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दक्षिण कोरिया के 26.2 ट्रिलियन वॉन के पूरक बजट से क्या समझें: महंगाई, नौकरियां, खेती और तकनीकी बदलाव के बीच सरकार की प्र

दक्षिण कोरिया के 26.2 ट्रिलियन वॉन के पूरक बजट से क्या समझें: महंगाई, नौकरियां, खेती और तकनीकी बदलाव के बीच सरकार की प्र

कोरिया का नया पूरक बजट क्यों अहम है

दक्षिण कोरिया की संसद ने 10 अप्रैल 2026 को 26.2 ट्रिलियन वॉन के अतिरिक्त या पूरक बजट को मंजूरी दी। किसी भी देश में पूरक बजट महज हिसाब-किताब की तकनीकी कवायद नहीं होता; यह सरकार की असली प्राथमिकताओं की खिड़की खोल देता है। इस बार भी यही हुआ है। उपलब्ध आधिकारिक विवरणों और कोरियाई मीडिया रिपोर्टों से जो तस्वीर बनती है, वह यह बताती है कि सियोल की चिंता सिर्फ आर्थिक विकास दर को तेज दिखाना नहीं है, बल्कि बाहरी झटकों को सीमित करना, रोजमर्रा की लागत पर दबाव कम करना, रोजगार बाज़ार को संभालना, कृषि उत्पादन को सहारा देना और साथ ही तकनीकी परिवर्तन की दिशा में निवेश जारी रखना है।

भारतीय पाठकों के लिए इसे ऐसे समझा जा सकता है जैसे नई दिल्ली किसी कठिन वैश्विक परिस्थिति—मान लीजिए तेल कीमतों में उछाल, पश्चिम एशिया में तनाव, खाद-डीजल की लागत बढ़ने और रोजगार पर दबाव—के बीच एक ऐसा बजट लाए जिसमें कुल खर्च को बेकाबू तरीके से नहीं बढ़ाया जाए, लेकिन खेती, नौकरियों, तकनीक और बाजार व्यवस्था जैसे अहम मोर्चों पर चुनिंदा राहत दी जाए। दक्षिण कोरिया के इस कदम की खासियत यही है कि इसमें खर्च की दिशा ज्यादा महत्वपूर्ण दिखती है, खर्च की महज मात्रा नहीं।

यहां एक बात साफ कर देना जरूरी है। उपलब्ध सामग्री से जो तथ्य सामने आते हैं, वे सीमित लेकिन महत्वपूर्ण हैं। तथ्य यह हैं कि कुल पूरक बजट 26.2 ट्रिलियन वॉन पर कायम रखा गया; कुछ मदों में कटौती कर दूसरी जरूरी मदों में बढ़ोतरी की गई; और सरकार ने कहा कि प्रमुख राजकोषीय अनुशासन सूचकांक—जैसे प्रबंधित राजकोषीय संतुलन और सरकारी ऋण अनुपात—को मूल प्रस्ताव के स्तर पर बनाए रखा गया। विश्लेषण के स्तर पर इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि कोरियाई सरकार और संसद ने इस दौर में ‘ज्यादा खर्च’ से अधिक ‘बेहतर पुनर्वितरण’ को प्राथमिकता दी है।

यह दृष्टिकोण भारत के लिए भी दिलचस्प है, क्योंकि यहां भी अक्सर बहस यही रहती है कि आर्थिक संकट के समय सरकार को कितना खर्च बढ़ाना चाहिए और कितना वित्तीय अनुशासन बनाए रखना चाहिए। कोरिया का यह उदाहरण बताता है कि कभी-कभी राजनीतिक संदेश ‘हमने बहुत बड़ा पैकेज दिया’ से नहीं, बल्कि ‘हमने दबाव झेल रहे क्षेत्रों की पहचान कर लक्षित हस्तक्षेप किया’ से भी बनता है।

