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कान में फिर गूंजा कोरियाई सिनेमा का नाम: नाहोंग-जिन की ‘होप’ से लौटी दक्षिण कोरिया की वैश्विक दावेदारी

कान में फिर गूंजा कोरियाई सिनेमा का नाम: नाहोंग-जिन की ‘होप’ से लौटी दक्षिण कोरिया की वैश्विक दावेदारी

चार साल बाद प्रतियोगिता खंड में वापसी: यह सिर्फ एक फिल्म की खबर नहीं

दक्षिण कोरिया के चर्चित निर्देशक नाहोंग-जिन की नई फिल्म ‘होप’ को अगले महीने 12 तारीख से शुरू होने वाले कान अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के प्रतियोगिता खंड में चुना गया है। सतह पर देखें तो यह खबर एक नई फिल्म, एक बड़े निर्देशक और एक प्रतिष्ठित फेस्टिवल के बीच बने समीकरण की लग सकती है। लेकिन अगर इसे थोड़ा ठहरकर पढ़ा जाए, तो यह दक्षिण कोरियाई सिनेमा के लिए कहीं बड़ी वापसी का संकेत है। चार साल बाद किसी कोरियाई फिल्म का कान के मुख्य प्रतियोगिता खंड तक पहुंचना केवल सांस्कृतिक गौरव का मामला नहीं, बल्कि यह उस फिल्म उद्योग की सांसों की रफ्तार मापने जैसा है जिसे पिछले कुछ वर्षों में विश्व मंच पर असाधारण पहचान मिली, फिर अचानक एक खालीपन का सामना भी करना पड़ा।

भारतीय पाठकों के लिए इसे समझना मुश्किल नहीं होना चाहिए। जिस तरह हमारे यहां कोई हिंदी या भारतीय फिल्म वेनिस, बर्लिन या कान के मुख्य प्रतियोगिता खंड में पहुंचे तो उसे महज ‘विदेशी फेस्टिवल में चयन’ कहकर नहीं छोड़ा जाता, उसी तरह कोरिया में भी ‘होप’ का चयन राष्ट्रीय सिनेमा के आत्मविश्वास, अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति और उद्योग की रचनात्मक ताकत से जुड़ा मामला बन गया है। विशेष बात यह है कि 2022 में पार्क चान-वूक की ‘डिसीजन टू लीव’ और कोरियाई निर्माता संस्था से जुड़ी ‘ब्रोकर’ के बाद अब जाकर फिर एक कोरियाई फिल्म प्रतियोगिता खंड में लौटी है। यानी बात केवल अंतराल की नहीं, उस अंतराल के बाद वापसी की है।

पिछले साल स्थिति और भी निराशाजनक थी। कान महोत्सव के आधिकारिक और अनौपचारिक सभी वर्गों को मिलाकर एक भी कोरियाई फीचर फिल्म आमंत्रित नहीं की गई थी। यह तथ्य अपने आप में इतना भारी है कि उससे उपजी बेचैनी को अलग से समझाने की जरूरत नहीं पड़ती। दक्षिण कोरिया, जिसे पिछले एक दशक में वैश्विक कंटेंट पावरहाउस की तरह देखा जाने लगा, उसके लिए ऐसा रिक्त वर्ष किसी सामान्य उतार-चढ़ाव जैसा नहीं था। ऐसे समय में ‘होप’ का सीधे प्रतियोगिता खंड में पहुंचना इस संदेश की तरह पढ़ा जा रहा है कि कोरियाई सिनेमा केवल मौजूद नहीं है, बल्कि फिर से उसी मेज पर लौट आया है जहां प्रतिष्ठा, सौंदर्यशास्त्र और वैश्विक प्रतिस्पर्धा एक साथ मौजूद रहते हैं।

