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दक्षिण कोरिया के जिओल्लानाम-डो की खाद्य-सुरक्षा जांच से क्या सीखें: जब जड़ी-बूटी, रसोई और जन-स्वास्थ्य एक ही मेज पर आ बै

दक्षिण कोरिया के जिओल्लानाम-डो की खाद्य-सुरक्षा जांच से क्या सीखें: जब जड़ी-बूटी, रसोई और जन-स्वास्थ्य एक ही मेज पर आ बै

कोरिया की एक क्षेत्रीय खबर, लेकिन असर उससे कहीं बड़ा

दक्षिण कोरिया के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में स्थित जिओल्लानाम-डो प्रांत से आई एक प्रशासनिक खबर पहली नजर में मामूली लग सकती है। वहां के स्वास्थ्य एवं पर्यावरण अनुसंधान संस्थान ने बाजार में बिक रहे उन कृषि और वानिकी उत्पादों की जांच की, जिन्हें भोजन के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है और स्वास्थ्यवर्धक औषधीय सामग्री के तौर पर भी। जांच में 11 श्रेणियों के 21 नमूनों को परखा गया और सभी निर्धारित मानकों पर खरे उतरे। कुल 417 सुरक्षा मानकों की जांच हुई, जिनमें 412 प्रकार के अवशिष्ट कीटनाशक, सीसा और कैडमियम जैसे 4 भारी धातु तत्व, और सल्फर डाइऑक्साइड शामिल थे। निष्कर्ष साफ था: जांचे गए सभी उत्पाद सुरक्षित पाए गए।

लेकिन इस खबर की अहमियत सिर्फ इतनी नहीं है कि ‘सब कुछ ठीक निकला’। असली महत्व इस बात में है कि आधुनिक कोरियाई समाज रोजमर्रा की खाद्य सामग्री, पारंपरिक स्वास्थ्य-मान्यताओं और प्रशासनिक निगरानी के बीच किस तरह संतुलन बनाता है। भारत में भी हम हल्दी, अश्वगंधा, गिलोय, मुलेठी, आंवला, सौंफ, दालचीनी या त्रिफला जैसी चीजों को केवल ‘खाद्य’ या केवल ‘औषधि’ की श्रेणी में नहीं रखते। ये रसोई में भी हैं, घरेलू नुस्खों में भी, और आयुर्वेदिक बाजार में भी। ठीक इसी तरह कोरिया में भी कई उत्पाद ऐसे हैं जो भोजन और ‘स्वास्थ्य-सहायक’ सामग्री की सीमा-रेखा पर खड़े होते हैं।

भारतीय पाठकों के लिए यह खबर इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि यह बताती है कि किसी समाज की खाद्य-सुरक्षा व्यवस्था की गंभीरता का अंदाजा केवल बड़े घोटालों या प्रतिबंधों से नहीं लगाया जाता, बल्कि इससे भी लगाया जाता है कि वहां रोजमर्रा की सामान्य लगने वाली चीजों पर कितनी बारीक और नियमित नजर रखी जाती है। हमारे यहां अक्सर चर्चा तब तेज होती है जब दूध में मिलावट, मसालों में रंग, तेल में गड़बड़ी या औषधीय सप्लीमेंट में संदिग्ध तत्व पाए जाते हैं। कोरिया की यह खबर उस ‘पूर्व-सावधानी’ वाली व्यवस्था की मिसाल है जिसमें प्रशासन पहले से जांच कर भरोसा बनाता है, न कि समस्या फूटने के बाद केवल सफाई देता है।

यह खबर एक और कारण से व्यापक महत्व रखती है। जिओल्लानाम-डो कृषि और वन उत्पादों के लिहाज से महत्वपूर्ण इलाका माना जाता है। वहां होने वाली जांच का असर सिर्फ स्थानीय नागरिकों तक सीमित नहीं रहता, क्योंकि यही सामग्री व्यापक वितरण नेटवर्क के जरिए दूसरे इलाकों तक भी पहुंच सकती है। यानी यह रिपोर्ट क्षेत्रीय प्रशासन की रूटीन फाइल नहीं, बल्कि उपभोक्ता-विश्वास, सार्वजनिक स्वास्थ्य और खाद्य-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर एक खिड़की है।