सिर्फ खर्च बढ़ाना नहीं, खर्च की दिशा बदलना

इस पूरक बजट का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसकी कार्यप्रणाली है। रिपोर्टों के अनुसार सरकार ने कुल आकार वही रखा जो पहले पेश किया गया था—26.2 ट्रिलियन वॉन। लेकिन उसके भीतर कुछ कार्यक्रमों का व्यय घटाकर दूसरी प्राथमिकताओं को अधिक संसाधन दिए गए। यह अंतर समझना बेहद जरूरी है। आम तौर पर अतिरिक्त बजट की खबर आते ही धारणा बनती है कि सरकार ने खजाना खोल दिया। लेकिन यहां मामला अलग है। यहां संदेश यह है कि संकट का जवाब देते हुए भी सरकार वित्तीय ढांचा ढीला छोड़ने के पक्ष में नहीं दिखना चाहती।

उपलब्ध विवरण के अनुसार 2026 का कुल सरकारी व्यय मूल बजट की तुलना में 11.8 प्रतिशत बढ़कर 753 ट्रिलियन वॉन तय हुआ, लेकिन साथ ही यह भी कहा गया कि प्रबंधित राजकोषीय घाटा और राष्ट्रीय ऋण अनुपात जैसे प्रमुख संकेतकों को सरकार के प्रस्तावित स्तर पर ही रखा गया। इसका सीधा अर्थ यही है कि सरकार अपने राजनीतिक और आर्थिक संदेश में दो बातें एक साथ रखना चाहती है—पहली, मौजूदा झटकों को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा; दूसरी, इसका मतलब यह नहीं कि वित्तीय अनुशासन को किनारे रख दिया गया है।

भारतीय आर्थिक विमर्श में भी ‘फिस्कल प्रूडेंस’ यानी राजकोषीय संयम और ‘काउंटर-साइक्लिकल सपोर्ट’ यानी संकट के समय राहत, दोनों को साथ लेकर चलने की कोशिश होती रही है। कोरिया का यह बजट उसी तरह की रस्साकशी का उदाहरण है। फर्क इतना है कि यहां उपलब्ध सूचनाओं से साफ झलकता है कि सरकार ने अतिरिक्त बांड जारी किए बिना, अपेक्षा से अधिक कर-संग्रह और कुल व्यय पर नियंत्रण के जरिए राहत पैकेज को गढ़ने की कोशिश की। इसका राजनीतिक अर्थ यह है कि सियोल संकट-प्रबंधन का दावा भी करना चाहता है और बाजारों को यह भरोसा भी दिलाना चाहता है कि खाता-पुस्तक नियंत्रण से बाहर नहीं जा रही।

इसका एक और पहलू है। जब किसी सरकार के सामने बाहरी झटका आता है—जैसे पश्चिम एशिया में तनाव, ऊर्जा कीमतों में तेजी, आयात लागत में दबाव—तो वह चाहें तो व्यापक मांग बढ़ाने वाला खर्च कर सकती है। लेकिन दक्षिण कोरिया ने इस बार जो संकेत दिया है, वह व्यापक प्रोत्साहन से ज्यादा लक्षित मरम्मत का है। यह उस डॉक्टर की तरह है जो पूरे शरीर को भारी दवा देने के बजाय वहीं इलाज करता है जहां चोट सबसे ज्यादा है।

यही वजह है कि अलग-अलग मंत्रालयों के लिए मंजूर रकम को साथ पढ़ने पर एक स्पष्ट पैटर्न उभरता है: विज्ञान एवं आईसीटी मंत्रालय के लिए 787 अरब वॉन, रोजगार एवं श्रम मंत्रालय के लिए 4,165 अरब वॉन, कृषि-खाद्य क्षेत्र के लिए 3,775 अरब वॉन, और आम जनजीवन तथा मूल्य-स्थिरता से जुड़े अपराधों की जांच के लिए न्याय मंत्रालय को करीब 700 मिलियन वॉन की आपात अतिरिक्त राशि। पहली नजर में ये अलग-अलग शीर्षक लग सकते हैं, पर असल में ये अर्थव्यवस्था के पांच धुरों को छूते हैं—कीमतें, रोजगार, खेती की लागत, तकनीकी बदलाव और बाजार व्यवस्था।

