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बुज़ुर्गों और दिव्यांगजनों के लिए ‘संस्था नहीं, अपना घर’: बुसान का नया देखभाल मॉडल भारत के लिए क्या संकेत देता है

बुज़ुर्गों और दिव्यांगजनों के लिए ‘संस्था नहीं, अपना घर’: बुसान का नया देखभाल मॉडल भारत के लिए क्या संकेत देता है

बदलती उम्र, बदलती नीति: बुसान ने देखभाल का केंद्र घर को बनाया

दक्षिण कोरिया के बंदरगाह शहर बुसान ने वृद्धावस्था, दिव्यांगता और आत्मनिर्भर जीवन को लेकर एक ऐसी नीति दिशा सामने रखी है, जिस पर भारत सहित एशिया के कई समाजों को गंभीरता से ध्यान देना चाहिए। बुसान महानगर प्रशासन ने 13 अप्रैल 2026 को एक बहुपक्षीय कार्य-समझौते के जरिए यह स्पष्ट संकेत दिया कि अब देखभाल का मतलब केवल अस्पताल, नर्सिंग सुविधा या संस्थागत आश्रय नहीं होगा। नीति का मूल विचार यह है कि जिन लोगों को नियमित सहायता की ज़रूरत है—विशेषकर बुज़ुर्ग और दिव्यांगजन—उन्हें उनके अपने घर, अपने परिचित मोहल्ले और अपने सामाजिक परिवेश में रहकर जीवन जारी रखने में मदद दी जाए।

पहली नज़र में यह एक प्रशासनिक घोषणा लग सकती है, लेकिन इसके सामाजिक अर्थ कहीं बड़े हैं। यह केवल सेवा-सूची बढ़ाने का मामला नहीं, बल्कि यह तय करने का मामला है कि किसी समाज में उम्र बढ़ना किस तरह देखा जाएगा। क्या बढ़ती उम्र का अर्थ अपने घर से कट जाना है? क्या दिव्यांगता का अर्थ यह है कि व्यक्ति को अपने परिचित जीवन-क्षेत्र से बाहर धकेल दिया जाए? बुसान का जवाब इन दोनों सवालों पर ‘नहीं’ की दिशा में जाता दिखता है।

कोरिया में अब तक देखभाल व्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा ज़रूरत बढ़ने के बाद अस्पतालों, पुनर्वास केंद्रों या अन्य संस्थागत व्यवस्थाओं की ओर झुकता रहा है। बुसान का नया मॉडल इस प्रवाह को उलटने की कोशिश करता है। इसका मतलब यह है कि देखभाल व्यक्ति तक पहुँचे, व्यक्ति को देखभाल तक भागकर न जाना पड़े। भारतीय पाठकों के लिए इसे ऐसे समझा जा सकता है जैसे किसी बुज़ुर्ग माता-पिता को हर छोटी-बड़ी ज़रूरत के लिए बड़े शहर के अस्पताल या संस्था पर निर्भर होने के बजाय स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य, सामाजिक सहायता, भोजन, गतिशीलता और परामर्श की सेवाएँ मिलें, ताकि वे अपने ही घर में गरिमा के साथ रह सकें।

यह सोच भारत के लिए इसलिए भी प्रासंगिक है क्योंकि हमारे यहाँ भी तेज़ी से शहरीकरण, छोटे होते परिवार, प्रवासी रोज़गार और महिलाओं पर अनौपचारिक देखभाल के बढ़ते बोझ ने पारिवारिक सहारे की पारंपरिक संरचना को बदल दिया है। जो प्रश्न बुसान पूछ रहा है, वही प्रश्न दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद, पुणे या लखनऊ जैसे शहरों में भी अलग-अलग रूपों में मौजूद है—क्या बुज़ुर्गों की देखभाल केवल परिवार की ‘नैतिक जिम्मेदारी’ है, या यह सार्वजनिक नीति का हिस्सा भी बननी चाहिए?

