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दक्षिण कोरिया में ‘चोनकांस’ का उभार: जब गांव बन रहे हैं समर वेकेशन का नया पता

दक्षिण कोरिया में ‘चोनकांस’ का उभार: जब गांव बन रहे हैं समर वेकेशन का नया पता

कोरिया की गर्मियों में गांव की ओर लौटता पर्यटन

दक्षिण कोरिया के जियॉन्बुक विशेष स्वायत्त प्रांत ने इस वर्ष जुलाई और अगस्त के बीच ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए एक अहम पहल की है। प्रांत प्रशासन ने घोषणा की है कि उसके अधिकार क्षेत्र के ग्रामीण अनुभव-आधारित अवकाश गांवों में ठहरने वाले पर्यटकों को सप्ताह के दिनों में, यानी सोमवार से गुरुवार के बीच चेक-इन करने पर, ठहरने के खर्च पर अधिकतम 50 प्रतिशत तक की सहायता दी जाएगी। यह पहल केवल एक मौसमी छूट योजना नहीं है, बल्कि बदलती यात्रा संस्कृति, स्थानीय अर्थव्यवस्था और ग्रामीण जीवन को नए सिरे से समझने की कोशिश का हिस्सा है। दक्षिण कोरिया में गर्मियों की छुट्टियां आम तौर पर समुद्र तटों, शहरों के होटलों और लोकप्रिय पर्यटन स्थलों से जोड़ी जाती रही हैं। लेकिन अब वहां एक ऐसा रुझान बढ़ रहा है जिसमें लोग भीड़भाड़ से दूर, गांवों में ठहरकर प्रकृति, स्थानीय भोजन, खेती-किसानी और अपेक्षाकृत धीमी जीवन-लय का अनुभव करना चाहते हैं। इसी बदलते रुझान को प्रशासनिक समर्थन देने की कोशिश जियॉन्बुक की यह योजना करती दिखती है।

भारतीय पाठकों के लिए इसे समझना कठिन नहीं है। जैसे भारत में लंबे समय तक छुट्टियों का मतलब शिमला, मनाली, गोवा, नैनीताल, जयपुर या बड़े धार्मिक-पर्यटन केंद्रों तक सीमित माना जाता रहा, वैसे ही कोरिया में भी छुट्टियों का एक तय नक्शा रहा है। लेकिन कोविड के बाद दुनिया भर में यात्रा की मानसिकता बदली है। लोग अब केवल ‘घूमना’ नहीं, बल्कि ‘ठहरना’ और ‘जीना’ चाहते हैं—कुछ दिन किसी दूसरी लय में, किसी दूसरी जगह के साथ। कोरिया में इसी बदलाव का एक स्थानीय रूप है, जिसे वहां ‘चोनकांस’ कहा जाता है। यह शब्द कोरियाई शब्द ‘चोन’ यानी गांव या ग्रामीण इलाका, और ‘वाकांस’ यानी वैकेंस या छुट्टी, के मेल से बना है। मोटे तौर पर कहें तो यह गांव में बिताई गई छुट्टी है—लेकिन सिर्फ खेत देखने या एक फोटो खिंचवाने भर का अनुभव नहीं, बल्कि वहां की जीवन-पद्धति के साथ कुछ समय बिताने का विचार।

जियॉन्बुक प्रशासन की ताजा घोषणा इसी मानसिकता को नीति का आधार बनाती है। प्रांत के मुताबिक यह कदम ‘ग्रामीण सहानुभूति यात्रा’ जैसे व्यापक कार्यक्रम का हिस्सा है, जिसे स्थानीय प्रशासन और ग्रामीण आर्थिक-सामाजिक सेवा सक्रियण सहायता केंद्र मिलकर आगे बढ़ा रहे हैं। यह साझेदारी अपने आप में संकेत देती है कि मामला केवल पर्यटन विभाग की प्रचार योजना भर नहीं है; इसमें गांवों की आजीविका, सामाजिक सेवाओं की सक्रियता और स्थानीय ठहराव-आधारित अर्थव्यवस्था को भी जोड़ा जा रहा है। यानी सवाल केवल यह नहीं कि पर्यटक कहां जाएगा, बल्कि यह भी कि उसके खर्च का लाभ किसे मिलेगा—किसी बड़े होटल समूह को, या गांव के सामुदायिक आवास, स्थानीय भोजन, छोटे उद्यम और ग्रामीण परिवारों को।

क्या हैं ये ‘ग्रामीण अनुभव-आधारित अवकाश गांव’?

