
सिर्फ सालगिरह नहीं, कूटनीति की भाषा में दिया गया एक संकेत
दक्षिण कोरिया और फ्रांस के राजनयिक संबंधों के 140 वर्ष पूरे होने पर सियोल के ऐतिहासिक देओक्सुगुंग महल के सियोकजोजोन भवन में आयोजित समारोह को अगर केवल एक औपचारिक स्मृति-आयोजन मान लिया जाए, तो यह उसके वास्तविक महत्व को कम करके देखने जैसा होगा। यह कार्यक्रम अपने स्वरूप में भले ही एक वर्षगांठ समारोह था, लेकिन उसके भीतर आज की अंतरराष्ट्रीय राजनीति की एक गहरी परत मौजूद थी—वह परत, जिसमें देश अपने पुराने रिश्तों को सिर्फ इतिहास की किताबों में नहीं, बल्कि वर्तमान साझेदारी की भाषा में फिर से परिभाषित करते हैं। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्योंग की पत्नी किम हे-क्योंग की मौजूदगी और उनके वक्तव्य ने इसी संदेश को केंद्र में रखा।
भारतीय पाठकों के लिए इसे समझने का सबसे आसान तरीका यह है कि जैसे भारत अपने अनेक पुराने द्विपक्षीय संबंधों—मान लीजिए फ्रांस, रूस, जापान या मॉरिशस के साथ—सिर्फ कूटनीतिक दस्तावेजों के आधार पर नहीं, बल्कि सभ्यता, संस्कृति, शिक्षा, व्यापार और जन-से-जन संपर्क के सहारे आगे बढ़ाता है, उसी तरह सियोल भी अपने यूरोपीय साझेदारों के साथ रिश्तों को बहुआयामी बनाकर पेश कर रहा है। 140 साल का आंकड़ा अपने आप में महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या इतना पुराना संबंध आज भी जीवित, प्रासंगिक और उपयोगी है? इस समारोह का उत्तर साफ था—हाँ, और शायद पहले से भी अधिक।
योनहाप की रिपोर्ट के अनुसार, इस आयोजन में केवल स्मृति नहीं थी, बल्कि समकालीन कूटनीतिक संदेश भी था। किम हे-क्योंग ने अपने संबोधन में इस बात पर जोर दिया कि 140 वर्ष पहले दोनों देशों ने भाषा, संस्कृति और भौगोलिक दूरी की सीमाओं को पार कर एक-दूसरे के लिए ‘दिल के दरवाजे’ खोले थे। यह वाक्य सुनने में काव्यात्मक लग सकता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय संबंधों की दुनिया में ऐसे शब्द अक्सर ठोस राजनीतिक अर्थ लेकर आते हैं। यह बताने का एक तरीका है कि रिश्ते सिर्फ सरकारी फाइलों से नहीं चलते; वे विश्वास, आदत, सांस्कृतिक जिज्ञासा और साझा सम्मान से टिकते हैं।
आज जब दुनिया में कूटनीति केवल सुरक्षा समझौतों, व्यापार वार्ताओं या रणनीतिक गठबंधनों तक सीमित नहीं रह गई है, तब ऐसे आयोजन देशों को अपनी छवि गढ़ने और साझेदारों को संकेत देने का अवसर देते हैं। दक्षिण कोरिया ने इस मौके पर फ्रांस के साथ अपने संबंधों को सिर्फ अतीत की विरासत नहीं, बल्कि वर्तमान सहयोग और भविष्य की संभावनाओं से जोड़ा। यही इस पूरे कार्यक्रम का केंद्रीय अर्थ है।
किम हे-क्योंग के बयान में छिपा व्यापक राजनीतिक संदेश
किम हे-क्योंग का वक्तव्य इस आयोजन का सबसे ध्यान देने योग्य हिस्सा था। उन्होंने कहा कि विश्वास और मित्रता के आधार पर दोनों देशों ने जो साझा समझ विकसित की है, वह दिन-ब-दिन और गहरी होती गई है, और अब दोनों देश रोजमर्रा के आदान-प्रदान के माध्यम से एक-दूसरे को समझने वाले ‘करीबी भागीदार’ बन चुके हैं। कूटनीति में ‘करीबी भागीदार’ जैसी अभिव्यक्ति हल्की नहीं होती। यह कोई साधारण शिष्टाचार वाक्य नहीं, बल्कि संबंधों की गुणवत्ता का संकेतक है। इसका अर्थ यह है कि दोनों देशों के बीच संपर्क केवल अवसरवादी या मौसमी नहीं, बल्कि संरचनात्मक और स्थिर है।
