
भारत-कोरिया रिश्तों में अब प्रशासन और समाज नीति का नया अध्याय
भारत और दक्षिण कोरिया के संबंधों की चर्चा आम तौर पर व्यापार, प्रौद्योगिकी, रक्षा सहयोग, सेमीकंडक्टर, ऑटोमोबाइल या लोकप्रिय संस्कृति—विशेषकर के-ड्रामा और के-पॉप—के संदर्भ में होती है। लेकिन इस बार बातचीत का केंद्र कुछ अलग रहा। दक्षिण कोरिया के प्रशासन एवं सुरक्षा से जुड़े शीर्ष मंत्री यून हो-जुंग ने 17 से 20 तारीख के बीच भारत का दौरा किया और इस दौरान भारतीय मंत्रियों व संसदीय प्रतिनिधियों से मुलाकात कर उन विषयों पर चर्चा की, जो पहली नजर में तकनीकी लग सकते हैं, लेकिन असल में आम लोगों के रोजमर्रा के जीवन से गहराई से जुड़े हैं। इनमें सबसे प्रमुख रहे—स्थानीय इलाकों का जनसंख्या क्षरण, सरकारी कामकाज में सुधार और आपदा सुरक्षा सहयोग।
कोरियाई प्रशासनिक ढांचे में जिस मंत्रालय ने यह पहल की है, वह केवल कागजी फाइलों का विभाग नहीं है। दक्षिण कोरिया का ‘मिनिस्ट्री ऑफ द इंटीरियर एंड सेफ्टी’ यानी प्रशासन और सुरक्षा मंत्रालय, केंद्र और स्थानीय प्रशासन दोनों के साथ-साथ सुरक्षा, आपदा प्रबंधन और क्षेत्रीय नीति जैसे अहम विषयों को संभालता है। भारतीय संदर्भ में देखें तो यह कुछ हद तक गृह मंत्रालय, कार्मिक सुधार, आपदा प्रबंधन और राज्य-स्थानीय प्रशासन से जुड़े आयामों का संयुक्त रूप लगता है। इसलिए इस मंत्रालय की भारत यात्रा को केवल औपचारिक कूटनीतिक कार्यक्रम मान लेना पर्याप्त नहीं होगा।
यून हो-जुंग ने भारत में आवासन और शहरी कार्य से जुड़े मंत्री मनोहर लाल तथा केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह से मुलाकात की। इसके अलावा उन्होंने भारतीय संसद से जुड़े नेताओं से भी बातचीत की, जिनमें लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और भारत-कोरिया संसदीय मैत्री तंत्र से जुड़े प्रतिनिधि शामिल रहे। इस पूरे कार्यक्रम का संदेश साफ था: भारत और दक्षिण कोरिया अपने रिश्ते को केवल निवेश और उद्योग तक सीमित नहीं रखना चाहते, बल्कि शासन, सार्वजनिक सेवा, स्थानीय असमानता और संकट-प्रबंधन जैसे ऐसे क्षेत्रों तक ले जाना चाहते हैं, जिनका असर सीधे नागरिकों की जिंदगी पर पड़ता है।
यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 21वीं सदी की कूटनीति अब सिर्फ सीमा, सेना और बाजार की भाषा में नहीं चलती। आज देशों के बीच यह भी साझा सवाल है कि गांव खाली क्यों हो रहे हैं, छोटे शहर कमजोर क्यों पड़ रहे हैं, सरकारी सेवा नागरिक तक तेज और भरोसेमंद तरीके से कैसे पहुंचे, और जलवायु, बाढ़, आग, महामारी या शहरी संकट के समय राज्य की क्षमता कितनी मजबूत है। भारत और दक्षिण Korea की ताजा बातचीत इसी बड़े वैश्विक प्रश्न से जुड़ती दिखती है।
‘स्थानीय विलुप्ति’ क्या है, और कोरिया इसे इतना गंभीर संकट क्यों मानता है?
