
ह्वाचॉन की खबर क्यों महत्वपूर्ण है
दक्षिण कोरिया के गंगवॉन प्रांत के छोटे से पहाड़ी जिले ह्वाचॉन में एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने वहां की जनसंख्या नीति, मातृ-स्वास्थ्य और स्थानीय प्रशासन की प्राथमिकताओं पर नया ध्यान खींचा है। ह्वाचॉन प्रशासन ने घोषणा की है कि उसके सार्वजनिक प्रसवोत्तर देखभाल केंद्र, यानी ‘पब्लिक पोस्टनैटल केयर सेंटर’, की सभी बुकिंग पूरी तरह भर चुकी हैं। स्थानीय भाषा में इसे ‘सांहु जोरीवॉन’ कहा जाता है। कोरियाई समाज में यह सिर्फ एक मेडिकल सुविधा नहीं, बल्कि मां के प्रसव के बाद शारीरिक और मानसिक पुनर्स्थापन, नवजात की शुरुआती देखभाल, स्तनपान मार्गदर्शन और परिवार के लिए संक्रमणकालीन सहारे का संस्थागत मॉडल है।
इस खबर का सबसे अहम पहलू यह है कि ह्वाचॉन में इस सुविधा का पूरा खर्च प्रशासन उठा रहा है। यानी नई माताओं को प्रसव के बाद कुछ दिनों या हफ्तों तक विशेष देखभाल की सेवा बिना शुल्क मिल रही है। नतीजा यह हुआ कि इसकी बुकिंग इतनी तेज हुई कि उपलब्ध स्लॉट पूरी तरह ‘सोल्ड आउट’ हो गए। यह शब्द आमतौर पर हम किसी संगीत समारोह, क्रिकेट मैच या मोबाइल फोन की नई लॉन्चिंग के लिए सुनते हैं, लेकिन यहां एक मातृ-स्वास्थ्य सुविधा के लिए ऐसी मांग दर्ज होना बताता है कि समाज में इसकी कितनी जरूरत है।
भारतीय पाठकों के लिए यह खबर इसलिए दिलचस्प है क्योंकि भारत में भी मातृ-स्वास्थ्य, नवजात देखभाल और घटती प्रजनन दर को लेकर बहस तेज हो रही है। हमारे यहां एक तरफ महानगरों में निजी अस्पतालों और महंगे मेटरनिटी पैकेजों का चलन है, तो दूसरी तरफ छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में प्रसवोत्तर देखभाल अब भी मुख्यतः परिवार, खासकर दादी-नानी और आशा-आंगनवाड़ी नेटवर्क पर टिकी हुई है। कोरिया का यह मॉडल हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या राज्य, समाज और परिवार के बीच ऐसी कोई साझी व्यवस्था बनाई जा सकती है जो मातृत्व को सिर्फ निजी जिम्मेदारी न मानकर सार्वजनिक नीति का हिस्सा बनाए?
