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दक्षिण कोरिया के यांगजू की नई पहल: बच्चों के इलाज तक पहुंच में सबसे बड़ी बाधा ‘अस्पताल का किराया’ भी अब नीति का हिस्सा

दक्षिण कोरिया के यांगजू की नई पहल: बच्चों के इलाज तक पहुंच में सबसे बड़ी बाधा ‘अस्पताल का किराया’ भी अब नीति का हिस्सा

खबर सिर्फ स्वास्थ्य की नहीं, पहुंच की भी है

दक्षिण कोरिया के ग्योंगगी प्रांत के यांगजू शहर ने एक ऐसी पहल शुरू करने का फैसला किया है, जिसे पहली नजर में मामूली प्रशासनिक घोषणा समझा जा सकता है, लेकिन सामाजिक नीति के नजरिये से देखें तो यह बेहद महत्वपूर्ण कदम है। शहर के स्वास्थ्य विभाग ने तय किया है कि अगले महीने से गांवनुमा प्रशासनिक इलाकों—यानी कोरियाई व्यवस्था के अनुसार ‘युप’ और ‘म्योन’—में रहने वाले 13 वर्ष या उससे कम उम्र के बच्चों को बाल एवं किशोर रोग विशेषज्ञ के पास ले जाने पर आने-जाने का परिवहन खर्च दिया जाएगा। यह सहायता खास तौर पर उन परिस्थितियों के लिए है, जब इलाज की जरूरत रात में, सप्ताहांत पर या सार्वजनिक अवकाश के दिन पड़ती है।

भारत में यदि किसी छोटे कस्बे, पंचायत क्षेत्र या दूर बसे गांव के माता-पिता से पूछा जाए कि बच्चे को डॉक्टर तक पहुंचाने में सबसे बड़ी दिक्कत क्या होती है, तो जवाब अक्सर सिर्फ डॉक्टर की फीस नहीं होगा। कई बार समस्या यह होती है कि डॉक्टर दूर है, बस नहीं मिलती, रात हो चुकी है, बच्चा बुखार में तप रहा है, और निजी वाहन का खर्च जेब पर भारी पड़ता है। यांगजू की यह नई नीति इसी बुनियादी सच्चाई को स्वीकार करती है कि स्वास्थ्य सेवा का मतलब केवल अस्पताल की इमारत या डॉक्टर की उपलब्धता नहीं, बल्कि वहां तक पहुंच पाने की क्षमता भी है।

यही कारण है कि इस खबर को केवल स्थानीय प्रशासन की एक छोटी योजना मानकर नहीं टाला जाना चाहिए। यह उस सोच का उदाहरण है जिसमें सरकार यह समझती है कि असमानता सिर्फ आय में नहीं, अवसर और पहुंच में भी होती है। अगर दो बच्चों को एक जैसी बीमारी है, लेकिन एक शहर के बीचोंबीच रहता है और दूसरा बाहरी इलाके में, तो चिकित्सा तक पहुंच दोनों के लिए बराबर नहीं होती। यही अंतर आगे चलकर स्वास्थ्य परिणामों में भी दिखता है।

कोरिया जैसे देश में, जहां स्थानीय प्रशासनिक इकाइयां नागरिक सेवाओं के स्तर पर काफी सक्रिय भूमिका निभाती हैं, इस तरह की योजनाएं उस व्यापक बहस का हिस्सा हैं जिसमें जीवन-यापन की वास्तविक लागत को समझने की कोशिश की जाती है। अस्पताल तक पहुंचने का किराया, खासकर रात और छुट्टियों में, किसी परिवार के लिए वही मायने रख सकता है जो भारत में एंबुलेंस न मिलने पर निजी गाड़ी का इंतजाम करना या शहर के बड़े अस्पताल तक पहुंचने के लिए उधार लेना।

यांगजू की पहल का महत्व इसी बात में है कि उसने इलाज शुरू होने से पहले आने वाली बाधा को नीति का विषय बनाया है। सार्वजनिक नीति में अक्सर ध्यान इलाज के बाद वाले बिल पर जाता है, लेकिन यहां सवाल यह है कि क्या बच्चा समय पर डॉक्टर के पास पहुंच भी पाएगा या नहीं। यह फर्क छोटा नहीं है; कई बार यहीं से बीमारी की गंभीरता तय होती है।