खेती पर फोकस: महंगाई से लड़ाई खेत से शुरू होती है

इस पूरे बजट का सबसे ठोस और जनता से सीधा जुड़ा पक्ष कृषि समर्थन है। दक्षिण कोरिया के कृषि, खाद्य और ग्रामीण मामलों के मंत्रालय के लिए इस पूरक बजट में 3,775 अरब वॉन तय किए गए। खास बात यह है कि संसदीय चर्चा के दौरान पश्चिम एशिया के युद्धजनित प्रभावों से बढ़ती ईंधन, उर्वरक और पशु-चारा लागत को देखते हुए कृषि-सामग्री सहायता मद में 1,118 अरब वॉन की अतिरिक्त बढ़ोतरी की गई। यह महज एक बजटीय पंक्ति नहीं है; यह बताती है कि सरकार ने महंगाई को सिर्फ खुदरा बाजार की समस्या नहीं, बल्कि उत्पादन-लागत की समस्या के रूप में भी देखा है।

रिपोर्ट के अनुसार कृषि उपयोग के टैक्स-फ्री ईंधन पर मूल्य-संलग्न सब्सिडी को बढ़ाने और कृषि मशीनों में इस्तेमाल होने वाले डीजल तक सहायता का दायरा बढ़ाने के लिए 529 अरब वॉन अतिरिक्त रखे गए। भारतीय संदर्भ में इसकी तुलना किसानों के लिए डीजल, खाद या सिंचाई लागत में राहत से की जा सकती है। हमारे यहां भी जब डीजल महंगा होता है तो उसका असर सिर्फ ट्रैक्टर या पंप पर नहीं, मंडी तक पहुंचने वाली पूरी आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ता है। यही तर्क कोरिया में भी लागू होता है।

यहां सबसे महत्वपूर्ण नीति संदेश यह है कि सरकार कीमतों को बाद में काबू करने के बजाय लागत को पहले ही संभालने की कोशिश कर रही है। अगर किसान के लिए डीजल, खाद और चारा महंगा होगा तो अंततः इसका असर भोजन और उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर पड़ेगा। इसलिए उत्पादन चरण पर राहत देना ज्यादा व्यावहारिक उपाय माना जा सकता है। उपलब्ध सामग्री के आधार पर हम यह नहीं कह सकते कि इससे महंगाई कितनी कम होगी या कितनी जल्दी असर दिखेगा, लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि कोरिया ने कृषि लागत को केंद्रीय नीति चिंता के रूप में स्वीकार किया है।

भारतीय पाठकों को यह बात खास तौर पर समझनी चाहिए कि कोरियाई समाज में भी खाद्य कीमतें सिर्फ आर्थिक नहीं, राजनीतिक मुद्दा होती हैं। वहां की सरकार जानती है कि रसोई की कीमतें, किसानों की लागत और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा झटके एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। भारत में प्याज, टमाटर या दाल की कीमतें जैसे बहस का विषय बनती हैं, वैसे ही कोरिया में भी खाद्य लागत व्यापक जनभावना को प्रभावित करती है। फर्क बस इतना है कि इस बार सियोल ने सीधे खुदरा दाम पर नियंत्रण की जगह उत्पादन-लागत पर चोट करने का रास्ता चुना है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि कृषि सहायता में बढ़ोतरी संसदीय चर्चा के दौरान हुई। इसका मतलब यह है कि राजनीतिक वर्ग के भीतर भी यह समझ बनी कि आर्थिक दबाव की सबसे तेज मार जमीन पर, खेत में और आपूर्ति प्रणाली में महसूस की जा रही है। किसी भी लोकतंत्र में यह एक अहम संकेत होता है: जब संसद संशोधन के जरिए खेती से जुड़ी लागत राहत को ऊपर उठाती है, तो वह दरअसल यह स्वीकार करती है कि आम जीवन की स्थिरता खेत और थाली से होकर गुजरती है।

