
कोरिया की चमकती शहरी छवि के पीछे दिखा खेती का असली चेहरा
दक्षिण कोरिया का नाम आते ही भारतीय पाठकों के मन में अक्सर सियोल की जगमगाती सड़कों, के-पॉप सितारों, के-ड्रामा, ब्यूटी इंडस्ट्री और अत्याधुनिक तकनीक की तस्वीर उभरती है। लेकिन इस आधुनिक, तेज़ और वैश्विक कोरिया के पीछे एक दूसरा कोरिया भी है—खेतों, पहाड़ों, मौसम और श्रम पर टिका हुआ ग्रामीण कोरिया। इसी कोरिया की एक महत्वपूर्ण झलक हाल में गंगवॉन प्रांत के प्योंगचांग काउंटी के डेग्वाल्ल्योंग क्षेत्र से सामने आई, जहां 200 से अधिक लोगों ने किसानों के साथ मिलकर खेतों में हाथ बंटाया। यह कोई औपचारिक फोटो-ऑप या महज़ सांकेतिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि वास्तविक कृषि कार्य में भागीदारी का दिन था, जिसमें स्वयंसेवकों और संस्थागत प्रतिनिधियों ने बीज बोए, पौधे लगाए और फसल प्रबंधन से जुड़े सूक्ष्म काम किए।
यह आयोजन दक्षिण कोरिया के नेशनल एग्रीकल्चरल कोऑपरेटिव फेडरेशन, जिसे वहां सामान्यतः ‘नॉन्घ्योप’ कहा जाता है, की गंगवॉन शाखा की ओर से आयोजित किया गया। इसमें नॉन्घ्योप के शीर्ष नेतृत्व, क्षेत्रीय पदाधिकारी, ग्रामीण महिला समूहों, स्थानीय सामाजिक संगठनों और विश्वविद्यालय के छात्र स्वयंसेवकों सहित 200 से अधिक लोग शामिल हुए। उसी दिन पूरे गंगवॉन प्रांत में लगभग 1,000 लोगों ने अलग-अलग ग्रामीण इलाकों में किसानों के लिए श्रम सहायता अभियान में भाग लिया। यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताता है कि मामला किसी एक खेत या एक गांव तक सीमित नहीं था; इसे कृषि के व्यस्त मौसम में संगठित, सामूहिक और प्रांतीय स्तर की प्रतिक्रिया के रूप में समझा जाना चाहिए।
भारतीय संदर्भ में देखें तो यह खबर हमें पंजाब के धान-रोपाई सीजन, महाराष्ट्र के गन्ना कटाई क्षेत्र, हिमाचल के सेब बागानों या बिहार-पूर्वांचल में कटाई-बोआई के दौरान बढ़ती श्रम मांग की याद दिलाती है। फर्क इतना है कि दक्षिण कोरिया जैसे अत्यधिक विकसित देश में भी खेती का एक बड़ा हिस्सा आज तक मनुष्य के हाथों, मौसम की घड़ी और सामुदायिक सहयोग पर निर्भर है। इसीलिए प्योंगचांग की यह घटना केवल एक स्थानीय कार्यक्रम नहीं, बल्कि आधुनिक समाजों में कृषि की अनकही कठिनाइयों पर एक गंभीर टिप्पणी भी है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया कि चाहे देश तकनीक में कितना ही आगे क्यों न निकल जाए, भोजन अंततः खेत से आता है, और खेत अब भी समय पर उपलब्ध श्रम, अनुभव, मौसम की समझ और सामुदायिक सहयोग पर टिका रहता है। दक्षिण कोरिया की यह कहानी भारतीय पाठकों को इसलिए भी आकर्षित करती है क्योंकि हमारे यहां भी खेती अक्सर राष्ट्रीय विमर्श में तब आती है जब संकट बहुत बड़ा हो जाता है, जबकि उसके रोज़मर्रा के श्रम, उसकी मौसमी लय और उसके सामाजिक ढांचे पर अपेक्षाकृत कम बात होती है।
