
कोरिया की नई पहल क्यों अहम है
दक्षिण कोरिया की स्वास्थ्य व्यवस्था को एशिया की सबसे संगठित और तकनीक-समर्थ प्रणालियों में गिना जाता है। वहीं अब सियोल से एक ऐसी नीति-चर्चा सामने आई है, जिसका असर केवल कोरियाई अस्पतालों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत जैसे देशों के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण संकेत है। कोरिया के स्वास्थ्य एवं कल्याण मंत्रालय ने 2026 में एक समर्पित ‘मरीज सुरक्षा विभाग’ या कहें ‘पेशेंट सेफ्टी डिवीजन’ बनाने की दिशा में काम शुरू किया है। सरल शब्दों में समझें तो यह केवल दफ्तर में नया बोर्ड टांगने की कवायद नहीं है, बल्कि यह तय करने की कोशिश है कि अस्पतालों में होने वाली गलतियों, चूकों, दवाओं के गलत इस्तेमाल, संक्रमण नियंत्रण की कमियों, मरीज गिरने की घटनाओं, गलत पहचान, उपचार में देरी और ऐसी अनेक जोखिमपूर्ण स्थितियों को अलग नीति-प्राथमिकता दी जाए।
कोरियाई प्रशासनिक ढांचे में किसी विषय के लिए अलग ‘क्वा’ या विभाग बनाना यह संकेत देता है कि सरकार उस मुद्दे को सामान्य प्रशासनिक कामकाज से ऊपर उठाकर विशेष निगरानी, बजट, डेटा और जवाबदेही से जोड़ना चाहती है। यही कारण है कि यह प्रस्ताव स्वास्थ्य-नीति विशेषज्ञों की नजर में विशेष महत्व रखता है। अब तक मरीज सुरक्षा को व्यापक स्वास्थ्य नीति के भीतर देखा जाता था, लेकिन शिकायत यह रही कि जिम्मेदारियां बिखरी रहीं, डेटा का समेकित विश्लेषण कमजोर रहा और अस्पतालों से मिलने वाली सीख नीति-निर्माण तक पूरी ताकत से नहीं पहुंच पाई।
भारतीय पाठकों के लिए यह बात नई नहीं लगनी चाहिए। हमारे यहां भी अक्सर कोई बड़ी चिकित्सा दुर्घटना, आग, संक्रमण, नवजात वार्ड में लापरवाही, गलत इंजेक्शन, देरी से रेफरल, या ऑपरेशन से पहले पर्याप्त पुष्टि न होने जैसी घटनाएं सामने आती हैं। हर बार जांच बैठती है, दिशानिर्देश जारी होते हैं, कुछ समय तक सख्ती दिखती है, और फिर व्यवस्था अपने पुराने ढर्रे पर लौटती दिखती है। दक्षिण कोरिया की यह पहल इसलिए दिलचस्प है क्योंकि वह मरीज सुरक्षा को ‘घटना के बाद कार्रवाई’ से आगे ले जाकर ‘सिस्टम के स्तर पर निरंतर निगरानी’ में बदलना चाहता है।
यह भी समझना जरूरी है कि मरीज सुरक्षा का मतलब केवल ‘मेडिकल नेग्लिजेंस’ यानी लापरवाही साबित करना नहीं होता। आधुनिक स्वास्थ्य प्रशासन में इसका अर्थ कहीं व्यापक है। यदि किसी बुजुर्ग मरीज को दवा की खुराक गलत मिल जाए, ऑपरेशन से पहले जरूरी जांच का चरण छूट जाए, संक्रमण रोकथाम के प्रोटोकॉल का पालन न हो, मरीज के गिरने का जोखिम समय रहते न पहचाना जाए, या कई डॉक्टरों के बीच इलाज समन्वय की कमी से नुकसान हो जाए, तो ये सभी मरीज सुरक्षा के दायरे में आते हैं। कोरिया अब इन्हीं जोखिमों को एकीकृत रूप से देखने की तैयारी कर रहा है।
भारत के संदर्भ में कहें तो यह वैसा ही है जैसे किसी राज्य सरकार ने अस्पतालों में केवल शिकायत प्रबंधन सेल नहीं, बल्कि ऐसा स्वतंत्र निकाय बनाया हो जो डेटा देखे, मानक तय करे, प्रशिक्षण दे, घटनाओं से सीख निकाले, और अस्पतालों को केवल दंडित करने के बजाय सुधार की दिशा भी दिखाए। यह सोच अपने आप में महत्वपूर्ण है।