‘खाद्य और औषधि दोनों’ का विचार क्या है, और यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है

कोरियाई संदर्भ में जिन उत्पादों की जांच की गई, वे ऐसे पदार्थ हैं जिन्हें आम भोजन में भी इस्तेमाल किया जाता है और स्वास्थ्य-संवर्धन या पारंपरिक औषधीय उपयोग में भी। इनमें ओगापी, गोजीबेरी, ओमिजा, मुलेठी, एंजेलिका और हुआंगगी जैसे पदार्थ शामिल बताए गए। भारतीय पाठकों के लिए इनके नाम भले अपरिचित हों, लेकिन इनका स्वभाव अपरिचित नहीं है। उदाहरण के लिए, मुलेठी हमारे यहां खांसी-जुकाम से राहत के घरेलू उपाय में आती है, लेकिन वह खाद्य पदार्थों और पेयों में भी प्रयुक्त हो सकती है। इसी तरह गोजीबेरी को अगर आंवला, सूखे मेवे या किसी ‘सुपरफूड’ प्रवृत्ति वाले उत्पाद की तरह समझें, तो एक मोटा सांस्कृतिक संदर्भ बनता है।

यही वह क्षेत्र है जहां खाद्य-सुरक्षा और औषधीय दावे आपस में मिलते हैं। उपभोक्ता जब किसी ऐसी वस्तु को खरीदता है जिसे ‘स्वास्थ्य के लिए अच्छा’ बताया जाता है, तब उसकी अपेक्षा साधारण सब्जी या फल से अलग हो जाती है। वह यह मानकर चलता है कि यह चीज न सिर्फ खाने योग्य है, बल्कि शरीर के लिए लाभकारी भी है। ऐसे में यदि उसमें कीटनाशक अवशेष, भारी धातुएं या संरक्षक रसायनों की मात्रा सीमा से अधिक हो, तो नुकसान केवल खाद्य-सुरक्षा का नहीं, बल्कि भरोसे का भी होता है।

भारत में भी यही मनोविज्ञान काम करता है। जब कोई परिवार काढ़े के लिए मुलेठी, तुलसी, दालचीनी और काली मिर्च लेता है, या कोई व्यक्ति इम्युनिटी के नाम पर आंवला, गिलोय या अश्वगंधा खरीदता है, तो उसकी मानसिकता ‘सिर्फ सामान खरीदने’ वाली नहीं होती। वह एक तरह का स्वास्थ्य-निवेश कर रहा होता है। इसलिए ऐसे उत्पादों की जांच केवल व्यापारिक गुणवत्ता का प्रश्न नहीं रह जाती; यह जन-स्वास्थ्य और उपभोक्ता-अधिकार दोनों का विषय बन जाती है।

कोरिया की इस जांच का यही पहलू सबसे अहम है: प्रशासन ने उस वर्ग की सामग्री पर ध्यान दिया जो रोजमर्रा के भोजन और स्वास्थ्य-सम्बंधित खपत के बीच पुल का काम करती है। आधुनिक एशियाई समाजों में, खासकर भारत, कोरिया, चीन और जापान जैसे देशों में, भोजन और उपचार के बीच की रेखा पश्चिमी औद्योगिक खाद्य व्यवस्था की तुलना में अधिक तरल रही है। दादी-नानी के नुस्खे, पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियां और मौसमी खानपान की संस्कृति इस तरलता को लंबे समय से आकार देती रही हैं। ऐसे में नियामक एजेंसियों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।

यही कारण है कि ‘सभी नमूने मानक पर खरे उतरे’ जैसी पंक्ति प्रशासनिक भाषा में भले छोटी हो, सामाजिक अर्थ में बहुत बड़ी है। यह संदेश देती है कि सरकार केवल बीमारी का इलाज करने वाली संस्थाओं तक सीमित नहीं, बल्कि इस बात पर भी नजर रख रही है कि नागरिकों की थाली और स्वास्थ्य-संबंधी उपभोग में क्या पहुंच रहा है।

