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G20 की मेज़ पर दक्षिण कोरिया की नई दावेदारी: पश्चिम एशिया-अफ्रीका की ओर बढ़ते कदम और बदलती वैश्विक कूटनीति

G20 की मेज़ पर दक्षिण कोरिया की नई दावेदारी: पश्चिम एशिया-अफ्रीका की ओर बढ़ते कदम और बदलती वैश्विक कूटनीति

सियोल से दुनिया तक: दक्षिण कोरिया की कूटनीति का दायरा अब कहीं बड़ा है

दक्षिण कोरिया को लंबे समय तक भारत सहित एशिया के बहुत से देशों में मुख्यतः तीन पहचान के साथ देखा गया—एक तकनीकी और औद्योगिक ताकत, दूसरी K-pop और K-drama जैसी सांस्कृतिक लहर का केंद्र, और तीसरी उत्तर कोरिया के साथ तनाव में घिरा एक सुरक्षा-संवेदनशील राष्ट्र। लेकिन अब सियोल की अंतरराष्ट्रीय भूमिका इन सीमित फ्रेमों से निकलकर कहीं अधिक व्यापक रूप लेती दिखाई दे रही है। ताज़ा घटनाक्रम इसी बदलाव की ओर संकेत करता है। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्यंग ने G20 शिखर सम्मेलन के अवसर पर पश्चिम एशिया और अफ्रीका की यात्रा शुरू की है, और इसी दौरान यह भी तय हो गया है कि 2028 का G20 शिखर सम्मेलन दक्षिण कोरिया में आयोजित होगा। यह महज़ एक कूटनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि उस लंबी राजनीतिक और रणनीतिक रेखा का हिस्सा है जिसमें सियोल खुद को केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक एजेंडा तय करने वाले ‘मिडिल पावर’ यानी प्रभावशाली मध्यम शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है।

भारतीय पाठकों के लिए इसे समझना कठिन नहीं होना चाहिए। जैसे भारत ने पिछले कुछ वर्षों में G20 की अध्यक्षता, ग्लोबल साउथ की आवाज़, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और विकासोन्मुख कूटनीति के जरिए अपने वैश्विक दायरे का विस्तार किया, वैसे ही दक्षिण कोरिया भी अब अपनी विदेश नीति को सिर्फ अमेरिका-चीन-जापान के त्रिकोण तक सीमित नहीं रखना चाहता। वह पश्चिम एशिया, अफ्रीका, उभरती अर्थव्यवस्थाओं, जलवायु, सप्लाई चेन, ऊर्जा और विकास साझेदारी को एक ही कूटनीतिक धुरी पर लाने की कोशिश कर रहा है।

इस घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि दक्षिण कोरिया एक ही समय में दो स्तरों पर काम कर रहा है—एक, वर्तमान की सक्रिय शिखर कूटनीति; और दो, 2028 के G20 मेज़बान के रूप में भविष्य की संस्थागत तैयारी। इसका मतलब है कि उसकी विदेश नीति अब तात्कालिक प्रतिक्रियाओं तक सीमित नहीं, बल्कि कई वर्षों आगे की योजना के साथ चल रही है। यह किसी भी ऐसे देश के लिए निर्णायक मोड़ होता है जो अपनी आर्थिक क्षमता, प्रशासनिक दक्षता और सांस्कृतिक प्रभाव को जोड़कर बड़ी अंतरराष्ट्रीय भूमिका निभाना चाहता है।

आज जब दुनिया बहुध्रुवीयता, संरक्षणवाद, जलवायु संकट, ऊर्जा असुरक्षा और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के दौर से गुजर रही है, तब G20 जैसे मंच का महत्व और बढ़ जाता है। दक्षिण कोरिया ने 2028 की मेज़बानी हासिल कर यह संकेत दिया है कि वह सिर्फ वैश्विक नियमों का पालन करने वाला देश नहीं रहना चाहता, बल्कि उन नियमों के निर्माण, संशोधन और संतुलन की प्रक्रिया में भी अपनी जगह बनाना चाहता है।

