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अचानक बढ़ी शुगर को सिर्फ खानपान की गलती न मानें: कोरिया के नए शोध ने क्यों पैंक्रियाज कैंसर पर बढ़ाई सतर्कता

अचानक बढ़ी शुगर को सिर्फ खानपान की गलती न मानें: कोरिया के नए शोध ने क्यों पैंक्रियाज कैंसर पर बढ़ाई सतर्कता

अचानक हुई डायबिटीज पर नया सवाल: क्या शरीर किसी बड़ी बीमारी का संकेत दे रहा है?

मधुमेह या डायबिटीज भारत में इतनी आम हो चुकी है कि बहुत से परिवारों में यह लगभग रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा बन गई है। किसी घर में पिता की दवा चल रही है, कहीं मां का उपवास के बाद शुगर लेवल बिगड़ जाता है, तो कहीं 40 की उम्र पार करते ही स्वास्थ्य जांच में पहली बार ‘फास्टिंग शुगर’ बढ़ी हुई मिलती है। इसी वजह से हम अक्सर यह मान लेते हैं कि डायबिटीज का मतलब वही पुरानी कहानी है—कम व्यायाम, ज्यादा वजन, तनाव, अनियमित भोजन, पारिवारिक इतिहास और उम्र। लेकिन दक्षिण कोरिया में सामने आए एक नए शोध ने इस सहज समझ को चुनौती दी है।

14 अप्रैल 2026 को सार्वजनिक किए गए इस शोध में कोरिया के एक संयुक्त मेडिकल रिसर्च समूह ने संकेत दिया कि कुछ मामलों में अचानक शुरू हुई डायबिटीज, या पहले से मौजूद डायबिटीज का बहुत कम समय में तेजी से बिगड़ जाना, पैंक्रियाज यानी अग्न्याशय के कैंसर का शुरुआती संकेत हो सकता है। शोध के अनुसार पैंक्रियाज कैंसर कोशिकाएं ‘Wnt5a’ नाम का एक प्रोटीन छोड़ती हैं, जो इंसुलिन के स्राव को कम कर सकता है। इसका परिणाम उच्च रक्त शर्करा और फिर मधुमेह के रूप में सामने आ सकता है।

यह समझना जरूरी है कि इस निष्कर्ष का मतलब यह नहीं है कि हर नया डायबिटीज रोगी कैंसर से जूझ रहा है। ऐसा कहना न केवल गलत होगा, बल्कि अनावश्यक डर भी पैदा करेगा। असली बात यह है कि हर डायबिटीज एक जैसी नहीं होती। कुछ मामले सामान्य जीवनशैली, शरीर की चयापचय प्रक्रिया और आनुवंशिक जोखिम से जुड़े होते हैं, लेकिन कुछ मामलों में शुगर का अचानक बिगड़ना उस अंग की परेशानी का संकेत हो सकता है जो शरीर में इंसुलिन बनाता है।

भारतीय संदर्भ में यह खबर इसलिए और भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां डायबिटीज के मामलों की संख्या बहुत बड़ी है। अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों में भारत को लंबे समय से दुनिया की ‘डायबिटीज कैपिटल’ कहा जाता रहा है। ऐसे में अगर हर बढ़ती शुगर को हम सिर्फ मिठाई, चावल, तनाव या व्यायाम की कमी से जोड़कर देखेंगे, तो उन दुर्लभ लेकिन गंभीर मामलों को चूक सकते हैं जिनमें शरीर हमें किसी और संकट की चेतावनी दे रहा होता है। जैसे घर की दीवार पर आया छोटा-सा दरार कभी-कभी केवल पेंट की समस्या नहीं, बल्कि भीतर की नमी या संरचनात्मक कमजोरी का संकेत होती है, वैसे ही कुछ रक्त शर्करा बदलाव सिर्फ मेटाबॉलिज्म की कहानी नहीं होते।

कोरिया के इस शोध ने चिकित्सा जगत के सामने एक अहम प्रश्न रखा है—क्या डॉक्टरों और मरीजों, दोनों को अचानक हुए शुगर बदलावों को अधिक सावधानी से पढ़ना चाहिए? इसका उत्तर हां की दिशा में जाता दिखता है। और यही कारण है कि यह अध्ययन केवल कोरिया तक सीमित स्वास्थ्य समाचार नहीं, बल्कि भारत जैसे देश के लिए भी एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संदेश है।

पैंक्रियाज क्या करता है, और इसमें गड़बड़ी होने पर शुगर क्यों बिगड़ती है?

