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दक्षिण कोरिया के ग्वांगजू का नया दांव: युवाओं के स्टार्टअप को सिर्फ पैसा नहीं, बाजार तक पहुंचाने की पूरी तैयारी

दक्षिण कोरिया के ग्वांगजू का नया दांव: युवाओं के स्टार्टअप को सिर्फ पैसा नहीं, बाजार तक पहुंचाने की पूरी तैयारी

स्थानीय खबर से बड़ा सामाजिक संकेत

दक्षिण कोरिया के ग्वांगजू शहर ने युवा उद्यमियों के लिए एक नई सहायता योजना की घोषणा की है, लेकिन इसे केवल एक प्रशासनिक सूचना मान लेना बड़ी भूल होगी। सतह पर देखें तो यह खबर 14 युवा स्टार्टअप कंपनियों के चयन, सीमित वित्तीय सहायता और एक ‘एक्सेलरेटर’ कार्यक्रम तक सिमटी हुई लग सकती है। मगर गहराई से पढ़ने पर यह समझ आता है कि कोरिया की स्थानीय सरकारें अब युवाओं की समस्या को केवल बेरोजगारी के आंकड़ों में नहीं, बल्कि टिकाऊ आजीविका, स्थानीय अर्थव्यवस्था और शहर में भविष्य बनाने की क्षमता के रूप में देखने लगी हैं। यही इस पहल को समाचार से आगे बढ़ाकर सामाजिक महत्व का विषय बनाता है।

ग्वांगजू महानगर प्रशासन ने 2 जून 2026 को घोषणा की कि वह तीन वर्ष से कम पुराने युवा-नेतृत्व वाले स्टार्टअप उद्यमों से आवेदन मांगेगा। योजना दो हिस्सों में बंटी है। पहला, तकनीकी उन्नयन के लिए प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता; दूसरा, ‘एक्सेलरेटर’ यानी ऐसा संरचित मार्गदर्शन कार्यक्रम जो शुरुआती कंपनियों को केवल पंजीकरण या विचार के स्तर से निकालकर उत्पाद, विपणन, नेटवर्क और निवेश-तैयारी तक पहुंचाए। यह फर्क बहुत महत्वपूर्ण है। भारत में भी हम अक्सर ‘स्टार्टअप’ शब्द सुनते हैं, लेकिन जमीन पर सबसे बड़ी मुश्किल कंपनी शुरू करना नहीं, उसे जिंदा रखना होती है। कोरिया का यह मॉडल उसी सबसे कठिन चरण पर निशाना साधता दिखता है।

भारतीय पाठकों के लिए इसे इस तरह समझना आसान होगा: जैसे हमारे यहां कोई राज्य सरकार केवल ‘मुद्रा’ जैसी ऋण-सहायता या अनुदान देकर नहीं रुकती, बल्कि साथ में उत्पाद डिज़ाइन, प्रमाणन, बाजार जोड़ने, मेंटरशिप और ब्रांडिंग का पैकेज देती है, तो उसका असर कहीं अधिक गहरा होता है। ग्वांगजू इसी दिशा में कदम बढ़ाता नजर आता है। यहां सरकार यह मानकर चल रही है कि किसी युवा के पास विचार हो सकता है, कुछ तकनीकी कौशल भी हो सकता है, लेकिन प्रोटोटाइप, प्रमाणपत्र, पेटेंट, मार्केटिंग और नेटवर्क तक पहुंच के बिना वह बाजार में टिक नहीं पाएगा।

आज जब भारत में भी टियर-2 और टियर-3 शहरों—इंदौर, कोच्चि, भुवनेश्वर, जयपुर, सूरत या कोयंबटूर—को स्थानीय नवाचार के नए केंद्र के रूप में देखने की कोशिश हो रही है, तब ग्वांगजू की यह पहल भारतीय नीति-निर्माताओं और युवा उद्यमियों, दोनों के लिए दिलचस्प उदाहरण बनती है। सवाल केवल इतना नहीं है कि कितने स्टार्टअप को पैसा मिला; बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी शहर ने अपने युवाओं से कहा है—“तुम यहीं रहकर काम करो, हम शुरुआत से आगे के मुश्किल पड़ावों पर तुम्हारे साथ हैं।”

