
एक मामूली धोखाधड़ी नहीं, स्वास्थ्य सुरक्षा पर सीधा प्रहार
दक्षिण कोरिया में सामने आया एक ताजा मामला यह बताता है कि महामारी की तीखी स्मृतियां भले धुंधली पड़ गई हों, लेकिन स्वास्थ्य सुरक्षा से जुड़ी ढिलाई अब भी समाज के लिए बड़ा खतरा बन सकती है। कोरिया के खाद्य एवं औषधि सुरक्षा मंत्रालय ने 16 अप्रैल 2026 को खुलासा किया कि लगभग 82 हजार स्वास्थ्य-उपयोगी मास्क, जिनकी उपयोग-अवधि समाप्त हो चुकी थी और जिन्हें नष्ट किया जाना था, उन्हें कथित तौर पर निर्माता को गुमराह करके बाहर निकाला गया, फिर उनकी पैकेजिंग पर दर्ज उपयोग-समाप्ति तिथि को लगभग तीन वर्ष आगे बढ़ाकर बाजार में बेच दिया गया। इस मामले में वितरण से जुड़े कारोबारी और उपकरण-सुविधा संचालक को पकड़ा गया और अभियोजन के लिए भेजा गया।
पहली नजर में यह मामला केवल पुराने माल को नए जैसा दिखाकर बेचने की ठगी लग सकता है। लेकिन असल चिंता कहीं अधिक गहरी है। स्वास्थ्य-सुरक्षा उत्पाद, खासकर वे जो सीधे सांस, संक्रमण-नियंत्रण और कमजोर प्रतिरक्षा वाले लोगों की सुरक्षा से जुड़े हों, उनमें पैकेजिंग पर लिखा हर शब्द उपभोक्ता के निर्णय का आधार होता है। अगर उपयोग की अंतिम तारीख यानी एक्सपायरी ही बदल दी जाए, तो उपभोक्ता के हाथ से सत्यापन का सबसे बुनियादी साधन छिन जाता है।
भारतीय पाठकों के लिए इसे समझना कठिन नहीं है। हमने कोविड-19 के वर्षों में देखा कि मास्क, सैनिटाइजर, ऑक्सीमीटर और दवाओं जैसे उत्पाद केवल बाजार की चीजें नहीं रह जाते, बल्कि सामाजिक भरोसे का हिस्सा बन जाते हैं। जैसे कोई मरीज दवा की शीशी पर लिखी एक्सपायरी देखकर उसे भरोसे से इस्तेमाल करता है, वैसे ही एक स्वास्थ्य-मानक वाले मास्क पर मुद्रित जानकारी उपभोक्ता के लिए आश्वासन बनती है। इसलिए कोरिया का यह प्रकरण केवल एक देश की नियामक विफलता नहीं, बल्कि आधुनिक उपभोक्ता समाज की एक साझा कमजोरी को सामने लाता है।
कोरिया में स्वास्थ्य-उपयोगी मास्क पर अक्सर ‘KF’ मानक अंकित होता है। इसे भारतीय संदर्भ में समझें तो यह कुछ वैसा है जैसा भारत में लोग N95, सर्जिकल मास्क या BIS/मानक-अनुरूप उत्पादों के आधार पर गुणवत्ता का अनुमान लगाते हैं। जब कोई उपभोक्ता ‘KF94’ जैसे अंकन को देखकर मान लेता है कि यह मास्क धूल, कण और श्वसन संबंधी जोखिमों से सुरक्षा देगा, तब वह न केवल ब्रांड बल्कि नियामक व्यवस्था पर भी भरोसा कर रहा होता है। यही भरोसा इस मामले में सबसे अधिक घायल हुआ है।
कोरिया का ‘KF94’ क्या है, और भारतीय पाठकों को यह क्यों समझना चाहिए
दक्षिण कोरिया में ‘KF’ का अर्थ ‘Korea Filter’ है। ‘KF94’ ऐसे मास्क को दर्शाता है जो सूक्ष्म कणों के एक बड़े हिस्से को रोकने की क्षमता का दावा करता है। महामारी के दौरान दुनिया भर में कोरियाई KF94 मास्क चर्चा में आए थे, क्योंकि वे चेहरे पर अपेक्षाकृत आरामदायक फिट और उच्च स्तर की फिल्ट्रेशन क्षमता के बीच संतुलन के लिए जाने जाते थे। भारत में जिस तरह N95 शब्द आम लोगों की भाषा का हिस्सा बन गया, उसी तरह कोरिया में KF94 एक भरोसेमंद श्रेणी के रूप में स्थापित हुआ।
