
सिर्फ सुनना नहीं, अमल करना असली परीक्षा
दक्षिण कोरिया में राष्ट्रपति के अधीन काम करने वाली ‘राष्ट्रीय एकता समिति’ ने 9 अप्रैल 2026 को यह संदेश दिया कि वह अपने नागरिक सहभागिता कार्यक्रम ‘ओपन माइक’ के जरिए जमीनी आवाज़ों को सीधे नीति-निर्माण से जोड़ेगी। पहली नज़र में यह एक सामान्य सरकारी पहल लग सकती है—जैसे नेता जनता से मिल रहे हों, शिकायतें सुन रहे हों, और लोकतंत्र को अधिक सहभागी बनाने की बात कर रहे हों। लेकिन कोरियाई राजनीति को करीब से देखने वाले जानते हैं कि इस घोषणा का महत्व सिर्फ संवाद तक सीमित नहीं है। यह असल में राष्ट्रपति ली जे-म्योंग सरकार के शुरुआती शासन मॉडल की परीक्षा है। सवाल यह नहीं है कि सरकार जनता की बात सुनना चाहती है या नहीं। सवाल यह है कि क्या वह सुनी गई बातों को बजट, कानून, प्रशासनिक निर्देश, नियामकीय ढांचे और मंत्रालयों की प्राथमिकताओं में बदलने की संस्थागत क्षमता रखती है।
भारतीय पाठकों के लिए इसे समझना कठिन नहीं है। हमारे यहां भी ‘जन सुनवाई’, ‘मन की बात’, जिला स्तर की शिकायत निवारण बैठकें, पंचायत संवाद, लोक शिकायत पोर्टल, सोशल मीडिया पर मुख्यमंत्री हेल्पलाइन, और चुनाव से पहले जनता दरबार जैसी कई व्यवस्थाएं दिखती हैं। लेकिन आम नागरिक का अनुभव अक्सर यही रहता है कि मंच तो बना, बयान भी हुआ, फोटो भी खिंची, पर उसके बाद फाइल कहां गई, किस विभाग ने क्या किया, और समस्या कब हल होगी—इसका कोई स्पष्ट उत्तर नहीं मिलता। दक्षिण कोरिया का ‘ओपन माइक’ भी इसी कसौटी पर कसा जाएगा। वहां की राजनीति आज जिस भरोसे के संकट से गुजर रही है, उसमें संदेश की कमी नहीं, बल्कि भरोसे की संरचना का अभाव सबसे बड़ी समस्या है।
कोरिया एक अत्यंत विकसित, तेज़-तर्रार और तकनीकी रूप से संगठित समाज है, लेकिन इसके भीतर सामाजिक तनाव कम नहीं हैं। 5.1 करोड़ से अधिक आबादी, 17 प्रांतीय स्तर की इकाइयां, 226 स्थानीय प्रशासनिक इकाइयां, और 65 वर्ष से ऊपर की आबादी का 20 प्रतिशत से अधिक होना—ये सभी संकेत बताते हैं कि कोरिया अब एक ‘सुपर-एजिंग सोसायटी’ यानी अति-वृद्ध समाज में प्रवेश कर चुका है। इसका अर्थ यह है कि वहां हर नीति पर पीढ़ियों, क्षेत्रों, पेशों और वर्गों के हित टकरा रहे हैं। युवा रोज़गार, घर और किराए की बात करते हैं; बुजुर्ग स्वास्थ्य, देखभाल और पेंशन की। राजधानी क्षेत्र और गैर-राजधानी क्षेत्रों की प्राथमिकताएं अलग हैं। ठीक वैसे ही जैसे भारत में दिल्ली-मुंबई-बेंगलुरु की शहरी चिंताएं और बुंदेलखंड, विदर्भ, पूर्वोत्तर या बिहार के कस्बों की जरूरतें एक जैसी नहीं हो सकतीं। ऐसे समय में ‘जनता से सीधे बात’ करना आसान नारा है, लेकिन ‘उस बात को नीति में बदलना’ बेहद कठिन प्रशासनिक काम है।
यही कारण है कि कोरिया में इस पहल को सिर्फ एक संचार कार्यक्रम की तरह नहीं देखा जा रहा। इसे सत्ता की गंभीरता, प्रशासनिक समन्वय और राजनीतिक ईमानदारी की कसौटी माना जा रहा है। वहां अब असली सवाल यह है कि क्या ‘ओपन माइक’ लोकतंत्र को अधिक उत्तरदायी बनाएगा, या यह भी सार्वजनिक नाराज़गी का दबाव कम करने वाला एक नियंत्रित मंच बनकर रह जाएगा।
कोरिया में ‘सीधा संवाद’ अब अचानक इतना अहम क्यों हो गया?
