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दक्षिण कोरिया के एक पोल्ट्री फार्म में लगी आग ने खोली ग्रामीण आपदा प्रबंधन की परतें, सिर्फ ‘कोई जनहानि नहीं’ कहकर नहीं ट

दक्षिण कोरिया के एक पोल्ट्री फार्म में लगी आग ने खोली ग्रामीण आपदा प्रबंधन की परतें, सिर्फ ‘कोई जनहानि नहीं’ कहकर नहीं ट

एक शांत वसंत सुबह, और कुछ ही मिनटों में उजड़ती आजीविका

दक्षिण कोरिया के उत्तरी ग्योंगसांग प्रांत के उइसोंग क्षेत्र में 24 अप्रैल की तड़के एक पोल्ट्री फार्म में लगी आग ने 10,000 चूजों की जान ले ली। आधिकारिक जानकारी के अनुसार आग सुबह 3 बजकर 8 मिनट पर शुरू हुई और करीब एक घंटे से कुछ अधिक समय बाद उस पर काबू पा लिया गया। राहत की बात यह रही कि कोई मानव हताहत नहीं हुआ। लेकिन क्या केवल इतना कह देना कि “जनहानि नहीं हुई”, इस घटना के वास्तविक अर्थ को समझने के लिए पर्याप्त है? बिल्कुल नहीं। क्योंकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुधन, खासकर पोल्ट्री, सिर्फ संपत्ति नहीं होता; वह परिवार की रोजमर्रा की आय, कर्ज चुकाने की क्षमता, अगले उत्पादन चक्र की उम्मीद और पूरे स्थानीय आपूर्ति तंत्र की रीढ़ होता है।

भारतीय पाठकों के लिए यह समझना जरूरी है कि कोरिया जैसे तकनीकी रूप से उन्नत देश में भी ग्रामीण क्षेत्र कई बार आग, मौसम और बुनियादी सुरक्षा ढांचे के मामले में उतने ही असुरक्षित साबित होते हैं, जितने हमारे यहां उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र या तेलंगाना के खेत-खलिहान और पशुपालन केंद्र। शहरों में रहने वालों को यह घटना केवल एक स्थानीय दुर्घटना लग सकती है, लेकिन गांवों की अर्थव्यवस्था में ऐसे हादसे छोटे भूकंप की तरह असर डालते हैं। एक खलिहान जले तो सिर्फ ढांचा नहीं जलता, उसके साथ किसान की नकदी-प्रवाह योजना, बाजार से उसका भरोसा, और परिवार की महीनों की मेहनत भी राख हो जाती है।

कोरिया में पोल्ट्री फार्म आधुनिक उपकरणों से लैस होते हैं, लेकिन यह आधुनिकता अपने साथ निर्भरता भी लाती है—बिजली, ताप नियंत्रण, वेंटिलेशन, फीडिंग सिस्टम और नमी-संतुलन जैसी व्यवस्थाओं पर। खासकर चूजों को पालने वाले केंद्रों में तापमान बनाए रखना अनिवार्य होता है। यही वजह है कि ऐसे स्थानों पर हीटर, बिजली की लाइनें, बल्ब, तापदीप और अन्य विद्युत उपकरण लगातार चलाए जाते हैं। यदि कहीं छोटी सी चिंगारी, तारों में शॉर्ट सर्किट, उपकरण में खराबी या ज्वलनशील सामग्री के संपर्क का जोखिम बन जाए, तो नुकसान तेज़ी से फैल सकता है।

इस घटना ने एक बार फिर दिखाया है कि आपदा का पैमाना केवल मौतों की संख्या से नहीं मापा जाना चाहिए। कभी-कभी वह नुकसान, जो अखबार की एक पंक्ति में समा जाता है, जमीन पर एक परिवार की पूरी आर्थिक रचना को ढहा देता है। यही इस खबर का असली केंद्र है।