लेकिन यह समझना जरूरी है कि ऐसे मास्क केवल कपड़े का टुकड़ा नहीं होते। इन्हें सामान्य फैशन एक्सेसरी की तरह नहीं, बल्कि स्वास्थ्य-संरक्षण उत्पाद की तरह देखा जाता है। कोरिया में इन्हें औषधि-सदृश विनियमित श्रेणी, यानी ऐसी वस्तुओं के रूप में माना जाता है जिनका संबंध सीधे मानव स्वास्थ्य से है। भारत में भी कई उत्पादों के लिए पैकेजिंग, लाइसेंसिंग, निर्माण-तिथि, बैच नंबर और एक्सपायरी जैसी सूचनाएं अनिवार्य हैं, क्योंकि उपभोक्ता स्वयं प्रयोगशाला में जाकर गुणवत्ता नहीं परख सकता।
यही कारण है कि उपयोग-अवधि का प्रश्न बेहद गंभीर हो जाता है। एक्सपायरी का मतलब केवल यह नहीं कि उसके बाद उत्पाद अचानक बेकार हो जाएगा। इसका अर्थ यह है कि उस तारीख तक निर्माता और नियामक प्रणाली उत्पाद की घोषित गुणवत्ता, संरचना और उपयोगिता के लिए जिम्मेदारी लेते हैं। इसके बाद वह आश्वासन समाप्त हो जाता है। मास्क में प्रयुक्त फिल्टर सामग्री, इलास्टिक बैंड, सीलिंग, पैकेजिंग की स्थिति और भंडारण की परिस्थितियां समय के साथ बदल सकती हैं। बाहर से ठीक दिखने वाला उत्पाद भी भीतर से गुणवत्ता खो चुका हो सकता है।
भारतीय बाजार में भी उपभोक्ता प्रायः पैकेट पर छपी जानकारी पर निर्भर रहता है। चाहे वह पल्स ऑक्सीमीटर हो, सैनिटाइजर की बोतल, बेबी फूड, दवा, या प्रदूषण के मौसम में खरीदा गया मास्क—लोग मुख्य रूप से लेबल देखकर ही निर्णय लेते हैं। यही वजह है कि लेबल से छेड़छाड़ को केवल ‘गलत मार्केटिंग’ कहना कम होगा। यह सूचना-आधारित उपभोक्ता अधिकार पर हमला है।
मामले की जड़ सप्लाई चेन में है: जो नष्ट होना था, वह दुकान तक कैसे पहुंचा?
कोरियाई अधिकारियों के अनुसार ये मास्क मूल रूप से ऐसे स्टॉक का हिस्सा थे जिनकी उपयोग अवधि समाप्त हो चुकी थी और जिन्हें नष्ट किया जाना था। लेकिन कथित तौर पर उन्हें निर्माता से यह कहकर बाहर निकाला गया कि वे नष्ट किए जाएंगे, जबकि बाद में उनकी मुद्रित तिथि बदलकर उन्हें दोबारा बाजार में उतार दिया गया। इसका मतलब यह है कि यह एक अकेली गलती नहीं थी, बल्कि कई चरणों वाली संगठित विफलता थी—पहला, निष्पादन या नष्ट करने की प्रक्रिया से माल का बाहर जाना; दूसरा, लेबल या पैकेजिंग में छेड़छाड़; और तीसरा, पुनर्वितरण के जरिए उसे सामान्य बिक्री श्रृंखला में शामिल कर देना।
यहीं इस कहानी का सबसे चिंताजनक पक्ष सामने आता है। सामान्य तौर पर हम मान लेते हैं कि समस्या उत्पादन स्तर पर पकड़ी जाएगी। लेकिन इस मामले से यह संकेत मिलता है कि उत्पादन से बाहर निकलने के बाद, रिकॉल, डिस्पोजल, लॉजिस्टिक्स और थोक वितरण के बीच कई ऐसे बिंदु हो सकते हैं जहां निगरानी कमजोर पड़ जाती है। भारत में भी हम यह सवाल पूछ सकते हैं: किसी स्वास्थ्य-सुरक्षा उत्पाद का निपटान कैसे होता है? क्या नष्ट किए जाने वाले स्टॉक का डिजिटल रिकॉर्ड, भौतिक निगरानी और स्वतंत्र सत्यापन होता है? क्या ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म या थोक बाजार असामान्य रूप से सस्ते स्टॉक की पहचान कर पाते हैं?