यांगजू की योजना क्या है और कैसे काम करेगी

यांगजू स्वास्थ्य विभाग के अनुसार यह सहायता अगले महीने की पहली तारीख से लागू होगी और उन चिकित्सा यात्राओं पर मिलेगी जो बाल एवं किशोर रोग विशेषज्ञ के पास परामर्श या इलाज के लिए की जाएंगी। योजना का दायरा स्पष्ट है: पात्रता उन्हीं बच्चों को मिलेगी जो यांगजू के ‘युप’ और ‘म्योन’ क्षेत्रों में पंजीकृत पते के साथ रहते हों और जिनकी उम्र 13 वर्ष या उससे कम हो। कोरिया में ‘युप’ और ‘म्योन’ broadly ऐसे उप-क्षेत्र हैं जिन्हें हम भारतीय संदर्भ में अर्ध-ग्रामीण या बाहरी प्रशासनिक इलाकों के रूप में समझ सकते हैं।

सहायता का समय भी सोचा-समझा है। यह सप्ताह के सामान्य दिन पर शाम 7 बजे से लेकर अगली सुबह 8 बजे तक लागू होगी। इसके साथ ही शनिवार और सार्वजनिक अवकाश के दिन अस्पताल जाने पर भी यह सुविधा उपलब्ध रहेगी। मतलब साफ है—योजना उस समय के लिए बनाई गई है जब परिवारों को सबसे ज्यादा दिक्कत होती है। दिन में कुछ हद तक सार्वजनिक परिवहन, पड़ोस की मदद या नियमित कार्यक्रम के अनुसार अस्पताल जाना संभव हो सकता है, लेकिन रात में अचानक बच्चे की तबीयत बिगड़ जाए तो निर्णय कठिन हो जाता है।

इस योजना के तहत टैक्सी या निजी एंबुलेंस जैसी सेवाओं से अस्पताल आने-जाने पर वास्तविक खर्च की प्रतिपूर्ति की जाएगी। यानी यह कोई एकमुश्त तय राशि नहीं है, बल्कि जितना वास्तविक खर्च हुआ, उसका प्रमाण देकर उतनी रकम वापस लेने की व्यवस्था है। प्रशासनिक नजरिये से यह थोड़ा अधिक कागजी काम मांग सकता है, लेकिन नीति की दृष्टि से यह अधिक सटीक है, क्योंकि इसका मकसद खर्च का यथार्थवादी बोझ कम करना है, न कि प्रतीकात्मक सहायता देना।

आवेदन प्रक्रिया भी समयबद्ध रखी गई है। परामर्श या इलाज की तारीख से तीन महीने के भीतर आवेदन किया जा सकेगा। परिवारों को आवेदन पत्र, इलाज की रसीद, परिवहन खर्च के प्रमाण, निवासी पंजीकरण की प्रति और बैंक खाते की जानकारी जमा करनी होगी। ये दस्तावेज संबंधित स्थानीय प्रशासनिक कल्याण केंद्र या यांगजू स्वास्थ्य विभाग की दवा-प्रशासन इकाई में जमा किए जा सकते हैं।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि योजना के नियम अपेक्षाकृत स्पष्ट हैं—कौन पात्र है, किस समय सहायता मिलेगी, किन खर्चों पर मिलेगी और किन कागजों की जरूरत होगी। अक्सर किसी भी कल्याणकारी योजना की सफलता उसके इरादे से उतनी तय नहीं होती, जितनी उसके इस्तेमाल की सुगमता से होती है। यांगजू ने कम से कम प्रारंभिक ढांचे में इस बात का ध्यान रखा है कि नागरिकों को पता हो कि सुविधा किसके लिए है और कैसे लेनी है।

‘परिवहन खर्च’ आखिर सामाजिक मुद्दा क्यों है

सवाल उठ सकता है कि क्या यह वास्तव में इतनी बड़ी खबर है? आखिर परिवहन खर्च की प्रतिपूर्ति कोई बहुत विशाल आर्थिक पैकेज तो नहीं। लेकिन सामाजिक न्याय और सार्वजनिक सेवा की बहस में यही वह बिंदु है जहां छोटी राशि भी बड़ा असर डाल सकती है। स्वास्थ्य सेवा में असमानता सिर्फ अस्पतालों की संख्या से नहीं बनती; वह दूरी, समय, आय, देखभाल की उपलब्धता और पारिवारिक परिस्थितियों से मिलकर बनती है।

