
एक अहम शोध, जो कैंसर की समझ को नई दिशा देता है
दक्षिण कोरिया से आई एक नई वैज्ञानिक खबर ने महिलाओं के स्वास्थ्य, कैंसर चिकित्सा और माइक्रोबायोम यानी शरीर के भीतर रहने वाले सूक्ष्मजीवों पर चल रही वैश्विक बहस को नया आयाम दिया है। ग्वांगजू इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (GIST) और सियोल नेशनल यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल के संयुक्त शोध में यह बताया गया है कि गर्भाशय की भीतरी परत, यानी एंडोमेट्रियम, में मौजूद कुछ खास लाभकारी बैक्टीरिया शरीर की कैंसर-रोधी प्रतिरक्षा को सक्रिय करने में भूमिका निभा सकते हैं। यही प्रक्रिया एंडोमेट्रियल कैंसर, जिसे हिंदी में सामान्यतः गर्भाशय-अंत:स्तर कैंसर कहा जाता है, की पुनरावृत्ति या दोबारा लौटने की आशंका को दबाने से जुड़ी पाई गई है।
यह खबर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कैंसर के बारे में आम सोच अब भी मुख्यतः सर्जरी, कीमोथेरेपी और दवाओं तक सीमित रहती है। भारत में भी जब परिवार के किसी सदस्य को कैंसर होता है, तो चर्चा अक्सर इलाज की ‘ताकत’ पर केंद्रित रहती है—कौन-सी दवा चलेगी, कितने चक्र कीमो के होंगे, ऑपरेशन होगा या नहीं। लेकिन यह शोध हमें याद दिलाता है कि शरीर केवल एक अंग या एक ट्यूमर का नाम नहीं है। शरीर के भीतर प्रतिरक्षा प्रणाली, चयापचय (मेटाबॉलिज्म), हार्मोनल संतुलन और सूक्ष्मजीवों की दुनिया एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं।
कोरियाई शोधकर्ताओं ने जो बात सामने रखी है, उसका सार यह है कि गर्भाशय के स्थानीय सूक्ष्मजीव वातावरण और आंत के माइक्रोबायोम के बीच एक जैविक रिश्ता हो सकता है। यह रिश्ता कैंसर-रोधी प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को प्रभावित करता है। सरल शब्दों में कहें तो जिस तरह भारतीय घरों में हम अक्सर कहते हैं कि “पेट ठीक तो सेहत ठीक”, विज्ञान अब उससे कहीं अधिक सूक्ष्म और गंभीर स्तर पर यह समझने की कोशिश कर रहा है कि आंत, प्रतिरक्षा और दूसरे अंगों का स्वास्थ्य कैसे आपस में जुड़ा है।
ध्यान देने वाली बात यह भी है कि यह शोध किसी चमत्कारी इलाज की घोषणा नहीं है। यह कोई ऐसा दावा नहीं करता कि अब एंडोमेट्रियल कैंसर का आसान इलाज मिल गया है या कोई विशेष सप्लीमेंट लेकर बीमारी को रोका जा सकता है। बल्कि इसकी असली अहमियत इस बात में है कि कैंसर के दोबारा लौटने की प्रक्रिया को समझने में एक नई कड़ी मिली है। चिकित्सा विज्ञान में अक्सर इलाज तक पहुंचने का रास्ता ऐसे ही बुनियादी शोधों से होकर गुजरता है। इसलिए इस खबर को उम्मीद और सावधानी—दोनों नजरियों से पढ़ना चाहिए।
एंडोमेट्रियल कैंसर क्या है और यह चिंता का विषय क्यों है