भारतीय संदर्भ में यह चिंता और प्रासंगिक हो जाती है, क्योंकि हमारे यहां स्वास्थ्य-संबंधी वस्तुएं दवा-दुकानों से लेकर स्थानीय थोक बाजारों, मोबाइल ऐप, ई-कॉमर्स साइटों और यहां तक कि छूट वाले ऑफलाइन स्टोरों तक हर जगह उपलब्ध हैं। कोविड के दौर में हमने यह भी देखा कि जरूरत और घबराहट जब साथ आती है, तब असंगठित या अर्ध-संगठित बिक्री चैनल तेजी से सक्रिय हो जाते हैं। महामारी के बाद भले मांग कम हुई हो, लेकिन वितरण नेटवर्क की जटिलता बनी हुई है।
कोरिया का यह मामला बताता है कि ‘किसने बेचा’ से अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न ‘कहां-कहां रोक लगनी चाहिए थी’ है। अगर कोई उत्पाद नष्ट होने की कतार से निकलकर बिक्री की शेल्फ तक पहुंच गया, तो सिर्फ अंतिम विक्रेता को दोष देकर समस्या का समाधान नहीं होगा। यह पूरी सप्लाई चेन की विश्वसनीयता का प्रश्न है।
महामारी के बाद आई ढील ने ऐसे जोखिमों को आसान बनाया
सामाजिक स्मृति का एक अपना स्वभाव होता है। जब संकट सामने होता है, तो सतर्कता चरम पर रहती है; जैसे ही संकट की तीव्रता घटती है, लोग और संस्थाएं दोनों धीरे-धीरे सहज हो जाते हैं। कोविड-19 के दौरान मास्क की कमी, नकली उत्पाद, ऊंची कीमतें और घटिया गुणवत्ता जैसी समस्याएं भारत से लेकर कोरिया तक सार्वजनिक बहस का हिस्सा थीं। लेकिन जैसे-जैसे रोजमर्रा का जीवन पटरी पर लौटा, मास्क भी ‘आपातकालीन वस्तु’ से ‘सामान्य उपभोक्ता वस्तु’ की तरह दिखाई देने लगा। यही वह मनोवैज्ञानिक और प्रशासनिक खाली जगह है, जहां इस तरह के फर्जीवाड़े पनपते हैं।
कोरिया में अधिकारियों ने संदेहास्पद लेबल-परिवर्तन की सूचना मिलने पर जांच शुरू की और कथित गैरकानूनी नेटवर्क का पता लगाया। यह सकारात्मक है कि मामला पकड़ा गया और संबंधित स्टॉक को नष्ट करने की कार्रवाई की गई। लेकिन यही तथ्य एक असुविधाजनक सवाल भी उठाता है—अगर सूचना न मिलती, तो क्या यह स्टॉक चुपचाप उपभोक्ताओं तक पहुंचता रहता? भारत में भी यह सवाल अनावश्यक नहीं है। हमारे यहां त्योहारों, प्रदूषण-भरे मौसम, वायरल संक्रमण के फैलाव, और अस्पतालों के आसपास स्वास्थ्य-उत्पादों की मांग अचानक बढ़ती-घटती रहती है। ऐसे में कमजोर निगरानी वाले चरणों पर जोखिम बढ़ जाता है।
दिल्ली-एनसीआर की सर्दियों को याद कीजिए, जब प्रदूषण का स्तर खतरनाक हो जाता है और लोग दोबारा उच्च-फिल्ट्रेशन मास्क की ओर लौटते हैं। कई परिवार अपने घर में पुराने पैकेट निकालते हैं, कुछ लोग ऑनलाइन छूट देखकर bulk खरीदते हैं, और कुछ थोक बाजारों से सस्ता माल उठाते हैं। अब सोचिए, अगर पैकेज पर छपी तारीख, बैच नंबर या उपयोग-अवधि से छेड़छाड़ की गई हो, तो एक आम उपभोक्ता के पास उसे पहचानने का कितना साधन है? उत्तर बहुत सीमित है।
यही वजह है कि महामारी के बाद सतर्कता कम होना अपने-आप में एक जोखिम है। स्वास्थ्य-सुरक्षा उत्पादों का महत्व केवल महामारी में नहीं होता। बुजुर्गों, अस्थमा या COPD जैसे रोगियों, कैंसर उपचार ले रहे मरीजों, नवजात शिशु वाले परिवारों, और संक्रमण-ग्रस्त परिजनों की देखभाल करने वालों के लिए मास्क आज भी महज आदत नहीं, व्यावहारिक सुरक्षा है। इसलिए इस घटना को ‘पुराने जमाने का कोविड किस्सा’ समझकर खारिज करना भूल होगी।
