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कम उम्र में फैटी लिवर अब सिर्फ ‘लिवर की बीमारी’ नहीं: नई कोरियाई स्टडी में युवाओं में किडनी कैंसर का खतरा बढ़ने के संकेत

कम उम्र में फैटी लिवर अब सिर्फ ‘लिवर की बीमारी’ नहीं: नई कोरियाई स्टडी में युवाओं में किडनी कैंसर का खतरा बढ़ने के संकेत

युवाओं के लिए नई चेतावनी: फैटी लिवर को हल्के में लेना अब मुश्किल

भारत में 20 से 39 वर्ष की उम्र को आम तौर पर जीवन का सबसे सक्रिय, उत्पादक और ‘स्वस्थ’ दौर माना जाता है। नौकरी की शुरुआत, उच्च शिक्षा, महानगरों की तेज रफ्तार, फिटनेस की छवि और सोशल मीडिया पर दिखने वाली जीवनशैली—इन सबके बीच यह मान लिया जाता है कि गंभीर बीमारियां अभी बहुत दूर की बात हैं। लेकिन दक्षिण कोरिया से आई एक बड़ी शोध-आधारित खबर इस धारणा को चुनौती देती है। वहां के शोधकर्ताओं ने पाया कि कम उम्र में होने वाली नॉन-अल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज, यानी ऐसी स्थिति जिसमें शराब के कारण नहीं बल्कि चर्बी जमा होने के कारण लिवर प्रभावित होता है, आगे चलकर किडनी कैंसर के बढ़े हुए खतरे से जुड़ी हो सकती है।

कोरिया यूनिवर्सिटी अंसान अस्पताल से जुड़े शोधकर्ताओं ने 2009 से 2012 के बीच राष्ट्रीय स्वास्थ्य परीक्षण कराने वाले 20 से 39 वर्ष के लगभग 56 लाख कोरियाई युवाओं का अधिकतम 12 वर्षों तक पीछा किया। इस अवधि में कुल 2,956 लोगों में किडनी कैंसर पाया गया। अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह था कि जिन युवाओं में नॉन-अल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज मौजूद थी, उनमें किडनी कैंसर का जोखिम उन लोगों की तुलना में लगभग 1.46 गुना अधिक था जिनमें फैटी लिवर नहीं था। और जब फैटी लिवर के साथ मोटापा भी मौजूद था, तब यह जोखिम लगभग 2.12 गुना तक बढ़ गया।

यह निष्कर्ष इसलिए अहम है क्योंकि फैटी लिवर को अब तक बहुत से लोग केवल रिपोर्ट पर लिखा एक ‘कॉमन फाइंडिंग’ मानते रहे हैं—कुछ वैसा ही जैसे डॉक्टर कह दें कि वजन थोड़ा ज्यादा है, खानपान सुधारिए और टहल लीजिए। भारतीय संदर्भ में भी यही रवैया अक्सर देखने को मिलता है। हेल्थ चेक-अप की रिपोर्ट में ‘फैटी लिवर’ लिखा होता है, परिवार में कोई कह देता है, ‘आजकल किसे नहीं है’, और मामला वहीं खत्म हो जाता है। लेकिन यह शोध कहता है कि कहानी लिवर पर खत्म नहीं होती। फैटी लिवर शरीर के पूरे मेटाबॉलिक सिस्टम में गड़बड़ी का संकेत हो सकता है, और यह गड़बड़ी आगे चलकर दूसरे अंगों पर भी असर डाल सकती है।

ध्यान देने वाली बात यह भी है कि यह संबंध उम्र, लिंग, धूम्रपान और शराब सेवन जैसे कारकों से परे भी लगातार देखा गया। यानी मामला केवल उन लोगों का नहीं है जिनकी जीवनशैली बहुत खराब है, बल्कि यह एक व्यापक जैविक चेतावनी की तरह उभरता है। भारतीय युवाओं के लिए, खासकर शहरी कामकाजी वर्ग, कॉलेज छात्रों, कोचिंग संस्कृति से गुजर रहे युवाओं और देर रात की दिनचर्या में उलझे पेशेवरों के लिए, यह खबर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हमारे यहां भी कम उम्र में मोटापा, प्री-डायबिटीज, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल और फैटी लिवर तेजी से बढ़ रहे हैं।

