
सीमा के उस पार उठी चेतावनी, जिसका असर भारत तक महसूस किया जा सकता है
दक्षिण एशिया में संक्रामक रोगों की खबरें अक्सर स्थानीय त्रासदी के रूप में शुरू होती हैं, लेकिन बहुत जल्द वे क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय बन जाती हैं। बांग्लादेश में खसरे के प्रकोप से 100 से अधिक लोगों की मौत का अनुमान और उसके जवाब में शुरू किया गया आपात टीकाकरण अभियान इसी तरह की एक गंभीर चेतावनी है। यह केवल एक देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की परीक्षा नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए एक आईना है। भारत के पाठकों के लिए यह खबर इसलिए भी अहम है क्योंकि बांग्लादेश हमारा पड़ोसी है, लोगों की आवाजाही, व्यापार, सीमावर्ती संपर्क और मानवीय संबंध लगातार बने रहते हैं। ऐसे में कोई भी संक्रामक बीमारी महज “विदेश” की खबर नहीं रह जाती।
खसरा, जिसे बहुत-से लोग अब भी बचपन की एक सामान्य बीमारी मान बैठते हैं, वास्तव में दुनिया की सबसे संक्रामक बीमारियों में गिना जाता है। जिन समाजों में टीकाकरण की मजबूत व्यवस्था है, वहां इसकी गंभीरता कम दिख सकती है। लेकिन जहां बच्चों का नियमित टीकाकरण छूट जाता है, पोषण कमजोर है, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं असमान हैं, या आपदा और विस्थापन जैसी परिस्थितियां मौजूद हैं, वहां यही बीमारी तेजी से जानलेवा रूप ले सकती है। बांग्लादेश में 100 से अधिक मौतों का अनुमान इस बात का संकेत है कि संक्रमण केवल छिटपुट नहीं रहा, बल्कि संभवतः कई समुदायों में कुछ समय से फैलता रहा है।
भारतीय संदर्भ में इसे समझना कठिन नहीं है। हमने भी समय-समय पर जापानी इंसेफेलाइटिस, डेंगू, स्वाइन फ्लू, कोविड-19 और खसरे-रूबेला से जुड़े स्थानीय प्रकोप देखे हैं। भारत के कई राज्यों में सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ बार-बार कहते रहे हैं कि बीमारी का असली खतरा तभी बढ़ता है, जब नियमित टीकाकरण में छोटी-छोटी दरारें बनती हैं और वे वर्षों तक भरी नहीं जातीं। बांग्लादेश का मौजूदा संकट उसी तरह की एक संचित विफलता की ओर इशारा करता है—एक ऐसी विफलता, जो किसी एक दिन में पैदा नहीं होती, बल्कि स्वास्थ्य तंत्र, गरीबी, पोषण, आपदा और जनसंख्या घनत्व के दबाव में धीरे-धीरे आकार लेती है।
यहां एक और बात समझना जरूरी है। अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसियां, जैसे कोरिया की योनहाप या हमारे यहां पीटीआई और एएनआई, जब किसी पड़ोसी देश की स्वास्थ्य आपदा को प्रमुखता देती हैं, तो उसका अर्थ केवल सूचना देना नहीं होता। इसका मतलब यह भी होता है कि मामला स्थानीय सीमा से बाहर निकलकर क्षेत्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा का प्रश्न बन चुका है। बांग्लादेश में खसरे की यह स्थिति उसी श्रेणी में आती है।
100 मौतों का अनुमान क्या बताता है, और ‘अनुमान’ शब्द क्यों महत्वपूर्ण है
