कोरिया की नई हकीकत: लंबी उम्र की उपलब्धि, लेकिन देखभाल का गहरा संकट
दक्षिण कोरिया को भारत में अक्सर K-pop, K-drama, तकनीकी कंपनियों, ब्यूटी इंडस्ट्री और तेज रफ्तार शहरी जीवन के जरिए समझा जाता है। लेकिन 2026 के कोरिया की सबसे बड़ी कहानी न सियोल की चमक है, न वैश्विक पॉप संस्कृति की ताकत। वहां का केंद्रीय सामाजिक प्रश्न अब यह है कि तेजी से बूढ़े होते समाज में बुजुर्गों की देखभाल कौन करेगा, किस कीमत पर करेगा, और क्या मौजूदा व्यवस्था उस दबाव को संभाल पाएगी।
कोरिया अब उस स्थिति में पहुंच चुका है जिसे वहां ‘चोगोर्योंग समाज’ यानी ‘सुपर-एज्ड सोसाइटी’ कहा जाता है। इसका अर्थ है कि देश की कुल आबादी में 65 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत से ऊपर चली गई है। यह सिर्फ एक जनगणना का तथ्य नहीं, बल्कि पूरे समाज की बनावट बदल देने वाली घटना है। परिवार, रोजगार, अस्पताल, स्थानीय प्रशासन, सामाजिक सुरक्षा, आवास और समुदाय—सब पर इसका असर पड़ता है।
भारतीय पाठकों के लिए इसे समझने का एक आसान तरीका यह है कि जैसे भारत में बेरोजगारी, महंगाई या शहरी प्रदूषण केवल एक मंत्रालय का विषय नहीं रहते, वैसे ही कोरिया में बुजुर्ग देखभाल का प्रश्न अब केवल सामाजिक न्याय या पेंशन नीति तक सीमित नहीं है। यह रोजमर्रा की जिंदगी का प्रश्न बन चुका है। अस्पताल में अपॉइंटमेंट मिलना कठिन हो, घर लौटे बुजुर्ग को भोजन और दवा कौन दे, अकेले रहने वाले वरिष्ठ नागरिक की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित हो, या मध्यम आयु का कर्मचारी नौकरी और माता-पिता की सेवा के बीच कैसे संतुलन बनाए—ये सब अब एक ही बड़े संकट के अलग-अलग चेहरे हैं।
दिलचस्प और चिंताजनक बात यह है कि कोरिया ने यह दौर बहुत तेज गति से देखा है। यूरोप के कई देशों में आबादी के बूढ़े होने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत धीमी थी, इसलिए वहां संस्थाएं और नीतियां समय के साथ ढल सकीं। लेकिन कोरिया में जन्मदर में तेज गिरावट और जीवन प्रत्याशा में वृद्धि ने कुछ ही दशकों में जनसंख्या संरचना पलट दी। नतीजा यह हुआ कि समाज बूढ़ा तो हो गया, मगर उसकी देखभाल की मशीनरी उसी गति से विकसित नहीं हो पाई।
भारत के लिए यह बहस इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हम अभी अपेक्षाकृत युवा देश माने जाते हैं, लेकिन शहरीकरण, छोटे परिवार, प्रवासन, महिलाओं की बढ़ती कामकाजी भागीदारी और अकेलेपन की संस्कृति जैसी प्रवृत्तियां यहां भी तेजी से बढ़ रही हैं। आज जो प्रश्न कोरिया से उठ रहे हैं, वे कल भारत के महानगरों और परसों छोटे शहरों के सामने उसी तीखेपन के साथ खड़े हो सकते हैं।
सिर्फ उम्र बढ़ना समस्या नहीं, ‘केयर गैप’ असली चुनौती क्यों बना