417 मानकों की जांच: संख्या से आगे बढ़कर इसका अर्थ क्या है

अक्सर सरकारी विज्ञप्तियों में संख्याएं इतनी अधिक होती हैं कि आम पाठक उनसे दूर हो जाता है। लेकिन इस मामले में 417 जांच मानकों का उल्लेख महज तकनीकी सूचना नहीं है। यह बताता है कि खाद्य-सुरक्षा को परत-दर-परत समझा गया। 412 प्रकार के अवशिष्ट कीटनाशकों की जांच इस ओर इशारा करती है कि कृषि-उत्पादन के दौरान इस्तेमाल होने वाले रसायन अनेक प्रकार के हो सकते हैं और उनका प्रभाव दिखाई नहीं देता। उपभोक्ता बाजार में जाकर फल, जड़ी या सूखी सामग्री देखकर यह तय नहीं कर सकता कि उसमें कौन-सा अवशेष किस स्तर पर मौजूद है। इसलिए प्रयोगशाला-आधारित परीक्षण ही विश्वसनीय आधार बनते हैं।

इसके अलावा भारी धातुओं—जैसे सीसा और कैडमियम—की जांच विशेष महत्व रखती है। ऐसी धातुएं कम मात्रा में भी लंबे समय तक शरीर में जमा होकर गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकती हैं। यही बात सल्फर डाइऑक्साइड जैसी सामग्री पर भी लागू होती है, जिसका संबंध प्रसंस्करण, संरक्षण या गुणवत्ता बनाए रखने की कुछ प्रक्रियाओं से हो सकता है। जब जांच केवल कीटनाशकों तक सीमित न रहकर भारी धातुओं और अन्य रासायनिक जोखिमों को भी शामिल करती है, तब यह स्पष्ट होता है कि प्रशासनिक दृष्टि ‘एक मुद्दा, एक समाधान’ वाली नहीं है, बल्कि बहु-स्तरीय है।

भारतीय संदर्भ में सोचें तो यह वैसा ही है जैसे मसालों की जांच में केवल रंग या मिलावट न देखी जाए, बल्कि कीटनाशक अवशेष, धातु संदूषण, फफूंदजनित विषाक्तता और पैकेजिंग से जुड़े जोखिमों को भी साथ में परखा जाए। जितनी जटिल आपूर्ति-श्रृंखला, उतनी ही बहुआयामी जांच की जरूरत। कोरिया की यह रिपोर्ट बताती है कि वहां कम से कम इस श्रेणी के उत्पादों के मामले में प्रशासनिक व्यवस्था ने जोखिम को व्यापक दृष्टि से देखने की कोशिश की।

ध्यान देने वाली बात यह भी है कि जांचे गए नमूनों की संख्या 21 थी। पहली नजर में यह संख्या बहुत बड़ी नहीं लग सकती। लेकिन यहां मात्रा से अधिक मायने नमूनों के चरित्र का है। यदि चयनित नमूने उन उत्पादों से जुड़े हैं जो आम जीवन में व्यापक रूप से इस्तेमाल होते हैं, तो ऐसी जांच निगरानी की दिशा और प्राथमिकता का संकेत देती है। यह संदेहास्पद उत्पादों की तलाश के साथ-साथ बाजार में नियमित उपस्थिति रखने वाली वस्तुओं पर नजर रखने का तरीका भी है।

यानी 417 मानकों की जांच का संदेश यह है कि खाद्य-सुरक्षा आज केवल ‘खराब माल’ पकड़ने का काम नहीं, बल्कि ‘विश्वसनीय आपूर्ति-व्यवस्था’ बनाए रखने का विज्ञान है। और जब किसी समाज में स्वास्थ्य-लाभ के दावों वाले पदार्थों की मांग बढ़ती है, तब इस विज्ञान की भूमिका और अधिक केंद्रीय हो जाती है।

कोरिया की व्यवस्था और भारतीय उपभोक्ता का सवाल: भरोसा आखिर बनता कैसे है

उपभोक्ता-भरोसा किसी विज्ञापन से स्थायी रूप से नहीं बनता। वह नियमन, पारदर्शिता और जवाबदेही से बनता है। कोरिया के जिओल्लानाम-डो स्वास्थ्य एवं पर्यावरण अनुसंधान संस्थान ने साफ कहा कि अगर किसी नमूने में गड़बड़ी पाई जाती, तो खाद्य-सुरक्षा प्रबंधन दिशानिर्देशों के अनुसार संबंधित एजेंसियों के साथ सूचना साझा की जाती और रिकॉल तथा नष्ट करने जैसी कार्रवाई की जाती। यह बिंदु उतना ही महत्वपूर्ण है जितना ‘सभी नमूने सुरक्षित’ वाला निष्कर्ष।