इस खबर का सबसे चौंकाने वाला पहलू है—100 से अधिक मौतों का अनुमान। लेकिन पत्रकारिता और सार्वजनिक स्वास्थ्य, दोनों की भाषा में “अनुमान” शब्द को ठीक से समझना आवश्यक है। इसका अर्थ यह नहीं कि खतरा कम है; बल्कि कई बार इसका अर्थ उल्टा होता है। जब किसी प्रकोप के दौरान मौतों की संख्या अनुमान के रूप में सामने आती है, तो अक्सर वह इस बात की ओर संकेत करती है कि जमीनी स्तर पर वास्तविक हालात और आधिकारिक आंकड़ों के बीच कुछ अंतर है। कारण कई हो सकते हैं: दूरदराज इलाकों में जांच की कमी, रिपोर्टिंग में देरी, स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंच की समस्या, निजी या अनौपचारिक उपचार, या फिर ऐसा प्रशासनिक दबाव जिसमें हर मृत्यु को समय पर रोग-विशेष से जोड़ना आसान नहीं होता।
भारत में भी हमने देखा है कि महामारी या प्रकोप के शुरुआती दौर में “संभावित”, “संदिग्ध”, “अनुमानित” जैसे शब्द खबरों में बार-बार आते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ इन्हें हल्के में नहीं लेते, क्योंकि यही वे संकेत होते हैं जो बताते हैं कि प्रकोप का दायरा आधिकारिक रिकॉर्ड से बड़ा हो सकता है। बांग्लादेश के मामले में भी यही चिंता है। अगर खसरे के कारण 100 से अधिक मौतें हुई हैं, तो यह संभव है कि संक्रमण की कड़ी कई जिलों, घनी बस्तियों या कमजोर आबादी वाले इलाकों में पहले से फैल चुकी हो।
खसरा केवल बुखार और दाने भर नहीं है। यह बच्चों में निमोनिया, गंभीर दस्त, निर्जलीकरण, कुपोषण की बिगड़ती स्थिति और कभी-कभी मस्तिष्क संबंधी जटिलताओं तक ले जा सकता है। जिन परिवारों में पहले से पोषण कमजोर हो, वहां बीमारी का असर और भी घातक बन जाता है। इसलिए मौतों की संख्या को केवल “वायरस का असर” मानना पर्याप्त नहीं है। यह उस पूरे सामाजिक ढांचे का प्रतिबिंब भी होती है, जिसमें बच्चा जन्म से लेकर टीकाकरण, पोषण, प्राथमिक इलाज और समय पर रेफरल तक की यात्रा करता है।
भारतीय पाठकों के लिए यह तुलना उपयोगी होगी: जैसे किसी शहर में पुल गिरने की घटना सिर्फ इंजीनियरिंग की विफलता नहीं होती, बल्कि रखरखाव, निरीक्षण और शासन की भी कहानी कहती है, वैसे ही खसरे से होने वाली मौतें केवल वायरस की कहानी नहीं होतीं। वे सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की उन कमजोरियों को उजागर करती हैं, जो सामान्य दिनों में छिपी रहती हैं।
आपात टीकाकरण क्यों शुरू करना पड़ा, और इसका वास्तविक अर्थ क्या है
बांग्लादेशी अधिकारियों ने खसरे के फैलाव को रोकने के लिए आपात टीकाकरण अभियान शुरू किया है। पहली नजर में यह एक सीधी प्रशासनिक प्रतिक्रिया लग सकती है, लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य के नजरिए से इसका अर्थ कहीं अधिक गहरा है। जब कोई देश नियमित टीकाकरण व्यवस्था के अलावा “आपात” अभियान चलाने को मजबूर होता है, तो इसका मतलब है कि सामान्य ढांचा संक्रमण की रफ्तार को थामने के लिए पर्याप्त नहीं रह गया। अब लक्ष्य सिर्फ भविष्य की पीढ़ियों को सुरक्षा देना नहीं, बल्कि तत्काल सामुदायिक प्रतिरक्षा को मजबूत करना होता है।
