
युवा संस्कृति, शराब और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच नया समीकरण
दक्षिण Korea में युवा जीवन, विश्वविद्यालयी मेलजोल और सामाजिक दबाव के बीच शराब को लेकर एक दिलचस्प और महत्वपूर्ण बहस फिर सामने आई है। वहां के स्वास्थ्य एवं कल्याण मंत्रालय और Korea Health Promotion Institute ने 2026 के लिए विश्वविद्यालय छात्रों का एक विशेष ‘मितपान समर्थन दल’ सक्रिय किया है, जो इस साल नवंबर तक देशभर में संयमित और जिम्मेदार पेय-संस्कृति को बढ़ावा देगा। इस अभियान का नारा है—‘स्वस्थ युवा, शराब के बिना भी खुशहाल!’ सुनने में यह एक सामान्य छात्र अभियान लग सकता है, लेकिन इसके भीतर एक व्यापक सार्वजनिक स्वास्थ्य सोच काम कर रही है।
भारत के पाठकों के लिए यह समझना जरूरी है कि कोरियाई समाज में सामूहिक मेलजोल, दफ्तरों की बैठकों, मित्र मंडली और विश्वविद्यालयी जीवन में कभी-कभी शराब सामाजिक ‘गोंद’ की तरह काम करती रही है। जैसे भारत के कई हिस्सों में कॉलेज फेयरवेल, फ्रेशर्स पार्टी, क्रिकेट जीत का जश्न या कॉरपोरेट ऑफ-साइट सामाजिक पहचान के मंच बन जाते हैं, वैसे ही दक्षिण कोरिया में भी कई अवसरों पर पीना सिर्फ व्यक्तिगत विकल्प नहीं, बल्कि समूह में शामिल होने का संकेत माना गया है। ऐसे माहौल में जब सरकार और छात्र मिलकर यह कहें कि ‘बिना शराब के भी आनंद संभव है’, तो यह सिर्फ स्वास्थ्य सलाह नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवहार बदलने की कोशिश होती है।
इस वर्ष इस अभियान में 40 विश्वविद्यालयों से 30 टीमें और कुल 244 छात्र भाग ले रहे हैं। उनका काम केवल पोस्टर लगाना या भाषण देना नहीं है। वे शराब से होने वाली हानियों पर जानकारी तैयार करेंगे, उसे फैलाएंगे और साथ ही व्यवहारिक स्तर पर ऐसे अभियान चलाएंगे जिनसे युवाओं के बीच शराब को ‘जरूरी’ सामाजिक माध्यम मानने की सोच कमजोर पड़े। यही वजह है कि इस खबर को सामान्य स्वास्थ्य सूचना की तरह नहीं, बल्कि बदलती युवा संस्कृति और सार्वजनिक नीति के संगम के रूप में पढ़ा जाना चाहिए।
भारतीय नजरिए से देखें तो यह मुद्दा हमारे यहां भी तेजी से प्रासंगिक हो रहा है। महानगरों से लेकर टियर-2 शहरों तक कॉलेज जीवन, नाइटलाइफ़, पार्टी संस्कृति और सोशल मीडिया पर ‘कूल’ दिखने की होड़ ने युवाओं के सामने नई चुनौतियां खड़ी की हैं। ऐसे में दक्षिण कोरिया की यह पहल हमें यह सोचने का मौका देती है कि क्या स्वस्थ सामाजिकता का कोई वैकल्पिक मॉडल बनाया जा सकता है—जहां दोस्ती, जश्न और अपनापन हो, पर नशा उसकी अनिवार्य शर्त न बने।
कोरियाई संदर्भ में ‘절주’ क्या है, और इसे समझना क्यों जरूरी है
इस अभियान का केंद्रीय शब्द है ‘절주’ जिसे मोटे तौर पर ‘मितपान’, ‘संयमित मद्यपान’ या ‘शराब कम करने की संस्कृति’ के रूप में समझा जा सकता है। यह पूर्ण निषेध या नैतिक उपदेश की भाषा नहीं है। कोरियाई स्वास्थ्य विमर्श में इसका अर्थ है—ऐसी जीवनशैली विकसित करना जिसमें शराब व्यक्ति के स्वास्थ्य, रिश्तों, निर्णय क्षमता और सामाजिक सुरक्षा पर अनावश्यक बोझ न बने। दूसरे शब्दों में, यहां लक्ष्य शराब पीने वालों को अपराधी ठहराना नहीं, बल्कि उस माहौल को बदलना है जो अत्यधिक या दबावपूर्ण पीने को सामान्य बना देता है।
