
मानसिक स्वास्थ्य आपातकाल को नए नजरिए से देखने की कोशिश
दक्षिण कोरिया की सरकार ने मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी आपात स्थितियों के लिए एक नए तरह के समन्वित तंत्र—मानसिक आपात चिकित्सा स्थिति कक्ष—को पायलट आधार पर शुरू करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। साथ ही, अनैच्छिक भर्ती और उपचार, यानी ऐसे मामलों में जब मरीज स्वयं उपचार के लिए तैयार न हो या निर्णय लेने की स्थिति में न हो, उससे जुड़ी व्यवस्थाओं में सुधार की बात भी सामने आई है। पहली नजर में यह एक प्रशासनिक सुधार लग सकता है, लेकिन असल में यह उस बड़ी खाई को भरने की कोशिश है जो अस्पताल, पुलिस, अग्निशमन सेवा, परिवार और सामुदायिक मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों के बीच लंबे समय से मौजूद रही है।
आम पाठकों के लिए इसे सरल भाषा में समझें तो मामला सिर्फ इतना नहीं है कि कोई नया हेल्पलाइन नंबर शुरू हो जाएगा। प्रस्तावित व्यवस्था का उद्देश्य यह है कि मानसिक संकट की घड़ी में यह तय करने का बोझ सिर्फ परिवार या मौके पर पहुंची पुलिस टीम पर न रहे कि मरीज को कहां ले जाना है, कौन-सा अस्पताल उसे तुरंत देख सकता है, क्या मनोचिकित्सक उपलब्ध हैं, क्या वहां भर्ती की सुविधा है, और बाद में उस व्यक्ति की देखभाल कौन करेगा। दक्षिण कोरिया में यह स्वीकार किया जा रहा है कि मानसिक आपात स्थिति, जैसे आत्म-हानि का खतरा, अत्यधिक भ्रम, हिंसक व्यवहार की आशंका, गंभीर घबराहट, या नशे और मानसिक बीमारी का संयुक्त असर—इन सबको सामान्य मेडिकल इमरजेंसी की तरह नहीं संभाला जा सकता।
भारतीय संदर्भ में यह बहस बिल्कुल अपरिचित नहीं है। हमारे यहां भी अक्सर परिवार सबसे पहले उलझन में पड़ता है कि संकट की घड़ी में 112 पर फोन करे, एम्बुलेंस बुलाए, किसी निजी अस्पताल जाए, सरकारी मेडिकल कॉलेज पहुंचे, या किसी मनोचिकित्सक को सीधे संपर्क करे। कई शहरों में तो यह भी साफ नहीं होता कि मानसिक स्वास्थ्य संकट को ‘मेडिकल इमरजेंसी’ माना जाएगा या ‘लॉ एंड ऑर्डर’ की समस्या की तरह देखा जाएगा। दक्षिण कोरिया का यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह मानसिक बीमारी को केवल इलाज का नहीं, बल्कि समन्वित सार्वजनिक व्यवस्था का प्रश्न मान रहा है।
कोरियाई समाज में, ठीक वैसे ही जैसे भारत में, मानसिक बीमारी पर सामाजिक कलंक पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। परिवार अक्सर बात छिपाने की कोशिश करते हैं, मरीज उपचार से इनकार कर सकता है, और आपात स्थिति तब बनती है जब बीमारी बहुत आगे बढ़ चुकी होती है। ऐसे में सरकार का यह कहना कि सिर्फ बिस्तर बढ़ाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि पूरे प्रतिक्रिया तंत्र को जोड़ना होगा, नीति की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण बदलाव है। यह बदलाव स्वास्थ्य व्यवस्था की तकनीकी भाषा में जितना जटिल है, सामाजिक दृष्टि से उतना ही मानवीय भी है।
