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माता-पिता से एक फोन कॉल भी बन सकता है स्वास्थ्य जांच: कोरिया की चेतावनी, भारत के परिवारों के लिए बड़ा सबक

माता-पिता से एक फोन कॉल भी बन सकता है स्वास्थ्य जांच: कोरिया की चेतावनी, भारत के परिवारों के लिए बड़ा सबक

आशीर्वाद, हालचाल और छिपे हुए संकेत

भारत में हम अक्सर कहते हैं कि परिवार सिर्फ खून का रिश्ता नहीं, बल्कि रोजमर्रा की चिंता, हालचाल और जिम्मेदारी का नाम है। यही बात दक्षिण कोरिया की एक हालिया स्वास्थ्य सलाह को भारतीय संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण बना देती है। कोरिया में ‘ओबोरिनाल’ या ‘पैरेंट्स डे’ एक ऐसा दिन है जब बच्चे अपने माता-पिता से मिलते हैं, फूल देते हैं, आभार जताते हैं और परिवार साथ बैठता है। यह कुछ-कुछ हमारे यहां मातृ-पितृ वंदना, श्रवण कुमार की परंपरा, बुजुर्गों के चरण छूने की संस्कृति और त्योहारों पर परिवार के जुटने जैसी भावना से जुड़ा हुआ है। लेकिन इस सांस्कृतिक आदर के बीच एक व्यावहारिक और जरूरी संदेश सामने आया है: माता-पिता से हालचाल पूछना सिर्फ भावनात्मक शिष्टाचार नहीं, बल्कि उनकी सेहत की पहली जांच भी हो सकता है।

सियोल के एक बड़े अस्पताल ने चेतावनी दी है कि बुजुर्गों में कई बार गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं अचानक सीने में तेज दर्द, बेहोशी या गिर जाने जैसी नाटकीय घटनाओं से शुरू नहीं होतीं। अक्सर शुरुआत बेहद मामूली दिखने वाले बदलावों से होती है—जैसे खाना कम कर देना, बातचीत में रुचि घट जाना, चलने-फिरने की रफ्तार धीमी पड़ जाना, या एक ही सवाल बार-बार पूछना। परिवार इन संकेतों को अक्सर एक ही वाक्य में समेट देता है: “उम्र हो गई है, ऐसा तो होता है।” समस्या यही है। जो बदलाव वास्तव में आपात स्थिति का शुरुआती संकेत हो सकते हैं, वे ‘बुढ़ापे की सामान्य बात’ मानकर टाल दिए जाते हैं।

यह संदेश भारतीय समाज के लिए खास तौर पर इसलिए अहम है क्योंकि यहां भी तेजी से एक ऐसा पारिवारिक ढांचा बन रहा है जिसमें बच्चे नौकरी, पढ़ाई या विवाह के कारण दूसरे शहरों में रहते हैं और बुजुर्ग माता-पिता छोटे शहरों, कस्बों या अपने पुश्तैनी घरों में अकेले या लगभग अकेले रहते हैं। एक समय था जब संयुक्त परिवार में दादा-दादी, चाचा-चाची, पोते-पोती सब एक छत के नीचे रहते थे और किसी बुजुर्ग के व्यवहार में बदलाव तुरंत पकड़ में आ जाता था। आज महानगरों की जिंदगी, प्रवास और व्यस्तता ने उस स्वाभाविक निगरानी को कम कर दिया है। ऐसे में महीने में एक मुलाकात या हफ्ते में दो फोन कॉल ही कई बार वह खिड़की बन जाते हैं जहां से परिवार बुजुर्गों की बदलती हालत को देख सकता है।

यहीं से इस पूरी सलाह का भारतीय अर्थ निकलता है। माता-पिता से बात करना सिर्फ संस्कार नहीं, स्वास्थ्य सुरक्षा का माध्यम भी है। जिस तरह हम बच्चों की भूख, नींद, पढ़ाई और व्यवहार में मामूली बदलाव देखकर चौकन्ने हो जाते हैं, उसी तरह बुजुर्गों के मामले में भी हमें यही संवेदनशीलता विकसित करनी होगी। फर्क सिर्फ इतना है कि बच्चों के संकेत हमें जल्दी दिखाई देते हैं, जबकि बुजुर्ग अपनी तकलीफ छिपा लेते हैं, कम बोलते हैं या दूसरों को परेशान न करने के लिए चुप रहना बेहतर समझते हैं।

