
सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, समाज के सामने खड़ी एक गहरी बेचैनी
दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल से आई एक आधिकारिक सूचना ने पूरे समाज को झकझोर दिया है। सियोल महानगर शिक्षा कार्यालय के अनुसार, पिछले वर्ष शहर के प्राथमिक, मिडिल और हाई स्कूलों में पढ़ने वाले 51 छात्रों ने आत्महत्या की। यह संख्या उससे पिछले वर्ष 40 थी, यानी एक साल में 27.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि यह कोई अकेले एक वर्ष की उछाल नहीं है। पिछले पांच वर्षों का रुझान लगातार ऊपर गया है—2021 में 28, 2022 में 30, 2023 में 36, 2024 में 40 और फिर 51। किसी भी विकसित, उच्च-शिक्षित और संसाधन-संपन्न महानगर के लिए यह एक बेहद गंभीर सामाजिक संकेत है।
भारतीय पाठकों के लिए इस खबर का महत्व केवल इतना नहीं है कि यह किसी दूसरे देश की दुखद स्थिति है। असल महत्व इस बात में है कि सियोल, जिसे अक्सर आधुनिक एशिया के सबसे प्रतिस्पर्धी, तकनीकी रूप से उन्नत और शिक्षा-केंद्रित शहरों में गिना जाता है, वहां भी किशोरों का मानसिक स्वास्थ्य एक बढ़ता संकट बनता दिख रहा है। यह हमें अपने समाज की तरफ भी देखने को मजबूर करता है। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, पुणे, कोटा, हैदराबाद या चेन्नई जैसे शहरों में भी उपलब्धि, तुलना, प्रतिस्पर्धा और भविष्य की चिंता युवाओं की जिंदगी का अहम हिस्सा हैं। इसलिए सियोल की यह खबर दरअसल भारत के लिए भी एक आईना है।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि यहां बात केवल हाई स्कूल या बोर्ड परीक्षाओं के दबाव की नहीं है। आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि प्रभावित छात्रों में प्राथमिक, मिडिल और हाई स्कूल—तीनों स्तरों के विद्यार्थी शामिल हैं। इसका अर्थ है कि मानसिक संकट किसी एक उम्र या एक शैक्षणिक मोड़ तक सीमित नहीं रहा। बचपन से किशोरावस्था तक की पूरी यात्रा में कहीं न कहीं असुरक्षा, अकेलापन, भावनात्मक दबाव, सामाजिक अपेक्षाएं और मदद मांगने में झिझक जैसे कारक जगह बना रहे हैं।
पत्रकारीय दृष्टि से भी यह खबर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह कोई अनुमान, अफवाह या सोशल मीडिया पर चलने वाली अधूरी जानकारी नहीं, बल्कि एक आधिकारिक शैक्षणिक संस्था द्वारा जारी की गई गिनती है। ऐसे आंकड़े अक्सर समाज को असुविधाजनक लगते हैं, लेकिन यही आंकड़े सार्वजनिक बहस की शुरुआत भी करते हैं। वे यह बताते हैं कि समस्या को निजी दुख कहकर चुपचाप किनारे नहीं किया जा सकता। जब पांच साल लगातार संख्या बढ़ती जाए, तो यह कहना मुश्किल हो जाता है कि यह सिर्फ कुछ अलग-अलग घटनाएं हैं। यह अब एक व्यापक सामाजिक प्रश्न बन चुका है।
सियोल क्यों मायने रखता है: सफलता के चमकते शहर के पीछे की दरारें
