광고환영

광고문의환영

दक्षिण कोरिया के स्थानीय चुनाव में नया प्रयोग: बहु-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र ने बढ़ाई राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, भारत के लिए

कोरिया के स्थानीय चुनाव से उठता बड़ा सवालदक्षिण कोरिया की स्थानीय राजनीति से इस सप्ताह एक ऐसी खबर आई है, जो पहली नजर में महज चुनावी आंकड़ों का मामला लग सकती है, लेकिन ध्यान से देखें तो यह लोकतंत्र की बनावट, प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता और चुनावी नियमों की ताकत पर गंभीर बहस छेड़ती है। कोरिया के जेनाम-ग्वांग्जू विशेष क्षेत्र में प्रांतीय स्तर के प्रतिनिधियों के चुनाव के लिए जिन चार निर्वाचन क्षेत्रों में पहली बार बहु-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र व्यवस्था, यानी एक ही सीट से एक से अधिक प्रतिनिधि चुनने का प्रयोग किया गया, वहां उम्मीदवारों के बीच प्रतिस्पर्धा औसतन 1.77 बनाम 1 रही। यह आंकड़ा उसी क्षेत्र के कुल औसत 1.6 बनाम 1 से ऊपर है।सुनने में यह अंतर बहुत बड़ा नहीं लगता, लेकिन चुनावी राजनीति में कभी-कभी छोटे अंतर भी बड़े संकेत देते हैं। यहां मुद्दा सिर्फ इतना नहीं है कि कुछ सीटों पर अधिक उम्मीदवार उतरे। असली सवाल यह है कि क्या चुनावी नियमों में बदलाव, उम्मीदवारों को मैदान में उतरने के लिए प्रेरित कर सकता है? क्या मतदाताओं के सामने अधिक विकल्प रखने से स्थानीय लोकतंत्र अधिक जीवंत बनता है? और क्या यह प्रयोग उन देशों के लिए भी महत्वपूर्ण है, जो स्थानीय निकायों और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता को बेहतर बनाने की कोशिश कर रहे हैं? भारत के संदर्भ में देखें तो यह बहस हमें पंचायत, नगर निकाय, जिला परिषद, और विधान परिषद जैसी संस्थाओं के ढांचे तक ले जाती है।कोरिया में स्थानीय चुनाव आमतौर पर हमारे यहां नगर निगम, नगर परिषद, जिला पंचायत या राज्य स्तरीय निकायों के चुनाव की तरह समझे जा सकते हैं, हालांकि वहां की संस्थागत संरचना और प्रशासनिक इकाइयों में अंतर है। फिर भी मूल प्रश्न एक जैसा है: जनता के सबसे नजदीक की राजनीति कैसी हो, उसमें कौन प्रवेश कर सके, और मतदाता के पास कितने तथा कैसे विकल्प हों? यही वजह है कि जेनाम-ग्वांग्जू के इस प्रयोग को केवल क्षेत्रीय खबर मानकर छोड़ देना जल्दबाजी होगी।भारतीय पाठकों के लिए इसे इस तरह समझना आसान होगा: मान लीजिए किसी नगर निगम वार्ड या जिला परिषद क्षेत्र में अब तक केवल एक प्रतिनिधि चुना जाता रहा हो, लेकिन अचानक वहां से दो या तीन प्रतिनिधि चुनने की व्यवस्था लागू कर दी जाए। इससे राजनीतिक दलों की रणनीति बदल सकती है, निर्दलीयों का आत्मविश्वास बढ़ सकता है, छोटे दलों को अवसर मिल सकता है, और मतदाता को केवल ‘कौन जीतेगा’ नहीं, बल्कि ‘किस तरह की टीम चुनी जाए’ जैसा सोचने का मौका भी मिल सकता है। दक्षिण कोरिया की इस खबर का सार यही है कि चुनावी गणित बदलते ही राजनीतिक व्यवहार का स्वर भी बदल सकता है।