खसरा इतना संक्रामक है कि इसे रोकने के लिए बहुत ऊंचे स्तर का टीकाकरण कवरेज चाहिए। यदि किसी समुदाय में बच्चों का एक छोटा हिस्सा भी बिना टीके के रह जाता है, तो वही समूह संक्रमण की कड़ी बन सकता है। यही वजह है कि स्वास्थ्य विभाग अक्सर ऐसे अभियानों में खास उम्र वर्ग के बच्चों, झुग्गी-बस्तियों, आपदा-प्रभावित इलाकों, सीमावर्ती जिलों, शरणार्थी शिविरों और कमजोर स्वास्थ्य सेवाओं वाले ग्रामीण क्षेत्रों को प्राथमिकता देता है। हालांकि बांग्लादेशी अभियान के विस्तृत भौगोलिक और आयु-आधारित दायरे की अधिकृत जानकारी आगे और स्पष्ट होगी, लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य तर्क यही बताता है कि सबसे पहले वही आबादी लक्ष्य होगी, जहां प्रतिरक्षा का अंतर सबसे बड़ा है।
भारत में पोलियो उन्मूलन अभियान इसका बड़ा उदाहरण रहा है। नियमित टीकाकरण अपनी जगह था, लेकिन जब तक विशेष बूथ, घर-घर संपर्क, रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों तक अभियान नहीं पहुंचे, तब तक संक्रमण की श्रृंखला तोड़ना आसान नहीं था। खसरे के मामले में भी यही सिद्धांत लागू होता है। केवल वैक्सीन उपलब्ध होना काफी नहीं; उसे सही समय, सही संख्या और सही समुदाय तक पहुंचाना ही असली परीक्षा है।
यहां एक और संवेदनशील पहलू है—विश्वास। अक्सर सरकारें टीका भेज देती हैं, लेकिन समुदाय तक संदेश प्रभावी ढंग से नहीं पहुंचता। कुछ परिवारों को जानकारी देर से मिलती है, कुछ दूरी या मजदूरी के कारण केंद्र तक नहीं जा पाते, कुछ में अफवाहें बाधा बनती हैं। भारत में भी कई राज्यों में स्वास्थ्य कर्मियों को घर-घर समझाइश देनी पड़ी है कि टीका बुखार नहीं फैलाता, बल्कि उससे बचाता है। बांग्लादेश में आपात टीकाकरण की सफलता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि वहां की स्थानीय स्वास्थ्यकर्मी, स्वयंसेवी नेटवर्क, धार्मिक और सामुदायिक नेतृत्व तथा अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां मिलकर कितना भरोसा बना पाती हैं।
फिर सवाल वही: टीके से रोकी जा सकने वाली बीमारी दोबारा क्यों फैली
यह प्रश्न किसी भी जागरूक पाठक के मन में स्वाभाविक रूप से उठेगा कि जब खसरे का टीका दशकों से उपलब्ध है, तो फिर ऐसी नौबत क्यों आती है। इसका उत्तर एक शब्द में नहीं दिया जा सकता। पहला कारण है टीकाकरण का छूट जाना, लेकिन उसके पीछे कई परतें हैं। किसी देश का राष्ट्रीय औसत कवरेज अच्छा दिख सकता है, पर वास्तविकता में कुछ जिले, कुछ बस्तियां या कुछ सामाजिक समूह पीछे छूट जाते हैं। बीमारी का फैलाव अक्सर इन्हीं जेबों से शुरू होता है।
बांग्लादेश जैसे घनी आबादी वाले देश में यह असमानता अधिक खतरनाक हो सकती है। तेजी से बढ़ते शहरों के आसपास बनने वाली अनौपचारिक बस्तियां, बाढ़-प्रभावित क्षेत्र, दूरदराज ग्रामीण इलाके, काम के सिलसिले में बार-बार स्थान बदलने वाले परिवार, और स्वास्थ्य संस्थानों से कमजोर जुड़ाव रखने वाली आबादियां—इन सबके बीच दो खुराक वाला पूर्ण टीकाकरण सुनिश्चित करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। एक बार अगर बच्चों का समूह बिना पर्याप्त प्रतिरक्षा के तैयार हो जाए, तो खसरे जैसे रोग को फैलने के लिए बहुत ज्यादा अवसर नहीं चाहिए।