दक्षिण कोरिया में जिन ठिकानों को ‘ग्रामीण अनुभव-आधारित अवकाश गांव’ कहा जा रहा है, उन्हें सामान्य होटल या गेस्टहाउस की तरह नहीं समझना चाहिए। ये ऐसे गांव-स्तरीय पर्यटन स्थल होते हैं जहां ठहरना, स्थानीय गतिविधियों में भाग लेना, प्रकृति के करीब समय बिताना और ग्रामीण संस्कृति को सीधे महसूस करना—सब एक साथ जुड़ते हैं। यहां पर्यटक सिर्फ कमरा बुक नहीं करता, बल्कि एक तरह से गांव की दुनिया में अस्थायी मेहमान बनता है। ऐसी जगहों पर खेती से जुड़े अनुभव, मौसमी भोजन, लोक संस्कृति, हस्तशिल्प, नदी या खेतों के किनारे सैर, स्थानीय लोगों के साथ साझा गतिविधियां और बच्चों के लिए प्रकृति-आधारित कार्यक्रम जैसे तत्व शामिल हो सकते हैं। हालांकि जियॉन्बुक की मौजूदा घोषणा में हर गांव की अलग-अलग गतिविधियों का ब्यौरा सार्वजनिक रूप से नहीं बताया गया है, फिर भी इस मॉडल की मूल भावना यही है कि आवास और अनुभव एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हों।

भारतीय संदर्भ में देखें तो इसकी तुलना कुछ हद तक महाराष्ट्र के ग्रामीण होमस्टे, नागालैंड और मेघालय के सामुदायिक पर्यटन, केरल के बैकवाटर गांवों, उत्तराखंड के पहाड़ी होमस्टे या राजस्थान के कुछ ग्रामीण सांस्कृतिक प्रवास मॉडलों से की जा सकती है। फर्क यह है that दक्षिण कोरिया इस मॉडल को अधिक व्यवस्थित प्रशासनिक ढांचे के साथ मुख्यधारा की छुट्टी संस्कृति में जगह देने की कोशिश कर रहा है। भारत में भी ‘रूरल टूरिज्म’ का विचार नया नहीं है, लेकिन यह अभी तक बड़े पैमाने पर आम परिवारों की पहली पसंद नहीं बन पाया। हमारे यहां गांव अक्सर ‘जड़ों की जगह’ तो माने जाते हैं, पर ‘छुट्टी बिताने की जगह’ के रूप में उनका ब्रांड निर्माण अभी सीमित है। कोरिया में ‘चोनकांस’ का उभार दिखाता है कि कैसे ग्रामीण जीवन को आधुनिक पर्यटन की भाषा में बिना पूरी तरह बाजारी तमाशे में बदले भी प्रस्तुत किया जा सकता है।

यहां एक सांस्कृतिक बिंदु भी महत्वपूर्ण है। कोरिया, भारत की तरह, तीव्र शहरीकरण से गुजरा समाज है। वहां भी युवा पीढ़ी का बड़ा हिस्सा शहरों में रहता है, काम करता है और तेज रफ्तार जीवनशैली में बंधा है। ऐसे में गांव का आकर्षण केवल हरियाली नहीं, बल्कि मानसिक विश्राम, डिजिटल थकान से राहत और ‘धीमे समय’ का अनुभव बन जाता है। भारत में हम इसे कभी-कभी ‘सिटी बर्नआउट’ से बचने की कोशिश के रूप में देखते हैं—जब लोग वीकेंड पर फार्मस्टे, ऑर्गेनिक फार्म, पहाड़ी गांव या किसी शांत देहाती इलाके की ओर निकल पड़ते हैं। कोरिया का यह मॉडल उसी भावना का अधिक औपचारिक और राज्य-समर्थित संस्करण प्रतीत होता है।

