
प्रदर्शनी के मंच पर बदली प्राथमिकता, और उससे झलकती नई औद्योगिक राजनीति
दक्षिण कोरिया का आईटी उद्योग लंबे समय से दुनिया के लिए एक आकर्षक प्रदर्शनशाला रहा है। सियोल या बुसान में लगने वाले तकनीकी मेलों में अक्सर विशाल स्क्रीन, तेज रोशनी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के चकाचौंध भरे प्रदर्शन, रोबोट की सटीक चाल और सेमीकंडक्टर की अगली पीढ़ी के वादे सुर्खियां बटोरते रहे हैं। लेकिन 22 अप्रैल 2026 के आसपास उभरे संकेत बताते हैं कि कोरिया के तकनीकी उद्योग की असली कहानी अब मंच की रोशनी में नहीं, बल्कि प्रदर्शनी हॉल की व्यवस्था, सरकारी संदेशों के स्वर और पुरस्कारों की दिशा में पढ़ी जानी चाहिए। अब सवाल यह नहीं है कि कौन सबसे शानदार तकनीक दिखा सकता है, बल्कि यह है कि कौन ऐसी तकनीक बना रहा है जिसे आज बेचा जा सकता है, विदेश भेजा जा सकता है और कारखानों, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क, अस्पतालों, परिवहन प्रणालियों या स्मार्ट शहरों में तुरंत लगाया जा सकता है।
यह बदलाव सतही नहीं है। कोरियाई सरकार ने एक ही समय में नवोन्मेषी लघु एवं मध्यम उद्यमों और स्टार्टअप्स के निर्यात समर्थन, आईसीटी कंपनियों को सम्मानित करने और एआई केंद्रित राष्ट्रीय रणनीति के संदेशों को एक ही धुरी पर रख दिया है। इसका अर्थ है कि नीति निर्माता यह समझ चुके हैं कि केवल भविष्य की तकनीक का परिचय कराने से विकास दर नहीं बढ़ती। उद्योग को अब ऐसे मॉडल की जरूरत है जिसमें तकनीक का व्यावसायीकरण, वैश्विक विस्तार, आपूर्ति श्रृंखला में समावेशन और वास्तविक उपयोग की क्षमता केंद्रीय मानदंड बनें। भारतीय पाठकों के लिए इसे समझना कठिन नहीं होना चाहिए। हमारे यहां भी टेक समिट में स्टार्टअप्स की पिच और बड़े विजन दस्तावेज बहुत दिखते हैं, लेकिन असली कसौटी तब बनती है जब वही तकनीक रेलवे, बैंकिंग, कृषि, स्वास्थ्य सेवा, रक्षा उत्पादन या राज्य सरकारों के ई-गवर्नेंस ढांचे में टिकाऊ ढंग से लागू हो। दक्षिण कोरिया आज उसी मोड़ पर खड़ा है जहां प्रदर्शन से अधिक परिनियोजन मायने रखता है।
कोरियाई संदर्भ में एक और बात समझनी जरूरी है। वहां सरकार, उद्योग और तकनीकी संस्थानों के बीच तालमेल अपेक्षाकृत अधिक संगठित होता है। जब किसी प्रदर्शनी में किन क्षेत्रों को प्रमुखता दी जाती है, किन कंपनियों को सम्मान मिलता है और मंत्री या उपप्रधानमंत्री किन शब्दों पर जोर देते हैं, तो उसे केवल आयोजन की रस्म नहीं माना जाता। वह औद्योगिक दिशा का संकेतक होता है। इसीलिए इस बार बड़े प्लेटफॉर्म दिग्गजों की तकनीकी प्रस्तुति के समानांतर लघु आईसीटी कंपनियों और स्टार्टअप्स की बढ़ती दृश्यता को केवल उत्साहवर्धन नहीं, बल्कि औद्योगिक प्राथमिकता के पुनर्संतुलन के रूप में पढ़ा जा रहा है।
सरकार की नजर अब स्टार्टअप गिनती पर नहीं, विदेशी ग्राहक पर है