भारतीय संदर्भ में देखें तो हम अक्सर विदेश नीति की चर्चा में ‘रणनीतिक साझेदारी’, ‘विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त साझेदारी’, ‘व्यापक आर्थिक सहयोग’ जैसे शब्द सुनते हैं। इन शब्दों का चयन आकस्मिक नहीं होता। हर अभिव्यक्ति एक तय संदेश देती है। दक्षिण कोरिया की ओर से फ्रांस के लिए इस्तेमाल की गई भाषा यही दर्शाती है कि सियोल यूरोप के भीतर फ्रांस को एक ऐसे देश के रूप में देखता है, जिसके साथ उसका संबंध औपचारिकता से आगे बढ़ चुका है।
यह भी महत्वपूर्ण है कि यह संदेश किसी तीखी घरेलू राजनीतिक बहस, चुनावी ध्रुवीकरण या सुरक्षा संकट के बीच नहीं दिया गया, बल्कि एक सांस्कृतिक-राजनयिक मंच पर सामने आया। इससे संकेत मिलता है कि दक्षिण कोरिया अपने रिश्तों को केवल रक्षा या तकनीक के फ्रेम में नहीं बांधना चाहता। वह यह दिखाना चाहता है कि उसकी विदेश नीति में भावना, प्रतीक और जन-संपर्क भी जगह रखते हैं। भारत में भी यह समझ अब और मजबूत हुई है कि प्रवासी भारतीय, योग, सिनेमा, भोजन, शिक्षा और डिजिटल सहयोग विदेश नीति के नरम लेकिन प्रभावी औजार हैं। कोरिया भी कुछ हद तक इसी राह पर दिखाई देता है, जहाँ के-पॉप, कोरियाई धारावाहिक, सौंदर्य उद्योग और तकनीकी आधुनिकता मिलकर एक राष्ट्रीय छवि बनाते हैं।
किम हे-क्योंग का ‘दिल के दरवाजे खोलने’ वाला कथन दो स्तरों पर पढ़ा जाना चाहिए। पहला, यह अतीत को रोमांटिक रूप में याद करता है, जिससे संबंधों का नैतिक आधार मजबूत होता है। दूसरा, यह वर्तमान के लिए एक सॉफ्ट राजनीतिक दावा भी है—कि हमारे बीच संबंध सिर्फ राज्य से राज्य तक नहीं, बल्कि समाज से समाज तक फैल चुके हैं। जब कोई देश यह कहता है कि वह दूसरे देश को ‘समझता’ है और उसके साथ ‘सहानुभूति’ रखता है, तो उसका मतलब यह भी होता है कि वह दीर्घकालिक सहयोग के लिए मानसिक और राजनीतिक पूंजी तैयार कर चुका है।
जब संस्कृति बन जाती है विदेश नीति का प्रभावशाली औजार
समारोह का एक अत्यंत उल्लेखनीय पहलू यह था कि इसमें संस्कृति को कूटनीति के केंद्र में रखा गया। किम हे-क्योंग ने कहा कि फ्रांस के लोग कोरियाई सांस्कृतिक सामग्री और के-पॉप को पसंद करते हैं, जबकि कोरियाई नागरिक विक्टर ह्यूगो के साहित्य, मोने और रोदां की कला के माध्यम से फ्रांस की स्वतंत्रता और सृजनशीलता की भावना की सराहना करते हैं। यह कथन औपचारिक लग सकता है, लेकिन इसमें आज की वैश्विक राजनीति का एक बहुत बड़ा सच छिपा है—संस्कृति अब केवल मनोरंजन या प्रतिष्ठा का मामला नहीं, बल्कि राजनयिक भरोसे का साधन भी है।
भारतीय पाठकों के लिए यह बिल्कुल नया विचार नहीं है। भारत ने दशकों से देखा है कि बॉलीवुड, भारतीय भोजन, योग, आयुर्वेद, शास्त्रीय संगीत और अब डिजिटल स्टार्टअप छवि—ये सभी मिलकर विदेशों में भारत की स्वीकार्यता बढ़ाते हैं। जिस तरह एक समय राज कपूर सोवियत संघ में भारत की लोकप्रिय सांस्कृतिक पहचान बन गए थे, या आज शाहरुख खान से लेकर ए. आर. रहमान तक वैश्विक पहचान का हिस्सा हैं, उसी तरह दक्षिण कोरिया के लिए के-पॉप और के-ड्रामा सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि वैश्विक पहुंच के वाहक हैं। BTS, BLACKPINK, Parasite, Squid Game या कोरियाई ब्यूटी ट्रेंड्स ने दुनिया के अलग-अलग समाजों में कोरिया के प्रति जिज्ञासा और अपनापन पैदा किया है।