कोरिया में विशेषज्ञों के अनुसार असली संकट इस बात से पैदा हुआ है कि देखभाल की जरूरत रखने वाले लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, लेकिन उनकी सहायता करने वाले परिवारजन, प्रशिक्षित कर्मी, संस्थान और सामुदायिक सेवाएं उस अनुपात में नहीं बढ़ीं। यही वह स्थिति है जिसे वहां ‘दोलबोम गोंगबैक’ यानी ‘केयर गैप’ या ‘देखभाल का खालीपन’ कहा जा रहा है।
कई भारतीय परिवारों में अब भी यह मान लिया जाता है कि बुजुर्गों की सेवा घर के भीतर ही हो जाएगी। लेकिन कोरिया का अनुभव बताता है कि यह धारणा आधुनिक समाज में तेजी से कमजोर पड़ती है। जब परिवार छोटे हों, बच्चे अलग शहरों में रहते हों, विवाह देर से हो रहे हों, अविवाहित रहने वालों की संख्या बढ़ रही हो, और महिलाएं बड़े पैमाने पर कामकाजी हों, तब ‘घर पर कोई न कोई संभाल लेगा’ जैसी सोच टिकती नहीं। कोरिया में यही हुआ।
वहां लंबे समय से दीर्घकालिक देखभाल बीमा जैसी व्यवस्थाएं मौजूद हैं, जिन्हें मोटे तौर पर आप भारत की स्वास्थ्य बीमा और सामाजिक कल्याण योजनाओं के मिश्रित रूप में समझ सकते हैं। इसके बावजूद जमीन पर क्षेत्रीय असमानता, लंबी प्रतीक्षा, प्रशिक्षित स्टाफ की कमी और जटिल बीमारियों से जूझ रहे बुजुर्गों के लिए अपर्याप्त सेवाओं की शिकायतें बनी हुई हैं। मतलब यह कि नीति बन जाने भर से संकट खत्म नहीं होता; उसके क्रियान्वयन और स्थानीय पहुंच पर असली परीक्षा निर्भर करती है।
देखभाल की समस्या केवल नहला-धुला देने या दवा दे देने तक सीमित नहीं है। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद भी कई बुजुर्गों को सामान्य जीवन में लौटने के लिए लगातार मदद चाहिए होती है—भोजन, चलना-फिरना, समय पर दवा, फिजियोथेरेपी, याददाश्त संबंधी समस्याओं की निगरानी, भावनात्मक सहारा और सुरक्षित आवास। कोरिया में बड़ी शिकायत यह है कि चिकित्सा, नर्सिंग, दीर्घकालिक देखभाल, आवास और सामुदायिक समर्थन आपस में समन्वित तरीके से नहीं चलते। परिणाम यह होता है कि परिवार को खुद समझना पड़ता है कि अस्पताल के बाद अगला कदम क्या हो।
भारत में भी ऐसी ही स्थिति अक्सर दिखती है। बड़े निजी अस्पताल में इलाज के बाद मरीज घर तो आ जाता है, लेकिन उसके बाद पुनर्वास, घर पर देखभाल, मानसिक स्वास्थ्य या पोषण संबंधी मदद की एकीकृत व्यवस्था बहुत कम मिलती है। कोरिया की कहानी इसी बिखराव की उच्च स्तरीय, अधिक तीखी और अधिक व्यवस्थित अभिव्यक्ति है।
परिवार की पारंपरिक भूमिका क्यों टूट रही है
कोरियाई समाज लंबे समय तक कन्फ्यूशियस परंपरा से प्रभावित रहा है, जिसमें परिवार, बुजुर्गों के प्रति सम्मान और संतान का दायित्व महत्वपूर्ण सांस्कृतिक मूल्य रहे हैं। भारतीय समाज में ‘मातृ देवो भव’ और ‘पितृ देवो भव’ जैसी धारणाओं से इसकी तुलना की जा सकती है। लेकिन सांस्कृतिक मूल्य जितने मजबूत हों, वे आर्थिक और सामाजिक संरचना के दबाव को हमेशा नहीं झेल पाते।