अग्न्याशय या पैंक्रियाज पेट के भीतर स्थित एक ऐसा अंग है जिसका नाम आम लोगों की बातचीत में बहुत कम आता है, लेकिन शरीर में इसकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। इसे समझना आसान भाषा में कुछ ऐसा है: यह अंग एक तरफ पाचन में मदद करने वाले एंजाइम बनाता है, और दूसरी तरफ इंसुलिन जैसे हार्मोन छोड़ता है जो रक्त में शर्करा की मात्रा नियंत्रित करते हैं। यानी यह केवल पाचन तंत्र का हिस्सा नहीं, बल्कि शरीर की ऊर्जा व्यवस्था का भी केंद्रीय खिलाड़ी है।

जब हम भोजन करते हैं, खासकर कार्बोहाइड्रेट लेते हैं—जैसे चावल, रोटी, आलू, मिठाई, इडली, डोसा या पराठा—तो शरीर उसे ग्लूकोज में बदलता है। यह ग्लूकोज रक्त में आता है और कोशिकाओं को ऊर्जा देने के लिए इस्तेमाल होता है। लेकिन कोशिकाओं तक इस ग्लूकोज को पहुंचाने के लिए इंसुलिन की जरूरत होती है। अगर इंसुलिन पर्याप्त मात्रा में नहीं बने, या शरीर उसका ठीक से इस्तेमाल न कर पाए, तो रक्त में शर्करा बढ़ने लगती है।

अब यही वह जगह है जहां कोरिया का नया शोध अहम हो जाता है। शोधकर्ताओं ने बताया कि पैंक्रियाज कैंसर कोशिकाएं Wnt5a नामक प्रोटीन स्रावित करती हैं। यह प्रोटीन इंसुलिन स्राव को दबा सकता है। सरल शब्दों में कहें तो कैंसर केवल एक गांठ या ट्यूमर के रूप में नहीं बढ़ रहा, बल्कि वह शरीर के हार्मोन तंत्र में दखल देकर शुगर नियंत्रण को भी खराब कर सकता है। यह बात चिकित्सा की दृष्टि से इसलिए बड़ी है, क्योंकि लंबे समय से डॉक्टरों को यह संदेह था कि पैंक्रियाज कैंसर और डायबिटीज के बीच कोई रिश्ता है, लेकिन अब उस रिश्ते के पीछे एक अपेक्षाकृत ठोस आणविक तंत्र सामने आया है।

भारतीय पाठकों के लिए इसे एक और उदाहरण से समझा जा सकता है। मान लीजिए किसी शहर में बिजली की सप्लाई अचानक बार-बार गिरने लगे। पहली नजर में लोग पंखे, वायरिंग या घरेलू लोड को कारण मान सकते हैं। लेकिन अगर असली समस्या पावर स्टेशन में हो, तो घर के भीतर दिख रही गड़बड़ी केवल ऊपर से दिखने वाला असर है। ठीक यही स्थिति कुछ मरीजों में डायबिटीज की हो सकती है। बाहर से मामला शुगर बढ़ने जैसा दिखे, लेकिन जड़ पैंक्रियाज में हो।

यह भी ध्यान रहे कि पैंक्रियाज की समस्या हमेशा शुरुआत में दर्द, गांठ या साफ संकेतों के साथ सामने नहीं आती। बहुत बार शरीर चुपचाप बदलाव झेलता रहता है। ऐसे में अगर इस अंग की बीमारी शुगर के जरिए अपना संकेत दे रही हो, तो यह चिकित्सा के लिए एक महत्वपूर्ण सुराग बन जाता है। यही कारण है कि यह अध्ययन केवल लैब की खोज नहीं, बल्कि क्लिनिकल प्रैक्टिस यानी रोजमर्रा की चिकित्सा पद्धति को प्रभावित करने वाली जानकारी मानी जा रही है।

पैंक्रियाज कैंसर को ‘साइलेंट’ बीमारी क्यों कहा जाता है?

