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दक्षिण कोरिया में साइबर सुरक्षा स्टार्टअप अब ‘सपोर्ट स्कीम’ नहीं, औद्योगिक नीति का हिस्सा हैं — भारत के लिए इसका क्या मत

दक्षिण कोरिया में साइबर सुरक्षा स्टार्टअप अब ‘सपोर्ट स्कीम’ नहीं, औद्योगिक नीति का हिस्सा हैं — भारत के लिए इसका क्या मत

भूमिका: कोरिया की नई प्राथमिकता हमें क्या बताती है

दक्षिण कोरिया की तकनीकी दुनिया से इस समय जो सबसे महत्वपूर्ण संकेत निकलकर सामने आ रहा है, वह केवल जनरेटिव एआई, नए चैटबॉट या चमकदार डिजिटल सेवाओं का नहीं है। असली कहानी उस अदृश्य ढांचे की है जिसके बिना कोई भी डिजिटल अर्थव्यवस्था टिकाऊ नहीं बन सकती—साइबर सुरक्षा। कोरिया में हाल में हुए घटनाक्रम बता रहे हैं कि वहां सुरक्षा स्टार्टअप को अब केवल छोटे उद्यमों के लिए प्रोत्साहन योजना, इनक्यूबेशन कार्यक्रम या सीमित अनुदान के नजरिये से नहीं देखा जा रहा। उन्हें अब राष्ट्रीय औद्योगिक प्रतिस्पर्धा, डिजिटल संप्रभुता और संस्थागत भरोसे की बुनियाद के रूप में रखा जा रहा है।

यह बदलाव प्रतीकात्मक नहीं, संरचनात्मक है। एक ओर कोरिया सूचना सुरक्षा उद्योग संघ यानी केआईएसआईए और सियोल क्रिएटिव इकॉनमी इनोवेशन सेंटर जैसे संस्थान सुरक्षा स्टार्टअप को बढ़ावा देने के लिए साथ आए हैं। दूसरी ओर, सार्वजनिक संस्थानों की साइबर सुरक्षा क्षमता को ठोस मूल्यांकन और रैंकिंग के जरिए मापा जा रहा है। यानी एक तरफ आपूर्ति पक्ष तैयार किया जा रहा है—नए सुरक्षा उद्यम, नई तकनीक, नए समाधान—और दूसरी तरफ मांग पक्ष को व्यवस्थित किया जा रहा है—सरकारी एजेंसियां, सार्वजनिक उपक्रम, आवश्यक सेवाएं और नियामकीय ढांचा।

भारतीय पाठकों के लिए इसे समझने का आसान तरीका यह है कि जैसे भारत में डिजिटल इंडिया, यूपीआई, आधार, जीएसटी नेटवर्क, कोविन या सरकारी सेवा पोर्टलों ने डिजिटल ढांचे को आम जीवन का हिस्सा बना दिया, उसी तरह कोरिया भी अब इस चरण पर पहुंच चुका है जहां सवाल यह नहीं रह गया कि कितनी चीजें ऑनलाइन होंगी, बल्कि यह है कि जो कुछ भी ऑनलाइन है, वह कितनी सुरक्षित, भरोसेमंद और निरंतर चलने वाली व्यवस्था में बदलेगा। भारत में भी हम बार-बार देखते हैं कि किसी बैंकिंग ऐप का ठप होना, किसी सरकारी पोर्टल पर डेटा लीक की आशंका, या किसी अस्पताल-नेटवर्क पर रैनसमवेयर का हमला सिर्फ तकनीकी घटना नहीं रहता; वह सीधे नागरिक भरोसे, कारोबार और शासन को प्रभावित करता है। कोरिया आज इसी मोड़ पर अपनी नीतियों को फिर से व्यवस्थित कर रहा है।

