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दक्षिण कोरिया में छोटे घरों की ओर बड़ा झुकाव: 2026 के आवास बाज़ार से भारत के लिए क्या सबक निकलते हैं

दक्षिण कोरिया में छोटे घरों की ओर बड़ा झुकाव: 2026 के आवास बाज़ार से भारत के लिए क्या सबक निकलते हैं

बदलती प्राथमिकताएं: कोरिया के आवास बाज़ार में सबसे साफ़ संकेत

दक्षिण कोरिया के आवास बाज़ार में अप्रैल 2026 की सबसे महत्वपूर्ण कहानी महंगे, बड़े और प्रतिष्ठा-चिह्न माने जाने वाले घरों की नहीं, बल्कि छोटे और अपेक्षाकृत किफायती अपार्टमेंटों की है। वहां अब खरीदार, किरायेदार और नए प्रोजेक्ट में आवेदन करने वाले परिवार एक ही दिशा में बढ़ते दिखाई दे रहे हैं—ऐसे घरों की तरफ़ जिनकी कीमत सिर्फ़ कागज़ पर आकर्षक न लगे, बल्कि जिनका मासिक खर्च वास्तव में उठाया जा सके। यह बदलाव केवल घर के आकार की पसंद भर नहीं है; यह उस आर्थिक दबाव का सीधा प्रतिबिंब है जिसमें परिवार अब ‘सपनों का घर’ नहीं, बल्कि ‘संभव घर’ चुनने को मजबूर हैं।

कोरिया में इस समय जो रुझान दिखाई दे रहा है, वह भारत के महानगरों के पाठकों को बहुत परिचित लगेगा। जैसे मुंबई, गुरुग्राम, बेंगलुरु, नोएडा या पुणे में घर खरीदने वाले युवा परिवार अक्सर पहले यह नहीं पूछते कि घर कितना बड़ा है, बल्कि यह देखते हैं कि डाउन पेमेंट कितना देना होगा, ईएमआई कितनी बनेगी, मेंटेनेंस कितना आएगा और नौकरी में उतार-चढ़ाव होने पर भी क्या वे यह बोझ उठा पाएंगे। कोरिया में भी अब यही सोच मुख्यधारा बनती दिखाई दे रही है।

वहां के बाज़ार में छोटे अपार्टमेंटों की मांग आवेदन, पुनर्विक्रय और किराये—तीनों स्तरों पर एक साथ बढ़ रही है। इसका अर्थ यह है कि यह कोई क्षणिक फैशन नहीं, बल्कि आवासीय अर्थशास्त्र में गहरी संरचनात्मक तब्दीली है। बाजार का पारंपरिक विचार, जिसमें बड़ा घर सफलता का प्रतीक माना जाता था, अब धीरे-धीरे उस विचार से प्रतिस्थापित हो रहा है जिसमें टिकाऊ नकदी प्रवाह, सीमित कर्ज़ और नियंत्रित मासिक बोझ को प्राथमिकता दी जा रही है।

भारतीय संदर्भ में कहें तो यह वही क्षण है जब मध्यमवर्गीय परिवार ‘तीन बेडरूम चाहिए’ की इच्छा से पीछे हटकर ‘अभी 1BHK या कॉम्पैक्ट 2BHK ही समझदारी है’ पर पहुंचते हैं। यह बदलाव आकांक्षा की हार नहीं, बल्कि आर्थिक यथार्थ की जीत है। दक्षिण कोरिया में यही यथार्थ अब पूरे आवास बाज़ार को आकार दे रहा है।

कोरिया में छोटा घर क्यों बन रहा है पहली पसंद?

इस बदलाव की जड़ में सबसे पहले वित्तीय परिस्थितियां हैं। घर खरीदने के इच्छुक लोगों के लिए अब केवल संपत्ति की कुल कीमत मायने नहीं रखती, बल्कि यह भी अहम है कि उस कीमत तक पहुंचा कैसे जाए। ऋण की शर्तें सख्त हों, ब्याज दरें ऊंची बनी रहें, और भुगतान की संरचना तनावपूर्ण हो, तो एक ही इलाके में स्थित छोटा घर अचानक कहीं ज्यादा व्यावहारिक विकल्प बन जाता है। यानी घर की उपयोगिता और हैसियत से पहले उसकी वहन क्षमता निर्णायक हो रही है।

