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दक्षिण कोरिया की स्वास्थ्य सहायता व्यवस्था में बड़ा मोड़: सिर्फ अस्पताल खर्च नहीं, अब ‘पूरे जीवन-चक्र’ की देखभाल पर जोर

इलाज से आगे बढ़कर जीवन को संभालने वाली व्यवस्था की ओरदक्षिण कोरिया में गरीब और सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए चलने वाली सरकारी स्वास्थ्य सहायता व्यवस्था एक अहम मोड़ पर पहुंचती दिख रही है। वहां की सरकार अब इस मॉडल पर विचार कर रही है कि स्वास्थ्य सहायता का मतलब केवल अस्पताल का बिल चुकाना या इलाज का खर्च वहन करना नहीं होना चाहिए, बल्कि बीमारी की रोकथाम, नियमित देखभाल, इलाज, पुनर्वास और रोजमर्रा के जीवन में सहारा देने वाली सेवाओं को एक साथ जोड़ना होगा। सरल शब्दों में कहें तो सोच यह है कि मरीज को केवल अस्पताल के बिस्तर तक नहीं, बल्कि उसके घर, मोहल्ले और दैनिक जीवन तक देखा जाए।यह बदलाव केवल प्रशासनिक फेरबदल नहीं है। इसके पीछे दक्षिण कोरिया के समाज में तेजी से बढ़ती उम्रदराज आबादी, पुरानी बीमारियों का बढ़ता बोझ, लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहने की समस्या और समुदाय-आधारित देखभाल की जरूरत जैसे बड़े कारण हैं। सरकार ने हाल में अपने केंद्रीय चिकित्सा सहायता समीक्षा तंत्र में इस बात पर चर्चा की कि मौजूदा व्यवस्था को किस तरह अगले चरण में ले जाया जाए। अगले वर्ष इस व्यवस्था के 50 वर्ष पूरे होने वाले हैं, इसलिए यह बहस केवल नीतिगत नहीं, बल्कि ऐतिहासिक भी है।भारतीय पाठकों के लिए यह समझना जरूरी है कि कोरिया की यह बहस हमें भी बहुत परिचित लग सकती है। भारत में भी स्वास्थ्य सेवा को लेकर लंबे समय से एक बुनियादी सवाल बना हुआ है—क्या सरकार की भूमिका केवल इलाज के समय आर्थिक मदद देने तक सीमित रहे, या उसे बीमारी से पहले, बीमारी के दौरान और उसके बाद भी व्यक्ति के जीवन को स्थिर बनाने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए? आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं ने अस्पताल में भर्ती से जुड़ी आर्थिक सुरक्षा का एक ढांचा दिया है, लेकिन भारत में भी बार-बार यह सवाल उठता है कि डिस्चार्ज के बाद मरीज का क्या होता है, बुजुर्ग अकेले कैसे जीते हैं, और पुरानी बीमारी से जूझ रहे गरीब परिवारों को वास्तविक सहारा कौन देता है।दक्षिण कोरिया की नई सोच इसीलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह एक बड़े सिद्धांत की ओर इशारा करती है: स्वास्थ्य केवल दवा, जांच और ऑपरेशन का नाम नहीं है। यदि किसी मरीज के पास घर लौटने के बाद चलने-फिरने की सुविधा नहीं, समय पर भोजन नहीं, घाव की देखभाल का इंतजाम नहीं, या डॉक्टर तक पहुंचने के लिए परिवहन नहीं, तो कागज पर हुआ इलाज भी अधूरा रह जाता है। भारतीय संदर्भ में इसे ऐसे समझा जा सकता है जैसे किसी गरीब मरीज का सरकारी अस्पताल में ऑपरेशन तो हो गया, लेकिन गांव लौटने के बाद न तो फॉलो-अप हो पाया, न पोषण मिला, न घर पर देखभाल। परिणामतः बीमारी फिर लौट आई। कोरिया अब इसी चक्र को तोड़ने की कोशिश कर रहा है।