रोजगार पर नजर: आर्थिक झटका सिर्फ बाजार में नहीं, नौकरी में भी दिखता है

इस पूरक बजट का दूसरा बड़ा स्तंभ रोजगार है। दक्षिण कोरिया के रोजगार और श्रम मंत्रालय के लिए पहला पूरक बजट 4,165 अरब वॉन पर तय हुआ। यह राशि सरकार के मूल प्रस्ताव 5,386 अरब वॉन से 1,221 अरब वॉन कम है। यह कमी अपने आप में एक महत्वपूर्ण तथ्य है, क्योंकि इससे साफ होता है कि संसद ने हर शीर्षक को वैसे का वैसा मंजूर नहीं किया, बल्कि प्राथमिकताएं बदलीं। रिपोर्टों में कहा गया है कि युवा प्रशिक्षण विस्तार तथा भर्ती और नौकरी में टिके रहने से संबंधित कुछ मदों में कटौती की गई।

लेकिन दूसरी ओर, इसी बजट में अमेरिका और ईरान के युद्ध से उत्पन्न घरेलू रोजगार झटके को कम करने के लिए 306 अरब वॉन शामिल किए गए। उपलब्ध जानकारी का यही तथ्य सबसे ज्यादा अर्थपूर्ण है। इससे संकेत मिलता है कि सरकार बाहरी भू-राजनीतिक तनाव को सीधे रोजगार बाजार से जोड़कर देख रही है। यह सिर्फ ऊर्जा कीमतों या आयात लागत का मामला नहीं माना जा रहा, बल्कि कंपनियों की गतिविधि, भर्ती की गति, प्रशिक्षण की मांग और नौकरी की स्थिरता पर उसके असर को भी ध्यान में रखा जा रहा है।

भारतीय पाठकों के लिए इसे समझना कठिन नहीं होना चाहिए। जब वैश्विक अनिश्चितता बढ़ती है, तो उसका असर अक्सर पहले शेयर बाजार में दिखता है, लेकिन असली चोट कुछ देर बाद नौकरी, निवेश और औद्योगिक गतिविधि में आती है। दक्षिण कोरिया की अर्थव्यवस्था निर्यात-उन्मुख है; इसलिए बाहरी संकट वहां के रोजगार बाजार तक तेजी से पहुंच सकता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो 306 अरब वॉन का प्रावधान संकट के बाद की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि संभावित प्रभाव को पहले से सीमित करने की कोशिश है।

हालांकि यहां तथ्य और राय में फर्क बनाए रखना जरूरी है। तथ्य यह है कि कुल श्रम मंत्रालय पूरक बजट घटकर 4,165 अरब वॉन हुआ और 306 अरब वॉन घरेलू रोजगार झटके को कम करने के लिए निर्धारित किए गए। राय या विश्लेषण के स्तर पर इतना कहा जा सकता है कि कोरियाई नीति-निर्माता महंगाई और उत्पादन लागत के साथ-साथ रोजगार सुरक्षा को भी संकट प्रबंधन के केंद्र में रख रहे हैं। यह भी स्पष्ट है कि संसद ने यह तय करने में भूमिका निभाई कि रोजगार समर्थन किस रूप में और कितनी मात्रा में दिया जाए।

भारतीय संदर्भ में इसकी तुलना उन बहसों से की जा सकती है जिनमें पूछा जाता है कि संकट के समय सरकार को सीधी वेतन-सहायता देनी चाहिए, कौशल प्रशिक्षण बढ़ाना चाहिए, उद्योगों को भर्ती प्रोत्साहन देना चाहिए या श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा के जरिए सहारा देना चाहिए। दक्षिण कोरिया का मौजूदा मामला दिखाता है कि वहां यह बहस जारी है और संसद ने कुछ मदों को कम कर कुछ को बचाए रखा। यानी रोजगार नीति वहां भी एक राजनीतिक चयन का विषय है, कोई स्वत:स्फूर्त प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं।