योजना का ढांचा क्या है और यह क्यों अलग है

ग्वांगजू प्रशासन ने इस कार्यक्रम को दो स्पष्ट खंडों में बांटा है। छह कंपनियों को तकनीकी उन्नयन निधि के तहत समर्थन दिया जाएगा, जबकि आठ कंपनियों को एक्सेलरेटर सहायता दी जाएगी। कुल मिलाकर 14 उद्यम चुने जाएंगे। संख्या छोटी लग सकती है, लेकिन नीति की भाषा में यह एक ‘पायलट-प्रभाव’ वाला मॉडल भी हो सकता है—यानी सीमित कंपनियों पर गहन निवेश, ताकि परिणाम अधिक स्पष्ट हों। भारतीय संदर्भ में देखें तो यह वैसा ही है जैसे कुछ सरकारी योजनाएं हजारों लाभार्थियों में बहुत कम संसाधन बांटने के बजाय चुनिंदा इकाइयों को गहराई से मजबूत करने का फैसला करें।

तकनीकी उन्नयन निधि के तहत चुनी गई कंपनियों को न्यूनतम 1 करोड़ कोरियाई वॉन के बराबर और अधिकतम 2 करोड़ वॉन तक सहायता मिलेगी, जो भारतीय मुद्रा में मोटे तौर पर कुछ लाख से लेकर दस लाख रुपये से ऊपर की श्रेणी में बैठ सकती है। यह राशि प्रोटोटाइप बनाने, उत्पाद को बेहतर और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने, तकनीक हस्तांतरण, पेटेंट व विभिन्न प्रकार के प्रमाणन, और मार्केटिंग जैसे खर्चों पर लगाई जा सकती है। प्रशासन ने जो खर्च मदें तय की हैं, वे अपने आप में बताती हैं कि उसे स्टार्टअप जीवन-चक्र की असली बाधाओं की समझ है। अक्सर किसी नए उद्यम की असफलता विचार की कमजोरी से नहीं, बल्कि प्रक्रिया की लागत से होती है।

दूसरी ओर ‘एक्सेलरेटर’ सहायता को समझना भी जरूरी है। भारतीय पाठकों के लिए यह शब्द कभी-कभी नया या कुछ तकनीकी लग सकता है। सरल भाषा में कहें तो एक्सेलरेटर ऐसा कार्यक्रम होता है जिसमें शुरुआती कंपनियों को अनुभवी विशेषज्ञ, उद्योग नेटवर्क, निवेशकों तक पहुंच, व्यवसाय रणनीति, विपणन सलाह, प्रस्तुतीकरण कौशल, और कभी-कभी कार्यालय या परीक्षण सुविधाओं तक उपलब्ध कराया जाता है। इसे आप स्टार्टअप की ‘कोचिंग’ कह सकते हैं, लेकिन यह सामान्य प्रशिक्षण से कहीं अधिक व्यावहारिक और बाजार-उन्मुख होता है। अगर तकनीकी अनुदान इंजन के पुर्जे ठीक करता है, तो एक्सेलरेटर ड्राइवर को रास्ता, गति और मंजिल समझाता है।

यही कारण है कि ग्वांगजू की योजना सिर्फ अनुदान वितरण नहीं है। यह धन और संवर्धन—दोनों को जोड़ती है। भारतीय सरकार के ‘स्टार्टअप इंडिया’, राज्य स्तरीय इनक्यूबेशन केंद्रों, अटल इनोवेशन मिशन और विभिन्न आईआईटी-आईआईएम समर्थित उद्यमिता कोशों के अनुभव से भी यही सामने आया है कि पैसा महत्वपूर्ण है, लेकिन अकेला पर्याप्त नहीं। जिन संस्थानों ने मेंटरशिप, बाजार संपर्क और नेटवर्क को पैकेज का हिस्सा बनाया, वहां टिकाऊ परिणामों की संभावना ज्यादा दिखाई दी। ग्वांगजू का यह ढांचा इसी सोच के करीब दिखता है।

कौन होंगे पात्र और इसका सामाजिक अर्थ क्या है

इस योजना के लिए पात्रता की शर्तें बेहद साफ हैं। आवेदन उसी कंपनी को करना है जिसकी स्थापना सार्वजनिक घोषणा की तारीख के आधार पर तीन वर्ष के भीतर हुई हो, जिसका प्रतिनिधि या प्रमुख 39 वर्ष से कम आयु का हो, और जिसका आधार ग्वांगजू शहर में हो। यह तीन शब्दों—युवा, शुरुआती चरण और स्थानीयता—का संयोजन है। यही इस नीति का असली दर्शन भी है। प्रशासन उन उद्यमों को लक्षित कर रहा है जो अभी आकार ले रहे हैं, जिन्हें बाजार तक पहुंचने के लिए धक्का चाहिए, और जो स्थानीय अर्थव्यवस्था में जड़ें जमा सकते हैं।