कोरियाई समाचारों में हाल के वर्षों में एक शब्द बार-बार सुनाई देता है—‘जिबांग सो멸’ यानी मोटे तौर पर कहें तो ‘स्थानीय विलुप्ति’ या ‘क्षेत्रीय लोप’। यह शब्द सुनकर लग सकता है कि बात केवल जनगणना के आंकड़ों की हो रही है, लेकिन असल अर्थ इससे कहीं व्यापक है। इसका मतलब है कि राजधानी और बड़े महानगरीय केंद्रों से बाहर के इलाके इस हद तक आबादी खोने लगें कि वहां स्कूल, अस्पताल, परिवहन, स्थानीय कारोबार, बुजुर्ग देखभाल और सामुदायिक जीवन जैसे बुनियादी ढांचे को टिकाए रखना कठिन हो जाए।
दक्षिण कोरिया में सियोल महानगर और उसके आसपास का इलाका लंबे समय से आर्थिक, शैक्षिक और रोजगार अवसरों का सबसे बड़ा केंद्र रहा है। नतीजा यह हुआ कि छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों से युवाओं का पलायन बढ़ा। कम जन्मदर और वृद्ध होती आबादी ने इस संकट को और गहरा किया। जब किसी जिले या कस्बे में युवा कम होते जाते हैं, तो सिर्फ जनसंख्या नहीं घटती—वहां का सामाजिक आत्मविश्वास भी कम होने लगता है। स्कूलों में बच्चों की संख्या घटती है, स्थानीय बाजार सिमटते हैं, सार्वजनिक बस सेवाएं कम होती हैं, और बुजुर्ग आबादी का अनुपात बढ़ता जाता है।
भारतीय पाठकों के लिए इसे समझना कठिन नहीं है। हमारे यहां भी कई राज्यों में ऐसी तस्वीरें मिलती हैं जहां रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के कारण लोग छोटे कस्बों से महानगरों की ओर खिंचते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, बुंदेलखंड, विदर्भ, पहाड़ी जिलों या पूर्वोत्तर के कुछ इलाकों से बड़े शहरों की ओर होने वाला पलायन इस चर्चा को भारतीय जमीन देता है। फर्क सिर्फ इतना है कि भारत में कुल जनसंख्या अभी भी बढ़ती हुई और संरचनात्मक रूप से युवा है, जबकि दक्षिण कोरिया बहुत कम जन्मदर और तेजी से वृद्ध हो रही आबादी से जूझ रहा है। इसलिए कोरिया में यह संकट अधिक तीखे रूप में सामने आया है।
यहां एक महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि ‘स्थानीय विलुप्ति’ केवल आर्थिक पिछड़ेपन का दूसरा नाम नहीं है। यह प्रशासनिक चुनौती भी है। सवाल यह है कि जब किसी क्षेत्र की आबादी घट रही हो, तब सरकार वहां सेवाओं को कैसे बनाए रखे? क्या हर जगह एक जैसा ढांचा संभव है? क्या डिजिटल सेवाएं मदद कर सकती हैं? क्या स्थानीय निकायों को अधिक अधिकार देने चाहिए? क्या परिवहन, स्वास्थ्य और बुजुर्ग देखभाल को नए तरीके से संगठित करना होगा? दक्षिण कोरिया इस संकट को अब केवल सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि प्रशासनिक पुनर्कल्पना के प्रश्न के रूप में देख रहा है। यही कारण है कि भारत यात्रा के दौरान इस विषय को सरकारी नवाचार के साथ जोड़कर रखा गया।
भारत के लिए यह चर्चा क्यों अहम है: पलायन, असमान विकास और ‘छोटे शहरों का भविष्य’
