
तकनीक की चमक के पीछे छिपा बड़ा सवाल
दक्षिण कोरिया के दक्षिण जिओला प्रांत के तटीय शहर येओसू में अप्रैल 2026 के तीसरे सप्ताह के दौरान एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय विमर्श आयोजित होने जा रहा है, जो पहली नजर में केवल तकनीक-केन्द्रित सम्मेलन लग सकता है, लेकिन वास्तव में इसकी बुनियाद कहीं अधिक राजनीतिक, सामाजिक और नैतिक है। 21 से 25 अप्रैल तक आयोजित होने वाले संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय यानी यूएनएफसीसीसी के तीसरे ‘क्लाइमेट वीक’ के आधिकारिक कार्यक्रमों के बीच 23 अप्रैल को एक विशेष फोरम रखा गया है, जिसका विषय है—विकासशील देशों की जलवायु कार्रवाई में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, यानी एआई, की भूमिका। इस कार्यक्रम का आयोजन कोरिया की विकास सहयोग एजेंसी कोइका और यूएनएफसीसीसी सचिवालय मिलकर कर रहे हैं।
लेकिन इस बैठक की असली अहमियत किसी नए ऐप, किसी बड़े टेक डेमो या किसी कॉरपोरेट प्रस्तुति में नहीं है। केंद्र में है एक असहज प्रश्न: जलवायु संकट का सबसे गहरा आघात किन देशों और समुदायों पर पड़ रहा है, और क्यों उन्हीं के पास उससे निपटने की क्षमता सबसे कम है? यही वह बिंदु है जहां ‘क्लाइमेट एआई’ का विमर्श तकनीकी प्रगति की चर्चा से आगे बढ़कर वैश्विक न्याय, विकास सहयोग और असमानता के प्रश्नों से जुड़ जाता है।
भारतीय पाठकों के लिए इसे समझना मुश्किल नहीं होना चाहिए। हमारे यहां भी हर साल बाढ़, लू, चक्रवात, अनियमित मानसून और सूखे का असर सब पर एक जैसा नहीं पड़ता। दिल्ली की गर्मी और बुंदेलखंड की गर्मी एक जैसी नहीं होती, क्योंकि तापमान के साथ संसाधन, संस्थागत तैयारी और सामाजिक सुरक्षा भी मायने रखते हैं। ठीक इसी तरह, जलवायु संकट में ‘जोखिम’ और ‘क्षमता’ का रिश्ता दुनिया भर में असमान है। येओसू में होने वाली चर्चा इसी वैश्विक विषमता को तकनीक के आईने में देखने की कोशिश है।
दक्षिण कोरिया पिछले दो दशकों में केवल तकनीकी शक्ति या सांस्कृतिक प्रभाव—जैसे के-पॉप, कोरियन ड्रामा या ब्यूटी इंडस्ट्री—के कारण ही नहीं, बल्कि एक सक्रिय विकास भागीदार के रूप में भी उभरा है। इसलिए यह फोरम कोरिया के लिए केवल मेजबानी का मामला नहीं, बल्कि अपनी अंतरराष्ट्रीय भूमिका को नए ढंग से परिभाषित करने का अवसर भी है।
जलवायु असमानता का मतलब केवल ज्यादा आपदा नहीं
जलवायु असमानता शब्द सुनते ही सामान्यतः यह समझ आता है कि कुछ देश या क्षेत्र अधिक बाढ़, अधिक गर्मी, अधिक सूखा या अधिक समुद्री कटाव झेलते हैं। यह बात सच है, लेकिन कहानी का केवल एक हिस्सा है। असली असमानता केवल आपदा की तीव्रता में नहीं, बल्कि उस आपदा को पहचानने, उसका पूर्वानुमान लगाने, लोगों को समय पर चेतावनी देने, नुकसान घटाने और बाद में व्यवस्थित पुनर्वास करने की क्षमता में होती है।
मान लीजिए दो तटीय देशों पर समान तीव्रता का चक्रवात आता है। एक देश में मौसम डेटा नियमित रूप से इकट्ठा होता है, उपग्रह और स्थानीय स्टेशन जुड़े होते हैं, प्रशासनिक व्यवस्था तेज है, मोबाइल अलर्ट सिस्टम सक्रिय है, और स्थानीय निकायों तक आदेश पहुंचते हैं। दूसरे देश में बिजली आपूर्ति अस्थिर है, इंटरनेट कमजोर है, मौसम रिकॉर्ड बिखरे हुए हैं, चेतावनी प्रणाली अधूरी है और प्रशासनिक अमला संसाधनविहीन है। दोनों पर एक ही चक्रवात आता है, लेकिन परिणाम अलग होंगे। यह अंतर प्रकृति नहीं, संरचना पैदा करती है।
यही कारण है कि आज अंतरराष्ट्रीय विकास सहयोग में जलवायु संकट पर बात केवल उत्सर्जन घटाने या धन जुटाने तक सीमित नहीं रही। अब यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि तकनीकी पहुंच में असमानता कहीं जलवायु न्याय की नई दीवार तो नहीं बना रही। एआई को अक्सर भविष्यवाणी, जोखिम मॉडलिंग, फसल आकलन, जल प्रबंधन, ऊर्जा दक्षता और आपदा पूर्व चेतावनी के लिए उपयोगी बताया जाता है। यह सब संभावनाएं वास्तविक हैं। मगर सवाल यह है कि क्या जिन देशों को इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है, वे इसे प्रभावी ढंग से उपयोग कर भी पाएंगे?