इस घटनाक्रम की सबसे बड़ी अहमियत यही है कि सुरक्षा को अब ‘जरूरी लेकिन बाद में देखेंगे’ वाले विभाग से निकालकर उद्योग नीति के केंद्र में रखा जा रहा है। यह परिवर्तन किसी भी डिजिटल समाज के परिपक्व होने का संकेत माना जाता है। जब तक तकनीक का विस्तार हो रहा होता है, सुरक्षा अक्सर बैकएंड का मसला समझी जाती है। लेकिन जैसे-जैसे डिजिटल ढांचा रोजमर्रा की अर्थव्यवस्था और प्रशासन की धुरी बनता है, सुरक्षा खुद एक स्वतंत्र बाजार, स्वतंत्र कौशल क्षेत्र और स्वतंत्र नीति-अक्ष में बदल जाती है। कोरिया में अभी यही हो रहा है।

क्यों अभी? एआई के दौर में ‘ट्रस्ट इंफ्रास्ट्रक्चर’ की मांग

यह प्रश्न स्वाभाविक है कि सुरक्षा स्टार्टअप पर इतना जोर अभी क्यों दिखाई दे रहा है। इसका उत्तर कोरिया तक सीमित नहीं है; यह पूरी दुनिया की डिजिटल अर्थव्यवस्था की दिशा से जुड़ा है। पिछले कुछ वर्षों में क्लाउड सेवाओं, रिमोट वर्क, डेटा आधारित निर्णय-प्रणाली, एपीआई इंटीग्रेशन, बाहरी सॉफ्टवेयर निर्भरता और जनरेटिव एआई ने संगठनों को पहले से कहीं अधिक जुड़े हुए नेटवर्क में बदल दिया है। इससे दक्षता बढ़ी है, लेकिन जोखिम भी कई गुना बढ़ा है। अब हमला केवल किसी एक सर्वर पर नहीं होता; वह सप्लाई चेन, थर्ड-पार्टी टूल, कर्मचारी खातों, मशीन-टू-मशीन कनेक्शन और औद्योगिक संचालन प्रणालियों तक फैल सकता है।

भारत में इसकी तुलना आप ऐसे कर सकते हैं जैसे एक समय ई-कॉमर्स का मुद्दा सिर्फ वेबसाइट बनाना था, फिर भुगतान तंत्र महत्वपूर्ण हुआ, और आज डेटा सुरक्षा, फ्रॉड रोकथाम, केवाईसी अनुपालन, लॉजिस्टिक्स ट्रैकिंग तथा ग्राहक विश्वास पूरी श्रृंखला का हिस्सा बन चुके हैं। ठीक इसी तरह कोरिया में भी डिजिटल रूपांतरण का पहला चरण ‘सेवाएं शुरू करो’ था, जबकि मौजूदा चरण ‘सेवाओं को सुरक्षित और स्थिर रखो’ का है। इस दूसरे चरण में सुरक्षा कंपनियों का रोल स्वाभाविक रूप से केंद्र में आ जाता है।

जनरेटिव एआई ने इस जरूरत को और जटिल बना दिया है। एआई मॉडल, डेटा पाइपलाइन, संवेदनशील दस्तावेज, स्वचालित निर्णय, कोड जनरेशन और एंटरप्राइज इंटीग्रेशन नए अवसर लाते हैं, पर साथ ही नए हमले की सतह भी बनाते हैं। अगर कोई संस्था एआई अपनाती है, लेकिन उसके डेटा एक्सेस नियंत्रण, मॉडल गवर्नेंस, लॉगिंग, ऑडिट और आंतरिक नीति स्पष्ट नहीं है, तो लाभ से ज्यादा जोखिम पैदा हो सकता है। इसलिए कोरिया में एआई के समानांतर एक और शब्द जोर पकड़ रहा है—भरोसे का बुनियादी ढांचा। यही वह क्षेत्र है जहां सुरक्षा स्टार्टअप की भूमिका निर्णायक बनती है।