पहले परिवार की महिलाएं, खासकर बहुएं या बेटियां, बिना वेतन वाले देखभाल श्रम का बड़ा हिस्सा उठाती थीं। कोरिया में भी यह मॉडल लंबे समय तक चलता रहा। अब दोहरी आय वाले परिवार बढ़े हैं, काम के घंटे लंबे हैं, दफ्तर की संस्कृति कड़ी है, नौकरी की असुरक्षा मौजूद है और आवागमन में काफी समय लगता है। ऐसे में घर के भीतर मुफ्त, लगातार और उच्च-गुणवत्ता वाली देखभाल उपलब्ध मान लेना अव्यावहारिक हो गया है।
सबसे ज्यादा दबाव 40 से 50 वर्ष के लोगों पर पड़ रहा है। यह वह पीढ़ी है जो करियर के निर्णायक दौर में होती है, बच्चों की शिक्षा पर खर्च कर रही होती है और साथ ही अपने बूढ़े माता-पिता की चिकित्सा तथा देखभाल की जिम्मेदारी भी उठाती है। कोरिया में यह स्थिति भारत के उस मध्यवर्गीय परिवार जैसी है जहां एक व्यक्ति पर एक साथ होम लोन, बच्चों की कोचिंग, बूढ़े माता-पिता की दवा और नौकरी बचाए रखने का दबाव हो। फर्क सिर्फ इतना है कि कोरिया में जनसांख्यिकीय दबाव अधिक संगठित और अधिक व्यापक स्तर पर दिखाई दे रहा है।
वहां परिवार-आधारित देखभाल अवकाश जैसी व्यवस्थाएं हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि उनका वास्तविक उपयोग सीमित है। वजहें वही हैं जो भारत में भी समझी जा सकती हैं—आय घटने का डर, कार्यालयी संस्कृति, पदोन्नति पर असर की आशंका, और यह चिंता कि लंबे समय तक अनुपस्थित रहने पर कर्मचारी की जगह कोई और न ले ले। कागज पर उपलब्ध सुविधा और जमीन पर उपयोग के बीच यही अंतर सामाजिक नीति की सबसे कठिन परीक्षा बन जाता है।
एक और महत्वपूर्ण बदलाव परिवार के आकार और रूप में है। अकेले रहने वाले बुजुर्ग बढ़ रहे हैं, दंपति के रूप में अकेले रहने वाले बुजुर्ग भी बढ़ रहे हैं, और ऐसी स्थितियां भी सामने आ रही हैं जहां 70 साल का व्यक्ति 80 साल के जीवनसाथी की सेवा कर रहा है। कोरिया में इसे ‘नो-नो केयर’ जैसा विचार समझा जा सकता है, यानी बुजुर्ग ही दूसरे बुजुर्ग की देखभाल कर रहा है। भारत में भी यह दृश्य तेजी से परिचित हो रहा है, खासकर उन शहरों में जहां बच्चे विदेश या दूसरे राज्यों में बस चुके हैं।
गांव, छोटे शहर और महानगर: हर जगह संकट का रूप अलग
सुपर-एज्ड समाज सबको एक जैसी तरह से प्रभावित नहीं करता। कोरिया में सियोल और उसके आसपास का इलाका आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत मजबूत है, लेकिन वहां सेवाएं महंगी हैं और मांग बहुत अधिक है। दूसरी तरफ छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में अस्पताल, नर्सिंग सुविधा, पुनर्वास केंद्र और देखभाल कर्मियों की कमी ज्यादा गंभीर है। युवा आबादी के पलायन ने इन क्षेत्रों को और कमजोर किया है।
भारत के संदर्भ में इसे ऐसे समझिए: जैसे हमारे कुछ जिलों में डॉक्टर, विशेषज्ञ अस्पताल, एंबुलेंस और वृद्धाश्रम जैसी सुविधाएं कागज पर मौजूद होती हैं लेकिन वास्तविक पहुंच बेहद सीमित रहती है, वैसे ही कोरिया के कई स्थानीय इलाकों में समस्या ‘सेवा की अनुपस्थिति’ या ‘बहुत दूर उपलब्धता’ के रूप में दिखाई दे रही है। अगर बुजुर्ग के बच्चे किसी दूसरे शहर में रहते हों और स्थानीय परिवहन कमजोर हो, तो साधारण जांच तक करवाना कठिन हो जाता है।