13 वर्ष से कम उम्र के बच्चे अपने फैसले खुद नहीं ले सकते। वे यह तय नहीं कर सकते कि कब डॉक्टर के पास जाना है, वहां कैसे पहुंचना है और कौन साथ जाएगा। यह पूरा बोझ अभिभावकों पर होता है। अगर माता-पिता नौकरी से देर से लौटते हैं, घर में दूसरा बच्चा भी है, निजी वाहन नहीं है, और अस्पताल दूर है, तो सामान्य बुखार या सांस की तकलीफ जैसी समस्या भी गंभीर चिंता का विषय बन जाती है। कई बार परिवार सोचता है—सुबह तक देखते हैं, शायद ठीक हो जाए। लेकिन यही देरी कुछ मामलों में चिकित्सा जोखिम को बढ़ा सकती है।

भारत में भी हम यह स्थिति खूब देखते हैं। महानगरों में रहने वालों के लिए 24x7 बाल रोग विशेषज्ञ, ऐप-आधारित कैब और मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल सहज उपलब्ध हो सकते हैं, लेकिन जिला मुख्यालय से दूर गांवों में रात के समय बच्चे को डॉक्टर तक पहुंचाना आज भी चुनौती है। कई राज्यों में ‘108’ जैसी आपातकालीन सेवाएं हैं, फिर भी हर स्थिति एंबुलेंस श्रेणी में नहीं आती। बुखार, उल्टी, एलर्जी, सांस की तकलीफ, कान दर्द या तेज खांसी जैसी समस्याओं में परिवार अक्सर निजी साधनों पर निर्भर हो जाता है।

यांगजू की नीति इस बात को पहचानती है कि स्वास्थ्य असमानता का एक रूप वह भी है, जब इलाज technically उपलब्ध हो, लेकिन वहां तक पहुंचने की लागत किसी परिवार को पीछे धकेल दे। इसलिए यह योजना आर्थिक सहायता जितनी है, उतनी ही ‘देखभाल के अधिकार’ को व्यावहारिक बनाने की कोशिश भी है।

सामाजिक नीति की भाषा में कहें तो यह ‘यूनिवर्सल’ नहीं, बल्कि ‘टार्गेटेड सपोर्ट’ का उदाहरण है—यानी सबको समान राशि नहीं, बल्कि उन परिवारों को मदद जिनके सामने पहुंच की बाधा ज्यादा है। भारत में भी छात्राओं के लिए साइकिल योजना, गर्भवती महिलाओं के लिए जननी परिवहन, या कुछ राज्यों में दूर-दराज के मरीजों के लिए यात्रा सहायता इसी सिद्धांत पर आधारित रही है कि बराबरी का अर्थ हर किसी को एक जैसी चीज देना नहीं, बल्कि जिनकी जरूरत अधिक है, उनकी बाधा कम करना है।

रात, छुट्टी और बच्चों की बीमारी: नीति ने वास्तविक जीवन का समय पहचाना

इस योजना का सबसे व्यावहारिक और शायद सबसे प्रभावशाली पहलू इसका समय-निर्धारण है। सप्ताह के दिनों में शाम 7 बजे से अगली सुबह 8 बजे तक की अवधि को शामिल करना केवल प्रशासनिक सुविधा नहीं, बल्कि पारिवारिक जीवन की वास्तविक लय को पहचानना है। यही वह समय है जब स्कूल बंद हो चुका होता है, दफ्तर से लोग लौट रहे होते हैं, बच्चे दिनभर की थकान या संक्रमण के बाद अचानक बीमार महसूस कर सकते हैं, और अभिभावकों के सामने तत्काल निर्णय का दबाव होता है।

कोरियाई समाज, ठीक वैसे ही जैसे भारत का शहरी और अर्ध-शहरी समाज, लंबे कामकाजी घंटों और प्रतिस्पर्धी जीवनशैली से प्रभावित है। ऐसे में बच्चों की रात की बीमारी सिर्फ चिकित्सकीय मामला नहीं रहती; वह समय प्रबंधन, परिवहन, आय और देखभाल के नेटवर्क की परीक्षा भी बन जाती है। सप्ताहांत और सार्वजनिक अवकाश पर कठिनाई और बढ़ जाती है, क्योंकि नियमित क्लीनिकों का समय सीमित हो सकता है और खुले अस्पताल तक पहुंचने की दूरी बढ़ सकती है।

