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कोरियाई ड्रामा उद्योग में बड़ा मोड़: अब वेबटून नहीं, खुद ड्रामा बन रहे हैं नए ‘आईपी’ की जन्मस्थली

कोरियाई ड्रामा उद्योग में बड़ा मोड़: अब वेबटून नहीं, खुद ड्रामा बन रहे हैं नए ‘आईपी’ की जन्मस्थली

वेबटून से ड्रामा तक की पुरानी राह अब उलट रही है

दक्षिण कोरिया के मनोरंजन उद्योग में लंबे समय से एक तयशुदा फार्मूला काम करता आया है—पहले कोई वेबटून या वेबनॉवेल, यानी ऑनलाइन कॉमिक या डिजिटल उपन्यास, पाठकों के बीच लोकप्रिय होता है; उसके बाद निर्माता उस लोकप्रियता को भुनाने के लिए उसे ड्रामा या सीरीज़ में बदलते हैं। यह मॉडल इतना मजबूत हो गया था कि कई बार किसी नए कोरियाई शो की घोषणा होते ही पहली पंक्ति यही होती थी कि वह किस वेबटून पर आधारित है। लेकिन 2026 के पहले छह महीनों में कोरियाई ड्रामा बाजार में एक महत्वपूर्ण बदलाव उभरकर सामने आया है। अब कई चर्चित परियोजनाएं पहले से मशहूर मूल रचनाओं पर नहीं, बल्कि नए लेखकों की मौलिक पटकथाओं पर खड़ी हो रही हैं। और दिलचस्प बात यह है कि बाद में वही ड्रामा आगे चलकर वेबटून या वेबनॉवेल में विस्तार पा सकते हैं।

यह बदलाव केवल कहानी सुनाने के क्रम का बदलाव नहीं है; यह पूरे कंटेंट उद्योग की मानसिकता में परिवर्तन का संकेत है। अब ड्रामा को केवल किसी लोकप्रिय मूल रचना का अंतिम दृश्यात्मक रूप नहीं माना जा रहा, बल्कि उसे एक ऐसी पहली प्रयोगशाला समझा जा रहा है जहां कहानी की बाजार-क्षमता, भावनात्मक असर और वैश्विक आकर्षण की वास्तविक परीक्षा होती है। अगर वह सफल रहती है, तो फिर उसी दुनिया को कॉमिक, उपन्यास, गेम, मर्चेंडाइज़ और दूसरे माध्यमों में फैलाया जाता है। आसान शब्दों में कहें तो पहले कहानी किताब या वेबटून में जन्म लेती थी और स्क्रीन पर बड़ी होती थी; अब कई मामलों में कहानी स्क्रीन पर जन्म लेकर बाकी मंचों तक जा रही है।

भारतीय पाठकों के लिए इसे समझना कठिन नहीं होना चाहिए। हमारे यहां भी कभी उपन्यासों, पौराणिक आख्यानों या लोकप्रिय किताबों पर आधारित फिल्मों और टीवी धारावाहिकों का दबदबा था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में ओटीटी के दौर ने स्थिति बदली है। अब कई बार कोई मौलिक वेब सीरीज़ इतनी लोकप्रिय हो जाती है कि उसके इर्द-गिर्द उपन्यास, ग्राफिक फिक्शन, स्पिन-ऑफ और विस्तारित ब्रह्मांड की बात होने लगती है। कोरिया में जो हो रहा है, वह उसी प्रवृत्ति का अधिक संगठित, अधिक व्यावसायिक और तकनीकी रूप है।