किसी भी लोकतंत्र में नागरिक भागीदारी कोई नया विचार नहीं होता। दक्षिण कोरिया में भी पिछले एक दशक में ऑनलाइन याचिकाएं, सार्वजनिक सुनवाई, जनमत सर्वेक्षण, नीति मंच, नागरिक शिकायत पोर्टल और विचार-विमर्श आधारित बैठकें काफी बढ़ी हैं। लेकिन विडंबना यह है कि मंच बढ़ने के साथ जनता का यह भरोसा नहीं बढ़ा कि उसकी भागीदारी वास्तव में निर्णयों को बदल रही है। उलटे कई लोगों को यह महसूस होने लगा कि सरकार नागरिकों की राय को ‘वैधता’ जुटाने के औज़ार की तरह इस्तेमाल करती है, न कि निर्णय की प्राथमिकताओं को बदलने वाले अधिकार की तरह।
यह स्थिति भारत में भी अपरिचित नहीं है। जब बड़े स्तर पर परामर्श होता है, तो अक्सर नागरिकों को लगता है कि सरकार ने उनसे राय तो मांगी, पर असली फैसला पहले ही हो चुका था। कोरिया में भी यही चिंता है। राजनीतिक तंत्र भागीदारी का विस्तार तो कर रहा है, लेकिन भागीदारी की प्रभावशीलता उतनी नहीं बढ़ी। इसका एक बड़ा कारण कोरियाई समाज की संरचनात्मक बदलती प्रकृति है। वह अब एकरूप समाज नहीं रहा। बुजुर्ग आबादी तेजी से बढ़ रही है, सियोल महानगरीय क्षेत्र में आबादी और संसाधनों का केंद्रित होना गहरा रहा है, युवाओं की आवासीय असुरक्षा बनी हुई है, छोटे व्यवसायों पर दबाव बढ़ रहा है, और कई छोटे शहरों व ग्रामीण इलाकों में जनसंख्या क्षरण का संकट है।
ऐसी परिस्थिति में ‘औसत नागरिक’ के लिए बनाई गई एक समान राष्ट्रीय नीति कारगर नहीं रह जाती। सरकार को अलग-अलग हित समूहों की सटीक मांगें समझनी पड़ती हैं। उदाहरण के लिए, सियोल और उसके आसपास रहने वालों के लिए परिवहन, घरों की कीमत और निजी शिक्षा का बोझ बड़ा मुद्दा हो सकता है, जबकि दूरदराज़ क्षेत्रों में चिंता यह है कि वहां अस्पताल क्यों नहीं हैं, बस सेवा क्यों घट रही है, युवा पलायन क्यों कर रहे हैं, और स्थानीय विश्वविद्यालयों का भविष्य क्या होगा। भारत में जैसे एक ही आर्थिक नीति का असर गुरुग्राम के कॉरपोरेट कर्मचारी, वाराणसी के लघु व्यापारी, केरल की नर्स, और झारखंड के आदिवासी किसान पर समान नहीं होता, वैसे ही कोरिया में भी सामाजिक विभाजन अधिक परिष्कृत और जटिल हो गए हैं।
राष्ट्रपति प्रणाली वाले देशों में शासन के शुरुआती महीनों में सबसे बड़ा पूंजीगत संसाधन सिर्फ संसद में संख्या नहीं होती, बल्कि जनता का यह भरोसा होता है कि सरकार समस्या समझती है और प्रतिक्रिया दे सकती है। हर नीति कानून बदलकर ही लागू नहीं होती। कई बार मंत्रालयों के बीच समन्वय, प्रशासनिक दिशा-निर्देश, बजट आवंटन, नियामकीय व्याख्या, और प्राथमिकता तय करने भर से वास्तविक परिवर्तन लाया जा सकता है। इसलिए ‘ओपन माइक’ जैसी पहल का अर्थ सिर्फ जनता से मिलना नहीं है; इसका अर्थ यह होना चाहिए कि सरकार यह दिखाए कि सुनने के बाद उसने बदला क्या। अगर यह कड़ी गायब रही, तो पूरा प्रयास एक आकर्षक राजनीतिक दृश्य भर रह जाएगा।