भारतीय संदर्भ में देखें तो हमें इस बहस का अर्थ तुरंत समझ आ सकता है। भारत में भी तकनीक उपलब्ध होने भर से समस्या हल नहीं होती। कई राज्यों में मौसम चेतावनी प्रणाली बेहतर हुई है, लेकिन अंतिम मील तक सूचना पहुंचाने में अभी भी पंचायत, भाषा, फोन नेटवर्क, स्थानीय प्रशासन और सामाजिक भरोसे की भूमिका निर्णायक रहती है। यही बात अफ्रीका, एशिया और छोटे द्वीपीय देशों के लिए भी उतनी ही सच है। इसलिए जलवायु असमानता का मूल प्रश्न है—किसके पास प्रतिक्रिया की संस्थागत क्षमता है, और किसके पास नहीं?
एआई: समाधान भी, नई खाई का जोखिम भी
एआई को लेकर वैश्विक उत्साह इस समय चरम पर है। जलवायु क्षेत्र में भी इसकी उपयोगिता के अनेक उदाहरण सामने रखे जा रहे हैं—अत्यधिक वर्षा की संभावना का जल्दी पता लगाना, सूखे के पैटर्न को समझना, फसल बीमा मॉडल बेहतर बनाना, समुद्री स्तर में बदलाव पर निगरानी, वनाग्नि जोखिम की पहचान, और सीमित राहत संसाधनों को अधिक प्रभावी ढंग से बांटना। इन सबमें एआई एक शक्तिशाली उपकरण बन सकता है।
लेकिन एआई कोई जादुई छड़ी नहीं है। यह तभी काम करता है जब उसके पीछे विश्वसनीय डेटा, कंप्यूटिंग ढांचा, प्रशिक्षित विशेषज्ञ, स्थिर बिजली, डिजिटल कनेक्टिविटी और सार्वजनिक संस्थाओं की कार्यक्षमता मौजूद हो। यदि डेटा अधूरा हो, स्थानीय भाषा समर्थन न हो, मॉडल बाहरी संदर्भों पर बने हों, और प्रशासनिक संस्थाएं कमज़ोर हों, तो एआई का परिणाम भ्रमित करने वाला भी हो सकता है। कई बार तकनीक की चमक वास्तविक समस्याओं को ढक देती है।
यही वह बिंदु है जहां येओसू फोरम खास बन जाता है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इसमें केवल ‘एआई क्या कर सकता है’ पर बात नहीं होगी, बल्कि ‘किसकी जरूरत क्या है’ और ‘तकनीक को किस तरह लागू किया जाए’ जैसे सवाल भी केंद्र में रहेंगे। यह अंतर बेहद महत्वपूर्ण है। बहुत-सी अंतरराष्ट्रीय बैठकें उन्नत तकनीक का प्रदर्शन बनकर रह जाती हैं, जहां विकासशील देशों की भूमिका श्रोता या संभावित ग्राहक की होती है। लेकिन अगर चर्चा का ढांचा मांग-आधारित है, तो इसका मतलब है कि स्थानीय जरूरतें, प्रशासनिक सीमाएं और सामाजिक वास्तविकताएं भी विमर्श का हिस्सा बनेंगी।
भारतीय नीति जगत में लंबे समय से ‘उपयुक्त तकनीक’ का विचार मौजूद है। हर समस्या के लिए सबसे महंगी या सबसे आधुनिक तकनीक जरूरी नहीं होती; जरूरी यह है कि वह स्थानीय परिस्थितियों में टिकाऊ हो। गांव में पानी के संकट का हल हमेशा स्मार्ट सेंसर नहीं, कभी-कभी बेहतर स्थानीय जल संरचना और पारंपरिक ज्ञान के साथ डिजिटल निगरानी का संयोजन भी हो सकता है। विकासशील देशों के लिए जलवायु एआई पर यही कसौटी लागू होती है—चमकदार तकनीक नहीं, उपयुक्त तकनीक।
येओसू फोरम की रूपरेखा क्या बताती है