दक्षिण कोरिया में इस पायलट व्यवस्था की चर्चा ऐसे समय हो रही है जब दुनिया भर में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक समन्वित, अधिक अधिकार-सम्मत और अधिक त्वरित बनाने की मांग बढ़ी है। भारत में भी, जहां एक ओर महानगरों में कॉरपोरेट अस्पतालों की पहुंच है और दूसरी ओर छोटे कस्बों में मनोचिकित्सक तक दुर्लभ हैं, इस बहस को गंभीरता से देखने की जरूरत है। क्योंकि प्रश्न सिर्फ यह नहीं कि संकट में कौन-सा दरवाजा खटखटाया जाए, बल्कि यह भी कि उस दरवाजे के पीछे कोई जवाबदेह व्यवस्था मौजूद है या नहीं।
मानसिक आपात स्थिति सामान्य इमरजेंसी से अधिक जटिल क्यों है
जब किसी व्यक्ति को सीने में दर्द, तेज रक्तस्राव या सड़क दुर्घटना जैसी शारीरिक आपात स्थिति होती है, तो लक्षण अक्सर अपेक्षाकृत स्पष्ट होते हैं। पर मानसिक आपात स्थिति में तस्वीर धुंधली हो सकती है। व्यक्ति अचानक असामान्य बातें करने लगे, उसे भ्रम या आवाजें सुनाई दें, वह खुद को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करे, दूसरों पर हमला करने की आशंका पैदा हो, या फिर शराब और नशीले पदार्थों के असर के साथ उसकी मानसिक स्थिति तेजी से बिगड़ जाए—ऐसी दशाओं में मौके पर मौजूद लोगों के लिए समझना कठिन होता है कि यह चिकित्सा संकट है, मनोवैज्ञानिक संकट है, नशे का मामला है, या इन सबका मिश्रण।
यही वजह है कि दक्षिण कोरिया में प्रस्तावित स्थिति कक्ष को सिर्फ कॉल सेंटर नहीं, बल्कि ‘हब’ या केंद्रीय समन्वय मंच के रूप में देखा जा रहा है। इस मंच को अस्पतालों में उपलब्ध बिस्तरों, ड्यूटी पर मौजूद विशेषज्ञों, पुलिस और अग्निशमन सेवा के साथ संचार, उच्च जोखिम वाले मरीजों की प्राथमिक श्रेणीकरण व्यवस्था, परिवार को दिशा-निर्देश, और बाद की सामुदायिक सेवाओं से जोड़ने की भूमिका दी जा सकती है। यदि यह सब वास्तव में एकीकृत रूप में काम करे, तो उस प्रतीक्षा और भटकाव को कम किया जा सकता है जो अक्सर सबसे अधिक नुकसान पहुंचाता है।
भारतीय पाठकों के लिए इसकी तुलना किसी बड़े रेलवे जंक्शन से की जा सकती है। जब तक संकेत प्रणाली, प्लेटफॉर्म प्रबंधन और कंट्रोल रूम एक-दूसरे से समन्वित न हों, सिर्फ ट्रेनों की संख्या बढ़ाने से अव्यवस्था कम नहीं होती। मानसिक स्वास्थ्य संकट में भी यही तर्क लागू होता है। अस्पताल हैं, पुलिस है, एम्बुलेंस है, लेकिन यदि इन सबके बीच एक साझा निर्णय संरचना न हो, तो मरीज और परिवार सबसे मुश्किल क्षण में प्रशासनिक भूलभुलैया में फंस जाते हैं।
अस्पतालों की अपनी सीमाएं भी हैं। हर इमरजेंसी वार्ड में मनोचिकित्सक चौबीसों घंटे उपलब्ध नहीं होते। कई अस्पतालों में सुरक्षित निगरानी क्षेत्र या अलग स्थान का अभाव होता है, जहां अत्यधिक उत्तेजित या भ्रमग्रस्त मरीज को बिना अपमानजनक व्यवहार के सुरक्षित रखा जा सके। यदि उसी समय गंभीर दुर्घटना, स्ट्रोक या हार्ट अटैक के मरीज भी आ रहे हों, तो मानसिक आपात स्थिति से जूझ रहे व्यक्ति को लंबा इंतजार करना पड़ सकता है। दक्षिण कोरिया की नई सोच का एक महत्वपूर्ण पहलू यही है कि अस्पताल के दरवाजे पर पहुंचने से पहले ही कुछ समन्वय हो, ताकि बाद की अराजकता कम हो।
