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सियोल का ‘अजा रनर’: जब मैराथन पदक से आगे बढ़कर पिता-पुत्र/पुत्री के रिश्ते, साझा परवरिश और रोजमर्रा की फिटनेस का उत्सव ब

सियोल से आई एक छोटी-सी खबर, लेकिन अर्थ बहुत बड़ा

दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल से इस हफ्ते जो खबर सामने आई, वह पहली नजर में एक सामान्य खेल आयोजन की सूचना लग सकती है। सियोल महानगर सरकार और सियोल फैमिली सेंटर ने घोषणा की है कि 22 तारीख से अगले महीने की 5 तारीख तक पिता और बच्चों की टीमों के लिए एक अनोखी वर्चुअल मैराथन आयोजित की जाएगी, जिसका नाम है ‘अजा रनर’। नाम ही अपने आप में संकेत देता है कि यह सिर्फ दौड़ का कार्यक्रम नहीं, बल्कि पिता और संतान के बीच साझेदारी, साथ-साथ समय बिताने और देखभाल की जिम्मेदारियों को साझा करने का सार्वजनिक संदेश है। दक्षिण कोरिया में इसे पुरुष अभिभावकों की सक्रिय भागीदारी को प्रोत्साहित करने वाले अभियान की तरह देखा जा रहा है।

भारतीय पाठकों के लिए यह खबर इसलिए दिलचस्प है, क्योंकि हम भी ऐसे समय में जी रहे हैं जब परिवार, काम, बच्चों की परवरिश और फिटनेस—इन सबके बीच संतुलन का सवाल लगातार बड़ा होता जा रहा है। हमारे शहरों में भी ‘फैमिली टाइम’ शब्द बहुत सुनाई देता है, लेकिन अक्सर वह मोबाइल स्क्रीन, मॉल या रेस्तरां तक सीमित रह जाता है। ऐसे में सियोल का यह प्रयोग याद दिलाता है कि परिवार के साथ समय बिताना किसी बड़े बजट, बड़े आयोजन या लंबी छुट्टी का मोहताज नहीं होता। कभी-कभी घर के आसपास की सड़क, पार्क, कॉलोनी का ट्रैक, या मोहल्ले की गली भी रिश्तों को मजबूत करने का मंच बन सकती है।

‘अजा रनर’ की सबसे खास बात यह है कि इसमें जीत-हार, रिकॉर्ड और रैंकिंग को केंद्र में नहीं रखा गया है। जोर इस पर है कि पिता और बच्चे मिलकर एक लक्ष्य तय करें, दो हफ्तों तक लगातार उसे पूरा करने की कोशिश करें, और उस सफर को साझा अनुभव में बदलें। यह मॉडल पारंपरिक मैराथन से अलग है, जहां फिनिश लाइन, टाइमिंग और पोजिशन अहम होते हैं। यहां असली उपलब्धि यह है कि परिवार ने साथ चलना, साथ दौड़ना और साथ बने रहना सीखा। खेल को सामाजिक रिश्तों के साथ जोड़ने की यह सोच आधुनिक शहरी जीवन के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है।

कई भारतीय परिवारों में भी हम देखते हैं कि बच्चों की परवरिश का भावनात्मक और व्यावहारिक बोझ अधिकतर माताओं पर आ जाता है, जबकि पिता की भूमिका कई बार ‘कमाने वाले’ या ‘अनुशासन रखने वाले’ व्यक्ति तक सीमित समझी जाती है। हालांकि यह तस्वीर तेजी से बदल भी रही है। नए शहरी भारत में पिता अब स्कूल मीटिंग में जाते हैं, बच्चों के साथ होमवर्क करते हैं, वीकेंड एक्टिविटी में हिस्सा लेते हैं और भावनात्मक उपस्थिति का महत्व समझने लगे हैं। सियोल का यह कार्यक्रम उसी बदलाव को संस्थागत रूप देने की कोशिश जैसा लगता है—जहां सरकार और सामाजिक संस्थाएं मिलकर कह रही हैं कि पालन-पोषण सिर्फ निजी मामला नहीं, सामाजिक संस्कृति का भी हिस्सा है।