‘राष्ट्रीय एकता समिति’ की ताकत और उसकी सीमाएं
दक्षिण कोरिया की ‘राष्ट्रीय एकता समिति’ राष्ट्रपति के अधीन एक परामर्शी निकाय है। भारतीय पाठकों के लिए इसे ऐसे समझा जा सकता है जैसे कोई उच्च-स्तरीय आयोग या सलाहकार परिषद, जिसे राजनीतिक महत्व तो प्राप्त हो, पर सीधे बजट जारी करने, कानून पेश करने या कार्यक्रम लागू करने की पूर्ण कार्यकारी शक्ति न हो। ऐसी संस्थाओं की सबसे बड़ी ताकत यह होती है कि वे मंत्रालयों की दीवारों से परे जाकर जटिल मुद्दों को एक साथ देख सकती हैं। श्रम, देखभाल, क्षेत्रीय असमानता, पीढ़ीगत तनाव, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और स्थानीय विकास—ये ऐसे प्रश्न हैं जिन्हें एक मंत्रालय अकेले हल नहीं कर सकता। इस दृष्टि से समिति का अस्तित्व उपयोगी है।
लेकिन इसकी सबसे बड़ी सीमा भी यही है। नागरिक यदि कहता है कि उसके इलाके में सार्वजनिक परिवहन नहीं है, तो केवल सहानुभूति पर्याप्त नहीं। उसके लिए मार्ग पुनर्गठन, सब्सिडी, स्थानीय और केंद्रीय फंडिंग का तालमेल, परिवहन नियमों की समीक्षा, और स्थानीय प्रशासन के साथ कार्यान्वयन की आवश्यकता होगी। अगर कोई युवा कहता है कि वह अपने क्षेत्र में रहना चाहता है, लेकिन काम, घर और सामाजिक अवसंरचना नहीं है, तो समाधान आवास नीति, निवेश आकर्षण, क्षेत्रीय उद्योग, कॉलेज संरचना, और सामुदायिक सुविधाओं से जुड़ जाएगा। एक वाक्य में व्यक्त नागरिक शिकायत, सरकारी व्यवस्था में कई मंत्रालयों, संसद, स्थानीय प्रशासन और वित्तीय तंत्र के समन्वय की मांग करती है।
यहीं पर ऐसे कई सलाहकार निकाय अतीत में असफल रहे हैं। वे समस्याओं का सुंदर मानचित्र तो बना लेते हैं, पर समाधान के लिए आवश्यक प्रशासनिक मशीनरी को गति नहीं दे पाते। परिणाम यह होता है कि नागरिकों को लगता है कि उनकी पीड़ा को शब्दों में बदल दिया गया, पर व्यवस्था में कुछ नहीं बदला। कोरिया में भी अब यही आशंका उठ रही है कि ‘ओपन माइक’ कहीं प्रतीकात्मक राजनीति का एक नया अध्याय न बन जाए। भाषण, बैठक और सामूहिक तस्वीरें लोकतांत्रिक लग सकती हैं, लेकिन लोकतंत्र का मूल्यांकन अंततः निष्पादन से होता है।
अगर इस पहल को विश्वसनीय बनना है, तो केवल यह बताना पर्याप्त नहीं कि कितने लोगों ने भाग लिया। यह बताना होगा कि कितनी शिकायतें या सुझाव प्राप्त हुए, उनमें से किन्हें औपचारिक समीक्षा के लिए चुना गया, किस मंत्रालय को कौन-सा मुद्दा भेजा गया, जवाब देने की समयसीमा क्या है, और कितने मामलों में वास्तव में नियम, बजट, या कार्यक्रम बदले गए। भारतीय प्रशासनिक शब्दावली में कहें तो ‘रिसीव्ड’ से ‘डिस्पोज़्ड’ और फिर ‘रिज़ॉल्व्ड’ तक की पूरी यात्रा सार्वजनिक होनी चाहिए। तभी भरोसा बनेगा।