ह्वाचॉन की यह पहल महज स्थानीय प्रशासनिक घोषणा नहीं है; यह उस बड़े संकट की पृष्ठभूमि में सामने आई है जिसे दक्षिण कोरिया लंबे समय से झेल रहा है—बेहद कम जन्मदर। दुनिया की सबसे कम प्रजनन दर वाले देशों में शामिल कोरिया के लिए हर बच्चा, हर परिवार और हर जन्म अब नीति-निर्माताओं के लिए केंद्रीय मुद्दा बन चुका है। ऐसे में प्रसव के बाद मां को मुफ्त देखभाल देना सिर्फ कल्याणकारी कदम नहीं, बल्कि जनसंख्या संकट से निपटने की रणनीति भी है।
‘सांहु जोरीवॉन’ क्या है, और कोरिया में इसकी सामाजिक भूमिका क्यों अलग है
भारतीय संदर्भ में इसे समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि कोरिया का ‘सांहु जोरीवॉन’ आखिर है क्या। मोटे तौर पर यह प्रसव के बाद मां और नवजात के लिए एक विशेष देखभाल केंद्र होता है, जहां प्रशिक्षित स्टाफ मां की रिकवरी, भोजन, आराम, नवजात की निगरानी, स्तनपान प्रशिक्षण, और बुनियादी स्वास्थ्य पर नजर रखता है। भारत में पारंपरिक रूप से प्रसव के बाद ‘सुतक’, ‘जच्चा-बच्चा की देखभाल’, ‘घी-गोंद के लड्डू’, ‘अजवाइन का पानी’, ‘तेल मालिश’ और 40 दिन आराम जैसी धारणाएं कई समुदायों में प्रचलित रही हैं। यानी प्रसवोत्तर पुनर्वास का विचार हमारे यहां नया नहीं है, लेकिन उसका स्वरूप घरेलू और पारिवारिक रहा है।
कोरिया में यह प्रक्रिया अधिक संस्थागत हो गई। वहां शहरीकरण, छोटे परिवार, कामकाजी दंपतियों की बढ़ती संख्या और बुजुर्गों से अलग रहने की प्रवृत्ति ने ऐसी पेशेवर सेवाओं की मांग बढ़ाई। इसलिए निजी ‘सांहु जोरीवॉन’ का बड़ा उद्योग विकसित हुआ। लेकिन समस्या यह रही कि निजी केंद्र महंगे होते गए और हर परिवार के लिए सुलभ नहीं रहे। ह्वाचॉन जैसे जिले का सार्वजनिक मॉडल इसी असमानता को कम करने की कोशिश है।
यहां एक सांस्कृतिक अंतर भी ध्यान देने योग्य है। भारत में बच्चे का जन्म अक्सर पूरे परिवार की सामूहिक घटना होता है; घर में रिश्तेदारों का आना-जाना, घरेलू सहारा और पारंपरिक ज्ञान बड़ी भूमिका निभाते हैं। हालांकि महानगरों में यह ढांचा तेजी से कमजोर हो रहा है। कोरिया में भी कभी परिवार की भूमिका अधिक थी, लेकिन अब वहां एकल और नाभिकीय परिवारों का चलन इतना बढ़ गया है कि प्रसव के बाद महिला को पेशेवर सहायता की जरूरत ज्यादा महसूस होती है। इसीलिए सार्वजनिक प्रसवोत्तर केंद्र वहां ‘लक्जरी’ नहीं, बल्कि एक सामाजिक आवश्यकता के रूप में उभर रहे हैं।
ह्वाचॉन का मामला इसीलिए खास है कि उसने इस सुविधा को बाजार-आधारित सेवा से निकालकर नागरिक अधिकार जैसा रूप देने की कोशिश की है। अगर नई मां को इस दौरान आर्थिक चिंता न करनी पड़े, तो वह शारीरिक रिकवरी और शिशु के साथ शुरुआती जुड़ाव पर बेहतर ध्यान दे सकती है। मातृ अवसाद, स्तनपान में शुरुआती कठिनाइयों और प्रसव के बाद शारीरिक थकावट जैसी समस्याओं को भी ऐसी व्यवस्था कुछ हद तक कम कर सकती है।