भारतीय संदर्भ में इसे समझने के लिए तंबाकू-विरोधी अभियानों और सड़क सुरक्षा संदेशों की तुलना उपयोगी हो सकती है। जैसे अब यह बात अधिक स्पष्ट हो चुकी है कि सिर्फ व्यक्ति को दोषी ठहराकर धूम्रपान या लापरवाह ड्राइविंग जैसी आदतें नहीं बदली जा सकतीं, वैसे ही कोरिया में भी यह स्वीकार किया जा रहा है कि शराब की समस्या केवल व्यक्तिगत इच्छाशक्ति का प्रश्न नहीं है। यदि हर सामाजिक कार्यक्रम, हर कैंपस समारोह और हर दोस्ताना मिलन का केंद्र शराब हो, तो युवा के लिए ‘ना’ कहना आसान नहीं रहता।
कोरिया में विश्वविद्यालय जीवन को लंबे समय से उस दौर के रूप में देखा जाता है जहां वयस्कता की शुरुआत होती है और जीवन भर साथ रहने वाली सामाजिक आदतें बनती हैं। यह बात भारत में भी कमोबेश सच है। इंजीनियरिंग कॉलेज के हॉस्टल से लेकर दिल्ली, पुणे, बेंगलुरु, हैदराबाद या चंडीगढ़ जैसे छात्र शहरों तक, कई युवाओं के लिए कॉलेज वह पहला स्थान होता है जहां परिवार की प्रत्यक्ष निगरानी घटती है और साथियों का प्रभाव बढ़ता है। ऐसे में यदि शराब सामाजिक पहचान, साहस, आधुनिकता या मित्रता की भाषा बन जाए, तो उसका असर लंबे समय तक रह सकता है।
यही कारण है कि कोरियाई स्वास्थ्य एजेंसियां इस अभियान को केवल चेतावनी अभियान की तरह नहीं चला रहीं। उनका फोकस यह है कि युवाओं को यह बताया जाए कि आनंद, आत्मीयता और समूह-बोध के अन्य तरीके भी संभव हैं। यह टोन महत्वपूर्ण है। स्वास्थ्य संचार की दुनिया में अब यह माना जाता है कि लगातार ‘यह मत करो’ कहना अक्सर कम असरदार होता है; जबकि ‘इस तरह भी बेहतर जी सकते हैं’ कहना ज्यादा व्यावहारिक और स्वीकार्य पड़ता है।
कैंपस और स्थानीय समुदाय को साथ देखने की नीति
इस कोरियाई पहल की सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि इसमें बार-बार ‘विश्वविद्यालय और स्थानीय समुदाय’ दोनों का उल्लेख किया गया है। इसका अर्थ यह है कि समस्या को केवल कैंपस के भीतर की आदत नहीं माना जा रहा, बल्कि उस पूरे सामाजिक-आर्थिक परिवेश से जोड़ा जा रहा है जो छात्रों के व्यवहार को प्रभावित करता है। विश्वविद्यालयों के आसपास के कैफे, बार, रेस्तरां, छात्र-छूट वाली रातें, क्लब गतिविधियां, सीनियर-जूनियर की अनौपचारिक बैठकों से लेकर प्रचार सामग्री तक—सब मिलकर एक ऐसा माहौल बना सकते हैं जिसमें शराब सामान्य से बढ़कर सांस्कृतिक अपेक्षा बन जाती है।
यह दृष्टिकोण भारत के लिए भी बहुत शिक्षाप्रद है। हमारे यहां अक्सर सार्वजनिक स्वास्थ्य बहसें व्यक्ति की जिम्मेदारी तक सीमित हो जाती हैं। कहा जाता है कि युवाओं को ‘समझदार’ होना चाहिए, परिवार को ‘संस्कार’ देने चाहिए, या छात्र को ‘स्वअनुशासन’ रखना चाहिए। यह सब अपनी जगह सही है, लेकिन सवाल यह भी है कि क्या हमारे शहर, हमारे कॉलेज इलाके और हमारे सामाजिक आयोजन स्वस्थ विकल्पों के लिए जगह छोड़ते हैं? यदि रात के मनोरंजन का मतलब सिर्फ बार, हुक्का लाउंज या ऐसी पार्टियां रह जाएं जहां नशा ही केंद्रीय तत्व हो, तो विकल्प सिकुड़ जाते हैं।
