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102 वर्ष की उम्र में थमी सातो आइको की कलम: बुढ़ापे को बोझ नहीं, बेबाक जीवन-दृष्टि बनाने वाली जापानी लेखिका से एशिया क्या

102 वर्ष की उम्र में थमी सातो आइको की कलम: बुढ़ापे को बोझ नहीं, बेबाक जीवन-दृष्टि बनाने वाली जापानी लेखिका से एशिया क्या

एक खबर, जो सिर्फ जापान की नहीं रही

जापान की वरिष्ठ लेखिका सातो आइको के निधन की खबर पहली नजर में पड़ोसी देश के साहित्य जगत की एक सामान्य शोक-सूचना लग सकती है, लेकिन यह घटना उससे कहीं बड़ी है। 102 वर्ष की उम्र में उनका जाना केवल एक लंबे जीवन का अंत नहीं, बल्कि उस लेखकीय आवाज का विराम है जिसने बुढ़ापे, घरेलू जीवन, विवाह, सामाजिक दिखावे और रोजमर्रा की थकान पर असाधारण स्पष्टता से लिखा। यही वजह है कि उनकी मृत्यु की खबर जापान तक सीमित नहीं रही; कोरिया में इसे गंभीरता से पढ़ा गया, और अब भारतीय पाठकों के लिए भी इसमें खास दिलचस्पी का कारण है।

एशिया के समाज तेजी से बदल रहे हैं। एक तरफ युवाओं का पॉप-संस्कृति संसार है, दूसरी तरफ उम्रदराज होती आबादी, अकेलापन, परिवारों की बदलती संरचना और आत्मसम्मान के साथ जीने की चुनौती। सातो आइको की रचनाएं इसी बदलती दुनिया को बहुत सजावटी भाषा में नहीं, बल्कि लगभग घरेलू बातचीत की लय में सामने लाती हैं। उनकी खासियत यह थी कि वे ‘प्रेरक’ बनने की कोशिश नहीं करती थीं, लेकिन पढ़ने वाले को भीतर से झकझोर देती थीं।

कोरिया में उन्हें हाल के वर्षों में नए सिरे से पढ़ा गया, खासकर तब जब उनकी एक किताब का अनुवाद वहां प्रकाशित हुआ। यह अपने आप में दिलचस्प सांस्कृतिक घटना है। आम तौर पर हम साहित्यिक प्रसिद्धि को युवा दौर की उपलब्धियों, पुरस्कारों या क्लासिक कृतियों से जोड़ते हैं। सातो आइको का मामला उलटा था। वे अपने नब्बे और सौ साल के आसपास के वर्षों में अधिक व्यापक पाठक-वर्ग तक पहुंचीं। यानी उम्र ने उनकी प्रासंगिकता कम नहीं की, बल्कि उन्हें और जरूरी बना दिया।

भारतीय संदर्भ में देखें तो यह कहानी हमें महादेवी वर्मा, अमृता प्रीतम, कृष्णा सोबती, निर्मल वर्मा या मन्नू भंडारी जैसी उन लेखकीय परंपराओं की याद दिलाती है जहां निजी जीवन, समाज और भाषा एक-दूसरे से अलग नहीं रहते। फर्क यह है कि सातो आइको ने वृद्धावस्था को श्रद्धा या करुणा के भाव में नहीं लिखा; उन्होंने उसे झुंझलाहट, तंज, व्यंग्य, थकान और जिजीविषा—इन सबके साथ लिखा। यही उनकी असली ताकत थी।

आज जब भारत में भी वरिष्ठ नागरिकों की संख्या बढ़ रही है, परिवारों की संयुक्त संरचना ढीली पड़ रही है, और डिजिटल दुनिया ने संवाद को तेज लेकिन उथला भी बना दिया है, तब सातो आइको की विरासत हमारे लिए सिर्फ साहित्यिक सूचना नहीं, सामाजिक आईना भी है।

102 वर्ष तक सक्रिय लेखन: लंबी उम्र नहीं, लंबे समय तक सजग रहने की कहानी

सातो आइको का जन्म 1923 में जापान के ओसाका में हुआ था। वे साहित्यिक माहौल में पली-बढ़ीं, लेकिन उनकी रचनाशक्ति केवल पारिवारिक विरासत का विस्तार नहीं थी। उनके जीवन में निजी त्रासदियां, आर्थिक संकट, रिश्तों की विफलताएं और सामाजिक संघर्ष इतने गहरे थे कि उनकी लेखनी को समझने के लिए जीवन और साहित्य को साथ पढ़ना पड़ता है।