बुकिंग फुल होने के पीछे सिर्फ ‘मुफ्त’ शब्द नहीं, बल्कि गहरी सामाजिक बेचैनी
ह्वाचॉन के सार्वजनिक प्रसवोत्तर केंद्र की बुकिंग पूरी भर जाने को केवल इस तरह नहीं पढ़ा जाना चाहिए कि लोग मुफ्त सेवा मिलने पर टूट पड़े। दरअसल यह मांग कई स्तरों की सामाजिक सच्चाइयों को सामने लाती है। पहला, प्रसव के बाद देखभाल की वास्तविक जरूरत बहुत अधिक है। दूसरा, निजी सेवाएं इतनी महंगी हैं कि मध्यमवर्गीय या सीमित आय वाले परिवारों के लिए वे बोझ बन जाती हैं। तीसरा, राज्य समर्थित विश्वसनीय सेवा मिलते ही लोग उस पर भरोसा दिखाते हैं।
दक्षिण कोरिया में बच्चे पैदा करने की लागत—घर, शिक्षा, स्वास्थ्य, देखभाल, करियर ब्रेक—इतनी ज्यादा मानी जाती है कि कई युवा दंपति विवाह और मातृत्व-पितृत्व को टालते हैं। ऐसे माहौल में यदि स्थानीय प्रशासन कहता है कि कम से कम प्रसव के बाद की देखभाल की पूरी चिंता वह उठाएगा, तो यह परिवारों के लिए राहत का संकेत बनता है। ह्वाचॉन में बढ़ी मांग इस बात का प्रमाण है कि समाज ऐसी सहायता की प्रतीक्षा कर रहा था।
भारत में भी इसी तरह के संकेत दिखते हैं। हमारे यहां सी-सेक्शन, निजी अस्पतालों के पैकेज, नवजात आईसीयू, लैक्टेशन काउंसलिंग, और प्रसवोत्तर रिकवरी से जुड़ी सेवाएं तेजी से महंगी हुई हैं। महानगरों में ‘पोस्टपार्टम डौला’, ‘न्यू मॉम केयर’, ‘होम नर्सिंग’ और ‘मदर-बेबी वेलनेस’ जैसे निजी पैकेज उभरे हैं, पर वे सीमित वर्ग तक ही पहुंचते हैं। दूसरी ओर, सरकारी अस्पतालों का ध्यान अक्सर सुरक्षित प्रसव तक सीमित रह जाता है; प्रसव के बाद मां की व्यापक पुनर्वास-आधारित देखभाल अभी भी नीति का कमजोर हिस्सा है।
इसलिए ह्वाचॉन की बुकिंग फुल होने की घटना हमें यह भी बताती है कि मातृत्व-सहायता की मांग छिपी हुई नहीं है, बल्कि स्पष्ट और मजबूत है। यदि राज्य संवेदनशील तरीके से, भरोसेमंद संस्थागत ढांचे के साथ आगे आए, तो परिवार उसका स्वागत करते हैं। यह भारतीय प्रशासनिक सोच के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश है, खासकर उन राज्यों के लिए जहां स्वास्थ्य अवसंरचना बेहतर है और जहां महिला एवं बाल विकास कार्यक्रमों को अगले स्तर पर ले जाया जा सकता है।
कम जन्मदर की चुनौती: कोरिया की मजबूरी, लेकिन भारत के लिए भी संकेत
दक्षिण कोरिया की बेहद कम जन्मदर दुनिया भर के नीति-विश्लेषकों के लिए चिंता और अध्ययन का विषय रही है। वहां की स्थिति इतनी गंभीर मानी जाती है कि राष्ट्रीय और स्थानीय सरकारें विवाह, मातृत्व, बाल-पालन और परिवार निर्माण को प्रोत्साहित करने के लिए तरह-तरह की योजनाएं ला रही हैं। ह्वाचॉन की मुफ्त प्रसवोत्तर देखभाल भी इसी व्यापक नीति-दिशा का हिस्सा है। संदेश साफ है: अगर परिवार बच्चे पैदा करने में हिचक रहे हैं, तो केवल नारे या नकद प्रोत्साहन काफी नहीं होंगे; उन्हें वास्तविक, ठोस, रोजमर्रा की राहत देनी होगी।
