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दक्षिण कोरिया के छोटे शहर से उठी बड़ी मिसाल: 1 करोड़ वॉन की छात्रवृत्ति ने क्यों जगाई ‘अपने गांव के बच्चों’ में निवेश की

दक्षिण कोरिया के छोटे शहर से उठी बड़ी मिसाल: 1 करोड़ वॉन की छात्रवृत्ति ने क्यों जगाई ‘अपने गांव के बच्चों’ में निवेश की

एक शांत खबर, लेकिन दूरगामी अर्थ

दक्षिण कोरिया के दक्षिणी हिस्से में बसे ग्योंगसांगनाम-डो प्रांत के हापचॉन काउंटी से आई एक खबर पहली नजर में साधारण दान की सूचना लग सकती है, लेकिन इसके भीतर स्थानीय समाज, शिक्षा और सामाजिक जिम्मेदारी की एक गहरी कहानी छिपी है। हापचॉन काउंटी मानव संसाधन विकास फाउंडेशन को जिबोंग छात्रवृत्ति संस्था के अध्यक्ष पार्क पान-जे ने 1억 원, यानी लगभग 10 करोड़ कोरियाई वॉन नहीं बल्कि 100 मिलियन वॉन, भारतीय मुद्रा में मोटे तौर पर 60 से 65 लाख रुपये के आसपास की राशि, छात्रवृत्ति कोष के रूप में दान की है। राशि अपने आप में महत्वपूर्ण है, लेकिन असली खबर केवल रकम नहीं, बल्कि उसका अर्थ है। यह एक ऐसे व्यक्ति की वापसी की कहानी है जिसने अपने जन्मस्थान से निकलकर सार्वजनिक जीवन और शिक्षा जगत में पहचान बनाई और फिर अपनी जड़ों की ओर लौटकर कहा कि स्थानीय बच्चों के सपनों में निवेश सबसे टिकाऊ सामाजिक काम है।

भारतीय पाठकों के लिए इसे समझना कठिन नहीं होना चाहिए। हमारे यहां भी जब कोई पूर्व छात्र अपने सरकारी स्कूल में पुस्तकालय बनवाता है, कोई उद्योगपति अपने जिले में छात्रावास खुलवाता है, या कोई सेवानिवृत्त अधिकारी अपने गांव के मेधावी छात्रों के लिए कोष बनाता है, तो समाज उसे केवल दान नहीं मानता। वह एक प्रकार का नैतिक संदेश होता है कि सफलता का अंतिम पड़ाव केवल निजी समृद्धि नहीं, बल्कि सामुदायिक वापसी भी है। हापचॉन की यह घटना उसी तरह की है। कोरिया जैसे अत्यधिक प्रतिस्पर्धी और शिक्षा-केंद्रित समाज में, जहां राजधानी सियोल और बड़े शहरों की ओर युवाओं का पलायन लंबे समय से चिंता का विषय है, वहां किसी स्थानीय मूल के वरिष्ठ व्यक्ति का अपने इलाके के विद्यार्थियों के लिए निरंतर छात्रवृत्ति कार्य करना प्रतीकात्मक और व्यावहारिक, दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण बन जाता है।

यह भी याद रखने की जरूरत है कि कोरिया में स्थानीय इलाकों के लिए शिक्षा केवल व्यक्तिगत प्रगति का माध्यम नहीं, बल्कि क्षेत्रीय अस्तित्व का सवाल भी है। भारत में जैसे कई छोटे शहरों और जिलों को यह चिंता रहती है कि पढ़ाई के लिए निकली प्रतिभा फिर लौटती नहीं, वैसे ही दक्षिण कोरिया के कई प्रांतीय इलाकों में युवाओं का बड़े शहरों की ओर प्रवासन सामाजिक और आर्थिक असंतुलन का कारण बनता है। ऐसे में छात्रवृत्ति का अर्थ फीस भरना भर नहीं रह जाता, बल्कि यह संदेश देना भी होता है कि अपने इलाके के बच्चों का भविष्य सामूहिक जिम्मेदारी है।

