
एक छोटी-सी खबर, लेकिन बहुत बड़ा सामाजिक अर्थ
दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल के इटावन इलाके से आई एक खबर पहली नजर में महज दान या सहानुभूति की घटना लग सकती है, लेकिन उसके भीतर आपदा, मानसिक आघात, सामाजिक स्मृति और सामुदायिक एकजुटता के गहरे प्रश्न छिपे हैं। समाचार एजेंसी योनहाप के अनुसार, 29 अक्तूबर 2022 की इटावन त्रासदी के दौरान राहत और बचाव में शामिल रहे एक स्थानीय दुकानदार की बाद में आघातजनित पीड़ा से मृत्यु हो गई थी। अब 2026 में उसके पिता ने ‘10·29 इटावन त्रासदी शोकसंतप्त परिवार परिषद’ को दान दिया है। दान की राशि सार्वजनिक नहीं की गई, न ही उसके तरीके का विस्तार सामने आया है, लेकिन इस कदम का नैतिक और सामाजिक संदेश बहुत स्पष्ट है।
यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह किसी एक परिवार के निजी दुःख से आगे बढ़कर उस पूरे वृत्त को सामने लाती है जिसमें बड़ी त्रासदियों के बाद वर्षों तक लोग फंसे रहते हैं। अक्सर जनस्मृति में हादसे का सबसे तीखा क्षण वही होता है जब मौतों की संख्या बताई जाती है, टीवी स्क्रीन पर चीख-पुकार दिखाई जाती है और सरकारें जांच या मुआवजे की घोषणा करती हैं। लेकिन असली कहानी कई बार उसके बाद शुरू होती है। जो लोग बच गए, जो लोगों को बचाने दौड़े, जो उस जगह से रोजी-रोटी कमाते थे, और जो परिजनों के रूप में पीछे रह गए—उनकी जिंदगी लंबी, थकाऊ और अक्सर अदृश्य पीड़ा से गुजरती है।
भारतीय पाठकों के लिए इसे समझना मुश्किल नहीं होना चाहिए। हमारे यहां भी बड़े हादसों के बाद चर्चा कुछ समय तक शोर में रहती है, फिर धीरे-धीरे सार्वजनिक ध्यान दूसरी खबरों की ओर मुड़ जाता है। मगर जिन परिवारों ने अपने लोग खोए हों, या जिन लोगों ने लाशें, अफरा-तफरी और असहायता को अपनी आंखों से देखा हो, उनके भीतर वह घटना खत्म नहीं होती। इटावन की यह खबर याद दिलाती है कि आपदा का कैलेंडर अखबारों की तरह अगले दिन नहीं बदलता। कई लोगों के लिए वह एक स्थायी वर्तमान बन जाती है।
यही वजह है कि इस दान को केवल ‘मानवीय संवेदना’ कहकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा। यहां एक पिता है, जिसने अपने बेटे को ऐसे दुखद परिणामों में खोया जो सीधे-सीधे घटना के दिन नहीं, बल्कि उसके बाद के मानसिक आघात से जुड़े थे। और वही पिता उन परिवारों के संगठन को धन्यवाद देना चाहता है जिन्होंने अपने प्रियजनों को उसी त्रासदी में खोया था। यह भावनात्मक दिशा साधारण नहीं है। यह बताती है कि आपदा के बाद बनने वाले रिश्ते केवल कानूनी दावों, मुआवजे या राजनीतिक मांगों तक सीमित नहीं रहते; वे दुःख की साझा भाषा में भी गठित होते हैं।
इटावन क्या है, और यह त्रासदी क्यों इतनी गूंजती रही
भारतीय पाठकों के लिए इटावन को समझना जरूरी है। सियोल का इटावन इलाका लंबे समय से एक बहुसांस्कृतिक, जीवंत और अंतरराष्ट्रीय पहचान वाला पड़ोस माना जाता है। यह जगह रात्रिकालीन जीवन, खानपान, विदेशी पर्यटकों, युवा संस्कृति और विविध सामाजिक समूहों की उपस्थिति के लिए जानी जाती रही है। कुछ हद तक इसे भारत के महानगरीय इलाकों—जैसे दिल्ली के हौज खास विलेज, मुंबई के बांद्रा या कोलाबा, बेंगलुरु के इंदिरानगर, या गोवा के लोकप्रिय पर्यटक इलाकों—की तरह समझा जा सकता है, जहां मनोरंजन, कारोबार, सांस्कृतिक मिश्रण और युवाओं की आवाजाही एक साथ दिखाई देती है।