भारत और दक्षिण कोरिया की जनसंख्या, भूगोल, संघीय ढांचा और विकास का पैमाना अलग है, फिर भी दोनों देशों के सामने एक साझा प्रश्न खड़ा है—क्या विकास केवल महानगरों में केंद्रित रह सकता है? भारत में दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, चेन्नई और गुरुग्राम जैसे शहर अवसरों के केंद्र हैं, लेकिन इससे छोटे शहरों और अर्ध-शहरी इलाकों पर भारी दबाव भी पैदा होता है। जो लोग जाते हैं, वे भी संघर्ष करते हैं; जो पीछे रह जाते हैं, उनके इलाके संसाधन, निवेश और प्रतिभा खोते हैं।
कई भारतीय राज्यों में यह शिकायत पुरानी है कि राजधानी शहर सब कुछ खींच लेता है—बेहतर कॉलेज, अस्पताल, निजी निवेश, नौकरी, कोचिंग, प्रशासनिक ध्यान और राजनीतिक वरीयता। यह वही तनाव है जिसे अलग सामाजिक संदर्भ में कोरिया ‘स्थानीय विलुप्ति’ की भाषा में व्यक्त करता है। भारत में किसी जिले का पूरी तरह खाली हो जाना फिलहाल व्यापक प्रवृत्ति नहीं है, लेकिन ‘प्रतिभा निकासी’, ‘कृषि से दूरी’, ‘छोटे शहरों का ठहराव’ और ‘क्षेत्रीय असंतुलन’ जैसे प्रश्न बहुत वास्तविक हैं।
इसलिए भारत और कोरिया के बीच इस विषय पर सहयोग का मतलब यह नहीं कि दिल्ली सियोल का मॉडल जस का तस अपनाएगी। इसका मतलब यह है कि दोनों देश यह समझने की कोशिश करेंगे कि स्थानीय समाजों को जीवंत रखने के लिए शासन कैसा हो, कौन-सी सेवाएं प्राथमिक हों, तकनीक का इस्तेमाल कहां सार्थक है, और प्रशासन कितनी तेजी से बदलती जनसांख्यिकी के मुताबिक खुद को ढाल सकता है। भारत के ‘आकांक्षी जिला’ कार्यक्रम, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, ग्रामीण-शहरी संपर्क, स्मार्ट सिटी, अमृत, जलवायु-लचीले शहरी ढांचे और पंचायत-नगर निकाय क्षमताओं की बहस इस चर्चा से जुड़ सकती है।
भारतीय पाठक यहां एक और तुलना आसानी से समझ सकते हैं। जैसे किसी परिवार में बड़े भाई की नौकरी के लिए महानगर जाना पूरे गांव की सामाजिक संरचना बदल देता है, वैसे ही राष्ट्रीय स्तर पर बड़े शहरों की ओर लगातार खिंचाव स्थानीय अर्थव्यवस्था और सामुदायिक जीवन पर असर डालता है। दक्षिण कोरिया इस बदलाव को बहुत व्यवस्थित तरीके से मापने और उसका नीतिगत जवाब खोजने की कोशिश कर रहा है। भारत के लिए इस अनुभव का महत्व इस बात में है कि हम बढ़ती शहरीकरण यात्रा में पहले से ही उन सवालों पर विचार करें, जिनका सामना कोरिया अब अधिक तीव्र रूप में कर रहा है।
सरकारी नवाचार: केवल ऐप नहीं, बल्कि भरोसे और गति की राजनीति
यून हो-जुंग की भारत यात्रा का दूसरा बड़ा मुद्दा था—सरकारी नवाचार या ‘गवर्नमेंट इनोवेशन’। यह शब्द सुनते ही अक्सर लोगों के मन में ऑनलाइन पोर्टल, मोबाइल ऐप, डिजिटल डैशबोर्ड या ई-ऑफिस जैसी चीजें आती हैं। ये निश्चित रूप से महत्वपूर्ण हैं, लेकिन सरकारी नवाचार का अर्थ इससे व्यापक है। इसका मतलब है कि शासन की प्रक्रिया को इस तरह बदला जाए कि नागरिकों को सेवाएं तेज, सरल, पारदर्शी और विश्वसनीय रूप में मिलें।
दक्षिण कोरिया लंबे समय से डिजिटल प्रशासन, स्मार्ट सेवा डिलीवरी और तकनीक-समर्थित सार्वजनिक प्रबंधन के लिए जाना जाता है। लेकिन तकनीक अकेले समाधान नहीं होती। असली कसौटी यह है कि आम नागरिक का समय बचे, कागजी बोझ घटे, शिकायतें कम हों, निर्णय प्रक्रिया स्पष्ट हो, और सेवा में भरोसा बढ़े। भारत भी इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ा है—आधार, यूपीआई, डिजिलॉकर, कोविन, जीएसटी नेटवर्क, ऑनलाइन प्रमाणपत्र, भू-अभिलेख डिजिटलीकरण, पासपोर्ट सेवा, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, और कई राज्यों के सेवा केंद्र इसके उदाहरण हैं।