भारतीय संदर्भ में यह शर्तें काफी परिचित लगेंगी। हमारे यहां भी कई योजनाओं में आयु-सीमा, उद्यम की आयु और भौगोलिक उपस्थिति जैसी शर्तें होती हैं। लेकिन व्यवहार में अक्सर इनमें से किसी एक तत्व पर ज्यादा जोर होता है, बाकी अपेक्षाकृत ढीले रह जाते हैं। ग्वांगजू ने तीनों को एक साथ बांधकर यह संकेत दिया है कि वह ‘युवा उद्यमिता’ को महज पोस्टर-बॉय सफलता कथाओं तक सीमित नहीं रखना चाहता। वह उन कंपनियों तक पहुंचना चाहता है जो अभी नाजुक अवस्था में हैं और जिनका बच पाना ही सबसे बड़ी चुनौती है।

इस नीति से एक और बात उजागर होती है। दक्षिण कोरिया जैसे उन्नत औद्योगिक देश में भी युवा पीढ़ी के सामने केवल नौकरी पाना ही मुद्दा नहीं है; अपने शहर में ठहरकर भविष्य बनाना भी उतना ही बड़ा प्रश्न है। कोरिया में लंबे समय से राजधानी सियोल और उसके आसपास के क्षेत्रों में अवसरों का संकेंद्रण चर्चा का विषय रहा है। ऐसे में ग्वांगजू जैसे शहरों के लिए स्थानीय स्तर पर प्रतिभा रोकना बेहद महत्वपूर्ण है। यदि कोई युवा इंजीनियर, डिज़ाइनर, डेवलपर या छोटे पैमाने का तकनीकी उद्यमी अपने ही शहर में संसाधन, मार्गदर्शन और बाजार समर्थन पा ले, तो उसके सियोल पलायन की संभावना घट सकती है।

यह बात भारत के लिए भी कम प्रासंगिक नहीं। हमारे यहां भी दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे जैसे शहर अवसरों के केंद्र माने जाते हैं। छोटे शहरों से पढ़े-लिखे युवा अक्सर वहीं खिंचे चले जाते हैं। यदि राज्य सरकारें अपने-अपने शहरों में शुरुआती उद्यमों के लिए ऐसी बहुस्तरीय सहायता संरचना तैयार करें—जहां पैसा, प्रमाणन, प्रोटोटाइप, विपणन और मेंटरशिप एक ही ढांचे में उपलब्ध हों—तो स्थानीय रोजगार और नवाचार की तस्वीर बदल सकती है। ग्वांगजू का मॉडल यह याद दिलाता है कि ‘ब्रेन ड्रेन’ को केवल भावनात्मक अपील से नहीं, संस्थागत समर्थन से रोका जाता है।

तकनीकी उन्नयन, पेटेंट और मार्केटिंग पर जोर क्यों महत्वपूर्ण है

किसी भी शुरुआती उद्यम के लिए सबसे कठिन समय वह होता है जब विचार कागज से निकलकर उत्पाद बनने की कोशिश करता है। यह वह चरण है जहां कई स्टार्टअप दम तोड़ देते हैं। कारण साधारण है: उत्पाद बनाने, उसे जांचने, बेहतर बनाने, सुरक्षा या गुणवत्ता प्रमाणन लेने, कानूनी अधिकार सुरक्षित करने और फिर ग्राहकों तक पहुंचाने में पैसा, समय और विशेषज्ञता लगती है। ग्वांगजू प्रशासन ने जिस तरह सहायता मदों की सूची बनाई है, उससे स्पष्ट है कि उसे इसी ‘बॉटलनेक’ की पहचान है।

उदाहरण के लिए, प्रोटोटाइप निर्माण केवल मशीन या सॉफ्टवेयर का प्रारूप तैयार करना नहीं होता; यह उस विचार की पहली वास्तविक परीक्षा है। यदि उत्पाद हार्डवेयर आधारित है तो पुर्जे, डिजाइन, परीक्षण और विनिर्माण लागत जुड़ती है। यदि बायोटेक, हेल्थटेक या फूडटेक से जुड़ा है तो प्रमाणन और अनुपालन की प्रक्रिया अलग से भारी पड़ती है। यदि डिजिटल उत्पाद है तो उपयोगकर्ता अनुभव, डेटा सुरक्षा, सर्वर लागत और बाजार परीक्षण सामने आते हैं। ऐसे में शुरुआती सहायता सीधे इस नाजुक दौर को सहारा देती है।