दक्षिण कोरियाई सरकार ने नवोन्मेषी लघु उद्योगों और स्टार्टअप्स के लिए निर्यात मार्ग खोलने पर जो जोर दिया है, उसके पीछे भावुकता नहीं, कठोर आर्थिक यथार्थ है। कोरिया की अर्थव्यवस्था में सेमीकंडक्टर, स्मार्टफोन और डिस्प्ले जैसे क्षेत्रों ने वैश्विक स्तर पर शानदार प्रतिष्ठा बनाई है। लेकिन सॉफ्टवेयर, एआई आधारित सेवाओं, औद्योगिक समाधान और मिश्रित आईसीटी प्लेटफॉर्म के क्षेत्र में तस्वीर उतनी सरल नहीं है। कंपनियां बहुत हैं, तकनीक भी अच्छी है, मगर विदेशी राजस्व का मजबूत आधार अभी भी सीमित है। खासकर उन क्षेत्रों में, जहां तकनीक का मूल्य लैब में नहीं बल्कि वास्तविक उपयोग की जगह पर तय होता है, विदेशी संदर्भ परियोजना यानी रेफरेंस का होना कंपनी की विश्वसनीयता, निवेश आकर्षण और मूल्यांकन का निर्णायक आधार बन जाता है।
भारत में भी हमने यह पैटर्न देखा है। अनेक सॉफ्टवेयर स्टार्टअप घरेलू स्तर पर चर्चा में रहते हैं, लेकिन जैसे ही उन्हें खाड़ी देशों, यूरोप, जापान या अफ्रीका में प्रवेश करना होता है, प्रमाणन, डेटा अनुपालन, स्थानीय साझेदार, आफ्टर सेल्स सपोर्ट और साइबर सुरक्षा की कसौटी पर तस्वीर बदल जाती है। दक्षिण कोरिया अब उसी अंतर को नीति के स्तर पर संबोधित कर रहा है। वहां निर्यात समर्थन का मतलब केवल व्यापार मेले में स्टॉल दिलाना नहीं है। इसका अर्थ है मानकों से तालमेल, सुरक्षा सत्यापन, स्थानीय पार्टनर नेटवर्क, रखरखाव क्षमता और सेवा निरंतरता को मजबूत करना। तकनीकी कंपनियों के लिए यह सब केवल सहायक तत्व नहीं, बल्कि भरोसे की पूंजी है। कोई समाधान घरेलू बाजार में काम कर लेना और बात है, लेकिन वही समाधान यदि विदेशी ग्राहक बार-बार खरीदे, अपने संचालन में शामिल करे और दीर्घकालिक अनुबंध दे, तो वह कंपनी एक अलग वर्ग में पहुंच जाती है।
यही कारण है कि कोरियाई नीति संदेश अब यह संकेत दे रहा है कि सरकार की सफलता की नई परिभाषा बदल रही है। पहले यह सवाल प्रमुख था कि कितने स्टार्टअप बने, कितने इनक्यूबेशन प्रोग्राम चले, कितनी नवाचार प्रतियोगिताएं आयोजित हुईं। अब जोर इस पर है कि कितनी आईसीटी कंपनियों ने विदेश में ग्राहक बनाए, कितनों ने वास्तविक अनुबंध हासिल किए और कितनों की तकनीक ने देश की सीमाओं से बाहर संचालन स्तर पर जगह बनाई। यह स्टार्टअप-प्रेरित अर्थव्यवस्था से स्केल-अप और निर्यात-प्रेरित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ने का संकेत है। भारतीय संदर्भ में इसे हम उस बदलाव से तुलना कर सकते हैं जब केवल यूनिकॉर्न बनने की चर्चा से आगे बढ़कर अब डीप-टेक, विनिर्माण, रक्षा टेक, सेमीकंडक्टर डिजाइन और सास उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय बिक्री पर अधिक जोर दिया जा रहा है।
दस आईसीटी कंपनियों को सम्मान क्यों महज औपचारिक पुरस्कार नहीं है
एआई, सेमीकंडक्टर, रोबोटिक्स और मोबिलिटी जैसे क्षेत्रों में दस आईसीटी लघु एवं मध्यम कंपनियों को उपप्रधानमंत्री पुरस्कार और उत्कृष्टता सम्मान मिलना पहली नजर में एक सरकारी कार्यक्रम जैसा लग सकता है। लेकिन दक्षिण कोरिया जैसे नीति-संवेदनशील औद्योगिक परिवेश में यह चयन स्वयं एक बयान है। किन क्षेत्रों को एक साथ रखा जाता है, इससे भविष्य की औद्योगिक संरचना को लेकर सरकार की समझ सामने आती है। एआई इस संरचना का दिमाग है, सेमीकंडक्टर उसका प्रोसेसिंग और सेंसर ढांचा, रोबोटिक्स उसका क्रियान्वयन तंत्र और मोबिलिटी वह मंच है जहां यह सब वास्तविक दुनिया में चलायमान रूप लेता है। यह चारों क्षेत्र अलग-अलग विभागों के विषय भर नहीं हैं, बल्कि अगली औद्योगिक श्रृंखला के परस्पर जुड़े अंग हैं।
