광고환영

광고문의환영

सियोल से उठी एक छोटी पहल, जो बड़े शहरों की सुरक्षा नीति का नया पाठ पढ़ाती है

सियोल से उठी एक छोटी पहल, जो बड़े शहरों की सुरक्षा नीति का नया पाठ पढ़ाती है

शहरों में डर का नया भूगोल और एक छोटी-सी सार्वजनिक दखल

दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल के यांगचॉन-गु जिले से आई एक हालिया नीति घोषणा पहली नजर में बहुत छोटी लग सकती है। कुल 77 घरों को सुरक्षा उपकरण देने की योजना—संख्या के लिहाज से यह न तो किसी बड़े बजट की कहानी है, न ही किसी राष्ट्रीय स्तर के अभियान का शोर-शराबा। लेकिन असल महत्व संख्या में नहीं, उस सोच में है जो इस योजना के पीछे दिखाई देती है। स्थानीय प्रशासन ने साफ संकेत दिया है कि घर में घुसपैठ, पीछा किए जाने यानी स्टॉकिंग, और अकेले रहने वाले लोगों की सुरक्षा जैसे सवाल अब केवल व्यक्ति की निजी चिंता नहीं रह सकते। इन्हें सार्वजनिक नीति, स्थानीय शासन और सामाजिक कल्याण के दायरे में लाया जाना चाहिए।

योनहाप समाचार एजेंसी के अनुसार, सियोल के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में स्थित यांगचॉन-गु ने 2026 के लिए एक ‘आनशिम उपकरण सहायता परियोजना’ शुरू करने की घोषणा की है। इसका लक्ष्य उन लोगों को सुरक्षा उपकरण देना है जिन्हें प्रशासन ने ‘सुरक्षा की दृष्टि से अधिक संवेदनशील’ माना है—विशेष रूप से एकल-व्यक्ति परिवार और स्टॉकिंग के पीड़ित। योजना के तहत 66 एकल-व्यक्ति परिवारों और 11 स्टॉकिंग पीड़ितों को सहायता दी जाएगी। यह कोई सामान्य वितरण कार्यक्रम नहीं है; यह उन घरों तक सार्वजनिक सुरक्षा पहुंचाने की कोशिश है जहां भय सबसे निजी, सबसे चुप और सबसे लगातार मौजूद रहता है।

भारतीय पाठकों के लिए इसे समझना कठिन नहीं होना चाहिए। हमारे यहां भी महानगरों—दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, पुणे, हैदराबाद, गुरुग्राम या नोएडा—में बड़ी संख्या में छात्र, नौकरीपेशा युवा, प्रवासी महिलाएं, बुजुर्ग और अकेले रहने वाले पेशेवर किराए के कमरों, स्टूडियो फ्लैटों या छोटे अपार्टमेंटों में रहते हैं। सुरक्षा का सवाल उनके लिए अक्सर दरवाजे का मजबूत ताला, मकान मालिक की संवेदनशीलता, पड़ोसियों की सतर्कता, और पुलिस तक त्वरित पहुंच जैसी बातों से तय होता है। लेकिन जब प्रशासन यह कहने लगे कि सुरक्षा केवल ‘सावधान रहो’ का निजी उपदेश नहीं, बल्कि सार्वजनिक समर्थन का विषय है, तब नीति का अर्थ बदल जाता है। सियोल की यह पहल इसी बदलाव का संकेत देती है।

कोरियाई शहरी समाज में बीते वर्षों में एकल-व्यक्ति परिवारों की संख्या तेजी से बढ़ी है। यह बदलाव केवल जीवनशैली का नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था, विवाह के बदलते पैटर्न, नौकरी की गतिशीलता और आवास संकट से भी जुड़ा है। भारत में भी यह रुझान महानगरों और उभरते शहरी केंद्रों में दिख रहा है। ऐसे में यह खबर सिर्फ कोरिया की एक जिला योजना नहीं, बल्कि उस बड़े सवाल की तरफ इशारा करती है जो एशिया के लगभग हर तेजी से शहरीकरण करते समाज के सामने है: क्या शहर अपने नागरिकों को केवल काम और किराए की जगह देते हैं, या उन्हें सुरक्षा का न्यूनतम भरोसा भी मुहैया कराते हैं?