एंडोमेट्रियल कैंसर गर्भाशय की अंदरूनी परत में शुरू होता है। यह महिलाओं में होने वाले स्त्रीरोग संबंधी कैंसरों में एक महत्वपूर्ण बीमारी है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी चर्चा लगातार बढ़ी है, और उपलब्ध वैश्विक आंकड़ों में यह महिलाओं में अपेक्षाकृत आम कैंसरों में गिना जाता है। कोरियाई रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया कि अमेरिका में महिलाओं में होने वाले कैंसरों के मामलों में इसका स्थान काफी ऊपर है। इसका अर्थ यह है कि यह केवल किसी एक देश या एक स्वास्थ्य तंत्र की समस्या नहीं, बल्कि व्यापक वैश्विक महत्व का विषय है।
भारतीय संदर्भ में बात करें तो स्त्रीरोग संबंधी कैंसरों पर चर्चा अक्सर सर्वाइकल कैंसर और स्तन कैंसर के इर्द-गिर्द अधिक दिखाई देती है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि जनजागरूकता अभियान, स्क्रीनिंग कार्यक्रम और सार्वजनिक विमर्श इन्हीं पर केंद्रित रहे हैं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि एंडोमेट्रियल कैंसर कम महत्वपूर्ण है। खासतौर पर शहरी भारत, बदलती जीवनशैली, मोटापा, मधुमेह, हार्मोनल असंतुलन और महिलाओं की बढ़ती औसत आयु के संदर्भ में इस बीमारी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इस कैंसर की एक बड़ी चुनौती इसका दोबारा लौटना है। शुरुआती इलाज के बाद रोगी और परिवार यह मानने लगते हैं कि कठिन दौर पीछे छूट गया। लेकिन जब बीमारी पुनरावृत्ति के रूप में लौटती है, तो वह भावनात्मक, आर्थिक और चिकित्सकीय—तीनों स्तरों पर अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाती है। भारत जैसे देश में, जहां कैंसर उपचार पहले से ही महंगा और मानसिक रूप से थकाने वाला हो सकता है, पुनरावृत्ति की खबर पूरे परिवार को हिला देती है। यही कारण है कि कैंसर की वापसी को रोकने वाली किसी भी वैज्ञानिक समझ का महत्व बहुत बढ़ जाता है।
डॉक्टर लंबे समय से यह मानते रहे हैं कि कैंसर केवल ट्यूमर कोशिकाओं की समस्या नहीं है। उसके आसपास का जैविक वातावरण, शरीर की प्रतिरक्षा, सूजन, हार्मोन और रोगी की समग्र शारीरिक स्थिति—ये सभी परिणामों को प्रभावित करते हैं। अब माइक्रोबायोम पर बढ़ते शोध ने इस तस्वीर में एक और परत जोड़ दी है। एंडोमेट्रियल कैंसर के संदर्भ में कोरिया से आई यह खोज इसी बड़ी वैज्ञानिक दिशा का हिस्सा है।
शोध में नया क्या मिला: ‘अच्छे बैक्टीरिया’, आंत और प्रतिरक्षा का त्रिकोण
इस शोध की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वैज्ञानिकों ने केवल यह नहीं कहा कि किसी ऊतक में कुछ बैक्टीरिया पाए गए। उन्होंने एक संभावित तंत्र या मैकेनिज्म की पहचान की है। यानी यह समझने की कोशिश की गई कि लाभकारी बैक्टीरिया किस तरह शरीर की कैंसर-रोधी प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को सक्रिय कर सकते हैं और उससे एंडोमेट्रियल कैंसर की पुनरावृत्ति पर असर पड़ सकता है।
यहां “लाभकारी बैक्टीरिया” या “गुड बैक्टीरिया” शब्द को बहुत सावधानी से समझना होगा। रोजमर्रा की भाषा में हम इसे दही, छाछ, किण्वित खाद्य पदार्थों या प्रोबायोटिक उत्पादों से जोड़ देते हैं। लेकिन चिकित्सा विज्ञान में इसका अर्थ कहीं अधिक विशिष्ट होता है। हर बैक्टीरिया हर व्यक्ति के लिए, हर परिस्थिति में, हर बीमारी पर एक जैसा प्रभाव नहीं डालता। कोरियाई शोध का फोकस एक खास कैंसर, एक खास जैविक परिवेश और एक खास प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया पर है। इसलिए इसे ‘कुछ भी खाइए, अच्छे बैक्टीरिया बढ़ाइए और कैंसर रुक जाएगा’ जैसे सरल निष्कर्ष में बदलना गंभीर भूल होगी।