और यहां सबसे ध्यान देने वाली बात यह है कि सम्मान का केंद्र बड़े कॉरपोरेट समूह नहीं, बल्कि आईसीटी मध्यम और लघु कंपनियां हैं। कोरिया की बड़ी कंपनियां पहले से वैश्विक पहचान रखती हैं, लेकिन एआई युग की प्रतिस्पर्धा केवल एक विशाल मॉडल या महंगे चिप पर तय नहीं होगी। डेटा संग्रहण उपकरण, हल्के एल्गोरिद्म, औद्योगिक नियंत्रण सॉफ्टवेयर, एज कंप्यूटिंग चिप, निगरानी प्रणाली, साइबर सुरक्षा मॉड्यूल और संचालन मंच जैसे अनेक घटक मिलकर एक संपूर्ण समाधान बनाते हैं। इन घटकों का बड़ा हिस्सा वही फुर्तीली कंपनियां विकसित करती हैं जो आकार में छोटी हैं लेकिन विशेषज्ञता में गहरी हैं। यही कंपनियां आपूर्ति श्रृंखला को मोटाई देती हैं, लागत को अनुकूल बनाती हैं और ग्राहक की विशिष्ट जरूरत के अनुसार समाधान को ढालती हैं।
यहां मूल्यांकन का पैमाना भी बदलता दिखता है। पहले सरकारी सम्मान अक्सर शोध की नवीनता, प्रौद्योगिकी आत्मनिर्भरता या स्थानीयकरण की प्रतीकात्मक उपलब्धि पर केंद्रित होते थे। अब उद्योग में असर, वास्तविक उपयोग, विस्तार क्षमता और बाजार तैयार स्थिति पर अधिक बल है। सरल शब्दों में कहें तो अच्छी तकनीक और बिकने लायक तकनीक अब अलग-अलग श्रेणियां नहीं मानी जा रहीं; दूसरी श्रेणी को पहली से ज्यादा महत्व मिलने लगा है। भारत में यदि हम ड्रोन, कृषि तकनीक, फिनटेक इंफ्रास्ट्रक्चर या हेल्थ-टेक को देखें, तो यही बदलाव धीरे-धीरे हमारे यहां भी दिखाई देता है। निवेशक और सरकार दोनों पूछ रहे हैं कि समाधान प्रयोगशाला में सफल है या खेत, कारखाने, अस्पताल और शहर में भी टिकाऊ है। दक्षिण कोरिया के ये सम्मान इसी नए युग के प्रतीक हैं।
डब्ल्यूआईएस 2026 ने क्या दिखाया: चमत्कार नहीं, तुरंत उपयोगी समाधान
वर्ल्ड आईटी शो 2026, जिसे वहां संक्षेप में डब्ल्यूआईएस कहा जाता है, इस साल केवल तकनीकी प्रदर्शनी नहीं बल्कि औद्योगिक मनोविज्ञान का आईना बनकर उभरा। प्रदर्शनी में सामने आई धारा का सार यह था कि एआई अब केवल विस्मय पैदा करने वाली तकनीक नहीं रह गई है; उसे वास्तविक दुनिया को चलाना है। पहले ऐसे आयोजनों में सवाल यह होता था कि तकनीक क्या कर सकती है। अब विदेशी खरीदार, सरकारी एजेंसियां, सार्वजनिक खरीद तंत्र, निवेशक और उद्योग प्रतिनिधि पूछ रहे हैं कि तकनीक को आज किस क्षेत्र में लगाया जा सकता है, कितनी लागत पर लगाया जा सकता है, कितनी सुरक्षा के साथ लगाया जा सकता है और वह कितने समय तक भरोसेमंद ढंग से चल सकती है। यही बदलाव प्रदर्शनी में नायक बदल देता है। विशाल दावे करने वाली कंपनी से ज्यादा प्रभाव उस कंपनी का पड़ता है जो किसी एक ठोस समस्या का मापनीय समाधान दिखा रही हो।