क्या हुआ प्योंगचांग के डेग्वाल्ल्योंग में
स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, 19 जून को गंगवॉन प्रांत के प्योंगचांग काउंटी के डेग्वाल्ल्योंग क्षेत्र के एक कृषि क्षेत्र में ‘नॉन्घ्योप’ की ओर से ग्रामीण श्रम सहायता का विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में नॉन्घ्योप के केंद्रीय नेतृत्व से लेकर गंगवॉन क्षेत्रीय इकाई, ग्रामीण परिवारों से जुड़े महिला समूह, स्थानीय सामुदायिक संगठन और छात्र स्वयंसेवक मौजूद थे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि कार्यक्रम की प्रकृति प्रतीकात्मक नहीं थी। इसमें मौजूद लोगों ने खेतों में जाकर वास्तविक काम किया।
इन कार्यों में मूली की बुवाई, लेट्यूस यानी सलाद पत्ते के पौधों की रोपाई, और स्ट्रॉबेरी के पौधों से अतिरिक्त लताओं या तनों को हटाने जैसे काम शामिल थे। पहली नज़र में ये छोटे या सामान्य कृषि कार्य लग सकते हैं, लेकिन खेती के जानकार समझते हैं कि इनमें समय की भूमिका सबसे बड़ी होती है। बुवाई देर से हो जाए तो पूरा चक्र प्रभावित हो सकता है; रोपाई गलत समय पर हो तो पौधे कमजोर पड़ सकते हैं; और फलदार या संवेदनशील फसलों में रखरखाव का काम छूट जाए तो उत्पादन और गुणवत्ता दोनों पर असर पड़ सकता है।
यानी यह श्रम केवल ‘मदद’ नहीं था, बल्कि उस मौसम की सबसे ज़रूरी घड़ी में किसानों की उत्पादन प्रक्रिया को संभालने की कोशिश थी। कोरिया में जून का महीना कई इलाकों में खेती के लिए बेहद व्यस्त माना जाता है। कुछ फसलों की शुरुआत, कुछ की देखभाल, और कुछ क्षेत्रों में मौसम के तेज़ बदलाव के बीच त्वरित निर्णय लेने पड़ते हैं। इसीलिए इस कार्यक्रम का केंद्र खेत में मौजूद श्रम-अभाव को सीधे संबोधित करना था।
यहां एक और बात ध्यान देने योग्य है। डेग्वाल्ल्योंग और प्योंगचांग का नाम दुनिया ने 2018 शीतकालीन ओलंपिक के दौरान खूब सुना था। अंतरराष्ट्रीय मीडिया में यह इलाका खेलों, पर्यटन और पहाड़ी भूगोल के कारण चर्चित रहा। लेकिन इस खबर में वही प्योंगचांग एक बिल्कुल अलग रूप में सामने आता है—एक ऐसे कृषि क्षेत्र के रूप में, जहां खेतों में समय पर हाथ न पहुंचें तो पूरी फसल-श्रृंखला प्रभावित हो सकती है। यह विरोधाभास ही इस खबर को खास बनाता है: ग्लोबल मंचों पर दिखने वाला कोरिया और रोजमर्रा की मेहनत से टिके ग्रामीण कोरिया, दोनों एक ही देश के दो चेहरे हैं।
भारतीय पाठकों के लिए यह दृश्य अनजाना नहीं है। हमारे यहां भी कई प्रसिद्ध शहरों या पर्यटन स्थलों के आसपास खेती की ऐसी दुनिया मौजूद है जिसे बाहरी नजर कम देखती है। जैसे शिमला का नाम पर्यटन से जुड़ता है, लेकिन उसके पीछे सेब उत्पादकों की चिंता भी है; नैनीताल की पहाड़ी छवि के पीछे कुमाऊं के किसानों की मेहनत है; और ऊटी या दार्जिलिंग का आकर्षण चाय बागानों, सब्जी उत्पादकों और स्थानीय श्रमिकों के श्रम से भी जुड़ा है। प्योंगचांग की खबर उसी प्रकार की परत खोलती है।