मरीज सुरक्षा आखिर है क्या, और यह अब इतना बड़ा मुद्दा क्यों बन रहा है
जब आम लोग ‘अस्पताल में गलती’ सुनते हैं, तो अधिकतर दिमाग में कोई बड़ा हादसा आता है—गलत ऑपरेशन, गंभीर दवा-त्रुटि या मौत का मामला। लेकिन स्वास्थ्य नीति की भाषा में मरीज सुरक्षा की दुनिया इससे कहीं ज्यादा व्यापक है। इसमें वे सभी स्थितियां शामिल हैं, जिनसे इलाज के दौरान मरीज को नुकसान पहुंचने का खतरा बनता है। इनमें दवा के नाम या डोज में भ्रम, जांच रिपोर्ट की गलत व्याख्या, सर्जरी से पहले पहचान की पुष्टि में कमी, संक्रमण नियंत्रण में चूक, आपातकालीन विभाग में गंभीरता का गलत आकलन, बुजुर्ग मरीजों के गिरने की घटनाएं, छुट्टी के बाद दवा-निर्देश की अस्पष्टता, और अलग-अलग विभागों के बीच खराब समन्वय शामिल हैं।
कोरिया की समस्या भी यही है कि ऐसी घटनाएं किसी एक अस्पताल या एक डॉक्टर तक सीमित नहीं रहतीं। यदि व्यवस्थागत कमजोरी है, तो वही गलती अलग-अलग शहरों, अस्पतालों और विभागों में दोहराई जा सकती है। भारत में हम इसे रेलवे सुरक्षा या विमानन सुरक्षा के उदाहरण से समझ सकते हैं। किसी दुर्घटना के बाद केवल यह जान लेना काफी नहीं कि उस दिन किसने गलती की; असली सवाल यह होता है कि क्या पूरी प्रणाली में कोई ऐसी कमी है जो फिर वही दुर्घटना दोहरा सकती है। अस्पतालों में भी यही तर्क लागू होता है।
कोरिया में मरीज सुरक्षा संबंधी कानून और रिपोर्टिंग व्यवस्था पहले से मौजूद हैं, लेकिन व्यवहार में कई चुनौतियां बताई जाती रही हैं। रिपोर्टिंग बढ़े तो भी जरूरी नहीं कि उससे सुरक्षा अपने आप बेहतर हो जाए। उसके लिए घटनाओं का वर्गीकरण, कारणों का विश्लेषण, साझा सीख, रोकथाम के दिशानिर्देश, और मूल्यांकन प्रणाली में उनका समावेश—यह सब एक सतत चक्र के रूप में चलना चाहिए। यदि रिपोर्ट फाइलों में बंद हो जाएं, अस्पताल डर के कारण सच्चाई छिपाएं, या डेटा के मानक अलग-अलग हों, तो पूरी व्यवस्था औपचारिक बनकर रह जाती है।
यह मुद्दा आज इसलिए और गंभीर हो रहा है क्योंकि दक्षिण कोरिया की तरह भारत भी तेजी से वृद्ध होती आबादी, पुरानी बीमारियों, बहु-दवा सेवन, और अनेक विशेषज्ञ डॉक्टरों के बीच इलाज की वास्तविकता का सामना कर रहा है। पहले जहां एक मरीज एक ही डॉक्टर से इलाज कराता था, आज अक्सर वही व्यक्ति मधुमेह विशेषज्ञ, हृदय रोग विशेषज्ञ, किडनी विशेषज्ञ, न्यूरोलॉजिस्ट और पारिवारिक चिकित्सक—सबके संपर्क में होता है। ऐसे में एक अकेली चिकित्सकीय गलती से ज्यादा खतरनाक हो सकती है ‘सिस्टम की असफल कड़ी’—यानी विभागों, रिकॉर्ड, दवाओं और निर्देशों के बीच समन्वय का टूटना।
कोरिया की नीति-बहस का एक महत्वपूर्ण संदेश यह है कि मरीज सुरक्षा अब अस्पताल की ‘आंतरिक’ समस्या भर नहीं रही। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य, प्रशासनिक जवाबदेही और नागरिक अधिकारों से जुड़ा विषय बन चुकी है। भारत में आयुष्मान भारत, डिजिटल हेल्थ मिशन, अस्पतालों के विस्तार और निजी स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती भूमिका के बीच यह प्रश्न और भी अहम हो जाता है कि क्या हमारी चिकित्सा व्यवस्था केवल इलाज दे रही है, या सुरक्षित इलाज भी सुनिश्चित कर रही है।