23 अप्रैल 2026 को होने वाले इस फोरम को दो सत्रों में बांटा गया है। पहला सत्र ‘जलवायु कार्रवाई के लिए एआई: विभिन्न क्षेत्रों में समाधान’ पर केंद्रित होगा। इसमें एआई नवोन्मेषक, वैश्विक कंपनियां, अंतरराष्ट्रीय संगठन और स्टार्टअप हिस्सा लेंगे। इस संरचना से संकेत मिलता है कि पहली चर्चा तकनीकी संभावनाओं, मॉडल, प्रयोगों और व्यावहारिक समाधानों की तुलना पर केंद्रित होगी। यहां यह देखने की कोशिश होगी कि निजी क्षेत्र, बहुपक्षीय संस्थाएं और नवप्रवर्तनकर्ता जलवायु क्षेत्र में एआई का उपयोग किस प्रकार कर रहे हैं।
दूसरा सत्र कहीं अधिक राजनीतिक और संस्थागत महत्व रखता है। इसका विषय है—‘खाई पाटना: जलवायु कार्रवाई में समर्थन के लिए मांग-आधारित दृष्टिकोण और एआई के उपयोग का विस्तार’। इसमें अंतरराष्ट्रीय संगठन, विकासशील देश, दाता संस्थाएं और बहुपक्षीय विकास बैंक शामिल होंगे। यही वह सत्र है जहां चर्चा तकनीक से हटकर शासन, वित्त, क्षमता निर्माण और न्यायपूर्ण पहुंच की ओर मुड़ेगी। दूसरे शब्दों में, सवाल यह नहीं रहेगा कि एआई क्या-क्या कर सकता है; सवाल होगा कि कौन, किन शर्तों पर, किस वित्तीय और संस्थागत समर्थन से इसका उपयोग कर सकता है।
यह सत्रीय संरचना बताती है कि आयोजक केवल समाधान बेचने वाले मंच की छवि नहीं चाहते। वे इस बात को स्वीकार कर रहे हैं कि जलवायु एआई का मुद्दा आपूर्ति-केन्द्रित नहीं हो सकता। अगर तकनीक बनाने वाले देश और कंपनियां एकतरफा समाधान पेश करेंगी, तो स्थानीय वास्तविकताओं की अनदेखी होगी। दूसरी ओर, यदि केवल जरूरतों की बात होगी और कार्यान्वयन तंत्र नहीं होगा, तो बहस घोषणाओं तक सीमित रह जाएगी। इसलिए येओसू की यह संरचना ‘तकनीकी क्षमता’ और ‘विकास न्याय’ के बीच पुल बनाने की कोशिश की तरह दिखती है।
यहां एक दिलचस्प सांस्कृतिक पहलू भी है। दक्षिण कोरिया अक्सर अपनी राष्ट्रीय कहानी को तेज आधुनिकीकरण, शिक्षा निवेश, निर्यात-आधारित विकास और राज्य-निजी सहयोग के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करता है। ऐसे में अगर वही देश जलवायु और एआई के प्रश्न पर ‘खाई पाटने’ को एजेंडा बनाता है, तो यह उसकी कूटनीतिक भाषा में एक परिपक्व बदलाव का संकेत है—सिर्फ विकास मॉडल दिखाने से आगे बढ़कर साझेदारी की शर्तों पर बात करना।
कोरिया की बदलती विकास कूटनीति और उसका संदेश
कोइका की इस फोरम में सह-मेजबानी केवल संस्थागत सूचना नहीं है; यह दक्षिण कोरिया की विकास कूटनीति में परिवर्तन का संकेत भी है। एक समय था जब कोरिया की विकास साझेदारी मुख्यतः अवसंरचना, प्रशासनिक अनुभव, शिक्षा और स्वास्थ्य परियोजनाओं के इर्द-गिर्द पहचानी जाती थी। वह ढांचा अभी भी महत्वपूर्ण है, लेकिन आज वैश्विक विकास एजेंडा पर दो चीजें लगभग हर विषय को काटती हैं—जलवायु और डिजिटल परिवर्तन। इन दोनों को जोड़कर ‘क्लाइमेट एआई’ जैसा विषय उठाना बताता है कि कोरिया खुद को नई पीढ़ी के विकास भागीदार के रूप में स्थापित करना चाहता है।
भारत के लिए यह रुझान परिचित है। हम भी पिछले कुछ वर्षों में डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, आपदा प्रबंधन, अंतरिक्ष डेटा, नवीकरणीय ऊर्जा और दक्षिण-दक्षिण सहयोग की भाषा को एक साथ जोड़ते देख रहे हैं। कोरिया का यह कदम उसी वैश्विक प्रवृत्ति का हिस्सा है, जिसमें देश केवल दान देने वाले नहीं, बल्कि समाधान-निर्माण और मानक-निर्धारण में भागीदारी चाहने वाले खिलाड़ी बन रहे हैं।