29 अक्तूबर 2022 को हैलोवीन के मौके पर इसी इलाके में भारी भीड़ के बीच भगदड़ जैसी स्थिति बनी और बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई। कोरिया के लिए यह केवल एक दुर्घटना नहीं थी; यह उस आधुनिक शहरी समाज की विफलता का प्रतीक भी बन गई जो तकनीक, प्रशासन और सार्वजनिक सुरक्षा पर गर्व करता है। भारत में जब हम किसी धार्मिक मेले, रेलवे स्टेशन, मंदिर परिसर या उत्सव स्थल पर भीड़ प्रबंधन की असफलता देखते हैं, तो अक्सर दो बातें साथ-साथ सामने आती हैं—एक, घटना की तात्कालिक भयावहता; और दो, बाद में उठते प्रश्न कि क्या यह रोका जा सकता था। इटावन के मामले में भी यही हुआ।
लेकिन इटावन की विशेषता यह है कि यह सिर्फ ‘हादसे का स्थान’ नहीं था, बल्कि बहुतों के लिए रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा था। वहां दुकानदार काम करते थे, स्थानीय कारोबारी थे, कर्मचारी थे, आस-पास रहने वाले लोग थे। यानी यह त्रासदी किसी निर्जीव आयोजन स्थल पर नहीं, बल्कि जीवित सामाजिक और आर्थिक ताने-बाने के बीच घटी। इसलिए उसके घाव भी केवल मृतकों की संख्या से नहीं मापे जा सकते। जिस दुकानदार का जिक्र इस खबर में है, वह इस बात का उदाहरण है कि कोई व्यक्ति एक साथ स्थानीय कारोबारी भी हो सकता है, प्रत्यक्षदर्शी भी, बचावकर्ता भी और बाद में मानसिक पीड़ा का शिकार भी।
भारतीय समाज में भी ऐसी बहुस्तरीय पहचानें बहुत सामान्य हैं। मान लीजिए किसी बड़े हादसे में मंदिर के बाहर प्रसाद बेचने वाला दुकानदार ही भीड़ में फंसे लोगों को निकालने लगे, या किसी रेलवे दुर्घटना में पास का चायवाला यात्रियों की मदद में जुट जाए—तो वह सिर्फ दर्शक नहीं रह जाता। वह उस त्रासदी का नैतिक सहभागी और उसके झटके का संवाहक बन जाता है। इटावन का यह मामला इसी मानवीय सच्चाई को उजागर करता है।
त्रासदी के बाद भी खत्म नहीं होता दर्द: बचाव करने वाले भी पीड़ित हो सकते हैं
इस खबर का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसमें ध्यान उस व्यक्ति पर भी जाता है जो आधिकारिक अर्थ में ‘प्रत्यक्ष मृतक’ नहीं था, लेकिन त्रासदी से उपजा मानसिक आघात उसकी जिंदगी पर इतना भारी पड़ा कि अंततः उसकी मृत्यु हो गई। यह बिंदु हमें आपदा विमर्श के एक ऐसे हिस्से की ओर ले जाता है जिस पर अक्सर पर्याप्त चर्चा नहीं होती—राहत और बचाव में शामिल लोगों की मानसिक सेहत।
हमारे यहां आमतौर पर वीरता की कहानियां जल्दी बन जाती हैं। जिसने लोगों को बचाया, वह नायक है; जिसने दूसरों के लिए अपनी जान जोखिम में डाली, उसे सलाम किया जाता है। यह सम्मान बिल्कुल उचित है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब नायकत्व के इस सार्वजनिक आख्यान के पीछे छिपी निजी टूटन को हम देखना बंद कर देते हैं। किसी घायल को उठाना, भीड़ में दम तोड़ते लोगों को देखना, चीखें सुनना, असहायता महसूस करना—ये सब अनुभव मन पर गहरे घाव छोड़ते हैं। ये घाव हमेशा उसी दिन नहीं दिखते। कई बार वे महीनों या वर्षों तक बेचैनी, अवसाद, भय, अनिद्रा, अपराधबोध या सामाजिक अलगाव के रूप में सामने आते हैं।