कोरिया में नए अपार्टमेंट प्रोजेक्ट की कीमतें भूमि लागत, निर्माण लागत और वित्तपोषण लागत के कारण आसानी से नीचे नहीं आ रहीं। वहां तकरीबन वही स्थिति है जो भारत में बड़े शहरों के प्रीमियम और उभरते इलाकों में दिखाई देती है—डेवलपर छूट की भाषा बोलते हैं, लेकिन कुल मिलाकर खरीदार के लिए प्रवेश लागत बहुत कम नहीं होती। ऐसे में खरीदार सिर्फ़ प्रति वर्गफुट दर नहीं देखते, बल्कि कुल बुकिंग राशि, अनुबंध राशि, बीच-बीच की किश्तें और अंत में देय रकम को जोड़कर गणित बैठाते हैं। इस पूरे समीकरण में छोटा घर स्वाभाविक रूप से अधिक संभव विकल्प बनकर उभरता है।

किराये के बाज़ार में भी यही दबाव दिखाई देता है। कोरिया की एक महत्वपूर्ण व्यवस्था है ‘जोंसे’ या ‘चोन्से’, जिसमें किरायेदार एक बड़ी सुरक्षा जमा राशि देकर अपेक्षाकृत कम मासिक भुगतान या बिना मासिक किराये के घर में रहता है। भारतीय पाठकों के लिए इसे एक बहुत बड़े रिफंडेबल डिपॉज़िट वाले मॉडल के रूप में समझा जा सकता है, हालांकि व्यवहार में यह हमारे शहरों के सुरक्षा जमा से कहीं विशाल और अधिक वित्तीय रूप से भारी होता है। जब ऐसी जमा राशि जुटाना कठिन हो जाता है, तब लोग मासिक किराये वाले विकल्प की ओर जाते हैं। लेकिन वहां भी हर महीने का बोझ बढ़ जाता है। नतीजतन, छोटे अपार्टमेंट किराये और डिपॉज़िट दोनों स्तरों पर दबाव कम करने वाले समझौते के रूप में सामने आते हैं।

यानी कोरिया में छोटे घरों की मांग केवल ‘कम जगह में रहने की नई जीवनशैली’ की कहानी नहीं है। यह उस तनाव की कहानी है जिसमें परिवार यह तय कर रहे हैं कि किस घर में वे बिना टूटे रह सकते हैं। भारत में जैसे युवा दंपति अक्सर कहते हैं कि “लोकेशन और ईएमआई के बीच बैलेंस बनाना है”, कोरिया में भी अब आवासीय फैसलों का यही केंद्रीय सूत्र बनता जा रहा है।

‘अच्छा घर’ की परिभाषा बदल रही है

किसी भी समाज के आवास बाज़ार में एक बेहद दिलचस्प क्षण वह होता है जब ‘अच्छे घर’ की परिभाषा बदलने लगती है। दक्षिण कोरिया में यह परिवर्तन अब साफ़ दिखता है। पहले जहां बड़ा फ्लोर एरिया, ऊंची प्रतिष्ठा वाले इलाके, और भविष्य में अधिक मूल्य वृद्धि की संभावना को अत्यधिक महत्व दिया जाता था, वहीं अब खरीदार और किरायेदार यह पूछ रहे हैं कि क्या यह घर अगले पांच या दस साल तक वित्तीय रूप से टिकाऊ रहेगा।

यानी अब सवाल यह नहीं कि घर कितना प्रभावशाली है, बल्कि यह कि क्या उसकी मासिक लागत परिवार की आय के भीतर समा सकती है। इसमें केवल होम लोन की किश्तें ही नहीं, बल्कि रखरखाव, सामुदायिक सुविधाओं का खर्च, आवागमन, बच्चों की पढ़ाई से जुड़ी लोकेशनल लागत, और भविष्य के अनिश्चित आर्थिक वातावरण को भी शामिल किया जा रहा है। एक तरह से देखें तो घर अब भावनात्मक उपलब्धि के साथ-साथ नकदी प्रबंधन का उत्पाद भी बन गया है।