पैंक्रियाज कैंसर को दुनिया भर में अक्सर ‘साइलेंट कैंसर’ कहा जाता है। इसका कारण यह है कि शुरुआती चरण में इसके लक्षण या तो बहुत हल्के होते हैं, या इतने सामान्य होते हैं कि लोग उन्हें दूसरी साधारण समस्याओं से जोड़ देते हैं। पेट में हल्की असहजता, बदहजमी, भूख में बदलाव, कमजोरी, वजन कम होना, पीठ या पेट में अस्पष्ट दर्द—ये सब ऐसे लक्षण हैं जिन्हें भारतीय परिवारों में लोग अक्सर गैस, एसिडिटी, थकान, मौसम, उम्र या काम के तनाव से जोड़कर टाल देते हैं।

हमारे यहां खासकर मध्यमवर्गीय घरों में यह प्रवृत्ति आम है कि जब तक दर्द बहुत तेज न हो जाए, जांच कराने को टाला जाता है। कई लोग पहले घरेलू उपाय अपनाते हैं, फिर मेडिकल स्टोर से दवा लेते हैं, और अंत में डॉक्टर तक पहुंचते हैं। पैंक्रियाज जैसे अंग की बीमारी में यही देरी खतरनाक हो सकती है। क्योंकि जब तक स्पष्ट लक्षण उभरते हैं, तब तक कैंसर अक्सर काफी आगे बढ़ चुका होता है।

यही वजह है कि अचानक शुरू हुई डायबिटीज या पहले से मौजूद डायबिटीज का अप्रत्याशित रूप से खराब होना इतना महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। यह एक ऐसा बदलाव है जिसे रक्त जांच में पकड़ा जा सकता है, जबकि पैंक्रियाज की बीमारी खुद अभी चुप हो सकती है। दूसरे शब्दों में, कैंसर शरीर में चुपचाप मौजूद हो, लेकिन उसका असर मेटाबॉलिज्म पर दिखने लगे।

भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था में यह समझ खास महत्व रखती है, क्योंकि यहां दोहरी चुनौती है—एक तरफ डायबिटीज बेहद आम है, दूसरी तरफ कैंसर की कई किस्में देर से पकड़ी जाती हैं। ऐसे में डॉक्टरों के सामने कठिन काम यह है कि वे हर बढ़ी हुई शुगर पर घबराएं भी नहीं, लेकिन अचानक और बिना स्पष्ट कारण हुए बदलाव को हल्के में भी न लें। यही संतुलन आधुनिक चिकित्सा की परिपक्वता है।

इस शोध का सार यही नहीं कि पैंक्रियाज कैंसर देर से पकड़ा जाता है, बल्कि यह भी कि शायद वह कुछ मरीजों में डायबिटीज के जरिए अपनी उपस्थिति का संकेत पहले ही दे देता है। भारतीय समाज में, जहां स्वास्थ्य जांच अक्सर बीमारी होने के बाद कराई जाती है, यह संदेश और प्रासंगिक हो जाता है—कुछ संकेत लक्षण नहीं, बल्कि पैटर्न होते हैं। और पैटर्न को पहचानना ही समय पर इलाज की दिशा खोल सकता है।

किन परिस्थितियों में डॉक्टर को पैंक्रियाज की ओर भी देखना चाहिए?

यहां सबसे जरूरी सवाल यही है कि आखिर किन लोगों में नई डायबिटीज या बिगड़ती शुगर को लेकर अतिरिक्त जांच पर विचार किया जाना चाहिए। कोरिया के शोध का सबसे संतुलित संदेश यही है कि हर मरीज में कैंसर खोजने की जरूरत नहीं, बल्कि चयनित मामलों में नैदानिक सतर्कता बढ़ाने की जरूरत है। यानी बात ‘सबकी जांच’ की नहीं, ‘सही मरीज की सही समय पर जांच’ की है।

