광고환영

광고문의환영

दक्षिण कोरिया में स्कूल ग्रेडिंग बदली, परीक्षा आसान हुई: अंकों की चमक के पीछे शिक्षा व्यवस्था का बड़ा बदलाव

दक्षिण कोरिया में स्कूल ग्रेडिंग बदली, परीक्षा आसान हुई: अंकों की चमक के पीछे शिक्षा व्यवस्था का बड़ा बदलाव

कोरिया की कक्षा से उठता एक बड़ा सवाल

दक्षिण कोरिया की स्कूली शिक्षा व्यवस्था में आया एक हालिया बदलाव केवल रिपोर्ट कार्ड की तकनीकी फेरबदल भर नहीं है, बल्कि यह उस समाज की मानसिकता, प्रतिस्पर्धा और बच्चों पर पड़ने वाले दबाव को समझने का भी एक मौका देता है, जो शिक्षा को लगभग राष्ट्रीय धर्म की तरह बरतता है। ताजा विश्लेषण बताता है कि कोरिया में हाई स्कूल के आंतरिक मूल्यांकन यानी स्कूल-आधारित ग्रेडिंग प्रणाली को 9-स्तरीय ढांचे से घटाकर 5-स्तरीय ढांचे में बदला गया, और इसके तुरंत बाद प्रमुख विषयों में औसत अंक बढ़ गए। आंकड़ों के अनुसार, कोरियाई भाषा, अंग्रेजी, गणित, सामाजिक विज्ञान और विज्ञान जैसे पांच मुख्य विषयों का औसत 70.4 अंक रहा, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 3.5 अंक अधिक है।

पहली नजर में यह किसी भी अभिभावक को राहत देने वाली खबर लग सकती है। भारत में भी जब बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम बेहतर आते हैं या प्रश्नपत्र अपेक्षाकृत सरल माना जाता है, तो परिवारों में एक क्षणिक सुकून की भावना जन्म लेती है। लेकिन पत्रकारिता का काम सिर्फ यह बताना नहीं कि अंक बढ़े, बल्कि यह समझना भी है कि वे क्यों बढ़े। कोरिया में यह बढ़त केवल छात्रों की पढ़ाई में अचानक आई छलांग का संकेत नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे नए ग्रेडिंग ढांचे के अनुसार स्कूलों, शिक्षकों और परीक्षा-निर्माण संस्कृति के पुनर्समायोजन के शुरुआती संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

कोरियाई समाचार एजेंसी योनहाप के हवाले से सामने आई यह तस्वीर सियोल स्थित निजी शिक्षा विश्लेषण संस्था जोंग्रो अकादमी की पड़ताल पर आधारित है। इस संस्था ने कोरिया के सार्वजनिक स्कूल सूचना पोर्टल पर उपलब्ध 1,695 सामान्य हाई स्कूलों के 2025 शैक्षणिक वर्ष के कक्षा 10 यानी हाई स्कूल प्रथम वर्ष, दूसरे सेमेस्टर के शैक्षिक उपलब्धि आंकड़ों का अध्ययन किया। यही वह बिंदु है जहां यह शिक्षा समाचार नीति, समाजशास्त्र और मनोविज्ञान—तीनों का विषय बन जाता है।

भारतीय पाठकों के लिए इसे समझना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत और दक्षिण कोरिया, दोनों समाजों में शिक्षा सामाजिक गतिशीलता का प्रमुख माध्यम मानी जाती है। यहां भी हम बोर्ड के प्रतिशत, कटऑफ, रैंक, कोचिंग, मेरिट और अवसर के बीच संबंधों पर लगातार बहस करते रहे हैं। इसलिए कोरिया की यह कहानी दूर देश का सूखा आंकड़ा नहीं, बल्कि हमारे लिए भी एक आईना है—कि जब मूल्यांकन की भाषा बदलती है, तो क्या बदलता है: बच्चों का आत्मविश्वास, अभिभावकों की चिंता, स्कूलों का व्यवहार, या प्रतिस्पर्धा की प्रकृति?