इस बहस का एक और अर्थ है—राज्य अब यह स्वीकार करता दिख रहा है कि कमजोर वर्गों की स्वास्थ्य समस्या अस्पताल की चारदीवारी के भीतर पैदा नहीं होती। वह रोजमर्रा की जिंदगी, आवास, आय, परिवार, भोजन, गतिशीलता और सामाजिक सहारे से गहराई से जुड़ी होती है। यही कारण है कि वहां चिकित्सा सहायता व्यवस्था को ‘खर्च की प्रतिपूर्ति’ से ‘जीवन को संभालने वाली व्यवस्था’ में बदलने की बात हो रही है। यह भाषा नई है, लेकिन चुनौती बहुत पुरानी है।कोरियाई व्यवस्था में क्या बदल रहा है और यह इतना अहम क्यों हैदक्षिण कोरिया की जिस व्यवस्था पर चर्चा हो रही है, उसका मूल उद्देश्य अब तक कमजोर तबकों को न्यूनतम चिकित्सा पहुंच देना रहा है। यानी जो लोग सामान्य स्वास्थ्य बीमा या निजी संसाधनों से इलाज नहीं करा सकते, उनके लिए सरकार सुरक्षा कवच बनती है। पिछले कई दशकों में इस मॉडल ने बुनियादी भूमिका निभाई, लेकिन अब यह माना जा रहा है कि पुराने ढांचे की सीमाएं स्पष्ट हो चुकी हैं। यदि कोई व्यक्ति बार-बार अस्पताल में भर्ती हो रहा है, लंबे समय तक अस्पताल में पड़ा है, या डिस्चार्ज के बाद फिर अस्थिर स्थिति में लौट जाता है, तो केवल अस्पताल-आधारित फंडिंग इस संकट का समाधान नहीं कर सकती।यहीं से ‘पूरे जीवन-चक्र की सहायता’ का विचार सामने आता है। कोरियाई नीति-निर्माता अब यह सोच रहे हैं कि सहायता की शुरुआत बीमारी गंभीर होने से पहले ही हो। इसमें रोकथाम, शुरुआती प्रबंधन, इलाज, पुनर्वास और देखभाल को एक ही निरंतर प्रक्रिया के हिस्से के रूप में देखा जाए। यह अवधारणा उन समाजों में ज्यादा प्रासंगिक हो जाती है जहां बुजुर्ग आबादी तेजी से बढ़ रही हो और अकेले रहने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ रही हो। दक्षिण कोरिया आज इन्हीं चुनौतियों का सामना कर रहा है।भारतीय पाठकों के लिए ‘रोकथाम से पुनर्वास तक’ वाला यह ढांचा कुछ हद तक उस अंतर की तरह है जो केवल अस्पताल आधारित योजना और व्यापक सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में होता है। हमारे यहां अक्सर नीति का राजनीतिक आकर्षण अस्पताल, मशीन, बिस्तर और बीमा राशि पर केंद्रित रहता है, क्योंकि यह तुरंत दिखाई देता है। लेकिन मधुमेह, उच्च रक्तचाप, स्ट्रोक के बाद देखभाल, कैंसर उपचार के बाद पोषण, या बुजुर्गों की दीर्घकालिक निर्भरता जैसे मुद्दे कागजों में कम और परिवारों के कंधों पर ज्यादा दिखते हैं। कोरिया की नई दिशा इस अदृश्य बोझ को दृश्य बनाने की कोशिश है।यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ‘मरीज’ की जगह ‘व्यक्ति’ को केंद्र में रखता है। अस्पताल में व्यक्ति एक केस नंबर होता है, लेकिन घर लौटते ही वह एक पिता, मां, दादा-दादी, अकेले रहने वाले बुजुर्ग, विकलांग व्यक्ति या अस्थिर आय वाले नागरिक में बदल जाता है। उसकी दिक्कत केवल मेडिकल नहीं रहती, सामाजिक भी हो जाती है। कोरिया की नीति में अब यही स्वीकारोक्ति दिख रही है कि स्वास्थ्य को सामाजिक जीवन से अलग करके नहीं समझा जा सकता।