बुसान प्रशासन का कहना है कि इस समझौते का उद्देश्य एक अधिक परिष्कृत, अधिक समन्वित और अधिक सुलभ एकीकृत देखभाल ढाँचा बनाना है, ताकि नागरिक अपने नज़दीकी प्रशासनिक कल्याण केंद्र के एकल खिड़की तंत्र के ज़रिए सहायता के लिए आवेदन कर सकें और उन्हें ज़रूरत के मुताबिक जोड़कर सेवाएँ दी जा सकें। यही वह बिंदु है जहाँ यह पहल सिर्फ़ सामाजिक कल्याण कार्यक्रम नहीं रह जाती, बल्कि राज्य, समुदाय और परिवार के रिश्ते को नए सिरे से परिभाषित करने लगती है।

‘बुसान मॉडल’ की असली खासियत: एक जैसा समाधान नहीं, स्थानीय ज़रूरत के हिसाब से देखभाल

इस पहल की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि बुसान ने केवल राष्ट्रीय स्तर पर लागू सामान्य एकीकृत देखभाल सेवाओं पर भरोसा नहीं किया, बल्कि स्थानीय ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए आठ अतिरिक्त सेवाएँ भी विकसित कीं। यह छोटा प्रशासनिक विवरण नहीं है। इसका मतलब यह है कि स्थानीय सरकार ने केंद्र द्वारा बनाए गए मानक ढाँचे को जस का तस लागू करने के बजाय अपने शहर की जनसंख्या, आवासीय ढाँचे, पहुँच की समस्याओं, सेवा-अंतराल और नागरिकों की वास्तविक ज़रूरतों को समझकर उसे आगे बढ़ाया है।

भारतीय संदर्भ में यह बात बेहद परिचित लग सकती है। जैसे केरल में वृद्धजन स्वास्थ्य और सामुदायिक भागीदारी का मॉडल कुछ और है, तमिलनाडु में लोक-स्वास्थ्य तंत्र की पकड़ अलग है, दिल्ली में मोहल्ला क्लिनिक जैसी पहुँच-आधारित राजनीति का प्रभाव अलग है, और राजस्थान या उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाक़ों में सेवा-प्राप्ति की चुनौतियाँ बिल्कुल भिन्न हैं। ऐसे में एक ही नीति का हर जगह एक जैसा परिणाम मिलना मुश्किल है। बुसान का संदेश यही है कि देखभाल, आखिरकार, स्थानीय भूगोल और स्थानीय समाज का चेहरा धारण करती है।

कोरियाई समाज में ‘समुदाय-आधारित देखभाल’ का विचार पिछले कुछ वर्षों में विशेष रूप से उभरा है। वहाँ ‘घर में उम्र बिताना’ या परिचित स्थान पर जीवन जारी रखना अब केवल भावनात्मक इच्छा नहीं, नीति-निर्माण का आधार बनता जा रहा है। इसे समझने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि दक्षिण कोरिया दुनिया के सबसे तेज़ी से बूढ़े होते समाजों में गिना जाता है। वहाँ कम जन्मदर, लंबी आयु और शहरी जीवन के दबावों ने परिवार-आधारित देखभाल की पुरानी धारणाओं को चुनौती दी है। इसलिए बुसान का यह कदम सिर्फ़ नगर प्रशासन का प्रयोग नहीं, बल्कि एक बड़े जनसांख्यिकीय बदलाव का जवाब भी है।