कोरियाई मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक इस वर्ष जिन ड्रामाओं ने सबसे अधिक ध्यान खींचा, उनमें कई ऐसे हैं जो सीधे नए पटकथा लेखकों के मौलिक विचारों से निकले हैं। यह बात इसलिए उल्लेखनीय है क्योंकि दक्षिण कोरियाई मनोरंजन उद्योग आमतौर पर जोखिम को बहुत गणनात्मक ढंग से संभालता है। वहां स्टार कलाकार, बड़े प्रसारण नेटवर्क, वैश्विक ओटीटी मंच और अंतरराष्ट्रीय बिक्री—सभी का समीकरण बेहद बारीकी से तय होता है। ऐसे में मौलिक पटकथा पर दांव लगाना केवल कलात्मक निर्णय नहीं, बल्कि उद्योग के अंदर बदलते जोखिम-प्रबंधन का संकेत भी है।

यह बदलाव क्यों महत्वपूर्ण है: ‘आईपी’ का अर्थ और उसका नया व्याकरण

कोरियाई मनोरंजन उद्योग में ‘आईपी’ यानी इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी शब्द सिर्फ कानूनी स्वामित्व का मामला नहीं है; यह एक व्यावसायिक पारिस्थितिकी का केंद्र है। किसी कहानी, पात्र, काल्पनिक संसार या ब्रांड की ऐसी रचनात्मक संपत्ति, जिसे अलग-अलग माध्यमों में दोहराया, विस्तारित और बेचा जा सके—उसे ही उद्योग की भाषा में मजबूत आईपी कहा जाता है। यही वजह है कि वेबटून और वेबनॉवेल लंबे समय तक निर्माताओं की पहली पसंद बने रहे। वे पहले से लोकप्रिय थे, उनका पाठकवर्ग मौजूद था, उनके पात्रों की पहचान बन चुकी थी और सोशल मीडिया पर उनकी चर्चा होती थी। निर्माताओं के लिए यह किसी ऐसी दुकान जैसा था जहां माल खरीदारों की पसंद का पहले से प्रमाणित हो।

लेकिन बाजार की एक समस्या यह भी होती है कि जैसे-जैसे सभी खिलाड़ी एक ही सुरक्षित रास्ते पर बढ़ते हैं, वैसे-वैसे उस रास्ते की चमक कम होने लगती है। कोरिया में कई बार यह देखने को मिला कि बहुत लोकप्रिय वेबटून का ड्रामा रूपांतरण अपेक्षा के अनुसार काम नहीं कर पाया। कारण साफ थे—कॉमिक की गति और स्क्रीन की गति एक जैसी नहीं होती; वेबनॉवेल की कल्पना और दृश्य माध्यम की ठोस प्रस्तुति में फर्क होता है; पाठक जिस पात्र की कल्पना अपने मन में करता है, वही पात्र अभिनेता के रूप में सामने आए तो हमेशा वैसा असर नहीं छोड़ता। ऊपर से, मूल रचना के प्रशंसक और सामान्य दर्शक—दोनों की अपेक्षाएं कई बार अलग-अलग दिशा में जाती हैं।

यहां एक सांस्कृतिक बात समझना जरूरी है। कोरिया में वेबटून केवल कॉमिक नहीं, बल्कि एक पूर्ण डिजिटल पठन-संस्कृति है। मोबाइल स्क्रीन पर लंबवत स्क्रॉल करके पढ़े जाने वाले ये कॉमिक्स शहरी युवाओं की रोजमर्रा की आदत का हिस्सा हैं। इसी तरह वेबनॉवेल भी धारावाहिक शैली में प्रकाशित डिजिटल कथाएं होती हैं, जिनमें प्रेम, फैंटेसी, ऐतिहासिक रोमांस, स्कूल ड्रामा, पुनर्जन्म और समय-यात्रा जैसे विषय खूब लोकप्रिय हैं। जब ऐसी सामग्री पर आधारित ड्रामा बनते हैं, तो दर्शकों के सामने पहले से एक तैयार मानसिक नक्शा मौजूद होता है। लेकिन इसी कारण रचनात्मक स्वतंत्रता सीमित भी हो सकती है।