‘नॉन्शिमचॉनशिम’ का अर्थ: खेती का मन, आसमान का मन
इस आयोजन का नाम दक्षिण कोरियाई सांस्कृतिक संदर्भ में विशेष महत्व रखता है। कार्यक्रम को ‘नॉन्शिमचॉनशिम’ अभियान के हिस्से के रूप में पेश किया गया। यह अभिव्यक्ति सीधे-सीधे हिंदी में अनुवादित करना आसान नहीं है, लेकिन इसका आशय broadly यह है कि ‘किसान का मन ही आकाश का मन है’ या ‘खेती और किसान की भावना का मान रखना ही व्यापक मानवीय संवेदना है’। कोरियाई समाज में ऐसे भाव-समृद्ध वाक्यांश अक्सर कृषि, समुदाय और परिश्रम को नैतिक गरिमा देने के लिए इस्तेमाल होते हैं।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में इसकी तुलना हम उन भावनात्मक कथनों से कर सकते हैं जैसे ‘अन्नदाता’, ‘जय जवान जय किसान’, या गांव और खेती को केवल आर्थिक इकाई नहीं बल्कि सभ्यता के आधार के रूप में देखने की परंपरा। भारत में भी किसान के श्रम को आध्यात्मिक, नैतिक और राष्ट्रीय महत्व से जोड़ा जाता है—हालांकि जमीनी हकीकत में किसान को मिलने वाली आय, सुरक्षा और सम्मान पर बहस जारी रहती है। दक्षिण कोरिया के इस अभियान का नाम भी कुछ इसी तरह का नैतिक संदेश देता है: खेती को केवल उत्पादन नहीं, बल्कि सामुदायिक जिम्मेदारी के रूप में समझो।
इस कार्यक्रम के दौरान कोरियाई कृषि नेतृत्व ने एक स्थानीय कहावत का हवाला दिया कि ‘जून में तो चूल्हा कुरेदने वाली लकड़ी भी उठकर खेत का काम करने लगती है।’ यह कहावत भारतीय ग्रामीण मुहावरों की तरह ही अतिशयोक्ति के सहारे एक गहरी सच्चाई बताती है। हमारे यहां भी लोग कहते हैं कि फसल के मौसम में ‘घर का हर हाथ काम आता है’ या ‘कटनी के समय बैठने की फुर्सत नहीं होती’। कोरिया की यह कहावत इसी बात को रेखांकित करती है कि कृषि के कुछ सप्ताह इतने निर्णायक होते हैं कि परिवार, समुदाय और उपलब्ध हर संसाधन को सक्रिय होना पड़ता है।
यह सांस्कृतिक समझ इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आधुनिक शहरी समाज में अक्सर यह भ्रम पैदा हो जाता है कि मशीनें और सप्लाई-चेन सब संभाल लेंगी। लेकिन खेत की दुनिया अब भी मौसम और हाथों के बीच गहरे संबंध पर चलती है। बुवाई, निराई, पौधों की छंटाई, संवेदनशील फसलों की देखरेख—इनमें से बहुत कुछ आज भी पूरी तरह मशीनों पर नहीं छोड़ा जा सकता। इसलिए ‘नॉन्शिमचॉनशिम’ जैसा अभियान वास्तव में तकनीक-विरोधी नहीं, बल्कि यह स्वीकारोक्ति है कि कृषि में मानवीय श्रम का स्थान अब भी निर्णायक है।
भारतीय पाठकों के लिए यह एक दिलचस्प सांस्कृतिक समानता भी है। हम अक्सर कोरिया को पॉप संस्कृति, फैशन और शहरी जीवनशैली के जरिये समझते हैं, जबकि वहां भी ग्रामीण स्मृति, पारिवारिक श्रम और खेती से जुड़ी कहावतें सामाजिक चेतना का हिस्सा हैं। यह खबर उस कोरिया से परिचय कराती है जो के-ड्रामा की स्क्रीन से बाहर, मिट्टी और मौसम के बीच सांस लेता है।