अलग विभाग बनने से क्या बदल सकता है
यदि दक्षिण कोरिया में मरीज सुरक्षा के लिए समर्पित विभाग वास्तव में बनता है, तो सबसे पहला बदलाव जिम्मेदारी की स्पष्टता में दिखाई दे सकता है। अभी तक ऐसे मुद्दे कई विभागों में बंटे रहने के कारण अक्सर प्राथमिकता खो देते हैं। एक समर्पित इकाई बनने पर दुर्घटना-रोकथाम, रिपोर्टिंग, डेटा विश्लेषण, अस्पतालों को दिशा-निर्देश, प्रशिक्षण, जन-संपर्क और निरीक्षण जैसी प्रक्रियाएं एक ही नीतिगत धुरी पर लाई जा सकती हैं। इससे काम की निरंतरता बढ़ती है, और हर घटना के बाद ‘किसके पास फाइल है’ वाला भ्रम कम होता है।
दूसरा बड़ा असर डेटा-आधारित निर्णयों में दिख सकता है। मरीज सुरक्षा केवल दोष तय करने का मामला नहीं, बल्कि पैटर्न पहचानने का विषय है। उदाहरण के लिए, यदि किसी खास प्रकार की दवा-त्रुटि छोटे शहरों के अस्पतालों में अधिक हो रही है, या वृद्ध मरीजों के गिरने की घटनाएं कुछ विशिष्ट वार्डों में ज्यादा हैं, तो नीति उसी आधार पर बनाई जानी चाहिए। एक मजबूत विभाग ऐसे डेटा को केवल संकलित नहीं करता, बल्कि उसका तुलनात्मक अध्ययन कर कमजोर बिंदुओं की पहचान करता है। भारत में भी यदि किसी राज्य की स्वास्थ्य प्रणाली जिला अस्पतालों, मेडिकल कॉलेजों और निजी अस्पतालों के अनुभवों को एक साथ पढ़ सके, तो बहुत सी ‘रोक सकने योग्य’ घटनाओं को पहले ही कम किया जा सकता है।
तीसरा संभावित बदलाव मरीज और उनके परिजनों के अनुभव में आ सकता है। अक्सर अस्पताल में कोई समस्या होने पर परिवारों को समझ ही नहीं आता कि शिकायत कहां करें—अस्पताल प्रशासन, बीमा कंपनी, उपभोक्ता मंच, मेडिकल परिषद, पुलिस, या अदालत? कोरिया में यदि नया विभाग सूचना और मार्गदर्शन तंत्र को व्यवस्थित करता है, तो यह मरीजों के लिए उपचार-पूर्व सावधानियों से लेकर उपचार-पश्चात शिकायत-निवारण तक अधिक स्पष्ट रास्ता तैयार कर सकता है। यह केवल कानूनी मदद की बात नहीं, बल्कि भरोसे की भी बात है।
चौथा पहलू प्रशिक्षण और संस्कृति का है। किसी भी अस्पताल में फॉर्म भरवाकर सुरक्षा नहीं आती। सुरक्षा तब आती है जब नर्स, जूनियर डॉक्टर, सर्जन, फार्मासिस्ट, तकनीशियन और प्रशासन—सभी यह मानें कि छोटी गलती की सूचना देना शर्म या सजा का कारण नहीं, बल्कि सुधार का अवसर है। विमानन क्षेत्र की तरह स्वास्थ्य क्षेत्र में भी ‘रिपोर्ट करो, सीखो, दोहराव रोकों’ वाली संस्कृति जरूरी होती है। नया कोरियाई विभाग यदि दंड-केंद्रित दृष्टिकोण से आगे जाकर सीख-केंद्रित मॉडल अपनाता है, तो उसके दीर्घकालिक परिणाम अधिक प्रभावी हो सकते हैं।
पांचवां बदलाव नीति-स्तर पर दिखेगा। जब कोई मुद्दा अलग प्रशासनिक पहचान पाता है, तो उसके लिए बजट, विशेषज्ञ, प्रशिक्षण मॉड्यूल, डिजिटल सिस्टम और मूल्यांकन मानक तय करना आसान हो जाता है। यही वह जगह है जहां कोरिया की यह पहल प्रतीकात्मक न रहकर संरचनात्मक बदलाव में बदल सकती है।
अस्पतालों के लिए राहत या नया बोझ?