कान के प्रतियोगिता खंड का महत्व इसलिए भी अलग है क्योंकि यहीं से पाल्मे दोर यानी गोल्डन पाम की दौड़ शुरू होती है। यह वही क्षेत्र है जहां सिनेमा का कलात्मक दर्जा, उद्योग की चमक और विश्व मीडिया की नजर एक बिंदु पर मिलती हैं। इसलिए ‘होप’ की मौजूदगी को प्रचारात्मक खबर मानना भूल होगी। यह चयन कहीं अधिक गंभीर अर्थ रखता है: क्या कोरियाई सिनेमा ने पिछले साल के झटके के बाद फिर से अपनी रफ्तार पकड़ ली है? क्या वह वैश्विक सिनेमा के केंद्र में अपनी सीट वापस हासिल कर रहा है? अभी अंतिम उत्तर देना जल्दबाजी होगी, लेकिन इतना साफ है कि ‘होप’ ने यह बहस फिर खोल दी है।

‘होप’ क्यों चर्चा में है: कहानी कम, वातावरण ज्यादा बोलता है

फिल्म की उपलब्ध जानकारी बहुत विस्तृत नहीं है, लेकिन जो कुछ सामने आया है, वही इसकी दिलचस्पी बढ़ाने के लिए काफी है। ‘होप’ की कहानी एक बंदरगाह वाले कस्बे में घटती है जो कोरियाई निरस्त्रीकृत क्षेत्र, यानी डिमिलिटराइज्ड ज़ोन या डीएमज़ेड के आसपास स्थित है। इसी स्थान पर किसी अज्ञात अस्तित्व का आगमन होता है और उसके बाद घटनाएं unfold होती हैं। अगर भारतीय पाठकों के लिए इस भूगोल को समझना हो, तो डीएमज़ेड को भारत-पाकिस्तान सीमा जैसी प्रत्यक्ष तुलना में नहीं, बल्कि एक ऐसे संवेदनशील पट्टी-क्षेत्र की तरह समझिए जहां इतिहास, सैन्य तनाव, राष्ट्रीय स्मृति और असुरक्षा एक साथ जमा रहती हैं। कोरियाई प्रायद्वीप में उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच मौजूद यह इलाका सिर्फ नक्शे का हिस्सा नहीं, बल्कि सामूहिक मनोविज्ञान का भी हिस्सा है।

यहीं से ‘होप’ की बुनियादी ताकत समझ में आती है। एक तरफ बंदरगाह का कस्बा है, जो व्यापार, आवाजाही, श्रम, समुद्री अनिश्चितता और बाहरी दुनिया के आगमन का प्रतीक हो सकता है। दूसरी तरफ डीएमज़ेड का तनाव है, जहां बंद सीमाएं, निगरानी और राजनीतिक इतिहास की छाया मौजूद रहती है। इन दो जगहों का संयोजन अपने आप में ऐसा सिनेमाई वातावरण बनाता है जिसमें रहस्य, भय, हिंसा, विस्थापन और अस्तित्वगत बेचैनी सब कुछ एक साथ संभव हो जाता है। और जब कहानी की चिंगारी एक ‘अज्ञात अस्तित्व’ से लगती हो, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि फिल्म पारंपरिक रेखीय कथा से अधिक अनिश्चितता और असहजता पर काम कर रही है।

यहां एक महत्वपूर्ण बात है। अभी फिल्म के विस्तृत कथानक, संदेश या राजनीतिक अभिप्राय को लेकर बहुत बड़े निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। लेकिन कान जैसा महोत्सव किसी फिल्म को प्रतियोगिता खंड में शामिल करता है, तो वह केवल एक आकर्षक लॉगलाइन से प्रभावित होकर ऐसा नहीं करता। इसका मतलब यह है कि ‘होप’ में अवधारणा, शिल्प और सिनेमाई तनाव का ऐसा मेल जरूर है जिसने चयनकर्ताओं का ध्यान खींचा। अंतरराष्ट्रीय महोत्सवों में अक्सर वही फिल्में अधिक गूंजती हैं जो एक परिचित ढांचे के भीतर अपरिचित बेचैनी पैदा कर सकें। ‘होप’ के बारे में उपलब्ध सूचना से यह अंदाजा बनता है कि वह इसी इलाके में काम करती है।