‘उम्र का असर’ और ‘बीमारी का संकेत’—फर्क समझना क्यों जरूरी है

कोरियाई चिकित्सकों की सलाह का सबसे महत्वपूर्ण शब्द है—‘अचानक बदलाव’। उम्र बढ़ने के साथ शरीर में परिवर्तन होना स्वाभाविक है। चलने की गति कुछ धीमी हो सकती है, नींद का पैटर्न बदल सकता है, भूख पहले जैसी न रहे, याददाश्त में हल्की कमी हो सकती है। लेकिन यदि ये बदलाव लंबे समय में धीरे-धीरे आए हों तो डॉक्टर उन्हें उम्र से जुड़ी सामान्य प्रक्रिया के भीतर देख सकते हैं। चिंता तब बढ़ती है जब किसी व्यक्ति के सामान्य व्यवहार, क्षमता या सोच में कम समय में स्पष्ट अंतर दिखने लगे।

उदाहरण के लिए, यदि आपके पिता हमेशा नियमित रूप से सुबह की सैर पर जाते थे, अखबार पूरा पढ़ते थे, चाय के साथ राजनीति पर चर्चा करते थे और अचानक पिछले कुछ दिनों में उठने में सुस्ती, बात करने में अरुचि और खाने में कमी दिखने लगे, तो इसे सिर्फ “मौसम का असर” या “उम्र हो गई” कहकर छोड़ना जोखिम भरा हो सकता है। उसी तरह यदि आपकी मां जो हमेशा घर के कामकाज और रिश्तेदारों के फोन पर सक्रिय रहती थीं, अचानक चुप रहने लगी हैं, एक ही बात दोहराने लगी हैं, या साधारण निर्देश भूलने लगी हैं, तो परिवार को इसे ध्यान से लेना चाहिए।

भारत में एक बड़ी सामाजिक प्रवृत्ति यह भी है कि बुजुर्ग स्वयं भी बीमारी को कम करके बताते हैं। कई माता-पिता अपने बच्चों को परेशान नहीं करना चाहते। वे कहते हैं, “सब ठीक है”, “बस थोड़ी कमजोरी है”, “उम्र हो गई है, क्या ही होगा”, “तुम अपनी नौकरी देखो।” यह भाव भारतीय परिवारों में बहुत परिचित है। लेकिन कई बार यह विनम्रता और त्यागभाव, स्वास्थ्य के मामले में देरी का कारण बन जाता है। डॉक्टरों का कहना है कि देर से अस्पताल पहुंचने का मतलब यह हो सकता है कि इलाज की खिड़की छोटी हो गई हो।

यही वजह है कि परिवार को चिकित्सक बनना नहीं है, लेकिन पर्यवेक्षक जरूर बनना है। आपको बीमारी का नाम नहीं बताना, बस यह पहचानना है कि “पहले ऐसा नहीं था।” यह वाक्य ही अक्सर सबसे महत्वपूर्ण होता है। बड़े शहरों में रहने वाले बच्चों के लिए यह और भी जरूरी है क्योंकि वे रोज माता-पिता को देखते नहीं। ऐसे में किसी मुलाकात का पहला प्रभाव, आवाज के उतार-चढ़ाव में फर्क, फोन पर जवाब देने में देरी—ये सब ऐसे छोटे संकेत हैं जिन्हें हल्के में नहीं लेना चाहिए।

चार संकेत जिन पर परिवार को तुरंत ध्यान देना चाहिए

कोरियाई अस्पताल ने जिन संकेतों पर जोर दिया, वे इतने सरल हैं कि कोई भी परिवार उन्हें समझ सकता है। पहला संकेत है—खाने की मात्रा में कमी। बुजुर्ग यदि पहले की तुलना में बहुत कम खाने लगें, खाना बनाने या खाने में दिलचस्पी खो दें, या बार-बार कहें कि भूख नहीं है, तो यह सामान्य स्वाद परिवर्तन से आगे की बात हो सकती है। भोजन केवल पेट भरने का मामला नहीं, बल्कि शरीर की ऊर्जा, मानसिक स्थिति, संक्रमण, दवा के असर और कई आंतरिक समस्याओं का एक मूल संकेतक है। भारतीय घरों में रसोई से व्यक्ति की हालत का अंदाजा अक्सर लगा लिया जाता है। जो मां सबके लिए थाली सजाती थी, यदि अब अपनी थाली ही अधूरी छोड़ रही है, तो यह परिवार के लिए एक चेतावनी होनी चाहिए।