भारत में आपदा प्रबंधन पर होने वाली बहसों में मानसिक स्वास्थ्य का पक्ष अभी भी पर्याप्त रूप से मुख्यधारा में नहीं है। राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल, स्थानीय प्रशासन, पुलिस, दमकलकर्मी, स्वयंसेवक और समुदाय के आम लोग—सभी किसी बड़ी घटना के बाद मनोवैज्ञानिक दबाव झेलते हैं। फिर भी हमारी सार्वजनिक भाषा में ‘बचे हुए लोगों’ और ‘मृतकों के परिवारों’ की तुलना में ‘बचाव में शामिल लोगों’ के मानसिक पुनर्वास पर कम बात होती है। इटावन से आई यह खबर बताती है कि कोरिया जैसा विकसित और संसाधन-संपन्न समाज भी इस चुनौती से मुक्त नहीं है।
यहां ध्यान देने वाली बात यह भी है कि बचावकर्ता होने का अर्थ हमेशा किसी प्रशिक्षित पेशेवर का होना नहीं है। कई बार स्थानीय लोग, दुकानदार, राहगीर, टैक्सी चालक, सुरक्षा कर्मी या पड़ोसी सबसे पहले मदद के लिए दौड़ते हैं। वे प्रशिक्षण, सुरक्षा उपकरण या मनोवैज्ञानिक तैयारी के बिना सीधे संकट में उतर जाते हैं। ऐसी स्थिति में बाद का आघात और भी जटिल हो सकता है। क्योंकि उनके पास न तो संस्थागत सहारा होता है, न ऐसी भाषा जिससे वे अपने भीतर की टूटन को व्यक्त कर सकें।
इसी संदर्भ में उस दुकानदार की मृत्यु को पढ़ना चाहिए। यह सिर्फ एक व्यक्ति की दुखद कहानी नहीं, बल्कि उन अनगिनत लोगों का प्रतीक है जो किसी त्रासदी के बाद दिखना बंद कर देते हैं, जबकि भीतर से लगातार बिखर रहे होते हैं। इसलिए यह खबर दान की नहीं, बल्कि उस छिपे हुए दर्द की खबर है जो समाज की नज़र से ओझल हो जाता है।
एक पिता का दान: धन्यवाद, शोक और साझा पीड़ा की भाषा
खबर के अनुसार, मृतक दुकानदार के पिता ने शोकसंतप्त परिवार परिषद को कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए दान भेजा। यह कथन छोटा है, लेकिन इसका भावनात्मक अर्थ अत्यंत गहरा है। सामान्य तौर पर यह अपेक्षा की जा सकती थी कि कोई ऐसा परिवार, जिसने स्वयं अपने सदस्य को त्रासदी के बाद खोया हो, अपने दर्द में सिमट जाए। लेकिन यहां उल्टा हुआ। पिता ने उन परिवारों की संस्था की ओर हाथ बढ़ाया जिन्होंने उसी त्रासदी में अपने प्रियजन खोए थे।
यह कदम बताता है कि दुःख में भी रिश्तों की एक ऐसी नैतिक भूगोल बनती है जो बाहर से हमेशा स्पष्ट नहीं दिखती। प्रत्यक्ष पीड़ित परिवार और बचावकर्ता के परिवार पहली नजर में अलग श्रेणियों में रखे जा सकते हैं। एक ने घटना में अपने प्रियजन खोए, दूसरे ने घटना के बाद आघात में। परंतु इस विभाजन के नीचे एक साझा सच्चाई काम करती है—दोनों एक ही सामाजिक त्रासदी की कक्षा में घूम रहे हैं। दोनों जानते हैं कि किसी क्षण ने जीवन को दो हिस्सों में बांट दिया: पहले और बाद में।