वसंत का मौसम: खूबसूरत दृश्य नहीं, छिपा हुआ जोखिम भी

कोरियाई मौसम एजेंसियों के मुताबिक जिस दिन यह आग लगी, उस दिन दक्षिण कोरिया के दाएगू-ग्योंगबुक इलाके में सुबह का तापमान काफी कम था, जबकि दिन चढ़ने के साथ तापमान 16 से 24 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने की संभावना जताई गई थी। यानी रात और दिन के तापमान में बड़ा अंतर। कुछ इलाकों में सुबह तक पाला पड़ने जैसी स्थिति भी दर्ज की गई। सुनने में यह मौसम सुखद लगता है—ठंडी सुबह, साफ आसमान, और हल्की गर्म दोपहर। लेकिन आपदा प्रबंधन की भाषा में यही मौसम अत्यंत संवेदनशील होता है।

भारत में भी हम इस तरह की मौसमी विडंबना को खूब जानते हैं। मार्च-अप्रैल के दौरान उत्तर भारत में सुबह अपेक्षाकृत ठंडक, दोपहर में शुष्क गर्मी, और खेतों में सूखी घास, भूसा, प्लास्टिक शीट, डीजल पंप और ढीली बिजली वायरिंग—ये सब मिलकर जोखिम की ऐसी स्थितियां बनाते हैं, जिन्हें अक्सर सामान्य ग्रामीण जीवन का हिस्सा मान लिया जाता है। हर साल गेहूं कटाई के मौसम में खेतों में आग लगने की घटनाएं सामने आती हैं। कई जगह डेयरी शेड, मुर्गीपालन केंद्र और चारे के गोदाम इसी वजह से जलते हैं। कोरिया की यह घटना उसी व्यापक कृषि-संकट की एक दूसरी भौगोलिक अभिव्यक्ति है।

वसंत के मौसम में हवा अधिक शुष्क होती है, खासकर जब सुबह की ठंड और दिन की गर्मी के बीच तेज़ उतार-चढ़ाव हो। इसका असर केवल जंगलों में आग के जोखिम तक सीमित नहीं रहता। पशुशालाएं, अनाज भंडारण केंद्र, प्लास्टिक ग्रीनहाउस, मशीन शेड और लकड़ी या भूसे से भरे ग्रामीण ढांचे भी उतने ही संवेदनशील हो जाते हैं। कोरिया में मौसम विभाग ने उसी दिन जंगल की आग और सामान्य अग्नि-जोखिम को लेकर चेतावनी भी जारी की थी। यही तथ्य इस घटना को मात्र “दुर्भाग्य” नहीं रहने देता। जब मौसम पहले से जोखिम बढ़ा रहा हो, तब किसी फार्म में आग लगना एक अकेली दुर्घटना नहीं, बल्कि कमजोर सुरक्षा ढांचे का संकेत बन जाता है।

यहां एक सांस्कृतिक संदर्भ भी समझना जरूरी है। कोरिया में ग्रामीण इलाकों में पारिवारिक कृषि-आधारित जीवन का महत्व अब भी बना हुआ है, भले ही देश तेज़ी से शहरीकृत हो चुका हो। वहां छोटे और मध्यम पैमाने के कृषि व पशुपालन केंद्र कई बार परिवार-आधारित संचालन पर टिके रहते हैं। यानी रात के समय पूरा तकनीकी स्टाफ या चौबीसों घंटे निगरानी दल हर जगह संभव नहीं होता। यह स्थिति भारत के उन पारिवारिक फार्मों से मिलती-जुलती है, जहां घर और व्यवसाय एक ही परिसर में या एक ही श्रम-शक्ति पर निर्भर होते हैं। ऐसे में रात के 3 बजे लगी आग का मतलब है—जब लोग सबसे कम सतर्क होते हैं, तभी संकट सबसे तेज़ी से सिर उठाता है।

‘जनहानि नहीं’ के पीछे छिपा आर्थिक मलबा

10,000 चूजों की मौत एक संख्या भर नहीं है। पोल्ट्री अर्थव्यवस्था में चूजा भविष्य की आय का शुरुआती बिंदु होता है। वह उस पूरी उत्पादन श्रृंखला का पहला चरण है, जिससे कुछ सप्ताह या महीनों बाद बिक्री, थोक आपूर्ति, चारा लागत की वसूली और ऋण भुगतान जुड़ा होता है। यदि आरंभिक चरण ही नष्ट हो जाए, तो नुकसान सिर्फ वर्तमान स्टॉक का नहीं रहता; पूरा आगामी चक्र प्रभावित हो जाता है।

