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दक्षिण कोरिया में ‘बयान गढ़ने’ के आरोपों से मचा सियासी तूफान: राष्ट्रपति ली जे-म्यंग की जांच पर उठे सवाल और उससे उपजी बड

दक्षिण कोरिया में ‘बयान गढ़ने’ के आरोपों से मचा सियासी तूफान: राष्ट्रपति ली जे-म्यंग की जांच पर उठे सवाल और उससे उपजी बड

क्यों यह मामला सिर्फ एक ऑडियो टेप का विवाद नहीं है

दक्षिण कोरिया की राजनीति इन दिनों एक ऐसे विवाद के बीच खड़ी है, जिसने वहां की न्याय व्यवस्था, सत्ता-संघर्ष और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता—तीनों को एक साथ बहस के केंद्र में ला दिया है। सत्तारूढ़ दल ने यह दावा करते हुए एक कथित ऑडियो रिकॉर्डिंग सार्वजनिक की है कि अभियोजन पक्ष, यानी कोरियाई प्रोसिक्यूशन, ने राष्ट्रपति ली जे-म्यंग को फंसाने के लिए कथित तौर पर ‘बयान गढ़ने’ या ‘बयान को मनचाहे ढंग से तैयार कराने’ जैसी प्रक्रियाओं का सहारा लिया। कोरियाई राजनीतिक शब्दावली में इसे केवल एक कानूनी आरोप नहीं, बल्कि राज्य संस्थाओं की निष्पक्षता पर सीधा प्रश्न माना जा रहा है।

भारतीय पाठकों के लिए इस मामले को समझना हो तो इसे सिर्फ किसी नेता के खिलाफ जांच से जुड़े विवाद की तरह नहीं, बल्कि उस बड़े सवाल की तरह देखना होगा जो हम अपने यहां भी बार-बार सुनते रहे हैं—क्या जांच एजेंसियां सचमुच पूरी तरह स्वतंत्र हैं, या वे राजनीतिक माहौल, सत्ता परिवर्तन और वैचारिक ध्रुवीकरण से प्रभावित होती हैं? भारत में केंद्रीय जांच एजेंसियों को लेकर समय-समय पर उठी बहसें इस कोरियाई विवाद को समझने का एक उपयोगी संदर्भ देती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि दक्षिण कोरिया में यह बहस एक मौजूदा राष्ट्रपति से जुड़ी जांच के संदर्भ में और भी अधिक विस्फोटक रूप ले चुकी है।

30 मार्च 2026 को यह मामला वहां की प्रमुख राजनीतिक सुर्खियों में आया। सत्ताधारी दल द्वारा रिकॉर्डिंग को सार्वजनिक करना अपने-आप में एक गंभीर राजनीतिक कदम है, क्योंकि इसका मतलब है कि पार्टी अब रक्षात्मक मुद्रा में नहीं, बल्कि आक्रामक नैरेटिव गढ़ने के प्रयास में उतर चुकी है। संदेश साफ है—वह केवल विपक्ष या अभियोजन पक्ष के आरोपों का जवाब नहीं दे रही, बल्कि पूरे जांच ढांचे की वैधता को कटघरे में खड़ा कर रही है।

यहां यह समझना जरूरी है कि कोरिया में अभियोजन प्रणाली, विशेषकर प्रोसिक्यूटर्स की भूमिका, लंबे समय से बेहद शक्तिशाली मानी जाती रही है। दक्षिण कोरिया के आधुनिक राजनीतिक इतिहास में कई ऐसे मौके आए हैं जब राष्ट्रपतियों, पूर्व राष्ट्रपतियों, बड़े कारोबारी घरानों और शीर्ष नौकरशाहों के खिलाफ अभियोजन पक्ष की कार्रवाई ने सत्ता संतुलन को बदल दिया। इसलिए जब सत्ताधारी दल यह कहता है कि जांच प्रक्रिया ही संदिग्ध थी, तो उसका असर केवल एक मुकदमे तक सीमित नहीं रहता; वह पूरे लोकतांत्रिक संस्थागत ढांचे पर अविश्वास का बादल खड़ा करता है।

