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कोरिया के को스닥 में ‘समझाने की जिम्मेदारी’ पर बड़ा सवाल: बायो-फार्मा खुलासों की भाषा बदलेगी तो ही लौटेगा भरोसा

कोरिया के को스닥 में ‘समझाने की जिम्मेदारी’ पर बड़ा सवाल: बायो-फार्मा खुलासों की भाषा बदलेगी तो ही लौटेगा भरोसा

क्यों कोरिया के इस फैसले पर भारत को भी ध्यान देना चाहिए

दक्षिण कोरिया के वित्तीय नियामक ने 12 अप्रैल 2026 को एक ऐसा कदम उठाया है, जिसे सिर्फ तकनीकी सुधार या सरकारी फाइलों की भाषा दुरुस्त करने की कवायद मानना भूल होगी। कोरियाई वित्तीय पर्यवेक्षण सेवा ने यह संकेत दिया है कि वह फार्मा और बायो कंपनियों के खुलासे, यानी निवेशकों को दी जाने वाली जानकारी, को अधिक स्पष्ट, तुलनात्मक और समझने योग्य बनाना चाहती है। इसके लिए एक विशेष टास्क फोर्स बनाई जा रही है। पहली नजर में यह एक नियामकीय पहल लग सकती है, लेकिन वास्तव में यह कोरिया के पूंजी बाजार के उस संवेदनशील हिस्से को छूती है जहां उम्मीद, विज्ञान, जोखिम और सट्टा—चारों एक साथ चलते हैं।

भारतीय पाठकों के लिए इसे समझना मुश्किल नहीं है। हमारे यहां भी जब कोई नई दवा, बायोटेक, हेल्थटेक या वैक्सीन कंपनी बाजार में उम्मीदों का बड़ा नैरेटिव बेचती है, तो निवेशक सिर्फ बैलेंस शीट नहीं देखते। वे भविष्य की कहानी में निवेश करते हैं। यही बात कोरिया के को스닥 बाजार पर लागू होती है। को스닥 को मोटे तौर पर दक्षिण कोरिया का विकासोन्मुख, टेक और उभरते उद्योगों वाला शेयर बाजार समझा जा सकता है, कुछ हद तक भारत के SME प्लेटफॉर्म, मिडकैप-ग्रोथ सेगमेंट और नैस्डैक-शैली की विकास कंपनियों के मिश्रण जैसा। फर्क सिर्फ इतना है कि वहां बायो-फार्मा कंपनियों की मौजूदगी और प्रभाव बहुत ज्यादा बड़ा है।

आंकड़े इसका वजन समझाते हैं। को스닥 बाजार में फार्मा और बायो कंपनियों की हिस्सेदारी बाजार पूंजीकरण के हिसाब से लगभग 29.9 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है, जिसकी राशि 183.2 ट्रिलियन वॉन बताई गई है। यह किसी एक सेक्टर की सामान्य मौजूदगी नहीं, बल्कि पूरे बाजार की विश्वसनीयता पर असर डालने वाली ताकत है। अगर शीर्ष 10 कंपनियों में 6 कंपनियां इसी क्षेत्र से आती हों, तो सवाल सिर्फ यह नहीं रह जाता कि कोई कंपनी क्या कह रही है, बल्कि यह भी कि बाजार किस भाषा में निवेशकों से बात कर रहा है।

भारत में भी हमने बार-बार देखा है कि जिन सेक्टरों में विकास की कहानी सबसे चमकदार होती है, वहीं सूचना की असमानता सबसे महंगी साबित होती है। कभी स्टार्टअप, कभी डिजिटल प्लेटफॉर्म, कभी अक्षय ऊर्जा, तो कभी फार्मा—कहानी जितनी आकर्षक होती है, जोखिम उतना धुंधला कर दिया जाता है। कोरिया का यह कदम इसलिए अहम है क्योंकि वह अब यह पूछ रहा है कि क्या बाजार की सूचना सचमुच आम निवेशक की समझ के हिसाब से लिखी गई है, या फिर सिर्फ विशेषज्ञों और अंदरूनी हलकों के लिए?

मुद्दा क्या है: ‘खुलासा’ हुआ, पर निवेशक ने समझा कितना?