‘बुसान-शैली’ या ‘बुसान प्रकार’ जैसा शब्द कोरियाई प्रशासनिक भाषा में केवल ब्रांडिंग नहीं है। उसका मतलब है कि यह शहर अपने अनुभव और अपनी ज़मीन की सच्चाइयों से नीति गढ़ रहा है। महानगरों में आवास घनत्व, सार्वजनिक सुविधाओं का वितरण, निजी सेवा-प्रदाता संस्थाओं की भूमिका, स्थानीय प्रशासन तक पहुँच और नागरिकों की आवाजाही की क्षमता—ये सब मिलकर तय करते हैं कि कोई देखभाल योजना कागज़ पर रहेगी या रोज़मर्रा की ज़िंदगी में असर डालेगी। भारत में भी अगर किसी राज्य या नगर निगम को प्रभावी वृद्ध-देखभाल या दिव्यांग समर्थन प्रणाली बनानी है, तो उसे दिल्ली सचिवालय की फाइलों से अधिक अपने वार्ड, बस्ती, पंचायत और मोहल्ले की वास्तविकताओं को देखना होगा।

यहाँ एक और बात ध्यान देने योग्य है। जब सरकारें केवल सेवाओं की संख्या गिनाती हैं, तब अक्सर नीति का मूल्यांकन सतही स्तर पर रुक जाता है। लेकिन बुसान मॉडल जिस चीज़ पर जोर दे रहा है, वह है ‘कनेक्टिविटी’—यानी सेवा का समय पर, सही व्यक्ति तक, सही तरीके से पहुँचना। किसी अकेले रहने वाले बुज़ुर्ग के लिए डॉक्टर की सलाह, भोजन-सहायता, दवा की निगरानी, गिरने जैसी आपात स्थिति में त्वरित प्रतिक्रिया और सामाजिक संपर्क—ये सब अलग-अलग विभागों की सूची में दर्ज चीज़ें हो सकती हैं, पर जीवन में ये सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। बुसान इसी बिखराव को कम करने की कोशिश कर रहा है।

प्रशासनिक कल्याण केंद्र का ‘एकल खिड़की’ तंत्र क्यों महत्वपूर्ण है

इस पूरी पहल का शायद सबसे व्यावहारिक पहलू यह है कि नागरिकों को अपने नज़दीकी प्रशासनिक कल्याण केंद्र में एकीकृत देखभाल खिड़की के माध्यम से आवेदन और परामर्श की सुविधा मिलेगी। यह सुनने में साधारण बात लग सकती है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई में यही अक्सर सबसे बड़ी बाधा होती है—लोगों को पता ही नहीं होता कि किस दफ्तर जाएँ, कौन सा फ़ॉर्म भरें, कौन पात्र है, और किस सेवा का किससे संबंध है।

भारत में हम यह समस्या बहुत अच्छी तरह जानते हैं। आयुष्मान भारत कार्ड का लाभ, पेंशन योजना, दिव्यांग प्रमाणपत्र, घरेलू देखभाल सहायता, दवाओं की उपलब्धता, पुनर्वास सहायता, स्थानीय निकाय सेवाएँ—इन सबके बीच आम नागरिक अक्सर चक्कर काटता रह जाता है। जो पढ़ा-लिखा है, जिसके पास समय है, जिसके परिवार में कोई सरकारी प्रक्रियाओं को समझता है, वह किसी तरह रास्ता निकाल लेता है। लेकिन सबसे ज़्यादा ज़रूरतमंद व्यक्ति वही होता है जो इस जाल में सबसे पहले छूट जाता है। बुसान का यह मॉडल इसी सूचना-असमानता और पहुँच की बाधा को कम करने की कोशिश करता है।

कोरिया के स्थानीय प्रशासनिक ढाँचे में ऐसे केंद्र नागरिकों के रोज़मर्रा के सरकारी संपर्क का प्रमुख माध्यम होते हैं। यदि देखभाल की पहली सीढ़ी घर के पास हो, तो बुज़ुर्गों और दिव्यांगजनों के लिए यह केवल सुविधा नहीं, बल्कि अधिकार तक पहुँच का रास्ता बन जाती है। कई लोगों के लिए लंबी दूरी तय करना, भीड़ वाले दफ्तरों में जाना, दस्तावेज़ जुटाना और अलग-अलग संस्थाओं के पास जाना स्वयं में एक कठिन परीक्षा होती है।