भारतीय शहरों में भी यह प्रवृत्ति तेजी से दिख रही है। पहले लोग कहते थे—“एक बार बड़ा घर ले लिया तो जीवन बन जाएगा।” अब वही लोग कह रहे हैं—“ऐसा घर लेना है जिसमें ईएमआई चुकाने के बाद जीवन बचा रहे।” कोरिया का वर्तमान इसी मानसिक बदलाव की पुष्टि करता है। वहां रहने वाले युवा पेशेवर, नई शादीशुदा जोड़ियां, और पहली बार घर खरीदने वाले परिवार अब इस बात पर अधिक ध्यान दे रहे हैं कि घर की कुल लागत उनके करियर, आय वृद्धि और जीवन-चक्र के साथ कितनी मेल खाती है।

यह बदलाव सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। बड़े घर लंबे समय तक सफलता और स्थिरता का सार्वजनिक संकेत रहे हैं। लेकिन जब अर्थव्यवस्था, ब्याज दरें और संपत्ति मूल्यों का दबाव बढ़ता है, तब प्रतिष्ठा की जगह टिकाऊपन ले लेता है। कोरिया इस समय ठीक ऐसे मोड़ पर है जहां ‘प्रतिष्ठित घर’ की जगह ‘व्यवहार्य घर’ नई आकांक्षा बन रहा है।

आवेदन और नई परियोजनाएं: अब जीतने से ज्यादा ज़रूरी है बाद में निभा पाना

कोरिया में नए अपार्टमेंट के लिए आवेदन करने की एक लंबी परंपरा है, जिसे वहां की आवासीय व्यवस्था में बेहद अहम माना जाता है। भारतीय पाठकों के लिए इसे किसी हाउसिंग स्कीम, लॉन्च बुकिंग या सीमित यूनिट वाले नए प्रोजेक्ट के आवेदन और अलॉटमेंट की प्रक्रिया से जोड़कर समझा जा सकता है। पहले इस प्रक्रिया में कई लोग केवल इस उम्मीद से भाग लेते थे कि यदि उन्हें यूनिट मिल गई तो भविष्य में संपत्ति मूल्य बढ़ने का लाभ मिलेगा। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है।

अब वहां आवेदन करने वाले लोग सिर्फ़ यह नहीं सोचते कि उन्हें फ्लैट मिल जाएगा या नहीं, बल्कि यह भी देखते हैं कि अलॉटमेंट के बाद अनुबंध भुगतान, ऋण प्रबंधन, अंतिम भुगतान और प्रवेश के बाद का खर्च वे वास्तव में संभाल पाएंगे या नहीं। यह मानसिकता अधिक सतर्क, अधिक यथार्थवादी और कुछ हद तक रक्षात्मक है। छोटे अपार्टमेंट इसीलिए आकर्षक हो रहे हैं क्योंकि इनकी कुल कीमत अपेक्षाकृत कम होती है और भुगतान की पूरी समय-रेखा अधिक प्रबंधनीय लगती है।

युवा खरीदारों की बढ़ती हिस्सेदारी इस रुझान को और स्पष्ट बनाती है। रिपोर्टों के अनुसार, कोरिया में आवेदन के जरिए घर पाने वालों में 30 वर्ष या उससे कम उम्र के लोगों का हिस्सा काफी बढ़ा है। इसका अर्थ यह है कि आवासीय बाजार का केंद्र अब युवा वास्तविक खरीदार बन रहे हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि इन युवाओं की पसंद अक्सर उनकी आर्थिक स्वतंत्रता से कम और उनकी वित्तीय सीमाओं से ज्यादा तय होती है।

भारत में भी यही स्थिति देखने को मिलती है। नोएडा एक्सटेंशन, ठाणे, न्यू टाउन, व्हाइटफील्ड या नई परिधीय बस्तियों में फ्लैट देखने जाने वाले युवा दंपति अक्सर लोकेशन, सुविधाओं और ब्रांडेड डेवलपर से प्रभावित होते हैं, लेकिन अंतिम निर्णय ईएमआई कैलकुलेटर करता है। कोरिया की मौजूदा स्थिति हमें बताती है कि जब आर्थिक माहौल अनिश्चित हो, तब आवेदन बाजार में ‘कम जोखिम वाली आकांक्षा’ सबसे ज्यादा बिकती है। छोटा घर इसी श्रेणी का उत्पाद है।