कोरिया की कंपनियों ने एआई को जिन रूपों में सामने रखा, उनमें औद्योगिक निरीक्षण, विनिर्माण में दोष पहचान, गोदाम प्रबंधन, लॉजिस्टिक्स स्वचालन, स्मार्ट फैक्टरी विश्लेषण, गतिशील वस्तुओं की निगरानी और रोबोट के साथ सहयोगी संचालन जैसे उपयोग अधिक प्रमुख रहे। यह कोई संयोग नहीं है। जनरेटिव एआई की प्रारंभिक चमक अब वैश्विक स्तर पर सामान्य होती जा रही है। लगभग हर देश, हर कंपनी और हर मंच एआई की भाषा बोल रहा है। इसलिए प्रतिस्पर्धा अब इस बात पर है कि कौन एआई को कम लागत, अधिक स्थिरता और मजबूत सुरक्षा के साथ वास्तविक उद्योग में रोप सकता है। ठीक वैसे ही जैसे भारत में डिजिटल भुगतान की चर्चा केवल तकनीकी चमत्कार के रूप में नहीं, बल्कि यूपीआई के रोजमर्रा इस्तेमाल, कम लागत और व्यापक स्वीकार्यता के कारण महत्वपूर्ण हुई। तकनीक का असर तभी स्थापित होता है जब वह सामान्य जीवन और उत्पादन प्रक्रियाओं का हिस्सा बन जाए।
डब्ल्यूआईएस 2026 ने कोरियाई आईटी उद्योग के सामने एक बुनियादी प्रश्न रखा है। क्या कोरिया दुनिया का वह बाजार बनेगा जो सबसे पहले नई तकनीक दिखाता है, या वह जो सबसे तेजी से नई तकनीक को उद्योग में उतारता है। दोनों भूमिकाएं एक जैसी लग सकती हैं, पर वास्तव में वे अलग हैं। पहली भूमिका आयोजन-केंद्रित है, दूसरी संचालन-केंद्रित। संचालन-केंद्रित मॉडल अपनाते ही उत्पाद की स्थिरता, ऊर्जा दक्षता, ग्राहक समर्थन, सुरक्षा मानक, डेटा प्रबंधन और कुशल मानव संसाधन निर्णायक बन जाते हैं। यही वह बिंदु है जहां प्रदर्शनी का संदेश और सरकारी नीति एक-दूसरे से जुड़ते दिखाई देते हैं।
एआई की असली अड़चन अब एल्गोरिद्म नहीं, बिजली, सुरक्षा और लोग हैं
कोरिया के विज्ञान और आईसीटी नेतृत्व ने जब एआई केंद्रित राष्ट्रीय रणनीति को तेज करने के लिए बिजली, सुरक्षा और प्रतिभा यानी मानव संसाधन को एक साथ रेखांकित किया, तो यह एक बेहद महत्वपूर्ण स्वीकारोक्ति थी। इसका सीधा अर्थ यह है कि एआई उद्योग की बाधाएं अब केवल मॉडल की क्षमता या एल्गोरिद्मिक श्रेष्ठता में नहीं हैं। जैसे-जैसे कोई तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र परिपक्व होता है, चुनौती शोधपत्र से हटकर संरचना, संचालन और निरंतरता पर आ जाती है। दक्षिण कोरिया भी अब उसी अवस्था में पहुंच गया है। तकनीकी विकास की गति महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह हो गया है कि उन तकनीकों के लिए बिजली कहां से आएगी, डेटा और नियंत्रण प्रणाली कितनी सुरक्षित होंगी, और उन्हें चलाने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षित लोग कहां से मिलेंगे।
बिजली का मुद्दा खासतौर पर ध्यान देने योग्य है। एआई मॉडल, क्लाउड इन्फ्रास्ट्रक्चर, एज उपकरण, स्मार्ट फैक्टरी सेंसर और रोबोटिक सिस्टम सभी ऊर्जा खाते हैं। जब एआई प्रयोगशाला से निकलकर उद्योग, परिवहन और शहरी प्रबंधन में फैलता है, तब ऊर्जा लागत केवल डेटा सेंटर की समस्या नहीं रहती, बल्कि मध्यम और छोटे उद्योगों के परिचालन खर्च का हिस्सा बन जाती है। भारत में भी डेटा सेंटर नीति, हरित ऊर्जा, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और औद्योगिक बिजली दरों पर जो बहस चलती है, उसका एक संस्करण कोरिया में अब तेज हो रहा है। तकनीक की कीमत केवल खरीद मूल्य नहीं होती; उसे चलाते रहने की ऊर्जा लागत भी होती है। इसीलिए बिजली आज औद्योगिक एआई के लिए उतनी ही रणनीतिक चीज है जितनी पहले चिप या सॉफ्टवेयर मानी जाती थी।