सियोल केवल दक्षिण कोरिया की राजधानी नहीं, बल्कि वहां की राजनीति, अर्थव्यवस्था, संस्कृति, मीडिया और शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा केंद्र है। भारतीय संदर्भ में देखें तो इसकी तुलना दिल्ली और मुंबई के मिश्रित प्रभाव से की जा सकती है—ऐसा शहर जहां अवसर भी सबसे ज्यादा हैं और प्रतिस्पर्धा भी सबसे तीखी। आम धारणा यह होती है कि जहां बेहतर स्कूल, काउंसलिंग सेवाएं, अस्पताल, डिजिटल पहुंच और प्रशासनिक ढांचा मौजूद हो, वहां संकट अपेक्षाकृत कम होना चाहिए। लेकिन सियोल के आंकड़े उल्टा संकेत दे रहे हैं। वे बता रहे हैं कि संस्थागत ढांचा होना और उसका प्रभावी, मानवीय तथा समय पर उपयोग हो पाना—दो अलग बातें हैं।
दक्षिण कोरिया की शिक्षा व्यवस्था लंबे समय से दुनिया भर में अनुशासन, उच्च उपलब्धि और परीक्षा-केंद्रित तैयारी के लिए जानी जाती है। वहां विश्वविद्यालय में प्रवेश की प्रक्रिया बेहद प्रतिस्पर्धी है और समाज में शैक्षणिक उपलब्धि का महत्व बहुत गहरा है। यह स्थिति भारतीय परिवारों के लिए अपरिचित नहीं होगी। हमारे यहां भी इंजीनियरिंग, मेडिकल, सिविल सेवा, टॉप कॉलेजों और प्रतिष्ठित करियर की दौड़ अनेक घरों में बच्चों की दिनचर्या तय करती है। फर्क सिर्फ इतना है कि सियोल का शहरी जीवन इस दबाव को बहुत अधिक सघन रूप में सामने लाता है। वहां छोटे-छोटे अपार्टमेंटों, लंबी पढ़ाई, निजी कोचिंग संस्कृति और सामाजिक तुलना के बीच किशोरों पर अपेक्षाएं कई दिशाओं से एक साथ आती हैं।
कोरिया में निजी ट्यूशन संस्थानों के लिए एक शब्द बहुत प्रचलित है—‘हाग्वोन’। ये ऐसे निजी अकादमिक केंद्र हैं जहां छात्र नियमित स्कूल के बाद अतिरिक्त पढ़ाई के लिए जाते हैं। भारतीय पाठक इसे कोचिंग क्लास, टेस्ट-प्रेप सेंटर या जेईई-नीट की तैयारी कराने वाले संस्थानों जैसी व्यवस्था से जोड़कर समझ सकते हैं। अंतर यह है कि दक्षिण कोरिया में यह संस्कृति और भी अधिक व्यवस्थित तथा व्यापक है। ऐसे माहौल में समय, ऊर्जा और आत्म-मूल्य—तीनों का माप कई बार उपलब्धि से ही होने लगता है। जो छात्र इस रफ्तार के साथ नहीं चल पाते, वे अपने संघर्ष को व्यक्तिगत असफलता मानने लगते हैं। यहीं से मानसिक संकट गहरा हो सकता है।
सियोल का महत्व इसलिए भी है क्योंकि वह अक्सर दक्षिण कोरिया के सामाजिक बदलावों का शुरुआती संकेतक माना जाता है। जिस तरह भारत में महानगरों के अनुभव बाद में छोटे शहरों तक सामाजिक व्यवहार, तकनीक, रोजगार और जीवनशैली के रूप में पहुंचते हैं, उसी तरह सियोल में दिखने वाली कई प्रवृत्तियां राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन जाती हैं। इसलिए वहां के छात्रों में लगातार बढ़ती आत्महत्याएं केवल स्थानीय प्रशासन का मसला नहीं, बल्कि उस समाज की दिशा पर प्रश्नचिह्न हैं जो वैश्विक सफलता की मिसाल के रूप में पेश किया जाता रहा है।
पांच साल की बढ़ोतरी क्या कहती है: संयोग नहीं, संरचनात्मक चेतावनी
एक साल के आंकड़े कभी-कभी परिस्थितियों, रिपोर्टिंग पद्धति या किसी असाधारण घटना से प्रभावित हो सकते हैं। लेकिन जब संख्या 28 से 30, फिर 36, 40 और उसके बाद 51 तक जाती है, तो यह रुझान संयोग की सीमा से बाहर निकल आता है। यह उस दबाव के संचय की ओर इशारा करता है जो शायद पहले से मौजूद था, लेकिन अब अधिक स्पष्ट होकर सामने आ रहा है। सार्वजनिक नीति की भाषा में कहें तो यह ‘ट्रेंड’ है, और सामाजिक दृष्टि से कहें तो यह एक लगातार चमकती हुई लाल बत्ती है।