कहा जाता है कि उन्होंने कम उम्र में विवाह किया, लेकिन उनके पति गंभीर बीमारी के इलाज के दौरान मॉर्फिन की लत का शिकार हुए और उनकी मृत्यु हो गई। यह अनुभव किसी भी व्यक्ति के जीवन को भीतर तक तोड़ देने वाला हो सकता है। बाद में उन्होंने फिर विवाह किया, लेकिन वह रिश्ता भी आर्थिक अस्थिरता और टूटन से घिरा रहा। दूसरे पति के व्यवसाय के विफल होने पर कर्ज चुकाने की जिम्मेदारी तक उन्होंने उठाई, और अंततः तलाक हुआ। यह जीवन-कथा किसी उपन्यास से कम नहीं, लेकिन सातो आइको ने इसे सनसनी की तरह नहीं, अनुभव की सच्चाई की तरह बरता।

यहीं से उनके लेखन की वह रीढ़ बनती है जिसने उन्हें अलग पहचान दी। वे जीवन के असुविधाजनक हिस्सों से बचती नहीं थीं। वे उन्हें उठाती थीं, पलटती थीं, देखती थीं और फिर पाठक के सामने रख देती थीं। इसलिए उनकी रचनाएं अक्सर ‘सुंदर’ कम और ‘सच’ ज्यादा लगती हैं। साहित्य में यह गुण दुर्लभ है, क्योंकि बहुत-सी लेखन परंपराएं दुख को भी शालीन बना देती हैं। सातो आइको ने दुख को शालीन बनाने से इनकार किया।

उनकी लंबी उम्र का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह नहीं कि वे 102 वर्ष तक जीवित रहीं, बल्कि यह है कि वे अंत तक ‘वर्तमान’ में रहीं। अक्सर बहुत वृद्ध लेखकों को सम्मान तो मिलता है, पर उन्हें समकालीन बहसों से बाहर कर दिया जाता है। सातो आइको के साथ ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने वृद्धावस्था में भी ऐसे वाक्य लिखे जो नई पीढ़ी को चुभते थे, मध्यमवर्ग को असहज करते थे और समाज को अपने ढोंग का अहसास कराते थे।

यहां भारतीय पाठक के लिए एक अहम बात समझना जरूरी है। एशियाई समाजों में वृद्धजनों के प्रति सम्मान की संस्कृति जरूर है, लेकिन व्यवहार में अक्सर बुढ़ापे को चुप्पी, संयम और ‘अब बस आराम कीजिए’ जैसी अपेक्षाओं में कैद कर दिया जाता है। सातो आइको ने इस छवि को तोड़ा। वे यह साबित करती रहीं कि बुढ़ापा सार्वजनिक विचार का भी समय हो सकता है, और बुजुर्ग लेखक केवल स्मृति-पुरुष या स्मृति-स्त्री नहीं, जीवित बहस का हिस्सा भी हो सकते हैं।

जब नब्बे के बाद शुरू हुई दूसरी लोकप्रियता

सातो आइको की लोकप्रियता का सबसे रोचक पहलू यह है कि उन्होंने अपने जीवन के उत्तरार्ध में, विशेष रूप से नब्बे की उम्र के बाद, एक नए पाठक-समुदाय से गहरा रिश्ता बनाया। साहित्यिक दुनिया में ऐसा विरले ही होता है। आम तौर पर लेखक की सबसे बड़ी पहचान या तो युवा उम्र की किसी चर्चित रचना से बनती है, या फिर जीवन के अंत में उन्हें ‘वरिष्ठ’ कहकर सम्मानित तो किया जाता है, पर बहुत व्यापक जन-चर्चा नहीं मिलती। सातो आइको इसका अपवाद थीं।

उनकी चर्चित निबंध-पुस्तक, जिसका आशय कुछ इस तरह है कि ‘90 साल की उम्र, इसमें आखिर जश्न कैसा?’, जापान में बेहद लोकप्रिय हुई। शीर्षक ही उनके स्वभाव का परिचय देता है। वे लंबी उम्र को भावुक शुभकामना की तरह नहीं देखती थीं। उनके लिए उम्र बढ़ना एक कठिन, थकाऊ, कई बार हास्यास्पद और कभी-कभी चिढ़ पैदा करने वाला अनुभव भी था। लेकिन यही ईमानदारी पाठकों को आकर्षित करती थी।