कोरिया की इस योजना से यह संकेत मिलता है कि व्यवहार बदलने के लिए माहौल बदलना भी जरूरी है। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य की आधुनिक सोच है—व्यक्ति को दोष देने की बजाय उस परिवेश को देखना जो व्यक्ति के चुनावों को आकार देता है। उदाहरण के लिए, यदि कैंपस उत्सवों में बिना शराब वाले मनोरंजन, संगीत, खेल, संवाद और देर रात सुरक्षित सामुदायिक गतिविधियों को बढ़ाया जाए, तो धीरे-धीरे सामाजिक दबाव का स्वरूप बदल सकता है।
स्थानीय समुदाय को शामिल करने का एक और अर्थ है कि विश्वविद्यालय कोई बंद द्वीप नहीं होता। छात्र आसपास के बाजारों, सार्वजनिक परिवहन, सांस्कृतिक स्थलों और भोजन स्थलों के साथ एक जीवंत संबंध में रहते हैं। इसलिए यदि संयम की संस्कृति को बढ़ाना है, तो केवल कक्षा या हॉस्टल नोटिस बोर्ड काफी नहीं होंगे। यह बदलाव पड़ोस, बाजार और सामाजिक भाषा तक फैलना चाहिए। कोरियाई एजेंसियां इसी बड़ी तस्वीर को पकड़ने की कोशिश कर रही हैं।
244 छात्र, 30 टीमें और एक बड़ा सामाजिक प्रयोग
आंकड़ों के स्तर पर देखें तो 40 विश्वविद्यालयों से 30 टीमों में 244 छात्रों की भागीदारी कोई बहुत विशाल राष्ट्रीय संख्या नहीं लगती। लेकिन सार्वजनिक नीति में हर प्रयोग का महत्व उसके आकार से नहीं, उसके प्रभाव की दिशा से तय होता है। यहां छात्र सिर्फ किसी सरकारी अभियान के पोस्टर-बियरर नहीं हैं; वे उसके निर्माता, संदेशवाहक और स्थानीय अनुकूलनकर्ता हैं। वे जानकारी तैयार करेंगे, उसे अपने साथियों की भाषा में ढालेंगे और व्यावहारिक गतिविधियों के जरिये संयम को सामाजिक विकल्प बनाने का प्रयास करेंगे।
इसे इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि स्वास्थ्य संबंधी जानकारी अक्सर व्यवहार में नहीं बदलती। हम सभी जानते हैं कि धूम्रपान हानिकारक है, अधिक चीनी नुकसान करती है, नींद की कमी बुरी है, फिर भी आदतें बदलना आसान नहीं होता। शराब के मामले में तो सामाजिक दबाव, साथियों की अपेक्षा और ‘फन’ की छवि इसे और कठिन बना देती है। ऐसे में जानकारी और व्यवहार को साथ जोड़ना—यानी सूचना सामग्री बनाना और साथ ही व्यावहारिक अभियान चलाना—एक अधिक परिपक्व रणनीति है।
भारतीय विश्वविद्यालयों में भी छात्र-नेतृत्व वाले अभियानों ने कई बार असर दिखाया है। मेंस्ट्रुअल हेल्थ जागरूकता से लेकर मानसिक स्वास्थ्य, एंटी-रैगिंग और पर्यावरण संरक्षण तक, जब छात्र अपने साथियों से बात करते हैं, तो संदेश अधिक विश्वसनीय और कम उपदेशात्मक लगता है। यही बात कोरिया की इस योजना पर भी लागू होती है। ऊपर से आई सरकारी सलाह की तुलना में साथियों के बीच से उठा संदेश ज्यादा स्वाभाविक ढंग से स्वीकार किया जा सकता है।
यहां एक सांस्कृतिक बारीकी भी समझनी होगी। पूर्वी एशियाई समाजों में समूह-सहमति और सामूहिक भागीदारी का महत्व अपेक्षाकृत अधिक माना जाता है। ऐसे में यदि छात्र समुदाय खुद नई सामाजिक भाषा गढ़े—जैसे ‘बिना शराब के भी जश्न’, ‘स्वास्थ्य और दोस्ती साथ-साथ’, या ‘ना कहना भी सामान्य है’—तो उसका असर व्यक्तिगत स्तर से बढ़कर सामूहिक मानकों पर पड़ सकता है। 244 छात्र दरअसल 244 संदेश नहीं, बल्कि 244 सामाजिक संपर्क-बिंदु हैं, जो धीरे-धीरे बड़े संवाद में बदल सकते हैं।
‘शराब के बिना भी मज़ा’—नारे के पीछे की गहरी संचार रणनीति