पुलिस और अग्निशमन बल भी लंबे समय से इस सीमा-रेखा पर खड़े रहते हैं जहां कानून, सुरक्षा और चिकित्सा एक-दूसरे में घुलते-मिलते हैं। अक्सर वे सबसे पहले मौके पर पहुंचते हैं, लेकिन वे डॉक्टर नहीं होते। उन्हें व्यक्ति को शांत भी करना पड़ता है, परिवार को संभालना भी पड़ता है, और कई बार शारीरिक टकराव की स्थिति भी बन सकती है। ऐसी परिस्थितियों में मानवीय गरिमा, मरीज के अधिकार और प्रथम प्रत्युत्तर देने वालों की सुरक्षा—तीनों को संतुलित करना आसान नहीं है। इसलिए एक पेशेवर समन्वय मंच की मांग केवल प्रशासनिक सुविधा का प्रश्न नहीं, बल्कि अधिकार और सुरक्षा, दोनों का प्रश्न है।
अनैच्छिक भर्ती और उपचार: अधिकार बनाम सुरक्षा की कठिन बहस
दक्षिण कोरिया की ताजा नीति चर्चा का सबसे संवेदनशील हिस्सा अनैच्छिक भर्ती और उपचार की व्यवस्था में सुधार है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में यह विषय बेहद नाजुक होता है, क्योंकि यहां दो मूल्यों का टकराव सामने आता है। पहला, व्यक्ति की स्वायत्तता और मानवाधिकार; दूसरा, संकट की ऐसी अवस्था में व्यक्ति, परिवार और समाज की सुरक्षा, जब मरीज स्वयं यह समझने की स्थिति में न हो कि उसे तत्काल उपचार की आवश्यकता है।
कोरियाई बहस में यह बात स्पष्ट दिखाई देती है कि समस्या सिर्फ बिस्तरों की कमी नहीं है। असल कठिनाई यह भी है कि कौन निर्णय लेगा, किस आधार पर लेगा, कितनी जल्दी लेगा, और बाद में उस निर्णय की समीक्षा कैसे होगी। यदि व्यवस्था बहुत कठोर हो, तो इलाज में खतरनाक देरी हो सकती है। यदि व्यवस्था बहुत ढीली हो, तो अति-भर्ती, शक्ति के दुरुपयोग, और मानवाधिकार हनन का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए सुधार की दिशा केवल ‘आसान भर्ती’ या ‘कठिन भर्ती’ जैसे सरल नारे में नहीं सिमट सकती।
भारतीय पाठकों के लिए यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हमारे यहां मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम ने रोगी अधिकारों पर जोर दिया है, लेकिन जमीन पर परिवार अक्सर बेहद कठिन परिस्थितियों का सामना करते हैं। कई घरों में देखभाल करने वाले रिश्तेदार यह नहीं समझ पाते कि किस क्षण चिकित्सकीय हस्तक्षेप जरूरी है और किस स्तर पर कानून उनकी मदद करेगा। कई बार इलाज से इनकार कर रहे व्यक्ति के सामने परिवार लगभग असहाय महसूस करता है। दूसरी ओर, किसी भी ऐसी व्यवस्था का खतरा भी बना रहता है जहां परिवार, संपत्ति विवाद, सामाजिक शर्म या अन्य कारणों से अनावश्यक दबाव डाल सके। यही कारण है कि अनैच्छिक उपचार पर हर समाज में बहस गहरी और सतर्क दोनों होती है।
दक्षिण कोरिया के प्रस्तावित सुधार के संदर्भ में विशेषज्ञों का जोर इस बात पर है कि बात केवल भर्ती तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। अस्पताल के आपात अवलोकन कक्ष, अल्पकालिक गहन उपचार, सामुदायिक संकट हस्तक्षेप, डिस्चार्ज के बाद बाह्य रोगी सेवाएं, घर-घर संपर्क, और स्थानीय मानसिक स्वास्थ्य कल्याण केंद्रों से जोड़ना—यह पूरी श्रृंखला महत्वपूर्ण है। यदि किसी व्यक्ति को संकट की घड़ी में जबरन अस्पताल पहुंचा भी दिया जाए, लेकिन उसके बाद इलाज टूट जाए, दवाएं छूट जाएं, फॉलो-अप न हो, या परिवार को कोई मार्गदर्शन न मिले, तो पूरी व्यवस्था फिर उसी पुराने संकट में लौट सकती है।