सुरक्षा का महत्व और भी व्यापक है। यदि एआई का इस्तेमाल सिर्फ उपभोक्ता चैटबॉट में हो रहा हो, तो सुरक्षा उल्लंघन एक डिजिटल समस्या है। लेकिन जब वही एआई रोबोट, वाहन, फैक्टरी मशीन और शहरी यातायात प्रणाली से जुड़ता है, तब सुरक्षा में चूक का असर भौतिक दुनिया में भी दिख सकता है। डेटा चोरी, सिस्टम रुकावट, गलत नियंत्रण आदेश या सेंसर स्तर की छेड़छाड़ सीधे दुर्घटना, उत्पादन हानि या सार्वजनिक खतरे में बदल सकती है। इसलिए औद्योगिक एआई में साइबर सुरक्षा केवल अनुपालन की औपचारिकता नहीं, बल्कि मूलभूत विश्वास का आधार है। भारतीय पाठकों को यह उसी तरह समझना चाहिए जैसे हम बैंकिंग नेटवर्क, रेलवे सिग्नलिंग, एयर ट्रैफिक सिस्टम या डिजिटल स्वास्थ्य डेटा की सुरक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकता मानते हैं।
तीसरा स्तंभ है प्रतिभा। एआई उद्योग चलाने के लिए केवल मॉडल डेवलपर पर्याप्त नहीं है। डेटा इंजीनियर, एम्बेडेड सिस्टम विशेषज्ञ, साइबर सुरक्षा पेशेवर, सिस्टम इंटीग्रेशन विशेषज्ञ, फील्ड ऑपरेशन टीम, रखरखाव इंजीनियर और सेक्टर-विशिष्ट डोमेन ज्ञान रखने वाले लोग सभी जरूरी होते हैं। दक्षिण कोरिया जैसे उच्च दक्षता वाले समाज में भी यह चिंता स्पष्ट है कि यदि प्रतिभा आपूर्ति उद्योग की मांग से पीछे रही, तो सर्वश्रेष्ठ तकनीक भी व्यापक रूप से लागू नहीं हो पाएगी। यह स्थिति भारत के लिए भी परिचित है, जहां आईटी सेवा क्षेत्र तो विशाल है, पर डीप-टेक विनिर्माण, औद्योगिक एआई, सेमीकंडक्टर डिजाइन और साइबर-फिजिकल सिस्टम के लिए विशिष्ट प्रतिभा विकसित करना अभी भी एक रणनीतिक चुनौती है।
कोरियाई संस्कृति में प्रदर्शन की प्रतिष्ठा, और उससे आगे बढ़ने की मजबूरी
दक्षिण कोरिया की आधुनिक औद्योगिक संस्कृति में तकनीकी प्रदर्शनी का एक खास महत्व है। वहां नई तकनीक दिखाना सिर्फ मार्केटिंग नहीं, राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा का हिस्सा माना जाता है। के-पॉप, के-ड्रामा और कोरियाई उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स की तरह ही तकनीक भी वैश्विक छवि निर्माण का माध्यम रही है। यही कारण है कि वहां का टेक सेक्टर अक्सर प्रभावशाली डेमो, भविष्यवादी प्रस्तुति और उच्च तकनीकी परिष्कार के लिए जाना जाता है। लेकिन इसी मॉडल की एक सीमा भी है। यदि प्रदर्शन के बाद निर्यात अनुबंध न आएं, विदेशी बाजार में सेवा नेटवर्क न बने और स्थानीय उद्योग उसे बड़े पैमाने पर न अपनाएं, तो तकनीकी श्रेष्ठता आर्थिक परिणाम में पूरी तरह परिवर्तित नहीं हो पाती।
यही वह पुरानी समस्या है जिसे इस बार कोरियाई उद्योग और सरकार मिलकर संबोधित करते दिख रहे हैं। शानदार डेमो और सीमित व्यावसायीकरण के बीच की खाई लंबे समय से चिंता का विषय रही है। इस साल की विशेषता यह है कि पुरस्कार, प्रदर्शनी और सरकारी वक्तव्य एक साथ उन शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं जिनका संबंध वास्तविक क्रियान्वयन से है, जैसे बिजली, सुरक्षा, प्रतिभा, निर्यात सहायता, वैश्विक विस्तार और औद्योगिक उपयोग। इससे स्पष्ट है कि कोरिया अब तकनीकी राष्ट्र होने की छवि से आगे बढ़कर तकनीक-आधारित परिचालन शक्ति बनना चाहता है।