योजना क्या है और किन लोगों पर इसका फोकस है

यांगचॉन-गु प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि यह योजना मुख्य रूप से दो वर्गों के लिए है—एकल-व्यक्ति परिवार और स्टॉकिंग के पीड़ित। कोरिया में ‘1인 가구’ यानी एकल-व्यक्ति परिवार का अर्थ केवल अविवाहित युवा नहीं होता; इसमें अकेले रह रहे बुजुर्ग, नौकरी के कारण परिवार से अलग रहने वाले लोग, और ऐसे नागरिक भी शामिल हो सकते हैं जिनकी जीवन परिस्थितियां उन्हें अकेले रहने पर मजबूर करती हैं। यही कारण है कि इस श्रेणी को प्रशासन केवल सामाजिक प्रवृत्ति नहीं, बल्कि सुरक्षा नीति के दृष्टिकोण से भी देख रहा है।

योजना के लिए पात्रता का एक आर्थिक मानदंड भी तय किया गया है। यांगचॉन-गु में रहने वाले ऐसे एकल-व्यक्ति परिवार, जिनके घर का मूल्य या किरायेदारी जमा राशि 350 मिलियन वॉन से कम है, उन्हें ‘आनशिम होम सेट’ के रूप में सुरक्षा उपकरण दिए जाएंगे। यह राशि भारतीय मुद्रा में मोटे तौर पर एक बड़ी शहरी आवासीय लागत के समकक्ष मानी जा सकती है, लेकिन नीति का मूल बिंदु मुद्रा परिवर्तन नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि प्रशासन ने सीमित संसाधनों को उन घरों पर केंद्रित करने की कोशिश की है जहां सुरक्षा की आवश्यकता ज्यादा और निजी प्रबंध की क्षमता अपेक्षाकृत कम हो सकती है।

मूल कोरियाई विवरण में यह नहीं बताया गया कि उपकरणों के सेट में कौन-कौन सी चीजें होंगी, लेकिन नाम और नीति की दिशा से इतना साफ है कि लक्ष्य ऐसे साधन देना है जो घर में घुसपैठ को कठिन बनाएं, संभावित अपराधी को हतोत्साहित करें, और निवासी को मनोवैज्ञानिक भरोसा दें। इसमें स्मार्ट डोर सेंसर, अतिरिक्त ताले, दरवाजा खोलने पर अलार्म देने वाले उपकरण, वीडियो डोरबेल, आपातकालीन सूचना प्रणाली या अन्य निवारक तकनीकें शामिल हो सकती हैं। यानी यह पुलिसिया कार्रवाई के बाद का मॉडल नहीं, बल्कि अपराध होने से पहले खतरे को कम करने का मॉडल है।

भारतीय संदर्भ में भी इसे समझना आसान है। कई राज्यों में महिलाओं की सुरक्षा के लिए हेल्पलाइन, आपातकालीन ऐप, पैनिक बटन या पुलिस गश्त जैसे उपाय अपनाए गए हैं। कुछ शहरों में आवासीय सोसायटियां सीसीटीवी, बायोमेट्रिक एंट्री और आरडब्ल्यूए आधारित निगरानी पर जोर देती हैं। लेकिन किराए के छोटे मकानों, पुराने मोहल्लों और असंगठित शहरी बस्तियों में ऐसी सुरक्षा व्यवस्था अक्सर अनुपस्थित होती है। वहां ‘अपनी सुरक्षा खुद’ का दबाव अधिक होता है। सियोल की यह योजना इस निजी बोझ को आंशिक रूप से सार्वजनिक जिम्मेदारी में बदलने का प्रयास है।

आवास सुरक्षा को कल्याण के मुद्दे के रूप में देखना क्यों महत्वपूर्ण है

इस पूरी खबर का सबसे उल्लेखनीय पहलू यही है कि घर में घुसपैठ रोकने को केवल कानून-व्यवस्था की पारंपरिक समस्या नहीं माना जा रहा। आमतौर पर अपराध होने के बाद पुलिस, जांच, अदालत और सजा की चर्चा होती है। लेकिन किसी भी नागरिक का पहला सवाल इससे पहले का होता है—क्या मैं अपने घर में सुरक्षित हूं? क्या रात में दरवाजे की हल्की आवाज सुनकर मुझे डरना चाहिए? क्या मेरा पता, मेरा रूटीन, मेरा अकेलापन मुझे ज्यादा असुरक्षित बनाता है? यांगचॉन-गु की पहल इन सवालों को गंभीरता से लेती है।