यहां मानवाधिकार की भूमिका केंद्रीय है। किसी भी प्रकार की अनैच्छिक चिकित्सा हस्तक्षेप को अंतिम उपाय माना जाना चाहिए, न कि प्रशासनिक शॉर्टकट। हर निर्णय का स्पष्ट रिकॉर्ड, जोखिम का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन, स्वतंत्र समीक्षा, मरीज और परिवार को प्रक्रिया की जानकारी, और अपील या आपत्ति की व्यवस्था—ये सब एक विश्वसनीय तंत्र के लिए अनिवार्य हैं। दक्षिण कोरिया की सरकार के लिए भी यही असली परीक्षा होगी कि क्या वह तेज प्रतिक्रिया और अधिकार-सम्मत प्रक्रिया, दोनों को साथ रख पाती है।
खंडित व्यवस्था को एक धागे में पिरोने की चुनौती
दक्षिण कोरिया की मौजूदा व्यवस्था पर सबसे बड़ा आरोप यही रहा है कि संकट के अलग-अलग चरण अलग-अलग संस्थानों के जिम्मे हैं, लेकिन उनके बीच एक जीवंत कमांड संरचना नहीं है। शिकायत 112 या 119 जैसी सेवाओं तक पहुंच सकती है, मौके पर पुलिस या अग्निशमन कर्मी पहुंच सकते हैं, फिर व्यक्ति को किसी इमरजेंसी वार्ड में लाया जा सकता है, बाद में मनोचिकित्सक की राय ली जा सकती है, और उसके बाद स्थानीय मानसिक स्वास्थ्य केंद्र या नगरपालिका की सेवाओं की भूमिका बनती है। कागज पर यह एक श्रृंखला लगती है, पर वास्तविक संकट में यह अक्सर ‘एक से दूसरे संस्थान की ओर धकेले जाने’ जैसी स्थिति बन जाती है।
प्रस्तावित मानसिक आपात चिकित्सा स्थिति कक्ष का दावा यही है कि वह इस खंडित ढांचे को एक मंच पर लाएगा। इसके लिए कम से कम तीन तरह की जानकारी का वास्तविक समय में जुड़ना जरूरी माना जा रहा है। पहली, किस अस्पताल में तत्काल जांच, इलाज या भर्ती की क्षमता उपलब्ध है। दूसरी, मौके से आने वाली जानकारी—व्यक्ति का जोखिम स्तर, संभावित सह-रोग, नशे की स्थिति, परिवार की मौजूदगी या अनुपस्थिति, और हिंसक व्यवहार की आशंका। तीसरी, बाद की देखभाल के लिए स्थानीय सामुदायिक संसाधन—जैसे मानसिक स्वास्थ्य कल्याण केंद्र, सामाजिक कार्यकर्ता, परामर्श सेवाएं, और पुनर्वास समर्थन।
यदि इन तीनों धुरियों को जोड़ा नहीं गया, तो कोई भी स्थिति कक्ष केवल फोन घुमाने वाली इकाई बनकर रह जाएगा। असली कठिनाई संचालन पुस्तिका में छिपी होती है। मान लीजिए, कंट्रोल रूम ने किसी अस्पताल की ओर रेफर किया, पर अस्पताल ने मरीज को स्वीकार करने से मना कर दिया; तब दोबारा समन्वय कौन करेगा? यदि रास्ते में मरीज की स्थिति अचानक बदल जाए, तो अंतिम निर्णय किसका होगा? यदि डिस्चार्ज के बाद सामुदायिक निगरानी विफल हो जाए, तो फिर से हस्तक्षेप के लिए कौन जिम्मेदार होगा? नीति की सफलता प्रेस विज्ञप्ति से नहीं, इन सूक्ष्म प्रक्रियाओं से तय होगी।