फ्रांस की सांस्कृतिक स्थिति भी दुनिया में असाधारण है। साहित्य, दर्शन, चित्रकला, फैशन, संग्रहालय संस्कृति और ‘स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व’ की राजनीतिक विरासत—ये सब फ्रांस की पहचान का हिस्सा हैं। जब दक्षिण कोरिया फ्रांस को केवल एक यूरोपीय शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि ‘स्वतंत्रता और सृजन’ की भावना के वाहक के रूप में याद करता है, तब वह संबंध को मूल्यों के स्तर पर ले जाता है। यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि मूल्य-आधारित भाषा संबंधों को मात्र लेन-देन से ऊपर उठाती है।
यहां एक और बात समझना जरूरी है। किसी भी सांस्कृतिक संबंध की सफलता तब अधिक होती है जब वह एकतरफा न लगे। यदि केवल फ्रांस कोरिया को देख रहा होता, या केवल कोरिया फ्रांस की कला से प्रेरित होता, तो तस्वीर अधूरी रहती। इस समारोह में जो बात उभरकर आई, वह पारस्परिकता थी—दोनों समाज एक-दूसरे की सांस्कृतिक आत्मा को पहचानने का दावा कर रहे हैं। यही पारस्परिकता टिकाऊ कूटनीतिक संबंधों के लिए जरूरी है।
भारत में कोरियाई संस्कृति की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए यह पहलू हमारे लिए भी दिलचस्प है। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे और यहां तक कि पूर्वोत्तर भारत के कई हिस्सों में के-पॉप फैन समुदाय तेजी से बढ़े हैं। कॉलेज कैंपसों में कोरियन भाषा सीखने का चलन, कोरियन स्किनकेयर का बाजार, और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर कोरियन कंटेंट की भारी खपत यह दिखाती है कि संस्कृति आज सीमा पार प्रभाव का वास्तविक माध्यम है। इसलिए सियोल में हुए इस समारोह को भारत के पाठक केवल कोरिया-फ्रांस घटना के रूप में न देखें; यह उस वैश्विक बदलाव का भी उदाहरण है, जिसमें सॉफ्ट पावर कठोर शक्ति जितनी ही महत्वपूर्ण होती जा रही है।
देओक्सुगुंग से निकला संदेश: इतिहास की पृष्ठभूमि, वर्तमान की राजनीति
जिस स्थान पर यह आयोजन हुआ, उसका भी महत्व कम नहीं है। देओक्सुगुंग, सियोल का एक ऐतिहासिक महल परिसर है, और उसका सियोकजोजोन भवन विशेष रूप से उस दौर की याद दिलाता है जब कोरिया आधुनिकता, साम्राज्यवादी दबाव और बाहरी दुनिया से संपर्क के जटिल रास्तों से गुजर रहा था। किसी भी देश में ऐतिहासिक इमारतें केवल पत्थर नहीं होतीं; वे स्मृति, वैधता और राष्ट्रीय कथा की वाहक होती हैं। भारत में यदि राष्ट्रपति भवन, हैदराबाद हाउस, सांची, लाल किला या जयपुर के किसी शाही परिसर में विदेशी गणमान्य व्यक्तियों के लिए विशेष आयोजन हो, तो वह सिर्फ लोकेशन का चुनाव नहीं होता—वह संदेश होता है।
दक्षिण कोरिया ने 140वीं वर्षगांठ के अवसर पर इस ऐतिहासिक स्थल को चुनकर यह संकेत दिया कि वह अपने अतीत को वर्तमान की साझेदारी से जोड़ना चाहता है। इसका मतलब यह नहीं कि कार्यक्रम अतीत में अटका हुआ था। बल्कि इसके उलट, इतिहास को एक मंच की तरह इस्तेमाल कर समकालीन रिश्ते की व्याख्या की गई। यही परिपक्व कूटनीति की पहचान है—वह स्मृति का उपयोग nostalgia के लिए नहीं, बल्कि वर्तमान की विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए करती है।