भारतीय दर्शकों के लिए इसमें एक और दिलचस्प परत है। हमारे यहां भी सीमांत भूगोल, छोटे कस्बों और रहस्यपूर्ण बाहरी शक्तियों पर आधारित कथाएं रही हैं, लेकिन मुख्यधारा और आर्टहाउस के बीच अक्सर खाई बनी रहती है। कोरियाई सिनेमा की खासियत यह रही है कि वह वातावरण, शैली, हिंसा, सामाजिक टिप्पणी और स्टार पावर को एक ही फ्रेम में रख सकता है। ‘होप’ की शुरुआती रूपरेखा इसी परंपरा का विस्तार लगती है। यह न तो केवल एक विशुद्ध एक्शन फिल्म दिखती है, न महज प्रतीकात्मक फेस्टिवल सिनेमा। इसकी बेचैनी का स्रोत उसी संधि-क्षेत्र में है जहां कथा और अनुभव एक-दूसरे को लगातार बदलते रहते हैं।

नाहोंग-जिन की शैली: जब जॉनर एक खांचा नहीं, एक यात्रा बन जाता है

कान महोत्सव के कलात्मक नेतृत्व से जुड़े अधिकारियों ने ‘होप’ का परिचय देते हुए इसे एक ‘एक्शन फिल्म’ कहा, लेकिन साथ ही यह भी जोड़ा कि दो घंटे से अधिक की अवधि में इसका जॉनर लगातार बदलता रहता है। यह टिप्पणी छोटी जरूर है, लेकिन फिल्म की प्रकृति समझने के लिए बहुत अहम है। आम तौर पर जब किसी फिल्म को एक्शन कहा जाता है, तो दर्शक गति, पीछा, हिंसा, टकराव और बाहरी संघर्ष की उम्मीद करते हैं। लेकिन जब उसी सांस में यह कहा जाए कि फिल्म लगातार अपनी शैली बदलती है, तो स्पष्ट हो जाता है कि यहां एक्शन केवल सतही आवरण नहीं, बल्कि एक बड़े सिनेमाई प्रयोग का शुरुआती दरवाजा है।

नाहोंग-जिन का नाम कोरियाई सिनेमा में वैसे भी उस निर्देशक के तौर पर जाना जाता है जो बेचैनी को रचते हैं, सिर्फ दिखाते नहीं। उनकी फिल्मों में हिंसा अचानक घटित होने वाली घटना भर नहीं होती; वह पात्रों, स्थानों और दर्शक की मानसिक स्थिति को धीरे-धीरे तोड़ती भी है। अगर ‘होप’ वास्तव में जॉनर बदलती हुई फिल्म है, तो इसे उनकी शैली के विस्तार के रूप में देखना स्वाभाविक है। एक फ्रेम में यह सर्वाइवल सिनेमा हो सकती है, दूसरे में थ्रिलर, तीसरे में मनोवैज्ञानिक हॉरर, और फिर अचानक वह किसी नैतिक या दार्शनिक प्रश्न की ओर मुड़ सकती है। यही वह गुण है जो कान जैसे मंच को आकर्षित करता है, क्योंकि वहां ऐसी फिल्मों की तलाश रहती है जो सिनेमाई भाषा में जोखिम उठाती हों।