यूएनएफसीसीसी सचिवालय के साथ संयुक्त आयोजन का अपना कूटनीतिक महत्व है। इसका मतलब है कि यह कार्यक्रम किसी एक एजेंसी का सीमित सम्मेलन नहीं, बल्कि व्यापक वैश्विक जलवायु शासन के ढांचे के भीतर स्थित है। यह भी याद रखना चाहिए कि जलवायु अब केवल पर्यावरण मंत्रालयों का विषय नहीं रह गया। यह वित्त, तकनीक, विदेशी नीति, व्यापार, खाद्य सुरक्षा, शहरीकरण और विकास सहायता से जुड़ा हुआ मुद्दा है। एआई भी इसी तरह केवल तकनीकी नवाचार नहीं, बल्कि नियमों, डेटा स्वामित्व, पहुंच और जवाबदेही का विषय है। जब ये दोनों धाराएं एक मंच पर मिलती हैं, तो चर्चा का वजन स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है।
फिर भी सावधानी जरूरी है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर घोषणाएं करना आसान होता है, लेकिन उनके बाद वास्तविक साझेदारियां बनाना कठिन। विकासशील देशों के लिए सार्थक परिणाम तभी निकलेंगे जब सम्मेलन के बाद क्षमता निर्माण, वित्त पोषण, ओपन डेटा सहयोग, स्थानीय अनुकूलन और दीर्घकालिक संस्थागत समर्थन जैसे ठोस कदम सामने आएं। केवल यह कहना कि एआई जलवायु समाधान में मदद करेगा, पर्याप्त नहीं है। सवाल है—क्या यह मदद स्थानीय प्रशासन, किसानों, तटीय समुदायों, छोटे द्वीपीय राष्ट्रों और संसाधन-विहीन नगरपालिकाओं तक पहुंचेगी?
भारत और वैश्विक दक्षिण के लिए इस बहस का क्या अर्थ है
भारत, दक्षिण एशिया, अफ्रीका और छोटे द्वीपीय देशों के लिए यह बहस अत्यंत प्रासंगिक है। हमारे क्षेत्र के अनेक देश जलवायु झटकों के लिहाज से बेहद संवेदनशील हैं, लेकिन संसाधन और तकनीकी ढांचा सीमित है। भारत की स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत है, क्योंकि यहां मौसम विभाग, इसरो, डिजिटल अवसंरचना, आपदा प्रबंधन संस्थाएं और निजी तकनीकी क्षमता मौजूद है। फिर भी हमें पता है कि राष्ट्रीय क्षमता और स्थानीय कार्यान्वयन के बीच बड़ा अंतर रह सकता है। यही अंतर कम संसाधन वाले देशों में और अधिक तीखा हो जाता है।
इसलिए येओसू की चर्चा को केवल कोरिया-केन्द्रित समाचार समझना भूल होगी। यह वास्तव में उस बड़े प्रश्न से जुड़ी है कि भविष्य की जलवायु सहायता कैसी होगी। क्या सहायता केवल धन होगी? क्या वह केवल उपकरण देगी? या वह डेटा, प्रशिक्षण, स्थानीय भाषा समर्थन, संस्थागत सुधार, और सामुदायिक भागीदारी को भी शामिल करेगी? अगर एआई आधारित समाधान स्थानीय प्रशासन की समझ में ही न आएं, या वे विदेशी कंपनियों के बंद प्लेटफॉर्म पर निर्भर हों, तो वे विकासशील देशों को तकनीकी रूप से और निर्भर बना सकते हैं।