भारतीय संदर्भ में इसे ऐसे समझिए: मान लीजिए किसी किसान ने ब्रॉयलर या लेयर यूनिट के लिए नया बैच लिया है। उसने अग्रिम में चारा खरीदा, बिजली-पानी की व्यवस्था की, कर्मचारी या परिवार की मेहनत लगाई, बाजार में सप्लाई का अनुमान बनाया, और शायद बैंक या निजी उधार भी लिया। यदि अचानक आग लग जाए, तो नुकसान कई स्तरों पर होता है—पशुधन का सीधा नुकसान, संरचना का नुकसान, अगले उत्पादन चक्र में देरी, बीमा दावे की जटिलता, और मनोवैज्ञानिक दबाव। यही कोरिया के उस फार्म में हुआ होगा।

कोरिया में भी पोल्ट्री व्यवसाय स्थिर लागत और परिवर्तनीय लागत—दोनों के दबाव में चलता है। बिजली बिल, हीटिंग लागत, फीड, जैव-सुरक्षा यानी बायोसेक्योरिटी प्रबंध, श्रम, रखरखाव—ये सभी खर्च निरंतर चलते रहते हैं। जब उत्पादन रुकता है, तब खर्च पूरी तरह रुकते नहीं; बल्कि कई बार बढ़ जाते हैं क्योंकि पुनर्निर्माण, सफाई, निरीक्षण, पुनर्स्थापन और पुन: स्टॉकिंग की जरूरत पड़ती है। ऐसे में घटना के बाद का पुनर्प्राप्ति काल अक्सर आधिकारिक आंकड़ों से कहीं ज्यादा लंबा और दर्दनाक होता है।

ग्रामीण समाज में आर्थिक नुकसान का असर केवल मालिक तक सीमित नहीं रहता। यदि एक पोल्ट्री फार्म बंद होता है, तो फीड सप्लायर, परिवहनकर्ता, स्थानीय श्रमिक, पैकिंग या वितरण से जुड़े लोग भी प्रभावित होते हैं। भारत के कस्बों में जैसे डेयरी, मंडी, ट्रांसपोर्ट और स्थानीय दुकानों की आय एक-दूसरे से जुड़ी होती है, वैसे ही कोरिया के ग्रामीण इलाकों में भी उत्पादन का हर नोड दूसरे से गहराई से जुड़ा है। यही कारण है कि ऐसे हादसे को “स्थानीय समाचार” मानकर छोड़ देना सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से अधूरा आकलन होगा।

एक और महत्वपूर्ण पक्ष है—ग्रामीण आबादी का वृद्ध होना। दक्षिण कोरिया में गांवों में बुजुर्ग आबादी का अनुपात लगातार बढ़ा है। युवा पीढ़ी शहरों की ओर जाती रही है। भारत में भी यह प्रवृत्ति अलग रूप में दिखती है, जहां खेत-पशुपालन का बड़ा काम बुजुर्ग माता-पिता या सीमित श्रमिकों पर निर्भर हो जाता है। ऐसी स्थिति में आग जैसी दुर्घटना के बाद पुनर्निर्माण की गति स्वाभाविक रूप से धीमी पड़ जाती है। इसलिए पोल्ट्री फार्म की आग केवल एक बीमा दावे की फाइल नहीं, बल्कि ग्रामीण पुनर्जीवन क्षमता की परीक्षा भी है।

पोल्ट्री और पशुशालाएं बार-बार क्यों बनती हैं आग का शिकार?

इस सवाल का उत्तर केवल “लापरवाही” नहीं है। इसके पीछे संरचनात्मक कारण हैं। पहला कारण है उपकरणों का घनत्व। पोल्ट्री फार्म में तापमान नियंत्रित रखने के लिए हीटर, गर्मी देने वाले लैंप, पंखे, वेंटिलेशन सिस्टम, स्वचालित फीडिंग लाइनें, पानी की व्यवस्थाएं और कई तरह की विद्युत इकाइयां लंबे समय तक लगातार चलती रहती हैं। जैसे-जैसे तापमान में उतार-चढ़ाव बढ़ता है, इन उपकरणों पर दबाव भी बढ़ता है।

