
घटती संख्या, बदलता संकेत
दक्षिण कोरिया से एक अहम सामाजिक संकेत सामने आया है। वहाँ विदेश के विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले कोरियाई छात्रों की संख्या घटकर लगभग 1.2 लाख रह गई है, जो महामारी से पहले के स्तर का करीब आधा बताई जा रही है। पहली नज़र में यह सिर्फ शिक्षा से जुड़ा आँकड़ा लग सकता है, लेकिन असल में यह कोरियाई समाज के भीतर चल रहे बड़े बदलावों की खिड़की खोलता है। कभी विदेश में पढ़ाई कोरिया के महत्वाकांक्षी मध्यवर्ग और उच्च-मध्यवर्ग के लिए सामाजिक उन्नति, बेहतर करियर, वैश्विक पहचान और प्रतिष्ठा का रास्ता मानी जाती थी। अब वही रास्ता संकरा होता दिख रहा है।
भारतीय पाठकों के लिए इसे समझना कठिन नहीं है। भारत में भी एक दौर था—और अब भी काफी हद तक है—जब विदेश में पढ़ाई, खासकर अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा या ऑस्ट्रेलिया जाना, सिर्फ डिग्री नहीं बल्कि ‘स्टेटस’, ‘नेटवर्क’ और भविष्य की सुरक्षा का पैकेज माना जाता था। महानगरों के परिवारों में यह उतना ही बड़ा निर्णय होता है जितना घर खरीदना या पारिवारिक कारोबार शुरू करना। कोरिया में आज जो परिघटना दिख रही है, वह हमें अपने यहाँ की बहसों की भी याद दिलाती है: क्या विदेशी डिग्री अभी भी उतनी ही उपयोगी है? क्या उसका खर्च वाजिब है? और क्या वैश्विक अनुभव अब भी वही सामाजिक सीढ़ी है, जो पहले हुआ करती थी?
कोरिया का यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वहाँ शिक्षा सिर्फ व्यक्तिगत पसंद नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा की परियोजना का हिस्सा रही है। कोरियाई समाज में ‘शिक्षा के जरिए ऊपर उठना’ एक गहरे सामाजिक विश्वास की तरह मौजूद रहा है। वहाँ कठोर परीक्षा-प्रणाली, निजी ट्यूशन संस्कृति और श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की होड़ लंबे समय से जीवन-योजना का केंद्र रही है। ऐसे समाज में विदेश-शिक्षा का तेज़ी से गिरना यह बताता है कि परिवारों की आर्थिक क्षमता, युवाओं का आत्मविश्वास और वैश्विक अवसरों का अर्थ—तीनों एक साथ बदल रहे हैं।
इसलिए यह कहानी सिर्फ इतनी नहीं है कि कम छात्र विदेश जा रहे हैं। असली कहानी यह है कि अब विदेश जाना पहले जैसा सीधा, स्वाभाविक या आकर्षक विकल्प नहीं रह गया। और जब किसी समाज में शिक्षा की सबसे महंगी और प्रतिष्ठित राह कमजोर पड़ने लगे, तो उसका असर नौकरी, सामाजिक गतिशीलता, वर्ग-भेद और राष्ट्रीय प्रतिभा-संसाधन तक पहुँचता है।
महामारी खत्म हुई, लेकिन असर क्यों नहीं गया?
कोविड-19 महामारी ने दुनिया भर की छात्र-आवाजाही को झटका दिया था, लेकिन कोरिया में इसका असर केवल अस्थायी व्यवधान तक सीमित नहीं रहा। महामारी के दौरान सीमाएँ बंद हुईं, वीज़ा प्रक्रियाएँ अटक गईं, विश्वविद्यालयों ने ऑनलाइन कक्षाओं का सहारा लिया और विदेश में रहकर पढ़ाई करने का बुनियादी तर्क ही कमजोर पड़ गया। जब छात्र हज़ारों किलोमीटर दूर जाकर लैपटॉप पर वही कक्षा सुन रहे थे, जो वे सियोल या बुसान में बैठकर भी सुन सकते थे, तो परिवारों ने स्वाभाविक रूप से सवाल उठाया: इतना खर्च किसलिए?
