सिर्फ शराब नहीं, अब दवा भी सड़क सुरक्षा का सवालदक्षिण कोरिया में 2 अप्रैल 2026 से शुरू हुई ‘ड्रग्ड ड्राइविंग’ या कहें दवा/नशीले पदार्थ के प्रभाव में वाहन चलाने के खिलाफ पहली विशेष पुलिस कार्रवाई ने एक बेहद महत्वपूर्ण बहस को केंद्र में ला दिया है। अब तक दुनिया भर में सड़क सुरक्षा पर चर्चा का बड़ा हिस्सा शराब पीकर गाड़ी चलाने पर केंद्रित रहा है, लेकिन कोरिया का यह कदम बता रहा है कि खतरा सिर्फ शराब तक सीमित नहीं है। नींद की गोलियां, एंग्जायटी कम करने वाली दवाएं, कुछ दर्दनिवारक, एलर्जी की दवाएं, सर्दी-जुकाम की दवाएं, और अवैध नशीले पदार्थ—ये सब अलग-अलग स्तर पर ड्राइविंग क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं।यह बात भारतीय पाठकों के लिए भी बहुत प्रासंगिक है। हमारे यहां लोग अकसर कहते हैं—‘बस हल्की-सी दवा ली है’, ‘रोज की दवा है’, ‘थोड़ी नींद आ रही है लेकिन घर तो पास ही है’। यही ढिलाई कई बार हादसे की वजह बनती है। जिस तरह हमने दशकों में धीरे-धीरे यह सामाजिक समझ विकसित की कि शराब पीकर वाहन चलाना अपराध ही नहीं, सामाजिक गैर-जिम्मेदारी भी है, उसी तरह अब यह समझ बनाने की जरूरत है कि कुछ दवाओं के सेवन के बाद ड्राइविंग भी उतनी ही खतरनाक हो सकती है।कोरिया की इस विशेष कार्रवाई का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह सिर्फ अपराधियों, मादक पदार्थ तस्करों या अवैध नशे का सेवन करने वालों की समस्या नहीं बताती। यह आम नागरिक की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा प्रश्न है। यदि कोई व्यक्ति डॉक्टर के पर्चे पर दवा ले रहा है, तब भी वह सड़क पर खतरा बन सकता है—यह बात सुनने में कठोर लग सकती है, लेकिन सार्वजनिक सुरक्षा के नजरिये से यह सच्चाई है।भारतीय संदर्भ में इसे ऐसे समझिए: जैसे त्योहारों के समय, शादी-ब्याह के मौसम में या देर रात लंबी हाईवे ड्राइव के दौरान थकान को लोग गंभीरता से नहीं लेते, वैसे ही दवाओं के असर को भी अक्सर हल्के में लिया जाता है। लेकिन ड्राइविंग एक ऐसा काम है जिसमें कुछ सेकंड की प्रतिक्रिया-देरी भी जानलेवा साबित हो सकती है। सड़क पर ट्रक, बस, दोपहिया, पैदल यात्री, ऑटो, गाय-बछड़े, अचानक यू-टर्न, खराब रोशनी और भीड़भाड़—इन सबके बीच गाड़ी चलाना पहले ही कठिन है। अगर उसके ऊपर नींद, चक्कर, धुंधली नजर या धीमी प्रतिक्रिया जुड़ जाए, तो दुर्घटना का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।कोरिया की कार्रवाई दरअसल एक कानून-व्यवस्था का कदम भर नहीं है; यह आधुनिक समाजों के सामने खड़े एक नए सार्वजनिक प्रश्न की घोषणा है—क्या हम दवा लेते समय यह सोचते हैं कि उसके बाद वाहन चलाना सुरक्षित है या नहीं? और यदि नहीं सोचते, तो क्या सिर्फ पुलिस कार्रवाई से यह आदत बदलेगी? यही प्रश्न भारत में भी समय रहते पूछा जाना चाहिए।