कोरियाई बहस का सबसे केंद्रीय विचार यही है कि किसी कंपनी ने सूचना जारी कर दी, यह पर्याप्त नहीं है। असली प्रश्न यह है कि निवेशक उस सूचना का अर्थ समझ पाया या नहीं। फार्मा और बायो क्षेत्र में यह समस्या और जटिल हो जाती है क्योंकि यहां उत्पाद नहीं, प्रक्रियाएं बिकती हैं; मुनाफा नहीं, संभावना बिकती है; और वर्तमान आय से ज्यादा भविष्य का अनुमान मूल्यांकन तय करता है। क्लिनिकल ट्रायल, तकनीक हस्तांतरण, पाइपलाइन वैल्यू, संभावित बिक्री, विकास का चरण, अनुमोदन का रास्ता—इन सबकी भाषा आम निवेशक के लिए स्वाभाविक नहीं होती।

यही वह जगह है जहां कोरिया का नियामक हस्तक्षेप महत्वपूर्ण हो जाता है। बाजार में लंबे समय से यह शिकायत थी कि बायो-फार्मा कंपनियों के खुलासे इतने तकनीकी और जटिल होते हैं कि सामान्य निवेशक उन्हें पढ़कर भी असल बात नहीं समझ पाता। किसी कंपनी ने ‘तकनीक निर्यात’ की घोषणा कर दी, लेकिन क्या उसमें मिलने वाली अग्रिम राशि कितनी है, आगे के माइलस्टोन भुगतान किन शर्तों पर मिलेंगे, साझेदार कंपनी के पास कौन-कौन से अधिकार हैं, अनुबंध कब खत्म हो सकता है, और राजस्व में बदलने तक कितनी अनिश्चितता है—ये सब बिंदु अक्सर स्पष्ट नहीं होते।

भारतीय संदर्भ में इसे ऐसे समझिए: जैसे किसी इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी ने सिर्फ इतना कहा कि उसे बड़ा प्रोजेक्ट मिला है, लेकिन यह न बताया कि भुगतान चरणबद्ध है, मंजूरियां लंबित हैं, भूमि अधिग्रहण बाकी है और लागत बढ़ने का जोखिम है। headline तो ‘बड़ी जीत’ की बनेगी, लेकिन निवेशक के लिए असली कहानी अधूरी रहेगी। बायो-फार्मा क्षेत्र में भी यही होता है। एक चमकदार प्रेस नोट और एक उपयोगी निवेशक सूचना में फर्क होता है, और कोरिया अब उसी फर्क को नियामकीय भाषा में बदलना चाहता है।

दक्षिण कोरियाई प्रणाली में ‘डिस्क्लोजर’ यानी सार्वजनिक खुलासा पूंजी बाजार का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह वैसा ही है जैसे किसी सूचीबद्ध भारतीय कंपनी को स्टॉक एक्सचेंजों पर समय-समय पर जरूरी जानकारियां देनी होती हैं। लेकिन कोरियाई बहस कहती है कि अगर सूचना का प्रारूप, क्रम और शब्दावली ऐसी हो कि निवेशक मूल जोखिमों को पहचान ही न पाए, तो नियमों का पालन कागज पर भले हो जाए, बाजार का भरोसा नहीं बनता।

अभी क्यों? समय का चुनाव बाजार की बनावट से जुड़ा है

यह पूछना स्वाभाविक है कि यह सुधार अभी क्यों। इसका जवाब कोरिया के पूंजी बाजार की संरचना में छिपा है। फार्मा और बायो उद्योग उन क्षेत्रों में गिने जाते हैं जहां पूंजी सबसे पहले कहानी पर आती है और बाद में आय पर। कई कंपनियां शुरुआती वर्षों में मुनाफा नहीं कमातीं, लेकिन रिसर्च एवं डेवलपमेंट, यानी अनुसंधान और विकास, की प्रगति, वैज्ञानिक उपलब्धि और भविष्य की व्यावसायिक संभावना के आधार पर वे भारी निवेश जुटा लेती हैं।