पार्क पान-जे कौन हैं और उनका दान क्यों खास है

पार्क पान-जे हापचॉन काउंटी के डे-ब्योंग-म्योन क्षेत्र से आते हैं। उन्होंने कोरिया यूनिवर्सिटी के कॉमर्स कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की, और उसके बाद सार्वजनिक प्रशासन, सरकारी संस्थानों और शिक्षा क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया। वे पर्यावरण प्रशासन से जुड़े उच्च पदों पर रहे, कोरिया के सार्वजनिक खरीद तंत्र में उप-आयुक्त जैसी जिम्मेदारियां संभालीं, और बाद में एक अंतरराष्ट्रीय डिजाइन ग्रेजुएट स्कूल विश्वविद्यालय के अध्यक्ष भी रहे। यह विविध अनुभव बताता है कि वे केवल नौकरशाह नहीं थे, बल्कि प्रशासन, नीति और अकादमिक जगत के संपर्क बिंदु पर सक्रिय रहे व्यक्ति हैं।

किसी भी समाज में ऐसे लोगों की वापसी खास महत्व रखती है जो बड़े संस्थानों में काम करने के बाद अपने मूल समाज की ओर मुड़ते हैं। भारत में भी जब किसी आईएएस अधिकारी, प्रोफेसर, वैज्ञानिक या उद्योगपति के बारे में खबर आती है कि उन्होंने अपने पैतृक जिले में छात्रवृत्ति, डिजिटल लैब, कोचिंग सहायता या स्कूल अवसंरचना के लिए कोष दिया, तो स्थानीय समुदाय उस खबर को गर्व के साथ ग्रहण करता है। इसकी वजह यह है कि इससे बच्चों को एक ठोस जीवन-पथ दिखाई देता है। वे देख पाते हैं कि छोटे स्थान से निकला व्यक्ति राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच सकता है, और फिर अपने गांव, कस्बे या जिले से रिश्ता बनाए रख सकता है।

पार्क पान-जे का दान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह अचानक किया गया एक बार का परोपकारी प्रदर्शन नहीं है। हापचॉन प्रशासन और फाउंडेशन के अनुसार, वे तीन दशक से अधिक समय से छात्रवृत्ति कार्य से जुड़े रहे हैं। आधुनिक सार्वजनिक जीवन में निरंतरता सबसे दुर्लभ गुणों में से एक है। एक बार मंच पर चेक सौंपना आसान होता है, लेकिन 30 वर्षों तक शिक्षा-सहायता जैसी पहल से जुड़े रहना कहीं अधिक कठिन है। यही वह बिंदु है जहां यह समाचार सामान्य दान-समाचार से अलग हो जाता है। यह हमें बताता है कि समाज में भरोसा केवल रकम से नहीं, समय से बनता है।

उन्होंने दान देते समय कहा कि वे चाहते हैं कि उनके गृहक्षेत्र के छात्र अपने सपनों को विकसित करें और इलाके का नेतृत्व करने वाली प्रतिभा बनें। यह कथन औपचारिक लग सकता है, लेकिन कोरियाई सामाजिक संदर्भ में इसके कई अर्थ हैं। वहां स्थानीय समुदाय, विद्यालय, परिवार और प्रशासन मिलकर शिक्षा को सामाजिक उन्नति का प्रमुख माध्यम मानते हैं। इसलिए जब कोई वरिष्ठ व्यक्ति छात्रों के लिए खुले शब्दों में समर्थन व्यक्त करता है, तो वह आर्थिक सहायता के साथ-साथ एक सामाजिक आश्वासन भी देता है। जैसे कोई कह रहा हो कि तुम्हें देखा जा रहा है, तुम्हारे सपनों का गवाह समाज है, और तुम्हारी सफलता निजी नहीं, सामुदायिक महत्व भी रखती है।

कोरिया के स्थानीय समाज में छात्रवृत्ति की संस्कृति क्या कहती है

भारतीय पाठकों के लिए यह समझना उपयोगी होगा कि दक्षिण कोरिया का शिक्षा-तंत्र अत्यंत प्रतिस्पर्धी माना जाता है। वहां स्कूल शिक्षा, विश्वविद्यालय प्रवेश, और पेशेवर सफलता के बीच बहुत घनिष्ठ संबंध है। बड़े शहरों में बेहतर संसाधन, नामी संस्थान, अतिरिक्त कोचिंग व्यवस्था और रोजगार के अवसर अधिक सघन रूप में मिलते हैं। इस वजह से प्रांतीय शहरों और काउंटियों के सामने यह सवाल रहता है कि वे अपने युवाओं को कैसे तैयार करें, कैसे प्रेरित करें, और कैसे यह अहसास दिलाएं कि वे किसी स्थायी पिछड़ेपन में नहीं फंसे हैं। इसी संदर्भ में स्थानीय छात्रवृत्ति संस्थाएं एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