अब जो नया मॉडल उभर रहा है, उसमें ड्रामा स्वयं पहली रचना बनकर सामने आ रहा है। इस मॉडल का अर्थ है कि निर्माता पहले कहानी को स्क्रीन के लिए सोचते हैं—उसकी संरचना, एपिसोडिक तनाव, कलाकारों की कैमिस्ट्री, दृश्य शैली और अंतरराष्ट्रीय दर्शक के लिए अपील—इन सबको ध्यान में रखकर। यदि शो सफल रहता है, तो उसके बाद उसे वेबटून या वेबनॉवेल में ढाला जाता है। इस तरह ड्रामा अब अंत नहीं, शुरुआत बन रहा है। यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें स्क्रीन लेखन को फिर से केंद्रीय रचनात्मक शक्ति के रूप में देखा जा रहा है।

नए लेखकों की वापसी नहीं, संस्थागत उभार

दक्षिण कोरिया में हाल के महीनों में जिन परियोजनाओं पर उद्योग की निगाह गई, उनमें कुछ उल्लेखनीय उदाहरण सामने आए हैं। चर्चित कलाकार आईयू और ब्योन वू-सोक की मौजूदगी के कारण चर्चा में आई एमबीसी की ड्रामा परियोजना ‘21세기 대군부인’ एक नवोदित लेखिका यू जी-वॉन के डेब्यू स्क्रिप्ट से निकली मानी जा रही है, जिसे 2022 के एमबीसी ड्रामा पटकथा प्रतियोगिता में मान्यता मिली थी। इसी तरह केबीएस का ‘은애하는 도적님아’ भी एक स्क्रिप्ट प्रतियोगिता के पुरस्कृत विचार से विकसित हुआ। नेटफ्लिक्स की कुछ नई परियोजनाओं के बारे में भी यही संकेत दिए गए हैं कि वे किसी चर्चित वेबटून से नहीं, बल्कि नए लेखकों की मौलिक पटकथाओं से शुरू हुईं।

यहां सबसे अहम बिंदु ‘नया लेखक’ नहीं, बल्कि ‘नया लेखक तंत्र’ है। कोरिया में पटकथा प्रतियोगिताएं, ब्रॉडकास्टरों के स्क्रिप्ट कॉन्टेस्ट, स्टूडियो-आधारित विकास कार्यक्रम और लेखक प्रशिक्षण मॉडल लंबे समय से मौजूद हैं। लेकिन एक समय के बाद उनका महत्व प्रतीकात्मक हो गया था—जैसे वे केवल प्रतिभा खोजने का माध्यम हों, वास्तविक बाजार का केंद्र नहीं। अब वही प्रतियोगिताएं दोबारा उद्योग के वास्तविक स्रोत-संसाधन के रूप में देखी जा रही हैं। यह किसी उभरते खिलाड़ी की कहानी नहीं, बल्कि पूरे संस्थागत ढांचे के पुनर्मूल्यांकन की कहानी है।

भारतीय संदर्भ में इसकी तुलना हम टीवी और फिल्म लेखन की पुरानी समस्या से कर सकते हैं। हमारे यहां भी स्टार अभिनेता, बड़े निर्देशक और पहले से स्थापित फ्रेंचाइज़ अक्सर लेखकों से अधिक महत्व पाते रहे हैं। नतीजा यह हुआ कि मौलिक लेखन के लिए संस्थागत पाइपलाइन कमजोर रही। ओटीटी प्लेटफॉर्म आने के बाद स्थिति में कुछ बदलाव जरूर आया, लेकिन आज भी व्यवस्थित स्क्रिप्ट लैब, प्रसारण-आधारित लेखन प्रतियोगिताएं और प्रतिभा पोषण की निरंतर औद्योगिक संरचना सीमित है। कोरिया का अनुभव भारतीय उद्योग के लिए एक संकेत हो सकता है कि अच्छी कहानी केवल प्रतिभा से नहीं, प्रतिभा तक पहुंचने वाली प्रणाली से भी जन्म लेती है।