G20 क्यों महत्वपूर्ण है, और दक्षिण कोरिया के लिए यह अवसर साधारण नहीं

बहुत से पाठकों के मन में स्वाभाविक प्रश्न हो सकता है कि G20 की मेज़बानी को इतना बड़ा राजनीतिक और कूटनीतिक अवसर क्यों माना जाता है। इसका उत्तर यह है कि G20 अब केवल वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंकों की बातचीत का मंच नहीं रह गया है। यह वह जगह है जहां दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ, प्रमुख उभरते देश और यूरोपीय संघ जैसे समूह आर्थिक वृद्धि, वैश्विक व्यापार, ऋण संकट, जलवायु वित्त, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा स्थिरता, डिजिटल शासन और सप्लाई चेन जैसे मुद्दों पर बातचीत करते हैं।

यानी यह मंच उन सवालों से जुड़ा है जो आम नागरिक की जेब, रोज़गार, महंगाई और भविष्य की आर्थिक दिशा तक असर डालते हैं। अगर दुनिया में तेल की कीमतें बढ़ती हैं, समुद्री मार्ग बाधित होते हैं, चिप सप्लाई टूटती है, खाद्य बाजार अस्थिर होता है, या जलवायु आपदा के कारण विकासशील देशों पर कर्ज़ का बोझ बढ़ता है—तो G20 की चर्चाएँ केवल बयानबाज़ी नहीं रह जातीं। वे वैश्विक नीति का संकेतक बन जाती हैं।

दक्षिण कोरिया के लिए 2028 में G20 की मेज़बानी मिलना इसीलिए विशेष है क्योंकि इससे उसे वर्षों तक एजेंडा तय करने, विभिन्न देशों के बीच पुल बनाने और अपने राष्ट्रीय अनुभव को वैश्विक विमर्श में बदलने का मौका मिलेगा। किसी शिखर सम्मेलन की मेज़बानी केवल दो या तीन दिनों का आयोजन नहीं होती। उससे पहले मंत्रिस्तरीय बैठकें होती हैं, कार्य समूह बनते हैं, नीति मसौदे तैयार होते हैं, कॉरपोरेट और सिविल सोसायटी स्तर की चर्चाएँ चलती हैं, और अंततः एक ऐसा वातावरण बनाया जाता है जिसमें भिन्न हितों वाले देश कम-से-कम कुछ साझा भाषा पर सहमत हो सकें।

यह वही भूमिका है जो भारत ने अपनी G20 अध्यक्षता के दौरान कुछ हद तक निभाई—एक ऐसे देश की भूमिका जो विकसित और विकासशील दुनिया के बीच संवाद का पुल बनने की कोशिश करता है। दक्षिण कोरिया भी अब इसी राह पर है, हालांकि उसकी प्राथमिकताएँ कुछ अलग होंगी। उसका औद्योगिक ढांचा, तकनीकी क्षमता, डिजिटल प्रशासन, हरित परिवर्तन और विकास सहयोग का अनुभव उसे एक अलग पहचान देता है। वह दुनिया को यह बताना चाहेगा कि एक ऐसा देश, जिसने युद्धोत्तर गरीबी से निकलकर उच्च-तकनीकी समाज बनाया, अब वैश्विक समाधान-निर्माण में भी योगदान दे सकता है।

यही कारण है कि 2028 की G20 मेज़बानी को केवल अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा का प्रतीक मानना पर्याप्त नहीं होगा। यह दक्षिण कोरिया के लिए अपने राष्ट्रीय ब्रांड को नई परिभाषा देने, नई आर्थिक साझेदारियाँ बनाने और वैश्विक दक्षिण के साथ भरोसेमंद संवाद स्थापित करने का अवसर है।

अफ्रीका की ओर बढ़ते कदम: यह यात्रा प्रतीकात्मक नहीं, रणनीतिक है

राष्ट्रपति ली जे-म्यंग का मिस्र से दक्षिण अफ्रीका की ओर बढ़ना इस पूरे घटनाक्रम की एक केंद्रीय छवि है। दक्षिण कोरिया की पारंपरिक विदेश नीति अक्सर उत्तर-पूर्व एशिया, अमेरिका और कभी-कभी यूरोप के संदर्भ में पढ़ी जाती रही है। इसका एक बड़ा कारण सुरक्षा वातावरण रहा है—उत्तर कोरिया का परमाणु प्रश्न, अमेरिका के साथ रक्षा साझेदारी, चीन के साथ आर्थिक जटिलता, और जापान के साथ इतिहास तथा रणनीति का मिश्रित संबंध। लेकिन वैश्विक आर्थिक नक्शा बदल चुका है।