पहले सुरक्षा कंपनियों को अक्सर संकट के बाद याद किया जाता था—डेटा लीक हो गया, सिस्टम बंद हो गया, तब विशेषज्ञ बुलाओ। अब यह सोच बदली है। अब संस्थाएं पूछ रही हैं: हमारे वेंडर कितने सुरक्षित हैं? हमारे क्लाउड कॉन्फिगरेशन कौन देख रहा है? सप्लाई चेन किस स्तर तक सत्यापित है? क्या औद्योगिक नेटवर्क अलग और सुरक्षित हैं? क्या नियामकीय प्रमाणन समय पर हो सकता है? इन प्रश्नों का उत्तर हर बार कोई विशाल बहुराष्ट्रीय कंपनी ही दे, यह जरूरी नहीं। कई बार छोटे लेकिन अत्यधिक विशेषज्ञ स्टार्टअप बेहतर समाधान दे सकते हैं। यही कारण है कि कोरिया अब सुरक्षा स्टार्टअप को सामान्य स्टार्टअप कार्यक्रमों में हाशिये पर रखने के बजाय अलग नीति-समर्थन देना चाहता है।

केआईएसआईए और सियोल इनोवेशन सेंटर की साझेदारी का असली अर्थ

किसी उद्योग संघ और किसी स्टार्टअप-प्रोत्साहन संस्था के बीच समझौते को सतही नजर से देखा जाए तो यह एक और एमओयू भर लग सकता है। लेकिन कोरिया में इस तरह की साझेदारी का मतलब इससे कहीं अधिक है। केआईएसआईए जैसे संगठन के पास उद्योग जगत से सीधा संपर्क, क्षेत्र की विश्वसनीयता, विशेषज्ञ नेटवर्क और बाजार की जरूरतों की समझ होती है। वहीं सियोल क्रिएटिव इकॉनमी इनोवेशन सेंटर जैसे संस्थानों के पास उद्यमिता ढांचा, मेंटरशिप, नेटवर्किंग, शुरुआती समर्थन और व्यावसायिक रूपांतरण की क्षमता होती है। जब ये दोनों प्रकार की संस्थाएं साथ आती हैं, तब केवल तकनीक विकसित करने की बात नहीं होती, बल्कि उस तकनीक को बाजार में भरोसे के साथ उतारने की संभावना भी मजबूत होती है।

सुरक्षा स्टार्टअप की सबसे बड़ी समस्या अक्सर तकनीक की कमी नहीं, बल्कि ग्राहक के विश्वास तक पहुंच की कमी होती है। कोई भी बैंक, ऊर्जा कंपनी, सरकारी एजेंसी या बड़ी औद्योगिक इकाई आसानी से किसी नए खिलाड़ी को अपने नेटवर्क में प्रवेश नहीं देती। कारण स्पष्ट है—सुरक्षा में गलती की कीमत बहुत बड़ी होती है। यहां ‘पहले ग्राहक’ तक पहुंचना ही सबसे कठिन युद्ध है। भारत में भी डीप-टेक, रक्षा तकनीक, हेल्थ-टेक या रेग-टेक स्टार्टअप का यही अनुभव रहा है: पूंजी जुटाना कठिन है, लेकिन उससे भी कठिन है विश्वसनीय रेफरेंस, पायलट प्रोजेक्ट और प्रमाणन का रास्ता बनाना।

कोरिया इस समस्या को समझते हुए सुरक्षा स्टार्टअप के लिए अलग व्यवस्था बनाता दिख रहा है। सामान्य सास या कंज्यूमर ऐप स्टार्टअप के लिए जो मॉडल काम करता है, वही सुरक्षा क्षेत्र में पर्याप्त नहीं होता। यहां टेस्टबेड चाहिए, स्वतंत्र मूल्यांकन चाहिए, अनुपालन समझना पड़ता है, कई बार सरकारी खरीद तंत्र में प्रवेश की जरूरत होती है, और शुरुआती ग्राहक को यह भरोसा दिलाना होता है कि स्टार्टअप केवल नया नहीं, भरोसेमंद भी है। इसलिए यदि कोई कार्यक्रम उद्योग संघ, स्टार्टअप केंद्र, संभावित ग्राहक, प्रमाणन सलाह और निवेश को एक मंच पर लाता है, तो उसका महत्व बहुत बढ़ जाता है।