किसी भी नई निगरानी व्यवस्था की तरह अस्पतालों में इस प्रस्ताव को लेकर मिश्रित प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है। छोटे और मध्यम अस्पतालों को डर हो सकता है कि रिपोर्टिंग, दस्तावेजीकरण, प्रशिक्षण और आंतरिक समीक्षा का बोझ बढ़ेगा। यह आशंका बेबुनियाद भी नहीं है। भारत में भी हम देखते हैं कि जब कोई नया अनुपालन नियम आता है, तो बड़े कॉरपोरेट अस्पताल उसे अपेक्षाकृत आसानी से अपना लेते हैं, लेकिन जिला स्तरीय या सीमित संसाधनों वाले संस्थानों के लिए वह अलग दबाव बन जाता है। दक्षिण कोरिया में भी यही चिंता जताई जा रही है कि यदि सरकार ने केवल मानक कड़े किए लेकिन जनशक्ति, डिजिटल सहायता, प्रशिक्षण और सलाहकार समर्थन नहीं दिया, तो मरीज सुरक्षा की नीति अस्पतालों के लिए एक और प्रशासनिक बोझ बन सकती है।
लेकिन इस मुद्दे को केवल ‘नया नियम बनाम पुरानी सुविधा’ के चश्मे से देखना पर्याप्त नहीं होगा। असल प्रश्न यह है कि क्या नई व्यवस्था अस्पतालों को ऐसी घटनाएं रोकने में मदद करेगी, जिनसे अंततः उनकी प्रतिष्ठा, लागत और कानूनी जोखिम भी प्रभावित होते हैं। दुनिया भर के शोध बताते हैं कि असुरक्षित देखभाल केवल मरीज के लिए नहीं, संस्थान के लिए भी महंगी पड़ती है। संक्रमण, दवा-त्रुटि, लंबी भर्ती, पुन: भर्ती, कानूनी विवाद, अतिरिक्त जांच और परिवारों के अविश्वास—ये सब अस्पताल के लिए भारी कीमत बनते हैं।
इसलिए यदि नया विभाग अस्पतालों को केवल नोटिस भेजने वाली संस्था न बनकर प्रशिक्षण, चेकलिस्ट, मानकीकृत प्रोटोकॉल, परामर्श, डिजिटल रिपोर्टिंग और सुरक्षित रिपोर्टिंग संरक्षण दे, तो अस्पताल इसे साझेदारी के रूप में भी देख सकते हैं। भारत में NABH मान्यता, संक्रमण नियंत्रण समितियां, गुणवत्ता प्रबंधक और रोगी अधिकार चार्टर जैसी पहलें तभी सार्थक लगती हैं जब वे कागज भरने का अभ्यास न बनें, बल्कि रोजमर्रा के काम में सहायक हों। कोरिया के सामने भी यही चुनौती है।
यहां एक सांस्कृतिक पहलू भी समझना होगा। कोरियाई कार्य-संस्कृति, खासकर अस्पतालों और बड़े संस्थानों में, पदानुक्रम यानी हाइरार्की की भूमिका मजबूत मानी जाती है। जूनियर स्टाफ के लिए वरिष्ठ से सवाल करना या उनकी चूक की ओर संकेत करना हमेशा आसान नहीं होता। भारतीय अस्पतालों में भी, चाहे निजी हों या सरकारी, यह समस्या अपरिचित नहीं है। यदि मरीज सुरक्षा ढांचा इस सांस्कृतिक बाधा को पहचानकर टीम-आधारित संवाद, सुरक्षित शिकायत, और गुमनाम रिपोर्टिंग को बढ़ावा देता है, तभी वास्तविक सुधार होगा। केवल आदेश से संस्कृति नहीं बदलती; उसके लिए संरक्षित संवाद-स्थल चाहिए।
यानी अस्पतालों पर नियमन बढ़ना एक पहलू है, मगर पूरी कहानी नहीं। असली कसौटी यह होगी कि क्या नीति ‘डर’ पैदा करती है या ‘सुधार की क्षमता’ भी बनाती है।
मरीज और परिवार क्या महसूस करेंगे
