतान करने वाला ग्राहक मौजूद है? क्या पायलट के बाद दोबारा राजस्व आएगा? क्या तकनीक केवल एक कंपनी के लिए कस्टमाइज्ड सेवा बनकर रह जाएगी, या उसका विस्तार भी संभव है? क्या तैनाती के बाद परिचालन लागत टिकाऊ है?
ऐसे माहौल में सियोल और एसबीए के साथ चलने वाला कार्यक्रम स्टार्टअप्स के लिए विश्वसनीयता का महत्वपूर्ण स्रोत बन सकता है। सार्वजनिक संस्थान द्वारा जोड़ा गया मध्यम आकार का औद्योगिक भागीदार किसी स्टार्टअप के लिए सिर्फ एक लोगो नहीं, बल्कि बाजार सत्यापन का प्रमाण बन सकता है। यह खासकर उन एआई कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण है जो अब केवल मॉडल की सटीकता के आधार पर खुद को अलग नहीं दिखा सकतीं। जनरेटिव एआई के प्रसार ने बुनियादी तकनीक तक पहुंच आसान कर दी है, इसलिए निवेशक अब पूछते हैं कि असल कमाई कहां से होगी।
रोबोटिक्स कंपनियों के मामले में स्थिति और जटिल है। निवेशक जानना चाहते हैं कि क्या रोबोट का उपयोग केवल प्रयोग तक सीमित है, या वह तैनाती, रखरखाव और विस्तार के साथ एक मजबूत व्यवसाय मॉडल बना सकता है। यदि इस कार्यक्रम के माध्यम से कुछ स्टार्टअप्स को वास्तविक फैक्टरी, लॉजिस्टिक्स केंद्र या सेवा वातावरण में पायलट मिलते हैं, तो वे निवेश जुटाने की दिशा में कहीं अधिक मजबूत स्थिति में आ सकते हैं।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में भी यह बहस प्रासंगिक है। हमारे यहां एआई स्टार्टअप्स की संख्या तेजी से बढ़ी है, लेकिन निवेशक अब प्रस्तुति से अधिक ग्राहकों की सूची देखना चाहते हैं। इसी तरह हार्डवेयर और डीप-टेक उद्यमों को अक्सर लंबी अवधि की पूंजी की जरूरत होती है, जिसे केवल विचारधारात्मक समर्थन से नहीं, ठोस औद्योगिक मांग से आकर्षित किया जा सकता है। इसलिए सियोल का यह कदम निवेश बाजार के लिए एक सिग्नल है कि तकनीकी उद्यमों की अगली लहर का आकलन अब वास्तविक उपयोग और अनुबंध क्षमता से होगा।
भारत के लिए सबक: क्या हमारे शहर भी ऐसा मॉडल बना सकते हैं?
यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या इस तरह की पहल भारत में भी लागू हो सकती है। जवाब है, हां, लेकिन इसके लिए नीति को स्टार्टअप उत्सव से आगे बढ़कर औद्योगिक समेकन की दिशा में जाना होगा। भारत के पास विशाल बाजार, तकनीकी प्रतिभा, डिजिटल अवसंरचना और बढ़ती विनिर्माण क्षमता है। लेकिन हमारे स्टार्टअप तंत्र की एक कमजोरी यह रही है कि शुरुआती ग्राहक तक पहुंच अक्सर संस्थापकों के निजी नेटवर्क, कुछ बड़े कॉर्पोरेट संपर्कों या सरकारी निविदा प्रक्रियाओं पर निर्भर रहती है। इससे बहुत सी अच्छी तकनीकें शुरुआती चरण में ही थक जाती हैं।
यदि भारतीय राज्य सरकारें, उद्योग निकाय, सार्वजनिक एजेंसियां और मध्यम आकार के उद्यम मिलकर मांग-आधारित नवाचार कार्यक्रम बनाएं, तो परिणाम बहुत अलग हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र में ऑटो और विनिर्माण इकाइयों के साथ कंप्यूटर विजन और रोबोटिक्स स्टार्टअप्स को जोड़ा जा सकता है। कर्नाटक में वेयरहाउस, ई-कॉमर्स और हेल्थ-टेक संस्थानों के साथ एआई-समर्थित ऑटोमेशन का परीक्षण किया जा सकता है। तमिलनाडु में इलेक्ट्रॉनिक्स और औद्योगिक संचालन के लिए स्मार्ट निरीक्षण समाधान, और गुजरात में लॉजिस्टिक्स तथा पोर्ट संचालन के लिए रोबोटिक सिस्टम की वास्तविक तैनाती कराई जा सकती है।
यहां एक सांस्कृतिक अंतर को भी समझना चाहिए। कोरिया में राज्य, उद्योग और संस्थागत नेटवर्क अक्सर अधिक संगठित ढंग से काम करते हैं। भारत में विविधता अधिक है, प्रक्रियाएं जटिल हैं और विभिन्न राज्यों की नीति क्षमता में बड़ा अंतर है। इसलिए हमारे यहां किसी एक मॉडल की सीधी नकल शायद कारगर न हो। लेकिन मूल विचार बेहद उपयोगी है: तकनीकी स्टार्टअप को अनुदान नहीं, परीक्षण-स्थल और ग्राहक संबंध चाहिए।
सियोल की पहल हमें यह भी याद दिलाती है कि भविष्य की प्रतिस्पर्धा केवल इस बात से तय नहीं होगी कि किस देश ने कितने एआई स्टार्टअप पंजीकृत किए। निर्णायक प्रश्न यह होगा कि किसने अपने नवाचारों को उद्योग, शहर और सेवाओं में सबसे प्रभावी ढंग से उतारा। कोरिया फिलहाल इसी दिशा में एक ठोस प्रयोग करता दिख रहा है। भारत यदि अगले दशक में एआई और रोबोटिक्स की वैश्विक श्रृंखला में अधिक गंभीर भूमिका चाहता है, तो उसे भी विचार से अधिक क्रियान्वयन, मंच से अधिक बाजार, और घोषणा से अधिक परीक्षण पर जोर देना होगा।
अंततः सियोल और एसबीए की इस पहल की सफलता कुछ बुनियादी संकेतकों से आंकी जाएगी: कितने पायलट शुरू हुए, कितने समाधान कार्यस्थल पर टिके, कितने अनुबंध हुए, और कितनी कंपनियां शुरुआती उत्साह से आगे बढ़कर स्थिर ग्राहक बना सकीं। यही कसौटी भारत के लिए भी प्रासंगिक है. टेक्नोलॉजी की दुनिया में तालियां डेमो को मिल सकती हैं, लेकिन इतिहास उन्हीं के नाम लिखा जाता है जो प्रयोग को कारोबार में बदल देते हैं।
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