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वेबटून से वीडियो गेम तक: दक्षिण कोरिया का नया कंटेंट मॉडल, जिससे भारत भी बहुत कुछ सीख सकता है

वेबटून से वीडियो गेम तक: दक्षिण कोरिया का नया कंटेंट मॉडल, जिससे भारत भी बहुत कुछ सीख सकता है

कोरिया में एक समझौता, लेकिन संकेत बहुत बड़े

दक्षिण कोरिया के ग्योंगगी प्रांत के ग्वांगजू शहर में 6 तारीख को हुआ एक समझौता पहली नजर में साधारण शैक्षणिक या संस्थागत सहयोग जैसा लग सकता है। डोंगवॉन विश्वविद्यालय और ‘हिपहॉप वर्ल्ड लीग’ नामक निजी सांस्कृतिक मंच ने गेम कंटेंट विकास और प्रतिभा निर्माण के लिए हाथ मिलाया है। लेकिन इस खबर की असली अहमियत कागज पर लिखे समझौते से कहीं आगे जाती है। यह हमें बताती है कि आज का कोरिया मनोरंजन उद्योग को केवल फिल्मों, धारावाहिकों, के-पॉप या वेबटून की अलग-अलग दुनिया के रूप में नहीं देखता, बल्कि एक पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में गढ़ रहा है—जहां शिक्षा, बौद्धिक संपदा, डिजिटल प्लेटफॉर्म, प्रदर्शन कला और तकनीकी उत्पाद एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

भारतीय पाठकों के लिए इसे समझना आसान हो, तो इसे इस तरह देखिए: जैसे हमारे यहां कोई विश्वविद्यालय, एक ओटीटी कंपनी, एक गेमिंग स्टूडियो, एक कॉमिक्स इकाई और एक लाइव इवेंट नेटवर्क मिलकर किसी ऐतिहासिक या पौराणिक कथा को वेबकॉमिक, मोबाइल गेम, एनीमेशन और मंचीय प्रस्तुति में बदलने की दीर्घकालिक योजना बनाए। फर्क यह है कि दक्षिण कोरिया अब ऐसे प्रयोगों को अपवाद नहीं, बल्कि उद्योग की रणनीति के रूप में अपनाता दिख रहा है। यही वजह है कि डोंगवॉन विश्वविद्यालय और हिपहॉप वर्ल्ड लीग का यह करार केवल स्थानीय खबर नहीं, बल्कि कोरिया के कंटेंट-आधारित विकास मॉडल की झलक है।

इस समझौते का केंद्र डोंगवॉन विश्वविद्यालय का वेबटून क्रिएशन विभाग है। वेबटून, यानी मोबाइल और डिजिटल पढ़ने के लिए तैयार की गई कॉमिक कथा, दक्षिण कोरिया की सबसे प्रभावशाली सांस्कृतिक देनों में से एक है। आज वेबटून केवल पढ़ी जाने वाली सामग्री नहीं, बल्कि फिल्मों, ड्रामा, एनीमेशन, मर्चेंडाइज और गेमिंग के लिए ‘स्रोत सामग्री’ बन चुकी है। इसीलिए जब कोई विश्वविद्यालय अपने वेबटून विभाग को उद्योग-साझेदारी के बीच रखता है, तो वह केवल छात्रों को चित्र बनाना नहीं सिखा रहा होता; वह उन्हें भविष्य की बौद्धिक संपदा तैयार करने वाली पीढ़ी के रूप में देख रहा होता है।

कोरिया के कंटेंट उद्योग का यही नया चरण भारत के लिए दिलचस्प है। हम लंबे समय से कोरियाई ड्रामा, के-पॉप और ब्यूटी इंडस्ट्री के प्रभाव पर चर्चा करते रहे हैं, लेकिन असली खेल वहां है जहां एक कहानी को कई माध्यमों में, कई वर्षों तक, कई बाजारों के लिए ढाला जाता है। डोंगवॉन विश्वविद्यालय का यह कदम इसी परिवर्तन का ताजा उदाहरण है।