बहु-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र क्या है और यह इतना महत्वपूर्ण क्यों हैबहु-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र, जिसे अंग्रेजी में मल्टी-मेंबर डिस्ट्रिक्ट कहा जाता है, ऐसी व्यवस्था है जिसमें एक ही निर्वाचन क्षेत्र से एक से अधिक प्रतिनिधि चुने जाते हैं। इसके विपरीत, एकल-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र में मतदाता एक क्षेत्र से केवल एक प्रतिनिधि चुनते हैं। भारत की लोकसभा और अधिकांश विधानसभा सीटें इसी दूसरे मॉडल पर आधारित हैं। हालांकि भारत में राज्यसभा, विधान परिषदों, कुछ स्थानीय निकायों और अनुपातिक प्रतिनिधित्व की कुछ व्यवस्थाओं में अलग-अलग ढांचे देखने को मिलते हैं, लेकिन आम मतदाता के स्तर पर ‘एक क्षेत्र, एक प्रतिनिधि’ का विचार ज्यादा परिचित है।कोरिया में इस प्रयोग की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि यह केवल तकनीकी सुधार नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के डिजाइन में बदलाव है। जब एक सीट से कई लोग चुने जाने लगते हैं, तो चुनाव केवल जीत-हार का सीधा द्वंद्व नहीं रह जाता। इसमें दलों की टिकट वितरण रणनीति बदलती है। उन्हें यह सोचना पड़ता है कि क्या एक ही दल से कई उम्मीदवार उतारे जाएं? यदि हां, तो वे एक-दूसरे के वोट न काटें, इसके लिए कैसी सामाजिक, भौगोलिक या वैचारिक संतुलन साधा जाए? दूसरी ओर छोटे दल और वैकल्पिक राजनीतिक ताकतें भी सोचती हैं कि अब उनके लिए मैदान थोड़ा खुला है।भारतीय राजनीति में यह बात नई नहीं है कि चुनावी व्यवस्था ही राजनीतिक व्यवहार को आकार देती है। उदाहरण के लिए, पंचायतों और नगर निकायों में आरक्षण की व्यवस्था ने महिलाओं, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों की भागीदारी में बड़ा बदलाव किया। कई राज्यों में वार्ड परिसीमन, सीटों की आरक्षित-अनारक्षित श्रेणियां, और अध्यक्ष पद के रोटेशन ने स्थानीय राजनीति का पूरा चरित्र बदल दिया। इसी तरह कोरिया का यह प्रयोग हमें बताता है कि सीटों की संख्या और निर्वाचन क्षेत्र की बनावट केवल प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की दिशा तय करने वाला निर्णय है।यह भी ध्यान देने योग्य है कि प्रतिस्पर्धा दर, यानी प्रति सीट कितने उम्मीदवार, लोकतंत्र की गुणवत्ता का अंतिम पैमाना नहीं है। अधिक उम्मीदवार होना हमेशा बेहतर प्रतिनिधित्व का पर्याय नहीं होता। लेकिन यह पहला संकेत जरूर देता है कि क्या राजनीतिक व्यवस्था लोगों को भाग लेने के लिए आमंत्रित कर रही है या नहीं। जेनाम-ग्वांग्जू के चार प्रायोगिक क्षेत्रों में औसत से अधिक प्रतिस्पर्धा इसी शुरुआती संकेत के रूप में देखी जा रही है।आंकड़े क्या कहते हैं: 1.77 बनाम 1 का मतलब सिर्फ संख्या नहींकेंद्रीय चुनाव प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, जिन चार क्षेत्रों में बहु-सदस्यीय मॉडल को पायलट आधार पर लागू किया गया, वहां औसत प्रतिस्पर्धा 1.77 बनाम 1 रही। पूरे जेनाम-ग्वांग्जू विशेष क्षेत्र का औसत 1.6 बनाम 1 था। यह अंतर मामूली लग सकता है, लेकिन चुनाव विश्लेषण में संदर्भ बहुत मायने रखता है। यदि किसी नयी व्यवस्था के शुरुआती चरण में ही औसत से बेहतर प्रतिस्पर्धा दिखाई दे, तो यह माना जाता है कि उस व्यवस्था ने कम-से-कम उम्मीदवारों के व्यवहार को प्रभावित किया है।