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उपलब्ध आंकड़े कारणों का पूरा विवरण नहीं देते। यानी यह कहना जल्दबाजी होगी कि इसके पीछे सिर्फ परीक्षा का दबाव, सिर्फ पारिवारिक तनाव, सिर्फ डिजिटल लत, सिर्फ सामाजिक तुलना या सिर्फ अवसाद जिम्मेदार है। वास्तविकता अक्सर इन सबके जटिल मेल से बनती है। किशोर जीवन में दोस्ती, पहचान, शरीर की छवि, सोशल मीडिया पर तुलना, घर की आर्थिक अपेक्षाएं, भविष्य की चिंता, पढ़ाई का दबाव और भावनात्मक संवाद की कमी—सभी एक साथ काम कर सकते हैं। इसलिए किसी एक कारण को पकड़कर पूरा निष्कर्ष निकालना न तो पत्रकारिता के लिहाज से जिम्मेदार होगा, न समाज के लिए उपयोगी।
फिर भी संख्या का अर्थ खत्म नहीं होता। आंकड़े हमें यह जरूर बताते हैं कि खतरा बढ़ रहा है और वर्तमान तंत्र पर्याप्त नहीं पड़ रहा। यदि स्कूलों में काउंसलिंग है, तो क्या वह पर्याप्त संख्या में है? अगर हेल्पलाइन हैं, तो क्या छात्रों को उन पर भरोसा है? अगर परिवार चिंतित हैं, तो क्या उन्हें यह समझने का प्रशिक्षण है कि किस व्यवहार को सामान्य किशोरावस्था मानें और किसे संकट का संकेत समझें? अगर समाज मानसिक स्वास्थ्य पर बात कर रहा है, तो क्या यह बातचीत केवल शहरी शिक्षित वर्ग तक सीमित है या वास्तव में बच्चों तक पहुंच रही है? यही वे प्रश्न हैं जो ऐसे आंकड़ों के बाद उठते हैं।
भारत में भी अक्सर किसी त्रासदी के बाद बहस कुछ दिनों तक तेज रहती है, फिर दूसरी खबरें उसे पीछे छोड़ देती हैं। सियोल का यह मामला याद दिलाता है कि लगातार बढ़ते रुझान पर प्रतिक्रिया भी लगातार ही होनी चाहिए। एक बार की अपील, एक अभियान, या किसी घटना के बाद भावुक बयानबाजी पर्याप्त नहीं होती। किशोर मानसिक स्वास्थ्य के लिए दीर्घकालिक, संस्थागत और परिवार-केंद्रित रणनीति की जरूरत होती है।
स्कूल के भीतर की दुनिया: अंक, अनुशासन और अनकहा अकेलापन
किसी भी छात्र की जिंदगी का सबसे बड़ा सार्वजनिक स्थल स्कूल होता है। वहां वह रोजाना कई घंटे बिताता है, अपनी पहचान बनाता है, दोस्तियां करता है, तुलना झेलता है और भविष्य के बारे में सोचना शुरू करता है। इसलिए छात्र आत्महत्या के बढ़ते मामलों को केवल घर या केवल व्यक्तिगत मन:स्थिति का परिणाम मानना अधूरा होगा। स्कूल का वातावरण, शिक्षकों का व्यवहार, साथियों के संबंध, प्रदर्शन का दबाव और विफलता के प्रति संस्थागत संवेदनशीलता—ये सभी तत्व महत्वपूर्ण हैं।
सियोल के मामले में एक अहम तथ्य यह है कि आधिकारिक गिनती में प्राथमिक, मिडिल और हाई स्कूल के छात्र शामिल हैं। इसका मतलब है कि संकट केवल उस उम्र में नहीं आ रहा जब विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा सामने हो। यह उससे पहले भी पनप सकता है। छोटी उम्र के बच्चों में मानसिक संकट कई बार चुप्पी, चिड़चिड़ापन, पढ़ाई में अचानक गिरावट, सामाजिक दूरी, बार-बार शारीरिक शिकायतें, नींद की समस्या या भावनात्मक विस्फोट के रूप में दिख सकता है। किशोरों में यह और जटिल हो सकता है, क्योंकि वे अपनी निजता को लेकर अधिक संवेदनशील होते हैं और मदद मांगने में झिझकते हैं।