समझौते का मूल क्या है और इसमें खास क्या दिखता है

समझौते की प्रत्यक्ष बात साफ है: दोनों संस्थाएं मिलकर गेम कंटेंट विकसित करेंगी और नई प्रतिभा तैयार करेंगी। लेकिन असली महत्व इस दोहरे फोकस में है। एक तरफ बाजार के लिए उत्पाद तैयार करना, दूसरी ओर उन्हीं उत्पादों को लगातार बनाने वाली मानव-शक्ति तैयार करना—यानी ‘आउटपुट’ और ‘टैलेंट पाइपलाइन’ को एक ही ढांचे में रखना। यही वह बिंदु है जो इस सहयोग को सामान्य एमओयू से अलग बनाता है।

अक्सर विश्वविद्यालयों और निजी संस्थाओं के बीच समझौते औपचारिक घोषणाओं तक सीमित रह जाते हैं। प्रेस विज्ञप्ति आती है, कुछ फोटो छपते हैं और फिर बात ठंडी पड़ जाती है। लेकिन यहां जिस तरह शिक्षा, कंटेंट, मीडिया और परफॉर्मेंस प्लेटफॉर्म को एक धुरी में जोड़ने की बात की गई है, उससे स्पष्ट है कि सहयोग को अलग-अलग परियोजनाओं तक सीमित नहीं रखा जाना है। यह एक ‘संरचनात्मक सहयोग मॉडल’ की भाषा है—यानि ऐसा ढांचा जिसमें छात्र, शिक्षक, रचनात्मक विशेषज्ञ, मंच संचालक और उद्योग भागीदार एक ही वैल्यू चेन में काम करें।

भारतीय संदर्भ में कहें तो यह वैसा ही है जैसे किसी राज्य विश्वविद्यालय का फाइन आर्ट्स या एनीमेशन विभाग किसी बड़े गेमिंग स्टूडियो के साथ मिलकर केवल इंटर्नशिप कार्यक्रम न चलाए, बल्कि मिलकर बौद्धिक संपदा विकसित करे। छात्र अवधारणा और चरित्र निर्माण में भूमिका निभाएं, शिक्षक सृजनात्मक और वैचारिक दिशा दें, निजी संस्था उसे बाजार-योग्य उत्पाद में बदलने की रणनीति बनाए, और फिर वही सामग्री डिजिटल प्लेटफॉर्म तथा लाइव इवेंट के जरिए जनता तक पहुंचे।

कोरिया में यह मॉडल नई बात नहीं कि कंटेंट को उद्योग की तरह देखा जाए, लेकिन यहां जो बात ध्यान खींचती है वह यह है कि अब विश्वविद्यालय को केवल ‘भविष्य के कर्मचारियों’ की फैक्टरी नहीं, बल्कि ‘वर्तमान के सह-निर्माता’ की भूमिका दी जा रही है। यह बदलाव केवल शिक्षा नीति का संकेत नहीं, बल्कि आर्थिक रणनीति का हिस्सा है।

इसीलिए यह खबर मनोरंजन पन्ने की सीमा पार करके अर्थव्यवस्था, श्रम बाजार और सांस्कृतिक कूटनीति तक जाती है। जब कोई देश अपनी रचनात्मक शिक्षा को उद्योग के साथ इतनी बारीकी से जोड़ता है, तो वह यह भी तय कर रहा होता है कि आने वाले वर्षों में उसकी सॉफ्ट पावर किस आधार पर टिकेगी।