भारत की स्थिति कोरिया जैसी नहीं है, क्योंकि यहां राष्ट्रीय स्तर पर जनसंख्या और प्रजनन का पैटर्न अलग है। लेकिन यह कहना भी सही नहीं होगा कि यह मुद्दा हमारे लिए अप्रासंगिक है। भारत में कुल प्रजनन दर कई राज्यों में प्रतिस्थापन स्तर के आसपास या उससे नीचे पहुंच चुकी है। केरल, तमिलनाडु, दिल्ली, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में परिवार का आकार पहले ही छोटा हो चुका है। शहरी भारत में करियर, घर की लागत, बच्चों की शिक्षा, महिलाओं के कार्यस्थल से बाहर होने का जोखिम और भरोसेमंद देखभाल तंत्र की कमी परिवार नियोजन के निर्णयों को प्रभावित कर रहे हैं।
यानी भारत के सामने कोरिया जैसा तात्कालिक संकट भले न हो, लेकिन परिवार-सहायक नीतियों की जरूरत अवश्य बढ़ रही है। हमें यह समझना होगा कि सिर्फ प्रसव अस्पताल में करा देना पर्याप्त नहीं है। प्रसव के बाद महिला की रिकवरी, मानसिक स्वास्थ्य, पोषण, स्तनपान सहायता, नवजात की शुरुआती निगरानी, और परिवार को प्रशिक्षित समर्थन देना भी उतना ही जरूरी है। अगर यह नहीं होगा, तो मातृत्व का अनुभव अधिक तनावपूर्ण, महंगा और असमान होता जाएगा।
कोरिया की नीति हमें यह सिखाती है कि जन्मदर पर असर डालने वाले फैसले अक्सर ‘बड़े’ आर्थिक ढांचों से जुड़ते हैं, लेकिन ‘छोटी’ दिखने वाली देखभाल सेवाएं भी बेहद निर्णायक हो सकती हैं। एक नए माता-पिता के लिए यह जानना कि प्रसव के बाद 10-15 दिन या उससे अधिक की सुरक्षित, सम्मानजनक और मुफ्त देखभाल उपलब्ध होगी, वास्तव में उनके निर्णय को प्रभावित कर सकता है। भारत में भी यह सोच विकसित हो सकती है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां शहरी तनाव और नाभिकीय परिवारों का दबाव बढ़ रहा है।
भारत के लिए सबसे बड़ा सबक: मातृत्व को निजी मामला नहीं, सार्वजनिक निवेश मानना होगा
भारत में मातृ-स्वास्थ्य पर पिछले दो दशकों में उल्लेखनीय काम हुआ है। संस्थागत प्रसव बढ़ाने, जननी सुरक्षा, प्रसूति देखभाल और नवजात टीकाकरण जैसी योजनाओं ने फर्क डाला है। लेकिन प्रसवोत्तर देखभाल अब भी नीति का अपेक्षाकृत कम चर्चित हिस्सा है। अक्सर महिला को अस्पताल से जल्दी छुट्टी दे दी जाती है, और उसके बाद की देखभाल परिवार की व्यवस्था, आर्थिक क्षमता और स्थानीय सुविधाओं पर निर्भर हो जाती है। यही वह खाई है, जिसकी ओर ह्वाचॉन का मॉडल हमारा ध्यान खींचता है।
भारत में यदि किसी राज्य सरकार या जिला प्रशासन को इस तरह की पहल करनी हो, तो वह केवल एक इमारत बनाकर काम पूरा नहीं कर सकता। इसके लिए प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ, लैक्टेशन विशेषज्ञ, पोषण व्यवस्था, मानसिक स्वास्थ्य परामर्श, संक्रमण नियंत्रण, रेफरल सिस्टम, और गरीब व मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए पारदर्शी पात्रता व्यवस्था की जरूरत होगी। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि ऐसी सुविधा किसी एक वर्ग की ‘प्रीमियम सरकारी सेवा’ न बनकर व्यापक सामाजिक जरूरत पूरी करे।