यह भारतीय अनुभव से भी मेल खाता है। भारत अपनी सभ्यतागत विरासत को अक्सर आधुनिक कूटनीति के साथ जोड़ता है—चाहे वह G20 के दौरान सांस्कृतिक प्रस्तुति हो, वाराणसी या साबरमती से जुड़े कार्यक्रम हों, या फिर बौद्ध विरासत के जरिए पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों से संपर्क। दक्षिण कोरिया का यह आयोजन भी इसी तरह इतिहास और वर्तमान के संगम की एक सधी हुई मिसाल के रूप में देखा जा सकता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का एक और महत्व है। जब दो देश 140 वर्ष पुराने राजनयिक संबंधों का जश्न मनाते हैं, तब वे यह भी संकेत देते हैं कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में उतार-चढ़ाव के बावजूद उनका संवाद बना रहा है। फ्रांस ने यूरोप और विश्व राजनीति में अनेक बदलाव देखे; कोरिया ने उपनिवेशवाद, युद्ध, विभाजन, सैन्य शासन, लोकतंत्रीकरण और तकनीकी विकास का दौर पार किया। इतने बड़े ऐतिहासिक परिवर्तनों के बीच यदि संबंध टिके रहे, तो वह आज के साझेदारी मॉडल को अतिरिक्त विश्वसनीयता देता है।
कौन मौजूद था, यही बताता है कि समारोह महज औपचारिक नहीं था
इस कार्यक्रम में लगभग 80 लोगों की उपस्थिति दर्ज की गई, जिनमें सरकारी प्रतिनिधि, दक्षिण कोरिया में फ्रांस के राजदूत फिलिप बर्तू, यूरोपीय संघ और G7 सदस्य देशों के राजनयिक, तथा कोरिया-फ्रांस से जुड़े प्रमुख कारोबारी प्रतिनिधि शामिल थे। यही वह बिंदु है जहां यह आयोजन साधारण स्मृति समारोह की सीमा से बाहर निकलता है। अगर केवल सांस्कृतिक हस्तियां होतीं, तो इसे सांस्कृतिक मित्रता का आयोजन कहा जा सकता था। अगर केवल अधिकारी होते, तो यह पारंपरिक राजनयिक औपचारिकता मान ली जाती। लेकिन जब सरकार, कूटनीतिक समुदाय और उद्योग जगत एक साथ उपस्थित हों, तो स्पष्ट हो जाता है कि यहां प्रतीक और व्यवहारिकता एक-दूसरे से जुड़ रहे हैं।
भारत में भी हम यह बात अच्छी तरह समझते हैं कि विदेश नीति अब केवल विदेश मंत्रालय की चारदीवारी के भीतर तय नहीं होती। व्यापारिक घराने, प्रौद्योगिकी कंपनियां, सांस्कृतिक संस्थान, शैक्षणिक सहयोग, प्रवासी समुदाय और मीडिया—ये सब मिलकर किसी भी द्विपक्षीय संबंध का वास्तविक ढांचा बनाते हैं। दक्षिण कोरिया और फ्रांस के बीच भी यही तस्वीर उभरती है। फ्रांस यूरोप की एक प्रमुख अर्थव्यवस्था, सैन्य शक्ति, तकनीकी क्षमता और सांस्कृतिक प्रभाव वाला देश है। वहीं दक्षिण कोरिया एशिया की अग्रणी तकनीकी और औद्योगिक शक्तियों में गिना जाता है। ऐसे में दोनों देशों का संबंध केवल शिष्टाचार तक सीमित रह ही नहीं सकता।
उद्योग जगत की मौजूदगी से यह भी संकेत मिलता है कि सांस्कृतिक निकटता आर्थिक सहयोग के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करती है। जब देशों के समाज एक-दूसरे के बारे में सकारात्मक धारणाएं रखते हैं, तो व्यापार, पर्यटन, शिक्षा, स्टार्टअप, डिजाइन, लक्जरी बाजार, हरित प्रौद्योगिकी और रक्षा जैसे क्षेत्रों में संवाद अपेक्षाकृत सहज हो सकता है। यही कारण है कि आज दुनिया के कई देशों में ‘क्रिएटिव इंडस्ट्री’ को केवल सांस्कृतिक क्षेत्र नहीं, बल्कि रणनीतिक आर्थिक क्षेत्र की तरह देखा जाने लगा है।
फ्रांस और दक्षिण कोरिया के संदर्भ में यह और दिलचस्प हो जाता है क्योंकि दोनों देश अपने-अपने क्षेत्र में ब्रांड वैल्यू रखते हैं—फ्रांस फैशन, कला, एयरोस्पेस, लक्जरी और राजनीतिक विचारधारा के लिए; दक्षिण कोरिया इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, डिजिटल संस्कृति, मनोरंजन और नवाचार के लिए। ऐसे में यह समारोह हमें बताता है कि आधुनिक कूटनीति की असली चौड़ाई कितनी बढ़ चुकी है।
140 साल का अर्थ: क्या पुराना रिश्ता आज भी जीवित है?