वेबटून, गेम और परफॉर्मेंस: कोरिया क्यों बना रहा है एकीकृत कंटेंट इकोसिस्टम

समझौते में सबसे दिलचस्प बात यह है कि गेम कंटेंट, वेबटून, एनीमेशन, मीडिया और प्रदर्शन मंचों को अलग-अलग खानों में नहीं रखा गया। यह आधुनिक कोरियाई कंटेंट रणनीति की पहचान है। एक कहानी पहले वेबटून में जन्म ले सकती है, फिर उसे एनीमेशन में दृश्य रूप मिल सकता है, उसके बाद उसी ब्रह्मांड पर गेम बन सकता है, फिर लाइव शो, प्रदर्शनी, म्यूजिक सहयोग और वैश्विक डिजिटल मार्केटिंग के जरिए उसका जीवन चक्र लंबा किया जा सकता है।

इसे समझने के लिए भारतीय पाठक अपने अनुभव से तुलना कर सकते हैं। हमारे यहां ‘महाभारत’, ‘बाहुबली’, ‘छोटा भीम’ या हाल के वर्षों में पौराणिक और ऐतिहासिक विषयों पर आधारित दृश्य-श्रव्य कंटेंट को देखें। यदि इन्हें शुरू से ही इस सोच के साथ डिजाइन किया जाए कि कहानी केवल फिल्म या धारावाहिक नहीं, बल्कि गेम, ग्राफिक नॉवेल, स्कूल-स्तरीय शैक्षणिक मॉड्यूल, थीम्ड लाइव इवेंट और अंतरराष्ट्रीय लाइसेंसिंग उत्पाद भी बन सकती है, तो उनका आर्थिक मूल्य कई गुना बढ़ जाता है। कोरिया अब यही काम व्यवस्थित तरीके से कर रहा है।

वेबटून की भूमिका यहां विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। वेबटून मूलतः डिजिटल-पहले कहानी कहने की शैली है, जो तेज गति से पढ़ी जाती है, दृश्य रूप से आकर्षक होती है और पात्रों तथा संसार-निर्माण के लिए एक मजबूत आधार देती है। यही तत्व गेमिंग में बहुत काम आते हैं। गेम केवल तकनीक नहीं, कथा और चरित्र की दुनिया पर भी निर्भर करता है। एक अच्छे गेम का भावनात्मक निवेश अक्सर उसकी कहानी, संघर्ष और नायकीय यात्रा से बनता है। ऐसे में वेबटून विभाग को केंद्र में रखना रणनीतिक फैसला है।

हिपहॉप वर्ल्ड लीग का जुड़ना भी सिर्फ नाम के स्तर पर दिलचस्प नहीं है। इससे संकेत मिलता है कि कोरिया कंटेंट निर्माण को केवल स्क्रीन तक सीमित नहीं रखना चाहता। परफॉर्मेंस प्लेटफॉर्म यानी लाइव ऑडियंस, सांस्कृतिक आयोजन, मंचीय ब्रांडिंग और फैन-समुदाय के साथ जुड़ाव—ये सब किसी बौद्धिक संपदा की पहचान मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। आज के दौर में फैनडम केवल दर्शक नहीं, एक आर्थिक शक्ति है। के-पॉप ने यह दुनिया को सिखाया है। अब वही तर्क गेम और वेबटून आधारित बौद्धिक संपदा पर भी लागू होता दिख रहा है।

दूसरे शब्दों में, कोरिया का नया मॉडल यह कहता है कि कहानी, तकनीक, शिक्षा और फैन-एंगेजमेंट को एक ही व्यवसायिक ढांचे में रखो। यही वजह है कि वहां कंटेंट उद्योग केवल कला का मामला नहीं, राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मकता का विषय बन चुका है।