कोरिया में पिछले वर्ष के IPO बाजार में भी बायो-फार्मा सेक्टर की हिस्सेदारी लगभग 47 प्रतिशत बताई गई। यानी नई सूचीबद्ध कंपनियों के बीच भी यह क्षेत्र लगभग आधे बाजार मूल्य के बराबर महत्व रखता है। इसका अर्थ स्पष्ट है—जो सेक्टर बाजार में नया पैसा खींच रहा है, उसी सेक्टर की सूचना प्रणाली अगर अस्पष्ट हो, तो समस्या सिर्फ एक कंपनी तक सीमित नहीं रहती। वह बाजार के मूल्य निर्धारण, निवेशकों के भरोसे और भविष्य की पूंजी जुटाने की क्षमता तक पहुंच जाती है।

भारत के निवेशकों के लिए इसमें एक अहम सबक है। हमारे यहां भी जब किसी क्षेत्र में तेज फंडिंग आती है—जैसे एक समय डिजिटल स्टार्टअप में आई, फिर EV और ग्रीन एनर्जी की कहानियों में दिखी—तो बाजार का एक बड़ा हिस्सा अनुमान और नैरेटिव पर चलने लगता है। उस समय नियामक का काम केवल धोखाधड़ी पकड़ना नहीं होता; उसे यह भी देखना पड़ता है कि क्या निवेशक को जरूरी जानकारी साफ और तुलनात्मक रूप में मिल रही है। कोरिया का नियामक अब इसी बात पर जोर दे रहा है कि ‘अच्छी खबर’ से ज्यादा जरूरी ‘समझ में आने वाली खबर’ है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि बायो-फार्मा जैसे क्षेत्रों में असफलता सामान्य है, असाधारण नहीं। हर दवा बाजार तक नहीं पहुंचती, हर परीक्षण सफल नहीं होता, हर तकनीक व्यावसायिक नहीं बनती। इसलिए यहां जोखिम को दबाकर, किनारे लगाकर या कठिन शब्दों में लपेटकर पेश करना सबसे बड़ी समस्या बन जाता है। अगर निवेशक को सिर्फ संभावित सफलता दिखे और असफलता की संरचना न दिखे, तो मूल्यांकन कृत्रिम रूप से फूलते हैं और फिर तेज गिरावट आती है। यही उतार-चढ़ाव छोटे निवेशकों को सबसे ज्यादा चोट पहुंचाता है।

‘अच्छी खबर’ नहीं, ‘समझ में आने वाली खबर’ क्यों ज्यादा जरूरी है

बाजार अक्सर घटनाओं को दो रंगों में देखता है—सकारात्मक या नकारात्मक। बायो-फार्मा कंपनियों के मामले में भी ऐसा ही होता है। क्लिनिकल ट्रायल की शुरुआत, विदेशी कंपनी से करार, दवा स्वीकृति के लिए आवेदन, शोध परिणामों की घोषणा—ये सब तुरंत शेयर की कीमतों को प्रभावित करते हैं। लेकिन असल निवेशक हित घटना के होने या न होने से आगे जाकर यह समझने में है कि उस घटना का कंपनी के नकदी प्रवाह, वाणिज्यिक क्षमता, समयसीमा और जोखिम प्रोफाइल पर क्या असर होगा।

मान लीजिए किसी कंपनी ने कहा कि उसने वैश्विक साझेदार के साथ तकनीक लाइसेंसिंग का समझौता किया है। खबर सुनते ही उत्साह पैदा होगा। लेकिन क्या अग्रिम भुगतान बहुत छोटा है? क्या भविष्य के भुगतान कई शर्तों पर निर्भर हैं? क्या पार्टनर किसी भी समय अनुबंध खत्म कर सकता है? क्या उत्पाद अभी शुरुआती वैज्ञानिक चरण में है? क्या नियामकीय स्वीकृतियों का रास्ता लंबा है? अगर ये बिंदु एक साथ साफ न बताए जाएं, तो निवेशक ‘घटना’ खरीदता है, ‘वास्तविकता’ नहीं।

कोरिया के नियामक ने इसलिए जिन तीन क्षेत्रों पर ध्यान देने की बात की है—अभिव्यक्ति, सूचना संरचना और लेखन मानक—वे साधारण शब्द नहीं हैं। इसका मतलब है कि वह नियमों का बोझ बढ़ाने से पहले जानकारी की भाषा और प्रस्तुति को सुधारना चाहता है। दूसरे शब्दों में, यह सिर्फ निगरानी कड़ी करना नहीं, बल्कि बाजार की भाषा बदलना है। सूचीबद्ध कंपनियों को यह समझना होगा कि वे वैज्ञानिक जर्नल नहीं लिख रहीं, न ही वे केवल पेशेवर विश्लेषकों से संवाद कर रही हैं। वे सार्वजनिक दस्तावेज जारी करती हैं, जिन पर आम निवेशक भी भरोसा करता है।