दूसरा कारण है ज्वलनशील परिवेश। चारा, बिछावन सामग्री, सूखी धूल, प्लास्टिक, लकड़ी, पैकेजिंग, और कई बार अस्थायी मरम्मत में प्रयुक्त स्थानीय सामग्री—ये सब आग को तेजी से फैलने में मदद करते हैं। यदि किसी भवन में पर्याप्त अग्निरोधक विभाजन, धुआं-सेंसर, स्प्रिंकलर या त्वरित अलार्म व्यवस्था न हो, तो कुछ ही मिनटों में स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है।

तीसरा कारण पशुओं की प्रकृति और घनत्व है। मनुष्य आग देखते ही बाहर भाग सकता है, लेकिन चूजे, मुर्गियां या अन्य पशु संकरे और घनीभूत स्थानों में फंसे रहते हैं। उनके लिए निकासी लगभग असंभव होती है। यही वजह है कि कई बार मानव हानि शून्य होती है लेकिन पशुधन का नुकसान भारी होता है। उइसोंग की घटना में भी यही हुआ—लोग बच गए, मगर 10,000 चूजे नहीं बच सके। यह विषमता हमें बताती है कि आपदा प्रबंधन के मौजूदा मानदंड कितने मानव-केंद्रित हैं, जबकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुधन भी आजीविका का जीवंत आधार है।

चौथा कारण निरीक्षण और अनुपालन की व्यावहारिक सीमाएं हैं। बड़े कॉरपोरेट फार्म और छोटे परिवार-आधारित फार्म एक ही नियम पुस्तिका के तहत तो आ सकते हैं, लेकिन उनकी वास्तविक क्षमता अलग-अलग होती है। नियमित तकनीकी निरीक्षण, वायरिंग का अद्यतनकरण, अग्निशमन यंत्रों का रखरखाव, थर्मल सेंसर, रिमोट मॉनिटरिंग—ये सब खर्चीले भी हैं और तकनीकी जानकारी भी मांगते हैं। कोरिया जैसे विकसित देश में भी यदि यह अंतर बना हुआ है, तो भारत जैसे विशाल और विविध ग्रामीण ढांचे वाले देश के लिए यह सीख और भी महत्वपूर्ण है।

कई बार समस्या नियमों की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि उनका अनुवाद जमीन पर न हो पाना होती है। जैसे भारत में भवन सुरक्षा या औद्योगिक सुरक्षा के नियम कागज पर होते हैं, लेकिन छोटे कस्बों और ग्रामीण इलाकों में उनका पालन आंशिक रहता है, उसी तरह कोरिया के ग्रामीण परिसर भी शहरी मानकों के समान सक्षम नहीं होते। इसलिए यह घटना किसी एक देश की कमजोरी नहीं, बल्कि आधुनिक कृषि-आधारित संरचनाओं की साझा चुनौती है।

जंगल की आग और फार्म की आग: प्रशासनिक श्रेणियां अलग, जोखिम एक

जिस दिन यह हादसा हुआ, मौसम चेतावनियों में शुष्क हवा और आग के बढ़े हुए जोखिम का उल्लेख था। आम तौर पर ऐसी चेतावनियां सुनते ही लोगों के मन में जंगल की आग, सूखी घास या खुले में जलती वस्तुओं का खतरा आता है। लेकिन वास्तविक जीवन में जोखिम इतने साफ-सुथरे खानों में बंटे नहीं होते। वही शुष्क हवा जो जंगल को भड़का सकती है, वही पोल्ट्री फार्म, भूसा-भंडार, प्लास्टिक ग्रीनहाउस या गोदाम को भी अधिक संवेदनशील बना सकती है।

भारत में भी यह समस्या प्रशासनिक वर्गीकरण के कारण अक्सर बिखर जाती है। वन विभाग जंगल की आग देखता है, कृषि विभाग खेती और पशुपालन से जुड़ी चुनौतियां, बिजली विभाग तारों और आपूर्ति को, और स्थानीय प्रशासन राहत कार्य को। लेकिन किसान के लिए ये सब अलग-अलग समस्याएं नहीं होतीं; उसके लिए खतरा एक ही है—आग लगने पर सबकुछ एक साथ जा सकता है। कोरिया की यह घटना हमें याद दिलाती है कि आपदा को विभागीय भाषा में बांटने से पहले जमीन पर उसके साझा कारणों को पहचानना होगा।