यहां एक महत्वपूर्ण सामाजिक बात समझनी होगी। स्टॉकिंग, यानी किसी व्यक्ति का लगातार पीछा करना, नजर रखना, बार-बार संपर्क करना, भय पैदा करना या निजी दायरे का उल्लंघन करना, दक्षिण कोरिया में बीते कुछ वर्षों में बहुत गंभीर सामाजिक और कानूनी मुद्दे के रूप में उभरा है। भारत में भी ऐसी घटनाएं नई नहीं हैं। फर्क यह है कि लंबे समय तक इन्हें या तो सामान्य छेड़छाड़, ‘जिद्दी प्रेम’, या व्यक्तिगत विवाद के रूप में कमतर करके देखा जाता रहा। जबकि वास्तविकता यह है कि स्टॉकिंग अक्सर हिंसा के बड़े रूपों की ओर जाने वाला शुरुआती चरण हो सकती है। ऐसे में पीड़ित को केवल कानूनी सलाह देना पर्याप्त नहीं; उसके रहने की जगह को भी अधिक सुरक्षित बनाना जरूरी है।

एकल-व्यक्ति परिवारों का मामला अलग है, पर खतरा उतना ही वास्तविक हो सकता है। अकेले रहने वाले लोगों के सामने समस्या यह होती है कि वे आपात स्थिति में तत्काल घरेलू सहायता से वंचित होते हैं। यदि कोई दरवाजे पर संदेहास्पद गतिविधि हो, रात में घुसपैठ का प्रयास हो, या कोई पीछा कर रहा हो, तो उनके पास निर्णय लेने और मदद बुलाने की गुंजाइश सीमित हो सकती है। प्रशासन का यह मानना कि ऐसी परिस्थिति स्वयं में एक संरचनात्मक संवेदनशीलता है, आधुनिक शहरी नीति का महत्वपूर्ण संकेत है। यह व्यक्ति की जीवनशैली को दोष नहीं देता, बल्कि बदलती पारिवारिक संरचनाओं के अनुरूप सुरक्षा व्यवस्था बनाने की बात करता है।

भारतीय समाज के लिए भी यह बिंदु खास मायने रखता है। हमारे यहां परिवार को अक्सर सुरक्षा कवच के रूप में देखा जाता है। लेकिन तेजी से बदलते शहरी जीवन में हर व्यक्ति पारंपरिक संयुक्त परिवार में नहीं रहता। काम, पढ़ाई, तलाक, विधवापन, प्रवास, या निजी स्वतंत्रता की वजह से अकेले रहने वालों की संख्या बढ़ रही है। इसलिए सुरक्षा का विमर्श भी ‘परिवार है तो सुरक्षित हो’ की पुरानी धारणा से आगे जाना होगा। सियोल का यह उदाहरण बताता है कि आधुनिक शहर को नए सामाजिक ढांचे के अनुसार अपनी नीतियां ढालनी पड़ती हैं।

77 घरों की संख्या छोटी है, पर नीति का संदेश बड़ा

आलोचक कह सकते हैं कि 77 घरों की योजना से महानगर की बड़ी समस्या हल नहीं होगी। यह बात आंशिक रूप से सही भी है। किसी भी बड़े शहर में सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां इतनी सीमित नहीं कि कुछ दर्जन घरों तक मदद पहुंचाकर तस्वीर बदल जाए। लेकिन सार्वजनिक नीति का महत्व हमेशा पैमाने से नहीं मापा जाता। कई बार सबसे महत्वपूर्ण बात यह होती है कि राज्य या स्थानीय प्रशासन किस दिशा में पहला औपचारिक कदम उठा रहा है। यांगचॉन-गु का यह कदम उसी श्रेणी का है।