आम नागरिक का सबसे सीधा सवाल यही होगा—जब मैं अस्पताल जाऊंगा तो मेरे लिए क्या बदलेगा? इस प्रश्न का जवाब कई स्तरों पर दिया जा सकता है। पहला और सबसे मूर्त बदलाव यह हो सकता है कि उपचार से पहले पुष्टि की प्रक्रियाएं अधिक सख्ती से और अधिक स्पष्टता से की जाएं। जैसे सर्जरी से पहले मरीज की पहचान, प्रक्रिया, शरीर के अंग, एलर्जी इतिहास और दवाओं का पुन: सत्यापन; भर्ती के समय गिरने के जोखिम का आकलन; डिस्चार्ज के समय दवा-निर्देश की साफ लिखित जानकारी; संक्रमण से बचाव के नियमों की बेहतर जानकारी। कई मरीजों को यह सब अतिरिक्त औपचारिकता लगे, लेकिन स्वास्थ्य सुरक्षा में यही प्रक्रियाएं सबसे मजबूत रक्षा-पंक्ति होती हैं।
दूसरा बदलाव संचार में दिख सकता है। भारतीय परिवारों की तरह कोरियाई परिवार भी अस्पताल में अक्सर निर्णय-प्रक्रिया का सक्रिय हिस्सा होते हैं। यदि नया विभाग मानकीकृत सूचना-प्रणाली बनवाता है, तो परिजनों को यह अधिक स्पष्ट रूप से बताया जा सकता है कि जांच क्यों हो रही है, कौन-सी दवा क्यों दी जा रही है, किस लक्षण पर तुरंत सूचना देनी है, और छुट्टी के बाद किन संकेतों पर वापस अस्पताल आना चाहिए। मरीज सुरक्षा का एक बड़ा भाग चिकित्सा टीम और परिवार के बीच भरोसेमंद संवाद से ही बनता है।
तीसरा बदलाव शिकायत और सहायता तंत्र में हो सकता है। अभी अक्सर मरीज या उनके परिजन अस्पताल के भीतर की शिकायत-प्रक्रिया, बाहरी परामर्श, विवाद समाधान और प्रशासनिक रिपोर्टिंग के बीच उलझ जाते हैं। यदि कोरिया का प्रस्तावित विभाग इन रास्तों को सुव्यवस्थित करता है, तो ‘किस समस्या के लिए किस संस्था से संपर्क करें’ यह अधिक साफ हो सकेगा। भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए भी यह बहुत उपयोगी सबक है। हमारे यहां भी अस्पतालों, बीमा, उपभोक्ता अदालतों, राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरणों और चिकित्सा नियामक संस्थाओं के बीच सूचना-पथ कई बार जटिल हो जाता है।
चौथा बदलाव मरीज-भागीदारी में दिख सकता है। आधुनिक चिकित्सा में सुरक्षित इलाज केवल डॉक्टर की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि मरीज और परिवार की सक्रिय भागीदारी से भी जुड़ा है। उदाहरण के लिए—अपनी एलर्जी की जानकारी देना, पहले से चल रही दवाओं की सूची साथ रखना, डिस्चार्ज के बाद दवा-समय का सही पालन करना, अचानक लक्षण बदलें तो नोट करना, और जांच से पहले उपवास या दवा-संबंधी निर्देश समझना। यदि सरकार ऐसी जानकारी को मानकीकृत रूप से सार्वजनिक करती है, तो नागरिक भी अपनी सुरक्षा में भागीदार बनते हैं।
भारत में गांव-कस्बों से महानगरों तक इलाज के दौरान परिवार की भूमिका अक्सर निर्णायक होती है। किसी मरीज के साथ आया परिजन दवा लाने, रिपोर्ट दिखाने, डॉक्टर की बात समझने और बाद की देखभाल में केंद्रीय भूमिका निभाता है। इसलिए मरीज सुरक्षा की कोई भी नीति तभी जमीन पर असर करेगी, जब वह परिजन को ‘बाहरी व्यक्ति’ नहीं, बल्कि देखभाल-चक्र का हिस्सा माने। कोरिया के अनुभव से यह पहलू खास तौर पर उभरकर सामने आ सकता है।
