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दुर्घटनाएं घटीं, मौतें बढ़ीं: कोरिया की सड़कों से उठता वह सवाल जो भारत को भी अभी सुनना चाहिए

दुर्घटनाएं घटीं, मौतें बढ़ीं: कोरिया की सड़कों से उठता वह सवाल जो भारत को भी अभी सुनना चाहिए

घटती दुर्घटनाएं, बढ़ती मौतें: आंकड़ों का यह विरोधाभास क्या कहता है

दक्षिण कोरिया से आई एक ताजा सामाजिक रिपोर्ट ने सड़क सुरक्षा पर बहस को नया मोड़ दे दिया है। 17 अप्रैल 2026 को जारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले वर्ष देश में कुल सड़क दुर्घटनाओं की संख्या घटी, लेकिन इन दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या उलटे बढ़ गई। सालाना सड़क हादसों में मरने वालों का आंकड़ा 2549 तक पहुंच गया। इसी दौरान बुजुर्ग चालकों से जुड़े मौत के मामलों में भी 10.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। पहली नजर में यह एक साधारण सांख्यिकीय विसंगति लग सकती है, लेकिन वास्तव में यह उस गहरे सामाजिक बदलाव की ओर इशारा करती है, जिसे केवल यातायात नियमों के उल्लंघन या ड्राइविंग कौशल की कमी से नहीं समझा जा सकता।

अब तक अधिकतर सरकारें, और सिर्फ कोरिया ही नहीं बल्कि भारत समेत दुनिया के कई देश, सड़क सुरक्षा को मुख्य रूप से दुर्घटनाओं की कुल संख्या के आधार पर मापते रहे हैं। कितनी टक्करें हुईं, कितने वाहन भिड़े, कितने चालान कटे, कितनी शराब पीकर गाड़ी चलाने की घटनाएं पकड़ी गईं—नीतियों का फोकस अक्सर इन्हीं सवालों पर टिका रहा है। लेकिन यदि दुर्घटनाएं कम हो रही हों और मौतें फिर भी बढ़ रही हों, तो इसका अर्थ साफ है: असली समस्या केवल हादसों की आवृत्ति नहीं, बल्कि उनकी घातकता है। दूसरे शब्दों में, सड़क सुरक्षा की बहस अब ‘कितनी दुर्घटनाएं हुईं’ से आगे बढ़कर ‘जो दुर्घटनाएं हुईं, वे कितनी जानलेवा साबित हुईं’ तक पहुंच चुकी है।

भारतीय पाठकों के लिए यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हमारे यहां भी सड़क सुरक्षा पर चर्चा अक्सर हेलमेट, सीट बेल्ट और चालान के दायरे में सीमित रह जाती है। जबकि एक समाज के बूढ़ा होने, छोटे शहरों में कार निर्भरता बढ़ने और पैदल यात्रियों के असुरक्षित होने जैसे बड़े ढांचागत कारण अक्सर नीति बहस से बाहर रह जाते हैं। कोरिया की यह कहानी दरअसल केवल कोरिया की कहानी नहीं है; यह उन सभी समाजों की कहानी है जो तेजी से बदलती जनसंख्या संरचना के बीच पुरानी सड़क व्यवस्था के सहारे चल रहे हैं।

कोरिया का संदर्भ: तेज आधुनिकता के बीच बूढ़ा होता समाज

दक्षिण कोरिया को अक्सर तकनीक, आधुनिक अवसंरचना, अनुशासित शहरी जीवन और उच्च जीवन स्तर वाले देश के रूप में देखा जाता है। के-पॉप, के-ड्रामा, सियोल की चमकदार सड़कों और तेज रफ्तार डिजिटल संस्कृति के बीच एक और कोरिया भी है—तेजी से बूढ़ा होता कोरिया। वहां कम जन्म दर और लंबी जीवन प्रत्याशा ने आबादी की उम्र संरचना को बदल दिया है। इसका असर सिर्फ अस्पतालों, पेंशन या पारिवारिक संरचना पर नहीं पड़ा, बल्कि सड़क पर चलने वाले हर व्यक्ति पर पड़ा है—चालक, पैदल यात्री, साइकिल सवार, बस का इंतजार करते बुजुर्ग, और रात में सड़क पार करने वाले लोग, सभी पर।