कोरिया में स्थानीय प्रशासनिक इकाई के रूप में “गुन” या काउंटी का दर्जा भारत के किसी जिले और प्रखंड के मिश्रित अनुभव जैसा लग सकता है, हालांकि दोनों व्यवस्थाएं अलग हैं। हापचॉन जैसे इलाकों में जनसंख्या अपेक्षाकृत कम हो सकती है, सामुदायिक पहचान अधिक मजबूत होती है, और स्थानीय मूल के प्रतिष्ठित लोगों का प्रभाव सामाजिक रूप से अधिक महसूस किया जाता है। ऐसे स्थानों पर छात्रवृत्ति का हर कोष केवल कुछ छात्रों की फीस का प्रश्न नहीं होता, बल्कि पूरे समुदाय के भविष्य-दृष्टि का हिस्सा बन जाता है।

हमारे यहां भी छोटे शहरों में यह अक्सर कहा जाता है कि “बच्चे तो पढ़कर दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु चले जाते हैं।” कोरिया में भी यह भावना अपने रूपांतरित स्वरूप में मौजूद है। फर्क यह है कि वहां स्थानीय निकाय, क्षेत्रीय फाउंडेशन और निजी छात्रवृत्ति नेटवर्क अक्सर इस चुनौती को बहुत संगठित ढंग से संबोधित करते हैं। छात्रवृत्ति केवल मेधा-आधारित नहीं होती; कई बार उसका उद्देश्य यह भी होता है कि आर्थिक दबाव कम हो, बच्चों का आत्मविश्वास बढ़े, और समुदाय में शिक्षा के प्रति विश्वास बना रहे।

पार्क पान-जे का दान इसी व्यापक परंपरा के भीतर देखा जाना चाहिए। यह संकेत देता है कि कोरिया का स्थानीय समाज अब भी शिक्षा को ऐसा क्षेत्र मानता है जहां निजी परोपकार और सार्वजनिक संस्थान साझेदारी में काम कर सकते हैं। भारत में सीएसआर, पूर्व छात्र नेटवर्क और धर्मार्थ ट्रस्ट अक्सर यह भूमिका निभाते हैं। कोरिया में भी निजी छात्रवृत्ति प्रयास राज्य की योजनाओं के साथ मिलकर उस खाली स्थान को भरने की कोशिश करते हैं जहां सरकारी सहायता पर्याप्त तो होती है, लेकिन हर छात्र की वास्तविक जीवन-स्थितियों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाती।

यही वह जगह है जहां छात्रवृत्ति “संस्था” और “जीवन” के बीच पुल बनती है। किताबें, हॉस्टल, परीक्षा शुल्क, आवागमन, डिजिटल उपकरण, कोचिंग, भाषा प्रशिक्षण, या केवल इतना कि कोई छात्र बिना आर्थिक चिंता के पढ़ाई जारी रख सके, यह सब छात्रवृत्ति की दुनिया का हिस्सा है। इसलिए स्थानीय समाज में ऐसी खबरें चुपचाप बड़े असर पैदा करती हैं। वे लोगों को याद दिलाती हैं कि शिक्षा में निवेश का लाभ वर्षों बाद दिखता है, लेकिन उसका असर एक पीढ़ी तक रह सकता है।

हापचॉन की कहानी और भारत के छोटे शहरों की समान चिंता

हापचॉन की यह कहानी पढ़ते समय भारत के अनेक जिले याद आते हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखंड, ओडिशा या उत्तराखंड के कई परिवारों में शिक्षा आज भी सामाजिक गतिशीलता का सबसे विश्वसनीय साधन मानी जाती है। लेकिन यह भी सच है कि छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को संसाधनों का वही स्तर नहीं मिलता जो महानगरों या बड़े शैक्षणिक केंद्रों में उपलब्ध होता है। ऐसे में यदि स्थानीय समुदाय, अपने क्षेत्र से आगे बढ़ चुके लोग, और संस्थागत फाउंडेशन मिलकर छात्रों के लिए स्थायी कोष बनाएं, तो उसका प्रभाव केवल कुछ चयनित छात्रों तक सीमित नहीं रहता; वह पूरे सामाजिक माहौल को बदल सकता है।

