
पो항 के समुद्रतट से उठता एक बड़ा सुरक्षा संदेश
दक्षिण कोरिया के दक्षिण-पूर्वी तटीय शहर पो항 में इन दिनों जो सैन्य गतिविधि दिखाई दी, वह सिर्फ सैनिकों की आवाजाही या युद्धपोतों की नियमित कवायद भर नहीं है। 27 तारीख को दक्षिण कोरियाई नौसेना और मरीन कॉर्प्स ने 2026 की पहली छमाही के संयुक्त उभयचर अभ्यास के सबसे महत्वपूर्ण चरण, जिसे वहां की सैन्य भाषा में ‘निर्णायक कार्रवाई’ कहा गया, को अंजाम दिया। यह अभ्यास 23 से 30 तारीख तक चल रहा है, लेकिन 27 तारीख का दिन इसलिए खास रहा क्योंकि इसी दिन समुद्र से तट पर उतरने, तट को सुरक्षित करने और फिर जमीन पर आगे बढ़ने की पूरी सैन्य प्रक्रिया का सबसे जटिल हिस्सा सार्वजनिक रूप से सामने आया।
भारतीय पाठकों के लिए इसे सरल भाषा में समझें तो यह कुछ वैसा ही है जैसे किसी सेना के लिए केवल सीमा पर तैनाती काफी न हो, बल्कि उसे यह भी दिखाना हो कि संकट की घड़ी में वह समुद्र, आसमान और जमीन—तीनों मोर्चों पर एक साथ काम कर सकती है। भारत में हम अक्सर गणतंत्र दिवस पर तीनों सेनाओं की समन्वित ताकत का प्रतीकात्मक प्रदर्शन देखते हैं, लेकिन पो항 का यह अभ्यास प्रतीकवाद से आगे जाकर वास्तविक संचालन क्षमता की परीक्षा जैसा है। यहां लक्ष्य यह बताना है कि अगर किसी जटिल सुरक्षा स्थिति में समुद्र के रास्ते सैन्य कार्रवाई करनी पड़े, तो दक्षिण कोरियाई सेना कितनी तेजी, अनुशासन और तकनीकी समन्वय के साथ प्रतिक्रिया दे सकती है।
इस पूरे घटनाक्रम को केवल कोरियाई प्रायद्वीप के संदर्भ में देखना पर्याप्त नहीं होगा। उत्तर-पूर्व एशिया आज दुनिया के सबसे संवेदनशील सुरक्षा क्षेत्रों में गिना जाता है, जहां उत्तर कोरिया की मिसाइल गतिविधियां, चीन-अमेरिका प्रतिस्पर्धा, जापान की रक्षा नीति में बदलाव और समुद्री शक्ति संतुलन जैसे कई कारक लगातार सक्रिय हैं। ऐसे में पो항 के तट पर हुआ यह अभ्यास, सियोल की सुरक्षा तैयारी का दृश्य प्रमाण भी है और उसके रणनीतिक संदेश का हिस्सा भी।
दक्षिण कोरिया की सुरक्षा नीति को समझने वाले विशेषज्ञ लंबे समय से कहते रहे हैं कि वहां की सेना के लिए युद्ध-तैयारी सिर्फ कागजों पर लिखी योजना नहीं, बल्कि लगातार दोहराई जाने वाली एक संस्थागत प्रक्रिया है। पो항 में हुआ संयुक्त उभयचर अभ्यास इसी प्रक्रिया की झलक देता है। यह घरेलू राजनीति के शोर-शराबे से अलग उस राज्य क्षमता का प्रदर्शन है, जिसके बल पर कोई देश अपने नागरिकों को भरोसा देता है और अपने प्रतिद्वंद्वियों को संकेत भी।
‘निर्णायक कार्रवाई’ का मतलब क्या है, और यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है
कोरियाई सैन्य शब्दावली में जिस चरण को ‘निर्णायक कार्रवाई’ कहा गया, उसे समझना जरूरी है। यह केवल समुद्र से सैनिकों के किनारे पर पहुंचने का दृश्य नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ इससे कहीं व्यापक है। यह वह क्षण होता है जब उभयचर बल—यानी समुद्र के रास्ते आने वाली सेना—नौसैनिक गोलाबारी, हवाई समर्थन और विशिष्ट उपकरणों की मदद से तट पर कब्जा जमाती है, उसे सुरक्षित करती है और आगे जमीन पर होने वाले अभियान के लिए रास्ता तैयार करती है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह समुद्री अभियान और जमीनी अभियान के बीच की कड़ी है।