महानगरों में तस्वीर अलग है। वहां विकल्प अधिक हैं, लेकिन लागत भी ऊंची है। अकेले रहने वाले वरिष्ठ नागरिक को किराया, भोजन, बिजली, दवा और अस्पताल—सबका खर्च एक साथ उठाना पड़ता है। बहुमंजिला अपार्टमेंट संस्कृति, जिसे आधुनिक शहरी जीवन का प्रतीक माना जाता है, चलने-फिरने में दिक्कत वाले बुजुर्गों के लिए बाधा बन सकती है। लिफ्ट, रैंप, फिसलन-रोधी बाथरूम, चौड़े दरवाजे, कम ऊंचाई वाले स्विच—ये सब मामूली वास्तु तत्व नहीं, बल्कि सम्मानजनक वृद्धावस्था की बुनियाद हैं।
कोरिया में इस पर भी आलोचना है कि आवास नीतियां लंबे समय तक युवाओं और नवविवाहित दंपतियों पर केंद्रित रहीं, जबकि समाज तेजी से उम्रदराज हो रहा था। भारत में भी सरकारी और निजी हाउसिंग नीति का केंद्र अक्सर युवा कमाऊ आबादी रही है। वरिष्ठ नागरिक-अनुकूल शहरों और घरों की सोच अभी सीमित है। इसलिए कोरिया का अनुभव हमें बताता है कि उम्रदराज समाज के लिए ‘हेल्थकेयर’ जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी ‘हाउसिंग डिजाइन’ और ‘स्थानीय परिवहन’ भी है।
वर्गीय अंतर इस संकट को और गहरा करता है। जिन परिवारों के पास पर्याप्त संसाधन हैं, वे निजी नर्स, घरेलू देखभाल या अतिरिक्त सेवा खरीद सकते हैं। लेकिन निम्न आयवर्ग के परिवारों में अक्सर किसी एक सदस्य को नौकरी छोड़नी पड़ती है या काम के घंटे घटाने पड़ते हैं। इस तरह देखभाल का संकट केवल भावनात्मक नहीं रहता, वह आय, करियर, मानसिक स्वास्थ्य और भविष्य की आर्थिक सुरक्षा को भी चोट पहुंचाता है।
डिजिटल व्यवस्था और बुजुर्गों का नया बहिष्कार
कोरिया दुनिया के सबसे डिजिटल देशों में गिना जाता है। बैंकिंग से लेकर अस्पताल, प्रशासनिक सेवाओं से लेकर सामाजिक लाभ—बहुत कुछ ऑनलाइन या मोबाइल ऐप आधारित है। सुनने में यह दक्षता का प्रतीक लगता है, लेकिन बुजुर्ग आबादी के लिए यही व्यवस्था नई दीवार बन जाती है। अस्पताल की बुकिंग, सरकारी योजना का आवेदन, पहचान सत्यापन, भुगतान या दस्तावेज अपलोड—हर जगह डिजिटल साक्षरता की जरूरत है।
भारत में भी यही प्रवृत्ति देखी जा रही है। शहरी शिक्षित वर्ग के लिए ऐप-आधारित सेवाएं सुविधाजनक हैं, लेकिन बड़ी संख्या में वरिष्ठ नागरिक स्मार्टफोन, ओटीपी, ऐप इंटरफेस, अंग्रेजी शब्दावली या साइबर सुरक्षा के जोखिमों से सहज नहीं होते। कोरिया में विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि डिजिटल संक्रमण ने दक्षता तो बढ़ाई, लेकिन सेवा से बाहर छूट जाने वाले नागरिकों की नई श्रेणी भी बनाई।
यह बहिष्कार सिर्फ तकनीकी नहीं, सामाजिक भी है। यदि किसी बुजुर्ग को अपॉइंटमेंट के लिए हर बार पड़ोसी, रिश्तेदार या भुगतान लेकर काम कराने वाले व्यक्ति पर निर्भर रहना पड़े, तो उसकी स्वायत्तता घटती है। वृद्धावस्था में सम्मान का अर्थ केवल जीवित रहना नहीं, बल्कि अपने फैसले स्वयं लेने की क्षमता भी है। कोरिया में यह प्रश्न इसलिए और तीखा है क्योंकि वहां तकनीकी ढांचा अत्यंत विकसित है, फिर भी वृद्ध नागरिकों के लिए मानवीय सहायता की जरूरत कम नहीं हुई।