कोरियाई समाज में बुजुर्गों का सम्मान एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक मूल्य है। कन्फ्यूशियस परंपरा से प्रभावित सामाजिक ढांचे में उम्र के साथ मान-सम्मान और सामाजिक गरिमा का रिश्ता गहरा है। यही कारण है कि वहां बुजुर्ग चालकों को लेकर बहस केवल सुरक्षा का प्रश्न नहीं रहती; वह सम्मान, स्वायत्तता और रोजमर्रा की गरिमा से भी जुड़ जाती है। भारत में जैसे परिवार के बड़े सदस्य को गाड़ी चलाना छोड़ने के लिए कहना कई बार भावनात्मक और सामाजिक रूप से कठिन होता है, वैसे ही कोरिया में भी ड्राइविंग छोड़ना सिर्फ एक कौशल का त्याग नहीं, बल्कि स्वतंत्र जीवन के एक हिस्से को छोड़ना माना जा सकता है।

यहां यह समझना जरूरी है कि कोरिया में समस्या केवल ‘बुजुर्ग गाड़ी चला रहे हैं’ तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट साफ बताती है कि सड़क पर मौजूद आबादी की औसत उम्र बढ़ रही है। यानी अगर टक्कर होती भी है तो उससे मरने का जोखिम उम्रदराज शरीर के लिए ज्यादा है। एक ही झटका युवा व्यक्ति को गंभीर चोट देकर छोड़ सकता है, जबकि वही झटका बुजुर्ग के लिए घातक साबित हो सकता है। इस तरह सड़क जोखिम का अर्थ बदल जाता है। सड़क पर खतरा अब केवल टक्कर की तीव्रता से नहीं, बल्कि उस टक्कर को झेलने वाले शरीर की नाजुकता से भी तय हो रहा है।

भारत में भी यह विमर्श धीरे-धीरे प्रासंगिक होता जा रहा है। हमारी आबादी अभी अपेक्षाकृत युवा है, लेकिन शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में वरिष्ठ नागरिकों की संख्या बढ़ रही है। परिवार छोटे हो रहे हैं, बुजुर्ग अधिक समय तक स्वतंत्र रहना चाहते हैं, और निजी वाहनों पर निर्भरता बढ़ रही है। ऐसे में कोरिया के अनुभव को भविष्य की चेतावनी की तरह पढ़ा जाना चाहिए।

समस्या सिर्फ बुजुर्ग चालक नहीं, पूरी सड़क व्यवस्था की उम्र बढ़ना है

सड़क सुरक्षा की बहस में सबसे आसान प्रतिक्रिया होती है—दोषी ढूंढो। अगर बुजुर्ग चालक से जुड़े मौत के मामले बढ़े हैं तो क्या समस्या सिर्फ वही हैं? रिपोर्ट का बड़ा निष्कर्ष यही है कि ऐसा सोचना अधूरा और कई बार भ्रामक होगा। सड़क की उम्र बढ़ रही है, सिर्फ चालक की नहीं। पैदल चलने वाले लोग भी उम्रदराज हैं, साइकिल चलाने वाले भी, बस अड्डों तक जाने वाले भी और बाजार, अस्पताल, सरकारी दफ्तर तक आने-जाने वाले भी। इसलिए यह कहना कि खतरा केवल किसी खास आयु वर्ग का है, वास्तविकता को बहुत संकीर्ण कर देना होगा।