किसी भी जनस्वास्थ्य अभियान में नारा सिर्फ प्रचार का साधन नहीं होता, वह नीति की सोच का संक्षिप्त रूप भी होता है। कोरियाई अभियान का नारा—‘स्वस्थ युवा, शराब के बिना भी खुशहाल!’—विशेष ध्यान खींचता है क्योंकि यह निषेधात्मक नहीं, वैकल्पिक आनंद की भाषा बोलता है। यह कहने की कोशिश है कि मज़ा, मित्रता, आत्मविश्वास और सामुदायिक जुड़ाव को शराब से मुक्त करके भी जिया जा सकता है।
भारत में भी यह संचार रणनीति काफी उपयोगी हो सकती है। हमारे यहां स्वास्थ्य संदेश कभी-कभी या तो अत्यधिक नैतिकतावादी हो जाते हैं, या इतने चिकित्सा-केंद्रित कि युवाओं तक भावनात्मक स्तर पर नहीं पहुंचते। लेकिन यदि संदेश यह हो कि बेहतर ऊर्जा, साफ दिमाग, अगली सुबह की ताजगी, सुरक्षित सामाजिकता और आत्मसम्मान भी ‘कूल’ हैं, तो उसका असर व्यापक हो सकता है। आज की पीढ़ी आदेश से कम, विकल्प से अधिक प्रभावित होती है। वह भागीदारी चाहती है, उपदेश नहीं।
इस नारे में एक और संकेत छिपा है—यानी स्वास्थ्य को आनंद का विरोधी नहीं माना जा रहा। यह महत्वपूर्ण बदलाव है। अक्सर सामाजिक कल्पना में स्वास्थ्य अनुशासन, त्याग और नियंत्रण से जुड़ा दिखाई देता है, जबकि आनंद को बेफिक्री, जोखिम और सीमा तोड़ने से। कोरियाई पहल इस विभाजन को चुनौती देती है। वह कहती है कि स्वस्थ रहना और आनंद लेना परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे को मजबूत करने वाली अवस्थाएं हो सकती हैं।
यदि इसे भारतीय युवा संस्कृति से जोड़कर देखें, तो यह संदेश उन परिवारों और संस्थानों के लिए भी उपयोगी है जो सिर्फ रोकथाम की भाषा जानते हैं। कई बार प्रतिबंधात्मक रवैया युवा को संवाद से दूर कर देता है। इसके उलट, यदि कैंपस जीवन में संगीत, खेल, कला, मिडनाइट फूड फेस्ट, ओपन माइक, फिल्म क्लब, ट्रेकिंग, नाइट साइकलिंग, वेलनेस इवेंट और बिना नशे वाली सामाजिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाए, तो शराब का प्रतीकात्मक महत्व अपने-आप घट सकता है। इसलिए कोरियाई नारे का अर्थ सतही नहीं है; यह सामाजिक कल्पना बदलने की रणनीति है।
युवा स्वास्थ्य की बड़ी तस्वीर: केवल बीमारी नहीं, जीवनशैली का प्रश्न
इस खबर की असली अहमियत यह है कि यह हमें याद दिलाती है कि स्वास्थ्य केवल अस्पताल, दवा, जांच और इलाज का मामला नहीं है। आधुनिक स्वास्थ्य नीति में जीवनशैली, सामाजिक व्यवहार और रोजमर्रा के चुनाव भी उतने ही निर्णायक हैं। शराब का सवाल इसी क्षेत्र में आता है। यह कोई ऐसा मुद्दा नहीं जिसे केवल डॉक्टर के कमरे में सुलझाया जा सके। यह दोस्ती, अकेलापन, समूह दबाव, सामाजिक प्रतिष्ठा, आत्मछवि, तनाव और मनोरंजन के पैटर्न से जुड़ा विषय है।
दक्षिण कोरिया में स्वास्थ्य संबंधी बहसें आज केवल तकनीकी चिकित्सा प्रगति तक सीमित नहीं हैं। वहां जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों—जैसे उच्च रक्तचाप, तनाव, अनियमित दिनचर्या, भोजन की आदतें और शराब—पर भी गहरा ध्यान दिया जा रहा है। यह रुझान भारत में भी स्पष्ट है। हमारे यहां शहरी युवाओं के बीच नींद की कमी, फास्ट फूड, डिजिटल थकान, कार्य-अध्ययन का दबाव और सामाजिक प्रदर्शन की संस्कृति पहले से ही मौजूद हैं। यदि इनके साथ शराब का अनियंत्रित उपयोग जुड़ जाए, तो मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों पर असर पड़ सकता है।