खेतों के काम से झांकती ग्रामीण अर्थव्यवस्था की जटिलता
मूली की बुवाई, लेट्यूस की रोपाई और स्ट्रॉबेरी की लताओं को हटाने जैसे काम देखने में भले साधारण प्रतीत हों, लेकिन वे ग्रामीण अर्थव्यवस्था की एक बड़ी सच्चाई सामने रखते हैं। खेती का संकट अक्सर बड़े शब्दों में समझाया जाता है—उत्पादन, मूल्य, आयात, निर्यात, मौसम, सब्सिडी—लेकिन खेत पर खड़ा किसान इन सबको सबसे पहले श्रम और समय की भाषा में महसूस करता है। अगर सही दिन मजदूर न मिले, अगर परिवार में काम करने वाले लोग कम हों, अगर मजदूरी लागत बहुत बढ़ जाए, या अगर मौसम अचानक करवट बदल दे, तो संकट रिपोर्टों में नहीं, सीधे फसल में दिखाई देता है।
दक्षिण कोरिया के कृषि नेतृत्व ने भी इस अभियान की जरूरत समझाते हुए तीन दबावों का जिक्र किया—ग्रामीण आबादी का बूढ़ा होना, मजदूरी लागत में वृद्धि, और असामान्य या चरम मौसम की घटनाएं। ये तीनों बातें भारत के लिए भी बेहद परिचित हैं। भारत में ग्रामीण युवाओं का गैर-कृषि क्षेत्रों की ओर जाना, छोटे किसानों की सीमित क्षमता, बढ़ती लागत, और अनिश्चित मानसून लंबे समय से चिंता का विषय रहे हैं। कोरिया का उदाहरण बताता है कि यह समस्या केवल विकासशील देशों तक सीमित नहीं है; उच्च आय वाली अर्थव्यवस्थाएं भी इससे जूझ रही हैं।
कोरिया के ग्रामीण क्षेत्रों में बुजुर्ग किसानों की संख्या बढ़ने की चर्चा पिछले कुछ वर्षों से लगातार होती रही है। इसका अर्थ है कि खेत संभालने वाले लोगों की औसत उम्र बढ़ रही है और शारीरिक रूप से कठिन काम करना अधिक चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। भारत में भी ऐसी तस्वीर कई राज्यों में दिखती है, जहां युवा शिक्षा, नौकरी या छोटे व्यवसाय के लिए शहरों की ओर जाते हैं और गांव में बुजुर्ग माता-पिता या सीमित श्रमशक्ति के साथ खेती बचती है। ऐसे में कृषि कार्य का हर चरण अधिक महंगा, अधिक जोखिम भरा और अधिक श्रमसाध्य हो जाता है।
दूसरा बड़ा प्रश्न मजदूरी का है। मजदूरी बढ़ना अपने आप में बुरी बात नहीं; यह श्रमिकों के अधिकार और बेहतर आय से जुड़ा प्रश्न है। लेकिन जब किसानों को अपने उत्पाद का उचित मूल्य नहीं मिलता और उधर श्रम लागत बढ़ती जाती है, तब कृषि की लाभप्रदता दबाव में आ जाती है। यही तनाव भारत में भी देखा जाता है। किसान चाहता है कि उसे उपज का बेहतर दाम मिले, मजदूर चाहता है कि मेहनत का उचित मूल्य मिले—लेकिन बाजार और नीति के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होता। कोरिया की घटना इस तनाव का एक व्यावहारिक उत्तर खोजने की कोशिश दिखती है: व्यस्त मौसम में सामुदायिक श्रम सहयोग।