9-ग्रेड से 5-ग्रेड: आखिर बदला क्या है?

कोरिया की ‘नैसिन’ प्रणाली को समझना यहां जरूरी है। ‘नैसिन’ से आशय मोटे तौर पर स्कूल के भीतर होने वाले सतत या आंतरिक शैक्षणिक मूल्यांकन से है, जो छात्र के पूरे स्कूल प्रदर्शन को दर्शाता है और आगे की शैक्षिक संभावनाओं, खासकर उच्च शिक्षा प्रवेश प्रक्रिया, में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसे भारत के संदर्भ में पूरी तरह किसी एक व्यवस्था से नहीं जोड़ा जा सकता, लेकिन इसे आप स्कूल-आधारित अंकों, इंटरनल असेसमेंट, टर्म-एंड परीक्षा और व्यापक शैक्षणिक रिकॉर्ड के मिश्रण की तरह समझ सकते हैं।

पहले कोरिया में छात्रों को 9 स्तरों में विभाजित किया जाता था। इसका अर्थ यह है कि उपलब्धि या प्रदर्शन का वर्गीकरण अपेक्षाकृत अधिक बारीकी से होता था। अब इसे घटाकर 5 स्तरों में कर दिया गया है। यानी छात्रों के प्रदर्शन को अलग-अलग खाने में रखने का ढांचा कम विस्तृत हो गया है। जब श्रेणियां कम होती हैं, तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि क्या परीक्षा का मकसद अब सूक्ष्म अंतर पकड़ना रहेगा, या फिर किसी न्यूनतम और मध्यवर्ती उपलब्धि-स्तर को पहचानना ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाएगा।

यहीं से परीक्षा की कठिनाई और औसत अंक का रिश्ता बनता है। यदि किसी व्यवस्था में बहुत सूक्ष्म अंतर दर्ज करने हों, तो प्रश्नपत्र प्रायः अधिक विभेदकारी बनाए जाते हैं—यानी उनमें ऐसे प्रश्न शामिल होते हैं जो शीर्ष, मध्य और निचले स्तर के छात्रों के बीच साफ फर्क कर सकें। लेकिन यदि श्रेणियां कम हैं, तो स्कूलों पर यह दबाव कम हो सकता है कि वे हर छोटे अंतर को पकड़ने वाली जटिल परीक्षा बनाएं। ऐसी स्थिति में प्रश्नपत्र अपेक्षाकृत सरल, संतुलित या व्यापक सीखने की जांच करने वाले हो सकते हैं।

यहां ‘सरल’ शब्द को भी सावधानी से समझना होगा। इसका अर्थ यह नहीं कि शिक्षा की गुणवत्ता गिरा दी गई या मानक छोड़ दिए गए। कई बार ‘सरल’ का मतलब यह भी होता है कि परीक्षा का जोर पेचीदा जाल बिछाने से हटकर बुनियादी समझ, मुख्य अवधारणाओं और सामान्य दक्षता पर आ गया है। भारत में नई शिक्षा नीति, दक्षता-आधारित प्रश्न, बोर्ड परीक्षाओं में अनुप्रयोग-आधारित सवालों की चर्चा, और रट्टा बनाम समझ के विवाद के बीच हम भी इसी तरह के प्रश्नों से जूझते रहे हैं।

इसलिए कोरिया की 5-स्तरीय व्यवस्था को केवल ‘ग्रेड घटा दिए गए’ के रूप में नहीं, बल्कि ‘मूल्यांकन दर्शन’ में संभावित बदलाव के रूप में देखना चाहिए। और यही कारण है कि 70.4 और 3.5 जैसे आंकड़े इतनी चर्चा में हैं।

औसत 70.4 और बढ़त 3.5 अंक: ये संख्या क्या कहती है?