यह कहना सही नहीं होगा कि फैटी लिवर का मतलब निश्चित रूप से किडनी कैंसर है। लेकिन यह कहना भी अब मुश्किल है कि फैटी लिवर सिर्फ एक मामूली, अस्थायी या नगण्य समस्या है। असल संदेश यही है: युवा होना सुरक्षा कवच नहीं है।

यह शोध इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जा रहा है

स्वास्थ्य से जुड़ी खबरों में अक्सर छोटे समूहों पर किए गए अध्ययन सामने आते हैं, जिनके नतीजों को आम जनता पर लागू करने में सावधानी बरतनी पड़ती है। लेकिन इस कोरियाई शोध का वजन इसके आकार और अवधि से आता है। 56 लाख से अधिक युवाओं का डेटा, और अधिकतम 12 साल तक की निगरानी—यह किसी साधारण अस्पताल-आधारित केस स्टडी की बात नहीं है। किडनी कैंसर बहुत आम कैंसरों में शामिल नहीं होता, इसलिए उसके जोखिम को समझने के लिए बड़ी आबादी और लंबा समय दोनों जरूरी होते हैं। इस शोध में 2,956 वास्तविक मामलों का सामने आना सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण माना जाएगा।

दूसरी बड़ी बात यह है कि अध्ययन ने खास तौर पर 20 से 39 वर्ष के आयु वर्ग पर ध्यान केंद्रित किया। यही वह आयु है जिसे आमतौर पर कैंसर के लिहाज से कम जोखिम वाला माना जाता है। मेडिकल बातचीत में भी कैंसर पर चर्चा अधिकतर मध्यम आयु या बुजुर्ग आबादी के संदर्भ में होती है। ऐसे में यदि किसी युवा की रिपोर्ट में फैटी लिवर मिलता है तो उसे अक्सर ‘अभी संभल जाओ, सब ठीक हो जाएगा’ वाली सलाह तक सीमित कर दिया जाता है। यह सलाह गलत नहीं है, लेकिन शायद अधूरी है। क्योंकि यदि उसी उम्र में फैटी लिवर भविष्य के गंभीर रोगों के बढ़े जोखिम से जुड़ रहा है, तो उसका चिकित्सकीय और सार्वजनिक स्वास्थ्य महत्व कहीं अधिक हो जाता है।

इस शोध के पीछे मूल विचार यह है कि नॉन-अल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज केवल लिवर की स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि पूरे शरीर के बिगड़े मेटाबॉलिक माहौल का दर्पण हो सकती है। जब शरीर में इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ता है, पेट के आसपास चर्बी जमा होती है, सूजन का स्तर ऊपर रहता है, ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और लिपिड प्रोफाइल गड़बड़ाते हैं, तब कई अंग एक-दूसरे से स्वतंत्र नहीं रह जाते। लिवर, किडनी, हृदय, अग्न्याशय—सब पर असर पड़ सकता है।

भारतीय पाठकों के लिए इसे ऐसे समझा जा सकता है जैसे किसी घर की दीवार पर आई दरार सिर्फ प्लास्टर की समस्या न होकर नींव में बदलाव का संकेत हो। फैटी लिवर भी कुछ मामलों में यही भूमिका निभा सकता है—रिपोर्ट पर दिखने वाली एक पंक्ति, जो शरीर के अंदर चल रही बड़ी गड़बड़ी की ओर इशारा करती है।

शोधकर्ताओं ने यह भी रेखांकित किया कि फैटी लिवर और किडनी कैंसर के बीच संबंध धूम्रपान, शराब, उम्र और लिंग जैसे परिचित जोखिम कारकों को ध्यान में रखने के बाद भी बना रहा। चिकित्सा भाषा में इसे ‘स्वतंत्र जोखिम कारक’ की दिशा में संकेत माना जाता है। सामान्य पाठक के लिए इसका अर्थ है कि फैटी लिवर को केवल किसी और समस्या का साइड इफेक्ट मानकर नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा।