लेकिन असली बात यह है कि महामारी के बाद भी माँग पहले जैसी नहीं लौटी। इसका कारण सिर्फ पुरानी रुकावटों का असर नहीं, बल्कि मानसिकता में आया स्थायी बदलाव है। कोरिया के छात्र और अभिभावक अब विदेशी डिग्री को अपने-आप में अंतिम लक्ष्य नहीं मान रहे। वे अब अधिक व्यवहारिक ढंग से सोच रहे हैं—कितना खर्च होगा, कितने साल लगेंगे, नौकरी कहाँ मिलेगी, वीज़ा नियम कितने स्थिर हैं, और निवेश की वापसी क्या होगी। यह वही बदलाव है जो भारत में भी दिखाई देता है, जहाँ परिवार अब सिर्फ ‘बेटा विदेश चला गया’ वाली भावनात्मक उपलब्धि से संतुष्ट नहीं होते, बल्कि पूछते हैं: पढ़ाई के बाद नौकरी मिलेगी या नहीं, पीआर या वर्क परमिट का रास्ता स्पष्ट है या नहीं, और लोन कैसे चुकाया जाएगा?
महामारी ने अनिश्चितता की आदत भी पैदा की। जिन परिवारों ने उस दौर में दाख़िला टलते देखा, टिकट कैंसिल होते देखे, अचानक वापसी का संकट झेला या ऑनलाइन पढ़ाई के बावजूद भारी शुल्क भरा, वे दोबारा उसी राह पर जल्दी विश्वास नहीं कर पा रहे। शिक्षा अब भावनात्मक निवेश कम और जोखिम प्रबंधन का विषय अधिक बन गई है।
कोरिया में यह परिवर्तन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि वहाँ की युवा पीढ़ी पहले से ही नौकरी की प्रतिस्पर्धा, महँगे आवास, धीमी आर्थिक वृद्धि और सामाजिक दबाव के बीच जी रही है। ऐसे में विदेश-शिक्षा जैसी दीर्घकालिक और महँगी परियोजना, जो कभी ‘भविष्य में बढ़त’ का वादा करती थी, अब कई युवाओं को ‘बहुत जोखिम वाला दाँव’ लगने लगी है। भारत के शहरी युवाओं की तरह, कोरिया के छात्र भी अब पूछ रहे हैं—क्या डिग्री से ज्यादा ज़रूरी कौशल, अनुभव और लचीले अवसर नहीं हैं?
महँगी फीस, कमजोर मुद्रा और मध्यवर्ग की दुविधा
विदेश में पढ़ाई घटने का सबसे सीधा कारण लागत है। कोरिया में भी यही सबसे बड़ा कारक माना जा रहा है। विश्वविद्यालय की फीस बढ़ रही है, छात्रावास और किराये का खर्च ऊपर है, भोजन और परिवहन महँगे हुए हैं, और यदि स्थानीय मुद्रा कमजोर हो, तो कुल व्यय और तेज़ी से बढ़ता है। परिवारों के लिए यह कोई एकबारगी खर्च नहीं, बल्कि कई वर्षों तक चलने वाला भारी वित्तीय दायित्व है।
भारतीय परिवार इस तनाव को भली-भाँति समझते हैं। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद या पुणे के अनगिनत परिवार विदेशी विश्वविद्यालयों की फीस, रहने-खाने के खर्च, स्वास्थ्य बीमा, हवाई यात्रा और मुद्रा विनिमय की मार से जूझते रहे हैं। कोरिया में आज जो स्थिति दिख रही है, वह हमें याद दिलाती है कि शिक्षा का वैश्वीकरण हमेशा अवसर का पर्याय नहीं होता; वह अक्सर असमानता को भी तेज़ करता है। जिन परिवारों के पास पर्याप्त संपत्ति है, उनके लिए विकल्प खुले रहते हैं। लेकिन मध्यवर्ग के लिए थोड़ी-सी मुद्रा अस्थिरता या आय में गिरावट पूरे सपने को बदल सकती है।