हमें यह खबर इसलिए भी ध्यान से पढ़नी चाहिए क्योंकि यह “ब्रेन ड्रेन” बनाम “सामुदायिक पुनर्संपर्क” की बहस को नए ढंग से सामने लाती है। जब कोई प्रतिभाशाली छात्र अपने गांव से निकलकर बड़े शहर में जाता है, तो अक्सर उस पर यह आरोप या अफसोस जोड़ा जाता है कि वह लौटकर नहीं आया। लेकिन आधुनिक दुनिया में वापसी का अर्थ हमेशा भौतिक रूप से लौट आना नहीं होता। कोई व्यक्ति अपने जिले में कॉलेज न खोल पाए, फिर भी छात्रवृत्ति, मार्गदर्शन, इंटर्नशिप, मेंटरशिप और संस्थागत सहयोग के जरिए अपने क्षेत्र से जुड़ा रह सकता है। पार्क पान-जे का उदाहरण यही बताता है कि “जड़ों से रिश्ता” केवल स्मृति का विषय नहीं, एक सक्रिय सामाजिक हस्तक्षेप भी हो सकता है।

भारतीय संदर्भ में इसे हम उस भावना से जोड़ सकते हैं जिसे कई क्षेत्रों में “अपना जिला, अपने बच्चे” या “गांव का होनहार” जैसी स्थानीय अभिव्यक्तियों में देखा जाता है। जिस तरह कई राज्यों में प्रवासी उद्यमी अपने पैतृक स्थान पर स्कूल, अस्पताल या छात्रावास के लिए धन देते हैं, उसी तरह कोरिया के छोटे इलाकों में भी क्षेत्रीय पहचान शिक्षा के माध्यम से भविष्य निर्माण में बदलती दिखाई देती है। यह सामाजिक निवेश की ऐसी शैली है जिसमें सम्मान, स्मृति, जिम्मेदारी और प्रतिष्ठा एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।

विशेषज्ञ लंबे समय से कहते रहे हैं कि शिक्षा में असमानता केवल आय का प्रश्न नहीं, बल्कि “अवसर के भूगोल” का प्रश्न भी है। यानी आप कहां पैदा हुए, आपके आसपास कैसी संस्थाएं हैं, आपके जिले से कितने रोल मॉडल निकलते हैं, और क्या आपके समुदाय में शिक्षा को लेकर जीवित समर्थन-व्यवस्था मौजूद है। हापचॉन की घटना इसी “अवसर के भूगोल” को थोड़ा बेहतर बनाने की दिशा में एक कदम जैसी दिखती है। यह मान लेना गलत होगा कि एक दान से सारी समस्याएं हल हो जाएंगी। लेकिन यह मानना भी गलत होगा कि ऐसे कदम मामूली हैं। छोटे-छोटे हस्तक्षेप ही कई बार स्थानीय समाज में उम्मीद का ढांचा तैयार करते हैं।

हापचॉन काउंटी मानव संसाधन विकास फाउंडेशन की भूमिका

इस पूरी कहानी में एक महत्वपूर्ण पक्ष हापचॉन काउंटी मानव संसाधन विकास फाउंडेशन की भूमिका है। कोरिया में ऐसे फाउंडेशन अक्सर स्थानीय छात्रों के लिए छात्रवृत्ति, शैक्षिक सहायता, प्रशिक्षण कार्यक्रम और प्रतिभा-विकास योजनाओं के केंद्र के रूप में काम करते हैं। दान देने वाला व्यक्ति सुर्खियां बटोर सकता है, लेकिन असली परीक्षा उस संस्था की होती है जो यह तय करती है कि धन का उपयोग कैसे होगा, किन छात्रों तक पहुंचेगा, किन मानदंडों पर पहुंचेगा, और उसका सामाजिक प्रभाव कितना व्यापक होगा।

हापचॉन के काउंटी प्रमुख और फाउंडेशन अध्यक्ष किम यून-चोल ने पार्क पान-जे के 30 वर्षों से अधिक लंबे छात्रवृत्ति कार्य को समुदाय के लिए प्रेरक बताया और कहा कि दानदाता की भावना छात्रों तक सही रूप में पहुंचे, इसके लिए वे पूरी कोशिश करेंगे। यह कथन महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे एक बुनियादी सिद्धांत सामने आता है: दान कहानी की शुरुआत है, समुचित क्रियान्वयन उसका असली रूप है। भारत में भी शिक्षा-संबंधी कोष तब ही प्रभावी माने जाते हैं जब उनका चयन पारदर्शी हो, पहुंच समावेशी हो, और सहायता केवल औपचारिकता बनकर न रह जाए।