भारतीय संदर्भ में देखें तो यह वैसा ही है जैसे अगर किसी साइबर सुरक्षा स्टार्टअप के लिए केवल इनक्यूबेशन डेस्क नहीं, बल्कि सीईआरटी-इन, सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों, वित्तीय संस्थानों, राज्य सरकारों और उद्योग मंचों के साथ संरचित परिचय का तंत्र बने। तब वह कंपनी केवल आइडिया-स्टेज उद्यम नहीं रहती; वह राष्ट्रीय डिजिटल अवसंरचना की संभावित आपूर्तिकर्ता बन जाती है। कोरिया का हालिया कदम इसी सोच का परिचायक है। यह संदेश भी देता है कि सुरक्षा नीति को केवल रक्षा-प्रतिक्रिया या नियमन के नजरिये से नहीं, बल्कि उद्योग निर्माण के नजरिये से देखा जा रहा है।

सार्वजनिक संस्थानों की रेटिंग: सुरक्षा अब नारा नहीं, संचालन क्षमता है

कोरिया में एक सार्वजनिक संस्था को दो वर्ष लगातार सर्वोच्च साइबर सुरक्षा मूल्यांकन मिलना जितना प्रशासनिक समाचार लगता है, उससे कहीं बड़ा संकेत उसके भीतर छिपा है। इसका अर्थ यह है कि सुरक्षा अब किसी एक बार चलाए गए अभियान, एक ऑडिट या किसी घटना के बाद की सुधार-योजना का विषय नहीं रही। यह निरंतर संचालन, मापन, सुधार और जवाबदेही का हिस्सा बन रही है। जब किसी संस्था को लगातार उच्च मूल्यांकन मिलता है, तो यह बताता है कि उसके पास प्रक्रियाएं, निगरानी, प्रशिक्षण, नीति और तकनीकी तैयारी एक क्रमबद्ध ढांचे में मौजूद है।

इसका औद्योगिक महत्व बहुत गहरा है। जब सरकारें और सार्वजनिक निकाय साइबर सुरक्षा को मापने योग्य मानकों में बदलते हैं, तब बाजार में केवल सामान्य सुरक्षा उत्पादों की नहीं, बल्कि विशिष्ट समाधान और सेवाओं की मांग पैदा होती है। उदाहरण के लिए संपत्ति पहचान, पहचान एवं पहुंच प्रबंधन, धमकी पहचान, सप्लाई-चेन निगरानी, औद्योगिक नेटवर्क सुरक्षा, सहयोगी विक्रेताओं के एक्सेस नियंत्रण, लॉग विश्लेषण, घटना प्रतिक्रिया अभ्यास, अनुपालन ऑटोमेशन—ये सभी अलग-अलग व्यापारिक अवसरों में बदल सकते हैं।

भारत में भी यदि हम राष्ट्रीय महत्त्व के क्षेत्रों—ऊर्जा, पेट्रोलियम, रेलवे, डिजिटल भुगतान, स्वास्थ्य, शहरी सेवाएं, राज्य डेटा केंद्र—को देखें, तो पाएंगे कि सुरक्षा का प्रश्न केवल आईटी विभाग तक सीमित नहीं रहता। एक शहर का पानी वितरण नेटवर्क, एक बिजली ग्रिड, एक तेल पाइपलाइन, एक बंदरगाह या एक सरकारी पहचान डेटाबेस—इनमें किसी भी स्तर पर व्यवधान व्यापक आर्थिक और सामाजिक असर डाल सकता है। इसलिए कोरिया का यह जोर कि सार्वजनिक संस्थान अपनी सुरक्षा-क्षमता को रेटिंग, समीक्षा और दोहराए जा सकने वाले मानकों में साबित करें, बहुत महत्व रखता है।

इसका एक और पहलू है—मांग की गुणवत्ता। सुरक्षा बाजार केवल हार्डवेयर बेचने का क्षेत्र नहीं रह गया। यहां ग्राहक चाहते हैं कि समाधान उनकी वास्तविक कार्यप्रणाली में फिट बैठे। इस वजह से वे कंपनियां आगे आती हैं जो लंबे समय तक संचालन समझें, डेटा नीतियों को जानें, नियमन का अर्थ समझें और संस्थागत जटिलताओं के साथ काम कर सकें। इसलिए जब सार्वजनिक क्षेत्र के मूल्यांकन कड़े होते हैं, तब छोटे लेकिन विशेषज्ञ स्टार्टअप के लिए अवसर पैदा होते हैं। वे बड़े ठेकों की छाया में गायब होने के बजाय विशिष्ट समस्याओं के समाधानकर्ता बनकर सामने आ सकते हैं।