भारतीय संदर्भ में यह बात और साफ हो जाती है। हमारे यहां भी कई बार दुर्घटनाओं या दंगों, प्राकृतिक आपदाओं या सामूहिक हादसों के बाद पीड़ित समूहों के बीच एक ऐसी अनकही समझ विकसित होती है जो औपचारिक संरचनाओं से अधिक मजबूत होती है। कोई मां दूसरी मां के दुःख को समझती है, कोई स्वयंसेवक किसी घायल परिवार की चुप्पी का अर्थ जानता है, कोई गवाह किसी शोकसभा में बिना बोले भी शामिल हो सकता है। यह ‘साझी पीड़ा’ का सामाजिक रूप है। इटावन मामले में पिता का दान उसी साझा पीड़ा को सार्वजनिक रूप देता है।
यह दान किसी चैरिटी अभियान का हिस्सा नहीं, बल्कि स्मृति और सम्मान का संदेश लगता है। इसे एक प्रकार की नैतिक स्वीकृति भी कहा जा सकता है—कि शोकसंतप्त परिवारों की परिषद ने केवल अपने लिए आवाज नहीं उठाई, बल्कि ऐसे अन्य लोगों को भी भावनात्मक आश्रय दिया जिनकी चोट अलग प्रकार की थी। किसी संस्था के प्रति ‘कृतज्ञता’ तभी पैदा होती है जब उसने किसी रूप में सहारा, मान्यता, सम्मान या साथ दिया हो। इसीलिए यह दान अपने भीतर एक प्रश्न भी लेकर आता है: क्या समाज और राज्य ने वह सहारा पर्याप्त रूप से दिया था, जो ऐसे परिवारों को मिलना चाहिए था?
शोकसंतप्त परिवार परिषद की भूमिका: सिर्फ मांगों का मंच नहीं, सामाजिक स्मृति का केंद्र
दक्षिण कोरिया में इटावन त्रासदी के बाद मृतकों के परिजनों ने एक संगठित मंच बनाया, जिसे मोटे तौर पर ‘शोकसंतप्त परिवार परिषद’ कहा जा सकता है। भारतीय पाठकों के लिए यह समझना उपयोगी होगा कि कोरिया में ऐसे नागरिक और परिवार-आधारित संगठन केवल संवेदना व्यक्त करने तक सीमित नहीं रहते। वे सत्य की मांग करते हैं, जवाबदेही चाहते हैं, नीतिगत सुधार पर दबाव बनाते हैं, स्मृति आयोजनों का संचालन करते हैं और यह सुनिश्चित करने की कोशिश करते हैं कि घटना को केवल सांख्यिकीय रिपोर्ट में न बदल दिया जाए।
भारत में भी हमने देखा है कि किसी बड़ी त्रासदी के बाद परिवार संगठन, नागरिक मंच और जन-समर्थन समूह लंबे समय तक न्याय और सुधार की आवाज उठाते रहते हैं। कभी वे अदालतों में जाते हैं, कभी संसद या विधानसभाओं का ध्यान खींचते हैं, कभी सालाना स्मरण सभाएं आयोजित करते हैं। लेकिन उनका एक और कार्य होता है—वे समाज को यह याद दिलाते हैं कि पीड़ा की समयसीमा चुनावी चक्र से बड़ी होती है।
इटावन मामले में इस परिषद का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि एक बाहरी व्यक्ति—या कहें, अलग श्रेणी के प्रभावित परिवार का सदस्य—उसे धन्यवाद देने योग्य मानता है। इसका अर्थ यह है कि यह परिषद महज राजनीतिक मांगों की संस्था नहीं रह गई, बल्कि नैतिक उपस्थिति और सामाजिक भरोसे का स्थान बन गई। किसी हद तक यह वैसा ही है जैसे शोक के बीच कोई समुदाय-आधारित संस्था लोगों को यह एहसास दिलाए कि वे अकेले नहीं हैं, कि उनका दर्द निजी नहीं बल्कि सामाजिक रूप से मान्य है।
यही किसी भी लोकतांत्रिक समाज में स्मृति राजनीति का सबसे मानवीय पक्ष होता है। जब संस्थाएं विफल होती हैं, प्रक्रियाएं लंबी हो जाती हैं और समाचार चक्र आगे बढ़ जाता है, तब परिवारों और नागरिक समूहों की ऐसी संस्थाएं जीवित इतिहास का काम करती हैं। वे गवाही को बचाए रखती हैं। वे पूछती हैं कि किसकी जिम्मेदारी थी, क्या बदला, और किसे अब भी सहायता की जरूरत है। इस दृष्टि से देखें तो पिता का दान उस परिषद की भूमिका की एक सार्वजनिक पुष्टि भी है।