तीसरा तत्व है जलवायु। असामान्य गर्मी, अनियमित वर्षा, पाला, तेज़ हवाएं, या मौसम का अचानक बदल जाना—ये सब खेती को और अस्थिर बनाते हैं। कोरिया जैसे देश, जहां मौसम की मार अपेक्षाकृत कम समझी जाती है, वहां भी अब ‘असामान्य जलवायु’ कृषि भाषण का हिस्सा बन चुकी है। भारत, जो पहले से ही जलवायु जोखिम के प्रति अधिक संवेदनशील है, उसके लिए यह एक चेतावनी भी है। जब मौसम अनिश्चित हो, तब खेती के कुछ कामों का समय और भी निर्णायक हो जाता है। ऐसे में अगर श्रम समय पर न मिले, तो नुकसान कई गुना बढ़ सकता है।
युवाओं और महिला समूहों की भागीदारी का सामाजिक अर्थ
इस कार्यक्रम की एक खास बात यह थी कि इसमें केवल संस्था के कर्मचारी ही नहीं, बल्कि ग्रामीण महिला समूहों और विश्वविद्यालय के छात्र स्वयंसेवकों ने भी भाग लिया। दक्षिण कोरिया में ऐसे महिला समूह, जो गांव, परिवार और कृषि-समर्थक गतिविधियों से जुड़े होते हैं, स्थानीय सामाजिक ताने-बाने का अहम हिस्सा हैं। भारतीय संदर्भ में इसकी तुलना स्वयं सहायता समूहों, महिला मंडलों, किसान परिवारों के सहकारी नेटवर्क या ग्राम स्तर की सामाजिक समितियों से की जा सकती है। जब ऐसे समूह खेतों से जुड़े अभियानों में शामिल होते हैं, तो इसका अर्थ होता है कि खेती केवल किसान परिवार का निजी मामला नहीं, बल्कि सामुदायिक जीवन का प्रश्न है।
छात्र स्वयंसेवकों की भागीदारी और भी दिलचस्प है। शहरी या अर्ध-शहरी युवाओं के लिए खेती अक्सर सुपरमार्केट, फूड डिलीवरी या कैफे संस्कृति के माध्यम से दिखती है। उन्हें खेत की वास्तविक गति, मौसम की बाध्यता, और श्रम की बारीकी का प्रत्यक्ष अनुभव कम होता है। जब छात्र खेत में उतरते हैं, तो यह सिर्फ सेवा नहीं होती, बल्कि सीखने की प्रक्रिया भी होती है। वे समझते हैं कि स्ट्रॉबेरी केवल एक आकर्षक डेज़र्ट या इंस्टाग्राम पोस्ट नहीं, बल्कि रोज़ाना देखभाल, छंटाई और समय पर काम की मांग करने वाली फसल है।
भारत में भी यदि विश्वविद्यालय, एनएसएस, कृषि महाविद्यालय, सहकारी संस्थाएं या शहरी नागरिक समूह खेती के व्यस्त मौसम में संगठित रूप से सीमित लेकिन व्यवस्थित श्रम सहयोग दें, तो इसके सामाजिक असर दूरगामी हो सकते हैं। यह कदम कृषि संकट का पूर्ण समाधान नहीं होगा, लेकिन शहर और गांव के बीच बढ़ती दूरी को कम कर सकता है। आज भारत में भी उपभोक्ता और उत्पादक के बीच मनोवैज्ञानिक दूरी बढ़ी है। शहर में रहने वाला मध्यमवर्ग अक्सर खाद्य महंगाई पर चर्चा करता है, लेकिन उस महंगाई और खेत की लागत के बीच संबंध को कम समझता है। कोरिया के इस कार्यक्रम में यह दूरी थोड़ी कम होती दिखती है।
इसके अलावा, महिला समूहों की उपस्थिति यह भी बताती है कि ग्रामीण जीवन में कृषि, परिवार और सामुदायिक देखभाल अलग-अलग खांचे नहीं हैं। महिला श्रम अक्सर अदृश्य रहता है—चाहे वह खेत में हो, घर में हो, या सामुदायिक संगठन में। इसलिए ऐसे अभियानों में महिलाओं की औपचारिक भागीदारी दर्ज होना महत्वपूर्ण है। भारतीय कृषि में भी महिलाओं की भूमिका बहुत बड़ी है, लेकिन नीति और मीडिया विमर्श में उन्हें पर्याप्त दृश्यता नहीं मिलती। कोरिया की यह खबर हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि ग्रामीण सहायता अभियानों की कहानी लिखते समय किन हाथों को हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं।