यहां यह समझना जरूरी है कि प्रतिस्पर्धा दर एक तरह से राजनीतिक ‘प्रवेश संकेतक’ भी होती है। अगर अधिक लोग चुनाव लड़ने का निर्णय लेते हैं, तो इसका मतलब हो सकता है कि उन्हें जीतने की संभावना नजर आ रही है, या कम-से-कम यह लग रहा है कि मैदान एकदम बंद नहीं है। एकल-सदस्यीय क्षेत्रों में अक्सर बड़ी पार्टियां और स्थापित चेहरे चुनाव को पहले से नियंत्रित कर लेते हैं। ऐसे में छोटे दलों या नए उम्मीदवारों को लगता है कि उनकी संभावना बहुत सीमित है। लेकिन जब एक से अधिक प्रतिनिधि चुने जाते हैं, तो सैद्धांतिक तौर पर चुनावी अवसरों का दायरा थोड़ा फैल सकता है।भारतीय उदाहरण लें तो कई बार नगर निकायों या छात्रसंघ चुनावों में देखा गया है कि जहां केवल एक पद होता है, वहां मुकाबला सिमट जाता है और रणनीतिक मतदान बढ़ जाता है। मतदाता भी ‘वोट खराब’ होने के डर से बड़े विकल्पों की ओर झुक जाते हैं। लेकिन जहां प्रतिनिधित्व की संरचना अधिक खुली हो, वहां वैचारिक, सामाजिक या स्थानीय मुद्दों के आधार पर अतिरिक्त उम्मीदवारों को जगह मिल सकती है। कोरिया के इन आंकड़ों को इसी दृष्टि से देखा जा रहा है।फिर भी सावधानी जरूरी है। केवल अधिक प्रतिस्पर्धा होने से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि प्रतिनिधित्व स्वतः बेहतर होगा। कई बार ज्यादा उम्मीदवार वोटों को बिखेर देते हैं, चुनावी भ्रम बढ़ता है, और दलों के भीतर खींचतान भी तेज हो जाती है। इसलिए यह खबर किसी चमत्कार की घोषणा नहीं, बल्कि लोकतंत्र के एक रोचक प्रयोग का प्रारंभिक संकेत है। राजनीति में यह वही क्षण है जब आंकड़े कहते हैं: कुछ बदला है, अब देखना यह है कि परिणाम किस दिशा में जाते हैं।नमगु-1 का उदाहरण: जहां तीन सीटों पर चार उम्मीदवार उतरेइस पूरे चुनावी प्रयोग में सबसे दिलचस्प उदाहरण नमगु-1 निर्वाचन क्षेत्र का है। यहां तीन प्रतिनिधि चुने जाने हैं और मैदान में चार उम्मीदवार उतरे हैं। इनमें डेमोक्रेटिक पार्टी के तीन उम्मीदवार—नो सो-यॉन्ग, कांग वोन-हो और इम मी-रान—शामिल हैं, जबकि जिनबो पार्टी की किम हे-रान भी चुनावी मैदान में हैं। इस एक उदाहरण से ही बहु-सदस्यीय मॉडल की जटिलता और संभावना दोनों समझी जा सकती हैं।पहला पहलू यह है कि एक ही दल ने कई उम्मीदवार उतारे हैं। भारतीय पाठक इसे इस तरह समझ सकते हैं जैसे किसी शहरी निकाय के बड़े वार्ड में एक ही पार्टी अलग-अलग सामाजिक आधारों या इलाकाई प्रभाव वाले कई चेहरों को सामने लाए, ताकि वह अधिक व्यापक प्रतिनिधित्व का दावा कर सके। इससे पार्टी के भीतर आंतरिक प्रतिस्पर्धा भी पैदा होती है। यानी उम्मीदवार केवल विरोधी दल से नहीं, बल्कि अपने ही दल के दूसरे चेहरे से भी तुलना में होते हैं। उन्हें मतदाताओं से यह कहना पड़ता है कि पार्टी एक है, लेकिन मेरी उपयोगिता अलग है।दूसरा पहलू यह है कि यहां प्रतिस्पर्धा दर 1.3 बनाम 1 है, जो प्रयोग वाले चार क्षेत्रों में सबसे कम बताई गई। सतही तौर पर देखें तो यह कम उत्साह जैसा लग सकता है, लेकिन मामला इतना सीधा नहीं। तीन सीटों पर चार उम्मीदवार होने का मतलब यह नहीं कि चुनाव हल्का है; इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि राजनीतिक दल बहुत सोच-समझकर उम्मीदवार उतार रहे हैं ताकि अतिप्रतिस्पर्धा से अपने ही वोट न बिखर जाएं। भारतीय चुनावों में भी अक्सर टिकट वितरण इसी गणित पर होता है—जितना विस्तार, उतना संतुलन।