भारत में अगर इस मॉडल की तुलना करनी हो, तो इसे कुछ हद तक ऐसे समझा जा सकता है जैसे किसी वार्ड-स्तरीय नागरिक सुविधा केंद्र, प्राथमिक स्वास्थ्य तंत्र, सामाजिक न्याय विभाग और स्थानीय समुदाय आधारित स्वयंसेवी नेटवर्क को एक मंच पर लाकर कहा जाए—नागरिक पहले यहाँ आए, बाकी समन्वय सरकार खुद करे। यह बदलाव जितना प्रशासनिक है, उतना ही वैचारिक भी है। इससे सेवा लेने वाला व्यक्ति ‘मांगने वाला’ नहीं, बल्कि ‘अधिकार-प्राप्त नागरिक’ बनता है।

बेशक, केवल खिड़की खोल देने से काम पूरा नहीं होता। असली प्रश्न उसके बाद शुरू होता है। आवेदन आने के बाद ज़रूरत का आकलन कौन करेगा? स्वास्थ्य, आवास, सुरक्षा, सामाजिक अलगाव, गतिशीलता और मानसिक स्थिति जैसे आयामों को किस तरह जोड़ा जाएगा? सेवा उपलब्ध न हो तो जिम्मेदारी किसकी होगी? निगरानी और पुनर्मूल्यांकन कैसे होगा? बुसान ने जो बहुपक्षीय समझौता किया है, उसका महत्व इसी में है कि वह यह संकेत देता है कि एकीकृत देखभाल किसी एक विभाग के बूते की चीज़ नहीं है। इसके लिए प्रशासन, स्वास्थ्य व्यवस्था, सामाजिक सेवा प्रदाता, स्थानीय नेटवर्क और कभी-कभी निजी भागीदारों तक का समन्वय आवश्यक होता है।

भारत में भी इस प्रकार की व्यवस्था का भविष्य तभी बन सकता है जब स्वास्थ्य विभाग, महिला एवं बाल विकास, सामाजिक न्याय, नगर निकाय, पुलिस, आपदा प्रतिक्रिया और सामुदायिक संगठनों के बीच कामकाजी तालमेल हो। वरना योजनाएँ अपने-अपने विभाग की फाइलों में ‘सफल’ दिखती रहती हैं, जबकि नागरिक के जीवन में कोई वास्तविक बदलाव नहीं आता।

परिवार बनाम समाज: देखभाल का बोझ आखिर किसका है?

बुसान की यह पहल एक गहरा सामाजिक प्रश्न भी उठाती है—क्या हम देखभाल को अब भी केवल परिवार की कुर्बानी और विशेष रूप से महिलाओं के अदृश्य श्रम पर छोड़ देना चाहते हैं, या इसे सामुदायिक और सार्वजनिक ज़िम्मेदारी के रूप में स्वीकार करेंगे? एशियाई समाजों में, जिनमें भारत और दक्षिण कोरिया दोनों शामिल हैं, परिवार को लंबे समय तक अंतिम सुरक्षा कवच माना गया है। यह धारणा आज भी भावनात्मक और सांस्कृतिक रूप से बहुत शक्तिशाली है। लेकिन वास्तविकता बदल चुकी है। छोटे परिवार, अकेले रहने वाले बुज़ुर्ग, नौकरी के लिए दूसरे शहरों या देशों में बसे बच्चे, और रोज़मर्रा की महंगाई ने पारंपरिक देखभाल ढाँचे को तनाव में डाल दिया है।

भारतीय घरों में अक्सर यह उम्मीद की जाती है कि बेटा-बेटी, बहू, पत्नी या बहन देखभाल की भूमिका निभाएँगी। यह नैतिक रूप से संवेदनशील बात है, लेकिन इसे नीति का विकल्प नहीं बनाया जा सकता। जब कोई बुज़ुर्ग व्यक्ति चलने-फिरने में असमर्थ हो, नियमित दवा की निगरानी चाहिए, अकेलेपन से जूझ रहा हो, बार-बार गिरने का जोखिम हो, या किसी दिव्यांग सदस्य को घर के भीतर और बाहर दोनों जगह सहायता चाहिए, तब केवल भावनात्मक रिश्ते पर्याप्त नहीं होते। वहाँ समय, प्रशिक्षण, संसाधन, पहुँच और व्यवस्थित समर्थन चाहिए।