भारत के लिए सबक: आपदा प्रबंधन में मानसिक स्वास्थ्य, स्थानीय समुदाय और दीर्घकालिक देखभाल
इस कोरियाई घटना को भारतीय संदर्भ में पढ़ना बेहद जरूरी है, क्योंकि हमारे यहां भीड़, शहरी अव्यवस्था, धार्मिक आयोजनों, त्योहारों, सार्वजनिक समारोहों और अवसंरचनात्मक कमजोरी के कारण दुर्घटनाएं बार-बार घटती रही हैं। लगभग हर बार बहस दो चरणों में चलती है—पहले शोक और क्रोध, फिर जांच और जिम्मेदारी। लेकिन तीसरा चरण, यानी दीर्घकालिक पुनर्वास, सामाजिक-मानसिक देखभाल और समुदाय-आधारित सहायता, अक्सर सबसे कमजोर कड़ी साबित होता है।
इटावन की घटना हमें कम-से-कम चार सबक देती है। पहला, किसी भी बड़े हादसे के बाद पीड़ितों की परिभाषा व्यापक होनी चाहिए। केवल मृतकों और घायलों तक सीमित दृष्टि अधूरी है। प्रत्यक्षदर्शी, बचाव में शामिल स्थानीय लोग, आस-पास के कारोबारी, सुरक्षा कर्मचारी और मृतकों के मित्र-परिवार सभी विभिन्न स्तरों पर प्रभावित हो सकते हैं। दूसरा, मानसिक स्वास्थ्य सहायता को ‘वैकल्पिक’ नहीं बल्कि अनिवार्य राहत ढांचे का हिस्सा बनाना होगा। जैसे शारीरिक उपचार के लिए अस्पताल और एंबुलेंस जरूरी हैं, वैसे ही मनोवैज्ञानिक परामर्श, सामुदायिक समर्थन और फॉलो-अप व्यवस्था भी जरूरी है।
तीसरा सबक यह है कि स्थानीय समुदाय केवल पीड़ित नहीं होते, वे पुनर्निर्माण की केंद्रीय इकाई भी होते हैं। किसी इलाके की अर्थव्यवस्था, सामाजिक भरोसा और सांस्कृतिक पहचान बड़ी आपदा के बाद बुरी तरह बदल सकती है। यदि कोई बाजार, मोहल्ला या आयोजन स्थल हादसे का पर्याय बन जाए, तो वहां काम करने और रहने वालों पर दोहरा असर पड़ता है—आर्थिक और भावनात्मक। हमारे यहां यह बात अक्सर कम समझी जाती है। प्रशासन मुआवजे की सूची बनाता है, लेकिन इलाके के छोटे कारोबारियों, श्रमिकों, अस्थायी कर्मचारियों और अनौपचारिक नेटवर्क पर पड़े असर का समुचित आकलन कम होता है।
चौथा और शायद सबसे महत्वपूर्ण सबक यह है कि स्मृति को संस्थागत रूप देना चाहिए। यदि हर त्रासदी के बाद कुछ महीनों में सार्वजनिक स्मरण समाप्त हो जाए, तो समाज वही गलतियां दोहराने के लिए अभिशप्त रहता है। स्कूलों, शहरी नियोजन संस्थाओं, आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण केंद्रों, स्थानीय निकायों और सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र में ऐसी घटनाओं के अनुभवों से सीखने की व्यवस्था होनी चाहिए। केवल जांच रिपोर्ट पर्याप्त नहीं; समाज को यह भी सीखना होगा कि बचे हुए लोगों के साथ कैसा व्यवहार किया जाए।
भारत में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर कलंक अब भी गहरा है। ऐसे में यदि कोई बचावकर्ता अनिद्रा, डर, घबराहट, अपराधबोध या अवसाद से गुजर रहा हो, तो वह मदद मांगने से भी हिचक सकता है। इसलिए नीति के साथ-साथ सांस्कृतिक बदलाव भी जरूरी है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि साहस और टूटन एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। जो व्यक्ति संकट की घड़ी में सबसे बहादुर दिखता है, वही बाद में सबसे अधिक भीतर से घायल भी हो सकता है।