क्षेत्रीय असमानता भी एक बड़ा प्रश्न है। दक्षिण कोरिया जैसे तकनीकी रूप से विकसित देश में भी राजधानी क्षेत्र और छोटे शहरों के बीच स्वास्थ्य ढांचे का फर्क रहता है। भारत में तो यह अंतर और भी अधिक गहरा है। इसलिए वहां पायलट परियोजना के दौरान यदि विभिन्न मॉडल—बड़े महानगर, मध्यम शहर और ग्रामीण-पेरिफेरी वाले इलाके—अलग-अलग रूप में जांचे जाते हैं, तो इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि राष्ट्रीय स्तर पर किस तरह का ढांचा टिकाऊ हो सकता है। हर जगह एक जैसी प्रणाली लागू करने से पहले यह देखना जरूरी है कि रात्रिकालीन विशेषज्ञ, सुरक्षित परिवहन, निगरानी बिस्तर और सामुदायिक फॉलो-अप वास्तव में उपलब्ध भी हैं या नहीं।
भारतीय अनुभव भी यही बताता है कि केवल ‘एक केंद्रीय व्यवस्था’ की घोषणा पर्याप्त नहीं होती। जैसे स्वास्थ्य बीमा योजना का कार्ड होने भर से उपचार स्वतः नहीं मिल जाता, वैसे ही मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी हेल्पलाइन नंबर तब तक प्रभावी नहीं होंगे जब तक अस्पताल, जिला प्रशासन, पुलिस, सामाजिक कल्याण विभाग और स्थानीय मानसिक स्वास्थ्य नेटवर्क के बीच जिम्मेदारियों की रेखाएं साफ न हों। दक्षिण कोरिया अब इसी कठिन लेकिन जरूरी काम की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है।
मरीज और परिवार के लिए क्या बदल सकता है
किसी भी नीति का अंतिम मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि वह उस परिवार की पीड़ा को कितना कम करती है जो सबसे कठिन घड़ी से गुजर रहा हो। दक्षिण कोरिया में प्रस्तावित व्यवस्था यदि प्रभावी रूप से लागू होती है, तो सबसे पहला बदलाव यह हो सकता है कि परिवार को यह साफ पता हो कि संकट की घड़ी में संपर्क किससे करना है। अभी तक अक्सर परिवार अस्पतालों, पुलिस, सामुदायिक केंद्रों और स्थानीय प्रशासन के बीच भटकते रहे हैं। एक समन्वित स्थिति कक्ष इस सूचना-अराजकता को कम कर सकता है।
दूसरा बड़ा बदलाव अस्पताल से अस्पताल भटकने, यानी जिसे साधारण भाषा में ‘पिंग-पोंग ट्रांसफर’ कहा जा सकता है, उसमें कमी के रूप में दिख सकता है। मानसिक आपात स्थिति में बार-बार रेफरल, लंबा इंतजार और जगह न मिलने की समस्या न केवल मरीज की हालत बिगाड़ती है, बल्कि परिवार की भावनात्मक और आर्थिक थकान भी बढ़ाती है। भारत के बड़े शहरों में भी कई परिवार जानते हैं कि गंभीर बीमारी के समय एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल दौड़ना कैसा अनुभव होता है; मानसिक स्वास्थ्य के मामले में यह अनुभव और अधिक अस्पष्ट तथा तनावपूर्ण हो सकता है, क्योंकि यहां बीमारी का स्वरूप हमेशा बाहरी रूप से दिखाई नहीं देता।
तीसरा संभावित लाभ यह होगा कि परिवार को केवल ‘कागजी अभिभावक’ या ‘संकट प्रबंधक’ की भूमिका न निभानी पड़े। आज भी एशिया के कई समाजों में, जिनमें भारत और दक्षिण कोरिया दोनों शामिल हैं, परिवार ही मानसिक स्वास्थ्य देखभाल की पहली इकाई है। लेकिन जब संकट अचानक बढ़ता है, तो परिवार के लोग डॉक्टर, कानूनी सलाहकार, परिवहन समन्वयक और भावनात्मक सहारा—सब कुछ एक साथ बन जाते हैं। यह बोझ अक्सर असहनीय हो जाता है। यदि स्थिति कक्ष परिवार को स्पष्ट मार्गदर्शन, उपलब्ध विकल्प और अगला कदम बता सके, तो यह केवल प्रशासनिक सुविधा नहीं, बल्कि भावनात्मक राहत भी होगी।