भारतीय पूंजी बाजार में भी यह बहस लगातार उठती रही है कि कॉर्पोरेट संचार में ‘लीगल अनुपालन’ और ‘सार्थक प्रकटीकरण’ अलग-अलग चीजें हैं। कई बार कंपनियां तकनीकी रूप से सारे नियम मान लेती हैं, लेकिन सूचना का असली अर्थ समझना फिर भी कठिन रहता है। जैसे हिंदी पट्टी का कोई छोटा निवेशक अंग्रेजी से भरे जटिल प्रस्तुतीकरण, चिकित्सा शब्दावली या valuation के अनुमानों को पढ़कर निर्णय नहीं ले सकता। कोरिया की नई पहल इस बात को संस्थागत रूप दे रही है कि सार्वजनिक सूचना का अंतिम मानक उसकी पठनीयता और उपयोगिता भी होना चाहिए।

को스닥 के फंडिंग मॉडल पर इसका असर: भरोसा बढ़ेगा या बोझ?

फार्मा-बायो खुलासों में सुधार का असर केवल सूचना की गुणवत्ता तक सीमित नहीं रहेगा; यह को스닥 के फंडिंग मॉडल पर भी पड़ेगा। को스닥 मूलतः वृद्धि-उन्मुख कंपनियों के लिए पूंजी जुटाने का एक मंच है। अगर उसके केंद्र में मौजूद क्षेत्र की सूचना व्यवस्था अविश्वसनीय या कठिन समझी जाती है, तो पूरा बाजार ‘डिस्काउंट’ पर ट्रेड कर सकता है। यानी निवेशक अतिरिक्त जोखिम मानकर कम कीमत देने लगेंगे।

स्पष्ट और तुलनात्मक खुलासों का सीधा लाभ यह है कि बेहतर कंपनियां अलग पहचान बना पाती हैं। अभी अक्सर होता यह है कि पारदर्शी और अपारदर्शी, दोनों तरह की कंपनियां एक ही उत्साह की लहर में ऊपर-नीचे होती रहती हैं। लेकिन अगर खुलासे अधिक मानकीकृत हों—जैसे क्लिनिकल चरण, सफलता की संभावना, नकदी खपत, संभावित समयसीमा, अनुबंध की शर्तें, और असफलता के जोखिम—तो निवेशक जोखिम का अधिक सटीक मूल्यांकन कर पाएंगे। इससे अच्छी कंपनियों को अपेक्षाकृत स्थिर पूंजी मिल सकती है, जबकि अस्पष्ट कंपनियों पर जांच और सवाल बढ़ेंगे।

संभव है कि अल्पावधि में कई कंपनियां इसे अतिरिक्त बोझ मानें। अधिक साफ भाषा में लिखना, जोखिमों को प्रमुखता देना, अनुबंधीय बारीकियां खोलना—यह सब आसान नहीं होगा, खासकर तब जब कंपनियां बाजार के उत्साह को बनाए रखना चाहती हों। लेकिन दीर्घकाल में यही प्रक्रिया क्षेत्र को विश्वसनीयता का प्रीमियम दिला सकती है। पूंजी बाजार अंततः उन्हीं संस्थाओं को पुरस्कृत करता है जिनकी सूचना विश्वसनीय, समय पर और तुलनात्मक हो।

IPO बाजार पर इसका असर और भी महत्वपूर्ण होगा। नई सूचीबद्ध बायो-फार्मा कंपनियां अक्सर भविष्य की पाइपलाइन और विकास कथा के आधार पर ऊंचा मूल्यांकन चाहती हैं। अगर लिस्टिंग से पहले दिया गया निवेशक दस्तावेज और लिस्टिंग के बाद का नियमित खुलासा अलग-अलग भाषा बोलते हों, तो भरोसा टूटता है। कोरिया का यह प्रयास लिस्टिंग से पहले और बाद की सूचना प्रणाली में निरंतरता ला सकता है। भारतीय बाजार में भी यह एक बड़ा मुद्दा रहा है कि IPO के समय कहानी सबसे चमकीली होती है, लेकिन बाद में तथ्य उतने व्यवस्थित रूप में सामने नहीं आते।