भारतीय संदर्भ में इसे ऐसे समझा जा सकता है जैसे किसी बड़े आपदा-राहत अभियान या सैन्य तैनाती में सिर्फ एक बल की दक्षता पर्याप्त न हो। मान लीजिए, अंडमान-निकोबार या लक्षद्वीप जैसे द्वीपीय क्षेत्रों में आपात स्थिति पैदा हो जाए, तो नौसेना के जहाज, वायुसेना के हेलीकॉप्टर, स्थलसेना की त्वरित प्रतिक्रिया इकाइयां और संचार तंत्र—सभी को एक साथ, एक समय-सारिणी के अनुसार काम करना होगा। उभयचर सैन्य अभियान में भी यही तर्क लागू होता है, फर्क सिर्फ इतना है कि यहां दांव कहीं अधिक ऊंचा होता है और जोखिम भी ज्यादा होता है।
दक्षिण कोरिया के लिए इस तरह की तैयारी विशेष महत्व रखती है क्योंकि उसकी सुरक्षा परिस्थिति बहुस्तरीय है। एक तरफ उत्तर कोरिया से जुड़ी स्थायी सैन्य चुनौती है, दूसरी तरफ समुद्री और क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन का सवाल है। ऐसे में यदि तट पर उतरने वाली सेना को नौसेना का पर्याप्त सुरक्षा कवच न मिले, या हवाई समर्थन समय पर न पहुंचे, या उतरने के बाद जमीनी कार्रवाई में तालमेल टूट जाए, तो पूरा अभियान कमजोर पड़ सकता है। इसलिए ‘निर्णायक कार्रवाई’ किसी युद्धाभ्यास का महज आकर्षक दृश्य नहीं, बल्कि उस व्यापक सामरिक मशीनरी की असली परीक्षा है जो अलग-अलग हथियार प्रणालियों और अलग-अलग सैन्य शाखाओं को एक साथ जोड़ती है।
यहीं पर इस अभ्यास का असली महत्व सामने आता है। दक्षिण कोरिया यह दिखाना चाहता है कि उसकी सेना सिर्फ हथियारों से लैस नहीं है, बल्कि उन हथियारों और बलों को एक संयुक्त प्रणाली की तरह चलाने का अभ्यास भी रखती है। आधुनिक युद्ध में यह क्षमता अक्सर हथियारों की संख्या से अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है। जिस तरह क्रिकेट में केवल स्टार खिलाड़ियों की मौजूदगी जीत की गारंटी नहीं होती, बल्कि बल्लेबाजी, गेंदबाजी और फील्डिंग के बीच तालमेल निर्णायक होता है, उसी तरह सैन्य अभियानों में संयुक्त संचालन ही सफलता का आधार बनता है।
जहाज, हेलीकॉप्टर, लड़ाकू विमान और ड्रोन: आधुनिक युद्धाभ्यास की बदलती तस्वीर
पो항 के इस अभ्यास में करीब 20 जहाजों ने भाग लिया, जिनमें बड़े परिवहन युद्धपोत ‘मराडो’ का उल्लेख विशेष रूप से किया गया। इसके अलावा कोरियाई उभयचर हमला बख्तरबंद वाहन, उभयचर गतिशीलता हेलीकॉप्टर, समुद्री गश्ती विमान, वायुसेना के लड़ाकू विमान, हमला हेलीकॉप्टर और ड्रोन भी शामिल थे। इसका अर्थ यह है कि यह अभ्यास एकल सैन्य प्रदर्शन नहीं, बल्कि समुद्र, वायु और स्थल—तीनों आयामों को समेटने वाली बहुस्तरीय संरचना था।