कोरिया की कार्रवाई का असली संदेश क्या हैकोरियाई रिपोर्टों के अनुसार इस विशेष अभियान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि केवल दवा लेने का तथ्य अपने आप में अपराध सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा रहा। असली सवाल यह है कि क्या चालक उस समय वाहन चलाने की स्थिति में था या नहीं। यही वह बिंदु है जहां दवा-प्रभावित ड्राइविंग, शराब पीकर ड्राइविंग से अधिक जटिल हो जाती है। शराब के मामले में रक्त में अल्कोहल की मात्रा एक अपेक्षाकृत स्पष्ट मानक उपलब्ध कराती है। लेकिन दवाओं के मामले में एक ही पदार्थ अलग-अलग लोगों पर अलग असर डाल सकता है।मसलन, किसी व्यक्ति को हल्की एलर्जी की दवा खाने के बाद सिर्फ थोड़ा उनींदापन महसूस हो सकता है, जबकि दूसरे व्यक्ति में वही दवा निर्णय क्षमता, एकाग्रता और प्रतिक्रिया गति पर गंभीर असर डाल सकती है। यही फर्क उम्र, शरीर की बनावट, बीमारी के इतिहास, साथ में ली जा रही दूसरी दवाओं, नींद की कमी और यहां तक कि पिछले भोजन पर भी निर्भर कर सकता है। इसीलिए कोरिया में पुलिस और न्यायिक व्यवस्था के सामने चुनौती सिर्फ यह नहीं है कि कौन-सी दवा ली गई, बल्कि यह साबित करना भी है कि उसका ड्राइविंग पर क्या वास्तविक असर पड़ा।यह मॉडल भारत के लिए भी शिक्षाप्रद है। हमारे यहां सड़क सुरक्षा कानूनों में शराब और कुछ स्पष्ट अपराधों के लिए व्यवस्था अपेक्षाकृत मजबूत है, लेकिन दवा के असर में ड्राइविंग का प्रश्न आम जनचर्चा में बहुत कम दिखाई देता है। फार्मेसी से खरीदी जाने वाली कई दवाएं ‘नींद ला सकती हैं’, ‘मशीनरी न चलाएं’, ‘वाहन न चलाएं’ जैसी चेतावनियों के साथ आती हैं, लेकिन आम उपभोक्ता या तो इन्हें पढ़ता नहीं, या गंभीरता से नहीं लेता।कोरिया के मामले में विशेष कार्रवाई का एक सामाजिक महत्व भी है। यह लोगों को संकेत देती है कि सड़क पर जोखिम सिर्फ नशेबाज या गैर-कानूनी गतिविधियों में शामिल लोगों से नहीं, बल्कि सामान्य जीवन की ‘कानूनी’ दवाओं से भी पैदा हो सकता है। यह बात उतनी ही असहज है जितनी जरूरी। क्योंकि जब कोई समस्या केवल अपराधियों तक सीमित दिखाई देती है, तब आम जनता उससे दूरी बना लेती है; लेकिन जब वही समस्या सर्दी-जुकाम, अनिद्रा, दर्द, चिंता या एलर्जी की दवा तक पहुंचती है, तब यह सार्वजनिक स्वास्थ्य और रोजमर्रा की आदतों का मामला बन जाती है।कोरिया की कार्रवाई को वहां की बदलती सामाजिक संरचना से जोड़कर भी देखना चाहिए। दक्षिण कोरिया एक अत्यंत शहरीकृत, तेज-रफ्तार, काम-केंद्रित समाज है जहां देर रात काम, तनाव, प्रतिस्पर्धा और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर गंभीर चर्चा बढ़ी है। ऐसे माहौल में नींद की दवाएं, एंग्जायटी से जुड़ी दवाएं या उपचारात्मक औषधियों का इस्तेमाल असामान्य नहीं है। इसलिए वहां दवा-प्रभावित ड्राइविंग की बहस केवल पुलिस की कार्रवाई नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, श्रम-संस्कृति और सार्वजनिक सुरक्षा के संगम पर खड़ी बहस है। भारत में भी महानगरों—दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, गुरुग्राम, हैदराबाद—में यही तनावपूर्ण जीवनशैली तेजी से बढ़ रही है। इसलिए यह विषय हमारे लिए दूर का नहीं है।