भारतीय संदर्भ में कहें तो हमारे यहां भी जॉनर-ब्लेंडिंग की परंपरा नई नहीं है। मसाला फिल्मों में एक्शन, रोमांस, कॉमेडी और मेलोड्रामा साथ-साथ चलते रहे हैं। लेकिन कोरियाई जॉनर-परिवर्तन का ढांचा अलग होता है। वहां यह बदलाव अक्सर मनोरंजन की मात्रा बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि दर्शक को अस्थिर करने के लिए किया जाता है। यानी आप एक क्षण में सोचते हैं कि आप एक पुलिस-थ्रिलर देख रहे हैं, और अगले ही क्षण आपको एहसास होता है कि फिल्म तो असल में आपके नैतिक भरोसे को चुनौती दे रही है। ‘होप’ के बारे में आई जानकारी से यही संकेत मिलता है कि वह जॉनर का उपयोग परिचितता पैदा करने के लिए नहीं, बल्कि उसे तोड़ने के लिए कर रही है।

कान में प्रतियोगिता खंड तक पहुंचना इस बात की भी पुष्टि करता है कि फिल्म में महज तकनीकी दक्षता नहीं, औपचारिक महत्वाकांक्षा भी है। यह महोत्सव ऐसी फिल्मों को तरजीह देता है जो अपने माध्यम के साथ सक्रिय संवाद करती हों। ‘होप’ के बारे में जो सबसे अधिक चर्चा में है, वह इसकी कहानी से ज्यादा इसकी संरचना है: एक्शन के भीतर बदलता जॉनर, अज्ञात सत्ता की उपस्थिति, सीमा-क्षेत्र का तनाव, और लंबी अवधि में दर्शक की उम्मीदों को लगातार पुनर्गठित करने का प्रयास। यह सब मिलकर इसे एक ऐसी परियोजना बनाता है जिसे केवल स्टारकास्ट या राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व के आधार पर नहीं, बल्कि अपने सिनेमाई इरादे की वजह से गंभीरता से लिया जा रहा है।

यही कारण है कि ‘होप’ को लेकर उत्सुकता सिर्फ कोरिया तक सीमित नहीं रहेगी। आज जब वैश्विक दर्शक स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्मों के जरिए तरह-तरह के कंटेंट तक पहुंच रखते हैं, तब कान जैसे फेस्टिवल किसी फिल्म की गुणवत्ता की ‘सील’ भर नहीं देते, बल्कि यह भी तय करते हैं कि उस फिल्म के इर्द-गिर्द किस तरह की बौद्धिक और सांस्कृतिक बातचीत होगी। ‘होप’ के साथ भी यही होने की संभावना है। और यह बातचीत नाहोंग-जिन के जॉनर-विचलन को केंद्र में रखकर आगे बढ़ेगी।

ह्वांग जंग-मिन से लेकर जो इन-संग और जंग हो-योन तक: सितारों की यह टोली क्या बताती है

‘होप’ की एक और उल्लेखनीय विशेषता इसकी कास्ट है। फिल्म में ह्वांग जंग-मिन, जो इन-संग और जंग हो-योन जैसे कोरियाई कलाकार हैं, साथ ही हॉलीवुड अभिनेता माइकल फासबेंडर और अलीसिया विकांडर भी जुड़े हुए हैं। यह संयोजन अपने आप में कई बातें कहता है। सबसे पहले तो यह कि फिल्म अपनी जड़ों में कोरियाई होते हुए भी अंतरराष्ट्रीय पहुंच की स्पष्ट तैयारी के साथ बनाई गई है। दूसरे, यह कि इसकी प्रस्तुति सिर्फ घरेलू दर्शक के लिए सीमित नहीं रखी गई, बल्कि उसे वैश्विक दृश्यता के अनुरूप ढाला गया है।