दरअसल यहां दो चीजों को अलग-अलग समझने की जरूरत है—दुर्घटना होने की संभावना और दुर्घटना के परिणाम की घातकता। कोई व्यक्ति उम्रदराज होने के कारण थोड़ी धीमी प्रतिक्रिया दे सकता है, लेकिन यह कहानी का केवल एक हिस्सा है। दूसरा हिस्सा यह है कि वही व्यक्ति यदि दुर्घटना में घायल होता है तो उसके लिए बचना अधिक कठिन हो सकता है। हड्डियां कमजोर, रिकवरी धीमी, पहले से मौजूद बीमारियां अधिक, और आपातकालीन चिकित्सा तक पहुंच के बीच समय का असर ज्यादा—ये सभी कारक किसी हादसे को मौत में बदल सकते हैं।

भारतीय संदर्भ में भी इसे समझना जरूरी है। हमारे शहरों में अक्सर फुटओवर ब्रिज ऊंचे होते हैं, जेब्रा क्रॉसिंग धुंधली होती है, रेड लाइट पर पैदल चलने का समय कम होता है, और रात में कई कॉलोनियों तथा उपनगरीय सड़कों पर रोशनी पर्याप्त नहीं होती। ये समस्याएं हर किसी के लिए असुविधाजनक हैं, लेकिन बुजुर्गों, बच्चों, दिव्यांगों और रात की शिफ्ट से लौटते मजदूरों के लिए जानलेवा बन सकती हैं। यही बात कोरिया की रिपोर्ट जोर देकर कहती है: जो सड़क बुजुर्ग के लिए सुरक्षित नहीं, वह अंततः किसी के लिए भी सचमुच सुरक्षित नहीं है।

इसीलिए यह बहस ‘अयोग्य चालक’ बनाम ‘अनुशासित चालक’ की नहीं, बल्कि ‘मानव-केंद्रित सड़क’ बनाम ‘वाहन-केंद्रित सड़क’ की है। लंबे समय तक आधुनिकता का मतलब तेज, चौड़ी और कार-प्रमुख सड़कें माना गया। अब उम्रदराज समाज बता रहा है कि तेज रफ्तार और दक्षता हमेशा सुरक्षा की गारंटी नहीं होते। कभी-कभी अधिक सरल, अधिक रोशन, अधिक धीमी और अधिक अनुमानित सड़कें ही बेहतर सार्वजनिक नीति होती हैं।

2549 मौतों का अर्थ: कम हादसों के दौर में भी क्यों बढ़ती है जानलेवा कीमत

2549 मौतों का आंकड़ा सिर्फ एक वार्षिक रिपोर्ट की पंक्ति नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि कोरिया शायद ‘बहुत सारे हादसों वाले दौर’ से निकलकर ‘कम लेकिन अधिक जानलेवा हादसों वाले दौर’ में प्रवेश कर चुका है। यानी टक्करों की संख्या घट सकती है, लेकिन एक बार हादसा होने पर उसके गंभीर या घातक होने की संभावना बढ़ रही है। यह परिवर्तन सड़क नीति की भाषा बदलने की मांग करता है।

ऐसा क्यों हो रहा होगा? इसके कई स्तर हो सकते हैं। पहला, उम्रदराज आबादी के कारण दुर्घटना का परिणाम अधिक गंभीर हो रहा है। दूसरा, छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में निजी वाहन पर निर्भरता ज्यादा है, जहां सार्वजनिक परिवहन सीमित होने के कारण बुजुर्गों के पास ड्राइविंग जारी रखने के अलावा विकल्प कम हैं। तीसरा, कम गति वाले हादसे भी उम्रदराज शरीर पर अधिक गंभीर असर डाल सकते हैं। चौथा, सड़क डिजाइन यदि जटिल हो—जैसे उलझे चौराहे, जल्दी बदलते सिग्नल, कमजोर रात्री दृश्यता—तो गलती की कीमत बढ़ जाती है।