यही वजह है कि इस विवाद को कोरिया में लोग केवल ‘रिकॉर्डिंग लीक’ के रूप में नहीं, बल्कि आने वाले महीनों की राजनीति, संसद की बहस, न्यायिक प्रक्रिया और जनमत की दिशा तय करने वाले मोड़ के तौर पर देख रहे हैं।

ऑडियो रिकॉर्डिंग में असली सवाल क्या है: ‘किसने क्या कहा’ से अधिक ‘कैसे कहा गया’

राजनीतिक विवादों में अक्सर कोई ऑडियो, वीडियो या दस्तावेज सामने आते ही बहस इस बात पर सिमट जाती है कि उसमें बोला क्या गया है। लेकिन दक्षिण कोरिया के इस मामले में असली विवाद किसी एक वाक्य या किसी कथित स्वीकारोक्ति से अधिक जांच की संरचना पर है। सत्तारूढ़ दल का आरोप यह नहीं भर है कि किसी व्यक्ति ने कुछ गलत कहा, बल्कि यह है कि बयान हासिल करने की प्रक्रिया ही संभवतः प्रभावित, निर्देशित या पक्षपाती थी।

इसे थोड़ा सरल भाषा में समझें। यदि कोई जांच एजेंसी किसी गवाह, संदिग्ध या संबंधित व्यक्ति से बयान ले रही है, तो आधुनिक आपराधिक न्याय व्यवस्था में यह मायने रखता है कि वह बयान स्वैच्छिक था या दबाव में; क्या सवाल निष्पक्ष थे या उत्तर पहले से तय कराए जा रहे थे; क्या पूरे संवाद को सुरक्षित रखा गया या चुनिंदा हिस्से ही आगे बढ़ाए गए; और क्या उस बयान की पुष्टि किसी स्वतंत्र बाहरी सबूत से होती है। यही वह जगह है जहां यह कोरियाई विवाद बेहद संवेदनशील हो जाता है।

भारतीय संदर्भ में कहें तो अदालतें यहां भी बार-बार कहती रही हैं कि स्वीकारोक्ति, गवाही, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और जांच की प्रक्रिया—सभी की विश्वसनीयता का परीक्षण व्यापक संदर्भ में होना चाहिए। सिर्फ क्लिप चल जाने या कागज लहरा देने से अंतिम सत्य तय नहीं हो जाता। ठीक यही स्थिति दक्षिण कोरिया में है। वहां के कानूनी हलकों में भी यही चर्चा है कि सार्वजनिक की गई रिकॉर्डिंग का पूरा संदर्भ क्या है, मूल फाइल कहां है, उसमें छेड़छाड़ तो नहीं हुई, वक्तव्य किस परिस्थिति में दिया गया, और क्या उसकी कानूनी स्वीकार्यता अंततः अदालत में टिक पाएगी।

यानी मामला केवल रिकॉर्डिंग के ‘मौजूद होने’ का नहीं, बल्कि जांच के ‘ढांचे’ का है। यदि जनता को यह महसूस होने लगे कि जांच एजेंसी पहले निष्कर्ष तय करती है और बाद में उसके अनुकूल बयान जुटाती है, तो विश्वास संकट गहरा जाता है। और अगर बाद में यह साबित हो जाए कि सत्तारूढ़ दल ने अधूरी या संदर्भविहीन सामग्री के आधार पर बड़ा आरोप गढ़ा, तो फिर उसी दल की विश्वसनीयता पर उलटा असर पड़ सकता है।

यहीं राजनीति और कानून की राहें अलग-अलग दिखाई देती हैं। राजनीति को त्वरित असर चाहिए; कानून को ठोस, क्रमबद्ध और सत्यापन योग्य साक्ष्य चाहिए। इसलिए यह विवाद फिलहाल अदालत से ज्यादा जनता की अदालत और मीडिया की बहस में जिंदा है।

राष्ट्रपति ली जे-म्यंग और कोरियाई सत्ता संघर्ष का बड़ा परिप्रेक्ष्य

राष्ट्रपति ली जे-म्यंग दक्षिण कोरिया की राजनीति में लंबे समय से एक ध्रुवीकरण करने वाले, लेकिन उतने ही प्रभावशाली नेता रहे हैं। उन्हें समझे बिना इस पूरे विवाद की तीव्रता को समझना मुश्किल है। वे उन नेताओं में गिने जाते हैं जिनके समर्थक उन्हें सामाजिक न्याय, आर्थिक असमानता के खिलाफ मुखर आवाज और स्थापित अभिजन राजनीति को चुनौती देने वाले व्यक्ति के रूप में देखते हैं। वहीं उनके आलोचक उन्हें तीव्र राजनीतिक शैली, टकरावपूर्ण भाषा और सत्ता संघर्ष में आक्रामक रणनीति अपनाने वाला नेता मानते हैं।