दूसरा संकेत है—बातचीत की मात्रा और शैली में बदलाव। पहले जो व्यक्ति खुलकर बात करता था, यदि वह अब छोटे-छोटे जवाब देने लगे, आवाज में ऊर्जा कम हो जाए, बातों में रुचि घटे या फोन पर जल्दी थकने लगे, तो यह सिर्फ मन न होने का मामला नहीं भी हो सकता है। कई बार शारीरिक कमजोरी, अवसाद, संज्ञानात्मक बदलाव या अन्य स्वास्थ्य समस्याएं व्यक्ति के संवाद को बदल देती हैं। भारतीय परिवारों में यह अक्सर नजरअंदाज हो जाता है क्योंकि हम सोचते हैं कि “बुजुर्गों का मूड बदलता रहता है।” लेकिन मूड और स्वास्थ्य के बीच संबंध गहरा है।

तीसरा संकेत है—व्यवहार और गति का धीमा पड़ जाना। चलने, उठने, बैठने, कपड़े पहनने, फोन उठाने, जवाब देने या रोज की छोटी गतिविधियों में यदि स्पष्ट सुस्ती दिखे, तो इसे नोट करना चाहिए। यह कमजोरी, दर्द, दवा के दुष्प्रभाव, संक्रमण, हृदय की समस्या या न्यूरोलॉजिकल कारणों से जुड़ा हो सकता है। परिवार को यह देखना चाहिए कि बदलाव कब से है और कितना तीव्र है। यदि यह अचानक है, तो मामला अधिक गंभीर हो सकता है।

चौथा संकेत है—एक ही सवाल बार-बार पूछना। यह बिंदु भारतीय पाठकों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि घरों में बुजुर्गों की भूलचूक को हम मजाक में टाल देते हैं। “अरे, दादाजी तो रोज यही पूछते हैं”, “मां को तो सब भूलता रहता है”—ऐसी टिप्पणियां आम हैं। लेकिन यदि प्रश्नों की पुनरावृत्ति अचानक बढ़ी हो, अगर व्यक्ति कुछ मिनट पहले कही गई बात भूल जाए, या बातचीत का धागा पकड़ने में कठिनाई होने लगे, तो यह सिर्फ सामान्य भुलक्कड़पन नहीं भी हो सकता है। ऐसे मामलों में चिकित्सकीय मूल्यांकन जरूरी हो सकता है।

इन चार संकेतों की खूबी यही है कि इन्हें समझने के लिए कोई मशीन, रिपोर्ट या मेडिकल डिग्री नहीं चाहिए। यह परिवार के अनुभव से जुड़े संकेत हैं। जो बेटा या बेटी अपने माता-पिता की आदतों को जानता है, वही सबसे पहले फर्क पकड़ सकता है। इसलिए स्वास्थ्य प्रणाली की पहली कड़ी अस्पताल नहीं, घर हो सकता है।

भारत में बदलता परिवार और अकेले होते बुजुर्ग

यह सलाह भारत में इसलिए और प्रासंगिक है क्योंकि यहां वृद्धजन आबादी लगातार बढ़ रही है। देश के कई हिस्सों में माता-पिता गांव या कस्बे में रहते हैं, जबकि बच्चे दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, पुणे, हैदराबाद या विदेशों में। त्योहारों, शादी-ब्याह और छुट्टियों पर ही लंबी मुलाकात हो पाती है। इस दूरी ने बुजुर्गों की देखभाल की प्रकृति बदल दी है। संयुक्त परिवार की ‘नजर’ अब मोबाइल स्क्रीन, व्हाट्सऐप कॉल और कभी-कभार की घरेलू यात्रा में सिमट गई है।