‘इ सुन-शिन, अमर लहर’ परियोजना: इतिहास को बौद्धिक संपदा में बदलने की कोशिश

इस सहयोग का सबसे ठोस हिस्सा वह संयुक्त परियोजना है जिसका नाम है ‘इ सुन-शिन, अमर लहर’—कोरियाई नौसैनिक नायक एडमिरल यी सुन-शिन पर आधारित गेम कंटेंट बौद्धिक संपदा विकसित करने की योजना। भारतीय पाठकों के लिए यह नाम समझना जरूरी है। यी सुन-शिन कोरिया के इतिहास में अत्यंत सम्मानित सैन्य नायक माने जाते हैं, कुछ-कुछ वैसे ही जैसे भारत में छत्रपति शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप या समुद्री परंपरा के संदर्भ में कान्होजी आंग्रे का स्मरण किया जाता है। वे सिर्फ इतिहास की किताबों के पात्र नहीं, राष्ट्रीय आत्मसम्मान और प्रतिरोध की प्रतीक छवि हैं।

ऐसे ऐतिहासिक व्यक्तित्व को गेम कंटेंट में बदलना केवल मनोरंजन का प्रयास नहीं है। यह सांस्कृतिक स्मृति को डिजिटल अर्थव्यवस्था से जोड़ने की कोशिश है। आज दुनिया भर में इतिहास और मिथक आधारित गेम बड़ी सफलता हासिल करते हैं, क्योंकि वे मनोरंजन के साथ पहचान और गौरव की भावना भी जगाते हैं। कोरिया शायद यह समझ चुका है कि उसके ऐतिहासिक नायकों, लोककथाओं और सांस्कृतिक प्रतीकों का मूल्य तभी अधिक है जब उन्हें नई पीढ़ी की भाषा—यानी इंटरैक्टिव मीडिया—में रूपांतरित किया जाए।

भारत में भी यह सवाल कई बार उठता है कि क्या हमारी सभ्यतागत और ऐतिहासिक संपदा को गेमिंग, एनीमेशन और डिजिटल कॉमिक्स में पर्याप्त रूप से बदला गया है। सच यह है कि संभावनाएं बहुत बड़ी हैं, लेकिन संस्थागत समन्वय अभी भी बिखरा हुआ है। कोरिया का यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह दिखाता है कि इतिहास-आधारित बौद्धिक संपदा को विश्वविद्यालय, रचनाकार और निजी मंच मिलकर विकसित कर सकते हैं। यानी राष्ट्रकथा और बाजार एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि साझेदार भी बन सकते हैं—यदि प्रस्तुति संवेदनशील और पेशेवर हो।

‘बौद्धिक संपदा’ या आईपी का विचार भी यहां समझना जरूरी है। इसका मतलब सिर्फ कॉपीराइट नहीं, बल्कि किसी कहानी, चरित्र, दृश्य शैली, नाम और उससे जुड़े ब्रांड-मूल्य को एक ऐसे संपत्ति-समूह में बदलना है जिसे कई माध्यमों में इस्तेमाल किया जा सके। जब कोई देश अपने कंटेंट को आईपी के रूप में सोचता है, तो वह एक फिल्म या एक किताब की सफलता से आगे बढ़कर ‘फ्रेंचाइज़’ के स्तर पर योजना बनाता है। कोरिया यही कर रहा है।

इस नजरिए से देखें तो ‘इ सुन-शिन, अमर लहर’ परियोजना एक पायलट भर नहीं, बल्कि एक प्रतीक है। यह बताती है कि कोरिया की अगली कंटेंट दौड़ में ऐतिहासिक आख्यान, डिजिटल गेमिंग, युवा प्रतिभा और मंचीय प्रचार—all in one—जुड़ने वाले हैं।

विश्वविद्यालय की बदलती भूमिका: कक्षा से सीधा कंटेंट बाजार तक

डोंगवॉन विश्वविद्यालय की भूमिका इस कहानी का केंद्रीय पहलू है। यहां विश्वविद्यालय सिर्फ स्थल उपलब्ध कराने वाली संस्था नहीं, बल्कि रचनात्मक प्रयोगशाला की तरह सामने आता है। खबर के अनुसार, प्रोफेसर और छात्र उद्योग-सहयोग के आधार पर विभिन्न बौद्धिक संपदा सृजन प्रयोगों में भाग लेंगे। यह बिंदु बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पता चलता है कि कोरिया में उच्च शिक्षा को अब निष्क्रिय अकादमिक प्रशिक्षण के रूप में नहीं, बल्कि उद्योग निर्माण की सक्रिय इकाई के रूप में देखा जा रहा है।