यह उदाहरण हमें एक और बात समझाता है: बहु-सदस्यीय प्रणाली में प्रतिस्पर्धा का अर्थ केवल ज्यादा संख्या नहीं, बल्कि गठजोड़, पार्टी अनुशासन, सामाजिक प्रतिनिधित्व और स्थानीय समीकरणों का नया संतुलन है। यदि एक पार्टी कई उम्मीदवार उतारती है, तो उसे यह देखना होता है कि महिला प्रतिनिधित्व, आयु-वर्ग, पेशेवर पृष्ठभूमि और स्थानीय नेटवर्क जैसी बातें किस तरह वोट में बदलेंगी। भारत में भी जब नगर निगमों या जिला परिषदों में किसी पार्टी को कई वार्डों में अपनी समग्र छवि बनानी होती है, तो वह यही संतुलन साधती है। कोरिया का यह उदाहरण उसी प्रक्रिया का अधिक संकेंद्रित रूप है।यह खबर महत्वपूर्ण क्यों है: चुनावी नियम भी बनते हैं बड़ी राजनीतिक खबरहम अक्सर राजनीति को चेहरों, नारों और दल-बदल के चश्मे से देखते हैं। लेकिन कई बार सबसे अहम खबर किसी नेता के बयान में नहीं, बल्कि चुनाव के नियमों में छिपी होती है। दक्षिण कोरिया की यह खबर इसलिए बड़ी है क्योंकि यहां असली पात्र कोई एक उम्मीदवार नहीं, बल्कि स्वयं चुनावी व्यवस्था है। यह हमें याद दिलाती है कि लोकतंत्र केवल वोट डालने का नाम नहीं; यह इस बात का भी नाम है कि वोट किस ढांचे में डाला जा रहा है।‘देश में पहली बार’ जैसे शब्द अक्सर समाचारों में आकर्षण बढ़ाने के लिए इस्तेमाल होते हैं, लेकिन यहां उनका वास्तविक महत्व है। चुनावी प्रणाली का पहला प्रयोग राजनीतिक दलों के लिए संकेत देता है कि भविष्य का खेल कैसा हो सकता है। यदि यह मॉडल सफल माना गया, तो अन्य क्षेत्रों में भी इसकी चर्चा बढ़ सकती है। यदि इससे प्रतिनिधित्व बेहतर होता दिखा, तो सुधार की मांग मजबूत हो सकती है। और यदि इससे नए प्रकार की दिक्कतें पैदा हुईं, तो आलोचक कहेंगे कि पुरानी व्यवस्था ही बेहतर थी।भारतीय लोकतंत्र में भी ऐसी बहसें लगातार चलती रही हैं। क्या हमें लोकसभा-विधानसभा चुनावों में वर्तमान ‘फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट’ मॉडल पर पुनर्विचार करना चाहिए? क्या शहरी निकायों में अधिक मिश्रित मॉडल लाए जा सकते हैं? क्या महिलाओं के लिए आरक्षण केवल संख्या का प्रश्न है या चुनावी ढांचे का भी? क्या स्थानीय शासन में बड़ी आबादी वाले वार्डों के प्रतिनिधित्व का तरीका बदला जाना चाहिए? कोरिया की इस घटना से यह तो स्पष्ट होता है कि चुनावी प्रणाली में सूक्ष्म बदलाव भी राजनीतिक ऊर्जा को प्रभावित कर सकते हैं।यही कारण है कि यह समाचार किसी दूर देश की प्रशासनिक सूचना भर नहीं है। यह लोकतंत्र की उस प्रयोगशाला की खबर है जहां नियम बदलते ही व्यवहार बदलने लगा। और लोकतंत्र में व्यवहार का बदलना ही असली कथा है।दूसरे कोरियाई क्षेत्रों से तुलना: जहां कहीं मुकाबला नहीं, कहीं प्रतिनिधित्व पर सवालजेनाम-ग्वांग्जू के प्रयोग को समझने के लिए कोरिया के अन्य क्षेत्रों की समानांतर खबरें भी महत्वपूर्ण हैं। उदाहरण के तौर पर, इसी चुनावी परिदृश्य में कुछ इलाकों से ऐसी खबरें सामने आईं जहां उम्मीदवारों की संख्या सीटों के बराबर रही और मुकाबला बिना मतदान के लगभग तय हो गया। यानी चुनाव नाम का लोकतांत्रिक उत्सव वहां औपचारिकता बनकर रह गया। इस तरह की स्थिति भारत के कई स्थानीय चुनावों में भी देखी जाती है, जब निर्विरोध निर्वाचन हो जाता है। कभी यह सामाजिक सहमति का परिणाम होता है, तो कभी यह राजनीतिक असंतुलन या विपक्ष की कमजोरी का संकेत।