ऐसे में भारतीय परिवारों को अपने ‘हालचाल’ की संस्कृति को थोड़ा अधिक सजग बनाना होगा। हम अक्सर फोन पर पूछते हैं—“खाना खा लिया?”, “दवा ली?”, “सब ठीक?”—और जवाब आता है—“हां, सब ठीक।” लेकिन अब शायद सवालों को थोड़ा गहराना होगा। जैसे—आज क्या खाया? कितनी रोटी खाई? सुबह टहलने गए थे? किससे बात हुई? कल वाली बात याद है? गैस बंद की थी? दवा का डिब्बा कहां रखा है? ये सवाल जासूसी नहीं, बल्कि पैटर्न समझने का तरीका हो सकते हैं।

भारतीय संदर्भ में एक और पहलू महत्वपूर्ण है—बहुओं, बेटियों और पड़ोस की भूमिका। कई घरों में बेटे बाहर रहते हैं लेकिन पड़ोसन आंटी, किराने वाला, दूधवाला, घरेलू सहायक या पास रहने वाली विवाहित बेटी ज्यादा बारीकी से देख पाती है कि बुजुर्ग का रूटीन बदला है या नहीं। हमारे समाज में अभी भी मोहल्ला और रिश्तेदारी की एक सामाजिक पूंजी मौजूद है। यदि इसे संवेदनशील ढंग से जोड़ा जाए, तो यह बुजुर्ग सुरक्षा का अनौपचारिक लेकिन प्रभावी नेटवर्क बन सकता है।

यह भी सच है कि भारत में कई परिवार आर्थिक और भावनात्मक दबावों से गुजर रहे हैं। हर कोई बार-बार यात्रा नहीं कर सकता, हर किसी के पास केयरगिवर रखने की क्षमता नहीं होती। इसलिए फोन, वीडियो कॉल और परिवार के साझा संदेश समूह अब केवल सुविधा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य निगरानी के उपकरण बन सकते हैं। कोरियाई विशेषज्ञों का संदेश यही है कि अवसर का इंतजार मत कीजिए; जो माध्यम उपलब्ध है, उसी से संकेत पकड़िए।

दिल, दिमाग और समय: देर क्यों खतरनाक है

इस सलाह में एक विशेष चेतावनी हृदय रोग जैसे आपात मामलों को लेकर भी है। डॉक्टरों ने कहा है कि दिल से जुड़ी गंभीर स्थितियों में समय सबसे बड़ा कारक होता है। यह बात भारत के लिए भी उतनी ही सच है, जहां हार्ट अटैक, स्ट्रोक, मधुमेह से जुड़ी जटिलताएं और उच्च रक्तचाप बुजुर्गों में आम हैं। समस्या यह है कि हर आपात स्थिति फिल्मी अंदाज में सामने नहीं आती। कई बार बुजुर्ग सिर्फ इतना कहते हैं कि कमजोरी लग रही है, मन नहीं है, भूख नहीं है, या बहुत सुस्ती महसूस हो रही है। परिवार इन संकेतों को ‘सामान्य थकान’ मानकर देर कर देता है।

यदि किसी बुजुर्ग की स्थिति में अचानक गिरावट दिखे—जैसे उठने में मुश्किल, चेहरे पर थकान, सामान्य बातचीत में कमी, भ्रम, असामान्य चुप्पी, सांस में परेशानी, या बार-बार एक बात पूछना—तो परिवार को कम से कम चिकित्सकीय सलाह लेने में देर नहीं करनी चाहिए। कई गंभीर स्थितियों में शुरुआती कुछ घंटे बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। जितनी देर हम यह तय करने में लगाते हैं कि यह ‘सचमुच बीमारी’ है या नहीं, उतनी देर में इलाज की संभावना कमजोर पड़ सकती है।

भारतीय परिवारों में एक आम प्रवृत्ति है—पहले घरेलू उपाय, फिर पास के परिचित से सलाह, फिर किसी रिश्तेदार की राय, और आखिर में डॉक्टर। यह सिलसिला कई मामलों में ठीक भी हो सकता है, लेकिन अचानक आए व्यवहारिक और कार्यात्मक बदलावों में यह देरी घातक हो सकती है। जरूरी नहीं कि हर बदलाव आपात स्थिति हो, लेकिन यह भी जरूरी नहीं कि हर बदलाव सामान्य हो। सावधानी का मतलब घबराहट नहीं, बल्कि समय रहते मूल्यांकन कराना है।