भारतीय समाज में भी जन्मदिन, दीर्घायु और बुढ़ापे से जुड़े शुभकामना-वाक्य बहुत आम हैं—‘सौ साल जिएं’, ‘ईश्वर लंबी उम्र दे’, ‘बुजुर्ग घर की छांव हैं’। ये भाव गलत नहीं, लेकिन इनके भीतर कभी-कभी बुढ़ापे की वास्तविक तकलीफें गायब हो जाती हैं। चलने-फिरने में परेशानी, अकेलापन, सामाजिक अदृश्यता, बच्चों की व्यस्त जिंदगी, आर्थिक निर्भरता, या लगातार बदलती तकनीक से पैदा हुआ अलगाव—इन सबकी चर्चा कम होती है। सातो आइको ने इसी मौन को तोड़ा।

उनकी लोकप्रियता इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि वह केवल ‘साहित्यिक’ पाठक तक सीमित नहीं रही। उनकी भाषा में ऐसा रोजमर्रा का ताप था कि वे टीवी, जनचर्चा और लोकप्रिय संस्कृति तक पहुंचीं। उनकी टिप्पणियां लोगों को याद रहती थीं, क्योंकि उनमें अकादमिक जटिलता नहीं, जीवन की सीधी चोट थी। भारत में अगर इसकी तुलना करनी हो तो इसे उन लेखकों और सार्वजनिक बुद्धिजीवियों की परंपरा के करीब रख सकते हैं जो अखबारी कॉलम, टेलीविजन बहस और पुस्तकीय लेखन—तीनों जगह असर छोड़ते हैं।

और यहां एक बड़ा सांस्कृतिक संकेत भी है। उम्रदराज महिलाओं की आवाज को सार्वजनिक क्षेत्र में अक्सर या तो ‘ममतामयी’ बनाकर प्रस्तुत किया जाता है, या ‘त्यागमयी’। सातो आइको इनमें फिट नहीं बैठतीं। वे कई बार कठोर लगती हैं, कभी व्यंग्यात्मक, कभी झल्लाई हुई। लेकिन इसी असुविधाजनक ईमानदारी ने उन्हें असाधारण बनाया। उन्होंने साबित किया कि एक वरिष्ठ महिला लेखक को ‘कोमल’ होना अनिवार्य नहीं है; उसका गुस्सा भी सामाजिक महत्व रखता है।

जीवन के घावों को साहित्य में बदलने की कला

सातो आइको की रचनाओं का मूल बल उनके निजी अनुभवों की तीखी उपस्थिति में है। लेकिन यह केवल आत्मकथात्मक लेखन नहीं था। वे जीवन की घटनाओं को सीधे-सीधे निजी विलाप में नहीं बदलती थीं। उनके यहां निजी आघात सामाजिक संरचनाओं की परख का उपकरण बन जाता है। विवाह की विफलता केवल व्यक्तिगत दुख नहीं रहती; वह इस प्रश्न में बदल जाती है कि समाज रिश्तों से क्या अपेक्षा करता है, और व्यक्तियों पर कौन-से भावनात्मक बोझ डालता है।

उनके जीवन में आर्थिक संकट भी एक महत्वपूर्ण तत्व था। कर्ज चुकाने के लिए उन्होंने टीवी टॉक शो में बतौर कमेंटेटर काम किया और अपनी बेबाक टिप्पणियों के कारण उन्हें एक तीखे उपनाम से भी पुकारा गया। यह बताता है कि वे साहित्य के ऊंचे आसन पर बैठी कोई दूरस्थ हस्ती नहीं थीं। वे रोजमर्रा की दुनिया में उपस्थित थीं, संघर्ष कर रही थीं, कमाई कर रही थीं, और साथ ही लिख भी रही थीं। इसीलिए उनकी भाषा में वह बनावट नहीं मिलती जो केवल अध्ययन-कक्ष में पैदा होती है।