दक्षिण कोरिया में वसंत ऋतु का अर्थ केवल चेरी ब्लॉसम, साफ पहाड़ियां और पर्यटन नहीं है। वहां यह जंगल की आग, शुष्क हवाओं और तापमान अंतर का मौसम भी है। भारतीय दर्शकों के लिए इसे कुछ वैसा समझा जा सकता है जैसे हमारे यहां एक ओर बसंत और फसल कटाई का उत्सव दिखता है, वहीं दूसरी ओर खेतों में आग, पराली, विद्युत दुर्घटनाएं और लू की शुरुआती आशंकाएं भी बढ़ने लगती हैं। मौसम की सुंदरता और आपदा की संभावना एक साथ चलती हैं। पत्रकारिता का काम सिर्फ दृश्यात्मक सुंदरता लिखना नहीं, बल्कि उसकी छाया में मौजूद जोखिम को भी सामने लाना है।

यही कारण है कि उइसोंग की आग पर चर्चा केवल एक फार्म तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह सवाल उठना चाहिए कि क्या मौसम आधारित चेतावनियों में ग्रामीण औद्योगिक इकाइयों—जैसे पोल्ट्री, डेयरी, ग्रीनहाउस, गोदाम, चारा केंद्र—के लिए अलग और व्यावहारिक दिशा-निर्देश जारी किए जाते हैं? क्या स्थानीय प्रशासन रात के समय संचालित या न्यूनतम स्टाफ वाले फार्मों के लिए विशिष्ट सावधानी मानक बनाता है? क्या बीमा मॉडल ऐसे नुकसान की वास्तविक भरपाई कर पाते हैं? यदि इन सवालों का उत्तर कमजोर है, तो फिर हम हर साल नए हादसों के बाद वही पुरानी संवेदना लिखते रहेंगे।

कोरिया से भारत के लिए सबक: रोकथाम की राजनीति, राहत से ज्यादा जरूरी

इस घटना की जांच जारी है और आग के सटीक कारण का पता लगाना निश्चित ही जरूरी है। मगर उससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या समाज और सरकारें हर बड़ी घटना के बाद केवल कारण तलाशने तक सीमित रहेंगी, या वे उन मौसमीय और संरचनात्मक स्थितियों को पहले से पहचानकर रोकथाम की मजबूत व्यवस्था बनाएंगी? यही इस पूरे प्रसंग का केंद्रीय बिंदु है।

भारत के लिए इसमें कई स्पष्ट सबक हैं। पहला, पशुशालाओं और पोल्ट्री फार्मों की बिजली व्यवस्था को मौसमी निरीक्षण से जोड़ना होगा। जैसे बरसात से पहले नालों की सफाई की बात होती है, वैसे ही गर्मी और वसंत के संक्रमण काल में ग्रामीण पशुपालन केंद्रों की वायरिंग, हीटिंग उपकरण और वेंटिलेशन यूनिट की अनिवार्य जांच होनी चाहिए। दूसरा, रात में चलने वाले या कम मानव उपस्थिति वाले फार्मों में कम-लागत वाले धुआं अलार्म, तापमान चेतावनी सेंसर और मोबाइल-आधारित अलर्ट प्रणाली को बढ़ावा देना चाहिए।

तीसरा, स्थानीय स्तर पर अग्नि-सुरक्षा प्रशिक्षण को केवल शहरी संस्थानों तक सीमित नहीं रखना चाहिए। पंचायतों, किसान उत्पादक संगठनों, डेयरी समितियों और पोल्ट्री संघों के जरिए छोटे-छोटे प्रशिक्षण शिविर संचालित किए जा सकते हैं। चौथा, बीमा और राहत नीति को केवल “संख्या” नहीं, बल्कि उत्पादन चक्र के नुकसान के हिसाब से समझना होगा। 10,000 चूजों की मौत का अर्थ केवल वर्तमान स्टॉक की कीमत नहीं, बल्कि अगले कई हफ्तों की आय का लोप भी है। यदि मुआवजा केवल तत्काल संपत्ति-हानि तक सीमित रहे, तो किसान या फार्म संचालक कभी पूरी तरह उबर नहीं पाता।