सांख्यिकीय दृष्टि से 70.4 अंक कोई सनसनीखेज संख्या नहीं लग सकती। बहुत से भारतीय अभिभावक कहेंगे कि 70 प्रतिशत तो ठीक-ठाक है, न बहुत कम, न बहुत अधिक। लेकिन समाचार का महत्व निरपेक्ष संख्या में नहीं, तुलना में है। पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले 3.5 अंक की वृद्धि तब अधिक मायने रखती है, जब यह बदलाव 1,695 स्कूलों के बड़े आधार पर दिखाई दे रहा हो। इसका अर्थ यह है कि यह सिर्फ किसी एक शहर, एक स्कूल-चेन या कुछ चुनिंदा संस्थानों का रुझान नहीं, बल्कि व्यापक स्तर पर उभरती प्रवृत्ति हो सकती है।

शिक्षा विश्लेषण में औसत अंकों की बढ़त कई अर्थ रख सकती है। पहला, छात्रों को पहले की तुलना में बेहतर स्कोर मिल रहा है। दूसरा, प्रश्नपत्रों की कठिनाई अपेक्षाकृत कम हुई है। तीसरा, मूल्यांकन पद्धति में नरमी या पुनर्संतुलन आया है। चौथा, स्कूल नए ढांचे के अनुकूल अपनी परीक्षा रणनीतियां बदल रहे हैं। इन सबमें कौन-सा कारण कितना प्रभावी है, यह एक ही रिपोर्ट से अंतिम रूप से तय नहीं किया जा सकता, लेकिन फिलहाल उपलब्ध संकेत यही बताते हैं कि प्रणालीगत बदलाव के बाद परीक्षा-निर्माण में सहजता आई है।

यदि हम भारतीय संदर्भ लें, तो यह कुछ-कुछ वैसा है जैसे किसी बोर्ड या विश्वविद्यालय में ग्रेडिंग पैटर्न बदलने के बाद पहले दो-तीन वर्षों तक परिणामों में कुछ अलग तरह का व्यवहार दिखाई दे। कभी आंतरिक मूल्यांकन का वज़न बढ़ने से औसत अंक सुधर जाते हैं, कभी मॉडरेशन से कटऑफ बदलते हैं, तो कभी प्रश्नपत्र के पैटर्न बदलने से छात्रों के प्रदर्शन में अचानक अंतर दिखता है। ऐसे समय में सिर्फ ‘बच्चे ज्यादा होशियार हो गए’ या ‘मानक गिर गए’ जैसे दो छोरों पर कूदना अक्सर जल्दबाजी होती है।

कोरिया के मामले में भी यही सावधानी जरूरी है। 3.5 अंक की वृद्धि राहत का संकेत जरूर दे सकती है, लेकिन यह साथ ही एक दूसरा प्रश्न भी पैदा करती है—यदि अधिक छात्रों के अंक ऊपर जा रहे हैं, तो क्या ऊपरी स्तर पर फर्क करना कठिन होगा? क्या इससे आगे चलकर कॉलेज प्रवेश, छात्रवृत्ति या मेरिट-आधारित चयन के अन्य पैमानों पर दबाव बढ़ेगा? भारत में भी जब बोर्ड अंकों का संकेंद्रण ऊपर होता है, तो कॉलेजों को चयन के लिए अतिरिक्त कसौटियां तलाशनी पड़ती हैं। कोरिया में भी ऐसी बहस तेज हो सकती है।

स्कूलों और शिक्षकों का समायोजन: व्यवस्था बदलते ही सबसे पहले क्या बदलता है?

किसी भी शिक्षा सुधार का पहला असर कक्षा-कक्ष में नहीं, बल्कि प्रश्नपत्र और मूल्यांकन में दिखाई देता है। कारण साफ है: नीति बदलते ही शिक्षक और स्कूल प्रबंधन इस बात का व्यावहारिक जवाब खोजने लगते हैं कि अब प्रदर्शन को मापा कैसे जाए। कोरिया के मामले में भी यही होता दिख रहा है। जब 9-स्तरीय ग्रेडिंग की जगह 5-स्तरीय ढांचा आता है, तो स्कूलों के सामने यह चुनौती खड़ी होती है कि वे न तो परीक्षा को इतना कठोर रखें कि बड़ी संख्या में छात्र नीचे सिमट जाएं, और न इतना ढीला कि ग्रेड का अर्थ ही कम हो जाए।