नए लेखकों के उभार का एक और आर्थिक पक्ष है। यदि हर निर्माता केवल पहले से हिट वेबटून खरीदने की दौड़ में रहेगा, तो लोकप्रिय मूल सामग्री की कीमत बढ़ती जाएगी। इससे परियोजना का शुरुआती खर्च बढ़ेगा और रचनात्मक जोखिम कम नहीं, कई बार उलटे बढ़ जाएगा—क्योंकि महंगी खरीद के बाद भी सफलता की गारंटी नहीं होती। इसके बजाय यदि निर्माता समय रहते नई पटकथाओं की पहचान कर लें, उन्हें विकसित करें, सही निर्देशक और कलाकार के साथ पेश करें, तो वे अपेक्षाकृत कम लागत में नया आईपी तैयार कर सकते हैं। यानी यहां भावनात्मक ताजगी और व्यापारिक समझ—दोनों एक साथ काम कर रहे हैं।

‘सुरक्षित’ वेबटून फॉर्मूला क्यों डगमगाया

यह मान लेना आसान होगा कि वेबटून-आधारित ड्रामाओं का दौर खत्म हो रहा है, लेकिन वास्तविकता इतनी सरल नहीं है। वेबटून अब भी कोरियाई मनोरंजन उद्योग की बेहद महत्वपूर्ण धुरी हैं और आगे भी रहेंगे। सवाल यह नहीं कि वेबटून अप्रासंगिक हो गए, बल्कि यह कि वे अब एकमात्र भरोसेमंद स्रोत नहीं रह गए। इसके पीछे कई कारण हैं। पहला, दर्शकों की थकान। जब लगातार मिलती-जुलती प्रेमकथाएं, स्कूल-आधारित फैंटेसी, टाइम-स्लिप कथानक या पुनर्जन्म की संरचनाएं स्क्रीन पर आने लगती हैं, तो शुरू में आकर्षण पैदा करने वाली परिचितता बाद में एकरूपता में बदल जाती है।

दूसरा कारण रूपांतरण की संरचनात्मक कठिनाई है। एक वेबटून अक्सर दृश्य रूप से बहुत प्रभावशाली होता है, लेकिन उसकी नाटकीयता का आधार फ्रेम-दर-फ्रेम भाव, स्क्रॉल-आधारित रहस्य और पाठक की अपनी गति पर टिका होता है। ड्रामा में उसे एपिसोड, दृश्यों, संवाद और अभिनय के माध्यम से फिर से गढ़ना पड़ता है। कई बार जो चीज चित्र में रोमांचक लगती है, वह लाइव-एक्शन में कृत्रिम दिखने लगती है। इसी तरह वेबनॉवेल में लंबे आंतरिक एकालाप और मानसिक दुनिया को स्क्रीन पर उतारना हमेशा आसान नहीं होता।

तीसरा कारण फैनडम और आम दर्शक के बीच का अंतर है। मूल रचना के प्रशंसकों की अपेक्षा होती है कि उनका प्रिय पात्र, दृश्य और भावनात्मक स्वर यथावत रहे। लेकिन व्यापक दर्शकवर्ग के लिए कहानी का प्रवाह, दृश्य गुणवत्ता, अभिनय, संपादन और ताजगी अधिक महत्वपूर्ण हो सकते हैं। जब निर्माता दोनों को साथ लेकर चलने की कोशिश करते हैं, तो कई बार परिणाम बीच का रह जाता है—न तो कट्टर प्रशंसक पूरी तरह संतुष्ट होते हैं, न नए दर्शक पूरी तरह जुड़ते हैं।

