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सिर्फ सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, स्थायी बदलाव की ओर: विकासशील देशों में कला-शिक्षा के जरिए नई भूमिका तलाशता दक्षिण कोरिय

सिर्फ सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, स्थायी बदलाव की ओर: विकासशील देशों में कला-शिक्षा के जरिए नई भूमिका तलाशता दक्षिण कोरिय

सियोल से उठी बहस, जिसका असर एशिया-अफ्रीका तक जा सकता है

दक्षिण कोरिया को दुनिया आज प्रायः के-पॉप, के-ड्रामा, ब्यूटी इंडस्ट्री और हाई-टेक अर्थव्यवस्था के जरिए पहचानती है। लेकिन सियोल से इस सप्ताह जो विचार सामने आया है, वह कोरियाई प्रभाव की एक अलग और कहीं अधिक गहरी परत को सामने लाता है। चर्चा इस बात की नहीं है कि कोरिया अपने सांस्कृतिक उत्पाद दुनिया को कैसे दिखाए, बल्कि इस बात की है कि वह विकासशील देशों में कौन-सा टिकाऊ संस्थागत योगदान छोड़कर जाए। सियोल में आयोजित एक महत्त्वपूर्ण मंच पर यह सुझाव सामने आया कि दक्षिण कोरिया की ‘संस्कृति एवं कला शिक्षा’ से जुड़ी सरकारी विकास सहायता—यानी ओडीए—को केवल बच्चों और युवाओं को एक-दो बार कला का अनुभव कराने वाले कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसे अब ऐसे मॉडल में बदलना होगा जो स्थानीय कानून, नीतियों, स्कूल व्यवस्था, शिक्षक प्रशिक्षण और सांस्कृतिक संस्थानों को भी मजबूत करे।

भारतीय पाठकों के लिए यह मुद्दा इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि हम स्वयं लंबे समय से इस सवाल से जूझते रहे हैं कि शिक्षा में कला, संगीत, नाटक, शिल्प और सांस्कृतिक अभ्यासों की भूमिका क्या होनी चाहिए। भारत में नई शिक्षा नीति से लेकर स्कूली सह-पाठ्यक्रम तक, बार-बार यह बात कही जाती रही है कि शिक्षा सिर्फ परीक्षा, अंकों और नौकरी की तैयारी तक सीमित नहीं हो सकती। लेकिन जब बात संसाधनों, संस्थागत ढांचे और नीति-निरंतरता की आती है, तब सबसे पहले कला-शिक्षा ही हाशिये पर चली जाती है। दक्षिण कोरिया में उठी यह बहस इसलिए दिलचस्प है, क्योंकि वह किसी एक देश की सांस्कृतिक छवि से आगे बढ़कर विकास की भाषा में कला-शिक्षा की भूमिका को परिभाषित करने की कोशिश कर रही है।

सियोल के जोंगनो जिले स्थित सियोल क्राफ्ट म्यूजियम में आयोजित ‘संस्कृति एवं कला शिक्षा ओडीए उपलब्धि-साझा मंच’ में कोरिया विश्वविद्यालय के सतत विकास केंद्र के प्रमुख किम सोंग-ग्यु ने जो बात रखी, उसका सार स्पष्ट था: अगर विकासशील देशों में सांस्कृतिक सहायता देनी है, तो उसे ‘एक दिन का कार्यक्रम’ या ‘एक सप्ताह की कार्यशाला’ भर न बनाया जाए। उसे स्थानीय समाज की संस्थाओं में समाहित करना होगा। यानी कला-शिक्षा बाहरी मेहमान के रूप में आए और चली जाए, यह पर्याप्त नहीं; उसे स्थानीय शिक्षा-तंत्र का हिस्सा बनना चाहिए।

यह विचार सुनने में अकादमिक लग सकता है, लेकिन इसके निहितार्थ बहुत व्यावहारिक हैं। अगर कोई देश किसी दूसरे देश में बच्चों को नृत्य, चित्रकला या संगीत का छोटा-सा अनुभव कराकर लौट जाता है, तो तस्वीरें अच्छी बनती हैं, रिपोर्ट आकर्षक दिखती है और तत्काल सराहना भी मिलती है। पर कुछ महीनों बाद उसका क्या शेष रहता है? क्या शिक्षक तैयार हुए? क्या स्कूल पाठ्यक्रम बदला? क्या स्थानीय प्रशासन ने कला-शिक्षा को बजट में जगह दी? क्या समुदाय ने इसे अपनाया? असली प्रश्न वहीं से शुरू होता है।