भारतीय पाठकों के लिए यह पहलू खास दिलचस्प है, क्योंकि हमारे यहां भी लेखकों के जीवन को लेकर एक रोमानी कल्पना बना दी जाती है—जैसे लेखक का काम सिर्फ सृजन करना है और बाकी संसार उससे अलग है। जबकि सच यह है कि हिंदी सहित भारतीय भाषाओं के अनेक लेखक नौकरी, आर्थिक दबाव, पारिवारिक जिम्मेदारियों और सामाजिक संघर्षों के बीच लिखते रहे हैं। सातो आइको की लोकप्रियता हमें याद दिलाती है कि पाठक आखिरकार उस आवाज को पहचान लेते हैं जिसमें जीवन की कमाई हुई सच्चाई हो।

उनके लेखन में गुस्सा एक महत्वपूर्ण भाव है, लेकिन वह अंधा गुस्सा नहीं है। उसमें अवलोकन है। वे समाज की दिखावटी शालीनता, बेमतलब की नैतिकता, और छोटी-छोटी बातों पर सामूहिक उत्तेजना को पहचानती थीं। इसीलिए उनका कथन कई बार ‘कठोर’ लगता है, पर वह दरअसल सामाजिक पाखंड पर प्रहार होता है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि उन्होंने अपने निजी घावों को वीरता-कथा नहीं बनाया। वे खुद को भी बख्शती नहीं थीं। यही आत्म-आलोचनात्मक ईमानदारी उन्हें विश्वसनीय बनाती है।

आज के समय में, जब सोशल मीडिया पर निजी जीवन का प्रदर्शन आम है, सातो आइको का लेखन एक अलग पाठ देता है। निजी अनुभव का सार्वजनिक उपयोग केवल आत्म-प्रचार नहीं होना चाहिए; वह समाज को समझने का माध्यम भी बन सकता है। उन्होंने यही किया। उन्होंने अपने जीवन की दरारों को छिपाया नहीं, लेकिन उन्हें बाजारू सनसनी में भी नहीं बदला।

कोरिया में पुनर्पाठ और एशियाई प्रकाशन जगत की नई हलचल

सातो आइको के निधन की खबर कोरिया में इसलिए भी महत्वपूर्ण बनी क्योंकि वहां हाल के वर्षों में उनकी रचनाओं का अनुवाद सामने आया और उन्हें नए पाठक मिले। किसी लेखक का दूसरे देश में ‘दुबारा जन्म’ अक्सर अनुवाद के माध्यम से होता है। दिलचस्प यह है कि ऐसा पुनर्पाठ कई बार लेखक की मृत्यु के बाद नहीं, बल्कि जीवन के उत्तरार्ध में भी शुरू हो सकता है। सातो आइको के मामले में यही हुआ।

कोरियाई पाठकों ने उन्हें केवल जापान की वरिष्ठ लेखिका के रूप में नहीं पढ़ा, बल्कि एक ऐसी लेखिका के रूप में अपनाया जिसने उम्र, समाज और निजी जीवन पर बिना लाग-लपेट बात की। कोरिया का समाज भी तीव्र प्रतिस्पर्धा, पारिवारिक दबाव, अकेलेपन और तेज डिजिटल संस्कृति से जूझ रहा है। वहां सातो आइको की आवाज इसलिए प्रासंगिक लगी क्योंकि उन्होंने ‘अच्छे जीवन’ की पैकेजिंग पर भरोसा नहीं किया।

भारतीय पाठकों के लिए यहां एक व्यापक सांस्कृतिक संदर्भ समझना जरूरी है। एशिया में सांस्कृतिक आदान-प्रदान की चर्चा अक्सर के-पॉप, के-ड्रामा, एनीमे, ओटीटी या फिल्मों के संदर्भ में होती है। लेकिन किताबें, अनुवाद और निबंध-साहित्य भी इस आदान-प्रदान का उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। कोरिया में जापानी लेखिका का पुनर्पाठ, और वहां से भारत जैसे देशों में उस पर बढ़ती रुचि, यह दिखाती है कि एशियाई समाज एक-दूसरे के अनुभवों को केवल मनोरंजन के जरिये नहीं, बल्कि विचार और भाषा के स्तर पर भी पढ़ रहे हैं।