यही कारण है कि भारत-कोरिया संवाद का यह पहलू विशेष महत्व रखता है। दोनों देशों के अनुभव अलग हैं, लेकिन दोनों के सामने एक समान अपेक्षा है: नागरिक सरकार को ‘दूर बैठे तंत्र’ की तरह नहीं, बल्कि ‘काम करने वाली सेवा’ की तरह महसूस करें। भारतीय राजनीति में भी अब सुशासन का अर्थ केवल नीतियों की घोषणा नहीं, बल्कि उनकी डिलीवरी क्षमता से तय होता है। पंचायत भवन से लेकर नगर निगम, तहसील, राजस्व रिकॉर्ड, भवन अनुमति, स्वास्थ्य कार्ड, आपदा राहत, पुलिस प्रतिक्रिया और सामाजिक सुरक्षा तक—हर जगह यह सवाल मौजूद है कि क्या प्रशासन नागरिक तक समय पर पहुंचता है।
यहां यह भी याद रखना होगा कि सरकारी नवाचार का अर्थ केवल केंद्रीकरण नहीं हो सकता। कई बार बेहतर प्रशासन का मतलब होता है स्थानीय स्तर को अधिक साधन, अधिकार और डाटा देना। दक्षिण कोरिया द्वारा ‘स्थानीय विलुप्ति’ और ‘सरकारी नवाचार’ को एक साथ रखना इसी सोच की ओर इशारा करता है—यदि इलाकों की समस्याएं अलग-अलग हैं, तो प्रशासन की प्रतिक्रिया भी अधिक लचीली और क्षेत्र-विशेष के अनुरूप होनी चाहिए। भारत में भी राज्यों और जिलों के बीच स्थितियां बहुत भिन्न हैं; इसलिए इस तरह का अंतरराष्ट्रीय संवाद नीति-निर्माताओं के लिए उपयोगी संदर्भ बन सकता है।
आपदा सुरक्षा सहयोग: जलवायु और शहरी जोखिम के दौर में साझा जरूरत
यात्रा के दौरान यून हो-जुंग ने यह भी कहा कि भारत और दक्षिण कोरिया सरकार सुधार और आपदा सुरक्षा के क्षेत्रों में सहयोग को अधिक ठोस रूप दे सके हैं। यह कथन खास ध्यान मांगता है, क्योंकि आपदा प्रबंधन आज केवल राहत और पुनर्वास का विषय नहीं रहा। जलवायु परिवर्तन, तीव्र शहरीकरण, गर्मी की लहरें, अचानक बाढ़, औद्योगिक दुर्घटनाएं, जंगल की आग, तटीय संकट और सार्वजनिक अवसंरचना पर बढ़ते दबाव ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा जितना गंभीर सामाजिक प्रश्न बना दिया है।
भारत इस चुनौती से भलीभांति परिचित है। हिमालयी क्षेत्र में भूस्खलन और बादल फटना, तटीय राज्यों में चक्रवात, उत्तर भारत में हीटवेव, महानगरों में जलभराव, औद्योगिक क्षेत्रों में आग, और भूकंप-संवेदनशील इलाकों की चिंताएं हमारी प्रशासनिक व्यवस्था को लगातार परखती रही हैं। दूसरी ओर दक्षिण कोरिया भी शहरी घनत्व, भारी वर्षा, स्थानीय सुरक्षा प्रणालियों और आपदा प्रतिक्रिया क्षमता को लेकर सतर्क है। इसलिए इस क्षेत्र में सहयोग की दिशा स्वाभाविक है।
यह सहयोग किन-किन रूपों में आगे बढ़ेगा, इस पर उपलब्ध जानकारी सीमित है, इसलिए ठोस परियोजनाओं का दावा करना जल्दबाजी होगी। लेकिन सिद्धांततः ऐसे सहयोग में प्रशिक्षण, प्रशासनिक अनुभव-साझेदारी, प्रारंभिक चेतावनी तंत्र, स्थानीय निकायों की तैयारी, आपदा के बाद सेवा बहाली, नागरिक सुरक्षा जागरूकता और संस्थागत ढांचे की तुलना जैसे पहलू शामिल हो सकते हैं। भारतीय संदर्भ में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि हमारे यहां आपदा प्रतिक्रिया केवल राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण या राज्य एजेंसियों तक सीमित नहीं रहती; जिला प्रशासन, पुलिस, स्वास्थ्य विभाग, स्थानीय निकाय, सामुदायिक नेटवर्क और स्वयंसेवी संरचनाएं भी इसमें निर्णायक भूमिका निभाती हैं।