यही वजह है कि यांगजू की योजना का फोकस ‘रात और छुट्टी’ पर होना इसे सामान्य सहायता से अलग बनाता है। यदि प्रशासन सिर्फ दिन के समय होने वाली यात्रा पर भी यही सुविधा देता, तो उसका सामाजिक अर्थ कम गहरा होता। यहां लक्ष्य उन क्षणों को पहचानना है जब परिवार सबसे ज्यादा असहाय महसूस करता है।

भारतीय पाठकों के लिए इसे ऐसे समझा जा सकता है जैसे किसी राज्य सरकार ने यह कहा हो कि ग्रामीण इलाकों में रहने वाले छोटे बच्चों को रात 8 बजे के बाद जिला अस्पताल या अनुमोदित बाल चिकित्सक तक ले जाने पर टैक्सी खर्च सरकार वहन करेगी। यह सुनने में छोटी बात लग सकती है, लेकिन गांव या कस्बे के परिवार के लिए इसका मतलब होगा—अब बीमारी और अस्पताल के बीच जो सबसे पहला डर था, वह थोड़ा कम हुआ।

दक्षिण कोरिया में कम जन्मदर और वृद्ध होती आबादी को लेकर लंबे समय से चिंता है। ऐसे में बच्चों और परिवारों के लिए ‘लाइफ-फ्रेंडली’ नीतियों पर विशेष जोर दिया जाता रहा है। इस योजना को उसी व्यापक पृष्ठभूमि में भी देखा जाना चाहिए। जब सरकारें चाहती हैं कि परिवार बच्चों की परवरिश को कम बोझिल महसूस करें, तब स्कूल, डे-केयर और स्वास्थ्य सेवाओं के बीच छोटे-छोटे लेकिन निर्णायक सहारे बहुत मायने रखते हैं।

यह नीति आपातकालीन चिकित्सा प्रणाली का विकल्प नहीं है, बल्कि रोजमर्रा की अनिश्चितताओं में सहारा देने वाली व्यवस्था है। यही इसकी विशिष्टता है। यह केवल ‘क्राइसिस रिस्पॉन्स’ नहीं, बल्कि ‘हर रोज के तनाव’ को कम करने का उपकरण है।

भारतीय संदर्भ में इस पहल का क्या मतलब निकलता है

भारत में स्वास्थ्य पर चर्चा अक्सर बड़े ढांचे—सरकारी अस्पताल, बीमा योजना, डॉक्टरों की कमी, मेडिकल कॉलेज, दवा की कीमत—के इर्द-गिर्द घूमती है। ये मुद्दे महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनके बीच ‘अस्पताल तक पहुंचने की लागत’ का सवाल कई बार हाशिये पर चला जाता है। जबकि हकीकत यह है कि ग्रामीण और अर्ध-शहरी भारत में यह लागत अनेक परिवारों के लिए निर्णायक होती है। बस किराया, ऑटो का भाड़ा, निजी वाहन का इंतजाम, रात में उपलब्धता, रास्ते की दूरी, साथ जाने वाले सदस्य की मजदूरी का नुकसान—ये सब मिलकर इलाज को महंगा बनाते हैं।

कई भारतीय राज्यों ने मातृ स्वास्थ्य, संस्थागत प्रसव और आपातकालीन परिवहन के लिए उल्लेखनीय योजनाएं चलाई हैं। लेकिन बच्चों के नियमित या अर्ध-आपात बाल रोग परामर्श के लिए यात्रा लागत को केंद्र में रखने वाली सोच अभी भी सीमित है। यांगजू का उदाहरण इसीलिए दिलचस्प है कि उसने यह माना कि हर बीमारी एंबुलेंस-स्तर की इमरजेंसी नहीं होती, फिर भी समय पर डॉक्टर तक पहुंच जरूरी हो सकती है। नीति-निर्माताओं के लिए यही सूक्ष्म अंतर सीखने जैसा है।