दूसरा बड़ा कारण महामारी के बाद पैदा हुई स्वास्थ्य-व्यवस्था की थकान है। कोविड-19 के दौरान और उसके बाद दुनिया के अनेक निम्न और मध्यम आय वाले देशों में नियमित टीकाकरण, स्कूल-आधारित स्वास्थ्य निगरानी और प्राथमिक सेवाओं की निरंतरता प्रभावित हुई। कई परिवार अस्पताल जाने से बचे, कई कार्यक्रम स्थगित हुए, कई स्वास्थ्यकर्मी महामारी प्रबंधन में लग गए। इसका असर तत्काल नहीं, कुछ वर्षों बाद दिखाई देता है, जब ऐसे बच्चे एक बड़े समूह के रूप में सामने आते हैं जिन्हें समय पर पूरी सुरक्षा नहीं मिल पाई। खसरा ऐसी ही बीमारी है, जो स्वास्थ्य व्यवस्था की पुरानी दरारों को अचानक बड़ी सुर्खी में बदल देती है।
तीसरा कारण पोषण और इलाज की उपलब्धता है। वैक्सीन बीमारी को रोकने का सबसे प्रभावी तरीका है, लेकिन जब संक्रमण हो ही जाए, तो उसके परिणाम इस बात पर निर्भर करते हैं कि बच्चा कितना पोषित है, परिवार कितनी जल्दी स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचता है, और वहां उपचार, दवाएं, ऑक्सीजन, तरल पदार्थ तथा निगरानी की कितनी सुविधा उपलब्ध है। दक्षिण एशिया के गरीब और असमान समाजों में बीमारी कभी भी अकेले नहीं आती; वह कुपोषण, भीड़भाड़, खराब स्वच्छता और स्वास्थ्य-सेवाओं की कमी के साथ मिलकर ज्यादा घातक बनती है।
बांग्लादेश की संरचनात्मक चुनौतियां: जनसंख्या घनत्व, सीमा-पार आवाजाही और आपदा
बांग्लादेश की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियां उसके सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र पर लगातार दबाव डालती रही हैं। दुनिया के सबसे घनी आबादी वाले देशों में शामिल होने के कारण वहां एक संक्रमित व्यक्ति बहुत कम समय में बड़ी संख्या में लोगों के संपर्क में आ सकता है। स्कूल, बाजार, स्थानीय परिवहन, घनी आवासीय बस्तियां और अस्थायी निवास वाले क्षेत्र—ये सभी खसरे जैसे रोग के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार करते हैं। यदि प्रतिरक्षा का कवच कहीं पतला हुआ, तो संक्रमण तेजी से फैल सकता है।
भारत के महानगरों की झुग्गी-बस्तियों या बिहार, पश्चिम बंगाल, असम और उत्तर प्रदेश के कुछ सघन इलाकों की कल्पना कीजिए, जहां एक कमरे में कई सदस्य रहते हैं और साझा सुविधाओं का उपयोग करते हैं। ऐसे माहौल में अत्यंत संक्रामक बीमारी को केवल सावधानी संबंधी सलाहों से रोकना लगभग असंभव है। यही समस्या बांग्लादेश में और तीव्र रूप में सामने आती है। इसलिए वहां टीकाकरण, निगरानी और त्वरित रिपोर्टिंग की भूमिका और भी बढ़ जाती है।
दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है सीमा-पार और आंतरिक आवाजाही। दक्षिण एशिया में काम, परिवार, व्यापार, शरण, अस्थायी विस्थापन और मानवीय कारणों से आबादी का गतिशील रहना सामान्य बात है। जब लोग लगातार स्थान बदलते हैं, तो उनके टीकाकरण रिकॉर्ड की निरंतरता बनाए रखना कठिन होता है। यही वजह है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ किसी भी बड़े प्रकोप को सिर्फ राष्ट्रीय समस्या नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा के मुद्दे के रूप में देखते हैं। भारत के लिए यह संकेत स्पष्ट है: सीमावर्ती राज्यों और अंतरराष्ट्रीय यात्रा बिंदुओं पर निगरानी, सूचना साझाकरण और टीकाकरण सत्यापन की भूमिका और अहम हो जाती है।
