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सोशल मीडिया पर फैलता ‘ओडी पार्टी’ ट्रेंड: कोरिया की चेतावनी, भारत के लिए भी गंभीर सबक

सोशल मीडिया पर फैलता ‘ओडी पार्टी’ ट्रेंड: कोरिया की चेतावनी, भारत के लिए भी गंभीर सबक

दवा, नशा और डिजिटल दिखावा: दक्षिण कोरिया से आई एक बेचैन कर देने वाली खबर

दक्षिण कोरिया से आई हालिया स्वास्थ्य चेतावनी केवल वहां के किशोरों या वहां की डिजिटल संस्कृति तक सीमित मामला नहीं है। यह ऐसी खबर है जिसे भारत के माता-पिता, शिक्षक, डॉक्टर, फार्मासिस्ट और नीति-निर्माता भी गंभीरता से पढ़ें। कोरिया में विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि किशोरों के बीच सोशल मीडिया पर एक खतरनाक प्रवृत्ति फैल रही है, जिसे कुछ जगहों पर ‘ओडी पार्टी’ यानी ‘ओवरडोज पार्टी’ कहा जा रहा है। इसमें सर्दी-जुकाम की दवा, नींद लाने वाली दवाएं या अन्य सामान्य ओवर-द-काउंटर दवाओं को एक साथ या जरूरत से अधिक मात्रा में लेकर उसके बाद के अनुभव—जैसे चक्कर, सुस्ती, भ्रम, यहां तक कि मतिभ्रम—को सोशल मीडिया पर साझा किया जा रहा है।

पहली नजर में यह किसी इंटरनेट ट्रेंड की तरह लग सकता है, जैसा कि पहले भी दुनियाभर में कई खतरनाक ऑनलाइन चुनौतियां सामने आती रही हैं। लेकिन इस मामले की गंभीरता यहां है कि इसमें अवैध ड्रग्स नहीं, बल्कि ऐसी दवाएं शामिल हैं जो फार्मेसी या मेडिकल स्टोर पर अपेक्षाकृत आसानी से मिल जाती हैं। यानी जो चीजें आमतौर पर घर के फर्स्ट-एड बॉक्स, रसोई की अलमारी, या मोहल्ले की केमिस्ट दुकान में मिल जाती हैं, वही अचानक जोखिम भरे प्रयोग का माध्यम बन रही हैं।

भारतीय संदर्भ में सोचिए—हमारे यहां बुखार, सर्दी, खांसी, एलर्जी, दर्द या नींद न आने पर लोग अक्सर बिना ज्यादा हिचक के दवा ले लेते हैं। परिवारों में भी कई बार पुरानी दवाएं संभालकर रख दी जाती हैं—‘काम आ जाएंगी’ सोचकर। यही सामान्यता असली खतरा बन सकती है। क्योंकि जब कोई किशोर यह मानने लगे कि मेडिकल स्टोर पर मिलने वाली दवा ‘सेफ’ ही होगी, तब वह उसके दुरुपयोग के खतरे को समझ नहीं पाता। कोरिया की यह खबर दरअसल उस भ्रम को तोड़ती है कि केवल गैरकानूनी नशीले पदार्थ ही नुकसानदेह होते हैं।

यह कहानी दवा की नहीं, दवा को लेकर बदलती सामाजिक मानसिकता की भी है। इलाज के लिए बनी चीज को ‘अनुभव’, ‘थ्रिल’, ‘कंटेंट’ या ‘कूल’ दिखने के साधन में बदल देना आधुनिक डिजिटल संस्कृति की एक खतरनाक दिशा है। और यही कारण है कि यह खबर भारतीय परिवारों के लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी कोरिया के लिए।

‘ओडी पार्टी’ शब्द क्यों खतरनाक है: भाषा कैसे जोखिम को हल्का बना देती है

किसी भी सामाजिक समस्या को समझने में भाषा की भूमिका बहुत बड़ी होती है। ‘ओवरडोज’ अपने आप में एक चिकित्सकीय, गंभीर और चेतावनी देने वाला शब्द है। लेकिन जब उसके साथ ‘पार्टी’ जोड़ा जाता है, तो अर्थ बदलने लगता है। अचानक वही व्यवहार, जो मूल रूप से जोखिम, बीमारी या आपात स्थिति का संकेत होना चाहिए, एक साझा अनुभव, मनोरंजन या समूह गतिविधि की तरह सुनाई देने लगता है।