इसीलिए कोरियाई अभियान का संदेश सीमित नहीं है। यह कहता है कि स्वस्थ समाज बनाने के लिए हमें बीमारी होने से पहले की अवस्था में हस्तक्षेप करना होगा। यानी आदत बनने से पहले संवाद, दबाव बनने से पहले विकल्प, और जोखिम बढ़ने से पहले सामुदायिक समर्थन। भारत के संदर्भ में यह दृष्टिकोण स्कूलों, कॉलेजों, युवा केंद्रों और शहरी स्थानीय निकायों के लिए भी प्रासंगिक हो सकता है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि शराब से जुड़े नुकसान केवल लीवर या शारीरिक बीमारियों तक सीमित नहीं होते। दुर्घटनाएं, हिंसक व्यवहार, यौन सुरक्षा के जोखिम, अवसाद, शैक्षणिक प्रदर्शन में गिरावट और रिश्तों में तनाव—ये सभी ऐसे पहलू हैं जिनकी चर्चा अक्सर कम होती है। इसलिए ‘शराब हानि-निवारण’ को केवल चिकित्सा विषय की तरह नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा और जीवन-गुणवत्ता के प्रश्न की तरह देखना चाहिए।
भारत के लिए क्या सबक हैं, और आगे की राह क्या हो सकती है
दक्षिण कोरिया की यह पहल भारत को सीधे नकल करने का मॉडल नहीं देती, लेकिन कुछ स्पष्ट सबक जरूर देती है। पहला, युवा स्वास्थ्य अभियानों को नैतिक भाषण नहीं, सहानुभूतिपूर्ण और सहभागी भाषा चाहिए। दूसरा, विश्वविद्यालयी संस्कृति को केवल अनुशासन के नजरिये से नहीं, सामाजिक डिजाइन के नजरिये से देखना होगा। तीसरा, छात्र-नेतृत्व वाले अभियान अधिक विश्वसनीय हो सकते हैं, खासकर तब जब वे साथियों की वास्तविक समस्याओं, दबावों और भाषा को समझते हों।
भारत जैसे विविध समाज में शराब को लेकर सांस्कृतिक दृष्टिकोण भी बेहद अलग-अलग हैं। कुछ राज्यों में सख्त नियंत्रण है, कुछ क्षेत्रों में सामाजिक स्वीकृति ज्यादा है, और कई जगह यह वर्ग, लिंग और शहरीकरण के साथ बदलती हुई आदत है। इसलिए यहां किसी भी जनस्वास्थ्य रणनीति को संवेदनशील, क्षेत्रीय और बहुस्तरीय होना पड़ेगा। लेकिन यह तो स्पष्ट है कि युवाओं को सिर्फ ‘मत करो’ कहने से बात नहीं बनेगी। उन्हें स्वस्थ, सम्मानजनक और आकर्षक विकल्प देने होंगे।
कॉलेज परिसरों में वेलनेस क्लब, पीयर सपोर्ट ग्रुप, सुरक्षित सामाजिक कार्यक्रम, मानसिक स्वास्थ्य संवाद, देर रात सुरक्षित परिवहन, बिना शराब वाले उत्सव और स्थानीय व्यवसायों के साथ साझेदारी जैसे उपाय इस दिशा में मददगार हो सकते हैं। जैसे भारत ने स्वच्छता, योग, डिजिटल भुगतान और हेलमेट जैसे विषयों पर धीरे-धीरे सामाजिक व्यवहार बदला, वैसे ही जिम्मेदार सामाजिकता पर भी लंबी अवधि में काम किया जा सकता है।
अंततः दक्षिण कोरिया की यह खबर केवल एक सरकारी कार्यक्रम की सूचना नहीं है। यह इस बड़े प्रश्न की ओर इशारा करती है कि आधुनिक युवा समाज में ‘मस्ती’ की परिभाषा कौन तय करेगा—बाजार, दबाव और परंपरागत आदतें, या स्वास्थ्य, विकल्प और आत्मनिर्णय? यदि विश्वविद्यालयों से नई संस्कृति उठती है, तो उसका असर आने वाले समाज पर पड़ता है। और शायद यही वजह है कि 244 छात्रों का यह अभियान अपने आकार से कहीं बड़ा महत्व रखता है। भारत में भी, जहां युवा आबादी दुनिया में सबसे बड़ी है, ऐसी पहलों पर गंभीरता से विचार करना समय की मांग है।
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