इस नीति की असली परीक्षा कहां होगी
किसी भी नई सरकारी इकाई की तरह इस प्रस्ताव की सफलता उसके नाम से नहीं, उसकी शक्ति और संरचना से तय होगी। सबसे पहले सवाल मानव संसाधन का है। मरीज सुरक्षा कोई ऐसा विषय नहीं जिसे दो-चार अधिकारियों के भरोसे संभाला जा सके। इसके लिए डेटा विशेषज्ञ, चिकित्सक सलाहकार, नर्सिंग पृष्ठभूमि वाले पेशेवर, संक्रमण नियंत्रण विशेषज्ञ, गुणवत्ता प्रबंधन कर्मी, कानूनी और संचार क्षमता—सबकी जरूरत पड़ती है। यदि विभाग बन भी जाए लेकिन उसके पास पर्याप्त विशेषज्ञ न हों, तो वह शिकायत-निस्तारण डेस्क बनकर रह जाएगा।
दूसरा बड़ा सवाल अधिकारों का है। मरीज सुरक्षा की प्रकृति ऐसी है कि उसका संबंध बीमा भुगतान, अस्पताल मूल्यांकन, संक्रमण नियंत्रण, आपातकालीन सेवाओं, डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड, प्रशिक्षण व्यवस्था और विवाद समाधान—सभी से जुड़ता है। यदि नया विभाग केवल सलाह दे सके, पर बाकी संस्थाओं पर उसका समन्वयकारी प्रभाव न हो, तो उसकी उपयोगिता सीमित रह सकती है। लेकिन यदि उसे पर्याप्त अधिकार मिलते हैं, तो वह अलग-अलग तंत्रों को जोड़ने वाली केंद्रीय कड़ी बन सकता है।
तीसरा प्रश्न बाहरी संस्थाओं से जुड़ाव का है। अस्पतालों से रिपोर्ट आएं, पर उनका विश्लेषण धीमा हो; विश्लेषण हो, पर सीख अस्पतालों तक वापस न पहुंचे; मार्गदर्शिका बने, पर मूल्यांकन में शामिल न हो—तो पूरी कवायद प्रतीकात्मक सुधार बनकर रह जाएगी। इसलिए कोरिया के सामने चुनौती केवल मंत्रालय के भीतर विभाग बनाने की नहीं, बल्कि अस्पतालों, मूल्यांकन एजेंसियों, पेशेवर संघों, मरीज समूहों और विवाद निपटान संस्थाओं के साथ वास्तविक कामकाजी तंत्र बनाने की है।
चौथा और शायद सबसे कठिन पक्ष संस्थागत संस्कृति है। क्या अस्पताल कर्मचारी बिना डर के त्रुटि की सूचना दे पाएंगे? क्या जूनियर स्टाफ वरिष्ठ से असहमति दर्ज कर पाएगा? क्या प्रबंधन नुकसान छिपाने के बजाय सीख साझा करेगा? क्या मरीज को केवल ‘शिकायतकर्ता’ नहीं, बल्कि सुधार का सहभागी समझा जाएगा? इन सवालों का उत्तर कानून की धाराओं से कम और नेतृत्व की नीयत से अधिक तय होगा।
भारतीय अनुभव यह बताता है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में ढांचा बनाना अपेक्षाकृत आसान, और व्यवहार बदलना अपेक्षाकृत कठिन होता है। जैसे स्वच्छता, हाथ धोने, एंटीबायोटिक स्टेवार्डशिप, बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट, या प्रसूति देखभाल के मानक—सबके नियम मौजूद हो सकते हैं, लेकिन उनका जीवंत पालन तभी होता है जब प्रणाली उसे रोजमर्रा की प्राथमिकता बनाए। कोरिया के लिए भी यह अंतर निर्णायक होगा।
भारत के लिए सबक: इलाज की गुणवत्ता से आगे, सुरक्षित इलाज की बहस