शराब से ज्यादा जटिल क्यों है ‘दवा लेकर ड्राइविंग’पहली नजर में लग सकता है कि यदि शराब पीकर गाड़ी चलाना मापा जा सकता है, तो दवाओं के असर को भी उसी तरह मापा जा सकता होगा। लेकिन वास्तविकता कहीं अधिक उलझी हुई है। शराब के मामले में वैज्ञानिक और कानूनी मानक अपेक्षाकृत स्पष्ट हैं। पुलिस के पास ब्रेथ एनालाइजर जैसे उपकरण होते हैं, और न्यायिक प्रक्रिया में एक परिभाषित सीमा का महत्व होता है। दवाओं के मामले में ऐसी सरलता नहीं है। यहां पदार्थों की संख्या बहुत अधिक है, और उनका असर सीधा, एक-सा और पूर्वानुमेय नहीं होता।किसी नींद की गोली, एंटी-एंग्जायटी दवा या दर्दनिवारक की थोड़ी मात्रा एक व्यक्ति को मामूली सुस्ती दे सकती है, तो किसी दूसरे व्यक्ति में वही दवा भ्रम, धीमी प्रतिक्रिया, चक्कर या दृश्य धुंधलापन पैदा कर सकती है। यदि किसी ने दो दवाएं एक साथ ली हों, ऊपर से पिछली रात नींद कम ली हो, या साथ में शराब का हल्का सेवन किया हो, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है। यही कारण है कि दवा-प्रभावित ड्राइविंग की जांच में केवल ‘दवा मिली या नहीं’ काफी नहीं होता। जांच एजेंसियों को चालक के व्यवहार, गाड़ी की लेन बनाए रखने की क्षमता, सिग्नल पर प्रतिक्रिया, बोलचाल, शारीरिक संतुलन, आंखों की स्थिति और दुर्घटना की परिस्थितियों जैसे अनेक संकेत देखने पड़ते हैं।इससे कानून लागू करने वालों के सामने दोहरी चुनौती खड़ी होती है। एक ओर अगर मानक बहुत कठोर रखे जाएं तो इलाज करा रहे सामान्य लोग अनावश्यक रूप से निशाने पर आ सकते हैं; दूसरी ओर यदि मानक बहुत ढीले हों, तो वास्तविक खतरे को रोका नहीं जा सकेगा। यही संतुलन सबसे कठिन है। कोरिया की विशेष कार्रवाई इस जटिलता को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करती दिखती है।भारत में भी यह जटिलता कम नहीं होगी, बल्कि शायद अधिक होगी। हमारे यहां स्व-औषधि सेवन यानी बिना डॉक्टर की सलाह दवा लेना बहुत आम है। सर्दी-जुकाम हो तो सीधे मेडिकल स्टोर से दवा, पीठ दर्द हो तो दर्दनिवारक, नींद न आए तो किसी परिचित की सलाह पर गोली, एलर्जी हो तो एंटीहिस्टामिन—ये सब परिचित दृश्य हैं। ग्रामीण इलाकों और छोटे शहरों में तो कई बार दवा का सेवन बिना पर्याप्त सलाह या बिना दुष्प्रभाव समझे किया जाता है। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति वाहन चलाता है, तो जोखिम केवल कानून का नहीं, बल्कि जागरूकता की कमी का भी है।दूसरी बड़ी समस्या प्रमाण की है। दवा का असर समय के साथ बदल सकता है। घटना के कई घंटे बाद की गई जांच हमेशा उस क्षण की वास्तविक स्थिति नहीं बता पाती। इसलिए पुलिस, डॉक्टर, फॉरेंसिक विशेषज्ञ और न्यायपालिका के बीच समन्वय बेहद जरूरी हो जाता है। यही कारण है कि केवल सख्त नारा—‘दवा लेकर ड्राइविंग बंद करो’—पर्याप्त नहीं है। जरूरत है स्पष्ट प्रोटोकॉल, प्रशिक्षण, मेडिकल सलाह प्रणाली और जनता में व्यवहारगत बदलाव की।