क्योंकि किसी भी सुरक्षा-तंत्र की विश्वसनीयता केवल इस बात से तय नहीं होती कि उसने कितनी जांच की, बल्कि इस बात से भी तय होती है कि गड़बड़ी मिलने पर उसकी अगली चाल क्या होगी। क्या सूचना दबा दी जाएगी? क्या बाजार से माल हटाया जाएगा? क्या जिम्मेदारी तय होगी? क्या जनता को सच बताया जाएगा? जब कोई प्रशासनिक संस्था पहले ही यह स्पष्ट कर देती है कि उसके पास सूचना-साझाकरण, रिकॉल और निपटान का ढांचा मौजूद है, तब भरोसा केवल अच्छे परिणामों पर नहीं, बल्कि खराब परिणामों से निपटने की क्षमता पर भी टिकता है।

भारत में भी यह सवाल बार-बार उठता है। चाहे बात मसालों की गुणवत्ता की हो, पैकेज्ड खाद्य पदार्थों की, आयुर्वेदिक दावों की, या ऑनलाइन बिकने वाले हेल्थ सप्लीमेंट्स की—उपभोक्ता जानना चाहता है कि नियामक संस्थाएं कब और कैसे हस्तक्षेप करती हैं। हमारे यहां खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण, राज्य स्तरीय प्रयोगशालाएं, दवा नियंत्रण तंत्र और उपभोक्ता संरक्षण संस्थाएं अपनी-अपनी भूमिका निभाती हैं, लेकिन जनता के मन में अक्सर एक दूरी बनी रहती है। इस दूरी का कारण सिर्फ व्यवस्था की कमी नहीं, बल्कि सूचना के संप्रेषण का ढंग भी है।

कोरियाई उदाहरण यहां इसलिए दिलचस्प है क्योंकि वहां एक क्षेत्रीय संस्थान ने अपनी जांच का दायरा, निष्कर्ष और संभावित कार्रवाई का ढांचा सार्वजनिक रूप से रखा। इससे संदेश जाता है कि प्रशासन केवल आदेश देने वाली मशीनरी नहीं, बल्कि निगरानी, परीक्षण और प्रतिक्रिया का एक जीवंत तंत्र है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह उस आदर्श की याद दिलाता है जहां जनता को केवल ‘सुरक्षित है’ या ‘असुरक्षित है’ न बताया जाए, बल्कि यह भी बताया जाए कि किन मानकों पर, किस पद्धति से और किस जिम्मेदारी-श्रृंखला के तहत यह निर्णय लिया गया।

यहां एक सांस्कृतिक पहलू भी ध्यान देने योग्य है। कोरिया जैसे समाजों में, जहां सामुदायिक अनुशासन, प्रशासनिक अनुपालन और सार्वजनिक व्यवस्था को अपेक्षाकृत गंभीरता से देखा जाता है, ऐसी जांच-रिपोर्टें सामाजिक भरोसे को मजबूत करती हैं। भारत जैसा विविध, विशाल और बहु-स्तरीय बाजार वाला देश इस मॉडल को हूबहू नहीं अपना सकता, लेकिन उससे प्रेरित जरूर हो सकता है—खासकर वहां जहां खाद्य और स्वास्थ्य के नाम पर बेचने वाली वस्तुओं की संख्या तेजी से बढ़ रही हो।