दक्षिण कोरिया की यह पहल भारत के लिए कई स्तरों पर सोचने का अवसर देती है। हमारे यहां स्वास्थ्य अवसंरचना पर बहस अधिकतर डॉक्टरों की कमी, अस्पतालों की संख्या, बीमा कवरेज, निजी बनाम सरकारी व्यवस्था, और दवाओं की उपलब्धता पर केंद्रित रहती है। ये सभी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, लेकिन एक समानांतर प्रश्न हमेशा पर्याप्त जोर से नहीं उठता—क्या मरीज सुरक्षित है? अस्पताल पहुंच जाना और अच्छा इलाज मिल जाना एक बात है; उपचार के हर चरण में बचाव योग्य जोखिम कम होना दूसरी बात है।
भारत में कई उत्कृष्ट अस्पताल हैं, अनेक संस्थानों ने गुणवत्ता और संक्रमण नियंत्रण के अच्छे मानक विकसित किए हैं, और डिजिटल रिकॉर्ड जैसी प्रणालियां धीरे-धीरे बढ़ रही हैं। फिर भी स्वास्थ्य प्रणाली बहुत विषम है। महानगर के सुपर-स्पेशियलिटी अस्पताल और दूरदराज जिले के सीमित संसाधनों वाले अस्पताल के बीच अंतर बहुत बड़ा है। ऐसे में मरीज सुरक्षा को केवल ‘बड़ी संस्थाओं’ का विषय मान लेना गलत होगा। दरअसल जहां संसाधन कम हैं, वहां मानकीकृत सुरक्षा प्रक्रियाएं और भी जरूरी हो जाती हैं।
कोरिया की प्रस्तावित नीति भारत को कम से कम तीन सबक देती है। पहला, मरीज सुरक्षा को गुणवत्ता सुधार का उप-विषय भर नहीं माना जा सकता; उसे अलग नीति और प्रशासनिक ध्यान चाहिए। दूसरा, रिपोर्टिंग का मतलब दोषी खोजने की मशीन बनाना नहीं, बल्कि सीखने की प्रणाली बनाना है। तीसरा, मरीज और परिवार को सूचना, भागीदारी और शिकायत-मार्गदर्शन दिए बिना कोई भी सुरक्षा मॉडल अधूरा है।
भारतीय संदर्भ में यह बहस विशेष रूप से इसलिए भी प्रासंगिक है क्योंकि अब डिजिटल हेल्थ आईडी, ई-रिकॉर्ड, आयुष्मान भारत जैसी योजनाएं और अस्पतालों का तेजी से बदलता ढांचा, देखभाल को अधिक जटिल बना रहा है। जटिलता बढ़ेगी तो सुरक्षा को भी उतनी ही परतों में सोचना होगा। एक स्वास्थ्य प्रणाली की परिपक्वता का माप केवल इस बात से नहीं होता कि वह कितने मरीजों का इलाज करती है; यह भी उतना ही अहम है कि वह कितनी पारदर्शिता से अपनी गलतियों से सीखती है।
दक्षिण कोरिया अभी ‘प्रस्ताव’ के चरण में है। अंतिम संरचना, कर्मियों की संख्या, अधिकारों का दायरा, अन्य विभागों से समन्वय—ये सब आने वाले समय में स्पष्ट होंगे। इसलिए यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि नया विभाग बनते ही सब कुछ बदल जाएगा। लेकिन संकेत साफ है: मरीज सुरक्षा अब परिधि का विषय नहीं, केंद्र की चिंता बन रही है। यही इस पहल का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है।
और शायद यही वह बिंदु है जहां भारत सहित पूरे एशिया को गंभीरता से सोचना चाहिए। अस्पताल केवल इलाज की जगह नहीं, विश्वास की संस्था होते हैं। यदि मरीज को यह भरोसा हो कि प्रणाली उसकी सुरक्षा के लिए निरंतर सीख रही है, सुधार रही है और जवाबदेह है, तो चिकित्सा व्यवस्था का नैतिक आधार मजबूत होता है। कोरिया की यह पहल अभी कागज पर है, लेकिन इसने एक जरूरी बहस को फिर से सामने ला दिया है—स्वास्थ्य सेवा में सबसे पहली शर्त क्या होनी चाहिए? जवाब सीधा है: मरीज पहले सुरक्षित हो, तभी व्यवस्था सचमुच आधुनिक कही जाएगी।
0 टिप्पणियाँ