‘सपोर्ट स्कीम’ से ‘इंडस्ट्रियल पॉलिसी’ तक: भाषा बदली तो सोच भी बदली

कोरिया में इस समय सबसे अहम बदलाव शायद शब्दों के स्तर पर है, लेकिन इसका प्रभाव बहुत वास्तविक है। जब किसी क्षेत्र को केवल ‘स्टार्टअप समर्थन’ के दायरे में रखा जाता है, तो चर्चा फंडिंग, मेंटरशिप, पिचिंग, प्रतियोगिता और शुरुआती प्रशिक्षण तक सीमित रह जाती है। लेकिन जब वही क्षेत्र औद्योगिक नीति का हिस्सा बनता है, तब सवाल बदल जाते हैं। तब पूछा जाता है: क्या इस क्षेत्र के लिए दीर्घकालिक घरेलू बाजार बनेगा? क्या सार्वजनिक खरीद में अवसर मिलेंगे? क्या प्रमाणन और परीक्षण का ढांचा उपलब्ध होगा? क्या कौशल-श्रृंखला तैयार होगी? क्या निर्यात-क्षमता विकसित की जाएगी? क्या यह राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा का स्तंभ बनेगा?

यही वह स्तर है जिस पर दक्षिण कोरिया सुरक्षा स्टार्टअप को ले जाता दिख रहा है। इसका सीधा मतलब है कि सुरक्षा अब केवल खर्च नहीं, बल्कि उत्पादक निवेश के रूप में देखी जा रही है। यह वैसा ही बदलाव है जैसा भारत में मोबाइल निर्माण, सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन या इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली के मामले में देखने को मिला—जब तक नीति केवल प्रोत्साहन पर रहती है, उद्योग सीमित रहता है; लेकिन जैसे ही उसे रणनीतिक उद्योग माना जाता है, पूरे इकोसिस्टम की रचना शुरू होती है।

साइबर सुरक्षा के मामले में यह और भी जरूरी है क्योंकि यह ऐसा क्षेत्र है जहां घरेलू क्षमता का प्रश्न सीधे राष्ट्रीय हित से जुड़ जाता है। विदेशी तकनीक उपयोगी हो सकती है, लेकिन हर स्तर पर बाहरी निर्भरता जोखिम भी पैदा करती है—विशेष रूप से तब, जब डेटा संप्रभुता, महत्वपूर्ण अवसंरचना और प्रशासनिक नेटवर्क दांव पर हों। ऐसे में यदि किसी देश को अपने डिजिटल विस्तार को सुरक्षित रखना है, तो उसे स्थानीय सुरक्षा कंपनियों, विशेषज्ञता और सेवा-श्रृंखला को सक्षम बनाना ही होगा। कोरिया का रुख इसी व्यापक सोच की ओर इशारा करता है।

भारतीय संदर्भ में यह बहस और भी प्रासंगिक है। हमारे यहां स्टार्टअप परिदृश्य विशाल है, लेकिन साइबर सुरक्षा को अक्सर या तो आईटी सेवा के एक उपवर्ग के रूप में देखा जाता है, या किसी हमले के बाद तात्कालिक चिंता के रूप में। जबकि सच्चाई यह है कि भारत जितना अधिक डिजिटल सार्वजनिक ढांचा बनाता जाएगा, उतना ही अधिक उसे घरेलू सुरक्षा कंपनियों, विशिष्ट प्रतिभा, नीति-संगत परीक्षण, भरोसेमंद ऑडिट, और सार्वजनिक-निजी समन्वय की आवश्यकता होगी। इसीलिए कोरिया की हालिया दिशा भारत के नीति-निर्माताओं, निवेशकों और उद्योग समूहों के लिए भी ध्यान देने योग्य है।