पेटेंट और प्रमाणन पर जोर भी कम अर्थपूर्ण नहीं है। कोरिया की औद्योगिक अर्थव्यवस्था लंबे समय से गुणवत्ता, विनिर्माण अनुशासन और बौद्धिक संपदा पर टिकी रही है। वहां किसी तकनीकी उद्यम के लिए सिर्फ अच्छा विचार काफी नहीं; उसे कानूनी और व्यावसायिक तौर पर सुरक्षित भी होना पड़ता है। भारतीय पाठकों के लिए यह पहलू इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि हमारे यहां बड़ी संख्या में स्टार्टअप ऐसे हैं जो उत्पाद तो बना लेते हैं, लेकिन प्रमाणन, बौद्धिक संपदा सुरक्षा और अनुपालन के मोर्चे पर कमजोर रह जाते हैं। परिणाम यह होता है कि वे निवेश, सरकारी खरीद या बड़े वितरण नेटवर्क तक पहुंचने में पिछड़ जाते हैं।

मार्केटिंग को सहायता सूची में रखना और भी महत्वपूर्ण संकेत है। अक्सर नीति-निर्माता तकनीकी उत्पाद को ‘अपने दम पर बिकने’ वाली चीज मान लेते हैं। वास्तविकता इससे अलग है। नया उद्यम तभी टिकता है जब वह ग्राहकों के सामने अपनी उपयोगिता, भरोसा और भिन्नता साबित कर सके। खासकर उस दौर में जब डिजिटल विज्ञापन महंगा है और उपभोक्ता का ध्यान खींचना कठिन होता जा रहा है, शुरुआती मार्केटिंग सहायता किसी स्टार्टअप के लिए जीवनरेखा साबित हो सकती है। भारत में भी अगर किसी छोटे शहर का उद्यमी शानदार उत्पाद बनाता है, लेकिन उसे बाजार में दृश्यता नहीं मिलती, तो उसका नवाचार सीमित दायरे में सिमट जाता है। ग्वांगजू की योजना इस बिंदु को प्रशासनिक स्तर पर स्वीकार करती दिखती है।

दरअसल, यह पूरी संरचना एक बड़ा नीति-संदेश देती है: सरकार ‘कंपनी खोलने’ को सफलता नहीं मान रही, बल्कि ‘कंपनी को बाजार में टिकाने’ को सफलता की कसौटी बना रही है। यही बात इसे कई पारंपरिक उद्यमिता योजनाओं से अलग करती है, जो कभी-कभी केवल पंजीकरण संख्या या प्रशिक्षण शिविरों की गिनती तक सीमित रह जाती हैं।

कोरियाई संदर्भ: स्थानीय सरकारें, युवा और शहर में टिकने की राजनीति

दक्षिण कोरिया में स्थानीय स्वशासन इकाइयों की भूमिका भारत से कुछ मायनों में अलग, लेकिन कई मायनों में तुलनीय है। ग्वांगजू जैसे शहर सिर्फ प्रशासनिक इकाई नहीं, बल्कि औद्योगिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक पहचान वाले क्षेत्रीय केंद्र हैं। कोरियाई समाज में युवा पीढ़ी पर शिक्षा, रोजगार और सामाजिक स्थिरता को लेकर काफी दबाव रहता है। ऐसे माहौल में यदि कोई शहर यह कहता है कि वह युवाओं को रोजगार खोजने वाले के बजाय रोजगार बनाने वाले के रूप में समर्थन देगा, तो उसका राजनीतिक और सामाजिक अर्थ दोनों होते हैं।

यह भी ध्यान रखने योग्य है कि कोरिया में ‘युवा’ की नीति-परिभाषा कई बार 39 वर्ष तक जाती है, जो भारतीय पाठकों को कुछ व्यापक लग सकती है। भारत में भी अलग-अलग योजनाओं में युवा की उम्र सीमा बदलती रहती है, लेकिन 39 वर्ष तक की सीमा यह बताती है कि आधुनिक अर्थव्यवस्था में करियर की शुरुआत, पुनःकौशल, और उद्यमिता का समय-चक्र पहले से लंबा हो चुका है। विशेष रूप से उच्च शिक्षा, सैन्य सेवा, पेशेवर प्रशिक्षण, उद्योग अनुभव और पूंजी जुटाने में लगने वाले समय को देखते हुए कोरियाई व्यवस्था ने ‘युवा उद्यमी’ की परिभाषा अपेक्षाकृत व्यावहारिक रखी है।