‘अनुभव’ बनाम ‘प्रणाली’: फर्क क्या है और क्यों अहम है

दक्षिण कोरिया की इस बहस का सबसे केंद्रीय बिंदु यही है कि सांस्कृतिक सहयोग को ‘अनुभव’ से ‘प्रणाली’ की ओर मोड़ा जाए। आम तौर पर सांस्कृतिक आदान-प्रदान का अर्थ हम प्रदर्शनियों, कार्यशालाओं, छात्र यात्राओं, संगीत आयोजनों, नृत्य प्रस्तुतियों या अल्पकालिक प्रशिक्षणों से लगाते हैं। इनमें कोई बुराई नहीं है। वास्तव में, ऐसे कार्यक्रम शुरुआती आकर्षण पैदा करते हैं, सांस्कृतिक दूरी घटाते हैं और बच्चों-युवाओं में आत्मविश्वास भी भरते हैं। लेकिन विकास सहयोग के स्तर पर सवाल यह है कि क्या इतने भर से समाज में दीर्घकालिक परिवर्तन संभव है?

किम सोंग-ग्यु का तर्क यही है कि अगर लक्ष्य वास्तविक विकास है, तो स्थानीय कानूनों, नीतिगत ढांचे, शिक्षक-प्रशिक्षण, पाठ्यचर्या, सांस्कृतिक संस्थाओं और प्रशासनिक क्षमता को मजबूत करना होगा। दूसरे शब्दों में कहें तो कला-शिक्षा को ‘इवेंट’ नहीं, ‘इकोसिस्टम’ के रूप में देखना होगा। यह ठीक उसी तरह है जैसे भारत में किसी सरकारी स्कूल में एक दिन के लिए प्रसिद्ध कलाकारों को बुला देना प्रेरक हो सकता है, लेकिन अगर स्कूल में संगीत शिक्षक ही नहीं, अभ्यास का समय ही नहीं, वाद्ययंत्रों का रख-रखाव नहीं, और परीक्षा-तंत्र में कला का मूल्यांकन ही नहीं, तो उसका असर सीमित रह जाएगा।

विकास सहयोग की दुनिया में इसे स्थायित्व या सस्टेनेबिलिटी कहा जाता है। अल्पकालिक कार्यक्रम तेजी से दिख जाते हैं, इसलिए नीति-निर्माताओं और दानदाताओं को वे पसंद भी आते हैं। लेकिन संस्थागत ढांचा बनाना धीमा, जटिल और कम चमकदार काम है। उसमें स्थानीय सरकारों से बातचीत करनी होती है, कानूनी प्रावधानों को समझना पड़ता है, शिक्षक तैयार करने पड़ते हैं, प्रशिक्षण मॉड्यूल बनाने होते हैं, मूल्यांकन के पैमाने तय करने होते हैं और सबसे अहम—स्थानीय संस्कृति का सम्मान करते हुए काम करना होता है।

यही वह बिंदु है जहां दक्षिण कोरिया की नई सोच उसकी सांस्कृतिक ‘सॉफ्ट पावर’ को एक गहराई देती है। अब तक दुनिया कोरिया को उसके लोकप्रिय सांस्कृतिक निर्यात के जरिए देखती रही है। लेकिन अगर वही देश अब यह कहता है कि कला-शिक्षा को सामाजिक एकजुटता, सामुदायिक पुनर्निर्माण और मानव विकास के औजार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है, तो यह उसके वैश्विक चरित्र में एक नई परिपक्वता जोड़ता है। यह केवल ‘हमें देखिए’ की मुद्रा नहीं, बल्कि ‘हम मिलकर कुछ टिकाऊ बना सकते हैं’ वाली साझेदारी की भाषा है।