चौथा और शायद सबसे महत्वपूर्ण कारण यह है कि बाजार अब ‘समझ में आने वाली योजना’ से आगे बढ़कर ‘अलग दिखने वाली योजना’ मांग रहा है। ओटीटी प्रतिस्पर्धा के दौर में केवल यह बताना काफी नहीं कि शो किस लोकप्रिय वेबटून पर आधारित है; यह भी दिखाना पड़ता है कि वह बाकी दर्जनों शो से अलग क्यों है। यहां मौलिक पटकथा को फायदा मिलता है, क्योंकि उसे किसी पहले से तय ढांचे का बोझ नहीं उठाना पड़ता। वह पहले एपिसोड से अपनी दुनिया अपनी शर्तों पर बना सकती है। यही ताजगी इस समय कोरियाई बाजार में पूंजी के लिए भी आकर्षक बन रही है।

जब ड्रामा ही मूल रचना बन जाए: कारोबार का नया गणित

ड्रामा से वेबटून या वेबनॉवेल की ओर जाने वाली उलटी दिशा को सतही तौर पर देखें तो यह सिर्फ ‘रीपैकेजिंग’ लग सकती है—यानी एक सफल शो को दूसरे माध्यम में दोबारा बेचना। लेकिन व्यवसाय की दृष्टि से इसका अर्थ कहीं अधिक गहरा है। यदि कोई ड्रामा पहले दर्शकों के बीच चर्चा पैदा करता है, सोशल मीडिया पर वायरल होता है, कलाकारों की लोकप्रियता बढ़ाता है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है, तो वह एक तरह की प्रारंभिक बाजार-परीक्षा पास कर चुका होता है। इसके बाद उसी कहानी को वेबनॉवेल या वेबटून में बदलना पहले की तुलना में कहीं अधिक सुरक्षित निवेश बन सकता है।

इस मॉडल का सबसे बड़ा लाभ यह है कि कहानी की उपभोक्ता-यात्रा लंबी हो जाती है। पहले दर्शक शो देखते हैं, फिर उसी कहानी के टेक्स्ट संस्करण में जाते हैं, फिर कॉमिक रूपांतरण पढ़ते हैं, फिर पात्रों से जुड़े सामान, विशेष संस्करण, ओएसटी, फैन इवेंट और यहां तक कि गेमिंग या इंटरैक्टिव फॉर्मेट तक पहुंच सकते हैं। यानी एक बार बना रचनात्मक संसार कई अलग-अलग खिड़कियों से आमदनी पैदा कर सकता है। इसे आज की भाषा में मल्टी-प्लेटफॉर्म वैल्यू चेन कहा जा सकता है।

ओटीटी प्लेटफॉर्म के लिए भी यह मॉडल बेहद उपयोगी है। आज की प्रतिस्पर्धा केवल दर्शक जुटाने की नहीं, उन्हें अपने प्लेटफॉर्म के पारिस्थितिकी तंत्र में रोके रखने की है। यदि कोई शो खत्म होने के बाद भी उससे जुड़ा वेबटून, डिजिटल नॉवेल, विशेष सामग्री, फैन इंटरैक्शन और अतिरिक्त कथात्मक विस्तार उपलब्ध हो, तो दर्शक का जुड़ाव लंबा चलता है। भारत में भी हम देखते हैं कि किसी लोकप्रिय सीरीज़ के बाद दर्शक उसके सिद्धांत, पात्र, बैकस्टोरी और अगले सीज़न पर महीनों चर्चा करते रहते हैं। कोरिया इस भावनात्मक जुड़ाव को अधिक संरचित राजस्व मॉडल में बदल रहा है।

यहां एक सूक्ष्म बदलाव और है—अब ‘मूल रचना’ का अर्थ स्थिर नहीं रहा। पहले जो किताब या वेबटून मूल था, ड्रामा उसका रूपांतरण था। अब सफल ड्रामा के बाद जब उसी पर आधारित वेबटून बनेगा, तो युवा दर्शक शायद उसी वेबटून को भी ‘मूल कहानी का विस्तार’ मानेंगे, न कि ‘असल स्रोत’। इससे कहानी की प्रामाणिकता का केंद्र बदलता है। कलाकारों के चेहरे, सेट डिजाइन, पृष्ठभूमि संगीत और दृश्यात्मक स्मृति पहले दर्शक के मन में बसेंगे; बाद में पढ़ी गई कॉमिक या डिजिटल नॉवेल उसी दृश्य स्मृति को मजबूत करेगी।