यही कारण है कि यह खबर खेल पन्ने की एक संक्षिप्त सूचना भर नहीं रह जाती। यह खेल, परिवार, लैंगिक भूमिकाओं और शहरी जीवनशैली के चौराहे पर खड़ी एक ऐसी पहल है, जिसे भारत जैसे समाज में भी गंभीरता से पढ़ा जाना चाहिए।

रिकॉर्ड नहीं, रिश्ता: मैराथन की परिभाषा बदलने की कोशिश

मैराथन का नाम आते ही हमारे मन में कुछ तयशुदा दृश्य उभरते हैं—सुबह-सुबह बड़ी भीड़, बैरिकेड लगी सड़कें, स्टार्टिंग गन, चिप टाइमिंग, फिनिशर मेडल, और सोशल मीडिया पर पोस्ट होती तस्वीरें। बड़े शहरों में होने वाली मैराथन अब प्रतिष्ठा, फिटनेस और नेटवर्किंग का भी हिस्सा बन चुकी हैं। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद या कोलकाता जैसे शहरों में कॉर्पोरेट समूह, रनिंग क्लब और फिटनेस ब्रांड मिलकर इसे जीवनशैली आयोजन बना चुके हैं। लेकिन सियोल का ‘अजा रनर’ इस पूरे ढांचे को पलट देता है। वह पूछता है—क्या दौड़ का मतलब सिर्फ तेज दौड़ना है, या साथ दौड़ना भी उतना ही महत्वपूर्ण हो सकता है?

इस कार्यक्रम का मूल विचार यही है कि परिवार अपने हिसाब से लक्ष्य तय करे। किसी के लिए यह प्रतिदिन 20 मिनट पैदल चलना हो सकता है, किसी के लिए हर शाम पार्क में हल्की दौड़, तो किसी के लिए पूरे दो हफ्ते तक स्क्रीन टाइम घटाकर आउटडोर गतिविधि अपनाना। यह लचीलापन आयोजन को लोकतांत्रिक बनाता है। खेल केवल उन्हीं के लिए नहीं रह जाता जो पहले से फिट हैं, जिन्हें महंगे जूते खरीदने आते हैं, या जिनके पास प्रशिक्षण का समय है। यहां खेल का दरवाजा उन परिवारों के लिए भी खुलता है जो बस शुरू करना चाहते हैं।

भारतीय संदर्भ में इस विचार का महत्व और बढ़ जाता है। हमारे यहां खेल को अभी भी कई घरों में ‘अतिरिक्त’ गतिविधि माना जाता है—पढ़ाई और नौकरी के बाद बचा समय हो तो ठीक, वरना नहीं। खासकर मध्यवर्गीय परिवारों में बच्चे की सफलता का अर्थ लंबे समय तक परीक्षा, कोचिंग और करियर की तैयारी से जोड़ा गया है। ऐसे माहौल में यदि खेल को प्रतियोगिता से हटाकर पारिवारिक आदत में बदला जाए, तो उसका असर कहीं गहरा हो सकता है। इससे बच्चा खेल को दबाव के रूप में नहीं, आनंद और जुड़ाव के रूप में देखेगा।

यहां यह समझना जरूरी है कि खेल की सामाजिक भूमिका सिर्फ पदक पैदा करना नहीं है। खेल अनुशासन, सहयोग, मानसिक स्वास्थ्य, आत्मविश्वास और सामुदायिक भावना भी बनाता है। जब पिता और संतान एक टीम बनते हैं, तो उनके बीच संवाद का नया रास्ता खुलता है। बच्चा देखता है कि उसका अभिभावक सिर्फ नियम बताने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि उसके साथ प्रयास करने वाला साथी भी है। पिता भी बच्चे की शारीरिक क्षमता, उत्साह, संकोच और मनोस्थिति को अधिक करीब से समझ पाते हैं।

इस तरह ‘अजा रनर’ हमें यह याद दिलाता है कि मैराथन का एक मानवीय चेहरा भी हो सकता है। जहां सांसों की लय, कदमों की गति और रास्ते की दूरी से ज्यादा मायने उस प्रक्रिया के हैं जिसमें दो पीढ़ियां साथ चलती हैं। भारत में यदि इस तरह के पारिवारिक रन या वॉक कार्यक्रम अधिक संस्थागत हों, तो वे फिटनेस अभियान से बढ़कर सामाजिक बदलाव का साधन बन सकते हैं।