कोरियाई शिक्षा क्षेत्र के विश्लेषक यह मान रहे हैं कि विदेश-शिक्षा की माँग पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, बल्कि अब वह ‘छँट’ रही है। यानी वे छात्र अभी भी जा रहे हैं जिनके पास बहुत स्पष्ट लक्ष्य हैं—जैसे किसी विशेष शोध क्षेत्र में विशेषज्ञता, अंतरराष्ट्रीय पेशेवर लाइसेंस, शीर्ष विश्वविद्यालय का ब्रांड, या विदेश में नौकरी का ठोस अवसर। लेकिन वे छात्र कम हो रहे हैं जो पहले ‘प्रोफाइल बेहतर करने’ या ‘अनुभव लेने’ के लिए जाते थे। यह बदलाव बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे विदेश-शिक्षा का चरित्र बदल जाता है: वह व्यापक सामाजिक सीढ़ी नहीं, बल्कि चुनिंदा और महँगा निवेश बन जाती है।
यही वह बिंदु है जहाँ यह मुद्दा सामाजिक न्याय का रूप लेता है। जब शिक्षा के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय अनुभव हासिल करने का अवसर केवल संपन्न वर्ग तक सीमित होने लगे, तो समाज में वर्ग-आधारित अंतर और तीखे हो सकते हैं। कोरिया के संदर्भ में यह चिंता वास्तविक है, और भारत में भी यह प्रश्न उतना ही प्रासंगिक है। क्या वैश्विक exposure केवल उन्हीं के लिए रहेगा जिनके माता-पिता करोड़ों की योजना बना सकते हैं? अगर हाँ, तो ‘मेरिट’ की बहस कितनी निष्पक्ष रह जाएगी?
क्या विदेशी डिग्री की चमक फीकी पड़ रही है?
कोरिया में एक और महत्वपूर्ण बदलाव दिख रहा है: नौकरी-बाज़ार में विदेशी डिग्री की पारंपरिक चमक कम होती प्रतीत हो रही है। पहले विदेश से पढ़कर लौटना कई क्षेत्रों में स्पष्ट प्रतिस्पर्धात्मक लाभ माना जाता था। अब कंपनियाँ और संस्थान अधिक व्यावहारिक कौशल, समस्या-समाधान क्षमता, भाषा दक्षता, इंटर्नशिप, परियोजना अनुभव और वास्तविक कार्य-योग्यता पर जोर दे रहे हैं।
यह बदलाव भारत से भी मेल खाता है। हमारे यहाँ भी आईटी, स्टार्टअप, डिज़ाइन, मीडिया, डेटा, डिजिटल मार्केटिंग और यहां तक कि कई कॉरपोरेट भूमिकाओं में नियोक्ता अब सिर्फ डिग्री का नाम नहीं देखते; वे यह देखते हैं कि उम्मीदवार ने किया क्या है। किस प्रोजेक्ट पर काम किया, टीम में कैसे काम किया, तकनीकी कौशल क्या हैं, और बदलती परिस्थितियों में खुद को कितना ढाला। विदेशी डिग्री अब भी मूल्यवान है, लेकिन वह स्वतः सफलता की गारंटी नहीं रही।
कोरिया में इसी वजह से छात्र दीर्घकालिक विदेश-शिक्षा के बजाय अन्य रास्ते खोज रहे हैं—जैसे कम अवधि के एक्सचेंज कार्यक्रम, ऑनलाइन अंतरराष्ट्रीय पाठ्यक्रम, विदेशी इंटर्नशिप, संयुक्त डिग्री कार्यक्रम, या घरेलू विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए अंतरराष्ट्रीय exposure हासिल करना। यह अपने आप में नकारात्मक बदलाव नहीं है। तकनीक और शिक्षा के नए प्रारूपों ने वैश्विक अनुभव के अनेक रास्ते खोले हैं। लेकिन समस्या यह है कि इन वैकल्पिक रास्तों तक पहुँच भी सभी के लिए समान नहीं होती। किसे सही जानकारी है, किसे बेहतर मार्गदर्शन मिलता है, कौन आवेदन प्रक्रिया समझता है, और किसके पास भाषा-कौशल है—ये सब नए प्रकार की असमानता पैदा कर सकते हैं।