यानी स्कूल एक नए ‘सुरक्षित संतुलन’ की तलाश में होते हैं। इस संतुलन में परीक्षा का कठिनाई स्तर, प्रश्नों का स्वरूप, अध्यापन की प्राथमिकताएं और परिणामों की व्याख्या—सब धीरे-धीरे बदलते हैं। संभव है कि पहले जहां कुछ प्रश्न अत्यधिक विभेदकारी बनाए जाते रहे हों, अब उन्हें कम किया जा रहा हो। संभव है कि अवधारणा-आधारित, पाठ्यक्रम-केंद्रित और औसत छात्र के लिए सुलभ प्रश्नों का अनुपात बढ़ा हो। यह भी संभव है कि शिक्षकों ने नए ढांचे के शुरुआती चरण में अत्यधिक विवाद से बचने के लिए अपेक्षाकृत सरल प्रश्नपत्रों को चुना हो।

भारतीय स्कूलों में भी यह दृश्य अनजाना नहीं है। जब किसी राज्य बोर्ड में ब्लूप्रिंट बदलता है, जब सीबीएसई दक्षता-आधारित प्रश्नों की हिस्सेदारी बढ़ाता है, या जब मूल्यांकन को ‘स्टूडेंट-फ्रेंडली’ बनाने की बात होती है, तो शिक्षक समुदाय पहले कुछ समय तक उसी तरह प्रयोग और समायोजन करता है। कोरिया की शिक्षा व्यवस्था अपनी अनुशासनप्रियता और कठोर प्रतिस्पर्धा के लिए जानी जाती है, इसलिए वहां इस तरह का समायोजन और भी अधिक व्यवस्थित तरीके से सामने आता है।

यहां एक और दिलचस्प पहलू है। कोरिया में शिक्षा केवल स्कूल की चारदीवारी तक सीमित नहीं है; वहां निजी ट्यूशन और ‘हाग्वोन’ संस्कृति भी बेहद मजबूत है। ‘हाग्वोन’ को भारतीय पाठक कोचिंग संस्थानों के रूप में समझ सकते हैं—यानी स्कूल के बाद अतिरिक्त अकादमिक प्रशिक्षण देने वाले निजी केंद्र। यदि स्कूल परीक्षाएं अपेक्षाकृत आसान होती हैं, तो भी बाहरी प्रतिस्पर्धा समाप्त नहीं होती। बल्कि कई बार प्रतिस्पर्धा का केंद्र बदल जाता है: स्कूल ग्रेड में राहत मिलती है, लेकिन शीर्ष संस्थानों के लिए दूसरे स्तर पर होड़ जारी रहती है।

यानी स्कूल स्तर पर अंक बढ़ना हमेशा तनाव कम होने के बराबर नहीं होता। यह केवल तनाव के रूपांतरित होने का संकेत भी हो सकता है। भारत में ठीक यही बात हमें बोर्ड परीक्षा बनाम प्रवेश परीक्षा की बहस में दिखती है—एक तरफ स्कूल परिणाम बेहतर होते हैं, दूसरी तरफ जेईई, नीट, सीयूईटी या अन्य प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं का दबाव अलग दुनिया बनाकर खड़ा रहता है।

छात्रों और अभिभावकों पर असर: राहत, भ्रम या नई तरह की दौड़?

किसी भी शिक्षा समाचार का अंतिम अर्थ वहीं जाकर तय होता है जहां उसका असर सबसे सीधे पड़ता है—छात्र और परिवार। कोरिया में हाई स्कूल के पहले वर्ष के दूसरे सेमेस्टर में औसत अंक बढ़ना छात्रों के लिए मनोवैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है। यह वह समय होता है जब किशोर छात्र नए स्कूल वातावरण, विषयों की गति, सहपाठियों की प्रतिस्पर्धा और भविष्य की अनिश्चितताओं के बीच अपनी जगह पहचानने की कोशिश कर रहे होते हैं। यदि इस दौर में अंकों का समग्र परिदृश्य थोड़ा नरम दिखता है, तो शुरुआती झटका कम हो सकता है।