50 प्रतिशत तक छूट: नीति के पीछे की व्यावहारिक सोच

जियॉन्बुक प्रशासन की योजना का सबसे आकर्षक हिस्सा है—ठहरने के खर्च पर अधिकतम 50 प्रतिशत तक की सहायता। लेकिन यह सुविधा बिना शर्त नहीं है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह छूट जुलाई और अगस्त के बीच, सोमवार से गुरुवार तक चेक-इन करने वाले पर्यटकों पर लागू होगी। पहली नजर में यह एक साधारण छूट योजना लग सकती है, पर इसमें पर्यटन नीति की बहुत व्यावहारिक समझ छिपी हुई है। गर्मियों का मौसम स्वाभाविक रूप से यात्रा की मांग बढ़ाता है। ऐसे समय में यदि सभी यात्री केवल सप्ताहांत पर ही पहुंचते हैं, तो भीड़ का दबाव बढ़ता है, स्थानीय संसाधनों पर असर पड़ता है और गांवों को स्थिर आय नहीं मिल पाती। इसलिए प्रांत ने पीक सीजन को ध्यान में रखते हुए मांग को सप्ताह के दिनों में फैलाने का प्रयास किया है।

भारत में होटल उद्योग और विमानन कंपनियां लंबे समय से ‘वीकडे बनाम वीकेंड’ मूल्य निर्धारण का इस्तेमाल करती हैं। लेकिन यहां अंतर यह है कि कोरियाई प्रशासन खुद आगे आकर ग्रामीण क्षेत्रों की ओर पर्यटकों को मोड़ने के लिए प्रोत्साहन दे रहा है। यह किसी निजी प्लेटफॉर्म का प्रमोशनल डिस्काउंट नहीं, बल्कि सार्वजनिक नीति का उपकरण है। इसका संदेश साफ है—अगर आप थोड़ा अलग तरह की छुट्टी चुनेंगे, और पीक वीकेंड की भीड़ से हटकर यात्रा करेंगे, तो सरकार आपकी लागत कम करने में मदद करेगी।

यात्रा मनोविज्ञान के लिहाज से भी यह महत्वपूर्ण है। बहुत से लोग गांव में ठहरने या स्थानीय स्तर के आवास चुनने में इसलिए हिचकते हैं क्योंकि उन्हें सुविधा, जानकारी, स्वच्छता, पहुंच या अनुभव की गुणवत्ता को लेकर निश्चितता नहीं होती। शहर के बड़े होटल, लोकप्रिय ऐप और प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों की तुलना में गांव-स्तरीय विकल्प कम परिचित लगते हैं। ऐसे में 50 प्रतिशत तक की छूट केवल पैसों की बचत नहीं, बल्कि एक तरह का ‘ट्रायल प्रोत्साहन’ बन जाती है। यानी पहली बार ग्रामीण अवकाश चुनने का जोखिम कम हो जाता है। अगर अनुभव सकारात्मक रहा, तो ऐसी यात्राएं आगे बिना छूट के भी दोहराई जा सकती हैं। नीति-निर्माण की भाषा में कहें तो यह मांग सृजन का प्रवेश-द्वार है।

हालांकि उपलब्ध जानकारी में सहभागी गांवों की कुल संख्या, बुकिंग की विस्तृत प्रक्रिया या कुल बजट का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, इसलिए इस योजना के आकार को लेकर निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। फिर भी जो तथ्य सामने हैं, उनसे इतना स्पष्ट है कि जियॉन्बुक प्रांत गर्मियों की मौसमी यात्रा मांग को ग्रामीण ठहराव से जोड़ना चाहता है, और वह भी ऐसे ढंग से कि लाभ केवल सप्ताहांत की सीमित भीड़ तक सिमटकर न रह जाए।

‘चोनकांस’ क्यों महत्वपूर्ण है, और भारत इससे क्या सीख सकता है

‘चोनकांस’ को केवल एक ट्रेंडी शब्द मानना गलती होगी। यह छुट्टी की बदलती समझ का संकेत है। एक समय था जब यात्रा का अर्थ था—जितनी अधिक जगहें देख लो, उतना अच्छा। अब एक नई प्रवृत्ति कहती है—कम जगह देखो, लेकिन किसी जगह को थोड़ा गहराई से जी लो। यही वजह है कि दुनिया भर में स्लो ट्रैवल, लोकल स्टे, होमस्टे, एग्रो-टूरिज्म और कम्युनिटी-बेस्ड टूरिज्म जैसी अवधारणाएं मजबूत हुई हैं। कोरिया का ‘चोनकांस’ इसी वैश्विक बदलाव का स्थानीय, सांस्कृतिक रूप है।