ह्वांग जंग-मिन को कोरियाई सिनेमा के सबसे भरोसेमंद और प्रभावशाली अभिनेताओं में गिना जाता है। उनकी उपस्थिति अक्सर फिल्म को भावनात्मक गुरुत्व देती है। जो इन-संग लोकप्रियता, स्टार वैल्यू और स्क्रीन प्रेज़ेंस के प्रतिनिधि हैं। जंग हो-योन, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय दर्शक ‘स्क्विड गेम’ के बाद खास तौर पर पहचानते हैं, नई पीढ़ी की उस कोरियाई सांस्कृतिक लहर का चेहरा हैं जिसने फैशन, ओटीटी, टेलीविजन और वैश्विक पॉप-संस्कृति को एक-दूसरे से जोड़ दिया। इन तीनों के साथ माइकल फासबेंडर और अलीसिया विकांडर जैसे कलाकारों की मौजूदगी ‘होप’ को एक ऐसा चेहरा देती है जिसे कान, यूरोप, अमेरिका और एशिया के बाजार एक साथ पढ़ सकते हैं।

भारतीय फिल्म उद्योग में भी हम ऐसी कोशिशें देखते रहे हैं जहां अंतरराष्ट्रीय कलाकारों की मौजूदगी के जरिए किसी परियोजना को ‘ग्लोबल’ रूप दिया जाता है। लेकिन हर बार यह प्रयोग सार्थक नहीं होता। कई बार विदेशी चेहरों की मौजूदगी सतही प्रतीक बनकर रह जाती है। ‘होप’ के मामले में महत्वपूर्ण यह है कि इसकी बुनियादी कथा-भूमि कोरियाई है, निर्देशक की पहचान कोरियाई है, और फिल्म का सिनेमाई स्वर भी कोरियाई शैली-संवेदना से जुड़ा दिखाई देता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय कलाकारों की भागीदारी इसे अपनी मूल पहचान से दूर नहीं ले जाती, बल्कि इसकी पहुंच और जिज्ञासा का दायरा बढ़ाती है।

कान जैसे फेस्टिवल में यह बात अतिरिक्त महत्व रखती है। वहां फिल्म केवल स्क्रीन पर नहीं चलती; वह बाजार, समीक्षाओं, अंतरराष्ट्रीय खरीदारों, वितरकों, स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्मों और पुरस्कार-राजनीति के समग्र परिदृश्य में भी मौजूद रहती है। ऐसे में बहुभाषी और बहु-क्षेत्रीय कास्ट किसी फिल्म को दृश्यता का लाभ देती है। यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि कास्ट ही चयन का कारण है, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि ‘होप’ एक ऐसे समय में सामने आ रही है जब राष्ट्रीय सिनेमा और वैश्विक उद्योग के बीच की रेखाएं तेजी से बदल रही हैं।

भारतीय पाठक इसे दक्षिण कोरिया के सांस्कृतिक आत्मविश्वास के संकेत के रूप में भी पढ़ सकते हैं। कोरियाई फिल्म उद्योग अब उस चरण में नहीं है जहां उसे केवल ‘स्थानीय’ या ‘निश’ कहकर समझा जाए। वह अपने कथा-लोक, इतिहास, भाषा और सामाजिक तनाव को बरकरार रखते हुए भी विश्व स्तर पर संवाद करने की स्थिति में है। ‘होप’ की कास्ट यही बताती है कि कोरिया अब वैश्विक मंच पर जगह मांग नहीं रहा, बल्कि अपनी शर्तों पर उपस्थिति दर्ज करा रहा है।

पिछले साल का सन्नाटा और इस साल की वापसी: क्या कोरियाई सिनेमा ने संकट पार कर लिया?

पिछले साल कान में कोरियाई फीचर फिल्मों का न होना उस उद्योग के लिए झटका था, जिसे हाल के वर्षों में ‘पैरासाइट’, ‘मिनारी’, ‘स्क्विड गेम’ और अनेक निर्देशकों-अभिनेताओं के जरिए विश्व सांस्कृतिक नक्शे पर असाधारण स्थान मिला। अंतरराष्ट्रीय सफलताओं के बाद अक्सर यह भ्रम पैदा हो जाता है कि कोई राष्ट्रीय उद्योग अब स्थायी रूप से सुरक्षित है। लेकिन सिनेमा में कोई स्थिति स्थायी नहीं होती। फेस्टिवल राजनीति बदलती है, निर्माण ढांचे बदलते हैं, घरेलू बाजार की प्राथमिकताएं बदलती हैं, और दर्शकों की रुचि भी तेजी से रूपांतरित होती है।