पुनर्विक्रय बाज़ार: छोटा अपार्टमेंट अब ‘पहला घर’ और ‘रक्षात्मक संपत्ति’ दोनों

केवल नए प्रोजेक्ट ही नहीं, पुराने या पुनर्विक्रय वाले अपार्टमेंट के बाज़ार में भी छोटा घर महत्व पा रहा है। इसका कारण यह है कि मंद या मिश्रित बाजार में हर तरह की संपत्ति बराबर नहीं चलती। खरीदार सबसे पहले उसी श्रेणी की ओर जाते हैं जहां कुल निवेश कम हो, पुनर्बिक्री की संभावना बनी रहे और गिरावट का जोखिम अपेक्षाकृत सीमित लगे। छोटे अपार्टमेंट इसी वजह से ‘फर्स्ट होम’ और ‘डिफेंसिव एसेट’ दोनों की भूमिका निभा रहे हैं।

डिफेंसिव एसेट का अर्थ यहां शेयर बाजार वाली जटिल भाषा नहीं, बल्कि सामान्य अर्थ में ऐसी संपत्ति है जिसकी मांग पूरी तरह गायब होने की संभावना कम हो। छोटा अपार्टमेंट अक्सर अविवाहित पेशेवरों, युवा दंपतियों, सीमित आय वाले परिवारों और छोटे निवेशकों—सभी के लिए उपयोगी हो सकता है। इसलिए बाज़ार में इसकी खरीदार-आधार अपेक्षाकृत व्यापक रहती है। यही वजह है कि आर्थिक अनिश्चितता के दौर में लोग बड़े घर की तुलना में छोटे घर को अधिक सुरक्षित विकल्प मान सकते हैं।

हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि हर छोटा अपार्टमेंट समान रूप से मजबूत रहेगा। कोरिया में भी लोकेशन, मेट्रो या स्टेशन से दूरी, स्कूलों की गुणवत्ता, इमारत की उम्र, पड़ोस की सेवाएं और रोज़मर्रा की सुविधाएं कीमत को प्रभावित करती हैं। छोटा घर होने भर से वह सफल उत्पाद नहीं बन जाता। बल्कि सीमित बजट वाले खरीदार अधिक सूक्ष्म चयन करते हैं, इसलिए अच्छे इलाके का छोटा अपार्टमेंट अपेक्षाकृत टिकाऊ रह सकता है, जबकि कम सुविधाजनक जगह का वैसा ही फ्लैट पीछे छूट सकता है।

भारत में यह बात बहुत परिचित है। मुंबई में एक कॉम्पैक्ट फ्लैट का मूल्य केवल उसके कारपेट एरिया से तय नहीं होता; स्थानीय ट्रेन, मेट्रो, ऑफिस क्लस्टर, स्कूल और सामाजिक अवसंरचना उसे खास बनाते हैं। बेंगलुरु में आईटी कॉरिडोर के पास एक छोटा फ्लैट दूरस्थ क्षेत्र के बड़े फ्लैट पर भारी पड़ सकता है। कोरिया का संदेश यही है कि जब बाजार बजट-संचालित हो जाए, तब लोकेशन और कार्यक्षमता की कसौटी और कठोर हो जाती है।

किराये का दबाव और छोटी जगह का ‘अंतिम सहारा’ बनना

दक्षिण कोरिया में छोटे अपार्टमेंट की मांग सबसे तीखे रूप में किराये के बाजार में उभर रही है। जब किरायेदारों को या तो भारी सुरक्षा जमा का प्रबंध करना पड़े या फिर बढ़ते मासिक किराये को स्वीकार करना पड़े, तब घर का आकार घटाना मजबूरी में बदल जाता है। यहां छोटा घर कोई लाइफस्टाइल स्टेटमेंट नहीं, बल्कि वित्तीय जीवित रहने की रणनीति बन जाता है।

यह दबाव विशेष रूप से नई शादीशुदा जोड़ियों, पहली नौकरी कर रहे युवाओं और ऐसे परिवारों पर अधिक पड़ता है जिनकी बचत सीमित है लेकिन शहर में रहना अनिवार्य है। कोरिया में ऑफिसटेल जैसे आवासीय-कार्यालय मिश्रित छोटे यूनिट भी लोकप्रिय हैं, लेकिन पारंपरिक अपार्टमेंट अभी भी कई किरायेदारों को अधिक स्थिर, अधिक व्यवस्थित और दीर्घकालिक रूप से बेहतर विकल्प लगते हैं। छोटे अपार्टमेंट इसलिए किराये के बाजार में एक प्रकार के ‘सुरक्षित समझौते’ के रूप में उभरते हैं।