उदाहरण के लिए, अगर किसी व्यक्ति की उम्र मध्यम आयु या उससे ऊपर है, उसका वजन अचानक नहीं बढ़ा, खानपान में कोई बड़ा नकारात्मक बदलाव नहीं आया, परिवार में डायबिटीज का इतिहास भी बहुत स्पष्ट नहीं है, फिर भी कुछ ही समय में उसकी शुगर तेजी से बढ़ गई—तो यह स्थिति सामान्य पैटर्न से थोड़ी अलग मानी जाएगी। इसी तरह, अगर किसी पुराने डायबिटीज रोगी की शुगर लंबे समय तक ठीक चल रही थी, लेकिन पिछले कुछ हफ्तों या महीनों में अचानक दवाएं काम करती कम दिख रही हैं और नियंत्रण तेजी से बिगड़ रहा है, तो सिर्फ यह मान लेना कि मरीज ने परहेज नहीं किया, पर्याप्त नहीं हो सकता।

डॉक्टर आमतौर पर वजन, खानपान, शारीरिक गतिविधि, दवाओं का पालन, तनाव, संक्रमण, स्टेरॉयड जैसी दवाओं का उपयोग, लीवर या किडनी की समस्या और पारिवारिक इतिहास को देखते हैं। लेकिन यदि इन कारकों से शुगर में आई अचानक खराबी का संतोषजनक जवाब नहीं मिलता, तो पैंक्रियाज सहित अन्य संभावित कारणों पर विचार करना चिकित्सकीय रूप से उचित हो सकता है।

भारत में यह संदेश इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां कई मरीज डॉक्टर के सामने आधी कहानी रखते हैं—कभी समय की कमी में, कभी झिझक में, कभी इस डर से कि उन्हें ‘लापरवाह’ न समझ लिया जाए। लेकिन अब मरीजों को भी अपनी स्वास्थ्य डायरी अधिक व्यवस्थित रखनी होगी। जैसे: पिछले 6 महीनों में वजन कितना बदला? भूख में कोई अंतर आया? पेट या पीठ में नया दर्द है? शुगर कब से ज्यादा आने लगी? क्या पहले से चल रही दवा अचानक कम असर कर रही है? ऐसे प्रश्न साधारण लग सकते हैं, पर निदान का रास्ता बदल सकते हैं।

यहां यह भी स्पष्ट कर देना जरूरी है कि पैंक्रियाज कैंसर अपेक्षाकृत दुर्लभ है, जबकि डायबिटीज बहुत आम है। इसलिए किसी भी मरीज को केवल इंटरनेट पढ़कर निष्कर्ष पर नहीं पहुंचना चाहिए। भारत में ‘गूगल डायग्नोसिस’ की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है, और अक्सर इससे अनावश्यक भय पैदा होता है। सही तरीका यह है कि अगर शुगर बदलाव असामान्य लग रहे हों, तो चिकित्सक से परामर्श किया जाए। डॉक्टर मरीज की पूरी स्थिति देखकर तय करेंगे कि केवल दवा समायोजन पर्याप्त है या आगे इमेजिंग, पैंक्रियाज मूल्यांकन या किसी विशेषज्ञ की राय की जरूरत है।

मरीजों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात: डर नहीं, बदलावों का रिकॉर्ड रखें

स्वास्थ्य समाचारों का एक बड़ा संकट यह है कि वे अक्सर दो चरम सीमाओं में चले जाते हैं—या तो खबर को इतना सरल बना दिया जाता है कि उसका वैज्ञानिक अर्थ खो जाता है, या फिर इतना सनसनीखेज कि लोग सामान्य लक्षणों से भी भयभीत हो जाते हैं। इस कोरियाई शोध को लेकर सही सार्वजनिक संदेश यह होना चाहिए कि लोग घबराएं नहीं, बल्कि अपने शरीर में आए बदलावों को अधिक ध्यान से दर्ज करें।

अगर किसी व्यक्ति को पहली बार डायबिटीज का पता चला है, तो उसे केवल यह नहीं देखना चाहिए कि शुगर कितनी है, बल्कि यह भी समझना चाहिए कि यह बदलाव किस रफ्तार से आया। क्या पिछले साल तक रिपोर्ट सामान्य थी? क्या वजन बिना वजह घटा है? क्या भूख कम हुई है? क्या पेट में लगातार भारीपन, अपच या असुविधा है? क्या थकान का स्तर असामान्य है? इसी तरह, पुराने मरीजों को केवल HbA1c की संख्या नहीं, बल्कि उसके पीछे के व्यवहारिक और शारीरिक संदर्भ को भी दर्ज करना चाहिए।