सुरक्षा बाजार का नया रूप: ‘घटना के बाद प्रतिक्रिया’ नहीं, ‘लेन-देन से पहले भरोसा’

पारंपरिक सोच में साइबर सुरक्षा का मतलब अक्सर एंटीवायरस, फायरवॉल या हैकिंग के बाद जांच से जोड़ा जाता था। लेकिन आज सुरक्षा का अर्थ इससे कहीं अधिक व्यापक हो चुका है। अब यह उस भरोसे का हिस्सा है जिसके बिना दो संस्थाओं के बीच डिजिटल लेन-देन शुरू ही नहीं हो सकता। कोई कंपनी किसी वेंडर को अनुबंध देने से पहले उसकी सुरक्षा-परिपक्वता देखती है। कोई सार्वजनिक संस्था बाहरी समाधान जोड़ने से पहले उसके अनुपालन और नियंत्रण मानक जांचती है। कोई औद्योगिक संयंत्र यह देखता है कि आईटी और ओटी यानी ऑपरेशनल टेक्नोलॉजी के बीच सुरक्षा पुल कितना मजबूत है। यानी सुरक्षा अब बैकऑफिस की चीज नहीं, अनुबंध-पूर्व योग्यता बनती जा रही है।

इस बदलाव का अर्थ स्टार्टअप के लिए यह है कि केवल अच्छी तकनीक होना पर्याप्त नहीं। उसे यह भी दिखाना होगा कि समाधान कितनी आसानी से तैनात होगा, ग्राहक सहायता कैसी होगी, मौजूदा प्रणालियों से एकीकरण कैसे होगा, डेटा नीति कितनी स्पष्ट है, ऑडिट ट्रेल मौजूद है या नहीं, और किसी समस्या की स्थिति में जिम्मेदारी कैसे तय होगी। दूसरे शब्दों में, बाजार ‘सर्वश्रेष्ठ तकनीक’ से आगे बढ़कर ‘सुरक्षित रूप से अपनाई जा सकने वाली तकनीक’ की ओर जा रहा है।

यही वह जगह है जहां छोटे लेकिन विशेषज्ञ सुरक्षा स्टार्टअप के लिए अवसर खुलते हैं। धमकी इंटेलिजेंस, सप्लाई-चेन वैलिडेशन, अंदरूनी जोखिम नियंत्रण, औद्योगिक सुरक्षा, सेक्टर-विशिष्ट अनुपालन ऑटोमेशन, क्लाउड कॉन्फिगरेशन सुरक्षा, मशीन पहचान प्रबंधन—ये सब ऐसे क्षेत्र हैं जो पहले बड़े आईटी अनुबंधों के भीतर छिपे रहते थे, पर अब अलग बाजार के रूप में उभर सकते हैं। कोरिया में संस्थागत सहयोग और सार्वजनिक मूल्यांकन इसी संभावना को मजबूत कर रहे हैं।

भारत में इसे ऐसे समझिए: जैसे यूपीआई ने केवल भुगतान ऐप्स का बाजार नहीं बनाया, बल्कि फ्रॉड डिटेक्शन, रिस्क इंजिन, केवाईसी टेक, रेगुलेटरी कंप्लायंस और विवाद समाधान जैसे सहायक क्षेत्रों के लिए भी उद्योग खड़ा किया, वैसे ही व्यापक डिजिटल ढांचे के साथ सुरक्षा की सहायक अर्थव्यवस्था भी बनती है। कोरिया अभी इसी दूसरे स्तर को व्यवस्थित कर रहा है। वहां यह स्वीकार किया जा रहा है कि भरोसेमंद डिजिटल समाज केवल एप्लिकेशन डेवलपर से नहीं, बल्कि सुरक्षा आपूर्तिकर्ताओं, मूल्यांकन तंत्र, प्रमाणन संस्थानों और प्रारंभिक मांग-निर्माण के संयुक्त प्रयास से बनता है।