भारत के नीति-निर्माताओं के लिए यह एक स्पष्ट सबक है कि डिजिटलीकरण और मानवीय सहायता को साथ-साथ चलाना होगा। यदि हर सेवा ऐप पर डाल दी जाए, लेकिन सहायता डेस्क, स्थानीय हेल्प सेंटर, फोन-आधारित सहायता और ऑफलाइन विकल्प न हों, तो बुजुर्गों के लिए राज्य अदृश्य हो जाता है।
विशेषज्ञों की चेतावनी: देखभाल को निजी मामला मानना अर्थव्यवस्था के लिए भी खतरनाक
कोरिया में स्वास्थ्य अर्थशास्त्र, श्रम बाजार और सामाजिक नीति के विशेषज्ञ लगभग एक स्वर में कह रहे हैं कि यदि देखभाल को लंबे समय तक परिवार का निजी दायित्व मानकर छोड़ा गया, तो इसकी कीमत पूरी अर्थव्यवस्था चुकाएगी। जब किसी परिवार में एक व्यक्ति बुजुर्ग की सेवा के लिए नौकरी छोड़ता है या काम कम करता है, तो उसका असर केवल उस घर की आय तक सीमित नहीं रहता। प्रशिक्षित श्रमिक कार्यबल से बाहर होता है, कर संग्रह घटता है, महिलाओं का करियर अधिक प्रभावित होता है, और भविष्य में स्वयं वही व्यक्ति वृद्धावस्था गरीबी के जोखिम में फंस सकता है।
दूसरे शब्दों में, देखभाल केवल कल्याणकारी खर्च का प्रश्न नहीं है; यह श्रम आपूर्ति, उत्पादकता और दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता का मुद्दा भी है। भारत में ‘केयर इकॉनमी’ पर चर्चा अभी सीमित है, लेकिन घरेलू श्रम, बच्चों की परवरिश, बुजुर्ग सेवा और बीमार की देखभाल—इन सबका आर्थिक महत्व विशाल है। फर्क सिर्फ इतना है कि यह काम अक्सर महिलाओं के अदृश्य श्रम के रूप में दर्ज ही नहीं होता।
कोरिया में विशेषज्ञ यह भी कह रहे हैं कि समाधान केवल देखभाल कर्मियों की संख्या बढ़ा देने में नहीं है। यदि काम की शर्तें खराब हों, वेतन कम हो, काम भावनात्मक और शारीरिक रूप से बेहद थकाऊ हो, प्रशिक्षण अपर्याप्त हो और करियर प्रगति की कोई स्पष्ट राह न हो, तो इस क्षेत्र में लोगों को टिकाए रखना मुश्किल होगा। यही बात भारत के नर्सिंग, आशा, आंगनवाड़ी और घरेलू देखभाल क्षेत्र पर भी लागू होती है। सेवा की गुणवत्ता केवल सेवा देने वालों की संख्या से नहीं, बल्कि उनके सम्मान, सुरक्षा और पेशेवर तैयारी से तय होती है।
एक और बड़ी आलोचना ‘साइलो’ यानी विभागीय बंटवारे की है। चिकित्सा नीति अलग, आवास अलग, सामाजिक सुरक्षा अलग, स्थानीय प्रशासन अलग—इस तरह की व्यवस्था वास्तविक जीवन की जरूरतों से मेल नहीं खाती। कोई बुजुर्ग अस्पताल से डिस्चार्ज होकर घर आता है, तो उसे एक साथ कई चीजें चाहिए होती हैं: घर पर नर्सिंग, पौष्टिक भोजन, गिरने से बचाने वाले घर में बदलाव, आवागमन, पुनर्वास, मानसिक स्वास्थ्य सहयोग और सामाजिक संपर्क। यदि राज्य इन सेवाओं को जोड़कर नहीं देगा, तो परिवारों पर बोझ बढ़ता जाएगा।
भारत के लिए सबक: आज का कोरिया, कल का एशियाई शहरी समाज?