कोरिया में विशेषज्ञों की चिंता का एक बड़ा कारण यही है कि सोशल मीडिया पर इस तरह के व्यवहार को अनुभव-कथा की शैली में साझा किया जा रहा है—जैसे किसी ने कोई नया फूड ट्रेंड आजमाया हो, कोई नया डांस चैलेंज किया हो या किसी फैशन लुक की रील बनाई हो। यह पैटर्न नया नहीं है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कोई चीज जितनी ज्यादा छोटी, तेज, सनसनीखेज और भावनात्मक होगी, उतनी तेजी से फैलती है। समस्या यह है कि स्वास्थ्य संबंधी सावधानियां आमतौर पर धीमी, तथ्यात्मक और लंबी होती हैं। इसलिए जोखिम का मनोरंजक पैकेज, चेतावनी के संदेश पर भारी पड़ जाता है।

भारतीय सोशल मीडिया भी इस प्रवृत्ति से अछूता नहीं है। यहां भी ‘चैलेंज’, ‘ट्रेंड’, ‘रिएक्शन’, ‘पहले और बाद में’, ‘मैंने ट्राय किया’ जैसी भाषा रोजमर्रा की डिजिटल संस्कृति का हिस्सा बन चुकी है। युवा दर्शक किसी वीडियो को हमेशा उसकी चिकित्सकीय सच्चाई के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी वायरल अपील के आधार पर देखते हैं। यदि कोई किशोर किसी पोस्ट में यह देखता है कि सामान्य दवाएं लेकर ‘अजीब अनुभव’ हासिल किए जा सकते हैं, तो वह इसे जिज्ञासा या साहस की परीक्षा समझ सकता है।

यहां समझने की जरूरत है कि हर वायरल चीज सांस्कृतिक रूप से निरापद नहीं होती। जैसे कभी-कभी फिल्मों, वेब सीरीज या पॉप कल्चर में ‘बागी’ या ‘सीमा तोड़ने वाले’ व्यवहार को ग्लैमराइज किया जाता है, वैसे ही सोशल मीडिया भी सामान्य सीमाओं को पार करने के अनुभव को आकर्षक बना सकता है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां दर्शक केवल देख नहीं रहा, वह दोहराने की स्थिति में भी है। और यही इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य का मामला बना देता है।

किशोरावस्था वह दौर है जब जिज्ञासा, साथियों का दबाव, पहचान बनाने की इच्छा और जोखिम लेने की प्रवृत्ति एक साथ काम करती है। यदि भाषा खतरे को ‘मस्ती’ जैसा रूप दे दे, तो रोकथाम और कठिन हो जाती है। इसलिए कोरिया की यह बहस हमें यह भी सिखाती है कि रोकथाम की शुरुआत केवल दवा नियंत्रण से नहीं, बल्कि उस शब्दावली को चुनौती देने से भी होती है जो नुकसानदेह व्यवहार को हल्का, फैशनेबल या सामूहिक बना देती है।

आम दवाएं ज्यादा संवेदनशील मुद्दा क्यों हैं: ‘ओटीसी’ का मतलब ‘निर्दोष’ नहीं

इस मामले का सबसे चिंताजनक पक्ष यह है कि जिन दवाओं का उल्लेख किया जा रहा है, वे आमतौर पर ‘ओवर-द-काउंटर’ श्रेणी में आती हैं। यानी कई जगहों पर वे बिना सख्त पर्चे के भी उपलब्ध हो सकती हैं, या कम से कम लोग उन्हें सामान्य घरेलू दवाओं के रूप में पहचानते हैं। कोरिया की चेतावनी इसी बिंदु पर सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है—क्योंकि खतरा किसी रहस्यमय, कठिन-से-मिलने वाले पदार्थ से नहीं, बल्कि परिचित दवा से पैदा हो रहा है।