दूसरी ओर, कुछ क्षेत्रों में महिला उम्मीदवारों की कमी भी चर्चा का विषय बनी। यह समस्या केवल कोरिया की नहीं, भारत की भी है। पंचायतों और नगर निकायों में आरक्षण के कारण भारत में महिलाओं की उपस्थिति बढ़ी है, लेकिन राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में अब भी निर्णायक हिस्सेदारी सीमित है। ऐसे में जब हम कोरिया के इस बहु-सदस्यीय प्रयोग को देखते हैं, तो सवाल यह भी उठता है कि क्या ऐसी व्यवस्थाएं महिलाओं, युवा चेहरों, छोटे दलों और स्थानीय मुद्दों से जुड़े उम्मीदवारों के लिए अधिक जगह बना सकती हैं?यहां एक महत्वपूर्ण बात समझनी चाहिए: प्रतिस्पर्धा और प्रतिनिधित्व एक ही चीज नहीं हैं, लेकिन दोनों का संबंध है। यदि चुनावी संरचना ही ऐसी हो कि मैदान में आने का अवसर सीमित हो, तो प्रतिनिधित्व भी संकुचित रहता है। यदि ढांचा थोड़ा खुला हो, तो विविधता के लिए अवसर बनते हैं। यह जरूरी नहीं कि हर बार परिणाम आदर्श हों, मगर संभावना अवश्य पैदा होती है। जेनाम-ग्वांग्जू का प्रयोग इसी संभावना के द्वार खुलने की तरह देखा जा सकता है।भारत में भी जब हम स्थानीय निकायों के चुनावों को देखते हैं, तो अक्सर पता चलता है कि नियमों की बारीकी परिणामों की दिशा तय करती है। वार्डों का आकार, आरक्षण का रोटेशन, सीधे या अप्रत्यक्ष चुनाव का तरीका, मेयर या अध्यक्ष की शक्तियां, और दलगत चुनाव की अनुमति—ये सभी मिलकर तय करते हैं कि राजनीतिक भागीदारी कितनी व्यापक होगी। कोरिया के इस प्रयोग में भी कहानी उम्मीदवारों से उतनी नहीं, जितनी नियमों से बन रही है।भारत के लिए सबक: क्या स्थानीय लोकतंत्र की नई कल्पना संभव हैभारतीय पाठकों के लिए इस पूरी घटना का सबसे बड़ा महत्व यही है कि यह हमें अपने लोकतंत्र के निचले पायदान पर झांकने का अवसर देती है। हम अक्सर राष्ट्रीय चुनावों की विराटता में खो जाते हैं—प्रधानमंत्री कौन बनेगा, कौन-सी पार्टी कितनी सीटें जीतेगी, कौन-सा राज्य किस ओर झुकेगा। लेकिन किसी भी लोकतंत्र की असली गुणवत्ता वहां दिखती है जहां नागरिक सत्ता से सबसे नजदीक संपर्क में होता है: वार्ड, पंचायत, नगर परिषद, जिला परिषद, महानगरपालिका।यदि दक्षिण कोरिया जैसे परिपक्व लोकतंत्र में स्थानीय चुनावों की संरचना पर प्रयोग हो रहा है और उससे उम्मीदवारों के व्यवहार में फर्क दिखाई दे रहा है, तो भारत में भी यह बहस सार्थक हो सकती है कि क्या कुछ स्तरों पर प्रतिनिधित्व के ढांचे को और अधिक समावेशी, प्रतिस्पर्धी या संतुलित बनाया जा सकता है। यहां यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि किसी दूसरे देश का मॉडल हूबहू अपनाना न व्यावहारिक है, न जरूरी। भारत की सामाजिक विविधता, जनसंख्या का पैमाना, भाषाई बहुलता और संघीय ढांचा अलग है। लेकिन सिद्धांत समान है: चुनावी नियम तटस्थ नहीं होते; वे राजनीति को गढ़ते हैं।उदाहरण के लिए, शहरी भारत में तेजी से बढ़ती आबादी के बीच वार्ड प्रतिनिधित्व की प्रभावशीलता पर लंबे समय से प्रश्न उठते रहे हैं। क्या एक प्रतिनिधि विशाल शहरी वार्ड की जटिल जरूरतों को ठीक से संभाल पाता है? क्या बहु-सदस्यीय मॉडल कुछ महानगरीय इलाकों में बेहतर उत्तर दे सकता है? क्या इससे अल्पप्रतिनिधित्व वाले समूहों को अतिरिक्त अवसर मिल सकते हैं? या इससे जवाबदेही उलझ जाएगी, क्योंकि मतदाता समझ नहीं पाएंगे कि जिम्मेदार कौन है? ये प्रश्न आसान नहीं हैं, पर कोरिया की खबर इन्हें फिर से प्रासंगिक बनाती है।