दरअसल, अपराध-निवारण की नीतियों में ‘माइक्रो-डिजाइन’ यानी सूक्ष्म स्तर की संरचना का महत्व अब तेजी से स्वीकार किया जा रहा है। अच्छी स्ट्रीट लाइट, सुरक्षित प्रवेश द्वार, स्मार्ट निगरानी, आपातकालीन बटन, सामुदायिक सतर्कता और आसान रिपोर्टिंग तंत्र जैसे उपाय अपराध की संभावना को कम कर सकते हैं। इसे शहरी नियोजन, तकनीक और सामाजिक कल्याण के मेल के रूप में देखा जा सकता है। पश्चिमी देशों में इसे कभी-कभी ‘क्राइम प्रिवेंशन थ्रू एनवायरनमेंटल डिजाइन’ जैसे ढांचों में समझा गया है; एशियाई शहर अब इसे स्थानीय जरूरतों के हिसाब से ढाल रहे हैं।

यांगचॉन-गु की नीति का संदेश यह है कि सुरक्षा केवल चौड़ी सड़कें, अधिक पुलिस वाहन या बड़े निगरानी नेटवर्क का प्रश्न नहीं है। कभी-कभी असली फर्क उस छोटे उपकरण से पड़ता है जो किसी किराए के फ्लैट के दरवाजे पर लगा हो, उस सेंसर से जो संदिग्ध हलचल पर चेतावनी दे, या उस व्यवस्था से जो पीड़ित को यह एहसास दिलाए कि यदि खतरा बढ़े तो वह अकेला नहीं है। सार्वजनिक नीति जब घर की चौखट तक पहुंचती है, तभी वह नागरिक के दैनिक भय को छू पाती है।

भारतीय संदर्भ में यह वैसे ही है जैसे किसी बड़े शहर की सुरक्षा पर बहस केवल पुलिस बल की संख्या तक सीमित न रहे, बल्कि पीजी आवासों, कार्यरत महिलाओं के हॉस्टलों, पुराने मोहल्लों की गलियों, किराए के अपार्टमेंट ब्लॉकों और एकल वृद्ध नागरिकों के घरों की वास्तविक सुरक्षा व्यवस्था पर भी केंद्रित हो। यदि स्थानीय निकाय, नगर निगम, जिला प्रशासन और पुलिस मिलकर छोटी लेकिन लक्षित सहायता योजनाएं बनाएं, तो उनका असर सिर्फ अपराध के आंकड़ों में नहीं, बल्कि लोगों के मनोवैज्ञानिक भरोसे में भी दिखाई देगा।

उसी दिन सामने आई दूसरी कोरियाई पहल और व्यापक सामाजिक नीति की दिशा

इस खबर का एक और दिलचस्प पहलू यह है कि उसी दिन सियोल के एक अन्य जिले जोंगनो-गु ने अपने वरिष्ठ नागरिक कल्याण केंद्र में स्मार्ट इनडोर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट सिस्टम स्थापित करने की जानकारी दी। यह सिस्टम इंटरनेट ऑफ थिंग्स और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से सूक्ष्म धूलकण, कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य हानिकारक तत्वों को वास्तविक समय में पहचानता है, फिर एयर स्टरलाइजर उन्हें कम करने का काम करता है। लक्ष्य हैं वे बुजुर्ग, जो लंबे समय तक ऐसे केंद्रों में समय बिताते हैं और जिनकी प्रतिरोधक क्षमता अपेक्षाकृत कमजोर हो सकती है।

पहली नजर में आवास सुरक्षा और इनडोर वायु गुणवत्ता दो अलग-अलग विषय लगते हैं। एक अपराध-निवारण से जुड़ा है, दूसरा सार्वजनिक स्वास्थ्य से। लेकिन इन दोनों पहलों की नीति-दृष्टि समान है। दोनों ही घटनाओं के बाद राहत देने की बजाय, जोखिम को पहले से कम करने वाले वातावरण के निर्माण पर जोर देती हैं। दूसरे शब्दों में, प्रशासन अब केवल संकट प्रबंधन नहीं, बल्कि दैनिक जीवन के बुनियादी ढांचे को अधिक सुरक्षित बनाने की ओर बढ़ रहा है।