कोरियाई समाज में ‘एकता’ का अर्थ क्या है, और यह सिर्फ नैतिक नारा क्यों नहीं हो सकता
कोरिया में ‘नेशनल यूनिटी’ या ‘राष्ट्रीय एकता’ की भाषा बार-बार सुनाई देती है, लेकिन यह समझना ज़रूरी है कि यहां ‘एकता’ का अर्थ सबको एक राय पर ले आना नहीं है। आधुनिक लोकतंत्रों में एकता का मतलब अक्सर यह होता है कि हितों का टकराव स्वीकार करते हुए, नुकसान और लाभ के बंटवारे को न्यायसंगत ढंग से समझाया जाए। यानी यह नैतिक अपील से ज्यादा राजनीतिक और प्रशासनिक डिज़ाइन का प्रश्न है।
कोरिया में पीढ़ीगत तनाव, क्षेत्रीय विभाजन, वर्गीय दबाव, वैचारिक ध्रुवीकरण और पेशागत असुरक्षा एक साथ मौजूद हैं। उदाहरण के लिए, पेंशन सुधार एक वर्ग के लिए भविष्य की स्थिरता का प्रश्न है, तो दूसरे वर्ग के लिए आय पर अतिरिक्त दबाव। स्वास्थ्य व्यवस्था में बदलाव किसी के लिए संसाधन का बेहतर उपयोग हो सकता है, तो किसी के लिए सेवाओं की पहुंच में कमी। स्थानीय विश्वविद्यालयों का पुनर्गठन कुछ विशेषज्ञों को तर्कसंगत लगेगा, पर प्रभावित शहर के लिए यह आर्थिक-सामाजिक झटका हो सकता है। ऊर्जा या परिवहन लागत में पुनर्संतुलन एक समूह को राहत देगा, दूसरे पर बोझ डाल सकता है।
भारत में भी हम यह बार-बार देखते हैं कि कोई भी बड़ा सुधार—चाहे वह कृषि, शिक्षा, आरक्षण, शहरी नियोजन, या सामाजिक सुरक्षा से जुड़ा हो—तभी टिकाऊ बनता है जब सरकार यह स्पष्ट करे कि किसे क्या लाभ, किसे क्या लागत, और नुकसान झेलने वालों के लिए कौन-सा सुरक्षा उपाय मौजूद है। कोरिया में भी यही चुनौती है। केवल ‘एकता’ कह देने से समाज एकजुट नहीं हो जाता। यदि सरकार इस शब्द का इस्तेमाल सिर्फ नैतिक ऊंचाई हासिल करने के लिए करती है, तो उल्टा असर भी हो सकता है। लोग इसे वास्तविक संघर्षों को ढंकने की कोशिश मान सकते हैं।
इसी संदर्भ में ‘ओपन माइक’ की उपयोगिता महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि यह केवल मंच नहीं, बल्कि शुरुआती चेतावनी प्रणाली की तरह काम करे—जहां सरकार समय रहते यह पकड़ ले कि किन इलाकों में बस सेवाएं संकट में हैं, कहां लॉजिस्टिक्स या डिलीवरी कर्मियों की स्थितियां खराब हैं, कहां स्कूलों के विलय पर नाराज़गी बढ़ रही है, कहां बुजुर्ग देखभाल की कमी है, और कहां प्रवासी श्रमिकों या स्थानीय श्रमिकों के बीच तनाव पनप रहा है—तो कई बड़े सामाजिक संघर्षों को समय रहते संभाला जा सकता है। लेकिन यदि शिकायतें सुनी गईं और फिर महीनों तक कुछ नहीं हुआ, तो नागरिक भागीदारी लोकतांत्रिक पूंजी बनने के बजाय अविश्वास का स्रोत बन जाएगी।