ऐसे में पिछले वर्ष की अनुपस्थिति ने कोरिया में एक व्यापक चिंता को जन्म दिया। सवाल यह नहीं था कि क्या कोरियाई सिनेमा खत्म हो गया है—ऐसा कहना बेतुका होता। असली सवाल यह था कि क्या उसकी रचनात्मक ऊर्जा और अंतरराष्ट्रीय चयन-क्षमता के बीच कोई अस्थायी अंतर आ गया है? क्या उद्योग अत्यधिक व्यावसायिक दबावों, प्लेटफॉर्म-उन्मुख कंटेंट और बदलती दर्शक-आदतों के बीच नई फेस्टिवल-योग्य भाषा खोजने में जूझ रहा है? इन सवालों का सीधा जवाब ‘होप’ अकेले नहीं दे सकती, लेकिन इसने यह जरूर दिखाया है कि वापसी की संभावना जीवित है, और वह वापसी सीधे मुख्य मंच पर भी हो सकती है।

भारतीय संदर्भ में यह स्थिति हमें अपने यहां की बहसों की याद दिलाती है। जब कभी किसी साल बड़े अंतरराष्ट्रीय महोत्सवों में भारतीय फिल्मों की उपस्थिति कम होती है, तो तुरंत ‘संकट’ और ‘पुनर्जागरण’ जैसे शब्द चर्चा में आ जाते हैं। लेकिन किसी भी राष्ट्रीय फिल्म उद्योग को एक साल के आंकड़े से न पूरी तरह खारिज किया जा सकता है, न पूरी तरह महिमामंडित। कोरिया के साथ भी यही लागू होता है। फिर भी, तथ्य यह है कि ‘शून्य’ के बाद ‘मुख्य प्रतियोगिता’ में वापसी एक प्रतीकात्मक छलांग होती है। और प्रतीक कई बार उद्योग-विश्लेषण से अधिक असरदार होते हैं, क्योंकि वे मनोबल बनाते हैं।

‘होप’ की खबर को इसी मनोवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में समझना चाहिए। यह चयन कोरियाई फिल्मकारों, निर्माताओं और सांस्कृतिक संस्थानों के लिए एक संकेत हो सकता है कि विश्व मंच पर उनकी जगह अभी भी बनी हुई है—बशर्ते वे औसतपन से ऊपर उठने का साहस रखें। यह भी संभव है कि आने वाले महीनों में कोरिया के भीतर इस चयन को लेकर उद्योग की दिशा, निवेश, जॉनर-प्रयोग और वैश्विक साझेदारियों पर नई चर्चाएं शुरू हों। एक राष्ट्रीय सिनेमा के लिए कभी-कभी एक फिल्म सिर्फ फिल्म नहीं रहती; वह दिशा-सूचक बन जाती है। ‘होप’ फिलहाल ऐसे ही मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है।

कान का अर्थ क्या है, और भारतीय दर्शक इसे क्यों गंभीरता से लें

कई भारतीय पाठकों के मन में यह सवाल स्वाभाविक है कि आखिर कान जैसे महोत्सव का महत्व इतना बड़ा क्यों माना जाता है। इसका उत्तर केवल पुरस्कारों में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रतिष्ठा के पूरे ढांचे में छिपा है। कान दुनिया के उन कुछ चुनिंदा मंचों में है जहां फिल्में सिर्फ प्रदर्शित नहीं होतीं, बल्कि उन्हें वैश्विक संवाद का हिस्सा बनाया जाता है। यहां चुनी गई फिल्में आलोचना, व्याख्या, वितरण, पुरस्कार-दौर और सांस्कृतिक स्मृति में लंबी उम्र हासिल करती हैं। इसलिए किसी राष्ट्रीय सिनेमा के लिए कान के प्रतियोगिता खंड में पहुंचना, क्रिकेट की भाषा में कहें तो, सिर्फ घरेलू लीग जीतना नहीं बल्कि टेस्ट चैंपियनशिप के फाइनल में पहुंचने जैसा है। वहां केवल लोकप्रियता नहीं, तकनीक, धैर्य, रणनीति और मानसिक मजबूती सबकी परीक्षा होती है।