यह भी याद रखने योग्य है कि सड़क सुरक्षा में कानून का उद्देश्य सिर्फ सजा देना नहीं, बल्कि जोखिम को पहले ही रोकना होना चाहिए। शराब के खिलाफ सामाजिक चेतना तैयार होने में भी वर्षों लगे। फिल्मों, अभियानों, पुलिस की कार्रवाइयों और मीडिया रिपोर्टिंग ने मिलकर यह माहौल बनाया कि ‘ड्रिंक एंड ड्राइव’ शर्मनाक और खतरनाक है। दवा-प्रभावित ड्राइविंग को लेकर भी ऐसी ही दीर्घकालिक सामाजिक प्रक्रिया की आवश्यकता होगी।रोजमर्रा की दवाएं कैसे बन सकती हैं सड़क पर खतरासामान्य धारणा यह है कि ‘ड्रग ड्राइविंग’ का मतलब अवैध नशे—जैसे मादक पदार्थ—के सेवन के बाद वाहन चलाना है। लेकिन कोरिया की बहस ने इस धारणा को तोड़ा है। असल जोखिम उन दवाओं में भी हो सकता है जो डॉक्टर के पर्चे पर ली जाती हैं या मेडिकल स्टोर से सामान्य रूप से खरीदी जाती हैं। उदाहरण के तौर पर नींद लाने वाली दवाएं, चिंता कम करने वाली दवाएं, कुछ एंटीहिस्टामिन, तेज दर्द की दवाएं, मांसपेशियों को ढीला करने वाली दवाएं, और कुछ सर्दी-जुकाम की दवाएं व्यक्ति को उनींदा, सुस्त या कम सतर्क बना सकती हैं।भारतीय परिवारों में यह स्थिति बहुत आम है। घर में किसी को बुखार है, किसी को माइग्रेन, किसी को एलर्जी, किसी को स्लीप डिसऑर्डर। ऐसे में दवाएं जीवन का हिस्सा हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम दवा लेते समय यह देखते हैं कि उसके बाद बाइक, स्कूटर, कार या यहां तक कि ई-रिक्शा और ट्रैक्टर तक चलाना सुरक्षित है या नहीं? ग्रामीण भारत में खेतों से मंडी तक ट्रैक्टर चलाने वाले, छोटे शहरों में रात की बस चलाने वाले, महानगरों में कैब ड्राइवर, डिलीवरी एजेंट, ट्रक चालक—इन सबके लिए यह मुद्दा बेहद गंभीर है।विशेष चिंता उन लोगों के लिए है जो कई दवाएं एक साथ लेते हैं। बुजुर्गों में मधुमेह, रक्तचाप, हृदय रोग, अनिद्रा, गठिया, चिंता या अवसाद जैसी स्थितियों के कारण अनेक दवाओं का सेवन सामान्य है। कई दवाओं की पारस्परिक क्रिया यानी इंटरैक्शन ऐसा असर पैदा कर सकती है जिसे व्यक्ति खुद भी तुरंत पहचान न पाए। ऊपर से यदि नींद कम हुई हो, भोजन समय पर न हुआ हो, या शरीर पहले से कमजोर हो, तो प्रभाव और बढ़ सकता है।भारत तेजी से वृद्ध समाज की ओर बढ़ रहा है। शहरी मध्यवर्ग और उच्चवर्ग में नियमित दवा-सेवन बढ़ा है, वहीं छोटे शहरों और कस्बों में भी दवाओं की उपलब्धता पहले से कहीं अधिक है। ऐसे में यह मान लेना कि ‘दवा तो इलाज के लिए है, इसलिए उससे खतरा कैसे हो सकता है’—एक बहुत खतरनाक सरलता होगी। इलाज और सड़क सुरक्षा दोनों साथ-साथ सोचने होंगे।एक और महत्वपूर्ण आयाम है पेशेवर दबाव। कई लोग बीमारी या दवा के असर के बावजूद वाहन इसलिए चलाते हैं क्योंकि नौकरी पर जाना है, बच्चों को स्कूल छोड़ना है, अस्पताल पहुंचना है, डिलीवरी करनी है, या लंबा ट्रांसपोर्ट शेड्यूल पूरा करना है। भारतीय कार्य-संस्कृति में ‘किसी भी हालत में काम’ को अक्सर जिम्मेदारी माना जाता है। लेकिन सड़क पर यही मानसिकता जोखिम बन सकती है। जैसे हम बुखार में भी ऑफिस पहुंचने को समर्पण समझ लेते थे और कोविड के बाद जाकर समझा कि बीमार होकर बाहर निकलना दूसरों को भी खतरे में डाल सकता है, वैसे ही दवा के असर में ड्राइविंग के बारे में भी सोच बदलनी होगी।