तीसरी चुनौती है प्राकृतिक आपदाएं। बांग्लादेश लंबे समय से बाढ़, चक्रवात और जलवायु-संबंधी संकटों से जूझता रहा है। आपदा के समय स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंच बाधित होती है, कोल्ड-चेन यानी वैक्सीन को सुरक्षित तापमान में रखने की प्रणाली प्रभावित हो सकती है, और विस्थापित आबादी अस्थायी शिविरों या भीड़भाड़ वाली जगहों पर पहुंच जाती है। ऐसे माहौल में संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इसलिए खसरे के मौजूदा प्रकोप को केवल “टीका नहीं लगा” कहकर समझना अधूरा होगा; यह स्वास्थ्य, आवास, आपदा-प्रबंधन और सामाजिक सुरक्षा के जुड़े हुए संकट का मामला है।
भारत के लिए सबक: पड़ोसी की स्वास्थ्य त्रासदी से अपने सिस्टम को कैसे पढ़ें
भारत ने सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम, मिशन इंद्रधनुष, पोलियो उन्मूलन और खसरा-रूबेला अभियान के जरिए सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। लेकिन बांग्लादेश की स्थिति हमें यह याद दिलाती है कि सफलता स्थायी नहीं होती; उसे लगातार बनाए रखना पड़ता है। जैसे एक बार बनाई गई सड़क की मरम्मत न हो तो वह टूटने लगती है, वैसे ही टीकाकरण कवरेज में थोड़ी-सी ढील भी आने वाले वर्षों में गंभीर प्रकोप का रूप ले सकती है।
भारत के लिए पहला सबक है—राष्ट्रीय औसत से संतुष्ट न होना। जरूरी है कि जिला, ब्लॉक, शहरी बस्ती, प्रवासी समूह और कठिन भौगोलिक क्षेत्रों के स्तर पर डेटा को देखा जाए। अगर कहीं दूसरे डोज का कवरेज कम है, अगर स्कूल से बाहर बच्चों तक पहुंच कमजोर है, अगर प्रवासी मजदूर परिवारों के बच्चों का रिकॉर्ड बिखरा हुआ है, तो वही भविष्य का जोखिम क्षेत्र बन सकता है।
दूसरा सबक है—टीकाकरण को केवल स्वास्थ्य मंत्रालय की जिम्मेदारी न मानना। आंगनवाड़ी, स्कूल, पंचायत, नगर निकाय, महिला समूह, स्वयंसेवी संगठन, धार्मिक नेतृत्व और स्थानीय मीडिया—सभी की भूमिका है। भारत में पल्स पोलियो अभियान इसलिए सफल हुआ क्योंकि वह सरकारी आदेश भर नहीं रहा; वह सामाजिक भागीदारी का अभियान बना। खसरे जैसे रोगों के खिलाफ भी यही मॉडल उपयोगी है।
तीसरा सबक सीमावर्ती राज्यों के लिए खास है। पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा, मेघालय और अन्य संपर्क बिंदुओं पर स्वास्थ्य निगरानी तंत्र, टीकाकरण परामर्श और संदिग्ध मामलों की रिपोर्टिंग तेज होना चाहिए। इसका अर्थ बंदिशें बढ़ाना नहीं, बल्कि तैयारी मजबूत करना है। संक्रामक रोगों के युग में सीमा सुरक्षा का एक आयाम स्वास्थ्य सुरक्षा भी है।
चौथा सबक जनविश्वास से जुड़ा है। भारत में भी समय-समय पर टीकों को लेकर अफवाहें उठती रही हैं। जब तक स्थानीय भाषा में, स्थानीय उदाहरणों के साथ, सम्मानजनक संवाद नहीं होगा, तब तक केवल सरकारी पोस्टर पर्याप्त नहीं होंगे। यह समझना होगा कि किसी मां-बाप का संकोच हमेशा विज्ञान-विरोध नहीं होता; कई बार वह सूचना की कमी, दूरी, दिहाड़ी छूटने का डर या खराब अनुभव का परिणाम होता है। इसलिए सार्वजनिक स्वास्थ्य का काम सिर्फ इंजेक्शन लगाना नहीं, भरोसा बनाना भी है।
वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए संदेश: आपात कदम जरूरी, लेकिन पर्याप्त नहीं
बांग्लादेश में आपात टीकाकरण की शुरुआत स्वागतयोग्य और आवश्यक कदम है, लेकिन यह अंतिम समाधान नहीं माना जा सकता। किसी भी प्रकोप को नियंत्रित करने के लिए तीन चीजें साथ-साथ चलनी चाहिए—तेज पहचान, प्रभावी उपचार और व्यापक रोकथाम। यदि केवल वैक्सीन अभियान चलाया जाए लेकिन संदिग्ध मामलों की रिपोर्टिंग कमजोर रहे, अस्पतालों में जटिल मामलों के लिए पर्याप्त सुविधा न हो, और पोषण सहायता की कमी बनी रहे, तो मृत्यु दर कम करना मुश्किल हो सकता है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए यह भी एक कसौटी है। दुनिया आज युद्ध, जलवायु संकट, आर्थिक मंदी, शरणार्थी संकट और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से जूझ रही है। ऐसे समय में सार्वजनिक स्वास्थ्य अक्सर सुर्खियों से पीछे चला जाता है—जब तक कि कोई त्रासदी सामने न आ जाए। लेकिन खसरा जैसी वैक्सीन से रोकी जा सकने वाली बीमारी में बड़े पैमाने पर मौतें हमें बताती हैं कि रोकथाम पर खर्च घटाना बाद में कहीं अधिक बड़ी मानवीय और आर्थिक कीमत वसूल करता है।
यहां भारत की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है। फार्मा उत्पादन, वैक्सीन आपूर्ति, क्षेत्रीय सहयोग और दक्षिण-दक्षिण साझेदारी के क्षेत्र में भारत की क्षमता पहले से स्थापित है। दक्षिण एशिया में स्वास्थ्य सहयोग को केवल महामारी-काल की तदर्थ व्यवस्था नहीं, बल्कि स्थायी क्षेत्रीय तंत्र बनाने की जरूरत है। रोग-निगरानी, लैब सहयोग, प्रशिक्षण, कोल्ड-चेन, डिजिटल रिकॉर्ड और सीमापार सूचना साझा करना—ये सभी अब सुरक्षा नीति का हिस्सा समझे जाने चाहिए।
अंततः बांग्लादेश का यह प्रकोप हमें एक असुविधाजनक लेकिन जरूरी सच्चाई याद दिलाता है: सार्वजनिक स्वास्थ्य तब सबसे सफल माना जाता है, जब वह खबर नहीं बनता। जब बच्चे बिना शोर-शराबे के समय पर टीकाकरण पा लेते हैं, जब बुखार गंभीर निमोनिया में नहीं बदलता, जब एक गांव की बीमारी शहरों तक नहीं पहुंचती—तभी व्यवस्था वास्तव में काम कर रही होती है। आज बांग्लादेश में खसरे की जो खबर सुर्खी बन रही है, वह दरअसल उन अंतरालों की कहानी है जिन्हें समय रहते भरा नहीं जा सका। भारत के लिए यह केवल पड़ोसी के संकट पर सहानुभूति जताने का क्षण नहीं, बल्कि अपने स्वास्थ्य ढांचे को और सतर्क, समावेशी और लचीला बनाने का भी अवसर है।
दक्षिण एशिया का भविष्य केवल आर्थिक विकास दरों, एक्सप्रेसवे, बंदरगाहों या डिजिटल भुगतान प्रणालियों से तय नहीं होगा। यह इस बात से भी तय होगा कि हम अपने बच्चों को उन बीमारियों से कितनी मजबूती से बचा पाते हैं, जिनसे बचाव का रास्ता हमारे पास पहले से मौजूद है। बांग्लादेश में खसरे का यह प्रकोप हमें यही कठोर सबक देकर गया है।
0 टिप्पणियाँ