भारत अभी जनसांख्यिकीय रूप से कोरिया जैसी स्थिति में नहीं है। यहां युवा आबादी बड़ी है, संयुक्त परिवार की परंपरा पूरी तरह टूटी नहीं, और कई स्थानों पर समुदाय आधारित समर्थन भी अब भी मौजूद है। फिर भी यह सोच लेना खतरनाक होगा कि भारत इस बहस से बहुत दूर है। महानगरों में छोटे परिवार, प्रवासी बच्चे, अकेले बुजुर्ग दंपति, कामकाजी महिलाएं, बढ़ते जीवन-यापन खर्च और निजी स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भरता—ये सभी संकेत बताते हैं कि देखभाल संकट धीरे-धीरे हमारे यहां भी जड़ें जमा रहा है।
कोरिया का अनुभव भारत को कम से कम पांच स्पष्ट सबक देता है। पहला, बुजुर्ग नीति को केवल पेंशन या अस्पताल बिस्तरों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। दूसरा, घर और समुदाय आधारित देखभाल को मजबूत किए बिना संस्थागत मॉडल महंगा और अपर्याप्त साबित होगा। तीसरा, महिलाओं के अदृश्य श्रम पर टिके मॉडल की सीमा है। चौथा, डिजिटल सेवाओं के साथ मानवीय पहुंच जरूरी है। और पांचवां, वृद्धावस्था की तैयारी संकट आने के बाद नहीं, उससे बहुत पहले शुरू करनी होगी।
यहां एक सांस्कृतिक आयाम भी समझना जरूरी है। कोरिया की तरह भारत में भी बुजुर्गों का सम्मान एक महत्वपूर्ण सामाजिक मूल्य है। लेकिन सम्मान केवल त्योहारों, पारिवारिक भाषणों या विज्ञापनों से सिद्ध नहीं होता। उसका असली अर्थ है—स्वास्थ्य, सुरक्षा, सामाजिक संपर्क, मानसिक संतुलन, गतिशीलता, आर्थिक स्थिरता और निर्णय लेने की स्वतंत्रता। यदि कोई बुजुर्ग अकेलेपन, असुरक्षा, इलाज की अनुपलब्धता और पारिवारिक अपराधबोध के बीच जीवन गुजार रहा है, तो केवल सांस्कृतिक सम्मान की भाषा पर्याप्त नहीं है।
भारत में अभी अवसर यह है कि हम कोरिया, जापान और यूरोप के अनुभवों से पहले ही सीख लें। हमारे शहरों को वरिष्ठ नागरिक-अनुकूल बनाना, प्राथमिक स्वास्थ्य तंत्र को दीर्घकालिक रोग प्रबंधन से जोड़ना, सामुदायिक डे-केयर केंद्रों की कल्पना करना, पड़ोस-आधारित सहायता मॉडल बनाना, देखभाल कर्मियों का औपचारिक प्रशिक्षण बढ़ाना और परिवारों को लचीले कार्य विकल्प देना—ये सब भविष्य की अनिवार्य तैयारी का हिस्सा होने चाहिए।
नीति का असली फोकस क्या हो: इलाज से पहले रोकथाम, संस्थान से पहले समुदाय