लेकिन कहानी का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जब औसत ऊपर जाता है, तो छोटे-छोटे अंतर अधिक निर्णायक बन सकते हैं। 68 और 72 के बीच का फर्क उस स्थिति से अलग अर्थ रखता है, जब पूरी कक्षा 50 से 60 के दायरे में हो। उच्च औसत का मतलब यह भी हो सकता है कि छात्र, अभिभावक और स्कूल अधिक सूक्ष्म अंक-अंतर पर ध्यान देने लगें। ऐसे में तनाव गायब नहीं होता, बस उसका चेहरा बदल जाता है।

भारतीय मध्यवर्गीय परिवार इस मनोविज्ञान को भली-भांति समझते हैं। जब परिणाम अपेक्षाकृत अच्छे आते हैं, तो खुशी के साथ एक नया सवाल खड़ा हो जाता है—अब असली बढ़त किसमें है? किसके 95 हैं, किसके 97? किसके इंटरनल मजबूत हैं? किसका प्रोफाइल बेहतर है? कोरिया में भी इसी प्रकार, यदि ग्रेडिंग श्रेणियां कम हो जाएं और परीक्षा अपेक्षाकृत सुलभ हो, तो शीर्ष स्तर पर फर्क करने के लिए अन्य तत्व ज्यादा महत्वपूर्ण बन सकते हैं।

अभिभावकों के लिए यह बदलाव केवल रिपोर्ट कार्ड का डिज़ाइन बदलना नहीं है; यह उनके बच्चे के भविष्य को पढ़ने की भाषा बदलने जैसा है। पहले जहां अधिक स्तर होने से बच्चे की स्थिति का सूक्ष्म अनुमान लगाया जा सकता था, अब व्यापक श्रेणियों के भीतर तुलना के नए तरीके खोजे जाएंगे। इससे कुछ परिवारों को राहत मिल सकती है कि अत्यधिक ‘रैंकिंग’ का दबाव कम हुआ, लेकिन कुछ को यह चिंता भी हो सकती है कि अब वास्तविक प्रतिस्पर्धा धुंधली होकर किसी दूसरे रूप में सामने आएगी।

कोरिया जैसे समाज में, जहां शिक्षा सामाजिक प्रतिष्ठा, पेशेवर अवसर और पारिवारिक आकांक्षा से गहरे जुड़ी है, ऐसी नीति-परिवर्तन की सामाजिक प्रतिध्वनि लाजिमी है। भारत में भी हम देखते हैं कि अंक सिर्फ अंक नहीं होते—वे परिवार की उम्मीद, पड़ोस की तुलना, रिश्तेदारों की चर्चा और भविष्य के रास्तों का प्रतीक बन जाते हैं। इसलिए कोरिया में 3.5 अंक की वृद्धि एक सांख्यिकीय बदलाव से अधिक, एक भावनात्मक और सामाजिक घटना भी है।

क्या आसान परीक्षा का मतलब बेहतर शिक्षा है?

यहीं पर सबसे जरूरी सावधानी बरतनी होगी। औसत अंक बढ़ जाना अपने आप में शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ने का प्रमाण नहीं है। यह उतना ही संभव है कि प्रणाली ने छात्रों के सीखने को बेहतर तरीके से परखा हो, जितना यह कि उसने कठिनाई का स्तर कम कर दिया हो। इन दोनों संभावनाओं के बीच फर्क करना बेहद महत्वपूर्ण है। यदि आसान प्रश्नपत्र केवल इसलिए बनाए गए कि नई ग्रेडिंग प्रणाली में समायोजन सहज हो, तो यह प्रारंभिक चरण का स्वाभाविक परिणाम हो सकता है। लेकिन यदि लंबे समय तक मूल्यांकन इस तरह रहता है कि वह गहरी समझ के बजाय केवल आरामदायक स्कोरिंग को बढ़ावा दे, तो फिर शैक्षणिक मानकों को लेकर बहस तेज होगी।