किसी भी राजनयिक संबंध की वर्षगांठ में सबसे बड़ा जोखिम यही होता है कि वह आत्मप्रशंसा का मंच बनकर रह जाए। पुराने संबंधों का महिमामंडन करना आसान है; यह दिखाना कठिन है कि वे आज भी वास्तविक महत्व रखते हैं। दक्षिण कोरिया-फ्रांस समारोह की सबसे बड़ी सफलता यही रही कि उसने अतीत की लंबाई से अधिक वर्तमान की जीवंतता पर जोर दिया। किम हे-क्योंग के भाषण में ‘विश्वास’, ‘मित्रता’, ‘समझ’, ‘सहानुभूति’ और ‘करीबी भागीदारी’ जैसे शब्द बार-बार उभरे। कूटनीति की भाषा में ये शब्द संबंधों की स्थिरता, पूर्वानुमेयता और राजनीतिक सहजता को दर्शाते हैं।
आज दुनिया का माहौल अनिश्चितताओं से भरा है—यूरोप में सुरक्षा चिंताएं, इंडो-पैसिफिक में प्रतिस्पर्धा, आपूर्ति श्रृंखलाओं की राजनीति, तकनीकी निर्भरता, और घरेलू राजनीति का बाहरी संबंधों पर बढ़ता असर। ऐसे समय में कोई भी देश उन साझेदारियों को विशेष महत्व देता है जो लंबे समय से भरोसे पर बनी हों। दक्षिण कोरिया का यह संकेत कि फ्रांस के साथ संबंध एक ‘वर्तमानकालीन साझेदारी’ हैं, यह दर्शाता है कि सियोल यूरोप के साथ अपने रिश्तों को केवल प्रतीकात्मक संपर्क नहीं, बल्कि टिकाऊ नेटवर्क के रूप में देखता है।
भारत के लिए भी यह एक उपयोगी अवलोकन है। नई दिल्ली ने हाल के वर्षों में फ्रांस के साथ रक्षा, समुद्री सुरक्षा, अंतरिक्ष, ऊर्जा और हिंद-प्रशांत सहयोग में गहराई बढ़ाई है। दक्षिण कोरिया भी भारत के लिए एक महत्वपूर्ण आर्थिक और तकनीकी साझेदार है। ऐसे में भारत के पाठक इस खबर को व्यापक एशिया-यूरोप संबंधों के परिप्रेक्ष्य में भी देख सकते हैं। यह दिखाता है कि 21वीं सदी की कूटनीति में देशों को केवल सैन्य या आर्थिक आंकड़ों से नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक ग्रहणशीलता और वैचारिक आत्म-प्रस्तुति से भी आंका जाता है।
यहां ‘वर्तमानकाल’ की अवधारणा खास है। पुराने राजनयिक संबंध कई देशों के बीच हैं, लेकिन सब आज प्रभावी नहीं हैं। किसी संबंध को वर्तमानकाल में जीवित बनाए रखने के लिए निरंतर संवाद, सांस्कृतिक पुल, शैक्षणिक संपर्क, संस्थागत तंत्र और सकारात्मक सार्वजनिक छवि की जरूरत होती है। दक्षिण कोरिया-फ्रांस समारोह का यही निचोड़ है—इतिहास सम्माननीय है, लेकिन संबंध की असली परीक्षा वर्तमान में होती है।
भारतीय नजरिए से इस पूरी घटना का मतलब क्या है?