भारतीय नजरिये से यह बहस क्यों परिचित भी है और नई भी

भारत में कला और शिक्षा का रिश्ता पुराना है। गुरुकुल परंपरा से लेकर लोकनाट्य, भक्ति-संगीत, कथकली, भरतनाट्यम, कथक, पटचित्र, मधुबनी, वारली, कठपुतली, बाउल, सूफी संगीत और कबीर गायकी तक—हमारी सांस्कृतिक परंपरा ने हमेशा शिक्षा को केवल पाठ्यपुस्तक तक सीमित नहीं माना। गांवों के मेले, उत्सव, लोकगीत, मंदिर-मठ-मस्जिदों से जुड़ी कलाएं, हस्तशिल्प और मौखिक परंपराएं—ये सब सामाजिक सीख के माध्यम रहे हैं। लेकिन औपनिवेशिक और बाद के प्रशासनिक ढांचे में शिक्षा धीरे-धीरे परीक्षा-केंद्रित होती गई और कला को अक्सर ‘अतिरिक्त’ समझ लिया गया।

इसलिए जब दक्षिण कोरिया यह कहता है कि कला-शिक्षा को नीति और संस्थागत व्यवस्था का हिस्सा बनाया जाना चाहिए, तो भारतीय समाज इसे बहुत सहजता से समझ सकता है। हमारे यहां भी सरकारी स्कूलों, आदिवासी इलाकों, शहरी मलिन बस्तियों और संघर्षग्रस्त समुदायों में कला-आधारित शिक्षा को मानसिक स्वास्थ्य, अभिव्यक्ति, भाषा कौशल और सामुदायिक जुड़ाव के साधन के रूप में देखा गया है। कई गैर-सरकारी संगठनों ने रंगमंच, गीत, चित्रकला, कहानी-कथन और शिल्प के जरिए बच्चों में आत्मविश्वास और संवाद की क्षमता बढ़ाने के उदाहरण दिए हैं।

फिर भी चुनौती वही है जो कोरिया रेखांकित कर रहा है—क्या ये प्रयास संस्थागत रूप ले पा रहे हैं? क्या शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थानों में कला-शिक्षा को गंभीरता से पढ़ाया जा रहा है? क्या जिला और राज्य स्तर पर बजट उपलब्ध है? क्या स्थानीय भाषाओं और लोककलाओं को पाठ्यचर्या में सम्मानजनक स्थान मिल रहा है? क्या कला-शिक्षा को केवल वार्षिक दिवस, प्रतियोगिता या ‘टैलेंट शो’ तक सीमित कर दिया गया है? इस दृष्टि से देखें तो सियोल का यह विमर्श केवल कोरिया की विदेश नीति का मामला नहीं, बल्कि विकासशील समाजों की साझा चुनौती है।

भारतीय पाठकों के लिए यहां एक और दिलचस्प पहलू है। जिस तरह भारत ने योग, आयुर्वेद, भारतीय शास्त्रीय संगीत, बौद्ध विरासत, हस्तशिल्प और सिनेमा के जरिए अपनी सांस्कृतिक उपस्थिति दर्ज कराई है, उसी तरह कोरिया ने के-पॉप, फिल्मों, ड्रामों, खानपान और डिज़ाइन के जरिए वैश्विक पहचान बनाई। लेकिन लोकप्रियता की अगली परीक्षा हमेशा यही होती है कि क्या वह संस्थागत सहयोग में बदलती है। लोकप्रिय संस्कृति भीड़ जुटा सकती है; पर नीति और शिक्षा ही लंबे समय का ढांचा बनाती हैं।

कोरियाई सांस्कृतिक प्रभाव का अगला चरण: ‘हल्ल्यू’ से आगे की कहानी

दक्षिण कोरिया की सांस्कृतिक लहर, जिसे ‘हल्ल्यू’ कहा जाता है, पिछले दो दशकों में दुनिया भर में फैल चुकी है। भारतीय युवाओं के बीच भी बीटीएस, ब्लैकपिंक, के-ड्रामा, कोरियाई फैशन और फूड की लोकप्रियता असंदिग्ध है। उत्तर-पूर्व भारत, दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, पुणे, हैदराबाद और छोटे शहरों तक में कोरियाई सांस्कृतिक आयोजनों की मांग बढ़ी है। सोशल मीडिया ने इस आकर्षण को और बढ़ाया है। लेकिन हल्ल्यू का यह चरण मुख्यतः सांस्कृतिक उपभोग का चरण था—लोग देखते थे, सुनते थे, अपनाते थे, सीखते थे और उससे जुड़ी जीवनशैली में रुचि लेते थे।