भारतीय संदर्भ में देखें तो यह प्रवृत्ति हमारे महानगरों में भी दिखती है। उदाहरण के लिए, दिल्ली-एनसीआर में कई युवा परिवार बड़े घर की बजाय मेट्रो से जुड़े छोटे फ्लैट को चुनते हैं ताकि रोज़मर्रा का जीवन संभल सके। मुंबई में लोग अक्सर लंबी दूरी की यात्रा, ऊंचे किराये और सीमित जगह के बीच ऐसा संतुलन ढूंढते हैं जिसमें जीवन की गुणवत्ता पूरी तरह न टूटे। कोरिया में भी अभी यही खोज जारी है—कम जगह सही, लेकिन शहर से कटकर नहीं; छोटा घर सही, लेकिन रहने लायक हो।

लेकिन इसके दीर्घकालिक दुष्परिणाम भी हो सकते हैं। यदि एक पूरा बाजार लगातार छोटे घरों में सिमटता जाए, तो परिवारों के जीवन-चक्र के साथ स्वाभाविक रूप से बड़े घरों की ओर बढ़ने वाली प्रक्रिया बाधित हो सकती है। शादी, बच्चों का जन्म, माता-पिता का साथ रहना, या घर से काम करने जैसी बदलती जरूरतें तब आवासीय संकट में बदल सकती हैं। यानी आज का छोटा घर कल की संरचनात्मक कमी बन सकता है।

निर्माण कंपनियां कैसे बदलेंगी अपनी रणनीति?

जब खरीदारों की प्राथमिकताएं बदलती हैं, तो बिल्डर और डेवलपर भी अपनी परियोजनाओं की संरचना बदलते हैं। कोरिया में छोटे अपार्टमेंट की बढ़ती मांग का सीधा असर इस बात पर पड़ सकता है कि नई परियोजनाओं में किस आकार की यूनिट अधिक बनाई जाएं, लेआउट कैसे डिज़ाइन हों, और कीमत को मनोवैज्ञानिक रूप से आकर्षक कैसे रखा जाए। संभव है कि भविष्य की परियोजनाओं में कॉम्पैक्ट लेकिन अधिक दक्ष डिजाइन, बेहतर स्टोरेज, बहुउपयोगी कमरे, और सामुदायिक सुविधाओं के स्मार्ट उपयोग पर जोर बढ़े।

यह वह स्थिति है जिसे भारत के पाठक भी समझते हैं। हमारे यहां भी डेवलपर ‘स्पेस ऑप्टिमाइजेशन’, ‘इंटेलिजेंट प्लानिंग’, ‘वर्क-फ्रॉम-होम कॉर्नर’ और ‘कम एरिया में ज्यादा उपयोग’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन असली चुनौती यह है कि छोटा घर केवल छोटा न लगे, बल्कि रहने योग्य लगे। कोरिया की मांग बिल्डरों को यही सिखा रही है कि कम आकार में भी उपयोगिता, रोशनी, स्टोरेज और निजीपन का संतुलन बनाना होगा।

फिर भी इसके साथ जोखिम जुड़ा है। यदि डेवलपर केवल उसी आकार पर ध्यान केंद्रित करने लगें जो सबसे तेजी से बिकता है, तो लंबे समय में मध्यम और बड़े परिवारों के लिए उपयुक्त घरों की कमी पैदा हो सकती है। इससे कुछ वर्षों बाद किसी दूसरे आकार वर्ग में आपूर्ति संकट उभर सकता है। आवासीय नीति और निजी निर्माण रणनीति के बीच यही संतुलन सबसे कठिन होता है—आज की मांग को पूरा करें, लेकिन कल की सामाजिक ज़रूरतों को भी नजरअंदाज न करें।

कोरिया में यह सवाल अब केवल डेवलपर की व्यावसायिक समझ का नहीं, बल्कि शहरी नियोजन का भी है। भारत में भी यही चुनौती मौजूद है। अगर हमारे शहर सिर्फ़ माइक्रो-यूनिट और कॉम्पैक्ट फ्लैट पर टिक गए, तो परिवारों की बदलती संरचना के लिए पर्याप्त विकल्प कैसे बनेंगे? इसलिए कोरिया का अनुभव सिर्फ़ बाजार संकेत नहीं, नीति के लिए भी चेतावनी है।

भारत के लिए संकेत: क्या हमारा भविष्य भी इसी राह पर है?