दक्षिण कोरिया में सामाजिक अनुशासन और सामूहिकता की संस्कृति गहरी मानी जाती है। यह बात समझना भारतीय पाठकों के लिए उपयोगी है। वहां समूह के भीतर सामंजस्य बनाए रखना, अपेक्षाओं पर खरा उतरना और बाहरी रूप से ‘ठीक’ दिखना सामाजिक रूप से बहुत महत्व रखता है। भारत में भी कई परिवारों और स्कूलों में ‘लोग क्या कहेंगे’ या ‘इतनी सुविधाएं हैं, फिर समस्या क्या है’ जैसी सोच अनजाने में बच्चों की भावनाओं को छोटा कर देती है। जब कोई छात्र यह महसूस करने लगे कि उसकी तकलीफ को गंभीरता से नहीं लिया जाएगा, तो वह भीतर ही भीतर और अकेला पड़ सकता है।
स्कूलों के लिए चुनौती दोहरी है। पहली, शुरुआती चेतावनी संकेतों को पहचानना। दूसरी, सहायता मांगने को सामान्य और सम्मानजनक बनाना। अक्सर शिक्षा संस्थान अकादमिक उपलब्धि को मापने के लिए बहुत व्यवस्थित होते हैं, लेकिन भावनात्मक संकट की पहचान के लिए उतने तैयार नहीं। भारत के कई स्कूलों में भी काउंसलर नाम मात्र के हैं, या फिर उनका काम परीक्षा-परामर्श तक सीमित रह जाता है। सियोल के बढ़ते आंकड़े इस बात पर जोर देते हैं कि मानसिक स्वास्थ्य को ‘अतिरिक्त सेवा’ नहीं, बल्कि छात्र सुरक्षा का केंद्रीय हिस्सा माना जाए।
यह भी जरूरी है कि स्कूल केवल उपदेश न दें, बल्कि ऐसा माहौल बनाएं जहां असफलता को जीवन का अंत नहीं माना जाए। एशियाई समाजों में, खासकर मध्यमवर्गीय परिवारों में, उपलब्धि को आत्म-सम्मान से जोड़ देने की प्रवृत्ति मजबूत रहती है। जब बच्चे यह सीखते हैं कि उनका मूल्य सिर्फ रैंक, ग्रेड या कॉलेज से तय होगा, तब हर ठोकर अस्तित्वगत संकट का रूप ले सकती है। शिक्षा का उद्देश्य प्रतिस्पर्धी नागरिक तैयार करना है, लेकिन उससे भी पहले सुरक्षित और संतुलित इंसान बनाना है।
घर, परिवार और समाज: जिम्मेदारी सिर्फ स्कूल की नहीं
कोई भी बच्चा सिर्फ छात्र नहीं होता; वह परिवार का सदस्य, पड़ोस का निवासी, दोस्तों के समूह का हिस्सा और डिजिटल दुनिया का सक्रिय उपभोक्ता भी होता है। इसलिए छात्र आत्महत्या जैसी त्रासदियों को केवल शिक्षा विभाग का विषय मानना पर्याप्त नहीं होगा। सियोल से आए आंकड़े याद दिलाते हैं कि यदि स्कूल संकट की पहली सार्वजनिक जगह है, तो घर वह निजी जगह है जहां संकेत सबसे पहले दिखाई दे सकते हैं—यदि देखने की आदत और संवाद की संस्कृति हो।
भारतीय परिवारों में अक्सर बच्चों की पढ़ाई, करियर और अनुशासन पर विस्तार से बात होती है, लेकिन भावनाओं पर उतनी नहीं। “मजबूत बनो”, “इतनी सी बात पर परेशान मत हो”, “हमारे समय में तो इससे ज्यादा मुश्किलें थीं”—ऐसे वाक्य अनजाने में बच्चे को यह संदेश दे सकते हैं कि उसकी तकलीफ वैध नहीं है। दक्षिण कोरिया जैसे समाज में भी, जहां परिवार संरचना में बदलाव आए हैं और शहरी जीवन तेज हुआ है, पीढ़ियों के बीच संवाद का यह अंतर एक चुनौती माना जाता है। सियोल के आंकड़ों की पृष्ठभूमि में यही सवाल उठता है कि क्या घर ऐसी जगह बन पा रहे हैं जहां बच्चा बिना डरे कह सके कि वह मानसिक रूप से संघर्ष कर रहा है?