स्थानीय चुनावों से पहले यह पहल क्यों राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है
दक्षिण कोरिया में 3 जून को होने वाले स्थानीय चुनावों से लगभग पचास दिन पहले इस कार्यक्रम का संदेश सामने आया। इसलिए इसे केवल नीति प्रयोग मानना अधूरा होगा; यह स्पष्ट रूप से राजनीतिक अर्थ भी रखता है। स्थानीय चुनाव भले राष्ट्रीय दलों के बैनर तले लड़े जाते हों, लेकिन मतदाता अक्सर इन चुनावों में वैचारिक बहस से ज्यादा रोज़मर्रा की समस्याओं के आधार पर निर्णय लेते हैं। परिवहन, स्थानीय अर्थव्यवस्था, शहरी योजना, कल्याण सेवाएं, शिक्षा अवसंरचना, जनसंख्या बनाए रखना, और क्षेत्रीय निवेश—ये सब स्थानीय चुनावों के वास्तविक मुद्दे होते हैं।
भारत में नगर निगम, पंचायत, नगर पालिका या विधानसभा के कई चुनावों में भी यही पैटर्न दिखाई देता है। मतदाता बड़ी वैचारिक लड़ाइयों से प्रभावित जरूर होता है, लेकिन अंतिम निर्णय अक्सर सड़क, पानी, बस, अस्पताल, स्कूल, संपत्ति मूल्य, रोज़गार और स्थानीय प्रशासन की कार्यक्षमता पर टिकता है। कोरिया में भी इसी कारण ‘जमीनी एकता’ और ‘फील्ड-बेस्ड कम्युनिकेशन’ की भाषा चुनावी दृष्टि से उपयोगी मानी जा रही है। इससे केंद्रीय सरकार अपनी छवि को सॉफ्ट बना सकती है और स्थानीय उम्मीदवारों को यह कहने का मौका दे सकती है कि वे जनता की सीधी आवाज़ पर काम करने वाले तंत्र से जुड़े हैं।
इसका खास असर तथाकथित मध्यमार्गी और अनिर्णीत मतदाताओं पर पड़ सकता है। कट्टर समर्थक तो पहले ही किसी न किसी पक्ष में खड़े होते हैं, लेकिन स्थानीय चुनावों का परिणाम अक्सर उन्हीं मतदाताओं से तय होता है जो वैचारिक निष्ठा से ज्यादा प्रशासनिक क्षमता, संतुलित भाषा और समस्या-समाधान के रिकॉर्ड को देखते हैं। ऐसे मतदाता ‘सुनने वाली सरकार’ की भाषा से प्रभावित हो सकते हैं, पर वे केवल भाषा से संतुष्ट नहीं होते। उन्हें ठोस परिणाम चाहिए। इसलिए ‘ओपन माइक’ की राजनीतिक उपयोगिता तभी बनेगी जब जनता यह अनुभव करे कि सरकार केवल सहानुभूति नहीं दिखा रही, बल्कि फाइलें आगे बढ़ा रही है।
विपक्ष के लिए भी यह एक जटिल स्थिति है। वह स्वाभाविक रूप से इसे दिखावटी संवाद या चुनाव-पूर्व जनसंपर्क कार्यक्रम कहकर हमला कर सकता है। और इसके लिए उसके पास पर्याप्त उदाहरण भी होंगे, क्योंकि दुनिया भर में सरकारें जन-संवाद के मंचों को अक्सर छवि-निर्माण के लिए इस्तेमाल करती रही हैं। लेकिन विपक्ष बहुत आक्रामक होकर इस प्रकार की नागरिक भागीदारी को खारिज भी नहीं कर सकता, क्योंकि इससे यह संदेश जा सकता है कि वह जनता के सीधे संपर्क की राजनीति में कमजोर है। इसीलिए आने वाले हफ्तों में असली मुकाबला सिर्फ सत्तापक्ष बनाम विपक्ष का नहीं होगा, बल्कि ‘कौन बेहतर सुनता है’ से आगे बढ़कर ‘कौन बेहतर अमल करता है’ का होगा।