एक दिलचस्प संभावना यह हो सकती है कि भारत में जिला अस्पतालों और महिला अस्पतालों से जुड़े ‘पोस्टपार्टम रिकवरी यूनिट’ विकसित किए जाएं, जहां सामान्य प्रसव और सी-सेक्शन दोनों के बाद महिलाओं को कुछ दिन अतिरिक्त सहायता मिल सके। इसके साथ घर लौटने के बाद सामुदायिक स्वास्थ्यकर्मी, जैसे आशा और एएनएम, एक अधिक संगठित प्रसवोत्तर फॉलो-अप मॉडल अपनाएं। भारतीय पारिवारिक ढांचे को देखते हुए पूरी तरह कोरियाई ढांचा ज्यों का त्यों लागू करना शायद उचित न हो, लेकिन उससे प्रेरित स्थानीय मॉडल अवश्य तैयार किए जा सकते हैं।
यहां एक और बात महत्वपूर्ण है। भारत में महिलाओं का unpaid care work, यानी बिना वेतन वाली देखभाल-आधारित मेहनत, बहुत बड़ा और अक्सर अदृश्य श्रम है। प्रसव के बाद महिला से जल्दी सामान्य जिम्मेदारियों में लौटने की उम्मीद की जाती है। यदि राज्य यह संकेत देता है कि मातृत्व के बाद विश्राम और रिकवरी कोई ‘आलस्य’ नहीं, बल्कि स्वास्थ्य आवश्यकता है, तो यह सामाजिक दृष्टि भी बदल सकती है। ह्वाचॉन की पहल इसी सम्मानजनक नीति-दृष्टि का उदाहरण देती है।
आर्थिक राहत से आगे बढ़कर, यह भरोसे की राजनीति भी है
ह्वाचॉन की इस योजना को सिर्फ कल्याणकारी खर्च के रूप में नहीं देखना चाहिए। यह स्थानीय प्रशासन और नागरिकों के बीच भरोसे के रिश्ते की भी कहानी है। जब कोई जिला यह कहता है कि वह नवजात और मां की शुरुआती जरूरतों में साथ खड़ा रहेगा, तो वह केवल स्वास्थ्य सेवा नहीं दे रहा होता; वह यह संदेश भी देता है कि परिवार बनाना सामाजिक रूप से मूल्यवान कार्य है और राज्य इसमें भागीदार बनेगा।
दक्षिण कोरिया में कम जन्मदर का संकट अक्सर युवाओं की निराशा, रोजगार असुरक्षा, महंगे आवास और प्रतिस्पर्धी जीवनशैली से जोड़ा जाता है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर दी जाने वाली ठोस सहायता—जैसे प्रसवोत्तर केंद्र का पूरा शुल्क उठाना—नीति को मानव-केंद्रित बनाती है। नागरिक इसे सीधे महसूस करते हैं, इसलिए प्रतिक्रिया भी सकारात्मक होती है। बुकिंग फुल होना इसी भरोसे की भाषा है।
भारतीय राजनीति में भी महिलाओं और परिवारों के लिए योजनाओं की लंबी सूची है, लेकिन कई बार उनका असर वितरण-आधारित रहता है, देखभाल-आधारित नहीं। पोषण किट, नकद हस्तांतरण, साइकिल, गैस सिलेंडर या छात्रवृत्ति उपयोगी हैं, पर मातृत्व और शिशु-देखभाल के सबसे कठिन दिनों में संस्थागत साथ मिलना अलग तरह की सुरक्षा देता है। अगर कोई राज्य सरकार प्रसवोत्तर पुनर्वास को प्राथमिकता दे, तो उसका सामाजिक और राजनीतिक असर दोनों गहरे हो सकते हैं।