समाज की भूमिका भी कम नहीं है। जब सफलता की कहानियां लगातार महिमामंडित हों, लेकिन संघर्ष, असफलता और मानसिक थकान पर खुलकर बातचीत न हो, तो युवाओं को लगता है कि वे अकेले हैं। सोशल मीडिया इस भावना को कई बार और तीखा कर देता है। दूसरों की चुनी हुई उपलब्धियां देखकर अपनी रोजमर्रा की परेशानियां और भारी लगने लगती हैं। भारत और दक्षिण कोरिया, दोनों जगह युवाओं की डिजिटल जिंदगी अब वास्तविक जिंदगी से अलग नहीं रही। इसलिए सामुदायिक हस्तक्षेप का मतलब सिर्फ मोहल्ला या स्कूल नहीं, बल्कि ऑनलाइन वातावरण की समझ भी है।
स्थानीय समुदाय—चाहे वह वार्ड स्तर की सेवाएं हों, युवा केंद्र, हेल्पलाइन, धार्मिक-सांस्कृतिक समूह या नागरिक संगठन—महत्वपूर्ण सहारा बन सकते हैं। भारत में जैसे कई शहरों में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, स्कूल-आधारित जागरूकता कार्यक्रम या गैर-सरकारी संगठनों की परामर्श सेवाएं काम करती हैं, वैसे ही सियोल जैसे शहरों में भी बहु-स्तरीय समर्थन की जरूरत स्पष्ट दिखती है। किसी किशोर तक मदद पहुंचना अक्सर इस बात पर निर्भर करता है कि उसके आसपास कितने भरोसेमंद वयस्क मौजूद हैं।
यही कारण है कि इस तरह के आधिकारिक आंकड़ों का सार्वजनिक होना जरूरी है। वे समाज को असहज जरूर करते हैं, लेकिन चुप्पी तोड़ते हैं। समस्या को छिपाने से वह छोटी नहीं होती; बस और अदृश्य हो जाती है। सार्वजनिक चर्चा, यदि जिम्मेदारी से हो, तो नीति, संसाधन और सामाजिक संवेदनशीलता—तीनों को दिशा दे सकती है।
भारतीय संदर्भ में इस खबर का अर्थ: कोटा से महानगरों तक एक साझा चिंता
भारतीय पाठक स्वाभाविक रूप से पूछ सकते हैं कि सियोल की इस खबर को हमें इतनी गंभीरता से क्यों पढ़ना चाहिए। इसका जवाब सीधा है—क्योंकि प्रतिस्पर्धी शिक्षा, शहरी दबाव, पारिवारिक अपेक्षाएं और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति हिचक भारत में भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। हमारे यहां बोर्ड परीक्षाओं से लेकर प्रवेश परीक्षाओं तक, टॉप कॉलेजों की दौड़ से लेकर नौकरी की अनिश्चितता तक, युवा पीढ़ी पर दबाव कई रूपों में मौजूद है। कोटा जैसे कोचिंग केंद्रों में समय-समय पर उठी चिंताएं हों, महानगरों के स्कूलों में बढ़ती चिंता और अवसाद की रिपोर्टें हों, या छोटे शहरों में करियर को लेकर बढ़ती बेचैनी—ये सब हमें बताते हैं कि यह सिर्फ दूसरे देश की कहानी नहीं है।
हालांकि दोनों देशों की सामाजिक संरचनाएं अलग हैं, फिर भी तुलना उपयोगी है। दक्षिण कोरिया अत्यधिक शहरीकृत, तकनीकी रूप से उन्नत और शिक्षा-उन्मुख समाज है। भारत विविधताओं से भरा, बहुस्तरीय और असमानताओं वाला समाज है। लेकिन दोनों जगह मध्यमवर्गीय आकांक्षा की शक्ति बहुत प्रबल है। दोनों जगह परिवार अपने बच्चों के लिए बेहतर भविष्य चाहते हैं। और दोनों जगह कई बार यही इच्छा अनजाने में दबाव का रूप ले लेती है। इसलिए सियोल के आंकड़े हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या हम उपलब्धि की भाषा में बच्चों की भावनात्मक सुरक्षा को पीछे छोड़ रहे हैं।