बुसान का मॉडल इस बोझ को परिवार की निजी दीवारों के भीतर सीमित रखने के बजाय सार्वजनिक व्यवस्था के दायरे में लाने का प्रयास है। इसका अर्थ यह नहीं कि परिवार की भूमिका ख़त्म हो जाएगी। बल्कि इसका अर्थ यह है कि परिवार अकेला बोझ नहीं उठाएगा। भारतीय पाठकों के लिए यह बात विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि हमारे यहाँ वृद्धावस्था पर बहस अक्सर ‘संस्कार’ और ‘परिवार’ की भाषा में अटक जाती है, जबकि ज़मीन पर समस्या बहुत व्यावहारिक होती है—कौन दवा लाएगा, कौन अस्पताल ले जाएगा, कौन दिन में साथ बैठेगा, कौन आपात स्थिति में पहुँचेगा, कौन यह सुनिश्चित करेगा कि व्यक्ति ठीक से खा रहा है और सामाजिक रूप से बिल्कुल कट न जाए?

यहीं पर सार्वजनिक नीति की भूमिका शुरू होती है। यदि राज्य और स्थानीय निकाय भोजन सहायता, गतिशीलता समर्थन, घरेलू सुरक्षा, परामर्श, सामुदायिक संपर्क, घर-आधारित स्वास्थ्य निगरानी और केस मैनेजमेंट जैसी सेवाओं को जोड़ते हैं, तो परिवार की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती, लेकिन वह अधिक टिकाऊ और मानवीय बन जाती है। इस दृष्टि से बुसान की पहल किसी ‘कल्याणकारी उदारता’ की कहानी नहीं, बल्कि सामाजिक बुनियादी ढाँचे के पुनर्निर्माण की कहानी है।

भारत में भी यह बहस तेज़ होने की ज़रूरत है। हम मेट्रो शहरों में अकेले पड़ते बुज़ुर्गों, कस्बों में सीमित स्वास्थ्य पहुँच, और ग्रामीण क्षेत्रों में दिव्यांगजनों के सामने मौजूद परिवहन-संकट को देखते हैं। फिर भी हमारी नीतियों में घर-आधारित, समन्वित, सम्मानजनक देखभाल अभी भी उतनी केंद्रीय नहीं है जितनी होनी चाहिए। बुसान का संदेश यह है कि सम्मान केवल शब्दों से नहीं आता; सम्मान उस व्यवस्था से आता है जो व्यक्ति को अपने जीवन के परिचित दायरे से बेदखल किए बिना सहायता देती है।

‘आत्मनिर्भर जीवन’ का असली अर्थ: बिना मदद के नहीं, सही मदद के साथ जीना

इस पहल में बार-बार ‘स्वतंत्र’ या ‘आत्मनिर्भर’ जीवन का विचार सामने आता है। लेकिन इस शब्द को समझना ज़रूरी है। बहुत बार समाज आत्मनिर्भरता को गलत अर्थ में ले लेता है—जैसे कि किसी व्यक्ति को किसी भी प्रकार की सहायता न चाहिए, तभी वह स्वतंत्र है। वृद्धावस्था और दिव्यांगता के संदर्भ में यह समझ न केवल अधूरी है, बल्कि कई बार क्रूर भी साबित होती है। असली आत्मनिर्भरता का अर्थ यह है कि व्यक्ति अपनी इच्छा, अपने निर्णय और अपने परिचित जीवन-संदर्भ के भीतर रह सके, और जब उसे सहायता की ज़रूरत हो तो वह समय पर, व्यवस्थित और गरिमापूर्ण रूप से उपलब्ध हो।