शोध के अनुसार गर्भाशय के एंडोमेट्रियम में मौजूद कुछ लाभकारी सूक्ष्मजीव आंत के माइक्रोबायोम की चयापचय प्रक्रिया से जुड़े हो सकते हैं। यही संबंध प्रतिरक्षा कोशिकाओं को कैंसर से लड़ने के लिए अधिक सक्रिय बनाने में मदद करता है। यह निष्कर्ष वैज्ञानिक रूप से इसलिए भी आकर्षक है, क्योंकि यह शरीर को अलग-अलग कमरों में बंटी इमारत की तरह देखने के बजाय एक जुड़े हुए तंत्र के रूप में देखता है। यानी आंत में हो रही जैविक प्रक्रियाएं गर्भाशय जैसे किसी दूसरे अंग के कैंसर-जोखिम या पुनरावृत्ति-जोखिम से संबंध रख सकती हैं।
भारत में यह विचार आम पाठकों को शुरू में थोड़ा जटिल लग सकता है, लेकिन इसे एक आसान उदाहरण से समझा जा सकता है। जैसे किसी बड़े भारतीय संयुक्त परिवार में एक सदस्य की आदतें, खानपान और व्यवहार पूरे घर के माहौल को प्रभावित कर देते हैं, वैसे ही शरीर के भीतर भी एक हिस्से की जैविक गतिविधि दूसरे हिस्से के स्वास्थ्य पर असर डाल सकती है। आंत के सूक्ष्मजीव केवल पाचन का मामला नहीं हैं; वे प्रतिरक्षा, सूजन और कई रोग प्रक्रियाओं में भागीदार हो सकते हैं।
इस शोध का महत्व इस बात से भी बढ़ता है कि इसे “पहली बार” ऐसे संबंध की व्याख्या के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वैज्ञानिक रिपोर्टिंग में “पहली बार” जैसे शब्दों का इस्तेमाल अक्सर सावधानी से होना चाहिए, क्योंकि वे सनसनी पैदा कर सकते हैं। लेकिन यहां नया तत्व अपेक्षाकृत स्पष्ट है: एंडोमेट्रियल कैंसर की पुनरावृत्ति, गर्भाशय के लाभकारी बैक्टीरिया, आंत के माइक्रोबियल मेटाबॉलिज्म और कैंसर-रोधी प्रतिरक्षा के बीच एक जैविक कड़ी का प्रस्ताव और उसका विश्लेषण।
कैंसर की पुनरावृत्ति को समझना क्यों जरूरी है
किसी भी कैंसर के इलाज में शुरुआती सफलता महत्वपूर्ण होती है, लेकिन चिकित्सा जगत जानता है कि असली परीक्षा अक्सर उसके बाद शुरू होती है। पुनरावृत्ति, यानी कैंसर का वापस लौटना, रोगी के लिए केवल एक चिकित्सकीय स्थिति नहीं बल्कि एक भावनात्मक आघात भी होता है। भारत में परिवार अक्सर पहली बार कैंसर आने पर सारी बचत, बीमा और सामाजिक सहारे को झोंक देते हैं। ऐसे में अगर बीमारी फिर लौट आए, तो असर केवल शरीर पर नहीं पड़ता—जीवन की समूची व्यवस्था डगमगा जाती है।
एंडोमेट्रियल कैंसर के उन्नत या पुनरावर्ती मामलों में केवल पारंपरिक कीमोथेरेपी से अपेक्षित लाभ हर बार नहीं मिलता। यही वजह है कि दुनिया भर में शोधकर्ता इस बात की तलाश कर रहे हैं कि क्या प्रतिरक्षा-आधारित रणनीतियां, जैविक संकेतक, माइक्रोबायोम या व्यक्तिगत चिकित्सा के अन्य रास्ते मरीजों के लिए बेहतर परिणाम दे सकते हैं। कोरियाई शोध इसी प्रश्न के केंद्र में जाकर खड़ा होता है।