गंगवॉन के 1,000 हाथ और सामूहिक प्रतिक्रिया की ताकत
प्योंगचांग के डेग्वाल्ल्योंग में 200 से अधिक लोगों की मौजूदगी अपने आप में उल्लेखनीय थी, लेकिन पूरे गंगवॉन प्रांत में लगभग 1,000 लोगों के भाग लेने से इस अभियान का दायरा कहीं बड़ा हो जाता है। यह संख्या केवल भीड़ का संकेत नहीं, बल्कि प्रशासनिक और सहकारी समन्वय की क्षमता का सूचक है। इसका मतलब है कि कृषि के व्यस्त मौसम की मांग को पहचानकर एक ही दिन अलग-अलग इलाकों में स्वयंसेवी और संस्थागत हस्तक्षेप की योजना बनाई गई।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि रिपोर्टों में इस अभियान के अंतर्गत कितने खेतों को सहायता मिली, कितनी भूमि पर काम हुआ, या आगे की कार्ययोजना क्या होगी—इन सभी का विस्तृत ब्यौरा सामने नहीं आया। इसलिए पत्रकारिता के स्तर पर इस खबर को बढ़ा-चढ़ाकर चमत्कार की तरह पेश करना उचित नहीं होगा। लेकिन उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह अवश्य कहा जा सकता है कि दक्षिण कोरिया में कृषि-श्रम संकट को केवल बयानबाजी से नहीं, बल्कि संगठित भागीदारी से संबोधित करने की कोशिश की जा रही है।
भारत में भी इस तरह की पहलें विभिन्न स्तरों पर देखने को मिलती हैं—कहीं सहकारी संस्थाएं, कहीं सामाजिक संगठन, कहीं पंचायतें, कहीं धार्मिक या सामुदायिक नेटवर्क। लेकिन उन्हें अक्सर व्यापक राष्ट्रीय विमर्श में जगह नहीं मिलती। अगर ऐसी पहलें बेहतर ढंग से डिज़ाइन हों—उदाहरण के लिए स्थानीय जरूरतों के अनुसार, कृषि विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में, सीमित लेकिन सही समय पर—तो वे छोटे किसानों के लिए बड़ी राहत बन सकती हैं। खासकर उन फसलों में, जहां कुछ दिनों की देरी भारी पड़ सकती है।
गंगवॉन की इस घटना का एक और अर्थ है: खेती की समस्या बहुस्तरीय है, इसलिए समाधान भी बहुस्तरीय होना चाहिए। केवल सब्सिडी, केवल तकनीक, केवल श्रम बाजार, या केवल जलवायु नीति—इनमें से कोई एक अकेले पर्याप्त नहीं। जब खेत पर संकट एक साथ उम्र, लागत और मौसम से पैदा हो रहा हो, तब संस्थागत तंत्र, स्थानीय समुदाय, युवा और सामाजिक संगठनों का साझा हस्तक्षेप अधिक असरदार हो सकता है। दक्षिण कोरिया का यह उदाहरण यही संकेत देता है।
भारतीय पाठकों के लिए सबक: अन्न की राजनीति से आगे, अन्न के श्रम तक