दूसरे शब्दों में, सहायता लेना निर्भरता नहीं है; असंगठित व्यवस्था के कारण बेबस हो जाना निर्भरता है। यदि कोई बुज़ुर्ग महिला अपने घर में रह रही है, रोज़मर्रा के कामों में कुछ सहयोग पा रही है, दवा समय पर मिल रही है, किसी गिरावट या आपात स्थिति पर निगरानी तंत्र सक्रिय है, और उसे सामाजिक अलगाव से बचाने के लिए सामुदायिक संपर्क उपलब्ध है, तो वह कहीं अधिक स्वतंत्र जीवन जी रही है बनिस्बत उस व्यक्ति के जिसे मजबूरी में संस्थान में जाना पड़े क्योंकि घर पर कोई समन्वित सहायता उपलब्ध नहीं थी।

कोरिया में इस तरह की चर्चा सिर्फ़ शब्दों का खेल नहीं है। वहाँ तेज़ी से वृद्ध होती आबादी के कारण ‘घर में उम्र बिताने’ और ‘समुदाय में जीवन जारी रखने’ की अवधारणा नीति-निर्माण के केंद्र में आ रही है। भारत में भी ‘आत्मनिर्भर’ शब्द सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा है, लेकिन वृद्धावस्था और दिव्यांग नीति में इसका अधिक मानवीय और व्यावहारिक उपयोग अभी भी विकसित होना बाकी है। आत्मनिर्भर भारत की चर्चा अगर सचमुच समावेशी होनी है, तो उसमें उन लोगों की भी जगह होनी चाहिए जिन्हें मदद की ज़रूरत है—और जो सही मदद के साथ पूरी गरिमा के साथ समाज का हिस्सा बने रह सकते हैं।

बुसान का एकीकृत देखभाल मॉडल इसी समझ को संस्थागत रूप देता दिखाई देता है। यह कहता है कि व्यक्ति का जीवन प्रशासनिक विभागों में विभाजित नहीं होता। किसी एक नागरिक के लिए स्वास्थ्य, आवास, सुरक्षा, परिवहन, सामाजिक संपर्क, मानसिक स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिति एक ही जीवन के हिस्से हैं। पर सरकारें अक्सर इन्हें अलग-अलग टुकड़ों में देखती हैं। नतीजा यह होता है कि सबसे नाजुक क्षणों में ‘सेवा-अंतराल’ पैदा हो जाता है। एकीकृत देखभाल का मूल उद्देश्य इसी अंतराल को कम करना है।

भारतीय नीति-निर्माताओं के लिए यह एक अहम संकेत है। यदि वृद्धजन नीति केवल पेंशन तक सीमित रहे, यदि दिव्यांग सहायता केवल प्रमाणपत्र और उपकरणों तक सीमित रहे, और यदि स्वास्थ्य नीति घरेलू जीवन की वास्तविकताओं से कटी रहे, तो ‘आत्मनिर्भरता’ का नारा वास्तविक जीवन में खोखला साबित हो सकता है। इसलिए बुसान का अनुभव हमें यह सिखाता है कि स्वतंत्र जीवन का आधार व्यक्ति की इच्छाशक्ति भर नहीं, बल्कि एक सक्षम समर्थन-तंत्र भी है।

भारत के लिए सबक: उम्रदराज़ समाज आने वाला कल नहीं, आज की चुनौती है

भारत अक्सर खुद को एक युवा देश के रूप में देखता है, और जनांकिकीय लाभांश की चर्चा उचित भी है। लेकिन इसी तस्वीर का दूसरा पहलू भी है—हमारी बुज़ुर्ग आबादी तेज़ी से बढ़ रही है। शहरी भारत में अकेले रहने वाले बुज़ुर्गों की संख्या बढ़ रही है। कई परिवारों में बच्चे दूसरे शहरों, आईटी हबों, विदेशों या महानगरों में काम करते हैं। गाँवों में बुज़ुर्ग पीछे छूट जाते हैं, जबकि शहरों में वे फ्लैट संस्कृति, पड़ोस की कम होती आत्मीयता और सेवाओं की ऊँची लागत के बीच फँस जाते हैं। ऐसे में घर-आधारित, समुदाय-आधारित और समन्वित देखभाल का सवाल हमारे सामने भी तेजी से आएगा।