तकनीक, स्टार्टअप और एआई: संकट के बीच भी भविष्य की तैयारी

यदि इस पूरक बजट को सिर्फ महंगाई और राहत की कहानी समझा जाए, तो तस्वीर अधूरी रह जाएगी। विज्ञान एवं आईसीटी मंत्रालय के तहत 787 अरब वॉन के अतिरिक्त बजट को मंजूरी दी गई है। रिपोर्टों के अनुसार इसमें युवा उद्यमियों की नवाचार क्षमता बढ़ाने, पारंपरिक कंपनियों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई की ओर रूपांतरित करने, और कार्बन डाइऑक्साइड कैप्चर एवं उपयोग के शुरुआती व्यावसायीकरण जैसी मदें शामिल हैं।

इन शीर्षकों का साथ-साथ आना महत्वपूर्ण है। इसका मतलब है कि कोरियाई सरकार मौजूदा झटकों को सिर्फ आग बुझाने वाली समस्या की तरह नहीं देख रही। वह यह भी समझ रही है कि आज की अस्थिरता के बीच कल की प्रतिस्पर्धा क्षमता कमजोर नहीं पड़नी चाहिए। विशेष रूप से एआई रूपांतरण का उल्लेख बताता है कि पारंपरिक उद्योगों को तकनीकी बदलाव से जोड़ना वहां अब वैकल्पिक एजेंडा नहीं, मुख्यधारा का आर्थिक एजेंडा बन चुका है।

रिपोर्ट के अनुसार कोरिया एडवांस्ड इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी सहित चार प्रमुख विज्ञान-तकनीक संस्थानों के एकीकृत स्टार्टअप लीग और संस्थान-विशिष्ट उद्यमिता कार्यक्रमों से जुड़ी सहायता के लिए 398 अरब वॉन आवंटित किए गए। भारतीय पाठकों के लिए इसकी तुलना आईआईटी, आईआईएससी, स्टार्टअप इंडिया, डीप-टेक इनक्यूबेशन या एआई नवाचार मिशनों के मिश्रित मॉडल से की जा सकती है। दक्षिण कोरिया इस बात पर दांव लगाता दिख रहा है कि संकट के समय भी नवाचार पारिस्थितिकी को पीछे नहीं छोड़ा जाना चाहिए।

यहां कोरियाई आर्थिक संस्कृति का एक पहलू समझना उपयोगी है। कोरिया में तकनीकी आधुनिकीकरण को राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा, औद्योगिक प्रतिष्ठा और युवा अवसर से जोड़ा जाता है। इसलिए जब पूरक बजट जैसे आम तौर पर ‘राहत’ माने जाने वाले दस्तावेज़ में भी स्टार्टअप, एआई रूपांतरण और उन्नत औद्योगिक तकनीक की जगह बनती है, तो यह संकेत होता है कि सरकार के लिए संकट-प्रबंधन और संरचनात्मक बदलाव दो अलग-अलग फाइलें नहीं हैं। वे एक ही आर्थिक नीति ढांचे का हिस्सा हैं।

भारत में भी यह बहस तेजी से उभरी है कि क्या सरकारों को केवल तत्काल राहत देनी चाहिए या साथ-साथ भविष्य के उद्योगों में निवेश भी करना चाहिए। दक्षिण कोरिया का यह उदाहरण बताता है कि वहां इन दोनों को परस्पर विरोधी नहीं माना जा रहा। यह सही है कि उपलब्ध पाठ का अंतिम हिस्सा अधूरा है, इसलिए तकनीक और स्टार्टअप मदों के सभी विवरण हमारे सामने नहीं हैं। लेकिन जितनी जानकारी उपलब्ध है, उससे इतना स्पष्ट है कि सरकार ने अल्पकालिक राहत और दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है।