अगर इसे भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ में समझें तो हमारे यहां लंबे समय से परिवार को देखभाल की पहली इकाई माना जाता रहा है। लेकिन शहरीकरण, प्रवासन, छोटे परिवार और बुजुर्गों के अकेलेपन ने इस ढांचे को कमजोर किया है। दक्षिण कोरिया में भी परिवार आधारित देखभाल पर दबाव बढ़ा है। इसीलिए वहां सरकार यह सोच रही है कि यदि घर में पर्याप्त सहारा नहीं है, तो सार्वजनिक व्यवस्था को बीच में आना होगा। यह वह बिंदु है जहां कोरिया और भारत, अपनी अलग व्यवस्थाओं के बावजूद, एक साझा सामाजिक प्रश्न से जूझते दिखाई देते हैं।‘होम-आधारित चिकित्सा सहायता’ की अवधारणा क्या हैइस परिवर्तन की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है घर-आधारित चिकित्सा सहायता, जिसे दक्षिण कोरिया में एक ऐसे मॉडल के रूप में आगे बढ़ाया गया है जहां लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहने वाले चिकित्सा सहायता प्राप्तकर्ता अस्पताल के बजाय अपने घर में रहकर जरूरी सेवाएं ले सकें। इसका मतलब केवल घर भेज देना नहीं, बल्कि चिकित्सा, देखभाल, भोजन, आवाजाही और दैनिक जीवन से जुड़ी जरूरतों का समन्वित समर्थन देना है। यह सोच 2019 में पायलट परियोजना के रूप में शुरू हुई थी और जुलाई 2024 से इसे देशभर में लागू करने की दिशा में बढ़ाया गया।भारतीय पाठकों के लिए यह अवधारणा कुछ हद तक ‘होम केयर’, ‘कम्युनिटी केयर’ और ‘डिस्चार्ज के बाद समर्थन’ के मेल जैसी है, लेकिन कोरियाई मॉडल की खासियत यह है कि इसे सामाजिक रूप से कमजोर लोगों के लिए एक संस्थागत नीति के रूप में देखा जा रहा है। यह मान लिया गया है कि हर लंबे अस्पताल भर्ती के पीछे केवल चिकित्सा कारण नहीं होते। बहुत से लोग इसलिए भी अस्पताल में टिके रहते हैं क्योंकि घर लौटने पर उनकी मदद करने वाला कोई नहीं, खाने का भरोसा नहीं, चलने-फिरने की सुविधा नहीं, या दवाओं और घाव की निगरानी करने वाला कोई तंत्र नहीं।यह बात भारतीय समाज में भी खूब समझी जा सकती है। हमारे यहां कई परिवारों में ऐसा होता है कि मरीज इलाज के बाद घर तो आ जाता है, लेकिन घर में शौचालय, साफ जगह, नियमित दवा, फिजियोथेरेपी या देखभाल के लिए समय ही उपलब्ध नहीं होता। ग्रामीण क्षेत्रों में यह समस्या और जटिल हो सकती है, जहां जिला अस्पताल तक पहुंचना ही कठिन हो। ऐसे में अस्पताल में अनावश्यक लंबी भर्ती और घर में अधूरी रिकवरी—दोनों के बीच मरीज झूलता रहता है। कोरिया की यह पहल इस अंतर को भरने का प्रयास है।कोरियाई संदर्भ में ‘जैगा’ या घर-आधारित सहायता का अर्थ केवल चिकित्सक या नर्स की यात्रा नहीं, बल्कि एकीकृत सहायता है। यानी व्यक्ति के स्वास्थ्य को उसके घर-परिवार और आसपास के सामाजिक ढांचे के भीतर संभालना। भारतीय परिप्रेक्ष्य में इसे ऐसे समझा जा सकता है जैसे आशा कार्यकर्ता, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, सामाजिक कल्याण विभाग, बुजुर्ग देखभाल सेवाएं और स्थानीय प्रशासन किसी एक कमजोर मरीज के लिए साझा जिम्मेदारी निभाएं। फर्क यह है कि कोरिया इसे अधिक औपचारिक और योजनाबद्ध ढांचे में बदलना चाहता है।