भारत में यदि कोई पाठक इस राजनीतिक मनोविज्ञान को समझना चाहें, तो इसे उस तरह के नेता से जोड़कर देख सकते हैं जो एक ओर अपने समर्थकों के लिए व्यवस्था-विरोधी सुधारक हो, लेकिन विरोधियों के लिए संस्थागत टकराव की राजनीति का केंद्र। ऐसे नेताओं से जुड़े किसी भी मुकदमे, जांच या आरोप का प्रभाव सामान्य से कहीं अधिक होता है, क्योंकि मामला केवल अपराध या निर्दोषता का नहीं रह जाता, बल्कि पहचान, विचारधारा और जनसमर्थन से जुड़ जाता है।

दक्षिण कोरिया का लोकतंत्र बहुत ऊर्जावान है, लेकिन उसकी राजनीति भी बेहद प्रतिस्पर्धी और कभी-कभी कटु रही है। वहां राष्ट्रपति पद का महत्व बहुत बड़ा है, और इस पद से जुड़े किसी भी विवाद को मीडिया, विपक्ष, सत्तापक्ष और नागरिक समाज बड़े पैमाने पर फॉलो करते हैं। ली जे-म्यंग से संबंधित जांच पहले से ही सार्वजनिक रुचि का विषय रही थी। ऐसे में यदि अब सत्ताधारी दल यह संकेत देता है कि जांच की बुनियाद ही संदिग्ध थी, तो यह सीधे-सीधे विपक्ष, अभियोजन संस्थान और पूर्व जांच निर्णयों पर सवाल उठा देता है।

कोरियाई राजनीतिक संस्कृति में सार्वजनिक नैरेटिव बहुत अहम होता है। वहां प्रेस कॉन्फ्रेंस, दस्तावेजी खुलासे, रिकॉर्डिंग, संसदीय बहस और लाइव मीडिया कवरेज—सब मिलकर राजनीतिक अर्थ तय करते हैं। यह कुछ-कुछ वैसा है जैसे भारत में संसद सत्र, अदालत की टिप्पणी, एजेंसी की कार्रवाई और टीवी बहस मिलकर एक समांतर जनमत-युद्ध खड़ा कर देते हैं। फर्क बस इतना है कि दक्षिण कोरिया में डिजिटल मीडिया की तीव्रता और राजनीतिक ध्रुवीकरण इस बहस को और अधिक तेज बना देता है।

इस मामले में भी अब सवाल केवल यह नहीं है कि जांच सही थी या गलत, बल्कि यह है कि आने वाले समय में कोरिया की जनता किस पर ज्यादा भरोसा करेगी—सत्तारूढ़ दल की उस कथा पर कि राष्ट्रपति को निशाना बनाने के लिए प्रणाली का दुरुपयोग हुआ, या विपक्ष और अभियोजन पक्ष की उस दलील पर कि यह केवल राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति है।

अभियोजन पक्ष की साख पर सबसे बड़ा दबाव

दक्षिण कोरिया में अभियोजन तंत्र लंबे समय से शक्ति और विवाद—दोनों का केंद्र रहा है। वहां प्रोसिक्यूटर्स केवल मुकदमा चलाने वाले अधिकारी भर नहीं, बल्कि कई मामलों में जांच के केंद्रीय संचालक भी रहे हैं। इस कारण कोरिया में ‘प्रोसिक्यूशन रिफॉर्म’, यानी अभियोजन सुधार, एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा रहा है। यह बहस इस बात पर केंद्रित रही है कि क्या जांच और अभियोजन की इतनी शक्ति एक ही संस्थान में केंद्रित रहनी चाहिए, और क्या इस शक्ति पर पर्याप्त लोकतांत्रिक निगरानी है।