पांचवां, मौसम चेतावनियों को आम भाषा में स्थानीय उपयोगी सलाह के साथ जोड़ा जाना चाहिए। जैसे—“आज शुष्क हवाएं हैं” कहने भर से काम नहीं चलेगा; उसके साथ यह भी बताना होगा कि पोल्ट्री फार्म हीटर की जांच करें, अतिरिक्त धूल साफ करें, बिजली जोड़ ढीले न छोड़ें, आपातकालीन निकास और पानी की उपलब्धता परखें, तथा रात की निगरानी बढ़ाएं। कोरिया हो या भारत, आपदा-पूर्व चेतावनी तभी सार्थक बनती है जब वह नागरिक के व्यवहार को बदल सके।

सबसे अहम बात यह कि हमें “कोई जनहानि नहीं” जैसी हेडलाइन-फ्रेंडली भाषा से आगे जाना होगा। निश्चित रूप से मानव जीवन सर्वोपरि है, लेकिन ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आजीविका का नुकसान भी एक गंभीर सामाजिक चोट है। यदि एक परिवार की सालभर की कमाई, कर्ज चुकाने की क्षमता और मानसिक स्थिरता एक घंटे में खत्म हो जाए, तो वह भी सार्वजनिक चिंता का विषय है। पत्रकारिता, नीति और प्रशासन—तीनों को इस दृष्टि को अपनाना होगा।

वसंत को सिर्फ मौसम नहीं, जोखिम-मानचित्र की तरह पढ़ने का समय

दक्षिण कोरिया के उइसोंग का यह हादसा किसी बड़े महानगरीय विस्फोट या राष्ट्रीय आपदा की तरह सुर्खियों में नहीं आएगा। शायद कुछ दिनों में यह घटना स्थानीय रिकॉर्ड का हिस्सा बनकर रह जाएगी। लेकिन ऐसी ही घटनाएं हमें बताती हैं कि समाज की वास्तविक संवेदनशीलता कहां छिपी होती है—उन स्थानों पर, जो रोजमर्रा के दिखते हैं; उन ढांचों में, जो विकास के शोर में मामूली समझे जाते हैं; और उन लोगों के बीच, जिनकी हानि को आंकड़ों में आसानी से समेट दिया जाता है।

यह घटना हमें वसंत ऋतु की नई व्याख्या देती है। साफ आसमान, खिलते फूल और सुहाना तापमान—ये सब अपनी जगह हैं। लेकिन उसी मौसम में शुष्कता, तापांतर, उपकरणों पर बढ़ता दबाव और ग्रामीण ढांचों की कमजोर सुरक्षा भी शामिल है। यदि हम केवल मौसम की सुंदर तस्वीर देखें और उसके जोखिम को नजरअंदाज करें, तो हर साल ऐसी त्रासदियां हमें याद दिलाती रहेंगी कि प्रकृति और मानव-निर्मित संरचना के बीच संतुलन कितना नाजुक है।

भारतीय पाठकों के लिए यह कहानी किसी दूर देश की अजनबी घटना नहीं है। यह हमारे अपने गांवों, डेयरियों, पोल्ट्री यूनिटों, चारा-गोदामों और खेतों की कहानी से भी मेल खाती है। फर्क सिर्फ भाषा, भूगोल और प्रशासनिक ढांचे का है; जोखिम का स्वभाव बहुत हद तक समान है। इसीलिए कोरिया की यह घटना हमारे लिए महज अंतरराष्ट्रीय समाचार नहीं, बल्कि एक दर्पण है।

जब अगली बार मौसम विभाग शुष्क हवा, तापमान अंतर या आग के खतरे की चेतावनी जारी करे, तो हमें जंगलों के साथ-साथ ग्रामीण उत्पादन ढांचों को भी याद रखना होगा। और जब अगली बार किसी खबर में लिखा हो—“कोई जनहानि नहीं हुई”—तो उसके बाद यह भी पूछना होगा कि किसकी आजीविका जली, किसका उत्पादन चक्र टूटा, किस परिवार की आर्थिक सुरक्षा ढह गई, और क्या इस नुकसान को रोका जा सकता था। उइसोंग की सुबह यही सवाल हमारे सामने छोड़ती है।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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