अब जो बात सियोल से सामने आई है, वह हल्ल्यू के बाद के चरण की ओर इशारा करती है। यहां फोकस इस पर है कि सांस्कृतिक प्रभाव को सार्वजनिक नीति, शिक्षा, सामाजिक पुनर्निर्माण और संस्थागत क्षमता-विकास से कैसे जोड़ा जाए। यह बदलाव इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि विश्व राजनीति और विकास सहयोग के क्षेत्र में ‘सॉफ्ट पावर’ तभी टिकाऊ मानी जाती है जब वह स्थानीय समाज में भागीदारी, कौशल और संस्थागत मजबूती छोड़कर जाए। केवल लोकप्रियता, चाहे वह कितनी भी व्यापक क्यों न हो, अपने आप में विकास मॉडल नहीं बन जाती।

कोरिया के संस्कृति, खेल और पर्यटन मंत्रालय तथा कोरिया आर्ट्स एंड कल्चर एजुकेशन सर्विस जैसी संस्थाओं की भागीदारी इस चर्चा को विशेष वजन देती है। यह कोई निजी राय भर नहीं, बल्कि नीति-स्तर पर आत्ममंथन का संकेत है। जब कोई देश अपनी उपलब्धियों का उत्सव मनाने के बजाय यह पूछने लगे कि “हमने वास्तव में क्या टिकाऊ छोड़ा?”, तब समझना चाहिए कि वह अपनी वैश्विक भूमिका को परिपक्व तरीके से पुनर्परिभाषित कर रहा है।

भारतीय संदर्भ में कहें तो यह ठीक वैसा है जैसे हम केवल अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाकर संतुष्ट न हों, बल्कि यह भी सोचें कि स्वास्थ्य-शिक्षा, सामुदायिक कल्याण और प्रशिक्षक-तंत्र में उसके टिकाऊ मॉडल कैसे बने। इसी तरह यदि भारत कभी सांस्कृतिक कूटनीति को विकास सहयोग से अधिक गहराई से जोड़े, तो उसे भी केवल प्रदर्शन नहीं, संस्थागत साझेदारी की दिशा में बढ़ना होगा। कोरिया की बहस इस व्यापक एशियाई संभावना की ओर भी संकेत करती है।

कला-शिक्षा को मानव विकास, सामाजिक एकता और सामुदायिक पुनर्निर्माण से जोड़ना

सियोल के मंच पर एक महत्त्वपूर्ण बात यह भी सामने आई कि ‘संस्कृति ओडीए’ को अब मानव विकास, सामाजिक एकीकरण और सामुदायिक पुनर्प्राप्ति जैसे लक्ष्यों से जोड़कर देखा जा रहा है। यह विचार साधारण नहीं है। विकास पर बातचीत में आम तौर पर बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य, पोषण, रोजगार, स्वच्छता और डिजिटल पहुंच की चर्चा प्रमुख होती है। संस्कृति और कला को अक्सर ‘सॉफ्ट’ क्षेत्र मानकर पीछे रख दिया जाता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह समझ मजबूत हुई है कि केवल आर्थिक या भौतिक अवसंरचना से समाज पूर्ण नहीं बनता। संघर्ष, विस्थापन, सामाजिक विभाजन, मानसिक तनाव और सामुदायिक अविश्वास जैसी समस्याएं ऐसी हैं, जिनमें कला-आधारित हस्तक्षेप महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

उदाहरण के लिए, जिन समुदायों ने हिंसा, आपदा, पलायन या लंबे सामाजिक तनाव का सामना किया हो, वहां सामूहिक गायन, थिएटर, लोक-कला, कहानी-कथन और दृश्य कला लोगों को संवाद का मंच देती हैं। बच्चे अपनी भावनाएं व्यक्त करना सीखते हैं, समुदाय साझा स्मृतियों को पुनर्गठित करता है और स्थानीय पहचान को सकारात्मक रूप से पुनर्स्थापित किया जा सकता है। भारतीय अनुभव भी यही बताता है—चाहे वह आपदा प्रभावित इलाकों में बच्चों के लिए रचनात्मक गतिविधियां हों, या संघर्ष वाले क्षेत्रों में थिएटर एवं संगीत के जरिए मनो-सामाजिक सहारा।