दक्षिण कोरिया की कहानी भारतीय आवासीय बाजार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि दोनों समाजों में शहरी मध्यवर्ग पर मकान की लागत का दबाव लगातार बढ़ा है। दोनों जगह युवा पेशेवर वर्ग बड़े शहरों में अवसर तलाशता है, दोनों जगह परिवार स्थायित्व चाहते हैं, और दोनों जगह आवास केवल आश्रय नहीं बल्कि सामाजिक स्थिति, सुरक्षा और भविष्य की वित्तीय योजना का माध्यम है। फर्क इतना है कि कोरिया का बाजार अधिक सघन और संस्थागत है, जबकि भारत में विविधता बहुत अधिक है। फिर भी मूल प्रश्न एक ही है—क्या शहरों में रहने वाला कामकाजी मध्यमवर्ग सम्मानजनक और टिकाऊ आवास वहन कर पा रहा है?

अगर जवाब लगातार ‘नहीं’ की ओर झुकेगा, तो भारत में भी छोटे घरों की ओर झुकाव केवल रुझान नहीं, मजबूरी बन जाएगा। हम पहले से इसके संकेत देख रहे हैं—कॉम्पैक्ट 2BHK की आक्रामक मार्केटिंग, स्टूडियो और 1BHK का उभार, परिधीय इलाकों में छोटे घरों की उच्च मांग, और किराये के बाजार में लोकेशन के बदले आकार पर समझौते। बड़े शहरों में अनेक युवा अब अपने माता-पिता की पीढ़ी जैसी जगह की उम्मीद नहीं रखते; वे केवल इतना चाहते हैं कि नौकरी, आवागमन और बुनियादी जीवन की जरूरतों के बीच आवास उनका दम न घोंटे।

कोरिया का उदाहरण हमें यह भी बताता है कि आवासीय संकट सिर्फ़ कीमतों से नहीं बनता, बल्कि भुगतान संरचना से बनता है। यदि ऋण महंगा है, जमा राशि भारी है, किराया ऊंचा है, और आय वृद्धि अनिश्चित है, तो घर छोटा होना लगभग तय है। भारत की नीति-व्यवस्था को इसलिए केवल निर्माण संख्या नहीं, बल्कि वहनीयता की वास्तविक परिभाषा पर ध्यान देना होगा—डाउन पेमेंट कितना, ईएमआई कितनी, किराये से आय का अनुपात क्या, और क्या परिवहन व्यवस्था छोटी यूनिटों को भी रहने लायक बनाती है।

अंततः दक्षिण कोरिया का यह रुझान हमें एक असुविधाजनक लेकिन ज़रूरी सच दिखाता है: जब अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ता है, तो समाज की आकांक्षाएं सिकुड़ती नहीं, बल्कि पुनर्गठित होती हैं। लोग बड़े सपने देखना बंद नहीं करते, लेकिन पहले छोटे, साध्य और टिकाऊ कदम चुनते हैं। छोटे अपार्टमेंटों की बढ़ती मांग उसी पुनर्गठन का संकेत है। भारत के शहरों के लिए भी यह सवाल अब दूर का नहीं रहा—क्या हम ऐसा आवासीय ढांचा बना रहे हैं जिसमें युवा पीढ़ी केवल किसी तरह रह न रही हो, बल्कि सम्मान और स्थिरता के साथ जीवन भी बना सके?

कोरिया की मौजूदा तस्वीर का सबसे बड़ा निष्कर्ष यही है कि बाजार में असली बदलाव अक्सर वहीं से शुरू होता है जहां आम नागरिक अपनी गणित बदलते हैं। जब परिवार यह कहने लगें कि “हमें वही घर चाहिए जिसे हम निभा सकें,” तब समझ लेना चाहिए कि आवासीय अर्थव्यवस्था की दिशा बदल चुकी है। दक्षिण कोरिया में यह बदलाव अब स्पष्ट है। भारत में यह प्रक्रिया कई शहरों में पहले से चल रही है। सवाल केवल इतना है कि क्या नीति, बाजार और शहरी नियोजन इस नई वास्तविकता को समय रहते समझ पाएंगे।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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