राजनीति विज्ञान की भाषा में कहें तो यह प्रतिस्पर्धा बनाम स्थिरता, और प्रतिनिधित्व बनाम जवाबदेही का संतुलन है। एकल-सदस्यीय मॉडल में जवाबदेही स्पष्ट रहती है—क्षेत्र का एक प्रतिनिधि है, उसी से सवाल पूछिए। बहु-सदस्यीय मॉडल में प्रतिनिधित्व अधिक व्यापक हो सकता है, लेकिन जिम्मेदारी बंट सकती है। इसीलिए ऐसे प्रयोगों का मूल्यांकन केवल आंकड़ों से नहीं, बल्कि दीर्घकालिक परिणामों से किया जाता है। फिलहाल दक्षिण कोरिया ने यह दिखाया है कि नियम बदलिए, तो प्रतिक्रिया तुरंत मिलती है।निष्कर्ष: लोकतंत्र की जान सिर्फ मतदान में नहीं, उसकी संरचना में भी हैजेनाम-ग्वांग्जू के चार प्रायोगिक निर्वाचन क्षेत्रों से आया 1.77 बनाम 1 का आंकड़ा पहली नजर में सूखा चुनावी डेटा लग सकता है, लेकिन इसके भीतर लोकतंत्र का एक गहरा संदेश छिपा है। यह संदेश है कि चुनावी व्यवस्था का डिजाइन उम्मीदवारों की संख्या, दलों की रणनीति, मतदाताओं के विकल्प और अंततः राजनीतिक संस्कृति तक को प्रभावित कर सकता है। अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि दक्षिण कोरिया का यह प्रयोग दीर्घकाल में प्रतिनिधित्व को बेहतर करेगा या नहीं। यह भी कहना जल्दबाजी होगी कि औसत से अधिक प्रतिस्पर्धा का अर्थ स्वतः अधिक स्वस्थ लोकतंत्र है।लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि यह प्रयोग निष्क्रिय नहीं रहा। उसने राजनीतिक व्यवस्था में तत्काल हलचल पैदा की। उसने यह संकेत दिया कि जब एक क्षेत्र से एक से अधिक प्रतिनिधि चुनने की संभावना बनती है, तो कई दलों और उम्मीदवारों के लिए अवसर की खिड़की खुलती है। उसने यह भी दिखाया कि स्थानीय चुनावों को कमतर आंकना भूल होगी, क्योंकि संस्थागत सुधार की सबसे दिलचस्प शुरुआत अक्सर वहीं से होती है।भारतीय परिप्रेक्ष्य में इस खबर का महत्व और बढ़ जाता है। हमारा लोकतंत्र विशाल है, पर उसकी जीवंतता स्थानीय स्तर की भागीदारी पर निर्भर करती है। यदि हम सचमुच अधिक प्रतिनिधिक, अधिक सहभागी और अधिक उत्तरदायी स्थानीय शासन चाहते हैं, तो हमें केवल नेताओं को नहीं, नियमों को भी देखना होगा। दक्षिण कोरिया के इस चुनावी प्रयोग ने यही याद दिलाया है कि लोकतंत्र के पहिए केवल मतपत्र से नहीं घूमते; वे उन महीन व्यवस्थाओं से भी चलते हैं जिन्हें अक्सर आम समाचारों में पर्याप्त जगह नहीं मिलती।इसलिए जेनाम-ग्वांग्जू की यह कहानी सिर्फ कोरिया की कहानी नहीं है। यह उन सभी लोकतंत्रों की कहानी है जो यह समझना चाहते हैं कि नागरिक भागीदारी कैसे बढ़े, विकल्प कैसे विस्तृत हों और राजनीति का दरवाजा कुछ और लोगों के लिए कैसे खुले। यदि इस प्रयोग से आगे चलकर बेहतर प्रतिनिधित्व, अधिक विविधता और स्थानीय शासन में व्यापक भागीदारी निकलती है, तो यह कोरिया के लिए उपलब्धि होगी। और यदि नहीं भी, तो कम-से-कम उसने यह साबित कर दिया है कि लोकतंत्र में सुधार की बहस चुनावी नारों से नहीं, संस्थागत साहस से आगे बढ़ती है।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