बुसान का मॉडल भारत को यह सोचने का अवसर देता है कि क्या हमारे नगर निगम, ज़िला प्रशासन, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, आशा कार्यकर्ता नेटवर्क, सामाजिक न्याय विभाग और स्थानीय स्वयंसेवी संगठन मिलकर कोई ऐसा ढाँचा बना सकते हैं, जिसमें बुज़ुर्ग और दिव्यांग नागरिकों को इधर-उधर भटकना न पड़े। भारत में पहले से कई उपयोगी तत्व मौजूद हैं—आधारभूत स्वास्थ्य नेटवर्क, स्वयं सहायता समूह, पंचायत संरचना, शहरी स्थानीय निकाय, डिजिटलीकरण की बढ़ती क्षमता और सामुदायिक संगठनों की उपस्थिति। चुनौती यह है कि इन्हें एकीकृत तरीके से जोड़ा जाए।

यह भी सच है कि भारत और दक्षिण कोरिया के संसाधन, प्रशासनिक क्षमता और सामाजिक संरचनाएँ एक जैसी नहीं हैं। इसलिए किसी मॉडल की नकल करना संभव भी नहीं और बुद्धिमानी भी नहीं होगी। लेकिन सिद्धांत महत्वपूर्ण है—देखभाल को जीवन के परिचित स्थान तक ले जाना, सेवा-प्राप्ति की शुरुआती बाधा कम करना, परिवार के बोझ को सार्वजनिक रूप से साझा करना, और ‘संस्था’ को अंतिम उपाय बनाना, पहला नहीं।

भारतीय राजनीति और प्रशासन में अक्सर नई घोषणाएँ और नई योजनाएँ सुर्खियाँ बटोरती हैं। लेकिन सामाजिक नीति की सफलता का असली पैमाना ‘स्थायित्व’ होता है। बुसान के इस कदम की भी असली परीक्षा आने वाले वर्षों में होगी: क्या आवेदन के बाद लगातार केस प्रबंधन होगा? क्या विभागों के बीच टकराव कम होगा? क्या स्थानीय कर्मियों को पर्याप्त प्रशिक्षण और संसाधन मिलेंगे? क्या सेवाएँ समय पर पहुँचेंगी? क्या परिवारों को राहत का वास्तविक अनुभव होगा? यही प्रश्न किसी भी भारतीय प्रयोग पर भी लागू होंगे।

भारत के लिए एक और बड़ा सबक यह है कि देखभाल को केवल करुणा की भाषा में नहीं, अधिकार और बुनियादी ढाँचे की भाषा में देखा जाए। जैसे सड़क, पानी, बिजली और सार्वजनिक परिवहन नागरिक जीवन को संभव बनाते हैं, वैसे ही वृद्ध और दिव्यांग नागरिकों के लिए समन्वित देखभाल व्यवस्था भी एक प्रकार का सामाजिक बुनियादी ढाँचा है। यह किसी एक परिवार की निजी समस्या नहीं, बल्कि एक आधुनिक समाज की संरचनात्मक जिम्मेदारी है।

नीति की घोषणा से आगे: असली चुनौती है गुणवत्ता, निरंतरता और भरोसा

किसी भी सामाजिक नीति की तरह बुसान की यह पहल भी अपने साथ उम्मीदें और आशंकाएँ दोनों लेकर आती है। एक ओर यह अत्यंत सकारात्मक है कि प्रशासन ने स्पष्ट रूप से कहा है कि देखभाल की गुणवत्ता बढ़ाई जाएगी, सेवा-संपर्क को अधिक सूक्ष्म बनाया जाएगा और नागरिकों को परिचित जीवन-स्थल से बेदखल किए बिना सहायता देने का प्रयास होगा। दूसरी ओर, यही वह क्षेत्र है जहाँ कई अच्छी नीतियाँ अमल में कमजोर पड़ जाती हैं।