भारत में भी यह बहस समय-समय पर उठती रही है। ‘क्या बोर्ड आसान हो गया?’, ‘क्या बच्चों पर दबाव घटाना चाहिए?’, ‘क्या कठिन प्रश्न ही गुणवत्ता की पहचान हैं?’—ये प्रश्न शिक्षा विमर्श में लगातार लौटते हैं। विशेषज्ञ अक्सर कहते हैं कि कठिनाई और गुणवत्ता एक ही चीज नहीं हैं। एक उत्कृष्ट परीक्षा वह है जो न्यायपूर्ण हो, पाठ्यक्रम-संगत हो, अवधारणात्मक समझ को परखे, और विभिन्न क्षमता-स्तरों के छात्रों में अंतर भी कर सके। इसलिए आसान या कठिन की बहस से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि परीक्षा किस प्रकार का सीखना प्रोत्साहित करती है।

कोरिया के मौजूदा आंकड़े हमें केवल इतना बताते हैं कि नई 5-स्तरीय व्यवस्था लागू होने के बाद शुरुआती चरण में औसत अंक ऊपर गए और समग्र रूप से परीक्षा अपेक्षाकृत आसान हुई। यह अभी नहीं बताता कि छात्रों की वास्तविक समझ कितनी बदली, कक्षा-कक्ष में सीखने की गुणवत्ता कैसी रही, या दीर्घकाल में इस सुधार का प्रभाव क्या होगा। नीति विश्लेषण में इसे ‘अर्ली सिग्नल’ कहा जा सकता है—शुरुआती संकेत, अंतिम निर्णय नहीं।

इसके बावजूद यह संकेत बहुत महत्व रखता है, क्योंकि शिक्षा प्रणालियां अपने शुरुआती व्यवहार से ही भविष्य की दिशा बताती हैं। यदि स्कूलों ने नए ढांचे के साथ तालमेल बैठाने के लिए कठिनाई घटाई है, तो आगे यह देखा जाएगा कि वे किस बिंदु पर जाकर स्थिर होते हैं। क्या बाद के वर्षों में कठिनाई फिर संतुलित होगी? क्या मूल्यांकन की नई संस्कृति विकसित होगी? या क्या इससे प्रवेश और चयन की अगली सीढ़ियों पर अतिरिक्त दबाव पैदा होगा? ये सवाल अब कोरियाई शिक्षा व्यवस्था के सामने खड़े हैं।

भारत के लिए क्या सबक हैं?

दक्षिण कोरिया की यह खबर भारतीय नीति-निर्माताओं, शिक्षकों और अभिभावकों के लिए भी गंभीर महत्व रखती है। पहला सबक यह है कि मूल्यांकन की संरचना बदलते ही व्यवहार बदलता है। कागज पर लिखी गई नीति अपने आप कक्षा की वास्तविकता नहीं बन जाती; उसे स्कूल, शिक्षक, छात्र और परिवार अपने-अपने तरीके से अपनाते हैं। इसलिए किसी भी सुधार की सफलता केवल उसके उद्देश्य में नहीं, उसके क्रियान्वयन की बारीकियों में छिपी होती है।

दूसरा, ग्रेडिंग को सरल बनाने का मतलब प्रतिस्पर्धा को खत्म करना नहीं है। भारत में भी अक्सर यह उम्मीद की जाती है कि यदि परीक्षाओं को कम तनावपूर्ण बनाया जाए या ग्रेडिंग को व्यापक किया जाए, तो बच्चों पर दबाव घटेगा। आंशिक रूप से यह सच हो सकता है, लेकिन प्रतिस्पर्धा प्रायः अपना रास्ता बदल लेती है। जहां अंक का सूक्ष्म अंतर कम निर्णायक होता है, वहां प्रोफाइल, प्रवेश परीक्षा, इंटरव्यू, सह-पाठ्यक्रम या अन्य सूचक अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