चौथा महत्वपूर्ण पहलू संकट के बाद की निरंतरता है। अक्सर सार्वजनिक चर्चा आपात भर्ती तक सीमित रहती है, लेकिन असली सवाल तब शुरू होता है जब व्यक्ति घर लौटता है। दवा कौन समझाएगा? अगली अपॉइंटमेंट कौन तय करेगा? यदि व्यक्ति फिर से इलाज छोड़ दे तो कौन फॉलो-अप करेगा? यदि परिवार टूटन के कगार पर हो तो उन्हें कौन सहारा देगा? दक्षिण कोरिया की प्रस्तावित व्यवस्था का महत्व इसी में है कि वह इमरजेंसी कक्ष से लेकर सामुदायिक केंद्र तक की कड़ी को जोड़ने की बात कर रही है।
हालांकि, यह भी उतना ही सच है कि किसी केंद्रीकृत व्यवस्था से सभी समस्याएं जादू की तरह खत्म नहीं हो जाएंगी। मानसिक स्वास्थ्य संकट में भाषा, वर्ग, क्षेत्र, बीमा, निजी और सरकारी संस्थानों का अंतर, और सामाजिक पूर्वाग्रह जैसी बाधाएं बनी रहेंगी। लेकिन यदि शुरुआत इस स्वीकारोक्ति से होती है कि संकट की घड़ी में व्यक्ति और परिवार को दिशाहीन नहीं छोड़ा जा सकता, तो यह अपने आप में एक महत्वपूर्ण संस्थागत सुधार है।
भारत के लिए सबक: तकनीक से अधिक जरूरी है भरोसेमंद व्यवस्था
दक्षिण कोरिया की यह पहल भारत के लिए एक उपयोगी दर्पण की तरह देखी जा सकती है। भारत में मानसिक स्वास्थ्य अवसंरचना लंबे समय से विशेषज्ञों की कमी, शहरी-ग्रामीण असमानता, कलंक, और उपचार में देरी जैसी समस्याओं से जूझ रही है। इसके बावजूद पिछले वर्षों में अधिकार-आधारित कानून, टेली-मानसिक स्वास्थ्य, जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम और हेल्पलाइन सेवाओं के रूप में कुछ महत्वपूर्ण प्रयास हुए हैं। अब प्रश्न यह है कि क्या इन प्रयासों को भी किसी वास्तविक आपात प्रतिक्रिया ढांचे से जोड़ा जा सकता है।
हमारे यहां अक्सर नीति निर्माण में यह मान लिया जाता है कि हेल्पलाइन या ऐप बना देने से समस्या काफी हद तक हल हो जाएगी। पर दक्षिण कोरिया की चर्चा याद दिलाती है कि संकट की घड़ी में तकनीक तभी उपयोगी है जब उसके पीछे वास्तविक संस्थागत क्षमता हो। अगर फोन उठाने वाला व्यक्ति तो है, लेकिन मरीज को लेने वाली एम्बुलेंस नहीं; एम्बुलेंस है, लेकिन स्वीकार करने वाला अस्पताल नहीं; अस्पताल है, लेकिन मनोचिकित्सक नहीं; मनोचिकित्सक है, लेकिन डिस्चार्ज के बाद सामुदायिक व्यवस्था नहीं—तो पूरा ढांचा अधूरा रह जाता है।
भारत में भी 112, 108, मेडिकल कॉलेज, जिला अस्पताल, निजी अस्पताल, मनोचिकित्सा विभाग, आशा कार्यकर्ता, सामाजिक न्याय विभाग, और गैर-सरकारी संगठनों के बीच मानसिक आपातकालीन प्रोटोकॉल पर अधिक स्पष्टता की जरूरत है। यह काम आसान नहीं है, क्योंकि हमारे यहां स्वास्थ्य एक संघीय विषय है और राज्यों की क्षमता व प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं। फिर भी, महानगरों से लेकर जिला स्तर तक ऐसे मॉडल विकसित किए जा सकते हैं जहां संकट के समय स्पष्ट रेफरल नेटवर्क, सुरक्षित परिवहन, विशेषज्ञ सलाह और बाद की सामुदायिक निगरानी एक साथ उपलब्ध हो।
भारतीय सामाजिक संदर्भ में एक और महत्वपूर्ण बात परिवार की भूमिका है। हमारे यहां परिवार को अक्सर समर्थन-तंत्र माना जाता है, जो कई मामलों में सही भी है। लेकिन हर परिवार सक्षम, जागरूक या संवेदनशील हो, यह जरूरी नहीं। कई बार परिवार खुद कलंक, डर, शर्म या आर्थिक तंगी में घिरा होता है। इसलिए कोई भी नीति केवल परिवार पर भरोसा करके नहीं चल सकती; उसे प्रशिक्षित, जवाबदेह और अधिकार-सम्मत सार्वजनिक ढांचे पर टिका होना होगा। दक्षिण कोरिया की बहस इसी बिंदु पर विशेष रूप से ध्यान खींचती है।