ग्वांगजू की यह पहल एक और स्तर पर भी पढ़ी जानी चाहिए। कोरिया के कई गैर-राजधानी शहरों के लिए सबसे बड़ी चिंता है—प्रतिभाशाली युवा शहर छोड़कर न चले जाएं। भारत में भी यह भावना अक्सर सुनाई देती है: “पढ़ाई यहां, नौकरी बाहर।” ग्वांगजू इस प्रवृत्ति के खिलाफ संस्थागत जवाब देता दिखता है। वह कह रहा है कि यदि आप स्थानीय हैं, शुरुआती अवस्था में हैं और आपके पास कारोबार का विचार या उत्पाद है, तो शहर आपके साथ खड़ा हो सकता है। यह केवल आर्थिक हस्तक्षेप नहीं, स्थानीय सामाजिक अनुबंध की तरह है।

यहां ‘एक्सेलरेटर’ की भूमिका फिर से महत्वपूर्ण हो जाती है। कोरिया की कारोबारी संस्कृति में नेटवर्क, उद्योग संपर्क और व्यवस्थित तैयारी का बड़ा महत्व है। केवल उत्साह से काम नहीं चलता; प्रस्तुतीकरण, लक्ष्य-निर्धारण, समयबद्ध निष्पादन और गुणवत्ता का अनुशासन भी जरूरी है। एक्सेलरेटर कार्यक्रम इन्हीं क्षमताओं को व्यवस्थित रूप से विकसित करते हैं। भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम में भी महानगरों के बाहर यही अंतर अक्सर देखा जाता है—विचार और ऊर्जा तो होती है, लेकिन अनुभवी मार्गदर्शन और सही नेटवर्क नहीं होता।

भारत के लिए सबक: संख्या नहीं, डिजाइन ज्यादा मायने रखता है

ग्वांगजू की योजना का सबसे बड़ा सबक यह है कि किसी नीति की सफलता केवल उसके बजट या लाभार्थियों की संख्या से नहीं मापी जानी चाहिए। कई बार कम संख्या में लक्षित, सटीक और बहुस्तरीय सहायता ज्यादा प्रभावी होती है। यहां 14 कंपनियां चुनी जाएंगी। पहली नजर में यह आंकड़ा बहुत छोटा लग सकता है। लेकिन यदि इन 14 उद्यमों को तकनीकी उन्नयन, प्रमाणन, मार्केटिंग और पेशेवर संवर्धन के जरिए वास्तव में बाजार तक पहुंचाया जाता है, तो इसका प्रतीकात्मक और व्यावहारिक असर दोनों व्यापक हो सकता है।

भारत में भी स्टार्टअप नीतियों को लेकर यही बहस प्रासंगिक है। क्या हमें बहुत बड़ी संख्या में सूक्ष्म सहायता बांटनी चाहिए, या कम संख्या में उन उद्यमों पर अधिक केंद्रित निवेश करना चाहिए जिनके पास स्थानीय रोजगार पैदा करने और नए बाजार बनाने की वास्तविक क्षमता है? इसका एक ही उत्तर नहीं हो सकता, लेकिन ग्वांगजू का मॉडल यह जरूर बताता है कि शुरुआती चरण के उद्यमों की समस्याएं बहुआयामी होती हैं—और इसलिए समाधान भी पैकेज आधारित होने चाहिए।

दूसरा बड़ा सबक यह है कि ‘लोकल’ को केवल नारे की तरह नहीं, संस्थागत शर्त की तरह गढ़ना पड़ता है। जब पात्रता में शहर-आधारित उपस्थिति अनिवार्य की जाती है, तो सार्वजनिक धन और स्थानीय विकास के बीच सीधा रिश्ता बनता है। भारत में ‘वोकल फॉर लोकल’ का नारा लोकप्रिय रहा है, लेकिन व्यवहार में स्थानीय नवाचार पारिस्थितिकी को मजबूत करने के लिए नगर-स्तरीय और जिला-स्तरीय कार्यक्रमों की गहराई अब भी असमान है। यदि नगर निकाय, राज्य नवाचार परिषदें, विश्वविद्यालय और उद्योग मंडल मिलकर शहर-विशेष उद्यमिता कार्यक्रम चलाएं, तो तस्वीर काफी बदल सकती है।