भारत में भी राष्ट्रीय शिक्षा नीति, कौशल विकास और ‘इंडस्ट्री-एकेडेमिया’ सहयोग की बातें खूब होती हैं, पर रचनात्मक उद्योगों में यह जुड़ाव अभी सीमित है। इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट या फार्मा में उद्योग-सम्पर्क अपेक्षाकृत स्थापित हैं, लेकिन एनीमेशन, कॉमिक्स, गेम डिजाइन, प्रदर्शन कला और डिजिटल कहानी कहने जैसे क्षेत्रों में संस्थागत ढांचा अभी विकसित हो रहा है। दक्षिण कोरिया इस क्षेत्र में एक कदम आगे दिखाई देता है, क्योंकि वहां विश्वविद्यालय को केवल डिग्री देने वाला केंद्र नहीं, बल्कि आईपी उत्पादन की नर्सरी बनाया जा रहा है।

इसका आर्थिक मतलब भी है। विश्वविद्यालय प्रयोग का खर्च कम करते हैं, नई सोच को जगह देते हैं, युवाओं की ऊर्जा को परियोजनाओं से जोड़ते हैं और दीर्घकालिक कौशल का निर्माण करते हैं। निजी कंपनियों को इससे प्रशिक्षित और संदर्भ-समझ रखने वाली प्रतिभा मिलती है। छात्रों को सिर्फ प्रमाणपत्र नहीं, वास्तविक परियोजना अनुभव मिलता है। और यदि विकसित आईपी सफल होती है, तो उसका लाभ व्यापक उद्योग को मिलता है।

यानी यह मॉडल ‘जॉब-रेडी’ मानव संसाधन से आगे जाकर ‘इनोवेशन-रेडी’ प्रतिभा तैयार करता है। यही कारण है कि कोरिया की कंटेंट अर्थव्यवस्था लगातार नए रूपों में उभरती रहती है। वहां के विश्वविद्यालय, खासकर कला, मीडिया और डिजिटल स्टोरीटेलिंग से जुड़े विभाग, धीरे-धीरे सांस्कृतिक उद्योग के इनक्यूबेटर बनते जा रहे हैं।

भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह सीखने योग्य बिंदु है। हमारे यहां अगर फाइन आर्ट्स, डिजाइन, थिएटर, एनीमेशन, लोककला और कंप्यूटर साइंस विभागों को साझा परियोजनाओं में व्यवस्थित रूप से जोड़ा जाए, तो क्षेत्रीय भाषाओं और लोककथाओं पर आधारित शक्तिशाली आईपी विकसित हो सकती हैं। कोरिया का उदाहरण बताता है कि यह सपना सांस्कृतिक रोमांस भर नहीं, ठोस आर्थिक नीति का हिस्सा बन सकता है।

हिपहॉप वर्ल्ड लीग की मौजूदगी क्या बताती है

इस सहयोग में ‘हिपहॉप वर्ल्ड लीग’ की भूमिका विशेष ध्यान मांगती है। नाम से यह मंच संगीत और प्रदर्शन संस्कृति से जुड़ा लगता है, लेकिन समझौते का दायरा उससे कहीं व्यापक है। जब कोई परफॉर्मेंस-आधारित मंच गेम कंटेंट और शैक्षिक सहयोग में भागीदार बनता है, तो इसका अर्थ है कि कोरिया अब दर्शक-समुदाय को केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि बहु-माध्यमीय सांस्कृतिक सहभागिता का केंद्र मान रहा है।