कोरिया में अब नीति बहस का केंद्र यह बन रहा है कि केवल संकट के बाद हस्तक्षेप करना पर्याप्त नहीं होगा। बुजुर्ग व्यक्ति गिरकर घायल हो जाए, अकेलेपन से अवसाद में चला जाए, मधुमेह और उच्च रक्तचाप बिगड़ जाएं, या डिमेंशिया की समस्या गंभीर होकर परिवार को तोड़ने लगे—उसके बाद इलाज और संस्थागत देखभाल अत्यधिक महंगी, जटिल और थकाऊ हो जाती है। इसलिए रोकथाम, शुरुआती हस्तक्षेप और समुदाय-आधारित सहायता पर जोर बढ़ रहा है।
इसका सीधा मतलब है कि स्वस्थ वृद्धावस्था को सार्वजनिक नीति का केंद्र बनाया जाए। नियमित स्वास्थ्य जांच, पोषण, शारीरिक गतिविधि, मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक संपर्क, वरिष्ठ नागरिक क्लब, स्थानीय स्वयंसेवी नेटवर्क, पड़ोस स्तर पर निगरानी और अकेलेपन की पहचान—ये सब अब ‘सॉफ्ट’ मुद्दे नहीं रहे, बल्कि दीर्घकालिक आर्थिक विवेक का हिस्सा हैं।
भारत के लिए भी यही दिशा अधिक व्यावहारिक होगी। हमारे यहां विशाल और महंगी संस्थागत व्यवस्था रातोंरात खड़ी नहीं की जा सकती। लेकिन वार्ड, पंचायत, मोहल्ला और जिला स्तर पर सामुदायिक समर्थन प्रणालियां विकसित की जा सकती हैं। आशा कार्यकर्ता, शहरी स्वास्थ्य मिशन, वरिष्ठ नागरिक समूह, धार्मिक-सामुदायिक संस्थाएं और स्थानीय निकाय यदि समन्वय से काम करें, तो उम्रदराज आबादी के लिए शुरुआती मदद संभव है।
कोरिया की वर्तमान बहस आखिरकार एक मूल प्रश्न पर जाकर टिकती है: लंबी उम्र को क्या हम व्यक्तिगत उपलब्धि मानेंगे या सामूहिक जिम्मेदारी के रूप में समझेंगे? आधुनिक समाज की सफलता तभी पूर्ण कही जाएगी जब वह लोगों को केवल अधिक वर्ष न दे, बल्कि उन वर्षों में गरिमा, संबंध और सुरक्षा भी दे। सुपर-एज्ड समाज भय का नाम नहीं होना चाहिए; लेकिन अगर तैयारी अधूरी हो, तो वही उपलब्धि असमानता, थकान और सामाजिक विघटन का स्रोत बन सकती है।
दक्षिण कोरिया इस मोड़ पर खड़ा है। और भारत के लिए यह एक दूर देश की खबर भर नहीं, बल्कि भविष्य की खिड़की है। आज सियोल जिन प्रश्नों से जूझ रहा है, कल दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, पुणे, कोच्चि, चंडीगढ़ और लखनऊ भी उनसे जूझ सकते हैं। इसलिए इस कहानी को कोरिया की सामाजिक समस्या मानकर अलग रख देना आसान होगा, लेकिन समझदारी इसी में है कि इसे एशिया के बदलते परिवार, बदलती अर्थव्यवस्था और बदलती उम्र संरचना की साझा चेतावनी की तरह पढ़ा जाए।
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