भारत में भी यही स्थिति कई स्तरों पर दिखाई देती है। लोग अक्सर यह मान लेते हैं कि यदि कोई दवा खुलेआम बिक रही है, तो उसका गलत इस्तेमाल भी उतना खतरनाक नहीं होगा। यही सोच भ्रामक है। किसी भी दवा का सुरक्षित होना उसके उद्देश्य, मात्रा, समय, शारीरिक स्थिति और चिकित्सकीय सलाह पर निर्भर करता है। वही दवा जो उचित मात्रा में आराम देती है, गलत मात्रा में शरीर के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।

उदाहरण के लिए, सर्दी-जुकाम की कई दवाओं में ऐसे तत्व हो सकते हैं जो उनींदापन, हृदयगति में बदलाव, बेचैनी, भ्रम या अन्य दुष्प्रभाव पैदा करें—खासकर तब जब उन्हें अनुशंसित सीमा से अधिक लिया जाए या दूसरी दवाओं के साथ मिलाया जाए। इसी तरह नींद लाने वाली दवाओं का अनियंत्रित इस्तेमाल तंत्रिका तंत्र, सांस लेने की प्रक्रिया, मानसिक संतुलन और आपातकालीन स्वास्थ्य स्थितियों पर असर डाल सकता है। किसी किशोर के लिए, जिसका शरीर अभी विकासशील अवस्था में है, यह जोखिम और बढ़ जाता है।

भारत में घरों में रखी ‘सामान्य दवाएं’ अक्सर बिना सूची, बिना निगरानी और बिना समाप्ति तिथि देखे लंबे समय तक पड़ी रहती हैं। दादी के नुस्खे, पड़ोसी की सलाह, मेडिकल स्टोर वाले की तात्कालिक राय और पुराने अनुभवों के आधार पर दवाओं का इस्तेमाल करना हमारी सामाजिक आदतों का हिस्सा रहा है। लेकिन डिजिटल दौर में वही दवाएं अब किसी ऑनलाइन प्रभाव, चुनौती या ट्रेंड की चपेट में आ सकती हैं।

यहीं यह समझना जरूरी है कि ‘आसानी से उपलब्ध’ होना किसी वस्तु को ‘जोखिम-मुक्त’ नहीं बनाता। हम रसोई में गैस सिलेंडर भी रखते हैं, लेकिन उसके उपयोग के नियम होते हैं। बिजली हर घर में है, पर उसके साथ सावधानी अनिवार्य है। उसी तरह दवा भी घर की सुविधा नहीं, जिम्मेदारी है। कोरिया की घटना हमें यही याद दिलाती है कि परिचित चीजें ही सबसे बड़ी लापरवाही का कारण बन सकती हैं, क्योंकि हम उनसे डरना छोड़ देते हैं।

सोशल मीडिया, किशोर मन और ‘कंटेंट’ की भूख: यह सिर्फ स्वास्थ्य नहीं, समाजशास्त्र का भी मामला है

यदि हम इस पूरे घटनाक्रम को केवल दवाओं के दुरुपयोग के रूप में देखें, तो तस्वीर अधूरी रह जाएगी। यह दरअसल किशोर मानसिकता, डिजिटल प्लेटफॉर्म की संरचना और सामाजिक मान्यता की भूख से जुड़ा मामला भी है। आज के किशोर केवल स्कूल, परिवार और दोस्तों की दुनिया में नहीं रहते; वे एक ऐसे डिजिटल मंच पर भी मौजूद हैं जहां दृश्यता ही शक्ति बन जाती है। लाइक, शेयर, कमेंट, व्यू और फॉलोअर केवल तकनीकी सूचकांक नहीं, बल्कि आत्म-मूल्यांकन के सामाजिक उपकरण बन चुके हैं।

ऐसे माहौल में किसी भी असामान्य अनुभव को ‘कहानी’ बनाकर पेश करने का दबाव बढ़ता है। जो अनुभव ज्यादा चौंकाने वाला होगा, उसके वायरल होने की संभावना भी ज्यादा होगी। यही वजह है कि कुछ युवा जोखिम भरे व्यवहार को व्यक्तिगत गलती नहीं, बल्कि पोस्ट करने योग्य सामग्री की तरह देखने लगते हैं। कोरिया में दवा के ओवरडोज के बाद होने वाली प्रतिक्रियाओं को सोशल मीडिया पर साझा करना इसी मानसिक संरचना की ओर इशारा करता है।