कोरियाई सिनेमा के लिए यह महत्व और गहरा है, क्योंकि उसने पिछले दो दशकों में अपने को एक विशिष्ट फिल्म-भाषा, मजबूत उद्योग-ढांचे और निर्यात योग्य सांस्कृतिक उत्पाद के रूप में स्थापित किया है। के-पॉप, के-ड्रामा, ब्यूटी इंडस्ट्री और कोरियाई खान-पान की वैश्विक लोकप्रियता ने कोरिया की ‘सॉफ्ट पावर’ को बहुत मजबूत किया है। लेकिन फिल्में इस पूरी सांस्कृतिक परियोजना का वह हिस्सा हैं जो देश की जटिलताओं—वर्ग, हिंसा, परिवार, राज्य, इतिहास, अकेलापन, और आधुनिकता—को गहराई से व्यक्त करती हैं। इसलिए ‘होप’ का चयन केवल मनोरंजन उद्योग की खबर नहीं, बल्कि कोरिया की सांस्कृतिक आत्म-प्रतिष्ठा का मामला भी है।

भारतीय दृष्टि से यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि हम भी एक विशाल, बहुभाषी, बहुस्तरीय फिल्म-संस्कृति वाले देश हैं। हमारे यहां बॉक्स ऑफिस की अपनी राजनीति है, स्ट्रीमिंग का दबाव है, स्टार सिस्टम है, और साथ ही गंभीर सिनेमा की एक सतत परंपरा भी है। कोरिया का अनुभव हमें यह याद दिलाता है कि अंतरराष्ट्रीय सम्मान उन उद्योगों को मिलता है जो अपनी स्थानीयता से समझौता किए बिना भी विश्व-स्तरीय शिल्प विकसित करते हैं। नाहोंग-जिन की ‘होप’ का उत्सव इसी बात का उदाहरण है। फिल्म की कहानी जितनी कोरियाई है, उसका आकर्षण उतना ही वैश्विक दिखाई देता है।

यहां एक सांस्कृतिक पहलू भी समझना जरूरी है। कोरियाई समाज में राष्ट्रीय उपलब्धियों को सामूहिक प्रतिष्ठा के रूप में देखने की प्रवृत्ति मजबूत है—चाहे वह सिनेमा हो, खेल हो, तकनीक हो या पॉप संगीत। इसलिए कान में ‘होप’ की एंट्री को वहां सिर्फ फिल्म-समाचार के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे क्षण की तरह देखा जाएगा जिसने पिछले साल के सन्नाटे के बाद आत्मविश्वास लौटाया है। भारतीय पाठक इसे ठीक वैसे समझ सकते हैं जैसे किसी भारतीय संगीतकार, लेखक, फिल्मकार या खिलाड़ी का लंबे अंतराल के बाद विश्व मंच पर लौटना हमें सामूहिक गर्व का अवसर देता है।

आगे क्या देखना होगा: ‘होप’ से उम्मीदें, लेकिन संतुलित नजरिया भी जरूरी

अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आगे क्या? क्या ‘होप’ केवल चयन तक सीमित रहेगी या पुरस्कार-दौड़ में भी गंभीर दावेदारी पेश करेगी? इसका उत्तर अभी भविष्य के पास है। कान में चयन अपने आप में सम्मान है, लेकिन प्रतियोगिता खंड में होना अपेक्षाओं का दबाव भी साथ लाता है। वहां समीक्षकों की प्रतिक्रिया, प्रीमियर की गूंज, दर्शकीय ग्रहणशीलता और जूरी की संवेदना—सब मिलकर फिल्म की यात्रा तय करते हैं। कई बार बहुप्रतीक्षित फिल्में अपेक्षाओं से नीचे रह जाती हैं, और कई बार कम आंकी गई फिल्में सबसे बड़ी खोज साबित होती हैं। ‘होप’ के साथ भी यही अनिश्चितता रहेगी, और शायद यही इसकी सबसे बड़ी ताकत भी है।