यदि किसी रोग की पुनरावृत्ति के पीछे केवल कैंसर कोशिकाओं की संख्या ही नहीं, बल्कि शरीर का जैविक वातावरण भी भूमिका निभाता है, तो उपचार की सोच भी बदलनी पड़ेगी। तब केवल “कैंसर को मारना” पर्याप्त लक्ष्य नहीं रहेगा; “ऐसा आंतरिक वातावरण बनाना या बनाए रखना” भी लक्ष्य होगा जिसमें कैंसर दोबारा पनपने में कठिनाई महसूस करे। यही वह बिंदु है जहां प्रतिरक्षा और माइक्रोबायोम की चर्चा महत्वपूर्ण बन जाती है।
भारतीय स्वास्थ्य विमर्श में यह बदलाव धीरे-धीरे दिखाई भी दे रहा है। अब डॉक्टर केवल रिपोर्ट देखकर नहीं, बल्कि रोगी की संपूर्ण जीवन-स्थिति—पोषण, संक्रमण, सह-रोग, सूजन, मानसिक स्वास्थ्य और उपचार सहन करने की क्षमता—को भी ध्यान में रखते हैं। हालांकि माइक्रोबायोम अभी आम क्लीनिकल बातचीत का हिस्सा नहीं बना है, लेकिन आने वाले वर्षों में यह भूमिका बढ़ सकती है।
फिर भी यह याद रखना जरूरी है कि यह शोध एक दिशा दिखाता है, मंजिल नहीं। अभी इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि अस्पतालों में तुरंत नई चिकित्सा शुरू हो जाएगी, या डॉक्टर रोगियों को विशेष बैक्टीरिया-आधारित उपचार लिखने लगेंगे। उपचार-स्तर पर पहुंचने के लिए और अधिक प्रयोग, सत्यापन, नैदानिक अध्ययन और दीर्घकालिक परिणामों की जरूरत होगी। लेकिन पुनरावृत्ति जैसे कठिन चरण पर यह शोध आशा का गंभीर और वैज्ञानिक आधार जरूर प्रस्तुत करता है।
‘प्रोबायोटिक’ से आगे की बात: आम पाठकों को क्या समझना चाहिए
भारत में स्वास्थ्य संबंधी खबरें आते ही बाजार बहुत तेजी से प्रतिक्रिया देता है। कभी हल्दी को चमत्कारिक घोषित किया जाता है, कभी गिलोय को, कभी किसी विदेशी सप्लीमेंट को। माइक्रोबायोम और लाभकारी बैक्टीरिया की चर्चा भी कई बार इसी बाजारू उत्साह का शिकार हो जाती है। इसलिए इस कोरियाई शोध को पढ़ते समय सबसे पहले यह समझना होगा कि यह कोई उपभोक्ता-उत्पाद मार्गदर्शिका नहीं है।
रिपोर्ट में कहीं यह नहीं कहा गया कि बाजार में मिलने वाला कोई सामान्य प्रोबायोटिक एंडोमेट्रियल कैंसर की पुनरावृत्ति रोक देगा। यह भी नहीं कहा गया कि हर महिला को अभी से कोई विशेष सप्लीमेंट लेना चाहिए। शोध का मूल बिंदु यह है कि कुछ विशिष्ट सूक्ष्मजीव, विशिष्ट जैविक परिस्थितियों में, प्रतिरक्षा तंत्र के साथ मिलकर कैंसर-विरोधी भूमिका निभा सकते हैं। चिकित्सा विज्ञान में “विशिष्ट” शब्द बहुत महत्वपूर्ण होता है।
हमारे यहां दही, लस्सी, किण्वित भोजन, इडली-दोसा का खमीर, कांजी, अचार जैसी पारंपरिक खाद्य संस्कृतियां हैं। ये खाद्य परंपराएं पोषण और पाचन के लिहाज से अपनी जगह मूल्यवान हो सकती हैं। लेकिन इनके आधार पर कैंसर-उपचार संबंधी निष्कर्ष निकालना वैज्ञानिक रूप से गलत होगा। जैसे घर की रसोई का ज्ञान महत्वपूर्ण है, वैसे ही आधुनिक चिकित्सा की कठोर जांच-प्रक्रिया भी उतनी ही आवश्यक है। दोनों को गड्डमड्ड कर देना खतरनाक हो सकता है।