के-पॉप की सफलता ने यह साबित कर दिया कि आज की संस्कृति में फैन समुदाय सबसे बड़ी पूंजी है। फैन केवल एल्बम नहीं खरीदते; वे ऑनलाइन चर्चा करते हैं, कार्यक्रमों में जाते हैं, मर्चेंडाइज लेते हैं, गेम खेलते हैं, कहानी के विस्तार में रुचि रखते हैं और ब्रांड को वैश्विक पहचान दिलाते हैं। यदि यही तर्क गेमिंग और ऐतिहासिक या वेबटून आधारित आईपी पर लागू किया जाए, तो मंचीय नेटवर्क और प्रदर्शन-संस्कृति की भूमिका बहुत बढ़ जाती है।

हिपहॉप संस्कृति का जुड़ाव एक और संकेत देता है—कोरिया अपनी कंटेंट अर्थव्यवस्था को पारंपरिक और आधुनिक, दोनों के मेल से आगे बढ़ाना चाहता है। एक ओर इतिहास-आधारित नायक, दूसरी ओर समकालीन युवा संस्कृति; एक ओर विश्वविद्यालय, दूसरी ओर लाइव परफॉर्मेंस प्लेटफॉर्म; एक ओर वेबटून, दूसरी ओर गेमिंग। यह संयोजन बताता है कि वहां सांस्कृतिक उद्योग को ‘जेनर’ नहीं, ‘नेटवर्क’ की तरह समझा जा रहा है।

भारतीय पाठकों के लिए यह मॉडल अपरिचित नहीं होना चाहिए। हमारे यहां भी संगीत महोत्सव, कॉमिक-कॉन, एनीमेशन फेस्टिवल, ई-स्पोर्ट्स और ओटीटी संस्कृति के बीच नए-नए संबंध बन रहे हैं। लेकिन कोरिया जिस अनुशासन और संस्थागत स्पष्टता के साथ इन संबंधों को व्यापारिक मॉडल में ढालता है, वही उसे अलग बनाता है। यह खबर उसी व्यवस्थित सोच का उदाहरण है।

वरिष्ठ रचनात्मक नेतृत्व और उद्योग का संदेश

इस परियोजना में प्रोफेसर किम जे-हो की भागीदारी भी उल्लेखनीय है। वे ‘दल려라 हानी’ और ‘योंगशिमी’ जैसे लोकप्रिय एनीमेशन से जुड़े रहे हैं और अब इस आईपीकरण प्रक्रिया का मार्गदर्शन करेंगे। यहां मुद्दा किसी एक नाम की प्रसिद्धि भर नहीं, बल्कि वह व्यावहारिक अनुभव है जो एक अनुभवी रचनाकार उद्योग-शिक्षा गठजोड़ में लेकर आता है।

रचनात्मक उद्योगों में अक्सर एक बड़ी समस्या यह होती है कि शिक्षा और बाजार के बीच भाषा अलग-अलग हो जाती है। विद्यार्थी और युवा कलाकार कल्पना और प्रयोग में प्रखर होते हैं, लेकिन बाजार की जरूरतें, फॉर्मेट की सीमाएं, दर्शक व्यवहार और लाइसेंसिंग की पेचीदगियां उन्हें कम ज्ञात होती हैं। दूसरी ओर निजी कंपनियां व्यावसायिक दृष्टि तो लाती हैं, लेकिन मौलिक कथा और सांस्कृतिक गहराई हमेशा उनकी पहली ताकत नहीं होती। ऐसे में अनुभवी रचनाकार वह पुल बनते हैं जो सौंदर्यबोध और व्यवसायिक उपयोगिता को साथ ला सकें।

कोरिया का यह मॉडल बताता है कि वहां वरिष्ठ सृजनकर्ताओं को केवल प्रतीकात्मक संरक्षक नहीं, बल्कि परियोजना-निर्देशक की भूमिका दी जा रही है। यह दीर्घकालिक सोच का संकेत है। कंटेंट अर्थव्यवस्था में केवल युवापन काफी नहीं; स्मृति, शिल्प, अनुशासन और व्यावसायिक समझ—सबका संयोजन जरूरी है।