कोरिया की बहस का यही सबसे मानवीय पक्ष है: यह किसी व्यक्ति को अपराधी घोषित करने से पहले समाज को यह याद दिलाती है कि साधारण इलाज और सार्वजनिक खतरा कभी-कभी एक ही बिंदु पर आकर मिल सकते हैं। इसीलिए नागरिकों के लिए मूल सिद्धांत सरल होना चाहिए—यदि दवा लेने के बाद जरा भी नींद, चक्कर, सुस्ती, आंखों में भारीपन, भ्रम, प्रतिक्रिया-देरी या कमजोरी महसूस हो, तो वाहन चलाना टालें।सिर्फ पुलिस कार्रवाई से समस्या हल नहीं होगीकिसी भी विशेष अभियान की खबर आते ही आम तौर पर दो प्रतिक्रियाएं सामने आती हैं। पहली—बहुत अच्छा, सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। दूसरी—इससे आम लोगों को परेशान किया जाएगा। दवा-प्रभावित ड्राइविंग के मामले में दोनों प्रतिक्रियाओं में कुछ सचाई है, लेकिन दोनों अधूरी हैं। सख्त कार्रवाई जरूरी हो सकती है, पर अकेले उससे समस्या का समाधान नहीं होगा। क्योंकि यह अपराध-नियंत्रण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच की समस्या है।कोरिया की स्थिति दिखाती है कि सड़क पर मौके पर ही चालक की स्थिति पहचानना आसान नहीं है। हर बार बाहरी लक्षण स्पष्ट नहीं होंगे। कोई व्यक्ति सामान्य बातचीत करता दिख सकता है, लेकिन उसकी प्रतिक्रिया समय प्रभावित हो सकती है। कोई चालक शराबी की तरह डगमगाता नहीं दिखेगा, पर उसका ध्यान भटक रहा हो सकता है। ऐसे में पुलिसकर्मियों को विशेष प्रशिक्षण, मानकीकृत अवलोकन पद्धति और मेडिकल सलाह तंत्र की आवश्यकता होगी।भारत में यह चुनौती और अधिक होगी क्योंकि यहां यातायात का दबाव ज्यादा है, वाहन विविध प्रकार के हैं, प्रवर्तन ढांचा असमान है, और कई राज्यों में पुलिस बल पहले से ही भारी बोझ में काम कर रहा है। यदि दवा-प्रभावित ड्राइविंग को गंभीरता से लेना है, तो केवल अभियान चलाना पर्याप्त नहीं होगा। पुलिस, परिवहन विभाग, स्वास्थ्य मंत्रालय, अस्पताल, फार्मासिस्ट निकाय, सड़क सुरक्षा विशेषज्ञ और न्यायिक संस्थानों के बीच समन्वय आवश्यक होगा।एक दूसरी समस्या सबूत की है। यदि दुर्घटना हो जाती है, तो यह सिद्ध करना कि दवा का सेवन और दुर्घटना के बीच सीधा संबंध था, कई बार आसान नहीं होगा। कई कारक साथ मौजूद हो सकते हैं—थकान, तेज रफ्तार, खराब सड़क, मोबाइल फोन का इस्तेमाल, मौसम, वाहन की तकनीकी खराबी। इसलिए यदि नीति बनाई जाती है, तो उसे वैज्ञानिक और न्यायसंगत होना होगा ताकि न तो वास्तविक दोषी बच निकलें और न ही सामान्य मरीज अनावश्यक कानूनी उलझनों में फंसें।इस पूरे प्रश्न का तीसरा और शायद सबसे बड़ा आयाम सामाजिक मानसिकता है। आज भी बहुत से लोग मानते हैं कि ‘मैं संभाल लूंगा’, ‘मैं तो रोज यह दवा लेता हूं’, ‘बस पांच किलोमीटर ही तो जाना है’, ‘धीरे चलाऊंगा’। यही आत्मविश्वास कई बार भ्रम साबित होता है। सड़क पर दुर्घटना हमेशा लंबी दूरी, तेज रफ्तार या नशे की चरम अवस्था में ही नहीं होती; कई बार घर से कुछ ही मिनट दूर, परिचित रास्ते पर, एक छोटी-सी प्रतिक्रिया-देरी के कारण भी हो जाती है।