भारत में भी अनूदित साहित्य का दायरा बढ़ा है, हालांकि वह अभी भी सीमित पाठक-वर्ग तक अधिक केंद्रित रहता है। फिर भी जापानी, कोरियाई और अन्य एशियाई लेखन के प्रति हिंदी पाठकों की जिज्ञासा बढ़ रही है। यह बदलाव महत्वपूर्ण है, क्योंकि पश्चिमी साहित्य के माध्यम से एशिया को समझने के बजाय अब एशिया, एशिया को सीधे पढ़ रहा है। सातो आइको की उपस्थिति इसी बड़े बदलाव का हिस्सा है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि किसी लेखक की देर से मिली लोकप्रियता, विशेषकर अनुवाद के जरिये, हमें यह सिखाती है कि साहित्य का समय रैखिक नहीं होता। कोई पुस्तक अपने प्रकाशन के वर्षों बाद किसी दूसरी भाषा, दूसरे समाज और दूसरे पीढ़ीगत संदर्भ में अचानक प्रासंगिक हो सकती है। सातो आइको की यात्रा यही बताती है कि अच्छे लेखन को कभी-कभी अपना पाठक देर से मिलता है, लेकिन जब मिलता है तो बहुत गहराई से मिलता है।

उनकी ‘कड़वी’ बातें इतनी गूंजती क्यों थीं?

सातो आइको को अक्सर तीखी, बेबाक, यहां तक कि ‘कटु’ टिप्पणी करने वाली लेखिका के रूप में याद किया जाता है। उन्होंने स्मार्टफोन-आसक्त समाज पर तंज कसा, इंटरनेट की छोटी-छोटी बातों पर होने वाली हंगामेबाजी पर सवाल उठाए, और उस सामूहिक शोर की आलोचना की जो आधुनिक जीवन का स्थायी शोर बन चुका है। पहली सुनवाई में यह बातें बुजुर्ग पीढ़ी की सामान्य शिकायतें लग सकती हैं, लेकिन ऐसा मान लेना जल्दबाजी होगी।

असल में उनकी टिप्पणियां तकनीक-विरोध नहीं, संवेदना-विरोधी जीवनशैली की आलोचना थीं। वे इस बात को पहचान रही थीं कि लगातार जुड़े रहने वाला समाज जरूरी नहीं कि ज्यादा मानवीय भी हो। हर पल स्क्रीन पर मौजूद दुनिया व्यक्ति को थका सकती है, उसे उत्तेजित रख सकती है, और उसकी प्रतिक्रिया-क्षमता को इतना तेज कर सकती है कि धैर्य, चुप्पी और विचार के लिए जगह ही न बचे।

भारतीय संदर्भ में यह बात बहुत परिचित लगती है। यहां भी सोशल मीडिया पर मामूली मुद्दे घंटे भर में राष्ट्रीय बहस बन जाते हैं। ट्रोल-संस्कृति, नैतिक पहरेदारी, वायरल आक्रोश और सार्वजनिक शर्मिंदा करने की प्रवृत्ति ने सामाजिक वातावरण को बेचैन बनाया है। ऐसे समय में सातो आइको जैसी आवाज, जो कहे कि ‘हर बात पर इतना शोर क्यों?’, हमें ठहरकर सोचने पर मजबूर करती है।

उनकी बेबाकी विवाह और निजी संबंधों को लेकर भी दिखती थी। उन्होंने अपने अनुभवों को देखते हुए रिश्तों के रोमानी मिथकों पर आंख मूंदकर विश्वास नहीं किया। भारत जैसे समाज में, जहां विवाह अब भी सामाजिक संस्था के रूप में अत्यंत महत्वपूर्ण है, यह दृष्टि असहज कर सकती है। लेकिन शायद यही असहजता जरूरी भी है। साहित्य का काम केवल सांत्वना देना नहीं, भ्रम तोड़ना भी होता है।

सातो आइको की भाषा में जो ‘कड़वाहट’ सुनाई देती है, वह दरअसल जीवन के प्रति उनकी गहरी संलग्नता का दूसरा नाम है। उदासीन व्यक्ति तंज नहीं करता; तंज वही करता है जिसे समाज की दिशा से सचमुच फर्क पड़ता है। इस अर्थ में उनकी कठोरता निराशा नहीं, सक्रिय नैतिक बेचैनी थी। वे जीवन से भागी नहीं थीं, बल्कि उसे अंत तक पकड़कर बैठी रहीं—उसकी विडंबनाओं सहित।