भारतीय पाठकों के लिए यह चर्चा खास इसलिए भी है क्योंकि भारत में भी ग्रामीण भारत को लेकर दो समानांतर छवियां मौजूद हैं। एक ओर गांवों को पिछड़ेपन, पलायन और सीमित अवसरों के नजरिये से देखा जाता है; दूसरी ओर वही गांव परंपरा, भोजन, प्रकृति, समुदाय और सांस्कृतिक गहराई के वाहक भी हैं। अगर राज्य, समुदाय और स्थानीय उद्यम मिलकर इसे जिम्मेदार पर्यटन मॉडल में बदलें, तो गांव केवल ‘विकास के इंतजार’ की जगह नहीं, बल्कि अनुभव आधारित अर्थव्यवस्था के केंद्र भी बन सकते हैं। कोरिया का उदाहरण बताता है कि ग्रामीण क्षेत्र को पर्यटन मानचित्र पर लाना केवल विज्ञापन अभियान का मामला नहीं, बल्कि भरोसे, सुविधा और प्रोत्साहन का संयोजन है।

भारत में इसकी संभावनाएं बहुत व्यापक हैं। सोचिए, अगर बुंदेलखंड के किसी गांव में पारंपरिक जल-संरचना, लोकसंगीत और मिट्टी के भोजन के साथ आवासीय अनुभव विकसित हो; या बिहार के मिथिला क्षेत्र में लोककला, आंगन संस्कृति और देहाती खानपान के साथ छोटे, स्वच्छ, प्रमाणित होमस्टे हों; या कच्छ, गढ़वाल, विदर्भ, कूर्ग, सुंदरबन, ब्रज या मालवा के गांवों में समुदाय आधारित अवकाश पैकेज बनाए जाएं—तो यह केवल पर्यटन नहीं, स्थानीय अर्थव्यवस्था का नया अध्याय बन सकता है। लेकिन इसके लिए ‘गांव दिखाने’ से अधिक जरूरी है ‘गांव के साथ ठहरने’ की विश्वसनीय व्यवस्था। कोरिया की नीति इसी बिंदु पर जोर देती दिखाई देती है।

यह भी ध्यान देना चाहिए कि ग्रामीण पर्यटन को केवल ‘एथनिक शो’ में बदल देने का खतरा हमेशा रहता है। अगर गांव को महज शहरी पर्यटक के मनोरंजन की वस्तु बना दिया जाए, तो उसकी गरिमा और वास्तविकता दोनों प्रभावित हो सकती हैं। इसलिए ऐसे मॉडल की सफलता इस पर निर्भर करती है कि स्थानीय समुदाय की भागीदारी कितनी वास्तविक है, आय का बंटवारा कितना न्यायपूर्ण है, और अनुभव कितना सम्मानजनक व टिकाऊ है। जियॉन्बुक की योजना के बारे में उपलब्ध जानकारी सीमित है, लेकिन स्थानीय प्रशासन और ग्रामीण सेवा सक्रियण केंद्र की संयुक्त भूमिका संकेत देती है कि कम-से-कम नीति स्तर पर इसे क्षेत्रीय सशक्तिकरण के ढांचे में देखा जा रहा है।

स्थानीय अर्थव्यवस्था, संस्कृति और ‘ठहराव’ की राजनीति

पर्यटन को अक्सर केवल फोटो, होटल और घूमने-फिरने की चीज समझ लिया जाता है, लेकिन असल में यह आर्थिक और सामाजिक वितरण का प्रश्न भी है। किसी पर्यटक के खर्च का पैसा कहां जाता है—यह किसी भी पर्यटन मॉडल की केंद्रीय बहस है। बड़े शहरों के आलीशान होटल, चेन रेस्टोरेंट और विशाल मनोरंजन परिसर आर्थिक गतिविधि तो पैदा करते हैं, लेकिन वहां आय का बड़ा हिस्सा संगठित निजी क्षेत्र में केंद्रित हो सकता है। इसके उलट, गांव-स्तर पर आधारित ठहराव में वही पैसा स्थानीय परिवारों, छोटे भोजनालयों, हस्तशिल्प, खेत-उत्पाद, अनुभव कार्यक्रमों और सामुदायिक सेवाओं तक पहुंच सकता है। इस अर्थ में जियॉन्बुक की योजना केवल पर्यटक संख्या बढ़ाने की योजना नहीं, बल्कि खर्च की दिशा बदलने की कोशिश भी है।