इसलिए इस मुद्दे पर सफलता का पैमाना केवल पकड़े गए लोगों की संख्या नहीं होना चाहिए। असली सफलता तब होगी जब लोग वाहन चलाने से पहले दवा के प्रभाव के बारे में स्वाभाविक रूप से सोचने लगें, जैसे आज कई जिम्मेदार लोग पार्टी के बाद कैब लेना बेहतर मानते हैं। व्यवहार में यही बदलाव स्थायी सुरक्षा देता है।अस्पताल, डॉक्टर और मेडिकल स्टोर की भूमिका सबसे अहमयदि कोई नागरिक पहली बार किसी ऐसी दवा के संपर्क में आता है जो नींद, चक्कर, दृष्टि धुंधलापन या प्रतिक्रिया-धीमापन पैदा कर सकती है, तो उसका पहला संपर्क बिंदु पुलिस नहीं, बल्कि डॉक्टर और फार्मासिस्ट होते हैं। इसलिए इस मुद्दे का वास्तविक समाधान चिकित्सा व्यवस्था से शुरू होता है। कोरिया में उठी बहस का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही है कि दवा के पैकेट पर छोटा-सा चेतावनी वाक्य लिख देना पर्याप्त नहीं है। लोगों को स्पष्ट, सरल और व्यवहारिक तरीके से बताया जाना चाहिए कि दवा लेने के बाद क्या सावधानी रखनी है।भारत में भी प्रिस्क्रिप्शन समझाने की संस्कृति अभी सीमित है। बड़ी संख्या में मरीज डॉक्टर के पास कम समय में परामर्श लेते हैं, पर्चा हाथ में लेकर निकलते हैं और फिर मेडिकल स्टोर पर दवा ले लेते हैं। कई बार उन्हें दुष्प्रभाव, समय, भोजन के साथ संबंध, और वाहन चलाने पर असर जैसी बातों की विस्तृत जानकारी नहीं मिलती। फार्मेसी काउंटर पर भी भीड़, समय की कमी और व्यावसायिक दबाव के कारण सलाह औपचारिक रह जाती है।यहां सुधार की भारी गुंजाइश है। उदाहरण के लिए जिन दवाओं से नींद या प्रतिक्रिया क्षमता प्रभावित हो सकती है, उन पर बड़े, रंगीन, स्पष्ट चिह्न हों। डॉक्टर पर्चे पर साधारण भाषा में लिखें—‘दवा लेने के बाद वाहन न चलाएं’ या ‘पहली खुराक के बाद प्रभाव समझे बिना बाइक/कार न चलाएं’। फार्मासिस्ट मरीज से एक वाक्य जरूर पूछें—‘क्या आप आज वाहन चलाने वाले हैं?’ पेशेवर ड्राइवरों, बुजुर्गों, रात्रि-शिफ्ट कर्मचारियों और कई दवाएं लेने वाले मरीजों के लिए विशेष सलाह अनिवार्य की जा सकती है।भारत में जनस्वास्थ्य अभियानों की ताकत हमने पोलियो, टीकाकरण, स्वच्छता, कोविड और सीटबेल्ट-हेलमेट अभियान में देखी है। यदि सड़क सुरक्षा प्राधिकरण, स्वास्थ्य मंत्रालय और राज्य सरकारें मिलकर यह संदेश चलाएं कि ‘दवा पढ़ो, असर समझो, तभी वाहन चलाओ’, तो कुछ ही वर्षों में सार्वजनिक व्यवहार बदला जा सकता है। टेलीविजन विज्ञापन, रेडियो संदेश, टोल प्लाजा डिस्प्ले, फार्मेसी पोस्टर, कैब-एग्रीगेटर ऐप अलर्ट, यहां तक कि ई-फार्मेसी प्लेटफॉर्म पर चेतावनी संदेश—इन सबका समेकित इस्तेमाल किया जा सकता है।कोरिया की कार्रवाई का एक सबक यह भी है कि सड़क सुरक्षा को केवल ट्रैफिक नियम का मामला नहीं समझना चाहिए। यह स्वास्थ्य-साक्षरता का भी प्रश्न है। यदि मरीज को दवा की प्रकृति ही समझ में न आए, तो वह सुरक्षित निर्णय कैसे लेगा? इसलिए डॉक्टर, फार्मासिस्ट और सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र इस बहस के केंद्र में होने चाहिए, हाशिये पर नहीं।