वर्चुअल प्रारूप क्यों महत्वपूर्ण है, खासकर बड़े शहरों के लिए

सियोल का यह आयोजन वर्चुअल या गैर-आमने-सामने प्रारूप में होगा। यानी सभी प्रतिभागियों को एक ही स्थान पर, एक ही समय पर इकट्ठा नहीं होना है। वे अपनी सुविधा के अनुसार, अपने पसंदीदा स्थान पर और अपने पारिवारिक शेड्यूल के हिसाब से इस दौड़ में भाग ले सकते हैं। आज के शहरी जीवन में यह साधारण बात नहीं है। यही वह बिंदु है जो इस कार्यक्रम को व्यवहारिक और व्यापक बनाता है।

सियोल जैसे घनी आबादी वाले शहर में समय सबसे बड़ी पूंजी है। भारत के महानगरों में भी यही स्थिति है। सुबह दफ्तर, स्कूल बस, ट्रैफिक, ट्यूशन, देर रात वापसी—ऐसे में किसी एक रविवार को सबको एक मैदान या स्टेडियम तक लाना कई परिवारों के लिए मुश्किल हो सकता है। वर्चुअल फॉर्मेट इस बाधा को तोड़ देता है। अगर पिता की ड्यूटी शिफ्ट में है, बच्चा छोटा है, या परिवार सप्ताहांत में व्यस्त रहता है, तब भी भागीदारी संभव है। यह लचीलापन ही कार्यक्रम की असली ताकत है।

भारत में कोविड-19 महामारी के बाद वर्चुअल रन, ऑनलाइन फिटनेस चैलेंज और ऐप-आधारित वेलनेस कार्यक्रमों का चलन बढ़ा था, लेकिन महामारी के उतरते ही उनमें से कई पहलें फीकी पड़ गईं। उसका एक कारण यह भी था कि उनमें सामुदायिक अर्थ कम और व्यक्तिगत लक्ष्य अधिक थे। सियोल का मॉडल इससे थोड़ा अलग दिखता है, क्योंकि यहां तकनीक सिर्फ सुविधा का साधन है; केंद्र में परिवार और अनुभव है। यानी डिजिटल ढांचा मानवीय संबंधों को सपोर्ट करता है, प्रतिस्थापित नहीं करता।

यह बात भारतीय शहरों में विशेष रूप से लागू हो सकती है। दिल्ली-एनसीआर की सोसायटियों, मुंबई के सी-फेस, पुणे के पार्क, बेंगलुरु के लेआउट, लखनऊ और जयपुर के सार्वजनिक उद्यान, या छोटे शहरों के स्टेडियम—इन सब जगहों पर परिवार अपनी सुविधा से ऐसी भागीदारी कर सकते हैं। यदि स्थानीय नगर निगम, स्कूल, आरडब्ल्यूए, महिला एवं बाल विकास विभाग या खेल प्राधिकरण मिलकर ऐसा मॉडल अपनाएं, तो भागीदारी का दायरा तेजी से बढ़ सकता है।

वर्चुअल प्रारूप का एक और महत्व है—यह ‘परफॉर्मेंस एंग्जायटी’ कम करता है। बहुत से माता-पिता और बच्चे किसी बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम में इसलिए हिस्सा नहीं लेते क्योंकि उन्हें लगता है कि वे पर्याप्त फिट नहीं हैं, वे धीमे पड़ जाएंगे, या लोग उन्हें देखेंगे। जब वही गतिविधि परिचित माहौल में होती है, तो हिचक कम होती है। घर के पास का पार्क, स्कूल का मैदान, या सुरक्षित पैदल पथ बच्चों के लिए ज्यादा अनुकूल महसूस हो सकता है।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि वर्चुअल आयोजन में सामूहिकता कम हो जाती है। यदि प्रतिभागियों को मिशन डायरी, डिजिटल अपडेट, फोटो साझा करने के विकल्प, और लक्ष्य पूरा करने के बाद पहचान मिले, तो वे खुद को बड़े समुदाय का हिस्सा महसूस करते हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसे भारत में लोग योग दिवस, साइक्लिंग चैलेंज या स्वच्छता अभियान में स्थानीय स्तर पर भाग लेकर भी राष्ट्रीय पहल से जुड़े महसूस करते हैं। सियोल का ‘अजा रनर’ इसी संतुलन को साधता दिखता है—निजी सुविधा और सार्वजनिक उद्देश्य के बीच संतुलन।