यहां एक बात भारतीय पाठकों के लिए विशेष रूप से दिलचस्प है। पिछले कुछ वर्षों में भारत में भी रक्षा चर्चा में ‘जॉइंटनेस’ यानी सेनाओं के बीच संयुक्त संचालन की अवधारणा पर जोर बढ़ा है। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की व्यवस्था, थिएटर कमांड पर बहस, नौसेना की बढ़ती भूमिका, और ड्रोन व नेटवर्क-सक्षम युद्ध क्षमता पर बल—ये सभी संकेत देते हैं कि नई सैन्य सोच अब अलग-अलग शाखाओं की स्वतंत्र शक्ति के बजाय उनकी संयुक्त प्रभावशीलता को ज्यादा अहमियत देती है। दक्षिण कोरिया का यह अभ्यास उसी वैश्विक प्रवृत्ति का एशियाई उदाहरण है।
विशेष ध्यान देने वाली बात यह भी है कि मानव-संचालित प्रणालियों के साथ-साथ ड्रोन का उल्लेख सामने आया। इसका मतलब यह नहीं कि हर ड्रोन हमलावर भूमिका में था, क्योंकि उपलब्ध जानकारी में उनकी सटीक भूमिका का विस्तार नहीं दिया गया। लेकिन इतना स्पष्ट है कि आधुनिक सैन्य अभ्यास अब केवल टैंक, जहाज और हेलीकॉप्टर तक सीमित नहीं रहे। निगरानी, टोही, लक्ष्य पहचान, स्थिति की वास्तविक समय में समझ, और कम जोखिम वाले अग्रिम अवलोकन जैसे कामों में ड्रोन तेजी से केंद्रीय भूमिका निभा रहे हैं।
यह प्रवृत्ति भारत के लिए भी नई नहीं है। चाहे जम्मू-कश्मीर में निगरानी हो, पश्चिमी सीमा पर गतिविधि पर नजर रखना हो, या समुद्री क्षेत्र में व्यापक निगरानी—ड्रोन और मानव रहित प्रणालियों का महत्व लगातार बढ़ा है। दक्षिण कोरिया का पो항 अभ्यास हमें याद दिलाता है कि 21वीं सदी की सैन्य तैयारी का अर्थ केवल सैनिकों की बहादुरी नहीं, बल्कि सेंसर, नेटवर्क, प्लेटफॉर्म और निर्णय-प्रक्रिया के बीच निर्बाध तालमेल भी है।
इसीलिए इस अभ्यास को सिर्फ ताकत का प्रदर्शन कह देना पर्याप्त नहीं होगा। यह तकनीकी परिपक्वता, प्रक्रियागत अनुशासन और संयुक्त कमान संस्कृति का संकेत भी है। जब कोई देश अपने जहाज, मरीन बल, हेलीकॉप्टर, लड़ाकू विमान और ड्रोन को एक ही अभ्यास-परिदृश्य में सफलतापूर्वक चलाता है, तो वह यह बताता है कि उसकी सेना सिर्फ संसाधन-समृद्ध नहीं, बल्कि संगठनात्मक रूप से भी तैयार है।
पो항 क्यों महत्वपूर्ण है: भूगोल, प्रतीक और सामरिक अर्थ
अभ्यास का स्थान भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। पो항 दक्षिण कोरिया के पूर्वी तट पर स्थित एक अहम शहर है, जिसे औद्योगिक और सामरिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण माना जाता है। भारत के पाठकों के लिए तुलना करें तो जैसे विशाखापत्तनम सिर्फ एक बंदरगाह शहर नहीं, बल्कि नौसैनिक महत्व, औद्योगिक प्रतिष्ठान और पूर्वी समुद्री रणनीति का संगम है, वैसे ही पो항 को भी दक्षिण कोरिया के सैन्य-औद्योगिक परिदृश्य में देखा जा सकता है।
पूर्वी तट पर इस तरह का उभयचर अभ्यास कई स्तरों पर संदेश देता है। पहला, यह तटीय रक्षा और तेज सैन्य गतिशीलता की क्षमता पर बल देता है। दूसरा, यह बताता है कि दक्षिण कोरिया अपनी समुद्री सीमाओं और तटीय क्षेत्रों को केवल भौगोलिक रेखा की तरह नहीं, बल्कि गतिशील सुरक्षा क्षेत्र की तरह देखता है। तीसरा, यह घरेलू जनता और अंतरराष्ट्रीय समुदाय दोनों के लिए यह संकेत है कि सियोल अपनी सैन्य तैयारी को नियमित, संगठित और दृश्यमान बनाए रखना चाहता है।
ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि 27 तारीख की गतिविधि किसी एक-दिवसीय आयोजन का हिस्सा नहीं थी। यह 23 से 30 तारीख तक चलने वाले क्रमबद्ध अभ्यास का चरम चरण था। इस तथ्य से यह स्पष्ट होता है कि दक्षिण कोरिया की सेना किसी ‘शोकेस’ शैली की इवेंट-मैनेजमेंट नहीं कर रही, बल्कि चरणबद्ध प्रक्रिया का परीक्षण कर रही है—योजना-निर्माण से लेकर सैनिकों व उपकरणों की लोडिंग, समुद्री गमन, हवाई और नौसैनिक समर्थन, तट पर उतराई और फिर जमीन पर आगे बढ़ने की तैयारी तक।
यही वह पहलू है जिसे सुरक्षा विश्लेषक सबसे ज्यादा महत्व देते हैं। किसी भी सैन्य कार्रवाई की सफलता अक्सर उस चमकदार अंतिम दृश्य में नहीं छिपी होती जो कैमरे में कैद होता है, बल्कि उन असंख्य छोटे-छोटे चरणों में निहित होती है जिन्हें सामान्य दर्शक देख भी नहीं पाता। अगर लोडिंग में देरी हो, संचार में त्रुटि हो, मौसम का आकलन गलत हो, या समर्थन देने वाली इकाइयों का समय तालमेल बिगड़ जाए, तो अंतिम चरण प्रभावित हो सकता है। पो항 का अभ्यास इसी अदृश्य तैयारी को परखने की कोशिश है।
सुरक्षा नीति, घरेलू राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संकेत
सैन्य अभ्यासों को केवल हथियारों और सैनिकों की भाषा में पढ़ना अधूरा होगा। हर बड़ा सैन्य अभ्यास एक राजनीतिक पाठ भी लिखता है। वह बताता है कि कोई देश अपनी सुरक्षा प्राथमिकताओं को किस रूप में देखता है, किन परिदृश्यों के लिए तैयारी कर रहा है, और अपनी जनता तथा सहयोगियों को क्या संदेश देना चाहता है। पो항 में हुआ यह संयुक्त उभयचर अभ्यास भी इसी अर्थ में महत्वपूर्ण है।
दक्षिण कोरिया के भीतर घरेलू राजनीतिक बहसें अपनी जगह होंगी, लेकिन इस तरह के सैन्य अभ्यास उनसे अलग एक स्थायी राज्य-चिंता को व्यक्त करते हैं—राष्ट्रीय सुरक्षा की विश्वसनीयता। भारत में भी हमने यह देखा है कि सरकारें बदलती रहती हैं, राजनीतिक विमर्श बदलता रहता है, लेकिन सीमाओं की सुरक्षा, नौसैनिक उपस्थिति, और सैन्य तैयारी जैसे मुद्दे दीर्घकालिक राज्य नीति का हिस्सा बने रहते हैं। दक्षिण कोरिया में भी सैन्य तैयारी का यही संस्थागत पक्ष सामने आता है।
यह भी उल्लेखनीय है कि उपलब्ध जानकारी में किसी विशिष्ट देश या तत्काल खतरे का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं किया गया। इसलिए इस अभ्यास को किसी एक देश के खिलाफ सीधा संकेत मान लेना पत्रकारिता की दृष्टि से उचित नहीं होगा। फिर भी, रणनीतिक भाषा में ऐसे अभ्यासों का अपना वजन होता है। वे यह बताते हैं कि देश संभावित संकटों के लिए योजनाबद्ध तरीके से तैयार है, और यदि क्षेत्रीय अनिश्चितता बढ़ती है तो उसके पास संयुक्त प्रतिक्रिया की क्षमता मौजूद है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए इस तरह की गतिविधियां विशेष महत्व रखती हैं। उत्तर-पूर्व एशिया में स्थिरता केवल कूटनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि भरोसेमंद प्रतिरोधक क्षमता और अनुशासित सैन्य तैयारियों से भी बनती है। दक्षिण कोरिया यह प्रभाव छोड़ना चाहता है कि वह सुरक्षा चुनौतियों का सामना शोरगुल या अतिरंजना से नहीं, बल्कि व्यवस्थित तैयारी से करता है। यह शैली एशिया की बड़ी लोकतांत्रिक शक्तियों—जिनमें भारत भी शामिल है—के लिए परिचित लग सकती है, क्योंकि यहां भी अक्सर जिम्मेदार शक्ति-प्रदर्शन को कूटनीतिक विश्वसनीयता का आधार माना जाता है।