फिलहाल इतना कहना उचित होगा कि ‘होप’ ने कोरियाई सिनेमा को फिर से उस जगह पहुंचा दिया है जहां से बातचीत शुरू होती है, खत्म नहीं। इस चयन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पिछले साल की अनुपस्थिति को स्थायी गिरावट का प्रमाण मानना जल्दबाजी थी। साथ ही यह भी सच है कि एक फिल्म पूरे उद्योग की सभी समस्याओं का समाधान नहीं हो सकती। अगर कोरियाई सिनेमा को अपनी वैश्विक स्थिति मजबूत रखनी है, तो उसे विविध आवाजों, नए निर्देशकों, जोखिम लेने वाली पटकथाओं और घरेलू बाजार से परे दीर्घकालिक रणनीति पर लगातार काम करना होगा।

भारतीय दर्शकों और विशेष रूप से कोरियाई संस्कृति में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए ‘होप’ की यात्रा पर नजर रखना इसलिए भी रोचक होगा क्योंकि यह फिल्म उस बड़े सवाल से जुड़ती है जिसे हम आज की वैश्विक स्क्रीन-संस्कृति में बार-बार पूछते हैं: क्या स्थानीय कहानियां अभी भी विश्व मंच को चौंका सकती हैं? कोरिया ने कई बार इसका उत्तर ‘हां’ में दिया है। ‘होप’ उसी उत्तर का नया अध्याय बन सकती है।

एक और वजह से भी यह कहानी महत्वपूर्ण है। के-पॉप और के-ड्रामा की लोकप्रियता के बीच अक्सर गंभीर कोरियाई सिनेमा की चर्चा भारतीय मुख्यधारा में पीछे छूट जाती है। जबकि सच्चाई यह है कि कोरिया की सांस्कृतिक शक्ति का सबसे ठोस आधार उसकी कहानी कहने की क्षमता है—चाहे वह पॉप हो, टीवी हो या सिनेमा। ‘होप’ का कान प्रतियोगिता तक पहुंचना हमें यह याद दिलाता है कि चमकदार वैश्विक ब्रांडिंग के पीछे एक बेहद मजबूत रचनात्मक परंपरा काम करती है।

अभी पुरस्कार दूर हैं, फिल्म की पूरी समीक्षा भी बाकी है, और उसके प्रभाव का अंतिम आकलन तो उसके प्रदर्शन के बाद ही होगा। लेकिन इस क्षण की अहमियत कम नहीं होती। चार साल बाद प्रतियोगिता खंड में वापसी, पिछले साल के शून्य के बाद मुख्य मंच पर प्रवेश, जॉनर-बदलती फिल्म की चर्चा, और कोरियाई-हॉलीवुड कलाकारों की संयुक्त मौजूदगी—ये सभी तत्व मिलकर ‘होप’ को इस साल के कान की उन फिल्मों में शामिल कर चुके हैं जिन्हें गंभीरता से देखा जाएगा। दक्षिण कोरिया के लिए यह प्रतिष्ठा की वापसी है; और वैश्विक दर्शकों के लिए, खासकर भारत जैसे देशों के पाठकों के लिए, यह याद दिलाने वाला क्षण कि विश्व सिनेमा की सबसे दिलचस्प हलचलें अक्सर वहीं से आती हैं जहां स्थानीय इतिहास, राष्ट्रीय बेचैनी और सिनेमाई साहस एक साथ मिलते हैं।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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