कोरिया में शिक्षा-सहायता कार्यक्रमों को लेकर प्रशासनिक अनुशासन की अपेक्षा काफी ऊंची रहती है। इस कारण स्थानीय फाउंडेशन की जवाबदेही पर भी ध्यान दिया जाता है। छात्रवृत्ति को यदि केवल एक स्मारक-प्रतीक बना दिया जाए, तो उसका असर सीमित रह जाता है। लेकिन यदि वही कोष लंबी अवधि की योजना, छात्र-मार्गदर्शन, मनोवैज्ञानिक समर्थन, कौशल-विकास और स्थानीय प्रतिभा-नेटवर्क से जोड़ा जाए, तो यह एक जीवंत शैक्षिक पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा बन सकता है।

हापचॉन के लिए चुनौती भी यही होगी। क्या यह राशि मेधावी और जरूरतमंद छात्रों के बीच संतुलित ढंग से बांटी जाएगी? क्या इससे छात्रों को केवल फीस-सहायता मिलेगी या आगे की शैक्षिक दिशा भी? क्या यह पहल स्थानीय स्कूलों और परिवारों में शिक्षा के प्रति नया भरोसा पैदा करेगी? क्या इससे अन्य पूर्व छात्रों, अधिकारियों, उद्यमियों और स्थानीय परिवारों को भी योगदान देने की प्रेरणा मिलेगी? इन प्रश्नों के उत्तर समय देगा, लेकिन इतना स्पष्ट है कि संस्था के पास अब एक नैतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी दोनों हैं।

केवल पैसा नहीं, सामाजिक संदेश भी

छात्रवृत्ति का एक दृश्य पक्ष है और एक अदृश्य पक्ष। दृश्य पक्ष है राशि, घोषणा, समारोह, संस्थागत स्वीकृति। अदृश्य पक्ष है वह भावनात्मक ऊर्जा जो छात्रों और परिवारों तक पहुंचती है। पार्क पान-जे ने अपने वक्तव्य में जिन शब्दों पर जोर दिया, वे थे सपना, क्षेत्र, प्रतिभा और समर्थन। यह संयोग नहीं है। शिक्षा में आर्थिक सहायता महत्वपूर्ण है, लेकिन अकेले आर्थिक सहायता पर्याप्त नहीं होती। विशेषकर छोटे शहरों और ग्रामीण पृष्ठभूमि के छात्रों के लिए यह अनुभव भी बहुत मायने रखता है कि कोई उन पर विश्वास करता है।

भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले या उच्च शिक्षा के लिए शहरों में जाने वाले छात्रों से बात कीजिए, तो वे अक्सर बताते हैं कि आर्थिक संघर्ष के साथ-साथ सबसे बड़ी चुनौती आत्मविश्वास की होती है। उन्हें लगता है कि बड़े शहरों के छात्र उनसे आगे हैं, उनकी अंग्रेजी बेहतर है, उनके पास कोचिंग और नेटवर्क अधिक मजबूत हैं। कोरिया में भी स्थानीय इलाकों के छात्रों के लिए इसी तरह की मानसिक दूरी मौजूद हो सकती है। ऐसे में जब किसी स्थानीय मूल के वरिष्ठ व्यक्ति की ओर से छात्रवृत्ति और खुला समर्थन मिलता है, तो वह छात्रों को यह भरोसा देता है कि उनका शुरुआती बिंदु उनकी अंतिम सीमा नहीं है।

यही कारण है कि इस खबर को केवल परोपकार के कॉलम में रखकर आगे बढ़ जाना पर्याप्त नहीं होगा। यह समाजशास्त्रीय रूप से भी महत्वपूर्ण है। यह दिखाती है कि शिक्षा में सामुदायिक निवेश, सामाजिक पूंजी और भावनात्मक मान्यता एक-दूसरे से कैसे जुड़ते हैं। छात्रवृत्ति पाकर एक छात्र कॉलेज जा सकता है; वही छात्र बाद में अपने क्षेत्र के दूसरे बच्चों के लिए रोल मॉडल बन सकता है; और फिर वही प्रक्रिया अगले दान, अगले नेटवर्क, अगले समर्थन तंत्र में बदल सकती है। इस तरह एक दान कई वर्षों में सामाजिक पुनरुत्पादन की सकारात्मक शृंखला का हिस्सा बन जाता है।