‘साझा परवरिश’ का संदेश: कोरियाई समाज से भारत के लिए सबक

इस पहल की सबसे महत्वपूर्ण परत खेल नहीं, बल्कि सामाजिक संदेश है। दक्षिण कोरिया में इस कार्यक्रम को पुरुष अभिभावकों की ‘को-पैरेंटिंग’ या साझा परवरिश में भागीदारी बढ़ाने की पहल के रूप में देखा जा रहा है। वहां इसके लिए एक शब्द और विचारधारा मौजूद है, जिसका आशय यह है कि बच्चे की देखभाल सिर्फ मां का दायित्व नहीं, बल्कि माता-पिता दोनों की साझा जिम्मेदारी है। खेल को उस जिम्मेदारी की सार्वजनिक अभिव्यक्ति का साधन बनाना अपने आप में उल्लेखनीय है।

भारतीय समाज में भी यह मुद्दा बेहद प्रासंगिक है। पारिवारिक संरचना बदल रही है। संयुक्त परिवारों की जगह तेजी से न्यूक्लियर परिवार बढ़ रहे हैं। कामकाजी माताओं की संख्या बढ़ी है, लेकिन घरेलू काम और बच्चों की जिम्मेदारी का अनुपातिक पुनर्वितरण अभी भी अधूरा है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षणों, श्रम भागीदारी और समय उपयोग संबंधी अध्ययनों में बार-बार सामने आता है कि महिलाओं पर देखभाल का बोझ अधिक है। ऐसे में यदि पिता की भागीदारी को नीतिगत और सांस्कृतिक स्तर पर बढ़ावा मिले, तो उसका असर केवल बच्चों पर नहीं, पूरे परिवार की सेहत पर पड़ सकता है।

यहां ध्यान देने वाली बात है कि ‘अच्छा पिता’ होने का विचार भी बदल रहा है। पहले इसे आर्थिक सुरक्षा देने तक सीमित मान लिया जाता था। अब बच्चों के साथ भावनात्मक रूप से उपलब्ध रहना, उनकी दिनचर्या में भाग लेना, खेलना, सुनना, स्कूल और स्वास्थ्य संबंधी फैसलों में सक्रिय होना—ये सब भी पितृत्व के जरूरी हिस्से माने जाने लगे हैं। सियोल का यह कार्यक्रम इसी परिवर्तन को दृश्य रूप देता है। वह कहता है कि पिता होना सिर्फ जिम्मेदारी निभाना नहीं, संबंध बनाना भी है।

भारत में यदि हम इसकी तुलना करें, तो कई सकारात्मक उदाहरण पहले से मौजूद हैं। बड़े शहरों में ‘डैड्स ग्रुप’, पैरेंटिंग वर्कशॉप, पिता-बच्चा कैंपिंग और स्कूलों के फैमिली स्पोर्ट्स डे जैसी अवधारणाएं उभर रही हैं। लेकिन वे अभी सीमित वर्गों तक सिमटी हैं। सरकारी या नगर-स्तरीय मंच से यदि इस दिशा में पहल हो, तो संदेश कहीं व्यापक हो सकता है। जैसे आंगनवाड़ी नेटवर्क, स्कूल शिक्षा विभाग, नगर निगम पार्क, मोहल्ला क्लीनिक जैसे सार्वजनिक ढांचे से जुड़े कार्यक्रमों में ‘पिता की भागीदारी’ को भी सामाजिक अभियान बनाया जा सकता है।