भारत में भी कमोबेश यही संरचनात्मक खतरे मौजूद हैं। किसी महानगर में सार्वजनिक परिवहन और कैब सेवाओं की उपलब्धता एक बुजुर्ग व्यक्ति को वाहन न चलाने का विकल्प दे सकती है, लेकिन जिला मुख्यालय से दूर किसी कस्बे या गांव में यह विकल्प वैसा नहीं होता। वहां बाइक, स्कूटर या पुरानी कार सिर्फ सुविधा नहीं, जीवनरेखा होती है। अस्पताल, बैंक, राशन, मंडी, पेंशन कार्यालय—इन सब तक पहुंचने के लिए वाहन जरूरी हो सकता है। ऐसे में ड्राइविंग छोड़ना सुरक्षा का निर्णय जरूर हो सकता है, लेकिन साथ ही सामाजिक अलगाव और निर्भरता की शुरुआत भी बन सकता है।

यही वजह है कि कोरिया की रिपोर्ट व्यक्तिगत लापरवाही के बजाय संरचनात्मक कमजोरी पर जोर देती है। यदि समाज ऐसा बना हो जिसमें रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए वाहन अनिवार्य हो, पैदल बुनियादी ढांचा कमजोर हो, वैकल्पिक परिवहन उपलब्ध न हो, और सड़कें उम्रदराज शरीर को ध्यान में रखकर डिजाइन न की गई हों, तो दुर्घटना का जोखिम केवल व्यक्ति की गलती नहीं रह जाता। वह सार्वजनिक नीति की असफलता का हिस्सा बन जाता है।

सिर्फ लाइसेंस लौटाने की नीति क्यों अधूरी है

जब भी बुजुर्ग चालकों की चर्चा होती है, सबसे पहले जो सुझाव सामने आता है वह है—लाइसेंस सरेंडर कराइए। प्रशासनिक दृष्टि से यह सरल उपाय लगता है। आयु की एक सीमा तय कीजिए, प्रोत्साहन दीजिए, और बुजुर्गों को स्वेच्छा से ड्राइविंग छोड़ने के लिए प्रेरित कीजिए। कोरिया में भी यह रास्ता चर्चा में है। लेकिन रिपोर्ट के अनुसार, यह उपाय अपने आप में समाधान नहीं बन सकता। कारण साफ है: सड़क सुरक्षा और गतिशीलता का अधिकार एक-दूसरे से टकराते भी हैं और जुड़े भी हैं।

यदि ड्राइविंग छोड़ने के बाद व्यक्ति के पास अस्पताल जाने, दवा लाने, बाजार पहुंचने, सामाजिक संबंध बनाए रखने या काम पर जाने का विश्वसनीय विकल्प नहीं हो, तो लाइसेंस वापसी एक सुरक्षा नीति कम और जीवन-संकुचन की नीति ज्यादा लग सकती है। भारत में इसकी तुलना हम उन वरिष्ठ नागरिकों से कर सकते हैं जो उपनगरों, कॉलोनियों, छोटे कस्बों या गांवों में रहते हैं और जिनके लिए ऑटो, बस या मेट्रो जैसी सेवाएं रोजमर्रा की जरूरतों के लिए पर्याप्त नहीं होतीं। उनसे यह कहना कि सुरक्षा के लिए वाहन छोड़ दीजिए, तब तक व्यावहारिक नहीं जब तक हम यह न बताएं कि उसके बाद वे जिएंगे कैसे।

दूसरी बात, बुजुर्ग एक समान समूह नहीं हैं। 65 वर्ष की उम्र वाला हर व्यक्ति 80 वर्ष के व्यक्ति जैसी शारीरिक और मानसिक स्थिति में नहीं होता। कोई नियमित स्वास्थ्य जांच कराता है, दिन में सीमित दूरी चलाता है, रात में वाहन नहीं चलाता, और ट्रैफिक से बचकर ही बाहर निकलता है; जबकि दूसरा व्यक्ति ज्यादा जोखिमपूर्ण परिस्थितियों में ड्राइव कर सकता है। इसलिए केवल उम्र के आधार पर जोखिम तय करना कई बार वैज्ञानिक नहीं होता।