भारतीय पाठकों के लिए इसे समझना कठिन नहीं होना चाहिए। हमने पहले भी ऐसे कई ऑनलाइन ट्रेंड देखे हैं जिनमें लोग अपनी सुरक्षा की कीमत पर वीडियो बनाते हैं—चलती ट्रेन के पास रील, सड़क पर स्टंट, ऊंची इमारतों के किनारे सेल्फी, या खतरनाक ‘प्रैंक’। हर बार सवाल यही होता है: लोग ऐसा क्यों करते हैं? जवाब अक्सर एक ही दिशा में जाता है—दृश्यता, साथियों की स्वीकृति, अलग दिखने की चाह, और यह भ्रम कि मेरे साथ कुछ बुरा नहीं होगा।

किशोरावस्था में दिमाग का वह हिस्सा, जो दीर्घकालिक परिणामों का संतुलित आकलन करता है, अभी पूर्ण रूप से परिपक्व नहीं होता; जबकि जिज्ञासा, आवेग और सामूहिक प्रभाव बहुत मजबूत होते हैं। इसलिए यदि कोई जोखिमपूर्ण व्यवहार ‘समूह-स्वीकृत’ दिखने लगे, तो उसकी नकल की संभावना बढ़ जाती है। यही वजह है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थाओं की चिंता केवल दवा से नहीं, बल्कि उस प्रसार-तंत्र से है जो व्यक्तिगत नुकसान को सामूहिक ट्रेंड में बदल देता है।

इस समस्या को समझने के लिए हमें यह भी मानना होगा कि आज का किशोर केवल ‘समझ की कमी’ से प्रेरित नहीं होता। कई बार वह जानता है कि काम गलत है, फिर भी करता है—क्योंकि डिजिटल संस्कृति में ध्यान आकर्षित करना, सीमा लांघना और अलग दिखना एक सामाजिक मुद्रा बन चुका है। इसलिए समाधान केवल डराने से नहीं निकलेगा। संवाद, डिजिटल साक्षरता, मानसिक स्वास्थ्य समर्थन और पारिवारिक भरोसे की भूमिका यहां उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी कानून और निगरानी की।

भारत के लिए सबक: परिवार, स्कूल और मेडिकल सिस्टम को अब ज्यादा सजग होना होगा

दक्षिण कोरिया की यह घटना भारत के सामने कई सवाल रखती है। क्या हमारे घरों में रखी दवाओं को लेकर पर्याप्त जागरूकता है? क्या किशोर जानते हैं कि सामान्य दवाओं की अधिक मात्रा भी गंभीर संकट पैदा कर सकती है? क्या माता-पिता को पता है कि सोशल मीडिया पर किस प्रकार की स्वास्थ्य-विरोधी सामग्री प्रसारित हो रही है? और क्या स्कूलों में ‘हेल्थ लिटरेसी’ यानी स्वास्थ्य साक्षरता को केवल किताबों तक सीमित नहीं, व्यवहारिक स्तर पर पढ़ाया जा रहा है?

भारत में अक्सर बच्चों और किशोरों से स्वास्थ्य पर बातचीत तब होती है जब वे बीमार पड़ते हैं। लेकिन दवा के सुरक्षित उपयोग, स्व-दवा सेवन के खतरे, दोस्तों के दबाव, ऑनलाइन गलत सूचना और मानसिक तनाव जैसे विषय नियमित पारिवारिक संवाद का हिस्सा कम बनते हैं। यह कमी खतरनाक साबित हो सकती है। जिस तरह हम बच्चों को सड़क पार करना, अजनबी से सावधान रहना या साइबर फ्रॉड से बचना सिखाते हैं, उसी तरह दवाओं के बारे में भी स्पष्ट नियम सिखाने होंगे।