दक्षिण कोरिया की इस घटना का वैश्विक महत्व भी यही है कि यह हमें याद दिलाती है: शिक्षा की लड़ाई केवल राष्ट्रीय बजट की लड़ाई नहीं होती, यह स्थानीय सामाजिक इच्छाशक्ति की भी लड़ाई होती है। जब समुदाय अपने युवाओं को “साझा संपत्ति” की तरह देखता है, तब छात्रवृत्ति एक राशि से बढ़कर सामूहिक भविष्य की घोषणा बन जाती है।

छोटे शहरों के भविष्य पर बड़ी बहस

आज दुनिया के अनेक देशों में छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के सामने एक समान चुनौती है: युवा बाहर जा रहे हैं, जन्मदर घट रही है, स्थानीय अर्थव्यवस्थाएं पुनर्गठन के दौर में हैं, और शिक्षा भविष्य का सबसे निर्णायक क्षेत्र बन गई है। कोरिया भी इससे अछूता नहीं है। हापचॉन जैसे इलाकों के लिए इसलिए शिक्षा पर निवेश महज सामाजिक सेवा नहीं, बल्कि दीर्घकालिक क्षेत्रीय रणनीति है। यदि स्थानीय छात्र बेहतर शिक्षा, मार्गदर्शन और प्रोत्साहन पाते हैं, तो वे चाहे बाहर जाएं या लौटें, दोनों ही स्थितियों में अपने क्षेत्र से संबंध बनाए रखने की संभावना बढ़ती है।

भारतीय पाठकों के लिए यह बहस बेहद परिचित है। पूर्वांचल, बुंदेलखंड, विदर्भ, मराठवाड़ा, झारखंड के पठारी इलाके, उत्तराखंड के पर्वतीय जिले, या पूर्वोत्तर के अनेक छोटे शहर—हर जगह यह प्रश्न किसी न किसी रूप में मौजूद है कि प्रतिभा को कैसे संभाला जाए, स्थानीय सपनों को कैसे टिकाया जाए, और शिक्षा को पलायन की मजबूरी के बजाय सशक्तिकरण के अवसर में कैसे बदला जाए। इस दृष्टि से हापचॉन की खबर केवल कोरिया की स्थानीय खबर नहीं रहती; वह एशिया के बदलते सामाजिक मानचित्र की कहानी बन जाती है।

यह भी गौर करने योग्य है कि बड़े सुधार कभी-कभी बहुत छोटे, निरंतर और मानवीय कदमों से जन्म लेते हैं। न तो हर समस्या का हल केवल सरकार है, न ही हर समाधान केवल बाजार। समाज, प्रशासन, पूर्व छात्र, स्थानीय प्रतिष्ठित लोग और परिवार—इन सबके बीच यदि शिक्षा को लेकर भरोसेमंद साझेदारी बने, तो परिवर्तन की गति धीमी जरूर हो सकती है, पर टिकाऊ होती है। पार्क पान-जे का 1억 원 का दान इसी धीमी लेकिन टिकाऊ राजनीति की मिसाल है, जहां अगली पीढ़ी के लिए निवेश को सामाजिक प्रतिष्ठा का विषय बनाया जाता है।

आखिर में यह खबर हमें एक बहुत सरल, लेकिन गहरी बात याद दिलाती है: किसी भी क्षेत्र का भविष्य उसके बच्चों की कल्पना-शक्ति से बनता है, और उस कल्पना-शक्ति को सहारा देने के लिए केवल पाठ्यपुस्तकें नहीं, भरोसा भी चाहिए। हापचॉन में दिया गया यह छात्रवृत्ति कोष उसी भरोसे का सार्वजनिक रूप है। भारतीय समाज, जहां शिक्षा अब भी करोड़ों परिवारों के लिए उम्मीद की सबसे बड़ी सीढ़ी है, वहां इस खबर को पढ़ना शायद इसलिए जरूरी है कि यह हमें हमारे अपने छोटे शहरों, कस्बों और गांवों के बारे में भी सोचने पर मजबूर करती है। कौन लौटेगा? कौन हाथ बढ़ाएगा? कौन कहेगा कि अपने इलाके के बच्चों के सपनों की जिम्मेदारी हम सबकी है? दक्षिण कोरिया के एक शांत जिले से उठी यह आवाज, शायद इसी कारण हमारे लिए भी मायने रखती है।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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