भारत के लिए इसमें अवसर भी हैं। हमारी डिजिटल क्षमता, कम लागत वाले तकनीकी समाधान, मौसम और कृषि डेटा के उपयोग के अनुभव, और दक्षिण-दक्षिण सहयोग की राजनीतिक भाषा हमें एक महत्वपूर्ण सेतु बना सकती है। भारत चाहे तो ऐसी बहसों में यह तर्क अधिक मजबूती से रख सकता है कि जलवायु तकनीक को सार्वजनिक हित की दृष्टि से देखा जाए, न कि केवल उच्च मूल्य वाले बाजार के रूप में। जिस प्रकार हमने डिजिटल भुगतान, पहचान और जनसेवा अवसंरचना के क्षेत्र में खुले, स्केलेबल और तुलनात्मक रूप से कम लागत वाले मॉडल का विमर्श आगे बढ़ाया, उसी तरह जलवायु डेटा और अनुकूलन तकनीक के क्षेत्र में भी भूमिका निभाई जा सकती है।
भारतीय पाठकों के लिए एक और तुलना उपयोगी होगी। जैसे हमारे यहां मानसून केवल मौसम नहीं, अर्थव्यवस्था, खेती, महंगाई और रोज़मर्रा की जिंदगी का सवाल है, वैसे ही कई विकासशील देशों में जलवायु जोखिम केवल पर्यावरण का विषय नहीं बल्कि रोज़गार, भोजन, स्वास्थ्य और प्रवासन का प्रश्न है। ऐसे में एआई पर चर्चा तभी सार्थक है जब वह लोगों के जीवन से जुड़ती हो।
आगे की चुनौती: चमकदार नवाचार नहीं, भरोसेमंद सार्वजनिक सहयोग
येओसू में होने वाला यह फोरम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमें याद दिलाता है कि जलवायु संकट के दौर में तकनीकी बहस का नैतिक आधार खोना नहीं चाहिए। दुनिया इस समय एआई की क्षमताओं से प्रभावित है, और कुछ हद तक मोहित भी। लेकिन जलवायु क्षेत्र में असली परीक्षा यह नहीं होगी कि कौन सबसे परिष्कृत मॉडल बना सकता है। असली परीक्षा यह होगी कि कौन ऐसी तकनीक विकसित और साझा कर सकता है जो सबसे कमजोर देशों और समुदायों के लिए उपयोगी, सुलभ, पारदर्शी और टिकाऊ हो।
यदि यह फोरम विकासशील देशों की वास्तविक जरूरतों को केंद्र में रखता है, यदि यह वित्तीय संस्थाओं, दाता एजेंसियों और तकनीकी कंपनियों को साझा जवाबदेही की दिशा में धकेलता है, और यदि इसके बाद ठोस भागीदारी मॉडल बनते हैं, तो यह केवल एक सम्मेलन नहीं रहेगा। तब यह विकास सहयोग के नए चरण की शुरुआत साबित हो सकता है—जहां एआई को शक्ति प्रदर्शन के बजाय सार्वजनिक भलाई के औजार के रूप में देखा जाएगा।
दक्षिण कोरिया के लिए यह एक परीक्षा भी है और अवसर भी। एक ऐसा देश, जिसने युद्धोत्तर गरीबी से उठकर तकनीकी और सांस्कृतिक महाशक्ति जैसा प्रभाव बनाया, अब यह दिखाना चाहता है कि वह वैश्विक विकास विमर्श में भी गंभीर भूमिका निभा सकता है। लेकिन इस दावे की विश्वसनीयता अंततः भाषणों से नहीं, साझेदारियों से बनेगी।
और भारत सहित वैश्विक दक्षिण के देशों के लिए संदेश साफ है: जलवायु न्याय की अगली लड़ाई केवल उत्सर्जन और वित्त की नहीं होगी, बल्कि डेटा, डिजिटल ढांचे, तकनीकी पहुंच और संस्थागत क्षमता की भी होगी। येओसू में ‘क्लाइमेट एआई’ पर होने वाली चर्चा उसी बदलती दुनिया की एक झलक है, जहां सवाल यह नहीं कि तकनीक मौजूद है या नहीं; सवाल यह है कि वह किसके लिए, किस कीमत पर, किस नियंत्रण में और किस न्यायपूर्ण ढांचे के भीतर उपलब्ध होगी। यही इस फोरम का सबसे बड़ा और सबसे जरूरी एजेंडा है।
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