उपभोक्ता भरोसे की दरार: जब लेबल पर लिखा सच न रहे
बाजार की सबसे बड़ी मुद्रा केवल पैसा नहीं, भरोसा भी है। खासकर स्वास्थ्य से जुड़े उत्पादों में भरोसा कीमत से अधिक निर्णायक होता है। एक मास्क खरीदने वाला व्यक्ति आम तौर पर प्रयोगशाला रिपोर्ट नहीं मांगता, न ही वह फिल्टर की परतें खोलकर जांच करता है। वह पैकेज पर लिखे शब्दों—निर्माण तिथि, उपयोग-अवधि, बैच नंबर, मानक प्रमाणन—पर भरोसा करता है। यही भरोसा नियामक व्यवस्था, निर्माता और विक्रेता के बीच एक अनकहा अनुबंध बनाता है। कोरिया की यह घटना इसी अनुबंध के टूटने की मिसाल है।
भारतीय संदर्भ में इसे समझने के लिए दवाओं की एक्सपायरी से तुलना की जा सकती है। अगर कोई व्यक्ति बुखार की दवा खरीदता है और बाद में पता चले कि उसकी तारीख बदल दी गई थी, तो इसे कोई छोटा व्यापारिक अपराध नहीं मानेगा। कारण साफ है—यह केवल कीमत या मुनाफे का मामला नहीं, बल्कि स्वास्थ्य जोखिम और धोखे का संगम है। मास्क के मामले में खतरा थोड़ा अलग है, पर कम गंभीर नहीं। खराब हो चुकी फिल्ट्रेशन क्षमता, संग्रहण की खराब स्थिति, या समय के कारण सामग्री की गुणवत्ता में गिरावट उपभोक्ता को गलत सुरक्षा-बोध दे सकती है। वह यह मानकर जोखिम ले सकता है कि वह सुरक्षित है, जबकि उत्पाद अपनी मूल कार्यक्षमता खो चुका हो।
इसीलिए विशेषज्ञ लंबे समय से कहते रहे हैं कि स्वास्थ्य-उत्पादों में सूचना की पारदर्शिता स्वयं एक सुरक्षा तंत्र है। कोरिया का मामला बताता है कि जब यही सूचना संदिग्ध हो जाए, तो उपभोक्ता के पास बचता क्या है? भारत में ई-कॉमर्स की तेजी से बढ़ती दुनिया में यह और महत्वपूर्ण हो जाता है। चमकदार तस्वीरें, भारी छूट, ‘मेडिकल ग्रेड’ जैसे दावे और सीमित समय के ऑफर के बीच उपभोक्ता अक्सर भरोसे का निर्णय बहुत तेजी से लेता है। ऐसे में प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है।
यहां एक सामाजिक आयाम भी है। एक मध्यमवर्गीय भारतीय परिवार में स्वास्थ्य-संबंधी वस्तुओं का चयन अक्सर ‘सुरक्षित और सही’ की भावना से जुड़ा होता है। घर की बुजुर्ग मां, स्कूल जाता बच्चा, प्रदूषण से परेशान पिता, या अस्पताल आने-जाने वाला कोई सदस्य—इनमें से किसी के लिए खरीदा गया मास्क परिवार की देखभाल का हिस्सा होता है। इसलिए जब ऐसे उत्पाद की प्रामाणिकता पर सवाल उठे, तो नुकसान केवल आर्थिक नहीं रहता; यह घरेलू सुरक्षा की भावना पर चोट करता है।
कानून, नियमन और प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी: सिर्फ गिरफ्तारी काफी नहीं
कोरिया में इस मामले को औषधि-संबंधी कानून के उल्लंघन के रूप में लिया गया और आरोपियों को अभियोजन के लिए भेजा गया। इससे यह संकेत जाता है कि मामला साधारण उपभोक्ता विवाद नहीं, गंभीर विधिक अपराध की श्रेणी में देखा जा रहा है। लेकिन केवल दंडात्मक कार्रवाई से समस्या का पूर्ण समाधान नहीं होगा। यदि नष्ट किए जाने वाले स्टॉक की आवाजाही, पैकेजिंग परिवर्तन और पुनर्विक्रय एक श्रृंखला में संभव हुआ, तो इसका अर्थ है कि रोकथाम के कई स्तर कमजोर थे।