भारत में बहुत से मरीज दवा का नाम तो जानते हैं, लेकिन अपनी बीमारी के पैटर्न का रिकॉर्ड नहीं रखते। कई लोग अलग-अलग लैब से जांच करा लेते हैं, पर रिपोर्टें क्रमवार संभालकर नहीं रखते। कुछ मरीजों को याद ही नहीं रहता कि शुगर बिगड़ना कब शुरू हुआ। ऐसे में बीमारी का विकासक्रम समझना मुश्किल हो जाता है। आज जब मोबाइल फोन लगभग हर हाथ में है, तो एक साधारण डिजिटल नोट या फाइल में वजन, शुगर रीडिंग, दवा, भोजन में बदलाव और प्रमुख लक्षण दर्ज करना बेहद उपयोगी हो सकता है।

यह भी जरूरी है कि मरीज अपने ऊपर दोषारोपण कम करें। भारतीय समाज में खासकर डायबिटीज को अक्सर ‘अनुशासन की कमी’ से जोड़कर देखा जाता है—जैसे मरीज ने मीठा खा लिया होगा, व्यायाम नहीं किया होगा, परहेज नहीं रखा होगा। यह बात कई मामलों में सही हो सकती है, लेकिन हर बार नहीं। अगर शुगर में अचानक और असामान्य बदलाव हो रहा है, तो उसे केवल ‘मेरी गलती’ मानकर टाल देना चिकित्सा दृष्टि से हानिकारक हो सकता है।

अच्छे डॉक्टर भी अब केवल यह नहीं पूछेंगे कि आपने मिठाई खाई या नहीं, बल्कि यह भी पूछ सकते हैं कि पिछले कुछ महीनों में आपकी सेहत का पैटर्न क्या रहा है। यही आधुनिक चिकित्सा का महत्वपूर्ण बदलाव है—संख्या के साथ कहानी को भी समझना। और मरीज की जिम्मेदारी है कि वह यह कहानी साफ, ईमानदारी और विस्तार से बताए।

भारत के लिए सबक: डायबिटीज की महामारी के बीच ‘असामान्य’ मामलों को पहचानना

भारत में डायबिटीज के बोझ को देखते हुए इस शोध का सबसे बड़ा सबक यह है कि एक बड़ी महामारी के भीतर छिपे छोटे लेकिन गंभीर संकेतों को पहचानना होगा। हमारे देश में लाखों लोग प्रीडायबिटीज, टाइप 2 डायबिटीज और उससे जुड़ी जटिलताओं के साथ जी रहे हैं। सरकारी अस्पतालों से लेकर निजी क्लीनिकों तक, शुगर कंट्रोल एक बेहद सामान्य चिकित्सा विषय है। लेकिन जब कोई बीमारी बहुत सामान्य हो जाती है, तो उसका एक जोखिम यह भी होता है कि उसके भीतर छिपी असामान्य कहानियां नजर से छूट जाती हैं।

कोरिया के शोध ने यही याद दिलाया है कि ‘नई डायबिटीज’ हमेशा केवल जीवनशैली की कहानी नहीं होती। ‘तेजी से बिगड़ती डायबिटीज’ हमेशा सिर्फ दवा छोड़ने या परहेज तोड़ने का मामला नहीं होती। कभी-कभी यह शरीर के भीतर चल रही ऐसी प्रक्रिया की सूचना होती है, जो गंभीर है और अलग चिकित्सकीय दिशा मांगती है।

भारतीय स्वास्थ्य नीति और चिकित्सा शिक्षा, दोनों के लिए इस तरह के शोध का महत्व है। प्राथमिक स्तर के डॉक्टरों, फैमिली फिजिशियन, एंडोक्राइनोलॉजिस्ट और गैस्ट्रो-ऑन्कोलॉजी विशेषज्ञों के बीच बेहतर संवाद की जरूरत होगी। मधुमेह के प्रबंधन में अब यह प्रश्न भी जोड़ा जा सकता है कि किस मरीज में शुगर बदलाव का पैटर्न सामान्य से अलग दिख रहा है। इससे जांचों की अंधाधुंध बढ़ोतरी नहीं, बल्कि अधिक समझदारी भरी चयन प्रक्रिया विकसित हो सकती है।