अब अफ्रीका कोई दूर बैठा हुआ ‘भविष्य का महाद्वीप’ भर नहीं रह गया है। यह आज के समय में खनिज संसाधनों, ऊर्जा सहयोग, कृषि, खाद्य सुरक्षा, बुनियादी ढांचे, समुद्री मार्गों, बाजार विस्तार, डिजिटल सेवाओं और जलवायु साझेदारी का वास्तविक क्षेत्र बन चुका है। दक्षिण कोरिया जैसी उद्योग-प्रधान अर्थव्यवस्था के लिए यह बदलाव बेहद महत्वपूर्ण है। इलेक्ट्रिक वाहनों, बैटरियों, सेमीकंडक्टर और उच्च-प्रौद्योगिकी विनिर्माण की दुनिया में महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति निर्णायक हो चुकी है। अफ्रीका इस आपूर्ति-श्रृंखला का बड़ा स्रोत है।

दक्षिण अफ्रीका विशेष रूप से इसलिए अहम है क्योंकि वह G20 का सदस्य है और अफ्रीकी महाद्वीप की एक प्रमुख राजनीतिक-आर्थिक आवाज़ माना जाता है। वह अक्सर ग्लोबल साउथ के दृष्टिकोण—यानी उन देशों की चिंताओं—को सामने लाता है जो जलवायु न्याय, विकास वित्त, व्यापारिक असमानता और ऐतिहासिक असंतुलनों की बात करते हैं। दक्षिण कोरिया का वहां सक्रिय दिखाई देना यह बताता है कि वह केवल पश्चिमी साझेदारों की भाषा नहीं बोलना चाहता, बल्कि उभरती दुनिया की राजनीतिक संवेदनाओं को भी समझना चाहता है।

भारतीय संदर्भ में इसे ऐसे समझा जा सकता है जैसे नई दिल्ली ने अफ्रीकी संघ को G20 में स्थायी सदस्यता दिलाने के प्रश्न को वैश्विक न्याय और प्रतिनिधित्व से जोड़ा था। दक्षिण कोरिया भले वही भूमिका हूबहू न निभा रहा हो, लेकिन वह यह ज़रूर संकेत दे रहा है कि आने वाले वर्षों की प्रभावी कूटनीति में अफ्रीका को किनारे रखकर कोई भी देश बड़ा खिलाड़ी नहीं बन सकता।

पश्चिम एशिया और अफ्रीका की यात्रा का एक और अर्थ है—कूटनीति का भूगोल बदलना। पहले जो क्षेत्र केवल ऊर्जा आयात या बाज़ार के रूप में देखे जाते थे, अब वे साझेदारी, निवेश, तकनीकी सहयोग, विकास परियोजनाओं और बहुपक्षीय समर्थन के स्रोत बन रहे हैं। इस तरह दक्षिण कोरिया अपने लिए एक नया कूटनीतिक नक्शा बना रहा है जिसमें सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और विकास एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि गहराई से जुड़े हुए हैं।

‘एकजुटता, समानता और स्थिरता’: ये शब्द केवल नारा नहीं, आर्थिक हित का हिस्सा हैं

G20 के वर्तमान विमर्श में जिन तीन शब्दों पर ज़ोर दिया गया है—एकजुटता, समानता और स्थिरता—वे सुनने में भले आदर्शवादी लगें, लेकिन वास्तविकता में यह ठोस आर्थिक और रणनीतिक हितों का प्रश्न है। दुनिया अभी भी महामारी के बाद की असमान पुनर्बहाली, ऊंची ब्याज दरों, धीमी वृद्धि, क्षेत्रीय संघर्षों, व्यापारिक अवरोधों और जलवायु आपदाओं से जूझ रही है। ऐसे समय में मध्यम आकार की खुली अर्थव्यवस्थाओं के लिए नियम-आधारित बहुपक्षीय ढांचा किसी नैतिक विलासिता का विषय नहीं, बल्कि अस्तित्वगत आवश्यकता है।