जब मोटापा साथ हो, खतरे की घंटी और तेज बजती है

इस अध्ययन का सबसे तीखा निष्कर्ष वही है जो आधुनिक जीवनशैली की सबसे बड़ी विडंबना भी है—बीमारियां अकेले नहीं आतीं। जब फैटी लिवर के साथ मोटापा जुड़ा हुआ था, तब किडनी कैंसर का जोखिम लगभग 2.12 गुना तक बढ़ा हुआ पाया गया। इसका अर्थ यह नहीं कि हर मोटापे से ग्रस्त युवा को कैंसर होगा, लेकिन यह जरूर दिखाता है कि शरीर के भीतर जोखिम कारक एक-दूसरे को बढ़ा सकते हैं।

भारत में मोटापा अब केवल समृद्धि या उम्रदराज़ी से जुड़ी समस्या नहीं रहा। महानगरों से लेकर टियर-2 शहरों तक, आईटी सेक्टर के युवा, कॉल सेंटर कर्मचारियों, बैंकिंग और कॉरपोरेट पेशेवरों, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में घंटों बैठे रहने वाले छात्र, और यहां तक कि स्कूल-कॉलेज के युवाओं में भी पेट की चर्बी, कम शारीरिक सक्रियता और अनियमित भोजन आम हो चुके हैं। दिन भर स्क्रीन के सामने बैठे रहना, देर रात तक काम या पढ़ाई, नींद की कमी, मीठे पेय, तली-भुनी चीजें, बार-बार बाहर का खाना, और सप्ताहांत में ‘चीट मील’—ये सब मिलकर मेटाबॉलिक जोखिम को बढ़ाते हैं।

कोरिया की तरह भारत में भी ‘दिखने में ठीक’ और ‘असल में स्वस्थ’ होने के बीच फर्क बढ़ता जा रहा है। कई युवा ऐसे होते हैं जो बहुत अधिक मोटे नहीं दिखते, लेकिन पेट के भीतर चर्बी जमा होती है, जिसे विसरल फैट कहा जाता है। यही चर्बी इंसुलिन रेजिस्टेंस, फैटी लिवर और अन्य मेटाबॉलिक समस्याओं से जुड़ी होती है। दक्षिण एशियाई आबादी, खासकर भारतीयों में, तुलनात्मक रूप से कम बॉडी मास इंडेक्स पर भी मेटाबॉलिक जोखिम अधिक पाया जाता है। इस वजह से यह खबर हमारे लिए और भी प्रासंगिक बन जाती है।

यह समझना जरूरी है कि मोटापा केवल वजन मशीन का अंक नहीं है। यह एक जैविक स्थिति है जो हार्मोनल असंतुलन, दीर्घकालिक सूजन, ग्लूकोज चयापचय की गड़बड़ी और कई अंगों पर दबाव पैदा कर सकती है। फैटी लिवर उसी पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा है। इसलिए जब डॉक्टर केवल ‘वजन घटाइए’ कहते हैं, तो उसका अर्थ कई बार उससे कहीं बड़ा होता है जितना सुनने वाले को महसूस होता है।

भारतीय परिवारों में अक्सर युवा अवस्था में खाने-पीने पर ‘अभी खा लो, उम्र ही क्या है’ जैसा दृष्टिकोण मिलता है। यह सांस्कृतिक तौर पर सहज है, लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य के नजरिए से समस्या बन सकता है। क्योंकि 20 और 30 के दशक की जीवनशैली ही 40 और 50 की बीमारियों की नींव रखती है। यह अध्ययन इसी जमा होते जोखिम की याद दिलाता है।

फैटी लिवर: आखिर यह है क्या, और युवा इसे समझें कैसे

नॉन-अल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज, जिसे संक्षेप में एनएएफएलडी कहा जाता रहा है, वह स्थिति है जिसमें लिवर में चर्बी जमा हो जाती है, जबकि कारण शराब नहीं होता। हाल के वर्षों में चिकित्सा समुदाय में इसके लिए नए नाम और वर्गीकरण पर भी चर्चा हुई है, क्योंकि यह बीमारी मूल रूप से मेटाबॉलिक गड़बड़ियों से जुड़ी होती है। लेकिन आम पाठक के लिए सरल भाषा में बात करें तो इसका मतलब है—लिवर पर ऐसी चर्बी चढ़ना जो शरीर के ऊर्जा और पोषण संतुलन के बिगड़ने का संकेत है।