बाजार व्यवस्था, जांच और ‘मिनसैंग’ की कोरियाई राजनीति

इस पूरक बजट के एक छोटे लेकिन प्रतीकात्मक हिस्से पर भी ध्यान देना चाहिए। न्याय मंत्रालय ने कहा कि आम जनजीवन और मूल्य-स्थिरता से जुड़े मामलों की विशेष जांच के लिए लगभग 700 मिलियन वॉन की आपात अतिरिक्त राशि जोड़ी गई। रकम के लिहाज से यह कृषि या रोजगार बजट के मुकाबले बहुत छोटी है, लेकिन राजनीति और प्रशासन की भाषा में इसका अर्थ बड़ा हो सकता है। दक्षिण कोरियाई सार्वजनिक विमर्श में ‘मिनसैंग’ शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। इसका व्यापक अर्थ है आम लोगों का जीवन, रोजमर्रा की तकलीफें और वह सामाजिक-आर्थिक स्थिरता जो सीधे नागरिक के घर-परिवार से जुड़ी हो।

भारतीय राजनीति में इसकी तुलना ‘जनजीवन’, ‘रोजमर्रा की राहत’ या ‘आम आदमी के मुद्दे’ से की जा सकती है। जब कोरियाई सरकार मूल्य-स्थिरता और मिनसैंग से जुड़ी जांच पर जोर देती है, तो वह केवल अर्थशास्त्र नहीं, प्रशासनिक नियंत्रण और बाजार अनुशासन का संदेश भी देती है। दूसरे शब्दों में, यह मान लिया गया है कि महंगाई या आपूर्ति संकट से जुड़े दौर में सिर्फ सब्सिडी पर्याप्त नहीं होती; बाजार में गड़बड़ी, सट्टा, जमाखोरी या अवैध गतिविधियों पर नजर रखना भी जरूरी है।

यहां उपलब्ध तथ्य सीमित हैं—हमारे पास बस इतना है कि इस विशेष जांच कार्य के लिए आपात अतिरिक्त राशि स्वीकृत हुई। लेकिन विश्लेषण के स्तर पर यह कहा जा सकता है कि कोरिया की आर्थिक नीति इस समय केवल राजकोषीय हस्तक्षेप पर आधारित नहीं है। वह बाजार व्यवस्था को भी संकट-प्रबंधन के हिस्से के रूप में देख रही है। भारत में भी जब खाद्य कीमतें बढ़ती हैं, तो अक्सर सरकारें निर्यात-आयात नीति, स्टॉक सीमा, प्रवर्तन कार्रवाई और प्रशासनिक निगरानी का सहारा लेती हैं। कोरिया के इस कदम में भी ऐसी ही बहुस्तरीय सोच की झलक दिखती है।

यह भी महत्वपूर्ण है कि बजट में तकनीक, कृषि, रोजगार और बाजार जांच जैसी अलग-अलग धाराएं एक साथ दिखाई देती हैं। इससे यह समझ आता है कि सियोल संकट को किसी एक लेंस से नहीं देख रहा। वह इसे सिर्फ अंतरराष्ट्रीय युद्ध का असर, सिर्फ तेल-आधारित महंगाई, सिर्फ खेती की लागत, या सिर्फ औद्योगिक संक्रमण नहीं मान रहा; बल्कि इन सबके सम्मिलित दबाव के रूप में देख रहा है। यही कारण है कि पूरक बजट का ढांचा बहु-क्षेत्रीय है।

भारत के लिए सबक और कोरिया की नीति का बड़ा संकेत

दक्षिण कोरिया के इस पूरक बजट से सबसे बड़ा संकेत यह मिलता है कि आर्थिक नीति की प्राथमिकता अब ‘एक बड़े नारे’ की नहीं, बल्कि ‘कई लक्षित उपायों’ की राजनीति बनती जा रही है। उपलब्ध तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि सरकार और संसद ने कुल आकार को स्थिर रखते हुए संसाधनों का पुनर्वितरण किया; कृषि लागत राहत को ऊंचा स्थान दिया; रोजगार झटके के लिए विशेष प्रावधान रखा; तकनीक और स्टार्टअप को राहत बजट का भी हिस्सा बनाए रखा; और बाजार व्यवस्था व मूल्य-स्थिरता से जुड़ी जांच को भी शामिल किया।