भारत के लिए सबक: डिजिटल महाशक्ति बनने का अर्थ सुरक्षा महाशक्ति बनना भी है

दक्षिण कोरिया की इस नीति-दिशा से भारत को कम से कम तीन बड़े सबक मिलते हैं। पहला, डिजिटल अवसंरचना जितनी सफल होगी, सुरक्षा उतनी ही केंद्रीय नीति बनानी होगी। भारत में सरकारी सेवाओं का डिजिटलीकरण, फिनटेक का विस्तार, राज्य स्तरीय डेटा प्लेटफॉर्म, स्वास्थ्य और शिक्षा के डिजिटल रिकॉर्ड, स्मार्ट सिटी नेटवर्क, 5जी विस्तार और एआई के प्रयोग तेजी से बढ़ रहे हैं। इन सबके बीच साइबर सुरक्षा को अलग-थलग तकनीकी विषय की तरह नहीं देखा जा सकता। इसे औद्योगिक क्षमता, सार्वजनिक भरोसे और आर्थिक लचीलापन—तीनों के संयुक्त फ्रेम में रखना होगा।

दूसरा, सुरक्षा स्टार्टअप के लिए केवल फंडिंग पर्याप्त नहीं होती। उन्हें परीक्षण के अवसर, नियामकीय मार्गदर्शन, प्रारंभिक ग्राहक, सार्वजनिक खरीद तक पहुंच, सेक्टर-विशिष्ट पायलट और भरोसे की संस्थागत मुहर चाहिए। यदि भारत में इस क्षेत्र को आगे बढ़ाना है तो केवल हैकाथॉन या नवाचार प्रतियोगिताओं से काम नहीं चलेगा। बैंकिंग, ऊर्जा, दूरसंचार, रक्षा-संबद्ध नागरिक प्रणालियां, हेल्थ-टेक, और सरकारी सेवाओं के लिए संरचित ‘सुरक्षा सैंडबॉक्स’ तथा ‘ट्रस्टेड पायलट कार्यक्रम’ जैसे ढांचे पर विचार करना होगा।

तीसरा, सार्वजनिक संस्थानों का साइबर सुरक्षा मूल्यांकन केवल अनुपालन अभ्यास नहीं, बाजार निर्माण का माध्यम भी बन सकता है। जब मानक स्पष्ट होंगे, तब घरेलू कंपनियों को पता होगा कि उन्हें कौन सी समस्या हल करनी है। इससे निवेशकों को भी स्पष्टता मिलेगी कि किस प्रकार के समाधान दीर्घकालिक मांग में बदल सकते हैं। भारत में जैसे गुणवत्ता मानकों ने फार्मा, ऑटो कंपोनेंट और डिजिटल भुगतान पारिस्थितिकी को मजबूत किया, वैसे ही सुसंगत सुरक्षा मानक साइबर उद्योग को परिपक्व बना सकते हैं।

अंततः, कोरिया की ताजा दिशा हमें यह याद दिलाती है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था की असली मजबूती उसके सबसे आकर्षक उत्पादों से नहीं, बल्कि उसके सबसे विश्वसनीय सुरक्षा ढांचे से मापी जाती है। एक देश तब परिपक्व डिजिटल शक्ति बनता है जब वह केवल ऐप, प्लेटफॉर्म और एआई मॉडल नहीं बनाता, बल्कि उन सबके पीछे चलने वाली भरोसे की मशीनरी भी विकसित करता है। दक्षिण कोरिया ने सुरक्षा स्टार्टअप को उद्योग नीति के स्तर पर रखकर यही संकेत दिया है। भारत के लिए भी यह समय है कि साइबर सुरक्षा को ‘आईटी खर्च’ के खाने से निकालकर ‘राष्ट्रीय आर्थिक अवसंरचना’ के रूप में देखा जाए। क्योंकि आने वाले दशक में डिजिटल प्रतिस्पर्धा का निर्णायक प्रश्न शायद यह नहीं होगा कि किसके पास सबसे अधिक सेवाएं हैं, बल्कि यह होगा कि किसके पास सबसे अधिक भरोसेमंद और सुरक्षित सेवाएं हैं।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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