इसकी परेशानी यह है कि अधिकतर मामलों में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होते। व्यक्ति सामान्य दिनचर्या करता रहता है। कभी-कभी थकान, भारीपन, या जांच में लिवर एंजाइम बढ़े होने जैसे संकेत मिलते हैं, लेकिन बहुत से मामलों में यह केवल अल्ट्रासाउंड या हेल्थ चेक-अप के दौरान पता चलता है। इसी वजह से इसे ‘साइलेंट’ समस्या भी कहा जाता है।

कोरिया के अध्ययन ने इसी साइलेंट स्थिति को गंभीरता से देखने की मांग की है। क्योंकि यदि एक ऐसी बीमारी जिसमें तत्काल दर्द या स्पष्ट असुविधा नहीं होती, भविष्य में कैंसर जैसे गंभीर जोखिम से जुड़ रही है, तो स्क्रीनिंग रिपोर्ट पर लिखी ‘फैटी लिवर’ की टिप्पणी का महत्व बढ़ जाता है।

भारतीय स्वास्थ्य जांच शिविरों और कॉरपोरेट वार्षिक हेल्थ पैकेजों में भी फैटी लिवर अक्सर सामने आता है। समस्या यह है कि मरीज और कभी-कभी चिकित्सकीय तंत्र भी इसे व्यवहार परिवर्तन में बदलने में असफल रहते हैं। रिपोर्ट फाइल में रख दी जाती है, अगली बार फिर वही परिणाम आता है, और फिर धीरे-धीरे यह एक ‘नॉर्मल असामान्यता’ बन जाती है। यानी असामान्य होने के बावजूद इतनी आम कि वह सामान्य लगने लगे। यही सबसे खतरनाक स्थिति है।

किडनी कैंसर का सीधा अर्थ यह नहीं कि हर फैटी लिवर रोगी को किडनी की विशेष स्कैनिंग करानी चाहिए। विशेषज्ञ इसी बिंदु पर सावधानी बरतने को कहेंगे। लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि यदि किसी युवा में फैटी लिवर है, खासकर साथ में मोटापा, बढ़ी हुई कमर, उच्च रक्तचाप, शुगर या असामान्य लिपिड प्रोफाइल भी मौजूद हैं, तो उसे अपने स्वास्थ्य को टुकड़ों में नहीं बल्कि एक समग्र तस्वीर की तरह देखना चाहिए।

भारतीय युवाओं की जीवनशैली और क्यों यह खबर हमारे लिए खास मायने रखती है

कोरियाई समाज की तरह भारत का शहरी युवा वर्ग भी तेजी से बदलते सामाजिक-सांस्कृतिक दबावों से गुजर रहा है। काम के घंटे लंबे हैं, घर से दूर रहना आम है, बाहर का खाना आसानी से उपलब्ध है, और नींद अक्सर सबसे पहले बलिदान होती है। ‘वर्क हार्ड, पार्टी हार्ड’ और ‘ऑनलाइन हमेशा उपलब्ध’ रहने की संस्कृति शरीर को जितना नुकसान पहुंचाती है, उसका हिसाब तुरंत नहीं दिखता।

भारतीय भोजन परंपरा अपने आप में समस्या नहीं है। समस्या है उसका नया शहरी संस्करण—अत्यधिक परिष्कृत कार्बोहाइड्रेट, चीनी से भरे पेय, बड़ी मात्रा में तली चीजें, कम फाइबर, और बहुत कम शारीरिक गतिविधि। ऊपर से तनाव। तनाव केवल मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं है; यह हार्मोनल और मेटाबॉलिक बदलावों से भी जुड़ता है। जब यह पूरा चक्र चलता है, तो फैटी लिवर जैसी स्थितियां उभरती हैं।