इस मॉडल का बड़ा संदेश यह है कि अस्पताल से बाहर भी स्वास्थ्य सेवा जारी रहनी चाहिए। बीमारी का उपचार तभी सार्थक है जब वह व्यक्ति को फिर से गरिमापूर्ण जीवन जीने की क्षमता लौटाए। यदि अस्पताल से छुट्टी के बाद व्यक्ति को फिर वही असुरक्षा घेर ले, तो इलाज केवल अस्थायी राहत बनकर रह जाता है। कोरिया इसी ‘अस्थायी राहत’ से ‘स्थायी सहारे’ की ओर बढ़ना चाहता है।संभावनाएं जितनी बड़ी, सीमाएं भी उतनी ही स्पष्टहालांकि इस मॉडल ने नई संभावनाएं खोली हैं, लेकिन उसकी सीमाएं भी उतनी ही साफ हैं। रिपोर्टों के अनुसार वर्तमान व्यवस्था मुख्यतः उन लोगों के लिए डिजाइन की गई है जो अस्पताल से डिस्चार्ज हुए हैं। यानी सहायता का दरवाजा अक्सर तब खुलता है जब व्यक्ति पहले ही लंबी भर्ती की स्थिति से गुजर चुका हो। आलोचकों का कहना है कि यदि नीति का मकसद रोकथाम और शुरुआती हस्तक्षेप है, तो केवल डिस्चार्ज के बाद सहायता देना पर्याप्त नहीं होगा। कई लोग ऐसे होते हैं जिन्हें समय रहते समुदाय स्तर पर मदद मिल जाए तो वे लंबी भर्ती तक पहुंचें ही नहीं।यहीं इस मॉडल का सबसे बड़ा विरोधाभास सामने आता है। सरकार कहती है कि वह बीमारी को व्यापक जीवन-प्रक्रिया के रूप में देखना चाहती है, लेकिन यदि पात्रता केवल अस्पताल से बाहर आने के बाद तय हो, तो व्यवस्था अभी भी ‘बाद में प्रतिक्रिया’ देने वाले ढांचे में फंसी रह सकती है। भारत में भी यही समस्या अलग रूप में देखने को मिलती है। योजनाएं अक्सर तब सक्रिय होती हैं जब मरीज की हालत गंभीर हो जाती है, जबकि प्राथमिक स्तर पर पोषण, दवा पालन, परामर्श और घरेलू सहारा समय पर मिल जाए तो अस्पताल का दबाव कम हो सकता है।दूसरी बड़ी चिंता सहायता की समय-सीमा को लेकर है। कोरियाई घर-आधारित चिकित्सा सहायता में अधिकतम दो वर्ष तक समर्थन मिलने का प्रावधान चर्चा में रहा है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या किसी गरीब, बुजुर्ग, अकेले या बहु-बीमारी से जूझ रहे व्यक्ति का जीवन प्रशासनिक कैलेंडर के हिसाब से स्थिर हो जाता है? पुनर्वास और समुदाय में दोबारा टिकना एक रैखिक प्रक्रिया नहीं होती। किसी का घर सुरक्षित नहीं, किसी के परिवार में देखभाल करने वाला नहीं, किसी की आय अनिश्चित है, तो किसी की गतिशीलता सीमित। ऐसे में दो साल बाद अचानक सहारा कमजोर पड़ना व्यक्ति को फिर पुराने संकट में धकेल सकता है।तीसरी चुनौती समन्वय की है। कागज पर चिकित्सा, देखभाल, भोजन, दवा, परिवहन और दैनिक सहायता को जोड़ देना आसान लगता है, लेकिन जमीन पर यह तभी काम करता है जब कोई संस्था या टीम इनके बीच वास्तविक तालमेल स्थापित करे। भारतीय प्रशासनिक अनुभव बताता है कि विभागीय विभाजन अक्सर सेवा की सबसे बड़ी बाधा बन जाता है। स्वास्थ्य विभाग अपने हिसाब से चलता है, सामाजिक न्याय विभाग अपने, स्थानीय निकाय अपने। कोरिया भी इसी जोखिम से जूझ रहा है—सूची बनाना और प्रणाली चलाना दो अलग बातें हैं।