जिओल्लानाम-डो से दिल्ली, लखनऊ और भोपाल तक: भारतीय संदर्भ में इस खबर का मतलब

अगर इस कोरियाई खबर को भारतीय अनुभव से जोड़कर पढ़ें, तो कई सवाल सामने आते हैं। हमारे बाजार में बड़ी मात्रा में ऐसी सामग्री बिकती है जो भोजन भी है और स्वास्थ्य-सहायक भी। जैसे हल्दी केवल मसाला नहीं; रोग प्रतिरोधक क्षमता और सूजन कम करने के दावों से जुड़ी एक सांस्कृतिक पहचान भी है। मुलेठी सिर्फ स्वाद या सुगंध की चीज नहीं; गले और खांसी के घरेलू उपचार का हिस्सा भी है। अश्वगंधा, गिलोय, शतावरी, सौंठ, आंवला, मेथी, अलसी, दालचीनी—ये सब ऐसे उत्पाद हैं जिनके उपभोग में स्वाद, परंपरा और स्वास्थ्य-आकांक्षा तीनों मौजूद हैं।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या उपभोक्ता को इन उत्पादों के बारे में उतनी ही स्पष्ट और नियमित सुरक्षा-सूचना मिलती है जितनी उसे मिलनी चाहिए? बड़े शहरों में ऑर्गेनिक बाजार, आयुर्वेदिक ब्रांड, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और हेल्थ-इन्फ्लुएंसर्स की सलाह ने इस श्रेणी की मांग बढ़ा दी है। लेकिन मांग बढ़ने के साथ जोखिम भी बढ़ते हैं—गलत लेबलिंग, अप्रमाणित दावे, प्रसंस्करण में कमी, अनुचित भंडारण, कीटनाशक अवशेष, भारी धातुएं, या नकली उत्पादों का घुसपैठ।

कोरिया की यह रिपोर्ट भारतीय नीति-निर्माताओं के लिए एक सरल, पर महत्वपूर्ण संकेत देती है: उन वस्तुओं पर खास निगरानी कीजिए जिन्हें लोग स्वास्थ्य-लाभ की उम्मीद से खरीदते हैं। क्योंकि वहां नुकसान का अर्थ केवल ‘खराब खाना’ नहीं, बल्कि ‘स्वास्थ्य के नाम पर खतरा’ भी हो सकता है। भारत जैसे देश में जहां आयुष, पोषण, पारंपरिक उपचार और वेलनेस उद्योग का बाजार विशाल है, वहां ऐसी जांचों की सार्वजनिक रिपोर्टिंग उपभोक्ता शिक्षा का भी काम कर सकती है।

दूसरी बात, इस खबर से यह भी समझा जा सकता है कि क्षेत्रीय स्तर की संस्थाओं की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है। भारत में अक्सर राष्ट्रीय स्तर की नीतियों पर अधिक ध्यान जाता है, जबकि रोजमर्रा के खाद्य-निगरानी तंत्र का बड़ा हिस्सा राज्यों, जिलों और स्थानीय प्रयोगशालाओं के भरोसे चलता है। यदि राज्यों के स्तर पर नियमित, विषय-विशेष जांच हो और उसके परिणाम स्पष्ट भाषा में सार्वजनिक किए जाएं, तो आम नागरिक का भरोसा मजबूत होगा।

तीसरी बात, इस खबर में ‘समस्या नहीं मिली’ जैसी सूचना भी अपने-आप में सार्वजनिक हित की सूचना है। हमारे यहां कभी-कभी यह धारणा बन जाती है कि खबर वही है जिसमें संकट हो, विवाद हो, या सनसनी हो। लेकिन समाज की सुरक्षा व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा वह भी है जो चुपचाप, नियमित और प्रभावी ढंग से काम करता रहे। यह ठीक वैसे ही है जैसे किसी शहर में पुल नहीं टूटता, पानी में विषाक्तता नहीं मिलती, या स्कूल का भोजन सुरक्षित निकलता है—इन घटनाओं की गैर-मौजूदगी भी प्रशासनिक सफलता की कहानी होती है, भले वह सुर्खियों में कम आए।

सार्वजनिक स्वास्थ्य का असली पाठ: रोकथाम, पारदर्शिता और स्थानीय संस्थाओं की ताकत

जिओल्लानाम-डो की इस जांच से तीन बड़े निष्कर्ष निकलते हैं। पहला, स्वास्थ्य-सुरक्षा केवल अस्पतालों, दवाओं और टीकाकरण तक सीमित नहीं है; वह बाजार, खेत, प्रसंस्करण और वितरण तक फैली होती है। जब ऐसी सामग्री की जांच होती है जिसे लोग स्वास्थ्य-लाभ की आशा से खरीदते हैं, तो यह सार्वजनिक स्वास्थ्य की रोकथाम-आधारित सोच को मजबूत करती है। दूसरे शब्दों में, बीमारी का इंतजार करने के बजाय खतरे को पहले से कम करना ही आधुनिक प्रशासन का अधिक परिपक्व रूप है।