यही कारण है कि कोरिया में उठी यह बात केवल सांस्कृतिक नीति का विस्तार नहीं, बल्कि विकास की अवधारणा को व्यापक बनाने का प्रयास है। जब कला-शिक्षा को मानव विकास से जोड़ा जाता है, तो उसका अर्थ रचनात्मकता भर नहीं रह जाता। उसमें आत्मसम्मान, पहचान, भाषा, संवाद, सामाजिक भरोसा और नागरिक भागीदारी जैसे तत्व शामिल हो जाते हैं। सामाजिक एकीकरण का अर्थ भी यही है कि अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोग साझा सांस्कृतिक अभ्यासों के जरिए एक-दूसरे से जुड़ें।

हालांकि इस दृष्टिकोण की कठिनाई भी कम नहीं है। ऐसी परियोजनाओं को मापना आसान नहीं होता। सड़क बनी या नहीं, स्कूल की इमारत खड़ी हुई या नहीं, यह मापा जा सकता है; लेकिन समुदाय में विश्वास बढ़ा या बच्चों की आत्म-अभिव्यक्ति मजबूत हुई, इसे किस पैमाने पर आंका जाए? इसलिए यदि कोरिया वास्तव में इस दिशा में आगे बढ़ना चाहता है, तो उसे मूल्यांकन की नई पद्धतियां भी विकसित करनी होंगी। यही वह क्षेत्र है जहां नीति, शिक्षा, समाजशास्त्र और सांस्कृतिक अध्ययन एक-दूसरे से मिलते हैं।

नीति, कानून और स्थानीय भागीदारी: असली परीक्षा यहीं है

किसी भी अंतरराष्ट्रीय विकास पहल की सफलता अंततः स्थानीय स्वामित्व पर निर्भर करती है। सियोल में जो सुझाव दिया गया, उसकी सबसे बड़ी कसौटी यही होगी कि क्या कोरिया अपने साझेदार देशों में स्थानीय सरकारों, शिक्षाविदों, कलाकारों, समुदायों और नागरिक संस्थाओं के साथ बराबरी के रिश्ते में काम कर पाता है। यदि सांस्कृतिक सहायता केवल बाहरी मॉडल थोपने की कोशिश बनेगी, तो वह लंबे समय तक टिक नहीं पाएगी। लेकिन यदि वह स्थानीय जरूरतों, भाषाओं, परंपराओं और प्रशासनिक वास्तविकताओं को समझकर आगे बढ़ेगी, तो उसके स्थायी परिणाम निकल सकते हैं।

यहीं ‘कानून और संस्थागत ढांचे’ की बात बेहद अहम हो जाती है। किसी देश में कला-शिक्षा को विद्यालयी या सामुदायिक स्तर पर मजबूत करने के लिए नीति-संशोधन, वित्तीय प्रावधान, शिक्षक भर्ती, प्रशिक्षण मानक, पाठ्यक्रम दिशानिर्देश और प्रशासनिक समन्वय की जरूरत पड़ती है। यह सब किसी एक कार्यशाला से नहीं होता। इसके लिए लंबी साझेदारी, धैर्य और भरोसा चाहिए। कोरिया यदि इस राह पर चलता है, तो वह अपनी सांस्कृतिक क्षमता को एक प्रकार की ‘पब्लिक गुड’—सार्वजनिक हित की साझी संपदा—में बदल सकता है।

भारत में भी यही अनुभव रहा है कि शिक्षा-सुधार की कोई भी पहल तभी टिकती है जब राज्य सरकार, स्थानीय निकाय, शिक्षकों का समूह, अभिभावक और समुदाय, सब साथ आएं। ऊपर से बनी योजनाएं अक्सर कागज पर अच्छी लगती हैं, लेकिन जमीनी ढांचे से न जुड़ें तो उनका असर सीमित रह जाता है। दक्षिण कोरिया के सामने भी यही चुनौती होगी कि वह विकासशील देशों के साथ काम करते हुए ‘भागीदारी’ को औपचारिक शब्द भर न रहने दे, बल्कि इसे वास्तविक प्रक्रिया बनाए।