दूसरे शब्दों में, तैयार सेना केवल युद्ध का औजार नहीं होती; वह शांति की विश्वसनीय पृष्ठभूमि भी बनाती है। जब कोई देश यह दिखा पाता है कि उसकी सेनाएं प्रशिक्षित, संगठित और तकनीकी रूप से सक्षम हैं, तब उसकी विदेश नीति भी अधिक वजनदार दिखती है। पो항 का अभ्यास इसी व्यापक राजनीतिक-सुरक्षा समीकरण का हिस्सा है।
रक्षा तकनीक, औद्योगिक आधार और अभ्यासों का गहरा संबंध
हालांकि पो항 में हुआ यह अभ्यास सीधे तौर पर औद्योगिक नीति पर केंद्रित नहीं था, लेकिन इससे एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट होती है: आधुनिक सैन्य शक्ति केवल रक्षा उपकरण खरीद लेने से नहीं बनती, बल्कि उन्हें लगातार चलाने, बनाए रखने, उन्नत करने और एकीकृत ढंग से इस्तेमाल करने की क्षमता से बनती है। जब किसी अभ्यास में उभयचर वाहन, हेलीकॉप्टर, गश्ती विमान, लड़ाकू जेट और ड्रोन एक साथ दिखाई देते हैं, तो उसके पीछे प्रशिक्षण, रसद, रखरखाव, डेटा-लिंक, मरम्मत व्यवस्था और तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र की लंबी श्रृंखला छिपी होती है।
यहीं से दक्षिण कोरिया की रक्षा-उद्योग शक्ति का महत्व समझ में आता है। पिछले कुछ वर्षों में कोरिया वैश्विक रक्षा बाज़ार में एक उभरती हुई ताकत के रूप में सामने आया है। उसके टैंक, होवित्जर, विमानन प्रणालियां और नौसैनिक प्लेटफॉर्म कई देशों की रुचि का विषय बने हैं। लेकिन किसी भी रक्षा उद्योग के लिए सबसे बड़ा प्रमाणपत्र वही सेना होती है जो अपने उपकरणों को नियमित रूप से विश्वसनीय ढंग से संचालित कर सके। पो항 का अभ्यास परोक्ष रूप से यही दिखाता है कि रक्षा तकनीक और सैन्य उपयोगिता के बीच वास्तविक रिश्ता कैसा बनता है।
भारतीय नजरिए से यह बिंदु विशेष रूप से प्रासंगिक है। भारत में ‘आत्मनिर्भर भारत’ और स्वदेशी रक्षा उत्पादन को लेकर लगातार जोर दिया जा रहा है। लेकिन केवल उत्पादन नहीं, बल्कि परिचालन एकीकरण भी उतना ही जरूरी है। कोई ड्रोन, हेलीकॉप्टर या बख्तरबंद वाहन तभी सार्थक है जब उसे संयुक्त अभियान में प्रभावी ढंग से शामिल किया जा सके। दक्षिण कोरिया का अनुभव भारत जैसे देशों के लिए यह सबक देता है कि रक्षा निर्माण और सैन्य प्रशिक्षण को अलग-अलग खानों में नहीं बांटा जा सकता।
इसके साथ एक और पहलू जुड़ता है—स्टार्टअप और नई तकनीक का। उपलब्ध पृष्ठभूमि-सामग्री में कोरियाई रक्षा स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ी एक अलग खबर का भी उल्लेख है। भले ही वह पो항 अभ्यास से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी न हो, लेकिन दोनों को साथ रखकर देखने पर तस्वीर साफ होती है: एक तरफ सैन्य मैदान में संयुक्त संचालन का अभ्यास, दूसरी तरफ रक्षा तकनीक और नवाचार को संस्थागत समर्थन। यही वह मॉडल है जिसमें रणनीति, उद्योग और प्रशिक्षण एक-दूसरे को मजबूती देते हैं।