अब सत्ताधारी दल द्वारा कथित रिकॉर्डिंग जारी करने से यही बहस नए सिरे से भड़क सकती है। यदि जनता के एक बड़े हिस्से को लगता है कि किसी राजनीतिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए जांच प्रक्रिया को मोड़ा गया, तो अभियोजन सुधार की मांग फिर तेज होगी। इसमें कई प्रकार के मुद्दे उठ सकते हैं—जांच अधिकारों का पुनर्वितरण, अभियोजन की जवाबदेही, पूछताछ की रिकॉर्डिंग में पारदर्शिता, मीडिया को लीक पर नियंत्रण, और गवाहों या आरोपियों के बयानों की सत्यापन प्रणाली।

भारतीय संदर्भ में भी हम यह देखते हैं कि किसी जांच एजेंसी की कार्रवाई पर सवाल उठते ही केवल उस केस की जांच नहीं, बल्कि संस्था की संरचना, नियुक्ति प्रक्रिया, स्वायत्तता और राजनीतिक दबाव की संभावना पर बहस शुरू हो जाती है। दक्षिण कोरिया फिलहाल उसी मोड़ पर खड़ा नजर आ रहा है।

हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी भी जरूरी है। किसी राजनीतिक दल का आरोप अपने-आप में अंतिम सत्य नहीं होता। रिकॉर्डिंग का चयनात्मक उपयोग, संपादन, संदर्भ से बाहर उद्धरण या राजनीतिक संदेश के लिए कानूनी सामग्री का प्रतीकात्मक इस्तेमाल—ये सब भी आधुनिक राजनीति का हिस्सा हैं। इसलिए अभियोजन पक्ष पर दबाव तो है, लेकिन उसके पास भी यह अवसर होगा कि वह जांच प्रक्रिया की वैधता, दस्तावेजी श्रृंखला और साक्ष्यों की निरंतरता को सामने रखकर अपने पक्ष को मजबूत करे।

इसलिए निकट भविष्य में दक्षिण कोरिया में दो समानांतर लड़ाइयां चलने की संभावना है—एक अदालतों और कानूनी प्रक्रियाओं के भीतर, दूसरी टीवी स्टूडियो, संसद, सोशल मीडिया और जनसभाओं के मंच पर। कई बार दूसरी लड़ाई पहली से अधिक प्रभावशाली साबित होती है, क्योंकि जनता पहले भावनात्मक और नैरेटिव स्तर पर राय बनाती है, कानूनी दस्तावेज बाद में पढ़ती है।

सियासी रणनीति: सत्तापक्ष और विपक्ष इस विवाद को कैसे भुना सकते हैं

इस पूरे प्रकरण का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि यह सिर्फ कानूनी या नैतिक संकट नहीं, बल्कि चुनावी और रणनीतिक संकट भी है। दक्षिण कोरिया की राजनीति में स्थानीय चुनाव, उम्मीदवार चयन, क्षेत्रीय वादे और राष्ट्रीय नेतृत्व की स्वीकार्यता—ये सभी मुद्दे आपस में गहरे जुड़े रहते हैं। ऐसे समय पर यदि राष्ट्रपति से जुड़ी जांच के खिलाफ ‘बयान गढ़ने’ जैसा गंभीर आरोप सामने आता है, तो यह स्वाभाविक है कि दोनों पक्ष इसे अपने-अपने राजनीतिक फ्रेम में ढालने की कोशिश करेंगे।

सत्तारूढ़ दल के लिए यह मुद्दा कई तरह से उपयोगी हो सकता है। पहला, वह अपने समर्थकों को यह संदेश दे सकता है कि राष्ट्रपति केवल राजनीतिक हमले का शिकार हुए थे, इसलिए यह सत्ता और जनादेश की रक्षा का मामला है। दूसरा, वह अभियोजन सुधार को पुनः वैचारिक और नैतिक मुद्दे के रूप में सामने ला सकता है। तीसरा, यदि वह चरणबद्ध तरीके से और सामग्री सार्वजनिक करता है, तो यह विवाद कई दिनों या हफ्तों तक समाचार चक्र पर छाया रह सकता है। राजनीति में इसे एजेंडा सेटिंग कहा जाता है—यानी जनता किस मुद्दे पर सोचे, यह तय करना।