दक्षिण कोरिया की अर्थव्यवस्था निर्यात-आधारित है। सेमीकंडक्टर, ऑटोमोबाइल, बैटरी, जहाज निर्माण, उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स और अब सांस्कृतिक उद्योग—ये सभी वैश्विक बाजारों, समुद्री संपर्क, स्थिर व्यापार नियमों और भरोसेमंद निवेश माहौल पर निर्भर करते हैं। अगर दुनिया अलग-अलग ब्लॉकों में बंटती जाती है, आपूर्ति-श्रृंखलाएँ राजनीतिक हथियार बनती हैं और संरक्षणवाद बढ़ता है, तो इसका असर सीधे दक्षिण कोरियाई कंपनियों और श्रम बाजार पर पड़ता है।

यही वजह है कि बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था की बहाली दक्षिण कोरिया के लिए केवल कूटनीतिक पंक्ति नहीं है। यह उसके उद्योग, निवेश और विकास मॉडल की सुरक्षा का सवाल है। भारत के पाठक इसे इसलिए भी समझ सकते हैं क्योंकि भारत ने भी हाल के वर्षों में सप्लाई चेन की विश्वसनीयता, ‘चाइना-प्लस-वन’ रणनीति, विनिर्माण निवेश और वैश्विक उत्पादन नेटवर्क में अपनी भूमिका बढ़ाने पर जोर दिया है। दक्षिण कोरिया भी इसी व्यापक आर्थिक पुनर्संरचना का हिस्सा है।

समानता और स्थिरता के आयाम भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। जलवायु परिवर्तन का बोझ उन देशों पर अधिक पड़ता है जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से कम उत्सर्जन किया, लेकिन उनके पास संसाधन भी कम हैं। विकासशील देशों को हरित संक्रमण के लिए तकनीक, वित्त और संस्थागत सहयोग चाहिए। दक्षिण कोरिया यहां एक दिलचस्प उदाहरण बन सकता है क्योंकि उसने तेज़ औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, तकनीकी छलांग और डिजिटल शासन—इन सबको कुछ दशकों में एक साथ साधा। अब वह इस अनुभव को विकास सहयोग की भाषा में पेश करना चाहता है।

भारतीय संदर्भ में कहें तो जैसे भारत ‘डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर’, वैक्सीन सहयोग, सस्ती तकनीक और दक्षिण-दक्षिण सहयोग की बात करता है, वैसे ही दक्षिण कोरिया ‘विकास का व्यावहारिक मॉडल’, ई-गवर्नेंस, हरित उद्योग और तकनीकी साझेदारी की पेशकश के साथ आगे बढ़ सकता है। इसलिए ‘एकजुटता, समानता और स्थिरता’ दक्षिण कोरिया के लिए भावनात्मक नारे नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित और वैश्विक भूमिका के बीच संतुलन की भाषा हैं।

2028 की मेज़बानी: अवसर जितना बड़ा, जिम्मेदारी उतनी भारी

दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ने 2028 के G20 शिखर सम्मेलन को लेकर भारी जिम्मेदारी की बात कही है। यह कथन औपचारिक विनम्रता से अधिक यथार्थबोध को दिखाता है। G20 का मेज़बान देश केवल स्वागत-सत्कार नहीं करता; उसे दुनिया की सबसे कठिन असहमतियों को संभालने के लिए मंच तैयार करना पड़ता है। अमेरिका और चीन के बीच तनाव, रूस-पश्चिम टकराव, ऊर्जा उत्पादक और उपभोक्ता देशों के हित, जलवायु न्याय और विकास की जरूरतें, कर्ज़ राहत, तकनीकी नियम, डिजिटल संप्रभुता—इन सबके बीच एक साझा बयान तैयार करना आसान काम नहीं होता।

कई बार अंतिम घोषणा-पत्र की एक पंक्ति, एक शब्द, यहां तक कि एक विशेषण पर भी लंबी खींचतान होती है। मेज़बान देश की सफलता इस बात से मापी जाती है कि वह कितनी कुशलता से संवाद, मध्यस्थता और प्रक्रिया-निर्माण कर पाता है। इसके साथ-साथ उसे सुरक्षा, परिवहन, मीडिया प्रबंधन, कॉर्पोरेट सहभागिता, नागरिक समाज कार्यक्रम, और वैश्विक छवि—सभी को एक साथ साधना पड़ता है।