यह भी ध्यान रखना होगा कि ऐसी योजनाओं की सफलता से अपेक्षाएं बढ़ती हैं। ह्वाचॉन ने संकेत दिया है कि आगे सेवा का विस्तार किया जा सकता है, लेकिन विस्तार के साथ बजट, स्टाफ और गुणवत्ता नियंत्रण की चुनौतियां भी आएंगी। भारत में भी यही होगा। जैसे ही एक सुविधा लोकप्रिय होगी, मांग आपूर्ति से आगे निकल सकती है। इसलिए शुरुआत से ही विस्तार-योग्य मॉडल, डेटा-आधारित मूल्यांकन और पारदर्शी प्रवेश प्रणाली जरूरी होगी।
आगे की राह: क्या ह्वाचॉन मॉडल टिकाऊ है, और भारत क्या सीख सकता है
ह्वाचॉन की सफलता उत्साहजनक है, लेकिन किसी भी सार्वजनिक योजना की असली परीक्षा उसकी दीर्घकालिक टिकाऊ क्षमता में होती है। क्या प्रशासन लगातार बजट दे पाएगा? क्या मांग बढ़ने पर नई सीटें जोड़ी जा सकेंगी? क्या सेवा की गुणवत्ता निजी केंद्रों के मुकाबले भरोसेमंद बनी रहेगी? क्या यह सुविधा सबसे जरूरतमंद परिवारों तक पहुंचेगी, या पहले से जागरूक और संसाधन-संपन्न तबका ज्यादा लाभ उठा लेगा? ये प्रश्न कोरिया में भी उठेंगे और उठने चाहिए।
फिर भी, इस पहल का महत्व कम नहीं होता। उलटे, यही उसकी गंभीरता दर्शाता है। यदि कोई नीति लोकप्रिय होती है, तो उसका अर्थ यह है कि उसने वास्तविक जरूरत को छुआ है। अब चुनौती उस जरूरत को लगातार, न्यायसंगत और उच्च गुणवत्ता के साथ पूरा करने की है। ह्वाचॉन के लिए अगला चरण संभवतः क्षमता विस्तार, अतिरिक्त बजट, और व्यापक क्षेत्रीय समन्वय का होगा।
भारत के लिए इससे तीन बड़े सबक निकलते हैं। पहला, मातृ-स्वास्थ्य को प्रसव से आगे बढ़ाकर प्रसवोत्तर पुनर्वास तक देखना होगा। दूसरा, परिवार-सहायक नीतियां केवल नकद प्रोत्साहन नहीं, बल्कि देखभाल ढांचे के रूप में बनानी होंगी। तीसरा, छोटे प्रशासनिक इकाइयां—जिले, नगरपालिकाएं, स्थानीय निकाय—कई बार बड़े राष्ट्रीय विमर्श से पहले व्यावहारिक समाधान पेश कर सकती हैं। जैसे भारत में कुछ राज्य मिड-डे मील, मोहल्ला क्लिनिक या महिला स्वयं सहायता समूहों के मॉडल से राष्ट्रीय बहस को दिशा देते रहे हैं, वैसे ही मातृत्व-देखभाल में भी स्थानीय नवाचार रास्ता दिखा सकते हैं।
आखिरकार, एक सभ्य समाज की पहचान केवल इस बात से नहीं होती कि वह जन्म को कैसे दर्ज करता है, बल्कि इस बात से भी होती है कि वह जन्म देने वाली महिला के साथ कैसा व्यवहार करता है। ह्वाचॉन की खबर हमें याद दिलाती है कि मातृत्व के शुरुआती दिनों में सहायता कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि सामाजिक बुनियाद का हिस्सा हो सकती है। भारत में जहां ‘मां और बच्चे’ की छवि भावनात्मक रूप से बहुत मजबूत है, वहां इस भावना को नीति में बदलने का समय शायद अब पहले से अधिक प्रासंगिक है। अगर कोरिया का एक छोटा जिला प्रसव के बाद की देखभाल को सार्वजनिक प्राथमिकता बना सकता है, तो भारतीय राज्यों और शहरों के लिए भी यह विचार अब दूर की कौड़ी नहीं रहना चाहिए।
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