भारत के लिए उनकी विरासत का अर्थ

सातो आइको के निधन पर भारतीय हिंदी पाठक को क्यों ठहरकर पढ़ना चाहिए? पहला कारण यह है कि वे हमें वृद्धावस्था को नए ढंग से देखने की चुनौती देती हैं। भारत भी तेजी से बदलते जनसांख्यिकीय दौर में प्रवेश कर रहा है। शहरों में अकेले रह रहे बुजुर्ग, प्रवासी संतानों के माता-पिता, स्वास्थ्य सेवाओं का दबाव, पेंशन और सुरक्षा की चिंता, और डिजिटल दुनिया से बने नए अंतर—ये सभी प्रश्न हमारे समाज के सामने भी हैं। ऐसे समय में बुढ़ापे पर ईमानदार लेखन बहुत जरूरी है।

दूसरा कारण यह है कि सातो आइको हमें बताती हैं कि साहित्य का मूल्य ‘सुसंस्कृत’ भाषा भर में नहीं होता। जीवन की खुरदरी सच्चाई, थोड़ी चुभती हुई वाणी, और नैतिक सजावट से इनकार भी साहित्य को ताकत दे सकते हैं। हिंदी में भी ऐसी आवाजों की हमेशा जरूरत रही है, जो शिष्टाचार के दबाव में सच को धीमा न करें।

तीसरा कारण एशियाई सांस्कृतिक संवाद से जुड़ा है। भारत में कोरियाई संस्कृति के प्रति उत्साह आज मुख्यतः के-ड्रामा, के-पॉप, ब्यूटी ट्रेंड और फूड संस्कृति के स्तर पर दिखाई देता है। लेकिन अगर हमें इस सांस्कृतिक संवाद को गहरा बनाना है, तो हमें वहां के समाज द्वारा पढ़े जा रहे साहित्य, निबंध और सार्वजनिक विचार को भी समझना होगा। कोरिया में सातो आइको को जिस तरह पढ़ा गया, वह बताता है कि वहां की दिलचस्पी केवल चमकदार सांस्कृतिक उत्पादों तक सीमित नहीं है; वहां बुढ़ापे, समाज और अकेलेपन पर गंभीर लेखन भी पाठक जुटा रहा है।

चौथा कारण बहुत मानवीय है। सातो आइको की रचनाएं हमें यह एहसास कराती हैं कि जीवन का अर्थ हर हालत में व्यवस्थित, अनुशासित और ‘सफल’ दिखना नहीं है। कई बार अस्त-व्यस्त, अपूर्ण, असहज जीवन ही सबसे सच्ची भाषा पैदा करता है। यह बात उस भारतीय मध्यवर्ग के लिए खास अर्थ रखती है जो उपलब्धि, आत्म-प्रबंधन और सामाजिक प्रतिष्ठा के दबाव में लगातार जी रहा है।

अंततः सातो आइको की विरासत हमें यह भी सिखाती है कि उम्र के साथ व्यक्ति केवल स्मृति नहीं बनता; वह दृष्टि भी बन सकता है। 102 वर्ष की उम्र तक लिखना रिकॉर्ड भर नहीं, एक सभ्यतागत संदेश है—कि मनुष्य का अनुभव, यदि वह ईमानदारी से व्यक्त हो, तो वह किसी भी उम्र में समकालीन हो सकता है। सातो आइको अब नहीं रहीं, लेकिन उन्होंने बुढ़ापे को जिस निर्भीक भाषा में लिखा, वह एशिया के पाठकों के बीच लंबे समय तक जीवित रहेगी। शायद इसलिए भी कि हम सब, चाहे भारत में हों, कोरिया में या जापान में, अंततः उसी सवाल से जूझ रहे हैं: ठीक-ठाक, सम्मानजनक और सच्चे ढंग से जीना आखिर किसे कहते हैं?

सातो आइको का उत्तर सरल नहीं था। वह प्रेरक पोस्टर वाला उत्तर भी नहीं था। वह कुछ ऐसा था—जीवन सुंदर हो तो ठीक, न हो तब भी उससे मुंह मत मोड़ो; दुनिया बेतुकी लगे तो उसे पहचानो; उम्र बढ़े तो उसकी तकलीफ स्वीकार करो; और यदि कहना हो, तो खुलकर कहो। यही उनकी लेखकीय जिद थी। यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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