इसलिए कोरिया का संकेत यह है कि पूंजी जुटाने की गुणवत्ता केवल निवेशक संख्या बढ़ाने से नहीं सुधरती; वह सूचना की गुणवत्ता सुधारने से सुधरती है। अगर बाजार को यह महसूस हो कि सूचीबद्ध कंपनियां सिर्फ उत्साह नहीं बेच रहीं, बल्कि जोखिम और अवसर दोनों बराबर स्पष्ट कर रही हैं, तो निवेश का आधार ज्यादा टिकाऊ बन सकता है।

छोटे निवेशक की सुरक्षा से आगे: बाजार के भरोसे की मरम्मत

फार्मा और बायो क्षेत्र में व्यक्तिगत निवेशकों की रुचि हमेशा अपेक्षाकृत ज्यादा रहती है। इसका कारण साफ है—नई तकनीक, चिकित्सा नवाचार, सफलता की स्थिति में तेज मूल्यवृद्धि की संभावना, और लगातार आती खबरें। लेकिन यही गुण इस क्षेत्र को जोखिमपूर्ण भी बनाते हैं। विशेषज्ञों और आम निवेशकों के बीच समझ का फासला बड़ा होता है। ऐसे में अगर सूचना भी अस्पष्ट हो, तो नुकसान केवल बाजार जोखिम से नहीं बल्कि सूचना असमानता से पैदा होता है।

कोरिया का नया दृष्टिकोण इस मायने में महत्वपूर्ण है कि वह निवेशक सुरक्षा को सिर्फ बाद की जांच-पड़ताल या दंडात्मक कार्रवाई तक सीमित नहीं रखता। वह इसे ‘पूर्व-समझ’ यानी पहले से समझ में आने वाली सूचना के दायरे में ले जाता है। यह सोच आधुनिक बाजार नियमन के लिए केंद्रीय महत्व रखती है। निवेशक की सुरक्षा का अर्थ केवल यह नहीं कि उसे धोखा न दिया जाए; इसका अर्थ यह भी है कि उसे ऐसी भाषा और संरचना में जानकारी मिले जिससे वह मुख्य जोखिम, अनुमान और शर्तें पहचान सके।

यही वह बिंदु है जहां बाजार की विश्वसनीयता बनती या बिगड़ती है। बार-बार बड़ी उम्मीदें बनना, फिर तेज निराशा आना—यह चक्र तब अधिक हिंसक होता है जब मूल जानकारी असंतुलित हो। अगर सूचना बेहतर हो, तो शेयर कीमतें headline पर कम और उसके वास्तविक अर्थ पर ज्यादा प्रतिक्रिया देंगी। इससे उतार-चढ़ाव पूरी तरह खत्म नहीं होगा, लेकिन उसकी प्रकृति अधिक तर्कसंगत हो सकती है।

भारतीय पाठकों के लिए इसका एक सामाजिक अर्थ भी है। हमारे यहां शेयर बाजार में नए निवेशकों की संख्या लगातार बढ़ी है। छोटे शहरों, कस्बों और गैर-महानगरीय इलाकों से लोग तेजी से पूंजी बाजार में आए हैं। लेकिन जानकारी की भाषा, प्लेटफॉर्म और सलाहकारी ढांचे अब भी असमान हैं। ऐसे माहौल में अगर जटिल क्षेत्रों—जैसे बायोटेक, फार्मा, डीप-टेक—की सूचना को अधिक सरल, तुलनात्मक और जोखिम-संतुलित बनाने की कोशिश हो, तो वह सिर्फ निवेशक हित नहीं बल्कि बाजार के लोकतंत्रीकरण का हिस्सा भी बन जाती है।

कोरिया का यह कदम इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि वह निवेशक संरक्षण और बाजार विकास को परस्पर विरोधी नहीं मानता। अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि ज्यादा नियम नवाचार को रोकते हैं। लेकिन यहां संदेश उल्टा है: समझ में आने वाली सूचना, पारदर्शिता और मानकीकरण ही टिकाऊ बाजार विस्तार का आधार हैं। कमजोर भरोसे वाला बाजार हमेशा ज्यादा छूट नहीं, बल्कि ज्यादा छूट का दंड चुकाता है—कम कीमत, ज्यादा संदेह और महंगी पूंजी के रूप में।