इसके अलावा एक और संवेदनशील प्रश्न है: क्या ऐसी व्यवस्था व्यक्ति की गरिमा बढ़ाएगी या उसे अत्यधिक निगरानी वाले मॉडल में बदल देगी? कमजोर वर्गों के लिए बनाई गई योजनाओं में यह संतुलन हमेशा कठिन रहता है। सहायता जरूरी है, लेकिन सहायता की शर्तें इतनी जटिल न हों कि पात्र व्यक्ति खुद को बोझ या ‘केस’ समझने लगे। कोरिया की आने वाली नीति का मूल्यांकन इसी कसौटी पर भी होगा कि वह नागरिक को अधिकार देती है या केवल प्रबंधन का विषय बनाती है।यह बहस भारत के लिए क्यों मायने रखती हैपहली नजर में यह दक्षिण कोरिया की घरेलू नीति लग सकती है, लेकिन इसके संकेत भारत जैसे देश के लिए भी गहरे हैं। भारत में स्वास्थ्य सेवा की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है जेब से होने वाला खर्च, इलाज में असमान पहुंच और डिस्चार्ज के बाद समर्थन की कमी। पिछले वर्षों में सार्वजनिक स्वास्थ्य बीमा के विस्तार ने एक सुरक्षा दी है, लेकिन गरीब परिवारों की वास्तविक परेशानी केवल भर्ती खर्च तक सीमित नहीं है। ऑपरेशन के बाद पोषण, बुजुर्गों की देखभाल, कैंसर या स्ट्रोक के बाद लंबी रिकवरी, मानसिक स्वास्थ्य, विकलांगता के साथ जीवन—ये सारे क्षेत्र अभी भी अक्सर परिवारों के भरोसे छोड़ दिए जाते हैं।हमारे यहां गांवों और कस्बों में एक आम दृश्य है: अस्पताल से घर लौटा बुजुर्ग मरीज, जिसे दवा समय पर चाहिए, फॉलो-अप के लिए नियमित यात्रा चाहिए, चलने-फिरने में मदद चाहिए, लेकिन परिवार के कामकाजी सदस्य शहर में हैं या दिहाड़ी पर जाते हैं। ऐसे में महिला परिजन पर देखभाल का अतिरिक्त भार पड़ता है। दक्षिण कोरिया की बहस हमें याद दिलाती है कि स्वास्थ्य नीति का लिंग आयाम भी होता है। जब राज्य देखभाल की जिम्मेदारी नहीं लेता, तो उसका भार चुपचाप घर की महिलाओं के हिस्से आता है। भारतीय समाज इस सच को अच्छी तरह जानता है, भले ही नीति दस्तावेजों में यह कम दिखाई दे।दूसरा सबक यह है कि स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा को अलग-अलग खानों में बांटना अंततः महंगा पड़ता है। यदि मरीज को दवा तो मिल रही है, लेकिन भोजन नहीं; इलाज हो गया, लेकिन चलने के लिए सहायक उपकरण नहीं; अस्पताल पहुंचना जरूरी है, लेकिन यात्रा साधन नहीं—तो पूरी व्यवस्था का प्रभाव घट जाता है। भारत में भी बहु-विभागीय समन्वय लंबे समय से कमजोर कड़ी रहा है। दक्षिण कोरिया अब इसी गांठ को खोलने की कोशिश कर रहा है।तीसरा, तेजी से बूढ़े होते समाजों की चर्चा भले अभी जापान और कोरिया के संदर्भ में ज्यादा होती हो, लेकिन भारत भी इस दिशा में बढ़ रहा है। आने वाले दशकों में बुजुर्ग आबादी, अकेले रहने वाले वरिष्ठ नागरिक, पुरानी बीमारियों और निर्भरता से जुड़े प्रश्न हमारे सामने और तीखे रूप में आएंगे। यदि हम अभी से देखभाल-आधारित स्वास्थ्य मॉडल पर गंभीरता से नहीं सोचते, तो अस्पताल-केंद्रित ढांचा भविष्य में और दबाव झेलेगा। कोरिया आज जिस मोड़ पर खड़ा है, वह भारत के लिए एक तरह का पूर्वाभास भी है।