यदि भारतीय राज्यों में जिला स्तर पर बाल स्वास्थ्य सेवाओं के मानचित्रण के साथ यह देखा जाए कि कौन से ब्लॉक या पंचायत क्षेत्र रात के समय बाल रोग विशेषज्ञों से सबसे दूर हैं, तो वहां लक्षित परिवहन सहायता या ‘रीइम्बर्समेंट मॉडल’ प्रभावी हो सकता है। खासकर उन परिवारों के लिए जिनके पास निजी वाहन नहीं हैं। यह मॉडल सार्वभौमिक नकद भुगतान से अधिक सटीक हो सकता है, क्योंकि यह वास्तविक उपयोग और वास्तविक आवश्यकता पर आधारित है।

यहां एक सांस्कृतिक समानता भी ध्यान देने योग्य है। भारत और कोरिया दोनों समाजों में बच्चों की सेहत को लेकर परिवार बेहद संवेदनशील रहते हैं। अक्सर एक साधारण बुखार भी पूरे घर की चिंता बन जाता है। दादा-दादी की सलाह, पड़ोसियों के अनुभव, इंटरनेट से मिली जानकारी और डॉक्टर तक पहुंच—ये सब साथ चलने लगते हैं। ऐसे में प्रशासन यदि एक बाधा कम कर दे, तो परिवार का निर्णय आसान हो जाता है।

हमारे यहां अक्सर कहा जाता है कि ‘इन्फ्रास्ट्रक्चर’ बनाना ही समाधान है। निश्चित रूप से अस्पताल और विशेषज्ञों की संख्या बढ़ना जरूरी है। लेकिन जब तक वह संभव न हो, तब तक क्या किया जाए? यांगजू का जवाब है—जहां अस्पताल नहीं पहुंच सकता, वहां कम से कम परिवार को अस्पताल तक पहुंचने में मदद दी जाए। यह ‘परफेक्ट’ समाधान नहीं, पर ‘तुरंत उपयोगी’ समाधान जरूर है।

भारत के नीति विमर्श में यह बात खासतौर पर उपयोगी हो सकती है कि कल्याणकारी योजनाएं हमेशा बहुत बड़ी राशि की नहीं होनी चाहिए; उन्हें सही समय, सही समूह और सही जरूरत पर केंद्रित होना चाहिए। कई बार सीमित बजट में भी अधिक प्रभाव पैदा किया जा सकता है, यदि समस्या की जड़ पहचानी जाए।

कागजी प्रक्रिया, स्थानीय प्रशासन और योजना की असली परीक्षा

हालांकि किसी भी योजना की घोषणा और उसके वास्तविक असर के बीच लंबा फासला होता है। यांगजू की इस पहल के साथ भी यही चुनौती रहेगी। आवेदन के लिए परिवारों को चिकित्सा रसीद, परिवहन खर्च का प्रमाण, निवासी पंजीकरण दस्तावेज और बैंक विवरण जमा करने होंगे। सिद्धांततः यह व्यवस्था पारदर्शिता के लिए उचित है, लेकिन व्यवहार में यही दस्तावेजी प्रक्रिया कुछ परिवारों के लिए बाधा बन सकती है—विशेषकर उन लोगों के लिए जो डिजिटल या प्रशासनिक प्रक्रियाओं में सहज नहीं हैं।

योजना का असर इस पर भी निर्भर करेगा कि स्थानीय प्रशासनिक कल्याण केंद्र कितनी सक्रियता से लोगों को जानकारी देते हैं। क्या अस्पतालों में सूचना पर्चे होंगे? क्या टैक्सी रसीद लेने के बारे में अभिभावकों को पहले से बताया जाएगा? क्या आवेदन प्रक्रिया सरल भाषा में समझाई जाएगी? क्या किसी दस्तावेज के अभाव में परिवार को मार्गदर्शन मिलेगा? सामाजिक नीति में ‘डिजाइन’ जितना महत्वपूर्ण है, ‘लास्ट माइल इम्प्लीमेंटेशन’ उससे कम नहीं।

इस योजना की एक सकारात्मक बात यह है कि आवेदन के लिए तीन महीने की समयसीमा रखी गई है। इसका मतलब है कि यदि किसी परिवार को उसी वक्त आवेदन करने का अवसर न मिले, तब भी बाद में कागजात जुटाकर दावा किया जा सकता है। यह लचीलापन महत्वपूर्ण है, क्योंकि बीमारी के क्षण में प्राथमिकता स्वाभाविक रूप से बच्चे की देखभाल होती है, न कि फॉर्म भरना।