दर्शक का बदलता व्यवहार और K-संस्कृति की नई रणनीति

कोरिया की सांस्कृतिक सफलता का एक बड़ा कारण यह रहा है कि उसने मनोरंजन को केवल एक-बार-देखो उत्पाद नहीं रहने दिया। K-pop में गीत, मंच प्रदर्शन, रियलिटी कंटेंट, व्लॉग, फैन कम्युनिटी और मर्चेंडाइज़—सब मिलकर एक समग्र अनुभव बनाते हैं। अब ड्रामा उद्योग भी उसी दिशा में और आगे बढ़ता दिख रहा है। दर्शक अब केवल कहानी नहीं देखते; वे दुनिया में प्रवेश करते हैं। वे किरदारों के लिए सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखते हैं, संवादों को मीम बनाते हैं, फैशन की नकल करते हैं, शूटिंग लोकेशन खोजते हैं और कलाकारों की अगली परियोजनाओं का इंतजार करते हैं। इस व्यवहार को देखते हुए ड्रामा को प्राथमिक आईपी में बदलना रणनीतिक रूप से समझदारी भरा कदम है।

भारतीय दर्शक, खासकर हिंदी भाषी युवा, इस बदलाव को बहुत जल्दी समझ सकते हैं क्योंकि हमारे यहां भी अब सामग्री का उपभोग रैखिक नहीं रहा। एक फिल्म देखकर दर्शक यूट्यूब पर उसके एक्सप्लेनर देखते हैं, इंस्टाग्राम पर उसके दृश्यों के रीएल्स देखते हैं, रेडिट या एक्स पर सिद्धांत पढ़ते हैं और कभी-कभी उपन्यास या कॉमिक रूपांतरण भी खोजते हैं। कोरिया ने इस प्रवृत्ति को केवल देखा नहीं, बल्कि उद्योग की योजना का हिस्सा बनाया है।

कोरियाई सांस्कृतिक संदर्भ में यह भी ध्यान देने योग्य है कि वहां दर्शक प्रतिक्रिया का डेटा बहुत तेजी से एकत्र होता है। कौन सा संवाद ट्रेंड कर रहा है, किस पात्र की क्लिप सबसे ज्यादा साझा हुई, किस एपिसोड ने सदस्यता बढ़ाई, किन देशों में किस तरह की प्रतिक्रिया आई—ये सभी संकेत भविष्य के रूपांतरण को आकार दे सकते हैं। यदि ड्रामा पहले चरण में दर्शक डेटा उपलब्ध करा दे, तो बाद के वेबटून या वेबनॉवेल संस्करण अधिक लक्षित ढंग से बनाए जा सकते हैं। यानी अब कहानी सिर्फ रचनात्मक अंतर्ज्ञान से नहीं, दर्शक व्यवहार के विश्लेषण से भी विकसित हो रही है।

हालांकि इसके साथ जोखिम भी हैं। यदि हर निर्माता केवल ऐसे ड्रामा बनाना शुरू कर दे जो आगे चलकर फ्रेंचाइज़ में बदल सकें, तो कहानियां फिर से अत्यधिक गणनात्मक, सुरक्षित और फार्मूलाबद्ध हो सकती हैं। ठीक वही समस्या, जो कभी वेबटून-आधारित रूपांतरणों के अत्यधिक चलन में दिखी थी, किसी नए रूप में वापस आ सकती है। इसलिए मौलिक पटकथा की इस वापसी का असली महत्व तभी रहेगा जब उद्योग लेखकों को केवल ‘नई सामग्री सप्लाई करने वाले’ के रूप में नहीं, बल्कि रचनात्मक दिशा तय करने वाले केंद्र के रूप में भी स्वीकार करे।

भारत के लिए सबक: क्या हिंदी मनोरंजन उद्योग कुछ सीख सकता है?