कोरिया में यही चिंता उभर रही है कि विदेश-शिक्षा का पारंपरिक मॉडल भले कम हो रहा हो, पर उसकी जगह जो नया मॉडल ले रहा है, वह भी समान अवसर नहीं देता। भारतीय संदर्भ में यह हमें कोचिंग, करियर-काउंसलिंग, निजी सलाहकारों और लिंक्डइन-आधारित पेशेवर नेटवर्किंग की दुनिया की याद दिलाता है—जहाँ जानकारी ही पूँजी बन जाती है।
इसलिए विदेशी डिग्री की चमक कम होना एक तरफ़ यथार्थवादी बदलाव है, लेकिन दूसरी तरफ़ यह भी सवाल उठाता है कि क्या हम शिक्षा का मूल्य बहुत संकीर्ण आर्थिक पैमानों से मापने लगे हैं। विदेश में पढ़ाई का अर्थ केवल नौकरी नहीं होता; वह शोध संस्कृति, बहुसांस्कृतिक समझ, आत्मनिर्भरता, और लंबी अवधि के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क भी देती है। यदि समाज केवल तात्कालिक ‘रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट’ के आधार पर फैसले लेने लगे, तो दूरगामी बौद्धिक क्षमताएँ कमजोर पड़ सकती हैं।
युवा पीढ़ी की नई रणनीति: लंबे कोर्स से छोटे, लचीले रास्तों की ओर
कोरिया के युवाओं की करियर-रणनीति में भी स्पष्ट बदलाव दिखाई दे रहा है। अब वे विदेश जाने को जीवन का अनिवार्य पड़ाव नहीं, बल्कि उपलब्ध विकल्पों में एक विकल्प भर मान रहे हैं। यदि घरेलू विश्वविद्यालय में बेहतर शोध-अवसर मिल जाएँ, या स्थानीय नौकरी-बाज़ार में जल्दी प्रवेश संभव हो, तो वे कई साल और करोड़ों रुपये जैसी लागत वाला विदेश-शिक्षा मॉडल छोड़ने को तैयार हैं।
यह प्रवृत्ति भारत में भी तेजी से उभर रही है। एक बड़ी संख्या में छात्र अब यह सोचते हैं कि क्या वे भारत में स्नातक या स्नातकोत्तर कर, फिर कुछ विशेष अंतरराष्ट्रीय सर्टिफिकेट, सेमेस्टर-अब्रॉड, ऑनलाइन वैश्विक पाठ्यक्रम या अल्पकालिक प्रशिक्षण से वही लाभ प्राप्त कर सकते हैं। कुछ छात्रों के लिए यह व्यावहारिक और बुद्धिमत्तापूर्ण विकल्प है। खासकर ऐसे समय में जब कौशल-आधारित नौकरियाँ बढ़ रही हैं, उद्यमिता का आकर्षण बढ़ा है, और स्टार्टअप संस्कृति ने पारंपरिक डिग्री-क्रम को चुनौती दी है।
लेकिन कोरिया की कहानी यह भी बताती है कि हर विकल्प अपने साथ सामाजिक लागत लेकर आता है। यदि बड़ी संख्या में युवा जोखिम से बचने लगें, तो समाज में दीर्घकालिक वैश्विक प्रतिभा-निर्माण प्रभावित हो सकता है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, सार्वजनिक नीति, स्वास्थ्य, कला, अंतरराष्ट्रीय संबंध और शोध जैसे क्षेत्रों में लंबे समय के अंतरराष्ट्रीय अनुभव का अलग महत्व होता है। इन्हें सिर्फ ऑनलाइन मॉड्यूल या अल्पकालिक कार्यक्रमों से पूरी तरह नहीं बदला जा सकता।
कोरिया के लिए यह विशेष रूप से अहम है क्योंकि वह निर्यात-आधारित, तकनीक-केंद्रित और वैश्विक प्रतिस्पर्धा वाला देश है। ऐसी अर्थव्यवस्था को ऐसे लोगों की जरूरत होती है जो बहुराष्ट्रीय परिवेश में सहज हों, वैश्विक शोध-संवाद समझते हों और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से जुड़ सकें। यदि विदेश-शिक्षा की राह बहुत महँगी और जोखिमपूर्ण हो जाए, तो भविष्य में ऐसी प्रतिभा का आधार सिकुड़ सकता है।