जब कोई परिवार गांव में दो दिन ठहरता है, तो वह केवल बिस्तर का किराया नहीं देता। वह स्थानीय भोजन खाता है, आसपास की गतिविधियों में भाग लेता है, बच्चों के लिए अनुभव लेता है, शायद कोई स्थानीय उत्पाद खरीदता है, और अक्सर उस जगह की कहानी अपने साथ वापस ले जाता है। यह ‘स्टे-इकोनॉमी’ है—जहां यात्रा का अर्थ गुजरना नहीं, बल्कि कुछ समय के लिए टिकना है। भारत में भी यह फर्क साफ दिखता है: जो यात्री किसी पहाड़ी कस्बे से गुजरकर फोटो लेकर लौट आता है, और जो किसी गांव में होमस्टे लेकर स्थानीय भोजन, लोककथा, ट्रेक, खेती या हस्तशिल्प अनुभव के साथ समय बिताता है—दोनों की आर्थिक छाप अलग होती है।

कोरिया में ‘ग्रामीण अनुभव-आधारित अवकाश गांव’ इसी टिकाव वाली यात्रा को संस्थागत रूप देने की कोशिश हैं। जियॉन्बुक जैसे प्रांतों के लिए यह इसलिए भी अहम है क्योंकि राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर कोरिया की पहचान प्रायः सियोल, बुसान, के-पॉप, के-ड्रामा, कॉस्मेटिक्स और टेक्नोलॉजी के इर्द-गिर्द बनती है। लेकिन किसी भी देश की पहचान केवल उसके महानगर नहीं होते। जिस तरह भारत को सिर्फ मुंबई, दिल्ली और गोवा से नहीं समझा जा सकता, उसी तरह कोरिया को भी केवल उसके पॉप-कल्चर और शहरी चमक से नहीं पढ़ा जा सकता। ग्रामीण इलाके उस देश की दूसरी लय, दूसरा चेहरा और दूसरी संवेदना सामने लाते हैं।

इसलिए जियॉन्बुक की छूट योजना में सांस्कृतिक राजनीति का एक नरम, लेकिन अर्थपूर्ण पक्ष भी है। यह कहती है कि छुट्टी बिताने योग्य जगह केवल ‘ग्लैमरस’ नहीं होती; एक गांव भी आकर्षक गंतव्य हो सकता है, बशर्ते उसे देखने की नजर बदली जाए। भारत में भी यह सोच धीरे-धीरे आकार ले रही है। अब बहुत से युवा ‘ऑफबीट’ जगहों की तलाश करते हैं, हालांकि कई बार ऑफबीट भी जल्दी से इंस्टाग्राम-फ्रेंडली भीड़ में बदल जाता है। कोरिया का यह मॉडल इस भीड़-तंत्र से हटकर योजनाबद्ध ढंग से गांवों को यात्रा अर्थव्यवस्था में शामिल करने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।

सप्ताहांत की भीड़ से अलग, अनुभव आधारित छुट्टी का संदेश

जियॉन्बुक की नीति में सोमवार से गुरुवार तक चेक-इन की शर्त मामूली नहीं है। यह आधुनिक पर्यटन के एक बड़े संकट की ओर भी इशारा करती है—कुछ सीमित दिनों और कुछ सीमित जगहों पर अत्यधिक दबाव। दुनिया के कई लोकप्रिय शहर और प्राकृतिक स्थल ‘ओवरटूरिज्म’ की समस्या से जूझ रहे हैं। यदि छुट्टी का हर कार्यक्रम सिर्फ शुक्रवार रात से रविवार तक सीमित रहेगा, तो ट्रैफिक, महंगाई, संसाधनों पर भार और स्थानीय असुविधा बढ़ना तय है। सप्ताह के दिनों में यात्रा को प्रोत्साहित करना एक तरह से मांग प्रबंधन की रणनीति है। इससे पर्यटक को अपेक्षाकृत शांत अनुभव मिलता है और मेजबान स्थान को अधिक संतुलित आय।

भारतीय पाठक इसे अपने अनुभव से समझ सकते हैं। जो परिवार किसी पहाड़ी या धार्मिक स्थल पर वीकेंड की जगह मध्य सप्ताह में पहुंचता है, उसे अक्सर कम भीड़, बेहतर सेवा और कभी-कभी कम कीमत मिलती है। कोरिया का जियॉन्बुक प्रशासन इसी सहज सच को एक सार्वजनिक नीति में बदल रहा है। यह बात छोटे व्यवसायों के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि नियमित, फैला हुआ आवागमन एकमुश्त भीड़ की तुलना में अधिक उपयोगी हो सकता है।