दक्षिण कोरिया का यह उभरता बदलाव भारतीय मनोरंजन जगत, खासकर हिंदी फिल्म और ओटीटी उद्योग, के लिए कई सबक छोड़ता है। पहला सबक है—मौलिक लेखन में निवेश। हमारे यहां अक्सर चर्चा अभिनेता, बॉक्स ऑफिस, स्ट्रीमिंग डील और मार्केटिंग पर केंद्रित होती है, लेकिन किसी भी मजबूत सांस्कृतिक लहर की असली नींव कहानी में होती है। अगर लेखकों को पहचानने, प्रशिक्षित करने और लंबे समय तक विकसित करने की संस्थागत प्रक्रिया मजबूत नहीं होगी, तो उद्योग जल्दी ही रीमेक, रूपांतरण और सुरक्षित फार्मूलों के चक्र में फंस जाएगा।

दूसरा सबक है—आईपी को केवल खरीदने की चीज नहीं, गढ़ने की प्रक्रिया समझना। भारत में भी कॉमिक, पौराणिक कथा, अपराध-उपन्यास, लोककथाएं और युवा साहित्य की बड़ी दुनिया मौजूद है, लेकिन इसके समानांतर हमें ऐसी मौलिक स्क्रीन कहानियों की भी जरूरत है जो बाद में अपने आप में नए आईपी बन सकें। यदि कोई हिंदी वेब सीरीज़ पहले दर्शकों को पकड़ती है और फिर उसी पर उपन्यास, चित्रकथा, ऑडियो ड्रामा या गेम बनते हैं, तो यह भारतीय भाषाई बाजारों में कंटेंट की नई अर्थव्यवस्था खोल सकता है।

तीसरा सबक है—क्षेत्रीयता और वैश्विकता को विरोधी नहीं, सहयोगी मानना। कोरिया ने अपनी कहानियों को बहुत स्थानीय सांस्कृतिक भावभूमि में रखते हुए भी विश्वव्यापी आकर्षण दिया है। भारतीय उद्योग भी यदि अपनी कहानियों को दिल्ली-मुंबई से आगे छोटे शहरों, लोक-स्मृतियों, भाषाई विविधता और समकालीन सामाजिक यथार्थ से जोड़ते हुए रचे, तो वे मौलिकता के आधार पर अधिक दूर तक जा सकती हैं। मौलिकता का अर्थ अजीब होना नहीं; उसका अर्थ ईमानदार और ताजा होना है।

अंततः, कोरियाई ड्रामा उद्योग में यह बदलाव हमें बताता है कि कंटेंट उद्योग की अगली दौड़ केवल इस बात पर नहीं होगी कि किसके पास सबसे लोकप्रिय मूल सामग्री है, बल्कि इस पर होगी कि कौन सबसे पहले अगली लोकप्रिय मूल सामग्री पैदा कर सकता है। अभी तक वेबटून और वेबनॉवेल से ड्रामा बनने की कहानी K-संस्कृति की सफलता का प्रतीक थी। अब ड्रामा से वेबटून और वेबनॉवेल बनने की दिशा यह बता रही है कि कोरिया अपनी कहानी-उद्योग मशीनरी को अगले चरण में ले जा चुका है।

हिंदी पाठकों के लिए इसका सार एक वाक्य में यही है: दक्षिण कोरिया में अब केवल हिट कहानियों का रूपांतरण नहीं हो रहा, बल्कि हिट ड्रामाओं को ही नई मूल कहानियों की तरह विकसित किया जा रहा है। और यदि यह प्रवृत्ति मजबूत होती है, तो आने वाले वर्षों में K-drama केवल देखने की चीज नहीं रहेंगे—वे ऐसे सांस्कृतिक बीज बन जाएंगे, जिनसे कॉमिक, उपन्यास, फैनडम और डिजिटल अर्थव्यवस्था की पूरी नई फसल उगेगी।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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