भारत के लिए यहां कई सबक हैं। पहला, डिस्पोजल या राइट-ऑफ स्टॉक की निगरानी को कागजी प्रक्रिया तक सीमित नहीं रखा जा सकता। दूसरा, बैच-आधारित डिजिटल ट्रैकिंग को अधिक प्रभावी बनाना होगा, खासकर स्वास्थ्य-सुरक्षा वस्तुओं में। तीसरा, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और बड़े वितरकों को असामान्य पैटर्न पहचानने के लिए एल्गोरिद्मिक और मानव दोनों स्तरों पर निगरानी बढ़ानी चाहिए—जैसे बहुत पुराने बैच का अचानक भारी स्टॉक, अस्वाभाविक रूप से कम कीमत, या बार-बार बदली गई पैकेजिंग वाली आपूर्ति।
चौथा, निर्माता की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। नष्ट किए जाने वाले माल का नियंत्रण केवल गोदाम-प्रबंधन का प्रश्न नहीं, ब्रांड की विश्वसनीयता और सार्वजनिक सुरक्षा का प्रश्न है। यदि किसी कंपनी के नाम से जुड़ा स्टॉक बाहर जाकर फर्जी तारीख के साथ बिकता है, तो उपभोक्ता के मन में पहला अविश्वास अक्सर उसी ब्रांड के प्रति पैदा होता है, चाहे प्राथमिक अपराध किसी वितरक ने किया हो। इसलिए निर्माण कंपनियों को अपने निष्पादन-तंत्र, ठेका एजेंसियों और लॉजिस्टिक्स भागीदारों की नियमित ऑडिट करनी चाहिए।
पांचवां, नियामक संस्थाओं के लिए यह समय है कि वे स्वास्थ्य-सुरक्षा उत्पादों को केवल महामारी-कालीन श्रेणी में न देखें। भारत में प्रदूषण, मौसमी फ्लू, शहरी भीड़भाड़, अस्पताल संक्रमण और कमजोर प्रतिरक्षा वाले रोगियों की जरूरतों को देखते हुए ऐसे उत्पादों की स्थायी महत्ता है। इसलिए उनकी निगरानी भी स्थायी, तकनीकी और सक्रिय होनी चाहिए।
भारतीय उपभोक्ता अभी क्या करें: घबराहट नहीं, सतर्कता जरूरी
ऐसी खबरें स्वाभाविक रूप से चिंता पैदा करती हैं, लेकिन घबराहट सबसे खराब प्रतिक्रिया होती है। समझदारी यह है कि उपभोक्ता कुछ बुनियादी आदतें अपनाएं। यदि घर में लंबे समय से रखे मास्क के पैकेट हैं, तो सबसे पहले बाहरी पैक पर निर्माण तिथि, उपयोग-अवधि, बैच नंबर, निर्माता का नाम, प्रमाणन और पैकेजिंग की गुणवत्ता देखें। छपी हुई स्याही में असमानता, ऊपर से चिपकाई गई स्टिकर-लेयर, अस्पष्ट बैच जानकारी, या असामान्य रूप से कम कीमत पर खरीदे गए बड़े स्टॉक को विशेष सावधानी से जांचें।
दूसरी बात, जहां संभव हो, विश्वसनीय विक्रेताओं से खरीद करें। यह सलाह भारत में अक्सर दी जाती है, लेकिन स्वास्थ्य-संबंधी उत्पादों के मामले में इसकी अहमियत अधिक है। तीसरी बात, यदि पैकेजिंग संदिग्ध लगे, तो इस्तेमाल से पहले निर्माता के ग्राहक-सेवा चैनल, आधिकारिक वेबसाइट, या संबंधित नियामक शिकायत तंत्र से संपर्क किया जा सकता है। चौथी बात, थोक या bulk खरीद करते समय केवल कीमत को आधार न बनाएं। कई बार सस्ता सौदा बाद में जोखिमपूर्ण साबित हो सकता है।
हालांकि यह भी उतना ही जरूरी है कि सारी जिम्मेदारी उपभोक्ता पर न डाली जाए। एक आम नागरिक से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह हर उत्पाद की फॉरेंसिक जांच करे। उपभोक्ता की भूमिका बुनियादी सतर्कता तक सीमित होनी चाहिए; उससे आगे की जिम्मेदारी नियामकों, निर्माताओं, वितरकों और प्लेटफॉर्म पर है। लेकिन जब तक व्यवस्था पूरी तरह अभेद्य नहीं बनती, तब तक नागरिक स्तर की सावधानी एक आवश्यक रक्षा-कवच बनी रहती है।