देखभाल की गुणवत्ता का अर्थ केवल अधिक सेवाएँ नहीं है। इसका अर्थ है—उचित समय पर उपलब्धता, प्रशिक्षित मानव संसाधन, नागरिक की स्थिति का संवेदनशील आकलन, सेवाओं के बीच दोहराव और छूट को कम करना, और ऐसी व्यवस्था बनाना जिस पर परिवार भरोसा कर सके। यदि सहायता बहुत देर से पहुँचे, या आवेदन प्रक्रिया आसान हो लेकिन आगे कोई समन्वय न हो, तो नीति केवल कागज़ी उपलब्धि बनकर रह जाती है।

बुसान ने आठ अतिरिक्त सेवाओं का विकास किया है, लेकिन अंततः नागरिक के अनुभव का निर्णय सूची की लंबाई नहीं, जीवन में आए बदलाव से होगा। क्या कोई बुज़ुर्ग व्यक्ति अस्पताल या संस्था में जाने की नौबत टाल सका? क्या किसी दिव्यांग व्यक्ति को अपने परिचित घर में सम्मानजनक जीवन के लिए पर्याप्त सहायता मिली? क्या देखभाल का बोझ परिवार के एक सदस्य, विशेषकर महिला, के कंधों से कुछ हल्का हुआ? क्या स्थानीय केंद्र वास्तव में मददगार साबित हुआ, या वह भी एक और औपचारिक खिड़की बनकर रह गया? यही वे सवाल हैं जो इस मॉडल की सफलता तय करेंगे।

भारत में भी जब हम ऐसी पहलों की कल्पना करें, तो हमें संख्या, बजट और घोषणाओं से आगे जाकर ‘विश्वसनीयता’ पर ध्यान देना होगा। सामाजिक नीति तब सफल मानी जाती है जब नागरिक को यह विश्वास हो कि ज़रूरत पड़ने पर व्यवस्था काम करेगी। वृद्धावस्था और दिव्यांगता के मामलों में यह विश्वास विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ विलंब की कीमत बहुत भारी हो सकती है—स्वास्थ्य बिगड़ना, सामाजिक अलगाव, परिवार का थक जाना, और अंततः व्यक्ति का संस्था-निर्भर हो जाना।

बुसान की पहल की सबसे बड़ी वैचारिक उपलब्धि शायद यही है कि उसने देखभाल को ‘घरेलू त्याग’ या ‘आख़िरी संकट’ के दायरे से निकालकर सामान्य नागरिक जीवन के ढाँचे में रखने की कोशिश की है। यह संदेश आज के भारत में भी उतना ही प्रासंगिक है। जैसे-जैसे हमारा समाज बदल रहा है, वैसे-वैसे हमें यह स्वीकार करना होगा कि गरिमापूर्ण वृद्धावस्था और सहायक स्वतंत्र जीवन किसी विशेषाधिकार का नहीं, बल्कि नागरिकता का हिस्सा होना चाहिए।

अंततः बुसान हमें यही याद दिलाता है कि किसी समाज की सभ्यता का आकलन केवल उसकी तकनीकी प्रगति, चमकदार बुनियादी ढाँचे या आर्थिक आँकड़ों से नहीं होता। असली कसौटी यह है कि वह अपने सबसे नाजुक नागरिकों—बुज़ुर्गों, दिव्यांगजनों, अकेले पड़ चुके लोगों—को किस तरह देखता है। अगर नीति उन्हें उनके अपने घर, उनके अपने मोहल्ले और उनकी अपनी स्मृतियों के बीच सुरक्षित, जुड़े और सम्मानित जीवन का अवसर देती है, तो वही कल्याण राज्य का सबसे मानवीय चेहरा है।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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