भारत के हिंदी भाषी पाठकों के लिए यह खबर पहली नजर में दूर की कूटनीतिक घटना लग सकती है, लेकिन असल में इसके कई परिचित आयाम हैं। पहला, यह हमें याद दिलाती है कि संस्कृति आज अंतरराष्ट्रीय संबंधों की परिधि नहीं, बल्कि केंद्र का हिस्सा बन चुकी है। जिस तरह भारत अपनी सभ्यता, लोकतंत्र, भोजन, फिल्मों और डिजिटल क्षमताओं के जरिए दुनिया से संवाद करता है, उसी तरह कोरिया अपनी सांस्कृतिक ऊर्जा को विदेश नीति के साथ जोड़ रहा है।
दूसरा, यह घटना बताती है कि यूरोप के साथ संबंधों को केवल व्यापार या सुरक्षा के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। फ्रांस जैसे देश के साथ भावनात्मक और सांस्कृतिक सम्मान का रिश्ता भी उतना ही महत्वपूर्ण है। भारत ने भी फ्रांस के साथ अपने संबंधों में यह संतुलन बनाया है—राफेल या नौसैनिक सहयोग जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही सांस्कृतिक आदान-प्रदान, शिक्षा, संग्रहालय सहयोग, और जनता के बीच सकारात्मक छवि। दक्षिण कोरिया का मॉडल भी इस दिशा में समानता दिखाता है।
तीसरा, भारतीय युवाओं के लिए यह खबर खास मायने रखती है। के-पॉप और के-ड्रामा के प्रशंसकों की बढ़ती संख्या केवल मनोरंजन का रुझान नहीं, बल्कि एक बड़ी भू-सांस्कृतिक घटना है। जब किसी देश की संस्कृति आपके मोबाइल स्क्रीन, फैशन पसंद, भाषा सीखने की इच्छा, खानपान और सौंदर्य मानकों तक पहुंच जाती है, तो वह देश आपके मानस में स्थायी जगह बना लेता है। यही सॉफ्ट पावर का वास्तविक असर है। दक्षिण कोरिया समझ चुका है कि यह सांस्कृतिक पूंजी उसकी विदेश नीति को मजबूती देती है।
चौथा, यह समारोह हमें यह भी समझाता है कि ‘प्रतीक’ और ‘नीति’ को अलग-अलग डिब्बों में नहीं रखा जा सकता। अक्सर भारत में भी लोग पूछते हैं कि सांस्कृतिक कार्यक्रमों से क्या हासिल होता है। उत्तर यह है कि हर कूटनीतिक उपलब्धि किसी दस्तावेज से शुरू नहीं होती; कई बार वह भरोसे, आत्मीयता और अनौपचारिक संपर्क के वातावरण में जन्म लेती है। ऐसे आयोजन उस वातावरण को तैयार करते हैं।
अंततः, सियोल में हुआ यह कार्यक्रम एक परिपक्व संदेश देता है—कि दुनिया में प्रभावशाली वही देश होगा जो अपनी ताकत को कई भाषाओं में व्यक्त कर सके: अर्थव्यवस्था की भाषा में, सुरक्षा की भाषा में, तकनीक की भाषा में, और संस्कृति की भाषा में। दक्षिण कोरिया ने फ्रांस के साथ 140 वर्षों की अपनी दोस्ती के अवसर पर यही किया। उसने यह नहीं कहा कि हमारा रिश्ता केवल पुराना है; उसने यह दिखाने की कोशिश की कि यह रिश्ता आज भी जीवित है, सम्मानित है और भविष्य के लिए उपयोगी है।
भारतीय संदर्भ में यही सबसे बड़ी सीख है। विदेश नीति अब केवल राजधानियों के बीच नहीं चलती; वह लोगों की पसंद, सांस्कृतिक जिज्ञासा, शैक्षिक संपर्क, उद्योग की महत्वाकांक्षा और साझा मूल्यों के बीच भी चलती है। दक्षिण कोरिया और फ्रांस का यह आयोजन इसी बदलती दुनिया का एक सुस्पष्ट दृश्य है—जहां वर्षगांठें स्मृति से आगे बढ़कर रणनीतिक संकेत बन जाती हैं।
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