अधिक उपयोगी रास्ता यह हो सकता है कि आयु-आधारित प्रतिबंध की जगह फिटनेस-आधारित मूल्यांकन, नियमित परीक्षण, अनुकूलित ड्राइविंग प्रशिक्षण, वाहन में सहायक तकनीक और वैकल्पिक परिवहन सुविधाओं को साथ जोड़कर देखा जाए। जैसे भारत में कई बार केवल नियम बना देने से नहीं बल्कि नियम के पीछे की सुविधा और सामाजिक स्वीकार्यता से परिणाम आता है, वैसे ही कोरिया के लिए भी समाधान बहुस्तरीय होना होगा।

यानी प्रश्न यह नहीं कि ‘बुजुर्गों को ड्राइविंग से हटाया जाए या नहीं’; बल्कि यह कि ‘किसे, कब, किन शर्तों पर, किस समर्थन व्यवस्था के साथ सुरक्षित तरीके से सड़क उपयोग की अनुमति दी जाए।’ यही सोच सम्मान और सुरक्षा के बीच संतुलन बना सकती है।

पुलिस की सख्ती बनाम व्यापक सुधार: असली समाधान किस दिशा में है

रिपोर्ट के बाद कोरियाई पुलिस ने बुजुर्ग सुरक्षा उपाय मजबूत करने की बात कही है। यह एक महत्वपूर्ण संकेत है, क्योंकि इससे कम से कम यह स्पष्ट होता है कि मौतों में वृद्धि को सामान्य उतार-चढ़ाव मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा रहा। लेकिन ‘सख्ती’ का अर्थ क्या होगा—यह असली सवाल है। यदि इसका मतलब केवल ज्यादा चेतावनी, ज्यादा निगरानी और ज्यादा नियमन है, तो इससे कुछ हद तक राहत मिल सकती है, पर समस्या का मूल हल नहीं होगा।

सड़क सुरक्षा की नई समझ कहती है कि पुलिस कार्रवाई केवल एक हिस्सा है। उससे भी अधिक जरूरी है सड़क डिजाइन, रोशनी, संकेत व्यवस्था, पैदल पार-पथ, चौराहों की स्पष्टता, और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप परिवहन का विकास। मसलन, जहां बुजुर्गों की आबादी अधिक है वहां पैदल सिग्नल का समय बढ़ाना, सड़क पार करने के लिए बीच में सुरक्षित ठहराव बनाना, रात में रिफ्लेक्टिव मार्किंग और पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था सुनिश्चित करना, और जटिल दायां-बायां मोड़ कम करना—ये उपाय सीधे तौर पर जान बचा सकते हैं।

भारतीय शहरों में भी अक्सर यातायात सुधार का मतलब फ्लाईओवर, चौड़ी सड़क और तेज प्रवाह समझ लिया जाता है। लेकिन तेज वाहन प्रवाह कई बार पैदल चलने वालों और दोपहिया सवारों के लिए बड़ा खतरा बन जाता है। यदि कोरिया जैसे उन्नत अवसंरचना वाले देश को अब मानव-केंद्रित सड़कें बनाने की जरूरत महसूस हो रही है, तो भारत के लिए यह और भी बड़ा सबक है। हमारी सड़कें बच्चों, बुजुर्गों, साइकिल सवारों और दिव्यांगों के लिए कितनी सुरक्षित हैं—यह प्रश्न किसी भी स्मार्ट सिटी के दावे से ज्यादा महत्वपूर्ण होना चाहिए।

एक और महत्वपूर्ण पहलू क्षेत्रीय असमानता का है। राजधानी क्षेत्र और बड़े शहरों में नीति का असर अलग होगा, छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में अलग। कोरिया की तरह भारत में भी दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु या हैदराबाद जैसी जगहों की तुलना किसी दूरदराज जिले से नहीं की जा सकती। जहां मेट्रो, बस और ऐप-आधारित परिवहन उपलब्ध हैं, वहां लाइसेंस छोड़ना संभव विकल्प हो सकता है; लेकिन जहां दिन में दो बसें चलती हों, वहां वही नीति दंड जैसी महसूस होगी। इसलिए राष्ट्रीय स्तर की सड़क सुरक्षा नीति को स्थानीय जरूरतों के हिसाब से ढालना अनिवार्य है।