यह बदलाव भारत के लिए भी अत्यंत प्रासंगिक है। हमारे यहां भी वरिष्ठ नागरिकों के लिए डे-केयर केंद्र, आंगनवाड़ी, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, छात्रावास, शहरी किराए के आवास और महिला आश्रय गृह जैसी जगहों पर सुरक्षा और स्वास्थ्य के सूक्ष्म आयामों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। अक्सर नीति बड़े उद्घाटन, इमारत निर्माण या योजनाओं की संख्या में फंस जाती है। जबकि नागरिक की असली जरूरत उन जगहों पर होती है जहां वह रोजमर्रा का जीवन बिताता है—कमरा, सीढ़ी, गली, सामुदायिक केंद्र, बस स्टॉप, कार्यस्थल तक का रास्ता। कोरिया की इन स्थानीय पहलों में इसी ‘दैनिक जीवन के प्रशासन’ की झलक मिलती है।

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि आधुनिक नगर प्रशासन का अगला चरण यही है—जहां कल्याण और सुरक्षा के बीच की दीवारें पतली होती जाएंगी। जिस तरह स्वच्छ हवा स्वास्थ्य का हिस्सा है, उसी तरह सुरक्षित प्रवेश और निजी स्थान की सुरक्षा भी कल्याण का ही हिस्सा है। सार्वजनिक नीति का यह समेकित दृष्टिकोण भविष्य के शहरी शासन की पहचान बन सकता है।

डर को निजी समस्या मानने की पुरानी सोच पर चोट

सियोल की यह योजना एक गहरी सामाजिक प्रवृत्ति को भी चुनौती देती है। अक्सर जब घर में घुसपैठ, पीछा किए जाने या महिलाओं और अकेले रहने वालों की सुरक्षा की बात होती है, तो सलाह का बोझ पीड़ित पर ही डाल दिया जाता है—दरवाजा ठीक से बंद रखिए, रात में सावधानी बरतिए, रास्ता बदल लीजिए, किसी को बताकर निकलिए, सेल्फ-डिफेंस सीखिए, नया ताला लगाइए। ये सलाहें बुरी नहीं हैं, लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब पूरा जोखिम-प्रबंधन व्यक्ति के कंधों पर डाल दिया जाता है और राज्य पीछे हट जाता है।

यांगचॉन-गु की पहल कहती है कि यह बोझ अकेले नागरिक पर नहीं छोड़ा जा सकता। खासकर तब, जब खतरे की प्रकृति संरचनात्मक हो—जैसे अकेले रहना, सीमित आर्थिक संसाधन, या किसी विशिष्ट व्यक्ति द्वारा पीछा किए जाने का इतिहास। स्टॉकिंग पीड़ितों को अलग श्रेणी के रूप में शामिल करना इसी कारण प्रतीकात्मक रूप से भी महत्वपूर्ण है। यह मान्यता देता है कि कुछ लोगों की सुरक्षा जरूरत सामान्य जनसंख्या से भिन्न होती है और उन्हें लक्षित संरक्षण चाहिए।

भारत में भी यह विमर्श लगातार उभर रहा है। महिला सुरक्षा पर बहस में अब यह सवाल अधिक मजबूती से उठता है कि पीड़ित के व्यवहार को नियंत्रित करने की बजाय सार्वजनिक ढांचे को क्यों न सुधारा जाए। बेहतर प्रकाश व्यवस्था, अधिक भरोसेमंद सार्वजनिक परिवहन, त्वरित पुलिस प्रतिक्रिया, किराए के मकानों में बुनियादी सुरक्षा मानक, कामकाजी महिलाओं के आवास में तकनीकी सुरक्षा—ये सब उसी सोच का हिस्सा हैं। कोरिया की यह स्थानीय नीति इस बहस को अंतरराष्ट्रीय संदर्भ देती है।

इसके साथ एक और नाजुक बात भी है—सुरक्षा के नाम पर अति-निगरानी से बचना। किसी भी आधुनिक शहर में तकनीकी समाधान उपयोगी होते हैं, लेकिन वे निजता के सवाल भी पैदा करते हैं। इसलिए ऐसी योजनाओं की सफलता सिर्फ उपकरण बांटने में नहीं, बल्कि इस संतुलन में है कि व्यक्ति को सुरक्षा मिले, पर उसका निजी जीवन अनावश्यक निगरानी का शिकार न बने। यदि स्थानीय प्रशासन इस संतुलन को साध पाता है, तो यह मॉडल दूसरे शहरों के लिए भी प्रेरक बन सकता है।