तीसरा, शिक्षा पर चर्चा में आंकड़ों को भावनाओं से अलग करके पढ़ना जरूरी है। 70.4 और 3.5 जैसे आंकड़े न तो अपने आप जश्न मनाने का आधार हैं, न घबराने का। वे एक प्रक्रिया की झलक हैं। भारत में भी जब बोर्ड परिणामों, पास प्रतिशत या औसत अंकों पर प्रतिक्रिया दी जाती है, तो अक्सर यही भूल होती है कि अंक प्रणाली के भीतर हुए बदलावों को समझे बिना निष्कर्ष निकाल लिए जाते हैं।

चौथा, शिक्षा केवल अकादमिक नहीं, सामाजिक न्याय का भी प्रश्न है। यदि मूल्यांकन की नई व्यवस्था छात्रों के लिए अधिक मानवीय, कम दंडात्मक और सीखने के प्रति प्रोत्साहित करने वाली साबित होती है, तो उसे सकारात्मक नजर से देखा जाएगा। लेकिन यदि उससे केवल अंक बढ़ें और असली प्रतिस्पर्धा कहीं और और अधिक महंगी व असमान हो जाए, तो फिर सुधार का लाभ सीमित रह जाएगा। भारत और कोरिया दोनों ही देशों में यह चुनौती समान रूप से मौजूद है।

अंततः कोरिया की यह कहानी हमें याद दिलाती है कि शिक्षा व्यवस्था में छोटे दिखने वाले प्रशासनिक बदलाव भी बड़े सामाजिक असर पैदा कर सकते हैं। ग्रेडिंग के 9 खाने से 5 खाने होना एक तकनीकी बदलाव लग सकता है, लेकिन उसके पीछे बच्चों की मेहनत, अभिभावकों की बेचैनी, शिक्षकों की रणनीति और समाज की सफलता की परिभाषा—all जुड़ी होती है। यही वजह है कि इस बदलाव को केवल ‘परीक्षा आसान हुई’ की हेडलाइन तक सीमित करके नहीं पढ़ा जाना चाहिए। यह शिक्षा की उस राजनीति और संस्कृति का हिस्सा है, जिसमें हम सब—चाहे भारत में हों या कोरिया में—किसी न किसी रूप में शामिल हैं।

निष्कर्ष: अंक बढ़े हैं, पर असली परीक्षा अभी बाकी है

दक्षिण कोरिया के स्कूलों में 5-स्तरीय ग्रेडिंग लागू होने के बाद औसत अंक बढ़ने की खबर निश्चय ही महत्वपूर्ण है। यह संकेत देती है कि नई व्यवस्था के शुरुआती दौर में स्कूलों ने परीक्षा को अपेक्षाकृत सरल बनाया है और मूल्यांकन का स्वर थोड़ा नरम पड़ा है। 1,695 स्कूलों के बड़े डेटा-आधार पर दर्ज 70.4 का औसत और 3.5 अंक की वृद्धि इस प्रवृत्ति को महज अपवाद नहीं रहने देती।

लेकिन इस बदलाव का अंतिम अर्थ अभी तय नहीं हुआ है। आने वाले वर्षों में यह देखना होगा कि क्या यह केवल संक्रमणकालीन समायोजन है, या कोरियाई शिक्षा व्यवस्था वास्तव में एक नई मूल्यांकन संस्कृति की ओर बढ़ रही है। यह भी देखना होगा कि इससे छात्रों के मानसिक दबाव में वास्तविक कमी आती है या प्रतिस्पर्धा किसी दूसरी परत में और तीखी हो जाती है।

भारतीय पाठकों के लिए इस खबर की प्रासंगिकता साफ है। हम भी ऐसे दौर में हैं जहां परीक्षा, ग्रेड, कौशल, प्रतिस्पर्धा और मानसिक स्वास्थ्य पर नई बहसें चल रही हैं। कोरिया का अनुभव हमें यह समझने में मदद करता है कि शिक्षा सुधारों की सफलता केवल नीति की घोषणा में नहीं, बल्कि इस बात में है कि स्कूल उसे कैसे जीते हैं और छात्र उसे कैसे महसूस करते हैं। फिलहाल इतना कहा जा सकता है कि कोरिया में रिपोर्ट कार्ड की भाषा बदल चुकी है; अब देखना यह है कि क्या उससे सीखने की कहानी भी बदलती है।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