दक्षिण कोरिया के पास इस चुनौती से निपटने के लिए कुछ स्पष्ट ताकतें हैं। उसकी प्रशासनिक क्षमता मजबूत मानी जाती है। डिजिटल अवसंरचना उन्नत है। बड़े पैमाने के आयोजनों और अंतरराष्ट्रीय समन्वय का अनुभव भी है। इसके अलावा, सांस्कृतिक आकर्षण—जिसे आज दुनिया K-culture के नाम से जानती है—उसे एक अतिरिक्त ‘सॉफ्ट पावर’ देता है। यह केवल मनोरंजन उद्योग की चमक नहीं है; यह उस भरोसे का हिस्सा है जो किसी देश की समकालीन छवि बनाता है।

फिर भी 2028 की तैयारी केवल आयोजन-प्रबंधन का मामला नहीं होगी। दक्षिण कोरिया को यह तय करना होगा कि वह किन विषयों को अपनी प्राथमिकता बनाता है। क्या वह सप्लाई चेन सुरक्षा, हरित औद्योगिकीकरण और डिजिटल नवाचार को केंद्र में रखेगा? क्या वह ग्लोबल साउथ के विकास वित्त और जलवायु न्याय के मुद्दों पर अधिक मुखर होगा? क्या वह सांस्कृतिक प्रभाव को आर्थिक साझेदारी में बदलने की कोशिश करेगा? इन सभी प्रश्नों के उत्तर आने वाले वर्षों में उसकी कूटनीतिक दिशा तय करेंगे।

भारत के अनुभव से देखा जाए तो G20 मेज़बानी राष्ट्रीय क्षमता के प्रदर्शन का अवसर भी बनती है। यह बताने का मौका मिलता है कि कोई देश केवल अपने आकार या अर्थव्यवस्था से नहीं, बल्कि अपनी संस्थागत परिपक्वता, वैचारिक पहल और वैश्विक संवाद में योगदान से भी महत्वपूर्ण है। दक्षिण कोरिया अब उसी परीक्षा की तैयारी में है।

कोरियाई राजनीति के लिए भी एक परीक्षण, और एशिया के लिए नया संकेत

दक्षिण कोरिया की घरेलू राजनीति अक्सर तीखी प्रतिस्पर्धा, वैचारिक विभाजन और व्यक्तित्व-केंद्रित बहसों से भरी रहती है। यह स्थिति किसी भी लोकतंत्र में असामान्य नहीं है; भारत भी इससे अछूता नहीं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय किसी देश को केवल उसकी आंतरिक बहसों से नहीं, बल्कि इस बात से भी परखता है कि बाहरी दुनिया के सवालों पर उसकी नीति कितनी स्थिर, परिपक्व और दीर्घकालिक है।

G20 से जुड़ी मौजूदा सक्रियता दक्षिण कोरिया को यही अवसर देती है कि वह घरेलू राजनीतिक शोर से ऊपर उठकर एक व्यापक राष्ट्रीय दिशा प्रदर्शित करे। 2028 की मेज़बानी किसी एक सरकार या एक दल का कार्यक्रम भर नहीं होगी। यह अगले कई वर्षों तक चलने वाली तैयारी है जिसमें विदेश मंत्रालय, व्यापार और उद्योग तंत्र, जलवायु नीति संस्थान, सुरक्षा एजेंसियां, परिवहन व्यवस्था, सांस्कृतिक निकाय, नगर प्रशासन और निजी क्षेत्र—सबको मिलकर काम करना होगा।

यानी यह कोरियाई राज्य-क्षमता की सामूहिक परीक्षा होगी। क्या सियोल अपने आर्थिक मॉडल, लोकतांत्रिक संस्थाओं, तकनीकी दक्षता और सांस्कृतिक प्रभाव को एक साझा राष्ट्रीय कथा में बदल सकता है? क्या वह यह दिखा सकता है कि विकास और लोकतंत्र, उद्योग और हरित संक्रमण, राष्ट्रीय हित और वैश्विक जिम्मेदारी—ये परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक तत्व हैं? यही वे प्रश्न हैं जिनका उत्तर 2028 के रास्ते में तैयार होगा।