भारतीय पाठकों के लिए यह कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। पहला, यह दिखाता है कि महंगाई से लड़ाई सिर्फ खुदरा उपभोक्ता को राहत देकर नहीं जीती जाती; उत्पादन लागत और आपूर्ति श्रृंखला पर काम करना भी उतना ही जरूरी है। दूसरा, वैश्विक संकट के समय नौकरी बाजार पर पड़ने वाले असर को जल्दी पहचानना आवश्यक है। तीसरा, तकनीकी संक्रमण को टाला नहीं जा सकता, चाहे तत्काल संकट कितना भी बड़ा क्यों न हो। और चौथा, वित्तीय अनुशासन बनाम राहत की बहस में हमेशा ‘या तो-या’ का विकल्प ही नहीं होता; कभी-कभी सीमित संसाधनों के भीतर लक्षित पुनर्व्यवस्था भी प्रभावशाली राजनीतिक और आर्थिक संदेश दे सकती है।

एक दिलचस्प बात यह भी है कि दक्षिण कोरिया की नीति-शैली में संसद की भूमिका साफ दिखाई देती है। कुछ मदों में कटौती हुई, कुछ में बढ़ोतरी हुई, और अंतिम स्वरूप मूल प्रस्ताव से भिन्न बनकर सामने आया। यह बताता है कि लोकतांत्रिक बजट-निर्माण केवल सरकारी मंशा का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि राजनीतिक मोलभाव, प्राथमिकता निर्धारण और सार्वजनिक दबाव का नतीजा भी होता है। भारत जैसे बड़े लोकतंत्र के लिए यह कोई अनजानी बात नहीं, लेकिन कोरिया का ताजा उदाहरण इसे एक बार फिर रेखांकित करता है।

अंततः, इस पूरे प्रकरण को एक वाक्य में समझना हो तो कहा जा सकता है कि दक्षिण कोरिया ने इस पूरक बजट के जरिए यह संकेत दिया है कि आर्थिक संकट के समय सरकार की भूमिका सिर्फ पैसे की थैली खोलने की नहीं, बल्कि चोट के सही बिंदुओं की पहचान करने की है। अभी उपलब्ध तथ्यों से यह तय नहीं किया जा सकता कि इन कदमों का अंतिम प्रभाव कितना व्यापक होगा, कितनी जल्दी दिखाई देगा या किन क्षेत्रों में अपेक्षा से कम रहेगा। लेकिन इतना अवश्य स्पष्ट है कि 26.2 ट्रिलियन वॉन का यह बजट कोरिया की आर्थिक नीति का गुरुत्वाकर्षण केंद्र उजागर करता है—महंगाई के दबाव को कम करना, रोजगार को संभालना, किसान लागत पर राहत देना, तकनीकी बदलाव को आगे बढ़ाना और यह सब करते हुए राजकोषीय विश्वसनीयता की रेखा पार न करना।

यही वह संयोजन है जो इस बजट को सामान्य बजटीय समाचार से अधिक महत्वपूर्ण बनाता है। और यही वजह है कि भारत में बैठा पाठक भी इससे जुड़ाव महसूस कर सकता है। क्योंकि चाहे सियोल हो या नई दिल्ली, अंत में आर्थिक नीति का असली इम्तिहान उसी पुराने सवाल पर आकर टिकता है—क्या सरकार आम नागरिक के जीवन में बढ़ते दबाव को समझ पा रही है, और क्या वह सीमित संसाधनों के भीतर भी सही प्राथमिकताएं तय कर पा रही है। दक्षिण कोरिया ने अपने ताजा कदम से कम से कम इतना तो स्पष्ट कर दिया है कि उसके लिए फिलहाल जवाब ‘हां’ साबित करने की कोशिश ही सबसे बड़ी राजनीतिक परियोजना है।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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