यह पहल एक और संदेश देती है—छुट्टी को केवल ‘भागदौड़ से राहत’ नहीं, बल्कि ‘जीवन-लय बदलने’ के अवसर की तरह देखना। गांव में ठहरना मूलतः यही प्रस्ताव रखता है। वहां आपका समय होटल की लॉबी, शॉपिंग स्ट्रीट और थीम पार्क के हिसाब से नहीं, बल्कि सुबह की हवा, खेतों की गति, सामुदायिक भोजन और शाम की शांति के हिसाब से बहता है। यह बात सुनने में रोमानी लग सकती है, लेकिन आधुनिक शहरी समाजों में इसकी मांग वास्तविक है। काम के दबाव, डिजिटल स्क्रीन और निरंतर उपलब्ध रहने की संस्कृति के बीच लोग ऐसी जगहें खोज रहे हैं जहां वे अस्थायी रूप से अलग ढंग से सांस ले सकें।

कोरिया में ‘चोनकांस’ का उभार इसी मानसिक थकान के जवाब के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। और अगर प्रशासन इसे लागत सहायता देकर मजबूत कर रहा है, तो इसका मतलब है कि वहां नीति-निर्माता भी छुट्टी संस्कृति में हो रहे इस बदलाव को समझ रहे हैं।

आगे का रास्ता: क्या यह मॉडल टिकाऊ साबित होगा?

फिलहाल उपलब्ध तथ्य इतने ही बताते हैं कि जियॉन्बुक विशेष स्वायत्त प्रांत ने गर्मियों के मौसम में ग्रामीण अनुभव-आधारित अवकाश गांवों में ठहरने वालों के लिए अधिकतम 50 प्रतिशत तक की सहायता का ऐलान किया है, और यह सुविधा जुलाई-अगस्त के दौरान सोमवार से गुरुवार तक चेक-इन करने पर लागू होगी। यह भी स्पष्ट है कि यह पहल ग्रामीण पर्यटन सक्रिय करने और पर्यटकों को आकर्षित करने के व्यापक उद्देश्य से लाई गई है। लेकिन किसी भी नीति की वास्तविक सफलता अंततः तीन बातों पर निर्भर करेगी—क्रियान्वयन, गुणवत्ता और दोहराव।

पहला, क्या बुकिंग की प्रक्रिया सरल और भरोसेमंद होगी? दूसरा, क्या गांवों में उपलब्ध आवास और अनुभव उन यात्रियों की अपेक्षाओं पर खरे उतरेंगे जो पहली बार ऐसे मॉडल को आजमा रहे हैं? और तीसरा, क्या यह पहल एक सीजनल ऑफर बनकर रह जाएगी, या इससे स्थायी यात्रा व्यवहार में बदलाव आएगा? अगर पर्यटक पहली यात्रा में अच्छा अनुभव लेकर लौटते हैं, तो ‘चोनकांस’ एक नारे से आगे बढ़कर कोरिया की छुट्टी संस्कृति का मजबूत हिस्सा बन सकता है।

भारतीय नजरिये से देखें तो यह खबर सिर्फ कोरिया के एक प्रांतीय प्रशासनिक निर्णय की सूचना नहीं है। यह हमें यह सोचने का मौका देती है कि भविष्य का पर्यटन कैसा होगा—भीड़, उपभोग और तस्वीरों पर केंद्रित, या अनुभव, स्थानीयता और ठहराव पर आधारित। जिस तरह भारत में आज छोटे शहर, स्थानीय व्यंजन, लोक मेलों और होमस्टे धीरे-धीरे यात्रियों का ध्यान खींच रहे हैं, उसी तरह कोरिया भी अपनी ग्रामीण आत्मा को यात्रा के मानचित्र पर अधिक प्रमुखता से दर्ज कराना चाहता है।

जियॉन्बुक की यह पहल इसी व्यापक बदलाव की एक झलक है। के-पॉप, के-ड्रामा और सियोल की चमक से परिचित दुनिया के लिए यह याद दिलाने वाली खबर है कि दक्षिण कोरिया की कहानी केवल उसके महानगरों में नहीं लिखी जा रही। उसका एक हिस्सा उन गांवों में भी है, जहां गर्मियों की छुट्टी अब नए अर्थ पा रही है—थोड़ी सस्ती, थोड़ी शांत, थोड़ी स्थानीय, और शायद कहीं अधिक मानवीय।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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