इस शोध की सही सार्वजनिक व्याख्या यही होगी कि चिकित्सा विज्ञान अब शरीर के “अंदरूनी पारिस्थितिकी तंत्र” को अधिक गंभीरता से देख रहा है। यह पारिस्थितिकी तंत्र केवल रोगाणुओं का खतरा नहीं, बल्कि लाभकारी साझेदारों का भी संसार हो सकता है। लेकिन यह समझ अभी प्रयोगशाला और शोध संस्थानों में विकसित हो रही है। आम मरीजों को किसी भी तरह के सप्लीमेंट, वैकल्पिक उपाय या इंटरनेट पर उपलब्ध दावों के आधार पर स्वयं उपचार बदलने की भूल नहीं करनी चाहिए।
भारतीय परिवारों में, खासकर महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर, अक्सर दो अतियाँ दिखाई देती हैं—या तो लक्षणों को लंबे समय तक नजरअंदाज किया जाता है, या फिर किसी एक “नुस्खे” में पूरी उम्मीद डाल दी जाती है। एंडोमेट्रियल कैंसर जैसे रोगों के मामले में दोनों रास्ते नुकसानदेह हैं। सही जांच, समय पर विशेषज्ञ से परामर्श, प्रमाण-आधारित उपचार और डॉक्टर की निगरानी में फॉलो-अप—यही सबसे महत्वपूर्ण बातें हैं। माइक्रोबायोम पर शोध इन प्रक्रियाओं का विकल्प नहीं, बल्कि भविष्य में इन्हें और बेहतर बनाने की संभावित दिशा है।
भारत के लिए इस खबर का मतलब क्या है
भारत में महिला स्वास्थ्य अब भी कई स्तरों पर असमानताओं से घिरा है। महानगरों के कॉर्पोरेट अस्पतालों से लेकर छोटे शहरों की जिला चिकित्सा व्यवस्था तक पहुंच, जागरूकता और विशेषज्ञता में बड़ा अंतर है। स्त्रीरोग संबंधी कैंसरों की पहचान भी कई बार देर से होती है, क्योंकि महिलाएं अनियमित रक्तस्राव, पेट फूलना, थकान या रजोनिवृत्ति के बाद होने वाले रक्तस्राव जैसे संकेतों को नजरअंदाज कर देती हैं। परिवार भी कई बार इन्हें “उम्र का असर” या “हार्मोनल समस्या” कहकर टाल देता है।
ऐसे माहौल में कोरिया का यह शोध भारत को दो संदेश देता है। पहला, महिला-केंद्रित कैंसरों पर उन्नत शोध की जरूरत अत्यंत गंभीर है। दूसरा, कैंसर को समझने के लिए बहु-विषयक दृष्टिकोण—यानी क्लिनिकल मेडिसिन, इम्यूनोलॉजी, माइक्रोबायोलॉजी और मेटाबॉलिक साइंस—को साथ लाना होगा। भारत में भी शीर्ष संस्थानों, कैंसर केंद्रों और बायोमेडिकल रिसर्च प्रयोगशालाओं के बीच ऐसे सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता है।
यह भी ध्यान रखना होगा कि भारतीय आबादी की भोजन शैली, आनुवंशिक विविधता, संक्रमण-इतिहास, एंटीबायोटिक उपयोग, प्रसूति-इतिहास और आंत के सूक्ष्मजीवों की संरचना कई मायनों में पूर्वी एशिया, यूरोप या अमेरिका से अलग हो सकती है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय शोध से प्रेरणा मिल सकती है, लेकिन अंतिम चिकित्सा निष्कर्षों के लिए भारतीय संदर्भ में अध्ययन भी जरूरी होंगे। जिस तरह एक कोरियाई भोजन संस्कृति और एक भारतीय थाली में फर्क होता है, उसी तरह माइक्रोबायोम की तस्वीर भी आबादी-दर-आबादी बदल सकती है।
इसके बावजूद दिशा स्पष्ट है। अगर भविष्य में माइक्रोबायोम-आधारित परीक्षण, जोखिम-पूर्वानुमान या प्रतिरक्षा-समर्थक उपचार विकसित होते हैं, तो भारतीय चिकित्सा तंत्र को इसके लिए तैयार रहना होगा। यहां एक और महत्वपूर्ण प्रश्न लागत का है। भारत में कैंसर उपचार पहले ही महंगा है। इसलिए यदि नई तकनीकें विकसित हों, तो उनके सुलभ और किफायती होने पर नीति-निर्माताओं को अभी से सोचने की जरूरत होगी।