भारतीय सार्वजनिक जीवन में किसान और खेती का प्रश्न अक्सर राजनीतिक भाषण, चुनावी नारों, न्यूनतम समर्थन मूल्य, कर्ज, आंदोलन या खाद्य महंगाई के संदर्भ में सामने आता है। ये सभी विषय महत्वपूर्ण हैं, लेकिन खेती की रोज़मर्रा की श्रम-संरचना पर अपेक्षाकृत कम ध्यान जाता है। प्योंगचांग की यह घटना हमें याद दिलाती है कि कृषि केवल नीति का विषय नहीं, बल्कि समय पर उपलब्ध हाथों का विषय भी है। खेत में मौसम किसी संसदीय बहस का इंतजार नहीं करता। बीज, पौधा और फसल अपने समय पर ही प्रतिक्रिया देते हैं।
भारत में भी अगर हम ग्रामीण संकट को गंभीरता से समझना चाहते हैं, तो हमें खेती को तीन स्तरों पर देखना होगा—उत्पादन, श्रम और सामाजिक संबंध। उत्पादन का सवाल है कि किसान क्या उगा रहा है और किस शर्त पर उगा रहा है। श्रम का सवाल है कि कौन उगा रहा है, किस मजदूरी पर, किस उम्र में, और कितनी शारीरिक क्षमता के साथ। सामाजिक संबंध का सवाल है कि गांव, शहर, उपभोक्ता, सहकारी तंत्र, शिक्षा संस्थान और स्थानीय समूह खेती के साथ किस प्रकार जुड़े हुए हैं। दक्षिण कोरिया के इस आयोजन में ये तीनों परतें एक साथ दिखाई देती हैं।
यह खबर हमें यह भी सिखाती है कि ग्रामीण समाज को ‘पिछड़े’ या ‘पुराने’ ढांचे की तरह देखने के बजाय, उसे आधुनिक समाज की खाद्य सुरक्षा का केंद्रीय आधार समझना चाहिए। आज जब भारतीय शहरों में जैविक भोजन, फार्म-टू-टेबल, स्थानीय उत्पाद और स्वस्थ आहार पर चर्चा बढ़ रही है, तब यह भी समझना होगा कि इन सबके पीछे किसानों का बेहद सूक्ष्म, अक्सर कम आंका गया श्रम छिपा होता है। दक्षिण कोरिया के छात्र जब खेतों में उतरते हैं, तो वे दरअसल उसी दूरी को कम कर रहे होते हैं जो आधुनिक उपभोग और कृषि उत्पादन के बीच बन गई है।
प्योंगचांग की पहाड़ियों से आई यह खबर भारत के लिए कोई सीधा नुस्खा नहीं देती, लेकिन एक महत्वपूर्ण दृष्टि जरूर देती है। वह यह कि कृषि संकट केवल आर्थिक नहीं, सामाजिक और सांस्कृतिक भी है। खेती को बचाने के लिए पैसा जरूरी है, तकनीक जरूरी है, बाजार सुधार जरूरी हैं, लेकिन उतना ही जरूरी है खेती को समाज की साझा चिंता बनाना। जब तक भोजन केवल थाली में दिखाई देगा और खेत में नहीं, तब तक कृषि की वास्तविक चुनौतियां सार्वजनिक समझ से बाहर रहेंगी।
दक्षिण कोरिया के इस अभियान में 200 लोग एक खेत-क्षेत्र में उतरे, और पूरे प्रांत में 1,000 लोगों ने किसानों का हाथ थामा। संख्या चाहे सीमित लगे, पर संदेश बड़ा है: आधुनिक राष्ट्र की असली मजबूती केवल उसके चमकते शहरों में नहीं, बल्कि उन खेतों में भी मापी जाती है जहां मौसम से जूझते लोग अगले मौसम की फसल तैयार कर रहे होते हैं। भारत और कोरिया, दोनों के लिए यह संदेश समान रूप से प्रासंगिक है। आखिर किसी भी देश की सांस्कृतिक चमक, औद्योगिक ताकत और शहरी सुविधा की नींव अंततः उस अन्न पर ही टिकी होती है, जो किसी गांव, किसी ढलान, किसी खेत और किसी थके हुए लेकिन डटे हुए हाथ से आता है।
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