कई भारतीय घरों में बच्चों की दिनचर्या के छोटे-छोटे काम—उन्हें पार्क ले जाना, होमवर्क कराना, डॉक्टर के पास ले जाना, खेल में साथ देना—अब भी माताओं के हिस्से ज्यादा आते हैं। यदि पिता इन्हीं गतिविधियों में नियमित रूप से शामिल हों, तो परिवार के भीतर श्रम का बंटवारा संतुलित होता है। बच्चे भी लैंगिक भूमिकाओं को नए ढंग से समझते हैं। वे सीखते हैं कि देखभाल किसी एक लिंग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि परिवार का साझा कार्य है। ‘अजा रनर’ जैसा आयोजन इस सीख को किताबों की नैतिक शिक्षा की बजाय रोजमर्रा के अनुभव के जरिए देता है।

यही कारण है कि यह खबर खेल से कहीं आगे चली जाती है। यह परिवार नीति, लैंगिक समानता और सार्वजनिक स्वास्थ्य—तीनों के संगम पर खड़ी है। भारत में भी यदि ऐसी पहलें बढ़ती हैं, तो उनका असर आने वाली पीढ़ियों की सोच पर दिखाई दे सकता है।

गुड्स, मिशन डायरी और प्रतीकवाद: छोटे तत्व, बड़ा असर

सियोल के इस कार्यक्रम में प्रतिभागियों को फिनिशर मेडल, मिशन नोटबुक, बिब नंबर और कलाई सुरक्षा पट्टी जैसे सामान दिए जाएंगे। सुनने में यह मामूली लग सकता है, लेकिन व्यवहार विज्ञान और सामुदायिक कार्यक्रमों की दृष्टि से देखें तो ऐसे प्रतीकात्मक तत्व बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। वे किसी गतिविधि को औपचारिक पहचान देते हैं, उत्साह पैदा करते हैं और प्रतिभागियों को यह महसूस कराते हैं कि वे किसी बड़े सामूहिक प्रयास का हिस्सा हैं।

भारतीय परिप्रेक्ष्य में सोचें तो स्कूलों में मिलने वाला छोटा-सा बैज, NCC का प्रमाणपत्र, खेल दिवस का रिबन, या मंदिर-मेला-समारोह में मिलने वाला स्मृति-चिह्न—इन सबका भावनात्मक असर वास्तविक होता है। बच्चे विशेष रूप से ऐसी वस्तुओं से जुड़ाव महसूस करते हैं। अगर किसी परिवार को दो हफ्ते तक एक लक्ष्य के साथ चलना है, तो मिशन डायरी जैसी चीज उस प्रतिबद्धता को ठोस रूप देती है। वे उसमें लिख सकते हैं कि आज कितने कदम चले, किस दिन आलस आया, कब बारिश हुई, किस दिन बच्चे ने सबसे ज्यादा उत्साह दिखाया। इस तरह डायरी एक निजी दस्तावेज बन जाती है, जो आयोजन खत्म होने के बाद भी स्मृति के रूप में बची रहती है।

वर्चुअल कार्यक्रमों में यही ‘भौतिक स्पर्श’ सबसे ज्यादा कमी के रूप में महसूस होता है। जब सब कुछ मोबाइल स्क्रीन पर हो, तो उत्सव का एहसास हल्का पड़ सकता है। मेडल, बिब और कलाईबैंड जैसी चीजें उस कमी को भरती हैं। वे यह बताते हैं कि घर के आसपास की साधारण दौड़ भी उतनी ही अर्थपूर्ण है जितनी किसी बड़े स्टेडियम में आयोजित प्रतियोगिता। खासकर बच्चों के लिए यह अनुभव प्रेरक हो सकता है। वे महसूस करते हैं कि उनकी कोशिश को मान्यता मिली है।

भारत में भी कई स्वयंसेवी संगठन और निजी फिटनेस मंच इस तरह के किट का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन यदि इसे परिवार-केंद्रित सामाजिक अभियान के साथ जोड़ा जाए तो प्रभाव अलग हो सकता है। कल्पना कीजिए कि किसी शहर में ‘मां-बेटी वॉक’, ‘पिता-बच्चा रन’, ‘दादा-दादी फिटनेस सप्ताह’ या ‘परिवार साइकलिंग चुनौती’ जैसे कार्यक्रम हों और उनमें स्कूल, नगर निकाय तथा स्थानीय क्लब शामिल हों। तब यह केवल फिटनेस उत्पाद नहीं, बल्कि नागरिक संस्कृति का हिस्सा बन सकता है।