सार्वजनिक स्वास्थ्य के स्तर पर इस खबर का एक और संदेश है—महिलाओं के कैंसर पर खुली, तथ्यात्मक और सम्मानजनक चर्चा। जैसे स्तन कैंसर पर जागरूकता ने समाज में कुछ हद तक चुप्पी तोड़ी है, वैसे ही गर्भाशय और एंडोमेट्रियम से जुड़ी बीमारियों पर भी अधिक समझदारी भरी बातचीत आवश्यक है। विज्ञान तभी समाज तक पहुंचता है जब भाषा, चिकित्सा और संवेदना—तीनों साथ चलें।
उम्मीद और संयम के बीच: आगे का रास्ता
कोरिया से आया यह शोध न तो अंतिम उत्तर है, न ही मामूली सूचना। यह उन खबरों में से है जिन्हें मेडिकल साइंस की भाषा में “दिशा बदलने वाली खोज” कहा जा सकता है। इसने यह संकेत दिया है कि एंडोमेट्रियल कैंसर की पुनरावृत्ति को केवल आक्रामक कोशिकाओं के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि शरीर के सूक्ष्मजीव-प्रतिरक्षा नेटवर्क के भीतर भी समझना होगा। यह विचार आने वाले वर्षों में नए परीक्षणों, बेहतर रोग-पूर्वानुमान और शायद अधिक व्यक्तिगत उपचार विकल्पों का आधार बन सकता है।
लेकिन संयम इसलिए जरूरी है क्योंकि हर बुनियादी खोज को चिकित्सा लाभ में बदलने में समय लगता है। वैज्ञानिकों को यह जांचना होगा कि कौन-से बैक्टीरिया निर्णायक भूमिका निभाते हैं, वे किन जैव-रासायनिक रास्तों से काम करते हैं, क्या यह प्रभाव अलग-अलग रोगियों में समान रहता है, और क्या इसे सुरक्षित तरीके से उपचार रणनीति में बदला जा सकता है। इन सभी सवालों के जवाब अभी बाकी हैं।
मरीजों और परिवारों के लिए सबसे उपयोगी संदेश यह है कि कैंसर उपचार के बाद फॉलो-अप उतना ही महत्वपूर्ण है जितना प्रारंभिक इलाज। किसी भी असामान्य लक्षण को हल्के में न लें, नियमित जांच कराते रहें, और इंटरनेट-आधारित अप्रमाणित दावों से बचें। यदि भविष्य में माइक्रोबायोम या प्रतिरक्षा-आधारित विकल्प सामने आते हैं, तो उनका उपयोग भी विशेषज्ञ सलाह के साथ ही होना चाहिए।
पत्रकारीय दृष्टि से देखें तो यह खबर विज्ञान और समाज के रिश्ते को भी रेखांकित करती है। जब शोधकर्ता शरीर के भीतर ऐसे संबंध खोजते हैं जिन्हें आम लोग अपनी आंखों से नहीं देख सकते, तब मीडिया की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वह न तो डर फैलाए, न चमत्कार बेचे। इस कहानी का वास्तविक सार यही है: शरीर के भीतर एक अदृश्य संसार है, और संभव है कि उसी संसार में कैंसर के खिलाफ कुछ नई चाबियां छिपी हों।
भारतीय पाठकों के लिए यह एक महत्वपूर्ण क्षण है—क्योंकि यह खबर हमें बताती है कि आधुनिक चिकित्सा केवल मशीनों, दवाओं और ऑपरेशन थिएटरों में नहीं बनती; वह हमारे शरीर के सूक्ष्मतम जीवों, प्रतिरक्षा कोशिकाओं और जटिल जैविक रिश्तों को समझने की प्रक्रिया से भी आगे बढ़ती है। एंडोमेट्रियल कैंसर की पुनरावृत्ति को रोकने की राह अभी लंबी है, लेकिन कोरिया के इस शोध ने उस राह पर एक नई रोशनी जरूर जलाई है।
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