भारतीय पाठकों के लिए यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत और दक्षिण कोरिया के तकनीकी मार्ग अलग होते हुए भी कई बिंदुओं पर मिलते हैं। भारत ने सॉफ्टवेयर सेवाओं, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और स्टार्टअप ऊर्जा के आधार पर अपनी पहचान बनाई है। कोरिया ने इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण, हार्डवेयर क्षमता, उपभोक्ता तकनीक और उच्च गुणवत्ता वाले औद्योगिक निष्पादन के जरिए। अब दोनों देशों के सामने समान प्रश्न है: क्या तकनीकी उत्कृष्टता को व्यापक आर्थिक लाभ में बदला जा सकता है। कोरिया का मौजूदा मोड़ इस प्रश्न का एक व्यावहारिक उत्तर देने की कोशिश है।
भारत के लिए क्या सबक हैं, और आगे की दिशा क्या हो सकती है
दक्षिण कोरिया के आईटी उद्योग में उभरते इस बदलाव को भारत केवल एक विदेशी औद्योगिक समाचार के रूप में न देखे। इसमें हमारे लिए भी महत्वपूर्ण संकेत हैं। पहला सबक यह है कि स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र की सफलता का अंतिम पैमाना केवल निवेश, मूल्यांकन या चर्चा नहीं, बल्कि निर्यातयोग्य उत्पाद और वास्तविक ग्राहक आधार है। दूसरा सबक यह है कि तकनीक नीति को शोध, विनिर्माण, ऊर्जा, सुरक्षा, मानकीकरण और कौशल विकास के बीच पुल बनाना होगा। तीसरा सबक यह है कि मध्यम और लघु कंपनियां केवल सहायक इकाइयां नहीं होतीं; वे पूरी तकनीकी आपूर्ति श्रृंखला की रणनीतिक रीढ़ बन सकती हैं।
भारत यदि सेमीकंडक्टर, एआई, इंडस्ट्री 4.0, रोबोटिक्स, मोबिलिटी टेक और रक्षा-तकनीक में अगला कदम उठाना चाहता है, तो उसे भी यही पूछना होगा कि कितनी कंपनियां घरेलू बाजार के बाहर लगातार राजस्व ला रही हैं, कितनी कंपनियों के पास अंतरराष्ट्रीय प्रमाणन है, कितनी कंपनियां आफ्टर-सेल्स सपोर्ट के साथ वैश्विक अनुबंध निभा सकती हैं और कितने समाधान राज्य सरकारों, सार्वजनिक उपक्रमों और निजी विनिर्माण इकाइयों में बड़े पैमाने पर तैनात हैं। केवल नवाचार की घोषणा और नीति दस्तावेज पर्याप्त नहीं होंगे।
दक्षिण कोरिया की मौजूदा कहानी का सार यह है कि तकनीक का युग अब परिपक्व हो रहा है। चमकदार घोषणाएं अपनी जगह हैं, लेकिन असली मूल्य अब वहीं पैदा होगा जहां तकनीक बिकेगी, चलेगी, स्केल होगी और अंतरराष्ट्रीय विश्वास अर्जित करेगी। कोरिया के लिए यह बदलाव देर से सही, लेकिन निर्णायक मोड़ की तरह है। और भारत के लिए यह एक उपयोगी दर्पण है, जिसमें हम अपना भविष्य भी देख सकते हैं। आने वाले वर्षों में एआई, चिप, रोबोट और मोबिलिटी की होड़ केवल प्रयोगशालाओं या निवेशकों के मंच पर तय नहीं होगी। फैसला उन फैक्ट्रियों, सप्लाई चेन, डेटा नेटवर्क और ऊर्जा ग्रिड में होगा जहां तकनीक को रोज काम करना है। दक्षिण कोरिया ने यह संकेत पढ़ लिया है। सवाल यह है कि क्या बाकी एशिया, और खासकर भारत, इससे सही समय पर सीख लेगा।
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