कई भारतीय युवा मानते हैं कि वे शराब कम पीते हैं, इसलिए लिवर से जुड़ी बीमारी का खतरा कम होगा। लेकिन नॉन-अल्कोहॉलिक फैटी लिवर की यही खासियत है—यह शराब के बिना भी हो सकता है। यही कारण है कि यह बीमारी भ्रम पैदा करती है। व्यक्ति सोचता है कि उसने कोई ‘गलत आदत’ नहीं अपनाई, फिर भी रिपोर्ट खराब कैसे आई। दरअसल, शरीर को नुकसान केवल एक कारण से नहीं, बल्कि कई छोटे-छोटे रोज़मर्रा के पैटर्न से होता है।

भारत में एक और चुनौती है—नियमित स्वास्थ्य जांच के प्रति उदासीनता। बहुत से युवा डॉक्टर के पास तब जाते हैं जब लक्षण परेशान करने लगते हैं। लेकिन फैटी लिवर और प्रारंभिक किडनी कैंसर दोनों ही लंबे समय तक बिना स्पष्ट लक्षण के रह सकते हैं। इसलिए इस अध्ययन का वास्तविक संदेश जांच का आतंक पैदा करना नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के शुरुआती संकेतों को गंभीरता से लेना है।

अगर किसी युवा को हेल्थ चेक-अप में फैटी लिवर बताया गया है, तो उसे इसे केवल ‘थोड़ा वजन बढ़ गया’ के स्तर पर सीमित न समझना चाहिए। यह उस बिंदु की तरह है जहां जीवनशैली में सुधार सबसे अधिक लाभ दे सकता है। भारतीय संदर्भ में इसका अर्थ हो सकता है—नियमित पैदल चलना, सप्ताह में कम से कम 150 मिनट मध्यम तीव्रता का व्यायाम, मीठे पेय कम करना, रात का खाना हल्का रखना, पर्याप्त नींद लेना, और यदि जरूरत हो तो डॉक्टर या डाइटीशियन की मदद से योजनाबद्ध वजन प्रबंधन करना।

किडनी कैंसर की चुनौती: क्यों शुरुआती संकेत अक्सर छूट जाते हैं

किडनी कैंसर उन कैंसरों में से है जो शुरुआती चरण में कई बार बिना स्पष्ट लक्षण के रह सकता है। यही वजह है कि कई मरीजों में यह किसी दूसरे कारण से कराई गई जांच में संयोग से पकड़ में आता है। पारंपरिक तौर पर खून आना, कमर या पेट के एक तरफ दर्द, या वजन कम होना जैसे संकेत बताए जाते हैं, लेकिन ये हमेशा शुरुआती चरण में मौजूद नहीं होते।

ऐसे में जोखिम कारकों को पहचानना अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। कोरियाई अध्ययन का असली महत्व इसी जगह है। यह कहता है कि युवाओं में फैटी लिवर, खासकर मोटापे के साथ, एक ऐसी चेतावनी हो सकती है जिसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इसका मतलब यह नहीं कि हर व्यक्ति को तुरंत सीटी स्कैन या महंगी जांच करानी चाहिए। बल्कि इसका मतलब है कि डॉक्टर और मरीज दोनों फैटी लिवर वाले युवाओं को ‘लो-रिस्क’ मानकर सहज न हो जाएं।

भारतीय चिकित्सा व्यवस्था में भी यह सोच विकसित करने की जरूरत है कि युवा मरीजों की परामर्श प्रक्रिया केवल तत्काल लक्षणों तक सीमित न रहे। यदि किसी युवा में फैटी लिवर, उच्च रक्तचाप, प्री-डायबिटीज, मोटापा या परिवार में कैंसर और मेटाबॉलिक रोगों का इतिहास है, तो परामर्श को अधिक संरचित होना चाहिए। यह भी जरूरी है कि मरीज को डराकर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तरीके से समझाया जाए कि कौन-से संकेतों को तुरंत दिखाना चाहिए।