विशेषज्ञों के अनुसार, बुजुर्गों के स्वास्थ्य में शुरुआती संकेत अक्सर ‘फंक्शन’ यानी कार्यक्षमता में गिरावट के रूप में दिखते हैं—वे पहले जैसी आसानी से खाना नहीं खाते, फोन नहीं उठाते, बात नहीं करते, चलने में ढीलापन आता है, निर्देश भूलते हैं। यह शरीर का तरीका है यह बताने का कि अंदर कुछ गड़बड़ है। परिवार अगर इन संकेतों को जल्द पहचान ले, तो नुकसान कम किया जा सकता है।

फोन पर भी हो सकती है स्वास्थ्य की पहली जांच

हर परिवार रोज जाकर माता-पिता से मिल नहीं सकता। यही कारण है कि फोन कॉल की अहमियत बहुत बढ़ जाती है। भारत में भी सुबह-शाम की एक छोटी कॉल कई घरों का नियमित हिस्सा है। अक्सर इसे औपचारिकता मान लिया जाता है, लेकिन यदि थोड़ी सजगता जोड़ दी जाए तो यही कॉल बुजुर्ग की मानसिक और शारीरिक दशा का संकेत दे सकती है।

फोन पर किन बातों पर ध्यान दिया जाए? सबसे पहले—क्या वे जल्दी फोन उठा रहे हैं या असामान्य देर हो रही है? दूसरा—क्या आवाज में सामान्य उत्साह है या बहुत सुस्ती? तीसरा—क्या वे सवाल समझने में समय ले रहे हैं? चौथा—क्या वे उसी बात को दोबारा पूछ रहे हैं? पांचवां—क्या वे भोजन, दवा, नींद या दिनचर्या के बारे में साफ जवाब दे पा रहे हैं? यदि इन बिंदुओं में बदलाव दिखे, तो उसे याद रखिए, लिखिए और जरूरत पड़े तो किसी स्थानीय रिश्तेदार या डॉक्टर से संपर्क कीजिए।

वीडियो कॉल हो तो और भी बेहतर। चेहरा, बैठने का ढंग, आसपास की व्यवस्था, कपड़ों की स्थिति, आंखों की चमक, सांस की गति—बहुत कुछ दिखाई देता है। भारतीय परिवारों में अब स्मार्टफोन का प्रसार इतना बढ़ गया है कि तकनीक को भावनात्मक संपर्क से आगे ले जाकर स्वास्थ्य निगरानी के न्यूनतम साधन के रूप में उपयोग किया जा सकता है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि हर कॉल पूछताछ कक्ष बन जाए। बात करने का अंदाज सहज, स्नेहपूर्ण और सम्मानजनक होना चाहिए, ताकि बुजुर्गों को निगरानी नहीं, सहारा महसूस हो।

कई विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि परिवार एक सरल साप्ताहिक नोट बना सकता है—भूख कैसी रही, नींद कैसी रही, बाहर निकले या नहीं, दवा नियमित ली या नहीं, किसी बात की पुनरावृत्ति तो नहीं हुई। यह आदत भविष्य में डॉक्टर से बातचीत के समय बहुत उपयोगी साबित हो सकती है।

देखिए, लिखिए, और जरूरत हो तो तुरंत डॉक्टर तक पहुंचिए

कोरियाई चिकित्सक का सबसे व्यावहारिक सुझाव था—परिवर्तनों को देखें और दर्ज करें। भारतीय परिवारों के लिए यह सलाह बेहद उपयोगी है। हम अक्सर चिंता तो करते हैं, लेकिन तथ्य इकट्ठा नहीं करते। अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टर पूछते हैं—कब से भूख कम है? कितनी कम? क्या बातचीत में फर्क अचानक आया? क्या एक ही सवाल कई बार पूछ रहे हैं? चलने में सुस्ती कब शुरू हुई?—और परिवार के पास अक्सर अस्पष्ट जवाब होते हैं। अगर तारीख, समय, व्यवहार और परिवर्तन का मोटा लेखा हो, तो चिकित्सकीय निर्णय अधिक स्पष्ट हो सकता है।