भारत के लिए क्या सीख, और एशिया की सुरक्षा राजनीति में इसका क्या अर्थ है
भारतीय पाठकों के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि दक्षिण कोरिया के इस अभ्यास से हमें क्या समझना चाहिए। पहली बात, एशिया की सुरक्षा राजनीति तेजी से समुद्री आयामों की ओर बढ़ रही है। हिंद-प्रशांत की चर्चा हो, समुद्री आपूर्ति शृंखलाओं की सुरक्षा हो, या तटीय प्रतिरोधक क्षमता की बात—समुद्र अब सुरक्षा विमर्श का केंद्र बन चुका है। दक्षिण कोरिया का पो항 अभ्यास इसी समुद्री-रणनीतिक युग का हिस्सा है।
दूसरी बात, संयुक्त सैन्य क्षमता अब कोई वैकल्पिक विलासिता नहीं, बल्कि अनिवार्यता है। भारत ने कारगिल के बाद से लेकर आज तक सैन्य समन्वय, खुफिया साझेदारी, और संयुक्तता की जरूरत को कई बार महसूस किया है। चाहे अंडमान-निकोबार कमान हो, हिंद महासागर में नौसैनिक उपस्थिति, या आपदा-राहत अभियानों में तीनों सेनाओं का समन्वय—यह स्पष्ट है कि भविष्य के संकट किसी एक सेवा-शाखा से नहीं संभलेंगे। दक्षिण कोरिया का अभ्यास इस सच्चाई की पुष्टि करता है कि योजनाएं तभी कारगर होती हैं जब उनका लगातार यथार्थवादी अभ्यास किया जाए।
तीसरी बात, सुरक्षा संदेश हमेशा भाषणों से नहीं जाते। कभी-कभी एक अनुशासित, क्रमबद्ध और तकनीकी रूप से परिपक्व सैन्य अभ्यास किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस से कहीं अधिक प्रभाव छोड़ता है। दक्षिण कोरिया ने पो항 में यही किया। उसने क्षेत्रीय तनावों पर तीखी बयानबाजी किए बिना यह दिखाया कि उसकी तैयारी व्यवस्थित है। यह शैली भारत जैसे जिम्मेदार क्षेत्रीय शक्ति केंद्रों के लिए भी परिचित और प्रासंगिक है।
आखिर में, पो항 का यह संयुक्त उभयचर अभ्यास हमें यह समझने में मदद करता है कि आधुनिक एशिया में सुरक्षा का अर्थ केवल सीमा की रक्षा नहीं रह गया है। अब इसमें तकनीकी श्रेष्ठता, समुद्री गतिशीलता, संयुक्त कमान, औद्योगिक समर्थन, ड्रोन और सेंसर आधारित जागरूकता, और राजनीतिक विश्वसनीयता—सब शामिल हैं। दक्षिण कोरिया ने अपने तटीय अभ्यास के जरिए यही बहुस्तरीय संदेश दिया है।
भारत के हिंदी भाषी पाठकों के लिए इस कहानी की अहमियत इसलिए भी है क्योंकि यह हमें अपने क्षेत्र और अपनी चुनौतियों की याद दिलाती है। समुद्र से घिरा एशिया, प्रतिस्पर्धी शक्तियों का उदय, तकनीक-आधारित युद्ध की ओर झुकाव, और सुरक्षा व कूटनीति के बीच गहरा रिश्ता—ये केवल कोरिया की कहानी नहीं हैं। यह पूरे एशिया की कहानी है। पो항 के तट पर हुआ यह अभ्यास उसी कहानी का एक नया अध्याय है, जिसे समझना दिल्ली से लेकर सियोल तक, और मुंबई के बंदरगाह से लेकर बुसान के जलक्षेत्र तक, समान रूप से जरूरी है।
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