भारत के लिए सबक: उम्रदराज समाज, सुरक्षित सड़कें और नीति की नई भाषा

कोरिया का यह अनुभव भारत के नीति निर्माताओं, शहरी योजनाकारों, यातायात पुलिस, स्वास्थ्य तंत्र और समाज—सभी के लिए एक आईना है। हमें अभी से यह मानकर चलना होगा कि सड़क सुरक्षा केवल चालान या हेलमेट अभियान का विषय नहीं रहेगी। आने वाले वर्षों में यह जनसंख्या संरचना, शहरीकरण, सार्वजनिक परिवहन, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक देखभाल से जुड़ा संयुक्त प्रश्न बनती जाएगी।

भारत में हम अक्सर सड़क हादसों को नियति की तरह स्वीकार कर लेते हैं। ‘सड़कें ऐसी ही हैं’, ‘ट्रैफिक ऐसा ही है’, ‘थोड़ी बहुत गलती तो हो जाती है’—यह सामान्यीकृत रवैया बेहद खतरनाक है। कोरिया के आंकड़े बताते हैं कि जब समाज बूढ़ा होता है, तब वही ‘छोटी गलती’ या ‘हल्का टकराव’ भी मौत में बदल सकता है। इसलिए हमारी नीतियों का केंद्र अब केवल दुर्घटना रोकना नहीं, बल्कि किसी भी दुर्घटना को कम से कम घातक बनाना भी होना चाहिए।

इसके लिए हमें कई स्तरों पर सोचना होगा। क्या हमारी सड़कों पर पर्याप्त स्ट्रीट लाइट है? क्या जंक्शन और कट इतने जटिल हैं कि नया या उम्रदराज चालक भ्रमित हो जाए? क्या अस्पतालों तक आपातकालीन पहुंच समय पर संभव है? क्या छोटे शहरों में वरिष्ठ नागरिकों के लिए सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध है? क्या नगर नियोजन में पैदल चलने को प्राथमिकता मिलती है? क्या लाइसेंस नवीनीकरण में स्वास्थ्य और दृष्टि परीक्षण पर्याप्त गंभीरता से होते हैं? ये प्रश्न सुनने में तकनीकी लग सकते हैं, लेकिन इनका उत्तर सीधे जीवन और मृत्यु से जुड़ा है।

सबसे अहम बात यह है कि हमें सड़क सुरक्षा को पीढ़ियों की लड़ाई नहीं बनने देना चाहिए। बुजुर्ग चालक बनाम युवा चालक, कार बनाम पैदल यात्री, शहर बनाम गांव—इन खांचों में समस्या को बांटने से हल नहीं निकलेगा। बेहतर सोच यह होगी कि ऐसी सड़कें बनाई जाएं जो सबसे कमजोर व्यक्ति के लिए भी सुरक्षित हों। यदि एक वरिष्ठ नागरिक, एक बच्चा, एक दिव्यांग व्यक्ति और एक रात की शिफ्ट से लौटती महिला बिना डर सड़क पार कर सकें, तभी किसी सड़क को वास्तव में सुरक्षित कहा जा सकता है।

कोरिया से उठता मूल सवाल यही है: क्या हम सड़क सुरक्षा को केवल आंकड़ों का खेल मानेंगे, या उसे समाज की संवेदनशीलता और राज्य की जिम्मेदारी के पैमाने पर भी परखेंगे? दुर्घटनाओं की संख्या कम होना निश्चित ही उपलब्धि है, पर यदि मौतें बढ़ रही हों तो यह उपलब्धि अधूरी है। अब समय आ गया है कि सड़क नीति की भाषा बदले—तेज से सुरक्षित की ओर, वाहन से व्यक्ति की ओर, और दंड से डिजाइन की ओर। कोरिया की सड़कें हमें यह चेतावनी दे रही हैं; भारत के लिए समझदारी यही होगी कि वह इस चेतावनी को समय रहते सुन ले।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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