इसके साथ ही भारत को यह भी समझना होगा कि मानसिक आपात स्थिति केवल अस्पताल का मामला नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था—तीनों के संगम का विषय है। यदि दक्षिण कोरिया पायलट परियोजना के जरिए इस संगम को अधिक सुव्यवस्थित रूप दे पाता है, तो एशियाई समाजों के लिए यह एक उपयोगी मिसाल बन सकती है। बेशक भारत की आबादी, विविधता और संसाधन संरचना अलग है, लेकिन सिद्धांत समान हैं: संकट में समय पर प्रतिक्रिया, अधिकारों की रक्षा, और उपचार की निरंतरता।
आगे की राह: असली परीक्षा क्रियान्वयन की होगी
दक्षिण कोरिया की सरकार ने जिस दिशा का संकेत दिया है, वह महत्वाकांक्षी भी है और संवेदनशील भी। मानसिक आपात चिकित्सा स्थिति कक्ष का पायलट प्रोजेक्ट तभी सफल माना जाएगा जब वह केवल ‘एक नई प्रशासनिक परत’ जोड़ने के बजाय, पहले से बिखरी संस्थाओं को अधिक तेज, अधिक स्पष्ट और अधिक मानवीय तरीके से जोड़ सके। इसी तरह अनैच्छिक भर्ती और उपचार में सुधार तभी स्वीकार्य होगा जब वह मरीज की गरिमा, स्वतंत्र समीक्षा, पारदर्शी रिकॉर्ड और अपील की गुंजाइश जैसे अधिकार-सुरक्षा तंत्र को मजबूत करे।
नीति दस्तावेजों में सबसे आसान काम लक्ष्य लिखना होता है; सबसे कठिन काम है प्रशिक्षण, जवाबदेही और निरंतर निगरानी। क्या स्थिति कक्ष के कर्मचारी मानसिक स्वास्थ्य संकट की प्रकृति समझेंगे? क्या पुलिस और अग्निशमन कर्मियों को डी-एस्केलेशन यानी तनाव कम करने की तकनीकों का प्रशिक्षण दिया जाएगा? क्या अस्पतालों को अतिरिक्त संसाधन मिलेंगे? क्या ग्रामीण और छोटे शहरों के लिए अलग मॉडल बनेगा? क्या मरीज और परिवार को उनकी भाषा में प्रक्रिया समझाई जाएगी? ये सवाल जितने प्रशासनिक हैं, उतने ही नैतिक भी।
भारत में इस खबर को पढ़ते समय हमें यह समझना चाहिए कि मानसिक स्वास्थ्य सुधार केवल अस्पतालों की संख्या या दवाओं की उपलब्धता तक सीमित नहीं है। वह इस बात पर भी निर्भर करता है कि संकट की घड़ी में राज्य कितना मानवीय, कितना सक्षम और कितना समन्वित ढंग से सामने आता है। दक्षिण कोरिया इस दिशा में प्रयोग कर रहा है। यह प्रयोग सफल हो या आंशिक रूप से सफल हो, उससे मिलने वाले सबक एशिया के अन्य देशों, खासकर भारत, के लिए अहम होंगे।
अंततः मानसिक आपात स्थिति का प्रश्न किसी एक व्यक्ति की बीमारी का प्रश्न भर नहीं है। यह परिवारों की सहनशक्ति, संस्थाओं की विश्वसनीयता, और समाज की संवेदनशीलता की भी परीक्षा है। दक्षिण कोरिया की नई पहल इस स्वीकारोक्ति से शुरू होती दिखती है कि मानसिक संकट में फंसे व्यक्ति को ‘किसी तरह संभाल लेने’ की नहीं, बल्कि सुविचारित, त्वरित और अधिकार-सम्मत सार्वजनिक प्रतिक्रिया की आवश्यकता है। यही वह बिंदु है जहां से किसी भी आधुनिक समाज की परिपक्वता को परखा जा सकता है।
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