स्कूलों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। भारत में मादक पदार्थों पर चर्चा तो कभी-कभी होती है, लेकिन सामान्य दवाओं के दुरुपयोग पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता। यह मान लिया जाता है कि खतरा बाहर से आएगा, घर या मेडिकल स्टोर से नहीं। कोरिया की यह घटना इस धारणा को चुनौती देती है। स्कूल काउंसलिंग, जीवन-कौशल शिक्षा, साइबर जागरूकता सत्र और स्वास्थ्य शिक्षा कार्यक्रमों में ऐसे मुद्दों को शामिल किया जाना चाहिए।

फार्मासिस्ट और केमिस्ट भी इस कड़ी का अहम हिस्सा हैं। भारत में मोहल्ले का मेडिकल स्टोर अक्सर लोगों के लिए पहली सलाह का स्थान बन जाता है। ऐसे में दवा की बिक्री के साथ जिम्मेदार परामर्श भी जुड़ना चाहिए—विशेषकर उन दवाओं के मामले में जिनका दुरुपयोग हो सकता है। यदि कोई किशोर बार-बार या असामान्य मात्रा में कुछ खरीदने की कोशिश करता है, तो सतर्कता जरूरी है। यह काम केवल नियमन का नहीं, पेशेवर नैतिकता का भी है।

इसके साथ ही नीति-स्तर पर डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारी पर भी चर्चा होनी चाहिए। यदि आत्म-हानि, खतरनाक स्टंट या दवा-दुरुपयोग से जुड़े कंटेंट को एल्गोरिदम बढ़ावा देता है, तो प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही बनती है। भारत में यह बहस अभी शुरुआती स्तर पर है, लेकिन कोरिया का अनुभव बता रहा है कि ‘ऑनलाइन ट्रेंड’ और ‘ऑफलाइन स्वास्थ्य संकट’ के बीच की दूरी बहुत कम रह गई है।

के-पॉप पीढ़ी, दबाव और अदृश्य अकेलापन: सांस्कृतिक संदर्भ को समझना भी जरूरी

दक्षिण कोरिया को दुनिया आज के-पॉप, के-ड्रामा, ब्यूटी इंडस्ट्री और हाई-टेक जीवनशैली के लिए जानती है। लेकिन उसी चमकदार सांस्कृतिक परिदृश्य के पीछे तीव्र प्रतिस्पर्धा, प्रदर्शन का दबाव, सामाजिक अपेक्षाएं और युवा पीढ़ी का मानसिक तनाव भी एक वास्तविकता है। वहां की युवा संस्कृति में ‘परफॉर्म’ करने का दबाव केवल मंच पर नहीं, जीवन के हर हिस्से में महसूस किया जाता है—पढ़ाई, करियर, दिखावट, सामाजिक छवि और डिजिटल उपस्थिति तक।

यह कहना गलत होगा कि दवाओं का दुरुपयोग केवल मनोरंजन की इच्छा से जुड़ा है। कई बार इसके पीछे तनाव, अनिद्रा, भावनात्मक खालीपन, समूह में फिट होने का दबाव, या आत्म-अनुभव की जिज्ञासा भी होती है। दक्षिण कोरिया की खबर को केवल नैतिक गिरावट कहकर खारिज कर देना आसान है, लेकिन पर्याप्त नहीं। यह एक ऐसी पीढ़ी का संकेत भी हो सकता है जो डिजिटल रूप से बहुत जुड़ी हुई है, पर भावनात्मक रूप से कई बार अकेली महसूस करती है।

भारतीय समाज में भी यह स्थिति तेजी से उभर रही है। महानगरों और छोटे शहरों, दोनों में किशोरों पर अकादमिक दबाव, करियर की चिंता, शारीरिक छवि का तनाव, रिश्तों की जटिलता और सोशल मीडिया की तुलना संस्कृति असर डाल रही है। इंस्टाग्राम पर सबकी जिंदगी सुंदर, आत्मविश्वासी और रोमांचक दिखती है; अपनी वास्तविक जिंदगी उससे फीकी लगने लगती है। ऐसे माहौल में ‘कुछ अलग महसूस करने’ या ‘दिमाग बंद करने’ की चाह कमजोर क्षणों में खतरनाक फैसलों को जन्म दे सकती है।