भारतीय परिवारों में अक्सर पुराने स्वास्थ्य-उत्पाद ‘काम आ जाएंगे’ सोचकर रखे रहते हैं। मास्क, थर्मामीटर की बैटरियां, सैनिटाइजर, प्राथमिक चिकित्सा सामग्री—सब कुछ अलमारी में जमा रहता है। यह आदत गलत नहीं, लेकिन समय-समय पर इनका निरीक्षण जरूरी है। खासकर अगर उत्पाद किसी संवेदनशील व्यक्ति—बुजुर्ग, बच्चे, गर्भवती महिला, या गंभीर रोगी—के उपयोग के लिए हो, तो विश्वसनीयता पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए।
सबसे बड़ा सबक: सार्वजनिक स्वास्थ्य में भरोसा टूटे, तो नुकसान बहुत दूर तक जाता है
कोरिया में पकड़े गए 82 हजार मास्क का मामला संख्या के लिहाज से बहुत बड़ा लग सकता है, लेकिन इसका वास्तविक महत्व उस संख्या से भी आगे है। यह प्रकरण याद दिलाता है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य केवल अस्पतालों, डॉक्टरों और दवाओं से नहीं चलता; यह छोटी-छोटी रोजमर्रा की चीजों पर टिकता है—एक सही मास्क, एक असली दवा, एक प्रमाणित उपकरण, एक विश्वसनीय लेबल। इन कड़ियों में से कोई भी कमजोर पड़े, तो पूरा भरोसे का ढांचा प्रभावित होता है।
भारतीय समाज ने पिछले कुछ वर्षों में स्वास्थ्य-व्यवस्था, आपूर्ति-श्रृंखला और नियामक संस्थाओं के महत्व को बहुत करीब से महसूस किया है। ऑक्सीजन सिलेंडर से लेकर रेमडेसिविर, अस्पताल बेड से लेकर मास्क और सैनिटाइजर तक—हमने सीखा कि संकट के समय भरोसा और पारदर्शिता जीवन-मरण का प्रश्न बन सकते हैं। इस पृष्ठभूमि में कोरिया की यह घटना हमें यह सोचने को मजबूर करती है कि क्या हमने महामारी के बाद उन सबकों को पर्याप्त गंभीरता से संरक्षित किया है?
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि स्वास्थ्य-सुरक्षा उत्पादों को कभी ‘सिर्फ सामान’ नहीं माना जाना चाहिए। वे सार्वजनिक विश्वास की वस्तुएं हैं। इनके साथ की गई धोखाधड़ी बाजार-व्यवस्था की गड़बड़ी भर नहीं, सामाजिक अनुशासन और संस्थागत विश्वसनीयता पर चोट है। अगर उपभोक्ता यह मानने लगे कि पैकेज पर लिखी तिथि भी भरोसेमंद नहीं, तो नुकसान किसी एक ब्रांड या एक विक्रेता तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर पूरे बाजार, पूरे नियामक तंत्र और अंततः सार्वजनिक स्वास्थ्य के आचरण पर पड़ेगा।
कोरिया के इस मामले से भारत के लिए संदेश साफ है: महामारी खत्म हो सकती है, लेकिन स्वास्थ्य-सुरक्षा की जिम्मेदारी खत्म नहीं होती। निगरानी को ढीला पड़ने देना, डिस्पोजल-प्रक्रिया को औपचारिकता समझना, और उपभोक्ता सूचना को महज पैकेजिंग का हिस्सा मान लेना—ये सब मिलकर ऐसे जोखिम पैदा करते हैं जिनकी कीमत समाज को चुकानी पड़ती है। इसलिए इस खबर का सार केवल इतना नहीं कि कुछ लोगों ने एक्सपायरी बदलकर मास्क बेच दिए। असल बात यह है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य में भरोसे की दीवार बहुत मेहनत से बनती है, लेकिन उसमें दरार बहुत आसानी से पड़ जाती है।
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