यह रिकॉर्ड बहुत औपचारिक होने की जरूरत नहीं। मोबाइल के नोट्स ऐप में, व्हाट्सऐप के निजी चैट बॉक्स में, डायरी में या परिवार के साझा समूह में छोटी-सी प्रविष्टि भी काफी है। जैसे—“10 मई: मां ने दोपहर का खाना आधा छोड़ा”, “12 मई: पिताजी ने एक ही बात तीन बार पूछी”, “13 मई: आवाज बहुत धीमी लगी”, “14 मई: सुबह की सैर नहीं की, कमजोरी बताई।” ऐसे नोट परिवार के भीतर मतभेद भी कम कर सकते हैं। एक भाई कहे कि सब ठीक है, दूसरा कहे कि नहीं—तो लिखित संकेत निर्णय को अधिक वस्तुनिष्ठ बनाते हैं।

साथ ही यह भी समझना जरूरी है कि हर भूल, हर कम भूख या हर चुप्पी बीमारी नहीं होती। पत्रकारिता और चिकित्सा दोनों में एक बात समान है—पैटर्न देखना। एक बार की घटना और लगातार उभरते संकेत में फर्क होता है। फिर भी यदि बदलाव अचानक हो, पहले जैसा न लगे, या तेजी से बढ़े, तो डॉक्टर से सलाह लेने में देर नहीं होनी चाहिए।

भारतीय परिवारों के लिए सबसे बड़ा संदेश शायद यही है: बुजुर्गों की देखभाल केवल दवा खरीद देने या त्योहार पर उपहार भेज देने से पूरी नहीं होती। असली देखभाल उनकी दिनचर्या के सूक्ष्म बदलावों को समझने में है। जिस तरह बचपन में माता-पिता ने हमारे चेहरे की रंगत, भूख, चुप्पी और बेचैनी पढ़ ली थी, अब शायद वही संवेदनशीलता हमें उनके लिए लौटानी होगी।

एक सांस्कृतिक सबक, जो सीमाएं पार करता है

कोरिया का ‘पैरेंट्स डे’ और भारत की पारिवारिक संस्कृति, दोनों अलग सामाजिक पृष्ठभूमि से आते हुए भी एक साझा भाव पर टिके हैं—माता-पिता के प्रति सम्मान। लेकिन सम्मान का आधुनिक अर्थ केवल फूल, मिठाई, फोटो और औपचारिक शुभकामना नहीं है। सम्मान का अर्थ यह भी है कि हम उनकी बदलती जरूरतों को गंभीरता से लें, उनकी चुप्पी के भीतर के संकेत सुनें, और ‘उम्र’ को बहाना बनाकर स्वास्थ्य जोखिमों को न टालें।

आज जब भारत भी तेजी से उम्रदराज समाज की ओर बढ़ रहा है, यह संदेश नीति, समाज और परिवार—तीनों स्तरों पर महत्वपूर्ण है। स्वास्थ्य व्यवस्था अपनी जगह है, लेकिन शुरुआती पहचान अक्सर घर के भीतर होती है। माता-पिता से मिलने का एक दिन, फोन पर पांच अतिरिक्त मिनट, वीडियो कॉल में चेहरे को ध्यान से देखना, एक नोट लिख लेना—ये छोटे कदम किसी बड़ी समस्या को समय रहते पकड़ सकते हैं।

कहने को हालचाल पूछना एक साधारण सामाजिक व्यवहार है। लेकिन बुजुर्गों के मामले में यही पूछताछ कई बार जीवनरक्षक साबित हो सकती है। इसलिए अगली बार जब आप फोन मिलाएं और कहें, “मां, खाना खाया?” या “पापा, कैसे हैं?”—तो जवाब सिर्फ सुनिए मत, उसे समझिए भी। कई बार बीमारी सबसे पहले रिपोर्ट में नहीं, आवाज में दर्ज होती है; एक्स-रे में नहीं, भूख में दिखती है; और अस्पताल पहुंचने से पहले घर की बातचीत में संकेत देती है। परिवार यदि इन संकेतों को पढ़ना सीख ले, तो वही सबसे पहली और सबसे मानवीय स्वास्थ्य सेवा बन सकता है।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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