के-पॉप फैंडम की तरह भारत में भी स्टार-कल्चर और ऑनलाइन समुदायों की ताकत बहुत बड़ी है। समुदाय प्रेरणा भी दे सकते हैं और दबाव भी। इसलिए यह जरूरी है कि युवा संस्कृति पर रिपोर्टिंग करते समय हम केवल सनसनी या नैतिक उपदेश तक सीमित न रहें, बल्कि यह भी पूछें कि आज के किशोर किस मनःस्थिति में जी रहे हैं। यदि उनके पास भरोसेमंद बातचीत का मंच नहीं होगा, तो इंटरनेट ही उनका सलाहकार बन जाएगा—और इंटरनेट हमेशा जिम्मेदार सलाहकार नहीं होता।

यही वजह है कि मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं, स्कूल काउंसलिंग, पारिवारिक संवाद और गैर-आलोचनात्मक सुनने की संस्कृति को मजबूत करना किसी भी रोकथाम रणनीति का अनिवार्य हिस्सा होना चाहिए। दवा का दुरुपयोग कई बार लक्षण होता है; जड़ कहीं और होती है।

सबसे जरूरी संदेश: दवा इलाज है, ‘एक्सपेरिमेंट’ नहीं

दक्षिण कोरिया की यह चेतावनी अंततः एक बहुत बुनियादी, लेकिन बेहद जरूरी बात पर लौटाती है—दवा शरीर को ठीक करने के लिए होती है, शरीर को जोखिम में डालने के लिए नहीं। जब दवा का उद्देश्य उपचार से हटकर उत्तेजना, अनुभव, वायरल कंटेंट या समूह-अनुभव बन जाए, तब सबसे साधारण स्वास्थ्य संसाधन भी खतरे का सबसे पास का स्रोत बन सकता है।

भारतीय परिवारों के लिए इस घटना से तीन स्पष्ट सबक निकलते हैं। पहला, घर में रखी हर दवा को सुरक्षित, सीमित और समझदारी से रखें; यह मानकर न चलें कि बच्चा या किशोर अपने आप समझ जाएगा। दूसरा, बच्चों और युवाओं से सोशल मीडिया पर दिखने वाली खतरनाक चीजों के बारे में खुलकर बात करें; केवल ‘मत करो’ कहना काफी नहीं, ‘क्यों नहीं’ भी समझाना होगा। तीसरा, यदि किसी किशोर के व्यवहार में अचानक बदलाव, नींद, मूड, अलगाव, दवा में असामान्य रुचि या ऑनलाइन गोपनीयता बढ़ती दिखे, तो उसे केवल अनुशासनहीनता न समझें—संवाद और मदद दोनों की जरूरत हो सकती है।

नीति स्तर पर भी यह समय चेतने का है। सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियानों को अब केवल संक्रमण, पोषण या टीकाकरण तक सीमित नहीं रहना चाहिए; उन्हें डिजिटल युग के जोखिमों को भी शामिल करना होगा। जिस तरह साइबर सुरक्षा पर जनजागरूकता जरूरी हुई, उसी तरह दवाओं के डिजिटल दुरुपयोग पर भी जागरूकता बढ़ानी होगी।

कोरिया की यह खबर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमें भविष्य की एक झलक दिखाती है—जहां फार्मेसी की शेल्फ, स्मार्टफोन की स्क्रीन और किशोर मन, तीनों एक ही जोखिम-श्रृंखला में जुड़ सकते हैं। भारत के लिए समझदारी इसी में है कि हम इसे ‘वहां की समस्या’ कहकर न टालें। यह हमारे समय का साझा प्रश्न है: क्या हम अपने युवाओं को इतना समर्थ बना पा रहे हैं कि वे वायरल चीज और खतरनाक चीज में फर्क कर सकें? यदि नहीं, तो यह केवल स्वास्थ्य का संकट नहीं, सामाजिक जिम्मेदारी की परीक्षा भी है।

दुनिया चाहे कितनी भी डिजिटल क्यों न हो जाए, एक बात नहीं बदलती—दवा खिलौना नहीं है। और जब समाज इस मूल सच को भूलने लगे, तब पत्रकारिता, चिकित्सा, शिक्षा और परिवार—चारों को मिलकर उसे फिर से याद दिलाना पड़ता है।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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