भारत में पिछले कुछ वर्षों में मानसिक स्वास्थ्य पर सार्वजनिक चर्चा बढ़ी है। स्कूल काउंसलिंग, परीक्षा के समय हेल्पलाइन, सोशल-इमोशनल लर्निंग और माता-पिता के लिए जागरूकता कार्यक्रम जैसी पहलें भी दिखती हैं। लेकिन जमीनी सच्चाई अभी भी असमान है। बड़े निजी स्कूलों और छोटे सरकारी या अर्ध-शहरी संस्थानों के बीच सेवाओं का अंतर बहुत बड़ा है। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की उपलब्धता सीमित है, और सामाजिक कलंक अब भी गहरा है। ऐसे में सियोल की खबर एक चेतावनी है कि केवल आर्थिक विकास या शैक्षणिक विस्तार अपने आप किशोरों को सुरक्षित नहीं बना देते।
भारतीय समाज के लिए एक और सीख यह है कि बच्चों की सफलता को ‘परिवार की प्रतिष्ठा’ से बहुत कसकर बांध देना खतरनाक हो सकता है। एक परीक्षा, एक कॉलेज, एक रिजल्ट या एक करियर पथ को जीवन का अंतिम सत्य मान लेना युवाओं के लिए असहनीय दबाव पैदा कर सकता है। यदि सियोल जैसा संपन्न और व्यवस्थित शहर भी इस संकट से जूझ रहा है, तो हमें अपने यहां और अधिक सतर्क होना होगा।
आगे का रास्ता: संवेदनशीलता, संस्थागत तैयारी और निरंतर संवाद
सियोल से आई यह खबर किसी सनसनीखेज निष्कर्ष की मांग नहीं करती; यह गंभीर, धैर्यपूर्ण और दीर्घकालिक प्रतिक्रिया की मांग करती है। सबसे पहले यह स्वीकार करना होगा कि किशोर मानसिक स्वास्थ्य कोई सीमांत विषय नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा नीति और सामाजिक स्थिरता का केंद्रीय प्रश्न है। जब पांच वर्षों तक लगातार संख्या बढ़े, तो प्रतिक्रिया भी बहुस्तरीय होनी चाहिए—स्कूलों में, परिवारों में, स्थानीय प्रशासन में और मीडिया की भाषा में भी।
स्कूल स्तर पर नियमित मानसिक स्वास्थ्य स्क्रीनिंग, प्रशिक्षित काउंसलर, शिक्षकों के लिए शुरुआती संकेत पहचानने का प्रशिक्षण और परीक्षा-केंद्रित व्यवस्था के भीतर मानवीय संतुलन बेहद महत्वपूर्ण हैं। परिवारों के स्तर पर खुला संवाद, बिना निर्णय दिए सुनने की आदत और बच्चों के आत्म-मूल्य को केवल उपलब्धि से न जोड़ने की समझ जरूरी है। समुदाय के स्तर पर हेल्पलाइन, परामर्श सेवाएं, युवा सहायता केंद्र और विश्वसनीय रेफरल नेटवर्क मददगार हो सकते हैं।
मीडिया की भूमिका भी अहम है। ऐसी खबरों को प्रस्तुत करते समय सनसनी, रोमांटीकरण या सरलीकरण से बचना चाहिए। फोकस आंकड़ों की गंभीरता, सामाजिक संरचना और समाधान की दिशा पर होना चाहिए, न कि भय फैलाने पर। सार्वजनिक विमर्श तब सबसे उपयोगी बनता है जब वह समाज को अपराधबोध में नहीं, जिम्मेदारी में धकेले।
सियोल का मामला हमें यह समझाता है कि आधुनिकता, तकनीकी प्रगति, वैश्विक चमक और उच्च शिक्षा-प्रतिस्पर्धा के बीच भी युवाओं का मन असुरक्षित रह सकता है। यह एक कठिन सत्य है, लेकिन आवश्यक सत्य भी। भारत के लिए संदेश साफ है—यदि हम अपने बच्चों से बड़े सपने देखने की अपेक्षा करते हैं, तो हमें उनके लिए उतना ही बड़ा सहारा तंत्र भी तैयार करना होगा। अंततः किसी भी समाज की असली प्रगति केवल उसके अंकों, रैंकिंग, भवनों या डिजिटल गति से नहीं मापी जाती; वह इस बात से मापी जाती है कि उसके बच्चे कितने सुरक्षित, सुने गए और सम्मानित महसूस करते हैं। सियोल के आंकड़े हमें इसी कसौटी की याद दिला रहे हैं।
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