तीसरा सबक यह कि उद्यमिता को केवल ‘सफलता की चमक’ से नहीं, ‘शुरुआती संघर्ष की वास्तविकता’ से देखना चाहिए। ग्वांगजू की सहायता मदें बताती हैं कि प्रशासन को मालूम है—कई स्टार्टअप निवेशक प्रस्तुति से पहले ही प्रमाणन, नमूना निर्माण, मार्केट फिट और शुरुआती विपणन की लागत में अटक जाते हैं। भारत में भी जिला उद्योग केंद्रों, राज्य स्टार्टअप मिशनों और विश्वविद्यालय इनक्यूबेटरों को ऐसी सूक्ष्म बाधाओं पर अधिक ध्यान देना होगा।

और अंत में, यह योजना याद दिलाती है कि युवा नीति और औद्योगिक नीति के बीच कृत्रिम दीवारें नहीं होनी चाहिए। जब कोई युवा अपने शहर में कंपनी शुरू करता है, तो वह सिर्फ अपने लिए आय का रास्ता नहीं बनाता; वह स्थानीय आपूर्ति श्रृंखला, किराये के बाजार, सेवा क्षेत्र, तकनीकी प्रशिक्षण और भविष्य के रोजगार का भी आधार तैयार कर सकता है। इसलिए युवा उद्यमिता को कल्याण, कौशल, उद्योग और क्षेत्रीय विकास—इन सबके संगम पर रखकर देखने की जरूरत है। ग्वांगजू की पहल इसी व्यापक सोच का संकेत देती है।

आगे क्या देखना होगा

ग्वांगजू की इस घोषणा के बाद असली परीक्षा उसके क्रियान्वयन में होगी। कौन-सी कंपनियां चुनी जाती हैं, चयन प्रक्रिया कितनी पारदर्शी रहती है, तकनीकी उन्नयन के लिए दी गई राशि किस प्रकार के उत्पादों तक पहुंचती है, और एक्सेलरेटर कार्यक्रम कितना परिणाम-केंद्रित साबित होता है—इन सवालों पर आगे नजर रहेगी। यह भी महत्वपूर्ण होगा कि क्या चयनित उद्यम स्थानीय स्तर पर रोजगार, राजस्व या तकनीकी क्षमता का ठोस उदाहरण पेश कर पाते हैं।

फिलहाल इतना स्पष्ट है कि यह पहल केवल ‘युवा स्टार्टअप को प्रोत्साहन’ जैसी सामान्य सरकारी भाषा नहीं दोहरा रही। इसके भीतर एक परिपक्व नीति-दृष्टि दिखाई देती है—यानी युवा उद्यमिता का संकट कंपनी रजिस्ट्रेशन की कमी नहीं, बल्कि बाजार में टिकाव की कमी है। इसीलिए पैसा और पेशेवर मार्गदर्शन साथ-साथ दिया जा रहा है। यही सोच इसे सामाजिक रूप से प्रासंगिक बनाती है।

भारतीय हिंदी भाषी पाठकों के लिए यह खबर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दक्षिण कोरिया को हम अक्सर के-पॉप, के-ड्रामा, इलेक्ट्रॉनिक्स और तेज रफ्तार शहरी जीवन के संदर्भ में देखते हैं। लेकिन उस चमकदार सांस्कृतिक निर्यात के पीछे स्थानीय सरकारों, उद्योग नीतियों और कौशल-आधारित आर्थिक संरचना का लंबा काम भी है। ग्वांगजू की यह योजना उसी कम चर्चित, लेकिन निर्णायक कोरिया की झलक देती है—जहां शहर अपने युवाओं से सिर्फ उम्मीद नहीं करते, बल्कि उन्हें संरचित सहारा देने की कोशिश भी करते हैं।

अगर भारत के शहर भी इस संदेश को गंभीरता से लें, तो युवा उद्यमिता की बहस ‘यूनिकॉर्न’ से निकलकर ‘स्थानीय टिकाऊ कारोबार’ की तरफ बढ़ सकती है। और शायद यही किसी भी समाज के लिए अधिक महत्वपूर्ण है: कुछ बड़े प्रतीक नहीं, बल्कि हजारों छोटे लेकिन मजबूत आर्थिक स्तंभ। ग्वांगजू की 14 कंपनियों वाली योजना संख्या में भले सीमित हो, लेकिन सोच में यह काफी बड़ी दिखाई देती है।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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