भारतीय सामाजिक जीवन में ‘सेवा’ और ‘परिवार’ की अवधारणा बहुत गहरी है। लेकिन आधुनिक अर्थव्यवस्था और बदलते सामाजिक ढांचे में केवल नैतिक अपील के भरोसे देखभाल की व्यवस्था नहीं चल सकती। जैसे शिक्षा में केवल परिवार नहीं, स्कूल भी चाहिए; वैसे ही स्वास्थ्य में केवल घर का समर्पण नहीं, सार्वजनिक समर्थन भी चाहिए। कोरिया की नीति बहस इस बदलते संतुलन को संस्थागत रूप देने का प्रयास है।आगे की नीति में असली कसौटी क्या होगीदक्षिण कोरिया की आगामी चिकित्सा सहायता योजना के सामने सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि समर्थन किन लोगों तक पहुंचेगा। यदि पात्रता बहुत सीमित रखी गई, तो मॉडल प्रभावशाली होने के बावजूद व्यापक सामाजिक असर नहीं डाल पाएगा। यदि पात्रता बहुत व्यापक हुई, तो संसाधन और प्राथमिकता निर्धारण की चुनौती सामने आएगी। इसलिए असली परीक्षा केवल नीयत की नहीं, नीति-डिजाइन की होगी। किन जोखिम समूहों को पहले शामिल किया जाए, किस आधार पर सहायता की तीव्रता तय हो, और समुदाय-स्तर पर किसे समन्वय की जिम्मेदारी मिले—ये वे प्रश्न हैं जिनका उत्तर ठोस होना चाहिए।दूसरी कसौटी लचीलापन है। हर व्यक्ति की रिकवरी और निर्भरता की अवधि अलग होती है। किसी को कुछ महीने में स्थिरता मिल सकती है, किसी को वर्षों तक सहारा चाहिए। इसलिए समान समय-सीमा वाली नीति अक्सर सबसे कमजोर लोगों के साथ अन्याय कर सकती है। कोरिया यदि वास्तव में जीवन-चक्र आधारित समर्थन चाहता है, तो उसे व्यक्ति की स्थिति के अनुरूप समीक्षा और विस्तार की प्रणाली बनानी होगी। यही बात भारत जैसी विविधता भरी व्यवस्था पर भी लागू होती है।तीसरी कसौटी जवाबदेही की है। जब चिकित्सा, पुनर्वास, भोजन, आवाजाही और देखभाल जैसे कई घटक एक साथ आते हैं, तो अक्सर यह स्पष्ट नहीं रहता कि अंतिम जिम्मेदारी किसकी है। मरीज या परिवार को किस दरवाजे पर जाना है? किस अधिकारी या संस्था से जवाब मांगा जाए? कौन यह सुनिश्चित करेगा कि डॉक्टर की सलाह, सामाजिक कार्यकर्ता की मदद और स्थानीय सेवा प्रदाता का काम एक-दूसरे से जुड़ा रहे? यदि यह स्पष्ट नहीं हुआ, तो ‘एकीकृत देखभाल’ का नारा व्यवहार में विखंडित सेवा बन सकता है।चौथी कसौटी यह होगी कि सफलता को कैसे मापा जाए। क्या सफलता का मतलब केवल अस्पताल खर्च कम होना है? या फिर यह देखना होगा कि कितने लोग दोबारा अनावश्यक भर्ती से बचे, कितने मरीज समुदाय में बेहतर ढंग से रह पाए, कितनों की दैनिक कार्यक्षमता सुधरी, और कितने परिवारों का देखभाल का बोझ हल्का हुआ। यदि मूल्यांकन केवल वित्तीय बचत पर टिका रहा, तो नीति अपने मानवीय उद्देश्य से दूर जा सकती है।दक्षिण कोरिया के लिए यह क्षण इसलिए भी निर्णायक है क्योंकि वह अपनी पुरानी चिकित्सा सहायता व्यवस्था के 50 वर्ष पूरे होने से ठीक पहले उसके चरित्र पर पुनर्विचार कर रहा है। यह विरासत और परिवर्तन के बीच का समय है। क्या राज्य केवल भुगतान करने वाला तंत्र रहेगा, या जीवन के कठिन मोड़ों पर नागरिक का सहारा बनेगा? यही मूल प्रश्न है।