विपक्ष की रणनीति भी लगभग उतनी ही स्पष्ट है। वह कह सकता है कि सत्ताधारी दल न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने, जांच एजेंसियों को डराने या राष्ट्रपति को कानूनी जवाबदेही से बचाने के लिए इस प्रकार की रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल कर रहा है। विपक्ष यह भी सवाल उठा सकता है कि रिकॉर्डिंग का पूरा संदर्भ क्यों नहीं दिया गया, उसका स्रोत क्या है, और क्या यह निष्पक्ष जांच में सहयोग करने के बजाय एक राजनीतिक दबाव बनाने का प्रयास है।

भारतीय राजनीति में भी हम अक्सर देखते हैं कि किसी जांच या अदालत से जुड़े घटनाक्रम को पार्टियां अपने समर्थक आधार के मुताबिक अलग-अलग ढंग से पेश करती हैं। एक पक्ष कहता है कि यह राजनीतिक प्रतिशोध है, दूसरा कहता है कि कानून अपना काम कर रहा है। दक्षिण कोरिया में भी यही हो रहा है, लेकिन वहां राष्ट्रपति पद से जुड़ाव के कारण इस संघर्ष का प्रतीकात्मक महत्व कहीं बड़ा है।

सबसे अहम सवाल यह है कि मध्यमार्गी या गैर-प्रतिबद्ध मतदाता इस सबको कैसे देखेंगे। कोरियाई राजनीति में, ठीक भारत की तरह, कट्टर समर्थक जल्दी राय बना लेते हैं, लेकिन निर्णायक असर अक्सर उन मतदाताओं पर पड़ता है जो संस्थागत स्थिरता, नीति बहस और शासन की प्राथमिकताओं को महत्व देते हैं। यदि यह वर्ग मानने लगे कि राजनीतिक दल कानूनी सवालों को केवल चुनावी हथियार में बदल रहे हैं, तो दोनों पक्षों पर अविश्वास बढ़ सकता है। लेकिन यदि किसी एक पक्ष की कहानी अधिक विश्वसनीय, संयमित और दस्तावेज-समर्थित लगे, तो उसे राजनीतिक बढ़त मिल सकती है।

कानूनी सत्य और राजनीतिक सत्य हमेशा एक जैसे नहीं होते

इस प्रकरण में सबसे बड़ी सावधानी यही है कि राजनीतिक विस्फोटकता को कानूनी निष्कर्ष समझने की भूल न की जाए। कोई रिकॉर्डिंग सार्वजनिक हो जाने से यह अपने-आप सिद्ध नहीं हो जाता कि जांच अवैध थी, या बयान सचमुच गढ़वाया गया था। अदालतें इस तरह के मामलों में कई स्तरों पर परीक्षण करती हैं—मूल रिकॉर्डिंग की प्रामाणिकता, उसमें किसी छेड़छाड़ की संभावना, रिकॉर्डिंग की परिस्थितियां, वक्ता की पहचान, पूरी बातचीत का संदर्भ, सहायक दस्तावेज, स्वतंत्र साक्ष्य और जांच की आधिकारिक फाइलों से उसका संबंध।

यानी जो बात राजनीतिक मंच पर एक दिन में निर्णायक लग सकती है, वही अदालत में महीनों तक विचाराधीन रह सकती है। भारत में भी कई हाई-प्रोफाइल मामलों में हमने यही देखा है कि मीडिया ट्रायल और कानूनी प्रक्रिया की गति तथा मानदंड अलग-अलग होते हैं। दक्षिण कोरिया में भी अब शायद यही होगा। राजनीतिक बहस तेज होगी, लेकिन कानूनी निष्कर्ष धीरे-धीरे बनेंगे।

यहां एक और दिलचस्प पहलू है। यदि सत्तारूढ़ दल का दावा ठोस कानूनी आधार पाता है, तो यह केवल एक मामले की दिशा नहीं बदल सकता, बल्कि पिछले कई विवादित अभियोजन कदमों की भी पुनर्समीक्षा की मांग पैदा कर सकता है। वहीं यदि रिकॉर्डिंग का असर सीमित निकलता है, या अदालत में उसकी उपयोगिता कम साबित होती है, तो विपक्ष और अभियोजन पक्ष यह कहने में सक्षम होंगे कि सत्ताधारी दल ने एक संवेदनशील न्यायिक मुद्दे का राजनीतिक तमाशा बना दिया।