इसके साथ एक और भारतीय संदर्भ जुड़ता है—हमारे यहां लोग अक्सर नियमित वार्षिक स्वास्थ्य जांच नहीं कराते। कई मरीज पहली बार तभी सामने आते हैं जब शुगर बहुत बढ़ चुकी होती है। ऐसे में अचानक और पुरानी समस्या के बीच फर्क समझना मुश्किल हो जाता है। इसलिए नियमित स्वास्थ्य जांच, पुराने रिकॉर्ड का संरक्षण, और डॉक्टर के साथ लंबी बीमारी की कहानी साझा करना पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है।

सार यही है: यह शोध डराने के लिए नहीं, सोच बदलने के लिए है। डायबिटीज को गंभीरता से लेना पहले भी जरूरी था, लेकिन अब यह समझना भी जरूरी है कि कभी-कभी शुगर स्वयं बीमारी नहीं, बल्कि एक बड़े रोग का संकेत हो सकती है। भारत जैसे देश में, जहां स्वास्थ्य चुनौतियां विशाल हैं और समय पर निदान अक्सर इलाज की दिशा तय करता है, यह संदेश अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। अगर शरीर बिना स्पष्ट कारण शुगर के जरिए नई भाषा बोल रहा है, तो उसे सुनना सीखना होगा।

निष्कर्ष: हर बढ़ी हुई शुगर कैंसर नहीं, लेकिन हर असामान्य बदलाव को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता

कोरिया से आई यह वैज्ञानिक जानकारी हमें चिकित्सा की एक बुनियादी सच्चाई याद दिलाती है—रोग केवल रिपोर्ट की संख्या नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपे पैटर्न, समय और संदर्भ की कहानी भी हैं। अचानक हुई डायबिटीज, या बहुत तेजी से बिगड़ी पुरानी डायबिटीज, कुछ मरीजों में पैंक्रियाज की गहरी समस्या की चेतावनी हो सकती है। Wnt5a जैसे प्रोटीन के जरिए सामने आया संभावित जैविक तंत्र इस संबंध को अधिक विश्वसनीय और ठोस बनाता है।

लेकिन इस संदेश का दूसरा हिस्सा उतना ही महत्वपूर्ण है: घबराहट समाधान नहीं है। भारत में जहां हर घर में स्वास्थ्य सलाह देने वाले लोग मिल जाते हैं—कोई कहेगा मेथी खाइए, कोई कहेगा चावल छोड़ दीजिए, कोई कहेगा इंसुलिन शुरू मत कराइए—वहां वैज्ञानिक जानकारी को संतुलन के साथ समझना और भी जरूरी है। न तो हर नई डायबिटीज को कैंसर मान लेना चाहिए, न ही हर अचानक बदलाव को सामान्य जीवनशैली समस्या कहकर टाल देना चाहिए।

सही रास्ता है सतर्कता, रिकॉर्ड, संवाद और समय पर चिकित्सकीय मूल्यांकन। अगर शुगर का बदलाव असामान्य है, उसका कारण स्पष्ट नहीं है, और शरीर कुछ अलग संकेत दे रहा है, तो डॉक्टर से विस्तार से बात कीजिए। कभी-कभी इलाज की दिशा एक अतिरिक्त प्रश्न से बदल जाती है। और संभव है कि भविष्य में मधुमेह क्लिनिक केवल शुगर कंट्रोल का केंद्र न रहकर, कुछ गंभीर बीमारियों की शुरुआती पहचान का भी महत्वपूर्ण दरवाजा बनें।

भारतीय पाठकों के लिए यही सबसे बड़ा निष्कर्ष है—शुगर को हल्के में न लें, लेकिन उससे डरें भी नहीं। उसे समझें। क्योंकि कई बार शरीर सबसे पहले इसी रास्ते से बताता है कि भीतर कुछ ठीक नहीं चल रहा।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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