सफलता की असली शर्तें: डेटा, जवाबदेही और समयबद्ध कार्रवाई
इस पहल की विश्वसनीयता के लिए तीन बुनियादी शर्तें बेहद महत्वपूर्ण हैं। पहली, डेटा का व्यवस्थित सार्वजनिक प्रकटीकरण। आमतौर पर नागरिक संवाद को भावनात्मक, मानवीय और प्रतीकात्मक प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन वास्तविक शासन में यह एक डेटा-इंटेंसिव प्रक्रिया होनी चाहिए। सरकार को यह दिखाना होगा कि कौन-से क्षेत्र से किस प्रकार की शिकायतें आईं, उनमें कौन-से पैटर्न उभरे, किस वर्ग की कौन-सी समस्या बार-बार सामने आई, और इनमें से कौन-से विषय नीतिगत प्राथमिकता में रखे गए। बिना डेटा के ‘हमने जनता की बात सुनी’ एक अस्पष्ट दावा बनकर रह जाता है।
दूसरी शर्त, मंत्रालयों के बीच औपचारिक समन्वय की बाध्यकारी व्यवस्था। अगर ‘ओपन माइक’ में बात सुनी गई, लेकिन संबंधित मंत्रालय पर कोई स्पष्ट कार्य-प्रोटोकॉल नहीं है, तो यह पहल जल्द ही धीमी पड़ जाएगी। कोरिया में वित्त, आंतरिक प्रशासन, स्वास्थ्य, भूमि-परिवहन, शिक्षा और श्रम जैसे मंत्रालयों को किसी न किसी रूप में जोड़ा जाना ही होगा। केवल राष्ट्रपति के दफ्तर की राजनीतिक इच्छा पर्याप्त नहीं होती; उसे प्रशासनिक अनुशासन में बदलना पड़ता है। भारत में भी यही अनुभव रहा है कि अंतर-मंत्रालयी समन्वय के बिना बहु-आयामी समस्याएं लंबित रह जाती हैं।
तीसरी और शायद सबसे महत्वपूर्ण शर्त है स्पष्ट समयसीमा। नागरिकों की सबसे बड़ी शिकायत यह नहीं होती कि हर समस्या तुरंत हल क्यों नहीं हुई। उनकी शिकायत यह होती है कि उन्हें पता ही नहीं चलता कि प्रक्रिया कहां तक पहुंची। अगर सरकार कहे कि किसी विषय पर 2 सप्ताह में प्रारंभिक उत्तर, 6 सप्ताह में विभागीय समीक्षा, और 3 महीने में नीति-सिफारिश या कार्य योजना सार्वजनिक की जाएगी, तो भरोसा बन सकता है। लोकतंत्र में पारदर्शिता का मतलब केवल कागज़ दिखाना नहीं होता; इसका मतलब होता है प्रक्रिया को समझने लायक बनाना।
कोरियाई संदर्भ में यह और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वहां प्रशासनिक दक्षता की अपेक्षा बहुत ऊंची है। एक तकनीकी रूप से सक्षम समाज में यदि सरकार नागरिक इनपुट को ट्रैक भी न कर सके, तो निराशा और गहरी होगी। लोगों को यह लग सकता है कि डिजिटल लोकतंत्र के नाम पर केवल मंच सजाया गया। दूसरी ओर, यदि सरकार शिकायतों की श्रेणीकरण, प्राथमिकता निर्धारण, कार्रवाई की स्थिति, और विभागवार जवाबदेही को सार्वजनिक डैशबोर्ड के रूप में सामने लाती है, तो यह मॉडल अन्य लोकतंत्रों के लिए भी उदाहरण बन सकता है।
भारत के लिए इसमें क्या सबक हैं