यह केवल कड़ा नियंत्रण नहीं, बाजार की भाषा बदलने की कोशिश है

कोरियाई नियामक की इस पहल को सिर्फ ‘कठोर निगरानी’ कह देना अधूरा आकलन होगा। यह सही है कि जब किसी क्षेत्र-विशेष के खुलासों की बारीकी से समीक्षा शुरू होती है, तो कंपनियों पर जिम्मेदारी और जवाबदेही दोनों बढ़ती हैं। पर इस पहल का मूल स्वर दंडात्मक कम, संरचनात्मक अधिक दिखाई देता है। मकसद यह नहीं लगता कि हर वैज्ञानिक असफलता को अपराध बना दिया जाए, बल्कि यह कि असफलता की संभावना को ईमानदारी और स्पष्टता से बताया जाए।

बायो-फार्मा उद्योग का स्वभाव ही ऐसा है जहां विफलताएं सामान्य हैं। क्लिनिकल परीक्षण रुक सकते हैं, अनुमोदन टल सकते हैं, वैज्ञानिक परिकल्पना गलत साबित हो सकती है, या साझेदार कंपनी रणनीति बदल सकती है। निवेशकों को सबसे पहले इसी वास्तविकता की भाषा सिखाने की जरूरत है। अगर बाजार केवल ‘ब्रेकथ्रू’, ‘ग्लोबल डील’, ‘संभावित ब्लॉकबस्टर’ जैसे शब्दों पर चलेगा, तो वह अंततः अफवाह, प्रचार और selective explanation पर निर्भर हो जाएगा।

कोरिया की टास्क फोर्स इसलिए एक व्यापक संदेश देती है: सूचीबद्ध कंपनी की जिम्मेदारी केवल सूचना देना नहीं, बल्कि उसे इस तरह देना भी है कि आम निवेशक उसके अर्थ तक पहुंच सके। यह ‘explanation responsibility’ यानी समझाने की जिम्मेदारी है। भारतीय कॉर्पोरेट गवर्नेंस बहस में भी यह विचार तेजी से महत्व पा रहा है कि disclosure केवल मात्रा का प्रश्न नहीं, गुणवत्ता का भी प्रश्न है।

यदि यह मॉडल सफल होता है, तो कोरिया के लिए इसका महत्व केवल इतना नहीं होगा कि बायो-फार्मा सेक्टर के खुलासे साफ हो जाएंगे। इससे यह भी तय होगा कि को스닥 आगे किस तरह का बाजार बनेगा—उत्साह और अनिश्चितता के सहारे चलने वाला, या पारदर्शी जोखिम-आधारित मूल्यांकन वाला। यही कारण है कि इस कदम को एक प्रशासनिक सुधार से ज्यादा, बाजार की भाषा और संस्कृति बदलने के प्रयास के रूप में पढ़ा जाना चाहिए।

भारत में भी, जहां निवेशक आधार तेजी से फैल रहा है और जटिल क्षेत्रों में भागीदारी बढ़ रही है, यह बहस बेहद प्रासंगिक है। आखिरकार पूंजी बाजार का स्वास्थ्य केवल इस पर नहीं निर्भर करता कि कितनी कंपनियां सूचीबद्ध हैं, बल्कि इस पर भी कि वे अपने निवेशकों से कैसी भाषा में संवाद करती हैं। अगर बाजार आम निवेशक को केवल सपने दिखाए और जोखिम छोटे अक्षरों में छुपाए, तो भरोसा टिकता नहीं। लेकिन यदि वह अवसर और खतरे दोनों को बराबर स्पष्ट करे, तो पूंजी का प्रवाह अधिक स्थिर, अधिक न्यायपूर्ण और अधिक परिपक्व हो सकता है। दक्षिण कोरिया फिलहाल इसी मोड़ पर खड़ा दिखता है—और वहां उठे सवाल एशिया के दूसरे बाजारों, भारत सहित, के लिए भी अनसुने नहीं किए जा सकते।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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