स्वास्थ्य नीति की नई दिशा: अस्पताल के बिल से आगे, मानव गरिमा तकदक्षिण कोरिया में चल रही यह बहस अंततः एक बड़े मानवीय सत्य तक पहुंचती है—बीमारी केवल शरीर की घटना नहीं, जीवन की घटना होती है। खासकर गरीब, बुजुर्ग, अकेले और बहुस्तरीय वंचनाओं से जूझ रहे लोगों के लिए बीमारी आय, रिश्तों, आवास, भोजन और आत्मसम्मान तक को प्रभावित करती है। इसलिए यदि नीति केवल उपचार लागत तक सीमित रहती है, तो वह समस्या के एक हिस्से को ही संबोधित करती है। कोरिया की नई दिशा इस अधूरेपन को पहचानती दिख रही है।यह कहना अभी जल्दबाजी होगा कि वहां की सरकार जो नया ढांचा बना रही है, वह कितनी सफल होगी। लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि बहस का केंद्र बदल गया है। पहले प्रश्न था—इलाज का भुगतान कैसे किया जाए? अब प्रश्न है—व्यक्ति को बीमारी के बावजूद जीवन में कैसे टिकाए रखा जाए? यही बदलाव इस चर्चा को ऐतिहासिक बनाता है।भारतीय पाठकों के लिए इसमें एक खास सीख छिपी है। स्वास्थ्य नीति के बारे में हमारी चर्चाएं अक्सर अस्पताल, बीमा राशि, डॉक्टरों की कमी, दवा की उपलब्धता या बजट पर रुक जाती हैं। ये सब जरूरी हैं, लेकिन पर्याप्त नहीं। असली स्वास्थ्य सुरक्षा तब बनती है जब व्यक्ति को बीमारी से पहले सावधानी, बीमारी के दौरान इलाज और बीमारी के बाद सहारा—तीनों मिलें। यदि दक्षिण कोरिया इस दिशा में प्रभावी संस्थागत मॉडल बना पाता है, तो एशिया के अन्य देशों, जिनमें भारत भी शामिल है, के लिए यह एक महत्वपूर्ण संदर्भ बनेगा।एक समय था जब विकास का मतलब अस्पतालों की संख्या, मशीनों की क्षमता और विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता से मापा जाता था। अब धीरे-धीरे यह समझ बन रही है कि स्वास्थ्य व्यवस्था की परिपक्वता इस बात से भी मापी जानी चाहिए कि वह समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति को कितना संभाल पाती है। क्या वह व्यक्ति घर लौटकर सम्मान के साथ जी सकता है? क्या उसे फिर से अस्पताल में लौटने से बचाया जा सकता है? क्या उसके परिवार का बोझ कम होता है? क्या वह अकेलापन और असुरक्षा के बीच नहीं छूटता? कोरिया की नई नीति बहस इन्हीं प्रश्नों के इर्द-गिर्द घूम रही है।अंततः, किसी भी लोकतांत्रिक कल्याणकारी व्यवस्था की असली पहचान यही होती है कि वह संकटग्रस्त नागरिक के साथ कितनी देर और कितनी गहराई से खड़ी रहती है। केवल खर्च चुकाना आसान प्रशासन है; जीवन संभालना कठिन शासन है। दक्षिण कोरिया अब दूसरे रास्ते की ओर कदम बढ़ाता दिख रहा है। यही इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है—स्वास्थ्य सहायता की अगली पीढ़ी शायद अस्पताल के बिल से नहीं, मानव गरिमा से शुरू होगी।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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