दक्षिण कोरिया का यह प्रयोग भारत जैसे बड़े और विविध लोकतंत्र के लिए भी कई संकेत देता है। पहली सीख यह है कि जन-सुनवाई और जन-भागीदारी तब तक अधूरी है जब तक वह प्रशासनिक परिणाम में अनूदित न हो। हमारे यहां जिला कलेक्टर से लेकर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक, नागरिकों से सीधे संवाद के अनेक प्रारूप हैं। पर इनका मूल्यांकन अक्सर केवल पहुंच, लोकप्रियता और दृश्यता से किया जाता है। असली सवाल यह होना चाहिए कि कितने सुझाव नीति में बदले, कितनी शिकायतें संस्थागत सुधार तक पहुंचीं, और कितने मामलों में प्रणालीगत परिवर्तन हुआ।
दूसरी सीख यह है कि ‘एक राष्ट्र, एक संदेश’ की राजनीति बहुस्तरीय समाज में सीमित हो जाती है। भारत और कोरिया दोनों, अपने-अपने पैमाने पर, क्षेत्रीय और सामाजिक विषमताओं से जूझ रहे हैं। इसलिए अब राजनीति को ‘औसत नागरिक’ के बजाय ‘विशिष्ट हित समूहों’ की विविध वास्तविकताओं को समझना होगा। यही कारण है कि जमीनी शासन, शहरी लोक सेवाएं, देखभाल अर्थव्यवस्था, युवा आवास, बुजुर्ग कल्याण, और क्षेत्रीय असंतुलन जैसे प्रश्न आने वाले वर्षों में लोकतांत्रिक वैधता के केंद्र में रहेंगे।
तीसरी सीख यह है कि भरोसा केवल भाषण से नहीं, बल्कि प्रक्रियागत न्याय से पैदा होता है। अगर नागरिक को यह पता हो कि उसकी बात कहीं दर्ज हुई है, उसका ट्रैक नंबर है, संबंधित अधिकारी तय है, समयसीमा स्पष्ट है, और परिणाम सार्वजनिक होगा, तो व्यवस्था पर उसका विश्वास बढ़ता है। लेकिन अगर संवाद मंच एकतरफा प्रसारण बन जाए, तो वह लोकतंत्र को मजबूत करने के बजाय जनता में राजनीतिक दूरी बढ़ा देता है।
दक्षिण कोरिया आज इसी मोड़ पर खड़ा है। ‘ओपन माइक’ वहां एक आकर्षक लोकतांत्रिक प्रयोग भी बन सकता है और एक खोया हुआ अवसर भी। यदि यह पहल नागरिकों की आवाज़ को विभागीय आदेश, बजटीय प्राथमिकता, नियामकीय सुधार और स्थानीय समाधान में बदल देती है, तो यह राष्ट्रपति ली जे-म्योंग सरकार के लिए शुरुआती राजनीतिक पूंजी साबित होगी। लेकिन यदि यह केवल सुनने का मंच बनकर रह गई, तो यह कोरियाई समाज में पहले से मौजूद उस गहरी धारणा को और मजबूत करेगी कि राजनीति जनता को सुनती कम, दिखाती ज्यादा है।
कुल मिलाकर, इस पहल की सफलता तालियों, कैमरों या भाषणों से नहीं मापी जाएगी। असली पैमाना यह होगा कि क्या एक नागरिक की कही हुई एक साधारण-सी बात—बस सेवा, किराया, अस्पताल, देखभाल, रोज़गार, या क्षेत्रीय भविष्य को लेकर—वास्तव में शासन मशीनरी की दिशा बदल पाती है। लोकतंत्र में यही वह क्षण होता है जब आवाज़ शिकायत से अधिकार में बदलती है। और फिलहाल, दक्षिण कोरिया इसी परिवर्तन की कठिन परीक्षा से गुजर रहा है।
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