एक और महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या सांस्कृतिक सहायता को लोकप्रिय कोरियाई संस्कृति के विस्तार के रूप में देखा जाएगा, या स्थानीय सांस्कृतिक पारिस्थितिकी को मजबूत करने के साधन के रूप में? दोनों में फर्क है। यदि उद्देश्य सिर्फ कोरियाई संस्कृति का प्रसार है, तो वह सांस्कृतिक कूटनीति रहेगी। लेकिन यदि लक्ष्य स्थानीय समाज को उसकी अपनी सांस्कृतिक-शैक्षिक क्षमता में मजबूत करना है, तो वह वास्तविक विकास सहयोग कहलाएगा। सियोल की ताजा बहस संकेत देती है कि कोरिया दूसरी राह की ओर बढ़ना चाहता है। यही इसकी गंभीरता है।

भारत और वैश्विक दक्षिण के लिए इसके क्या संकेत हैं

दक्षिण कोरिया की यह नई सोच वैश्विक दक्षिण—यानी एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अनेक विकासशील देशों—के लिए एक उपयोगी बहस खोलती है। लंबे समय तक विकास सहयोग का ढांचा मुख्यतः पश्चिमी देशों और बहुपक्षीय संस्थाओं द्वारा प्रभावित रहा। अब एशियाई देश स्वयं अनुभव, नीति और संस्थागत मॉडल साझा करने की स्थिति में हैं। कोरिया का उदाहरण दिखाता है कि कोई देश केवल आर्थिक प्रगति या सांस्कृतिक लोकप्रियता से ही नहीं, बल्कि शिक्षा और संस्थागत निर्माण के क्षेत्र में भी वैश्विक योगदान का नया मॉडल बना सकता है।

भारत के लिए यहां दो स्तरों पर सीख है। पहला, हमें यह समझना होगा कि हमारी अपनी सांस्कृतिक और शैक्षिक पूंजी कितनी बड़ी है और उसे विकास सहयोग की भाषा में कैसे रूपांतरित किया जा सकता है। दूसरा, घरेलू स्तर पर कला-शिक्षा को गंभीरता से लिए बिना हम बाहर किसी मॉडल की बात नहीं कर सकते। अगर भारत अपने स्कूलों, सामुदायिक केंद्रों, जनजातीय क्षेत्रों, भाषाई विविधता और लोककला परंपराओं को सशक्त बनाता है, तभी वह आगे चलकर सांस्कृतिक विकास सहयोग में विश्वसनीय भागीदार बन सकता है।

कोरिया के लिए भी यह अवसर और परीक्षा दोनों है। अवसर इसलिए कि उसके पास संगठित सांस्कृतिक नीति, शिक्षा-संबंधी संस्थागत अनुभव और वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त सांस्कृतिक पूंजी है। परीक्षा इसलिए कि क्या वह इस पूंजी को टिकाऊ, न्यायसंगत और भागीदारी-आधारित विकास मॉडल में बदल पाता है। चमकदार मंच और वैश्विक लोकप्रियता से आगे बढ़कर यदि कोई देश स्थानीय शिक्षा-तंत्र, कानूनी ढांचे और सांस्कृतिक संस्थानों को मजबूत करने में मदद करता है, तो उसका प्रभाव कहीं अधिक दीर्घकालिक होता है।

अंततः सियोल की इस बहस का सार यही है कि अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक सहयोग का भविष्य ‘क्या दिखाया गया’ से कम और ‘क्या बनाया गया’ से अधिक तय होगा। भारत जैसे समाजों के लिए, जहां संस्कृति और शिक्षा का रिश्ता भावनात्मक भी है और राजनीतिक भी, यह संदेश खास मायने रखता है। कला-शिक्षा अगर केवल मनोरंजन, शौक या विशेष अवसर की चीज न रहकर सामाजिक विकास और संस्थागत मजबूती का हिस्सा बनती है, तो वह बच्चों और समुदायों के जीवन में वास्तविक अंतर ला सकती है। दक्षिण कोरिया ने यह प्रश्न दुनिया के सामने रख दिया है; अब देखना यह है कि वह स्वयं इसका उत्तर किस गंभीरता से देता है—और क्या बाकी एशिया, जिसमें भारत भी शामिल है, इस बहस को अपनी नीतियों में जगह देता है।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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