भारत के लिए सबक: महानगरों में सुरक्षा की नई भाषा कैसी हो

भारतीय हिंदी भाषी पाठकों के लिए इस खबर का सबसे सीधा अर्थ यह है कि शहरी सुरक्षा पर हमारी बहस को भी अधिक सूक्ष्म और मानवीय होना होगा। दिल्ली में अकेले रहने वाली कामकाजी महिला, मुंबई में देर रात शिफ्ट से लौटता कर्मचारी, नोएडा में किराए के फ्लैट में रहने वाला छात्र, बेंगलुरु में आईटी सेक्टर का युवा प्रोफेशनल, जयपुर या लखनऊ में अकेले रह रहे बुजुर्ग—इन सबकी सुरक्षा जरूरतें अलग हैं, लेकिन प्रशासनिक भाषा में वे अक्सर अदृश्य रह जाते हैं।

यदि भारत के शहरों को भविष्य के लिए तैयार करना है, तो सुरक्षा नीति में कुछ बुनियादी बदलाव जरूरी होंगे। पहला, स्थानीय निकायों को पुलिस से अलग लेकिन समन्वित भूमिका निभानी होगी। दूसरा, सुरक्षा को केवल अपराध दर्ज होने के बाद की कार्रवाई के रूप में नहीं, बल्कि निवारक बुनियादी सेवा के रूप में देखना होगा। तीसरा, किराए के आवास, एकल-व्यक्ति परिवार, वरिष्ठ नागरिक और स्टॉकिंग या घरेलू हिंसा के संभावित पीड़ितों जैसे समूहों के लिए लक्षित सहायता मॉडल बनाने होंगे। चौथा, तकनीक का इस्तेमाल संवेदनशील ढंग से करना होगा ताकि सहायता उपयोगी हो, दखलंदाजी नहीं।

कोरिया के समाज को भारत से जोड़कर देखें तो एक और समानता मिलती है—तेजी से बदलती पारिवारिक संरचनाएं। जिस तरह भारत में संयुक्त परिवार से परमाणु परिवार और फिर अकेले रहने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, उसी तरह कोरिया में भी सामाजिक जीवन की परिभाषाएं बदली हैं। इस परिवर्तन का असर केवल संस्कृति, विवाह और रोजगार पर नहीं, सुरक्षा की धारणा पर भी पड़ता है। जब सामाजिक ढांचा बदलता है तो राज्य की जिम्मेदारी भी बदलती है।

यांगचॉन-गु की यह योजना हमें याद दिलाती है कि सार्वजनिक नीति हमेशा बड़ी घोषणाओं से नहीं बनती। कई बार वह दरवाजे की चौखट पर लगने वाले एक छोटे उपकरण से बनती है; उस भरोसे से बनती है कि प्रशासन ने डर को निजी कमजोरी नहीं माना; और उस समझ से बनती है कि शहर का असली विकास तभी है, जब नागरिक अपने घर में चैन की नींद ले सके। सियोल के एक जिले की यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भविष्य के शहर की एक सधी हुई रूपरेखा पेश करती है—ऐसा शहर जहां सुरक्षा केवल पुलिस की वर्दी नहीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन में बुना हुआ सार्वजनिक आश्वासन हो।

आखिरकार, किसी भी सभ्य समाज की पहचान सिर्फ उसकी ऊंची इमारतों, चमकदार मेट्रो या डिजिटल सेवाओं से नहीं होती। असली कसौटी यह है कि वह अपने सबसे संवेदनशील नागरिकों के लिए कैसा ढांचा बनाता है। जो व्यक्ति अकेला रहता है, जो पहले से भय का सामना कर चुका है, जो आर्थिक रूप से बहुत सक्षम नहीं है, या जिसे हर रात घर लौटते समय मन में आशंका होती है—क्या राज्य उसके साथ खड़ा है? सियोल के यांगचॉन-गु ने कम-से-कम इस प्रश्न का एक व्यावहारिक उत्तर देने की कोशिश की है। और यही कारण है कि यह छोटी-सी खबर, दरअसल, बड़े शहरों की राजनीति और सार्वजनिक नैतिकता पर एक गंभीर टिप्पणी बन जाती है।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