कोरिया की स्थानीय सरकारें पिछले कुछ वर्षों में जीवन-यापन की लागत, आवास, परिवार सहायता और देखभाल जैसी जरूरतों के हिसाब से योजनाओं को अधिक सूक्ष्म बनाने की दिशा में आगे बढ़ी हैं। इसी दिन सामने आई अन्य स्थानीय खबरों में नवविवाहित दंपतियों के लिए किराये या ऋण ब्याज सहायता जैसी घोषणाएं भी थीं। इससे यह संकेत मिलता है कि स्थानीय प्रशासन अब नागरिक जीवन को ‘एक ही आकार सब पर फिट’ वाले मॉडल से नहीं, बल्कि अलग-अलग समूहों की वास्तविक कठिनाइयों को पहचानकर संबोधित करने की कोशिश कर रहा है।

यांगजू का कदम भी उसी प्रवृत्ति का हिस्सा है। यह बताता है कि स्थानीय शासन केवल सड़कों, सफाई या लाइसेंसिंग तक सीमित नहीं, बल्कि परिवार की रोजमर्रा की असुरक्षा को कम करने का माध्यम भी हो सकता है। यदि योजना का उपयोग अच्छा होता है, तो यह दूसरे शहरों और जिलों के लिए भी मॉडल बन सकती है।

छोटी नीति, बड़ा संकेत

दुनिया के कई देशों की तरह दक्षिण कोरिया भी क्षेत्रीय असमानता, कम जन्मदर, बढ़ती जीवन-यापन लागत और परिवारों पर बढ़ते दबाव जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे समय में यांगजू की यह पहल हमें याद दिलाती है कि कल्याणकारी राज्य केवल बड़े-बड़े सुधारों से नहीं बनता; कभी-कभी वह उस टैक्सी किराये से भी बनता है, जो किसी मां-बाप को रात के साढ़े दस बजे अपने बीमार बच्चे को डॉक्टर तक ले जाने का साहस दे।

नीति का मूल्य हमेशा उसके बजट आकार से नहीं मापा जाता। कई बार उसकी संवेदनशीलता, लक्ष्य की सटीकता और वास्तविक जीवन की समझ उसे महत्वपूर्ण बनाती है। यांगजू ने यह पहचाना है कि ‘इलाज’ सिर्फ अस्पताल के भीतर नहीं शुरू होता, बल्कि घर से निकलने के फैसले से शुरू होता है। यदि घर और अस्पताल के बीच की दूरी आर्थिक या व्यावहारिक वजहों से बड़ी हो जाए, तो स्वास्थ्य सेवा की समानता अधूरी रह जाती है।

भारतीय पाठकों के लिए यह खबर इसलिए भी अहम है क्योंकि यह हमें अपने यहां की स्वास्थ्य नीतियों को नए नजरिये से देखने का अवसर देती है। क्या हम केवल अस्पताल बना देने को पर्याप्त मान लेते हैं? क्या हम उन परिवारों की चिंता समझते हैं जिनके लिए रात में बच्चे को शहर ले जाना आर्थिक जोखिम है? क्या स्थानीय निकायों को ऐसी सूक्ष्म लेकिन असरदार योजनाओं के लिए अधिक अधिकार और संसाधन मिलने चाहिए? इन सवालों के जवाब आसान नहीं, लेकिन यांगजू की यह पहल बहस को आगे बढ़ाने के लिए एक ठोस उदाहरण जरूर देती है।

अंततः इस खबर का सार यही है: सार्वजनिक नीति तब सबसे मानवीय होती है, जब वह नागरिक के अनुभव को समझती है। एक बच्चे की बीमारी, एक मां की घबराहट, एक पिता की जेब, एक दूर का अस्पताल और रात का खाली रास्ता—इन सबके बीच यदि प्रशासन अपना हाथ रखता है, तो कल्याण सिर्फ कागज पर नहीं, जीवन में उतरता है। यांगजू ने कम से कम इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम रखा है। अब नजर इस पर रहेगी कि यह कदम व्यवहार में कितनी राहत देता है, और क्या दूसरे शहर भी इससे सीख लेते हैं।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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