सियोल का मॉडल यहां भी सीख देता है कि किसी अच्छी सामाजिक पहल को सिर्फ नारे से नहीं, अनुभव-डिजाइन से भी मजबूत किया जाता है। लोगों को भाग लेने, याद रखने और दोबारा जुड़ने के लिए छोटे-छोटे लेकिन भावनात्मक रूप से असरदार साधन चाहिए। यही वजह है कि इस आयोजन के ‘गुड्स’ महज प्रचार सामग्री नहीं, बल्कि भागीदारी की मनोविज्ञान समझने का हिस्सा हैं।

भारत के लिए क्या संकेत हैं: पार्कों से नीति तक

इस खबर को भारत के संदर्भ में पढ़ते हुए सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हमारे शहर भी इस तरह की पहलें अपना सकते हैं? जवाब है—हां, और शायद बहुत प्रभावी ढंग से। भारत के पास पहले से ऐसे कई ढांचे मौजूद हैं जिनका उपयोग परिवार-आधारित खेल और वेलनेस अभियानों के लिए किया जा सकता है। नगर निगम के पार्क, स्मार्ट सिटी परियोजनाएं, स्कूल परिसर, खेल विभाग, सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियान और डिजिटल प्लेटफॉर्म—इन सबको जोड़कर स्थानीय स्तर पर अत्यंत उपयोगी कार्यक्रम बनाए जा सकते हैं।

मान लीजिए किसी शहर का प्रशासन हर साल एक ‘फैमिली मूवमेंट फोर्टनाइट’ आयोजित करे, जिसमें परिवार अपनी सुविधा से चलना, दौड़ना, साइकिल चलाना या योग जैसी गतिविधि अपनाएं। स्कूल बच्चों को प्रेरित करें, स्वास्थ्य विभाग इसे मोटापा-निरोध और मानसिक स्वास्थ्य से जोड़े, और स्थानीय समुदाय इसकी निगरानी तथा उत्साहवर्धन करें। इससे कई स्तरों पर लाभ हो सकते हैं—बच्चों की शारीरिक सक्रियता बढ़ेगी, अभिभावकों का स्क्रीन-निर्भर जीवन थोड़ा संतुलित होगा, और परिवार के भीतर संवाद के अवसर बढ़ेंगे।

भारत में बाल स्वास्थ्य को लेकर दोहरी चुनौती है। एक तरफ कुपोषण, दूसरी ओर शहरी बच्चों में बढ़ता मोटापा और निष्क्रिय जीवनशैली। इसी तरह मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियां भी उभर रही हैं—अकेलापन, पढ़ाई का दबाव, डिजिटल निर्भरता, और पारिवारिक संवाद में कमी। ऐसे में खेल को केवल स्टेडियम या अकादमी तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं है। उसे घरों के भीतर और मोहल्लों के बीच ले जाना होगा। सियोल का यह कार्यक्रम उसी दिशा की याद दिलाता है।

इसके साथ सुरक्षा और समावेशन पर भी ध्यान देना होगा। भारत के कई शहरों में फुटपाथ, सुरक्षित पार्क, स्वच्छ सार्वजनिक शौचालय, पर्याप्त रोशनी और यातायात नियंत्रण जैसी बुनियादी बातें अब भी चुनौती हैं। यदि परिवारों को नियमित रूप से बाहर निकलकर चलना-दौड़ना है, तो शहरी ढांचे को भी अधिक मानवीय बनाना पड़ेगा। यही वह जगह है जहां खेल नीति, शहरी योजना और सामाजिक नीति एक-दूसरे से मिलती हैं।

एक और महत्वपूर्ण पक्ष है—कार्य संस्कृति। यदि माता-पिता, खासकर पिता, अपने बच्चों के साथ समय बिताना चाहते हैं तो उन्हें समय भी चाहिए। दक्षिण कोरिया की तरह भारत में भी कई पेशों में लंबी कार्य अवधि सामान्य बात है। इसलिए साझा परवरिश की बात केवल प्रेरक संदेशों से पूरी नहीं होगी; उसे परिवार-अनुकूल कार्य नीतियों, पितृत्व अवकाश, लचीले समय और सामाजिक स्वीकृति से भी समर्थन चाहिए। ऐसे सार्वजनिक कार्यक्रम समाज को यह संकेत देते हैं कि अभिभावक की भूमिका में समय देना मूल्यवान और सम्मानजनक है।