भारत के लिए सबक: कानून से पहले आदत बदलनी होगीदक्षिण कोरिया में शुरू हुई यह विशेष कार्रवाई भले वहां की पुलिस व्यवस्था से जुड़ी खबर हो, लेकिन इसका संदेश सार्वभौमिक है। आधुनिक समाजों में दवा का उपयोग बढ़ेगा, मानसिक स्वास्थ्य पर चर्चा बढ़ेगी, अनिद्रा और तनाव से जुड़ी समस्याएं बढ़ेंगी, बुजुर्ग आबादी बढ़ेगी, और इसके साथ-साथ ऐसी स्थितियां भी बढ़ेंगी जिनमें उपचार और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना होगा। भारत भी इसी दिशा में बढ़ रहा है।हमारे यहां सड़क सुरक्षा पहले से ही गंभीर चुनौती है। राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों पर हादसे, शहरी सड़कों पर अव्यवस्था, दोपहिया वाहनों की अधिक संख्या, तेज रफ्तार, नियमों का ढीला पालन और आपात चिकित्सा तक पहुंच की असमानता—ये सब मिलकर दुर्घटना को और घातक बना देते हैं। ऐसे में यदि दवा के असर का प्रश्न भी जोड़ा जाए, तो यह विषय और गंभीर हो जाता है।भारत के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि इसे नैतिक घबराहट या दंडात्मक अतिरेक में न बदला जाए। हर दवा लेने वाला व्यक्ति संदिग्ध नहीं है, और हर उनींदा दिखने वाला चालक अपराधी नहीं। लेकिन उतना ही सच यह भी है कि जोखिम वास्तविक है और उसे नजरअंदाज करना गैर-जिम्मेदारी होगी। इसलिए संतुलित नीति चाहिए—स्पष्ट चिकित्सा सलाह, सार्वजनिक जागरूकता, सीमित लेकिन वैज्ञानिक प्रवर्तन, और न्यायसंगत जांच प्रक्रिया।सामाजिक स्तर पर हमें वही बदलाव चाहिए जो शराब पीकर ड्राइविंग के मामले में धीरे-धीरे आया। जैसे आज शहरी भारत में बहुत से लोग पार्टी के बाद ‘डिजाइनेटेड ड्राइवर’, कैब, मेट्रो या ड्राइवर सेवा का विकल्प चुनते हैं, वैसे ही दवा के बाद भी वैकल्पिक यात्रा की संस्कृति विकसित करनी होगी। यदि सर्दी की दवा ली है, नींद की गोली ली है, तेज दर्द की दवा ली है या नई दवा शुरू की है, तो परिवार का कोई सदस्य गाड़ी चलाए, कैब लें, सार्वजनिक परिवहन लें, या यात्रा स्थगित करें। यह कमजोरी नहीं, जिम्मेदारी है।भारतीय परिवारों में सामूहिक निर्णय की संस्कृति अभी भी मजबूत है। यह हमारी ताकत बन सकती है। जैसे घर में कोई बुजुर्ग दवा लेने के बाद मंदिर, बाजार या डॉक्टर के पास जाना चाहते हों, तो परिवार पूछे—‘क्या अभी ड्राइव करना ठीक रहेगा?’ जैसे किसी बच्चे को बुखार हो तो माता-पिता दवा की खुराक देखते हैं, वैसे ही वयस्कों के लिए भी ‘दवा और ड्राइविंग’ की जांच सामान्य आदत बननी चाहिए।अंततः कोरिया की यह खबर हमें एक सरल लेकिन गहरी बात याद दिलाती है: सड़क पर सुरक्षा सिर्फ नियमों से नहीं, आत्म-जागरूकता से भी आती है। सीटबेल्ट बांधना, हेलमेट पहनना, शराब से बचना—ये सब अब अपेक्षाकृत स्थापित बातें हैं। अगला कदम यह हो सकता है कि हम दवा लेने के बाद खुद से पूछें—क्या मैं सचमुच वाहन चलाने की स्थिति में हूं? यदि इस एक प्रश्न की आदत समाज में बन गई, तो शायद कई दुर्घटनाएं होने से पहले ही रुक जाएंगी। और किसी भी अच्छी नीति का अंतिम लक्ष्य यही होना चाहिए—सजा नहीं, जान बचाना।
Source: Original Korean article - Trendy News Korea
0 टिप्पणियाँ