भारतीय दृष्टि से देखें तो यह बहस हमारे लिए भी परिचित है। हम अक्सर कहते हैं कि देश में प्रतिभा है, अवसर बढ़ रहे हैं, और सबको विदेश जाने की आवश्यकता नहीं। यह बात काफी हद तक सही है। लेकिन साथ ही यह भी सच है कि दुनिया से गहरे जुड़ाव, उच्च स्तरीय शोध-नेटवर्क और अंतरराष्ट्रीय अकादमिक परिसंचरण के बिना कोई भी देश लंबे समय तक ज्ञान-नेतृत्व का दावा नहीं कर सकता। इसलिए कोरिया की यह स्थिति हमें अपनी उच्च शिक्षा की प्राथमिकताओं पर भी विचार करने का अवसर देती है।
घरेलू विश्वविद्यालयों और शिक्षा-बाज़ार पर असर
यदि कम छात्र विदेश जाते हैं, तो पहली नज़र में घरेलू विश्वविद्यालयों को लाभ मिल सकता है। कोरिया में भी यह संभावना देखी जा रही है कि बेहतर छात्र देश के भीतर ही मास्टर्स, पीएचडी या विशेष पेशेवर कार्यक्रमों की ओर रुख करें। इससे स्थानीय विश्वविद्यालयों में प्रतिभा टिक सकती है, शोध-समूहों को बेहतर विद्यार्थी मिल सकते हैं और कुछ क्षेत्रों में अकादमिक ऊर्जा बढ़ सकती है।
लेकिन यह लाभ स्वतः नहीं मिलेगा। केवल इतना काफी नहीं कि छात्र विदेश न जाएँ; ज़रूरी यह है कि देश के विश्वविद्यालय उस स्तर का वातावरण दें, जिसकी तलाश में छात्र कभी विदेश जाते थे। यानी बेहतर प्रयोगशालाएँ, अंतरराष्ट्रीय शोध-सहयोग, उच्च गुणवत्ता वाली फैकल्टी, पारदर्शी प्रवेश, व्यावहारिक पाठ्यक्रम, और वैश्विक exposure के विकल्प। यदि ये नहीं मिलते, तो छात्र देश में रहकर भी असंतोष महसूस करेंगे और शिक्षा-व्यवस्था पर दबाव बढ़ेगा।
कोरिया में एक और असर शिक्षा-सेवा उद्योग पर पड़ सकता है—जैसे विदेशी प्रवेश सलाहकार, भाषा प्रशिक्षण संस्थान, परीक्षा तैयारी बाज़ार, वीज़ा सहायता और अध्ययन-अभियान से जुड़े कारोबारी ढाँचे। यदि दीर्घकालिक विदेश-शिक्षा घटती है, तो यह पूरा बाज़ार खुद को नए रूप में ढालने को मजबूर होगा। संभव है कि उसका केंद्र लंबे डिग्री कार्यक्रमों से हटकर एक्सचेंज, लघु पाठ्यक्रम, नौकरी-लिंक्ड प्रशिक्षण और अंतरराष्ट्रीय इंटर्नशिप की तैयारी की ओर चले जाए। भारत में भी ऐसे बदलाव देखने को मिल रहे हैं, जहाँ पारंपरिक ‘स्टडी अब्रॉड’ मॉडल के साथ-साथ कौशल, माइक्रो-क्रेडेंशियल और अल्पकालिक गतिशीलता का बाजार बढ़ रहा है।
इस पूरे परिदृश्य में क्षेत्रीय और वर्गीय असमानता भी बड़ा प्रश्न है। कोरिया में महानगरीय और गैर-महानगरीय इलाकों, सामान्य स्कूलों और विशिष्ट प्रतिष्ठित स्कूलों, तथा आय-आधारित परिवारों के बीच जानकारी और तैयारी की क्षमता में अंतर पहले से मौजूद है। विदेश-शिक्षा के घटते अवसर इन अंतरों को और स्पष्ट कर सकते हैं। भारत में भी यही स्थिति है—जहाँ दिल्ली-मुंबई-बेंगलुरु के विद्यार्थियों की तुलना में छोटे शहरों और कस्बों के छात्रों के सामने सूचना, मार्गदर्शन, भाषा और संसाधनों की चुनौतियाँ कहीं अधिक गहरी हैं।
नीति की चुनौती: सिर्फ ‘विदेश जाओ’ या ‘मत जाओ’ का सवाल नहीं