दक्षिण कोरिया का अनुभव यह दिखाता है कि आपदा सुरक्षा को प्रशासनिक दक्षता से अलग नहीं देखा जा सकता। यदि फाइलें धीमी हैं, विभागों के बीच तालमेल कमजोर है, स्थानीय डाटा अद्यतन नहीं है, और जिम्मेदारियां स्पष्ट नहीं हैं, तो संकट के समय नुकसान बढ़ता है। भारत में भी हर बड़ी आपदा के बाद यही बहस दोहराई जाती है कि तैयारी, समन्वय और संचार कितना सक्षम था। ऐसे में भारत-कोरिया संवाद केवल औपचारिक कूटनीति नहीं, बल्कि ‘राज्य की क्षमता’ पर केंद्रित गंभीर नीति चर्चा माना जाना चाहिए।
संसदीय संपर्क और गांधी स्मारक की प्रतीकात्मक राजनीति
इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण पहलू संसदीय स्तर पर संपर्क भी रहा। यून हो-जुंग स्वयं कोरिया की भारत-कोरिया संसदीय मैत्री संस्था से जुड़े हैं। भारत में उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और भारत-कोरिया संसदीय मित्रता से जुड़े प्रतिनिधियों से मुलाकात की। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अक्सर कार्यपालिका—यानी सरकार—के बीच हुए समझौते सुर्खियां बटोरते हैं, लेकिन दीर्घकालिक सहयोग के लिए विधायिका का संवाद भी कम महत्वपूर्ण नहीं होता।
भारत जैसी जीवंत लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद केवल कानून बनाने की संस्था नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सहमति और राजनीतिक वैधता का मंच भी है। दक्षिण कोरिया में भी लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका मजबूत है। ऐसे में जब दोनों देशों के बीच प्रशासन, सुरक्षा, क्षेत्रीय संतुलन और सार्वजनिक सेवा जैसे विषयों पर दीर्घकालिक साझेदारी की बात होती है, तो संसदीय संपर्क उसे स्थायित्व दे सकते हैं। यह संदेश भी जाता है कि रिश्ते सिर्फ नेताओं की निजी रसायन या अल्पकालिक रणनीति पर आधारित नहीं, बल्कि संस्थागत रूप से समर्थित हैं।
यून हो-जुंग का महात्मा गांधी स्मारक जाना भी इसी व्यापक संदेश का हिस्सा है। भारतीय राजनीतिक-सांस्कृतिक जीवन में गांधी केवल इतिहास की शख्सियत नहीं, बल्कि नैतिक राजनीति, जन-आधारित सार्वजनिक जीवन और राज्य-समाज संबंधों के प्रतीक हैं। किसी विदेशी प्रतिनिधि द्वारा गांधी को श्रद्धांजलि देना एक परिचित कूटनीतिक परंपरा है, लेकिन इसका संदेश आज भी प्रभावशाली रहता है—विशेषकर तब, जब बातचीत का विषय जनता के जीवन से जुड़े प्रशासनिक और सामाजिक प्रश्न हों।
भारत के पाठक इसे इस तरह भी पढ़ सकते हैं कि कोरिया अपने संबंधों को सिर्फ उद्योग या रणनीतिक गणना में नहीं बांधना चाहता। वह प्रतीक और नीति, दोनों स्तरों पर यह दिखाना चाहता है कि लोकतंत्र, समाज और प्रशासन की चुनौतियों पर साझी बातचीत की गुंजाइश है। यह बात इसलिए भी ध्यान देने योग्य है क्योंकि एशिया में उभरते संबंधों की भाषा अब पश्चिमी सुरक्षा विमर्श से अलग होकर ‘सार्वजनिक नीति साझेदारी’ की दिशा में भी बढ़ रही है।