भारत में भी यदि अनुभवी एनीमेशन निर्देशक, लोककथा विशेषज्ञ, इतिहासकार, गेम डिजाइनर और विश्वविद्यालय विभागों को एकीकृत ढंग से जोड़ा जाए, तो क्षेत्रीय भाषाओं में विशाल कंटेंट उछाल संभव है। कोरिया हमें यही दिखा रहा है कि क्रिएटिव इंडस्ट्री सिर्फ सितारों से नहीं चलती, संस्थागत डिजाइन से चलती है।

भारत के लिए सबक: कोरियाई मॉडल से क्या सीखा जा सकता है

इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत जैसे विशाल सांस्कृतिक देश के लिए इसमें क्या सबक है। पहला सबक है—कहानी को संपत्ति की तरह देखना। हमारे पास पौराणिक आख्यान, क्षेत्रीय लोकगाथाएं, स्वतंत्रता आंदोलन के नायक, समकालीन शहरी कथाएं, बच्चों का साहित्य और विशाल कॉमिक परंपरा है। लेकिन इन्हें सुनियोजित आईपी मॉडल में बदलने की हमारी क्षमता अभी सीमित है।

दूसरा सबक है—विश्वविद्यालयों को रचनात्मक अर्थव्यवस्था का भागीदार बनाना। यदि राष्ट्रीय महत्व के संस्थान, राज्य विश्वविद्यालय, निजी डिजाइन स्कूल और क्षेत्रीय कला महाविद्यालय गेमिंग, वेबकॉमिक्स, एनीमेशन और डिजिटल प्रदर्शन से जुड़ी कंपनियों के साथ संरचित सहयोग करें, तो प्रतिभा पलायन कम हो सकता है और स्थानीय उद्योग मजबूत हो सकता है।

तीसरा सबक है—माध्यमों की दीवारें तोड़ना। भारत में फिल्म, टीवी, प्रकाशन, कॉमिक्स, गेमिंग और लाइव इवेंट अभी भी काफी हद तक अलग-अलग उद्योगों की तरह चलते हैं। कोरिया दिखाता है कि भविष्य उन मॉडलों का है जो इन्हें एक-दूसरे से जोड़ें। एक कहानी का जीवन एक मंच पर खत्म नहीं होना चाहिए।

चौथा और शायद सबसे महत्वपूर्ण सबक है—सॉफ्ट पावर का अर्थ केवल प्रसिद्धि नहीं, संरचना है। हमने के-पॉप और के-ड्रामा की वैश्विक सफलता देखी है, लेकिन उसके पीछे विश्वविद्यालय, प्रशिक्षण व्यवस्था, रचनात्मक अनुशासन, प्लेटफॉर्म रणनीति और आईपी विस्तार की बारीक मशीनरी भी काम करती है। डोंगवॉन विश्वविद्यालय और हिपहॉप वर्ल्ड लीग का यह समझौता उसी मशीनरी का छोटा लेकिन स्पष्ट उदाहरण है।

अंततः यह खबर बताती है कि दक्षिण कोरिया अब ‘हिट कंटेंट’ बनाने से आगे बढ़कर ‘हिट सिस्टम’ बनाने में लगा है। यही अंतर किसी उद्योग को क्षणिक फैशन से स्थायी शक्ति में बदलता है। भारत के लिए चुनौती और अवसर दोनों यही हैं: क्या हम अपनी कहानियों, अपनी भाषाओं और अपनी युवा प्रतिभा को ऐसे संस्थागत ढांचे में बदल सकते हैं, जहां कक्षा से निकला विचार स्क्रीन, गेम, मंच और वैश्विक बाजार तक पहुंच सके? कोरिया का जवाब फिलहाल ‘हाँ’ की दिशा में दिखाई देता है। अब नजर इस पर रहेगी कि भारत इस संकेत को कितनी गंभीरता से पढ़ता है।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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