इसीलिए इस विवाद का अगला चरण बेहद अहम होगा—क्या और दस्तावेज सामने आते हैं, क्या अभियोजन पक्ष विस्तृत प्रतिक्रिया देता है, क्या कोई स्वतंत्र सत्यापन होता है, और क्या न्यायालय इस विषय पर कोई प्रारंभिक टिप्पणी करते हैं। फिलहाल जो सबसे स्पष्ट दिखता है, वह यह है कि राजनीतिक तापमान कानूनी तापमान से कहीं अधिक तेज है।

भारतीय पाठकों के लिए इसका व्यापक अर्थ

दक्षिण कोरिया की यह घटना हमें केवल कोरियाई राजनीति के बारे में नहीं बताती; यह लोकतंत्रों की एक साझा कमजोरी और साझा चुनौती की भी याद दिलाती है। जब समाज ध्रुवीकृत हो, नेता अत्यधिक लोकप्रिय या विवादास्पद हों, और जांच एजेंसियां संवेदनशील मामलों में सक्रिय हों, तब संस्थाओं की निष्पक्षता पर भरोसा सबसे बड़ा राजनीतिक संसाधन बन जाता है। एक बार यह भरोसा डगमगाता है, तो हर जांच राजनीतिक दिखने लगती है और हर राजनीतिक बचाव कानूनी प्रक्रिया में दखल जैसा प्रतीत होने लगता है।

भारतीय पाठकों को यह भी समझना चाहिए कि दक्षिण कोरिया की राजनीति, अपनी आधुनिकता और आर्थिक प्रगति के बावजूद, बेहद भावनात्मक और टकरावपूर्ण हो सकती है। वहां जनमत बहुत तेजी से बदलता है, सड़क से लेकर संसद तक दबाव बनता है, और मीडिया नैरेटिव असाधारण महत्व रखता है। इसलिए यह मानना गलत होगा कि यह केवल दूर देश की एक स्थानीय खबर है। यह उस बड़े वैश्विक प्रश्न का हिस्सा है—लोकतंत्र में जांच एजेंसियों, निर्वाचित नेतृत्व और जनता के बीच विश्वास का संतुलन कैसे बना रहे?

कोरियाई संस्कृति को कवर करने के नाते यहां एक सांस्कृतिक पहलू भी ध्यान देने योग्य है। दक्षिण कोरिया में सार्वजनिक प्रतिष्ठा, संस्थागत सम्मान और सामूहिक नैतिकता का सवाल बहुत गंभीरता से लिया जाता है। वहां किसी सार्वजनिक पदाधिकारी या संस्था पर लगा नैतिक आरोप भी कानूनी आरोप जितना असरकारी हो सकता है। भारतीय समाज में भी इज्जत, नैतिक वैधता और सार्वजनिक धारणा का महत्व कम नहीं, लेकिन कोरिया में यह अक्सर और अधिक तीव्र रूप से दिखाई देता है। इसलिए इस रिकॉर्डिंग विवाद का राजनीतिक प्रभाव केवल अदालत की फाइलों से तय नहीं होगा; यह इस बात से भी तय होगा कि किस पक्ष को जनता अधिक नैतिक विश्वसनीयता देती है।

अंततः यह मामला दक्षिण कोरिया के लिए एक परीक्षण है—क्या वह इस विवाद को संस्थागत सुधार, पारदर्शिता और न्यायिक विश्वसनीयता की दिशा में ले जा पाता है, या यह भी एक और ध्रुवीकरणकारी राजनीतिक संग्राम बनकर रह जाएगा। फिलहाल इतना तय है कि राष्ट्रपति ली जे-म्यंग से जुड़ी जांच पर उठा यह विवाद कोरियाई राजनीति में लंबा असर छोड़ने वाला है। और भारत जैसे लोकतंत्रों के लिए, जो समय-समय पर एजेंसियों की निष्पक्षता और सत्ता की जवाबदेही पर बहस करते रहे हैं, यह एक गंभीर अध्ययन का विषय है—क्योंकि संस्थाओं पर भरोसा एक बार टूटे, तो उसे वापस बनाना सबसे कठिन काम होता है।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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