दूसरा निष्कर्ष पारदर्शिता से जुड़ा है। यदि जांच हुई, तो जनता को यह भी पता होना चाहिए कि क्या जांचा गया, कितनी वस्तुएं जांची गईं, कौन-कौन से मानक देखे गए और परिणाम क्या रहे। कोरिया की यह खबर यही करती है। इसमें केवल निष्कर्ष नहीं, प्रक्रिया की झलक भी है। यही झलक उपभोक्ता-विश्वास की असली नींव बनती है। भारत में भी जब-जब प्रयोगशाला रिपोर्ट, रिकॉल सूचना, या चेतावनी आदेश स्पष्ट रूप से सामने आते हैं, उपभोक्ता अधिक सशक्त महसूस करता है।

तीसरा निष्कर्ष स्थानीय संस्थाओं की ताकत पर है। किसी भी देश की राष्ट्रीय नीति उतनी ही मजबूत होती है जितनी उसकी स्थानीय प्रयोगशालाएं, निरीक्षण तंत्र और क्षेत्रीय प्रशासनिक दक्षता। जिओल्लानाम-डो का संस्थान अपने स्तर पर बाजार में उपलब्ध वस्तुओं की निगरानी कर रहा है, यही इस खबर का सबसे व्यावहारिक पक्ष है। भारत में भी जिला और राज्य स्तर पर लैब, खाद्य निरीक्षक, औषधि नियंत्रण इकाइयां और कृषि विभाग यदि बेहतर समन्वय के साथ काम करें, तो उपभोक्ता सुरक्षा की तस्वीर बदल सकती है।

इस कहानी का एक सांस्कृतिक आयाम भी है। एशियाई समाजों में भोजन कभी सिर्फ कैलोरी नहीं रहा; वह ऋतु, देह, रोग-प्रतिरोध, घरेलू ज्ञान और सामुदायिक स्मृति से जुड़ा रहा है। इसलिए जब प्रशासन ‘खाने योग्य’ और ‘स्वास्थ्यकर’ के बीच के क्षेत्र पर बारीकी से काम करता है, तब वह केवल नियम लागू नहीं करता, बल्कि सांस्कृतिक यथार्थ को भी स्वीकार करता है। भारत में यह समझ और भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां भोजन और उपचार का रिश्ता हजारों साल पुरानी परंपराओं से निकला है।

अंततः, दक्षिण कोरिया के एक प्रांत की यह खबर हमें याद दिलाती है कि जन-स्वास्थ्य की मजबूत इमारत छोटे-छोटे, नियमित और तकनीकी रूप से सक्षम कदमों पर खड़ी होती है। बाजार में बिक रही जड़ी, फल, सूखी सामग्री या स्वास्थ्य-संबंधी पदार्थ सुरक्षित हैं या नहीं—यह कोई मामूली प्रश्न नहीं। यह सीधे घर की रसोई, बुजुर्गों के घरेलू नुस्खों, बच्चों के पोषण और नागरिकों के प्रशासन पर भरोसे से जुड़ा है। जिओल्लानाम-डो की रिपोर्ट इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह संकट की नहीं, व्यवस्था की खबर है; घबराहट की नहीं, भरोसे की खबर है; और सबसे बढ़कर, यह इस बात की खबर है कि आधुनिक समाजों में सुरक्षा केवल कानून से नहीं, बल्कि नियमित जांच और जिम्मेदार संस्थागत आचरण से पैदा होती है।

भारतीय पाठक के लिए इसका संदेश बिल्कुल साफ है: स्वास्थ्य के नाम पर जो कुछ हमारी थाली, डिब्बे, काढ़े, चूर्ण, चाय या सप्लीमेंट में पहुंचता है, उसकी विश्वसनीयता केवल परंपरा से नहीं, परीक्षण से भी तय होनी चाहिए। परंपरा सम्मान की हकदार है, लेकिन सुरक्षा का प्रमाण प्रयोगशाला और जवाबदेह प्रशासन ही देता है। दक्षिण कोरिया ने इस बार यही दिखाया है—और यही वह सबक है जिसे एशिया के दूसरे समाज, भारत सहित, गंभीरता से पढ़ सकते हैं।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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