इस नजरिए से देखें तो ‘अजा रनर’ एक शहर-स्तरीय वर्चुअल मैराथन भर नहीं, बल्कि भविष्य के शहरी समाज का एक खाका है—जहां खेल केवल तमाशा नहीं, जीवनशैली है; जहां पिता केवल कमाने वाले नहीं, देखभाल करने वाले भी हैं; और जहां बच्चों के साथ बिताया गया समय किसी विलासिता की वस्तु नहीं, बल्कि सामाजिक निवेश है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह खबर, भले इसमें कोई स्टार खिलाड़ी नहीं

आज के खेल समाचार अक्सर बड़े नामों, ट्रॉफियों, लीगों और अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों के इर्द-गिर्द घूमते हैं। दर्शकों की रुचि भी स्वाभाविक रूप से वहीं जाती है। लेकिन खेल संस्कृति केवल उन्हीं रोशनी वाले मंचों पर नहीं बनती। वह उन जगहों पर भी आकार लेती है जहां आम लोग अपने शरीर, समय और रिश्तों के साथ खेल को जोड़ते हैं। सियोल की यह पहल उसी ‘जमीनी खेल संस्कृति’ का उदाहरण है। इसमें कोई सुपरस्टार नहीं, कोई रिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन नहीं, कोई प्रसारित फाइनल नहीं—फिर भी इसकी सामाजिक प्रतिध्वनि गहरी है।

भारत में भी हमें खेल समाचारों के इस व्यापक अर्थ को समझने की जरूरत है। जब कोई शहर परिवार-केंद्रित खेल कार्यक्रम बनाता है, तो वह नागरिक जीवन की गुणवत्ता पर निवेश कर रहा होता है। वह लोगों से कह रहा होता है कि स्वस्थ समाज सिर्फ अस्पतालों से नहीं, बल्कि पार्कों, पगडंडियों, सुरक्षित सड़कों और सक्रिय परिवारों से बनता है। यह निवेश दीर्घकाल में स्वास्थ्य खर्च कम कर सकता है, सामाजिक तनाव घटा सकता है और बच्चों में बेहतर आदतें विकसित कर सकता है।

‘अजा रनर’ की खबर इसलिए भी असरदार है क्योंकि इसमें एक सादगी है। यह बताती है कि परिवर्तन हमेशा किसी विशाल आयोजन से शुरू नहीं होता। कभी-कभी बस इतना काफी है कि एक पिता और उसका बच्चा शाम को साथ निकलें, एक छोटा लक्ष्य तय करें, रास्ते भर बातें करें, और अगले दिन फिर वही दोहराएं। दो हफ्तों का यह क्रम कई परिवारों के लिए ऐसी आदत में बदल सकता है जो लंबे समय तक बनी रहे।

भारतीय समाज में जहां एक ओर पारिवारिक निकटता की परंपरा मजबूत मानी जाती है, वहीं दूसरी ओर आधुनिक शहरी जीवन ने साथ बिताए समय को सीमित भी किया है। ऐसे में यह पहल एक याद दिलाने वाली खबर है—परिवार का अर्थ केवल साथ रहना नहीं, साथ करना भी है। खेल उस ‘साथ’ को सहज और आनंदपूर्ण बना सकता है। न उपदेश की तरह, न बोझ की तरह, बल्कि साझा अनुभव की तरह।

अंततः सियोल की यह पहल हमें खेल की एक वैकल्पिक भाषा सिखाती है—जहां प्रतिस्पर्धा से अधिक सहयोग है, पदक से अधिक स्मृति है, और प्रदर्शन से अधिक सहभागिता है। भारतीय पाठकों के लिए इस खबर का सार यही है: कभी-कभी सबसे बड़ी दौड़ वह नहीं होती जो स्टेडियम में जीती जाए, बल्कि वह होती है जो परिवार अपने रोजमर्रा के जीवन में साथ मिलकर शुरू करे।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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