उदाहरण के लिए, पेशाब में खून आना, बिना कारण वजन घटना, लगातार थकान, पेट या कमर के एक हिस्से में असामान्य दर्द, या जांच में बार-बार असामान्य परिणाम आना—इन स्थितियों को हल्के में नहीं लेना चाहिए। लेकिन यहां संतुलन भी आवश्यक है। सार्वजनिक स्वास्थ्य संदेश ऐसा नहीं होना चाहिए कि हर फैटी लिवर रोगी घबरा जाए। सही संदेश यह है कि सावधानी, नियमित फॉलो-अप और जीवनशैली सुधार के जरिए जोखिम को गंभीरता से लिया जाए।

नीति, हेल्थ चेक-अप और डॉक्टर-मरीज संवाद में क्या बदलना चाहिए

यह शोध केवल एक वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं, बल्कि स्वास्थ्य नीति के लिए भी संकेत है। भारत में हेल्थ चेक-अप की संस्कृति बढ़ रही है, लेकिन जांच के बाद की परामर्श व्यवस्था अभी भी कमजोर है। रिपोर्ट हाथ में देने से स्वास्थ्य नहीं सुधरता; स्वास्थ्य तब सुधरता है जब रिपोर्ट के अर्थ को समझाया जाए और उसके आधार पर व्यवहारिक, मापने योग्य बदलाव सुझाए जाएं।

यदि फैटी लिवर किसी युवा में पाया जाता है, तो परामर्श का मॉडल ‘वजन कम कर लीजिए’ तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे यह बताया जाना चाहिए कि यह स्थिति डायबिटीज, हृदय रोग, मेटाबॉलिक सिंड्रोम और अब उभरते शोध के अनुसार कुछ कैंसर जोखिमों से भी जुड़ सकती है। इस तरह की स्पष्ट बातचीत लोगों में गंभीरता पैदा करती है। भारतीय परिवारों में भी जब बीमारी का संदर्भ ठोस होता है, तब व्यवहार परिवर्तन की संभावना बढ़ती है।

सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों में युवाओं के लिए मेटाबॉलिक स्वास्थ्य को अधिक प्राथमिकता देने की जरूरत है। हमारे यहां अभी भी कई लोग उच्च रक्तचाप, शुगर और फैटी लिवर को ‘मिडिल एज’ की समस्या मानते हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि 20 और 30 के दशक में बने पैटर्न ही आगे के दशकों की बीमारी तय करते हैं। इसलिए स्कूल, कॉलेज, कार्यस्थल और डिजिटल हेल्थ प्लेटफॉर्म—सभी जगह मेटाबॉलिक जोखिम के बारे में स्पष्ट, स्थानीय भाषा में और सांस्कृतिक रूप से समझ में आने वाली जानकारी दी जानी चाहिए।

डॉक्टरों के लिए भी यह एक संकेत है कि फैटी लिवर पर बातचीत को केवल लिवर एंजाइम की चर्चा तक सीमित न रखें। मरीज के लिए सवाल यह नहीं होता कि एसजीपीटी कितना बढ़ा है; सवाल यह होता है कि इसका मेरे जीवन पर क्या असर पड़ेगा। यदि जवाब में यह बताया जाए कि फैटी लिवर भविष्य के गंभीर रोगों का शुरुआती संकेत हो सकता है, तो बातचीत की गंभीरता बदल जाती है।

अंततः, इस कोरियाई अध्ययन का सबसे बड़ा संदेश यही है कि आधुनिक जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां उम्र का इंतजार नहीं करतीं। फैटी लिवर एक ‘रिपोर्ट की लाइन’ नहीं, बल्कि शरीर का संदेश हो सकता है कि अब दिशा बदलने की जरूरत है। भारत के युवा, जो अक्सर अपने करियर, परीक्षा, परिवार और सामाजिक आकांक्षाओं के बीच स्वास्थ्य को पीछे छोड़ देते हैं, उनके लिए यह खबर एक समयोचित चेतावनी है। यह डराने वाली खबर नहीं होनी चाहिए, लेकिन जगाने वाली जरूर होनी चाहिए। अभी संभलना संभव है—और शायद यही इस शोध की सबसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक उपयोगिता है।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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