कोरिया के विशेषज्ञ इस गिरावट को किसी एक कारण से नहीं जोड़ रहे। महामारी, वीज़ा अनिश्चितता, बढ़ी हुई लागत, मुद्रा विनिमय का दबाव, नौकरी-बाज़ार की बदलती प्राथमिकताएँ, और घरेलू विकल्पों की बढ़ती स्वीकार्यता—ये सभी कारण एक साथ काम कर रहे हैं। इसलिए समाधान भी किसी एक नारे में नहीं छिपा है। यह कहना आसान है कि सरकार को विदेशी शिक्षा को प्रोत्साहन देना चाहिए, या उलटे यह कहना कि छात्रों को देश में ही रहना चाहिए। लेकिन वास्तविक चुनौती इससे कहीं जटिल है।
नीति-निर्माताओं के सामने पहला काम यह है कि घरेलू उच्च शिक्षा को इतना मजबूत बनाया जाए कि छात्र ‘मजबूरी में रुकने’ के बजाय ‘विश्वास के साथ चुनने’ की स्थिति में हों। दूसरा, अंतरराष्ट्रीय exposure के अधिक न्यायपूर्ण रास्ते बनाए जाएँ—जैसे विनिमय कार्यक्रम, संयुक्त शोध, छात्रवृत्ति, लघु-कालिक अध्ययन, विदेश-इंटर्नशिप और डिजिटल सहयोग। तीसरा, आर्थिक सहायता और सूचना-सुलभता के जरिए यह सुनिश्चित किया जाए कि वैश्विक अवसर सिर्फ अमीर तबकों का विशेषाधिकार न बनें।
कोरिया के लिए यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि वहाँ जनसंख्या-संकुचन, युवाओं की घटती संख्या और वैश्विक प्रतिस्पर्धा तीनों बड़े प्रश्न हैं। यदि युवा कम होते जाएँ और उनमें से भी कम लोग वैश्विक अनुभव हासिल कर पाएँ, तो दीर्घकाल में देश की नवाचार-क्षमता प्रभावित हो सकती है। भारत में स्थिति अलग है—हमारे पास विशाल युवा आबादी है—लेकिन चुनौती समान है: संख्या अपने-आप गुणवत्ता या वैश्विक नेतृत्व में नहीं बदलती। उसके लिए मजबूत संस्थान, अवसरों की समानता और दीर्घकालिक शिक्षा-नीति चाहिए।
कोरिया की यह कहानी भारतीय पाठकों के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमें एक बुनियादी सच याद दिलाती है। विदेश-शिक्षा पर बहस सिर्फ ‘ब्रेन ड्रेन’ बनाम ‘ब्रेन गेन’ की नहीं है। यह उस सामाजिक ढाँचे की बहस है जिसमें परिवार अपने बच्चों के भविष्य का सपना देखते हैं, शिक्षा पर पैसा लगाते हैं, जोखिम उठाते हैं और बदलती दुनिया के हिसाब से अपने निर्णयों को पुनर्गठित करते हैं। आज कोरिया में विदेश-शिक्षा की राह संकरी हुई है; कल यही सवाल किसी और समाज के सामने हो सकता है—और कुछ रूपों में वह भारत के सामने पहले से मौजूद है।
अंततः, विदेश-शिक्षा में गिरावट को केवल निराशा या विफलता की कहानी मानना अधूरा होगा। यह बदलती प्राथमिकताओं, नई आर्थिक वास्तविकताओं और युवाओं की अधिक गणनात्मक सोच की कहानी भी है। लेकिन यदि यह बदलाव सामाजिक गतिशीलता को सीमित कर दे, अंतरराष्ट्रीय अनुभव को केवल धनी वर्ग का अधिकार बना दे, और दीर्घकालिक ज्ञान-निर्माण को कमजोर करे, तो यह चेतावनी है। कोरिया का मौजूदा अनुभव हमें यही बता रहा है: शिक्षा के रास्ते जब महँगे और अनिश्चित होते जाते हैं, तब समाज के सपनों का भूगोल भी बदल जाता है।
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