‘विशेष रणनीतिक साझेदारी’ का असली अर्थ अब नागरिक जीवन से जुड़े मुद्दों में दिखेगा
भारत और दक्षिण कोरिया अपने संबंधों को लंबे समय से ‘विशेष रणनीतिक साझेदारी’ कहते रहे हैं। लेकिन किसी भी कूटनीतिक पदबंध की असली परीक्षा तब होती है जब उसका असर नागरिक जीवन से जुड़े ठोस क्षेत्रों में दिखने लगे। इस यात्रा से यही संकेत मिलता है कि दोनों देश अब उस साझेदारी को सामाजिक नीति, प्रशासनिक सुधार, स्थानीय विकास और आपदा सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में अधिक सार्थक सामग्री देना चाहते हैं।
यह बदलाव वैश्विक राजनीति के लिए भी दिलचस्प है। पहले अंतरराष्ट्रीय सहयोग की धुरी रक्षा खरीद, ऊर्जा, निवेश और बड़े बुनियादी ढांचे पर अधिक केंद्रित रहती थी। अब आबादी का ढांचा, शहरी असंतुलन, सेवा वितरण, बुजुर्ग समाज, स्थानीय समुदायों की स्थिरता और राज्य की संकट-प्रतिक्रिया क्षमता भी अंतरराष्ट्रीय सीख का विषय बन रहे हैं। दक्षिण कोरिया, जिसने बहुत कम समय में गरीबी से विकसित अर्थव्यवस्था तक का सफर तय किया, अब अपनी आंतरिक चुनौतियों—जैसे क्षेत्रीय असमानता और जनसंख्या गिरावट—को भी अंतरराष्ट्रीय संवाद का हिस्सा बना रहा है।
भारत के लिए इसका अर्थ अवसर और सावधानी—दोनों है। अवसर इसलिए कि भारत दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में से एक होने के साथ-साथ विशाल डिजिटल सार्वजनिक ढांचा, विविध संघीय अनुभव और स्थानीय शासन की जटिलताओं का अनूठा मिश्रण रखता है। सावधानी इसलिए कि किसी भी दूसरे देश का मॉडल यहां सीधे लागू नहीं हो सकता। भारत की सामाजिक विविधता, भाषाई बहुलता, क्षेत्रीय राजनीति, ग्रामीण-शहरी निरंतरता और जनसंख्या आकार उसे अलग बनाते हैं। इसलिए सहयोग का सही मार्ग ‘अनुकरण’ नहीं, बल्कि ‘सीख और अनुकूलन’ होगा।
फिर भी इस खबर का महत्व कम करके नहीं आंका जाना चाहिए। जब दो एशियाई लोकतंत्र ‘जिला खाली होने’ के संकट, सरकारी नवाचार और आपदा सुरक्षा जैसे मुद्दों पर साथ बैठते हैं, तो वे असल में यह स्वीकार करते हैं कि 21वीं सदी का शासन केवल आर्थिक विकास दर से नहीं मापा जाएगा। उसे इस बात से भी परखा जाएगा कि क्या छोटे शहर जीवित रह पाते हैं, क्या नागरिकों को समय पर सेवा मिलती है, क्या सरकार पर भरोसा बना रहता है, और क्या संकट के समय समाज तेजी से संभल पाता है।
दक्षिण कोरिया की यह भारत यात्रा इसलिए उल्लेखनीय है क्योंकि यह हमें उस कोरिया की झलक दिखाती है जो सिर्फ मनोरंजन संस्कृति का निर्यातक नहीं, बल्कि अपने भीतर के सामाजिक प्रश्नों से जूझता, उनसे सीखता और उन्हें अंतरराष्ट्रीय सहयोग के एजेंडे में बदलता हुआ देश भी है। भारत के लिए यह संवाद उपयोगी है—क्योंकि हमारे अपने विकास पथ पर भी छोटे शहरों, जिलों, प्रशासनिक दक्षता और नागरिक सुरक्षा का सवाल आने वाले वर्षों में और ज्यादा केंद्रीय होने वाला है।
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