चुपचाप दिया गया दान, लेकिन समाज से बहुत ऊंची आवाज में पूछे गए सवाल
समाचार के तथ्य अत्यंत सीमित हैं: पिता ने इस महीने की 6 तारीख को दान भेजा, और 20 मई 2026 को यह बात सार्वजनिक हुई। लेकिन पत्रकारिता का काम केवल सूचना दर्ज करना नहीं, उसके सामाजिक अर्थ को समझना भी है। इस घटना ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि आपदाएं समाप्त नहीं होतीं; वे रूप बदलती हैं। पहले वे सार्वजनिक शोक होती हैं, फिर निजी पीड़ा बनती हैं, और अंततः समाज की नैतिक परीक्षा में बदल जाती हैं।
इस पिता का निर्णय हमें सोचने पर मजबूर करता है कि कृतज्ञता की दिशा कभी-कभी बहुत असामान्य होती है। जिसने अपना बेटा खोया, वह शोकग्रस्त परिवारों के संगठन को धन्यवाद दे रहा है। यह दृश्य हमें बताता है कि त्रासदी के बाद सबसे गहरे रिश्ते अक्सर वही लोग बनाते हैं जो शब्दों से परे एक-दूसरे का दुःख पहचानते हैं। आधुनिक समाज, चाहे वह कोरिया हो या भारत, तकनीकी रूप से जितना भी उन्नत क्यों न हो, अंततः संकट की घड़ी में उसकी असली शक्ति इसी मानवीय पहचान पर टिकती है।
इटावन की यह घटना हमें एक और स्तर पर चुनौती देती है। क्या हम आपदा को केवल घटना के दिन से जोड़कर देखते हैं? क्या हमारी नीति, मीडिया और सार्वजनिक संवेदना उन लोगों तक पहुंचती है जिनका जीवन दुर्घटना के बहुत बाद तक प्रभावित रहता है? क्या हम बचावकर्ताओं, स्थानीय व्यापारियों और आघात से जूझ रहे परिवारों के लिए दीर्घकालिक सहायता की कल्पना करते हैं? और क्या हम उन नागरिक संस्थाओं को पर्याप्त महत्व देते हैं जो स्मृति और न्याय को जीवित रखती हैं?
भारतीय पाठकों के लिए यह खबर दूर देश की कहानी भर नहीं है। यह हमारे अपने शहरों, त्योहारों, भीड़भाड़ वाले बाजारों, धार्मिक आयोजनों और शहरी प्रशासन की कमजोरियों का दर्पण भी है। यह हमें याद दिलाती है कि आपदा-प्रबंधन का अर्थ केवल बैरिकेड, पुलिस बंदोबस्त और आपात प्रतिक्रिया नहीं है। उसका अर्थ यह भी है कि हादसे के बाद वर्षों तक कौन किसके साथ खड़ा रहता है।
अंततः, इस दान की राशि से अधिक महत्वपूर्ण उसका आशय है। यह एक पिता का निजी शोक है, लेकिन साथ ही सार्वजनिक स्मृति को सौंपा गया विश्वास भी है। जैसे भारत में किसी शोकसभा में दीया जलाना केवल रस्म नहीं बल्कि स्मरण का सामाजिक वादा होता है, वैसे ही यह दान भी एक प्रकार का मौन वचन प्रतीत होता है—कि इस पीड़ा को भुलाया नहीं जाना चाहिए, कि त्रासदी में टूटे हुए समुदायों के बीच बने रिश्तों को सम्मान मिलना चाहिए, और कि जिन लोगों ने बचाने की कोशिश की, उनके घाव भी हमारे सामूहिक नैतिक दायरे में आने चाहिए। इटावन से आई यह खबर इसलिए छोटी नहीं है; यह हमें बताती है कि किसी भी समाज की सभ्यता का माप केवल उसकी समृद्धि से नहीं, बल्कि उसके शोक को संभालने की क्षमता से होता है।
0 टिप्पणियाँ