एशिया के लिए भी इसमें एक बड़ा संकेत छिपा है। इस महाद्वीप की दो प्रमुख लोकतांत्रिक और आर्थिक शक्तियाँ—भारत और दक्षिण कोरिया—अलग-अलग ऐतिहासिक अनुभवों के बावजूद अब ऐसे चरण में हैं जहां उन्हें क्षेत्रीय सीमाओं से बाहर जाकर व्यापक वैश्विक भूमिका निभानी पड़ रही है। भारत ग्लोबल साउथ, बहुध्रुवीयता और रणनीतिक स्वायत्तता की भाषा में यह कर रहा है; दक्षिण कोरिया तकनीक, व्यापार, मध्यम शक्ति कूटनीति और संस्थागत नेतृत्व की भाषा में ऐसा कर रहा है। दोनों रास्ते अलग हैं, पर मंज़िल समान दिखाई देती है—वैश्विक व्यवस्था में अधिक प्रभाव, अधिक विश्वसनीयता और अधिक स्वायत्त भूमिका।

भारत के लिए क्या संकेत हैं, और आगे क्या देखना चाहिए

भारतीय पाठकों के लिए इस पूरे घटनाक्रम में कई स्तरों पर दिलचस्प संकेत हैं। पहला, यह कि एशिया की कूटनीति अब केवल अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता की छाया में नहीं पढ़ी जा सकती। मध्यम शक्तियाँ—चाहे वे भारत हों, दक्षिण कोरिया हों, इंडोनेशिया हों या सऊदी अरब—अब अपने-अपने तरीके से वैश्विक एजेंडा गढ़ने की कोशिश कर रही हैं। दूसरा, अफ्रीका और पश्चिम एशिया आने वाले दशकों की निर्णायक कूटनीतिक भूमि बनने जा रहे हैं। ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा, समुद्री संपर्क, तकनीक, निवेश और विकास सहयोग—सभी का केंद्र वहां तेज़ी से सिमट रहा है।

तीसरा, सांस्कृतिक शक्ति और आर्थिक शक्ति का मेल अब विदेश नीति का महत्वपूर्ण साधन बन चुका है। दक्षिण कोरिया ने K-pop, K-drama, कोरियाई भोजन, ब्यूटी इंडस्ट्री और डिजिटल संस्कृति के जरिए जो वैश्विक पहचान बनाई है, वह अब उसकी व्यापक कूटनीति की पृष्ठभूमि भी बनती जा रही है। भारतीय संदर्भ में यह कुछ वैसा ही है जैसे योग, बॉलीवुड, भारतीय खान-पान, लोकतांत्रिक अनुभव और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना—ये सब मिलकर भारत की बाहरी छवि को मजबूत करते हैं।

चौथा, G20 की मेज़बानी जैसी प्रक्रिया किसी देश को मजबूर करती है कि वह अपने विकास अनुभव को वैश्विक भाषा में अनुवाद करे। दक्षिण कोरिया के पास युद्धोत्तर पुनर्निर्माण से लेकर औद्योगिक चमत्कार, डिजिटल आधुनिकीकरण और सांस्कृतिक वैश्वीकरण तक की कहानी है। अब सवाल यह है कि क्या वह इस कहानी को ऐसी नीति-भाषा में बदल पाएगा जो अफ्रीका, पश्चिम एशिया, दक्षिण एशिया और लैटिन अमेरिका के देशों को भी सार्थक लगे।

अंततः, दक्षिण कोरिया की यह नई सक्रियता हमें यह याद दिलाती है कि आज की दुनिया में प्रभाव केवल सैन्य शक्ति से नहीं बनता। भरोसा, मध्यस्थता, आर्थिक विश्वसनीयता, विकास साझेदारी, तकनीकी समाधान और सांस्कृतिक आकर्षण—इन सबका संयुक्त प्रभाव ही आधुनिक कूटनीति की असली पूंजी है। 2028 के G20 तक पहुंचते-पहुंचते दक्षिण कोरिया को यह साबित करना होगा कि वह केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था का सफल प्रतिभागी नहीं, बल्कि उसके भविष्य का जिम्मेदार शिल्पकार भी बन सकता है।

और भारत के लिए यह कहानी इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि एशिया की उभरती शक्तियों के बीच सहयोग, प्रतिस्पर्धा और संवाद—तीनों आने वाले समय की वैश्विक राजनीति को आकार देंगे। सियोल का पश्चिम एशिया और अफ्रीका की ओर बढ़ता कदम उसी बदलती दुनिया का संकेत है। यह केवल दक्षिण कोरिया की विदेश नीति का विस्तार नहीं, बल्कि उस नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की झलक है जिसमें एशियाई देश अब दर्शक नहीं, सक्रिय निर्माता बनना चाहते हैं।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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