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हिंसा, रोमांच और दर्शक की नैतिकता: क्यों चर्चा में है स्पेनिश बुलफाइटिंग पर बनी फिल्म ‘गोधूलि का एकांत’

कोरिया की मनोरंजन खबरों से निकला एक बड़ा सांस्कृतिक सवालदक्षिण कोरिया की मनोरंजन पत्रकारिता को अक्सर लोग केवल के-पॉप, के-ड्रामा और सितारों की निजी जिंदगी तक सीमित समझते हैं, लेकिन वहां का सांस्कृतिक परिदृश्य अब कहीं अधिक व्यापक हो चुका है। सियोल की फिल्म संस्कृति, बुसान अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव की वैश्विक साख, और स्ट्रीमिंग के दौर में बढ़ती अंतरराष्ट्रीय दर्शक-रुचि ने कोरियाई मनोरंजन समाचारों को दुनिया भर की विवादास्पद कलात्मक कृतियों की ओर भी मोड़ दिया है। इसी संदर्भ में इन दिनों एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘गोधूलि का एकांत’ पर विशेष चर्चा हो रही है। यह फिल्म स्पेन की पुरानी, चमकदार, लेकिन गहरे विवादों से घिरी परंपरा—बुलफाइटिंग—को अपने केंद्र में रखती है।यह महज किसी विदेशी लोक-परंपरा का दृश्यात्मक परिचय नहीं है। फिल्म दर्शक को उस अखाड़े में ले जाती है जहां रोमांच, कौशल, भय, भीड़ का उन्माद और एक जानवर की नियति एक ही दृश्य-रचना में साथ मौजूद रहते हैं। यही उसकी सबसे बड़ी विशेषता है। वह किसी आसान नैतिक निष्कर्ष पर नहीं पहुंचती, न ही केवल तमाशे की तरह इस परंपरा को बेचती है। बल्कि वह यह पूछती है कि जब हम किसी खूबसूरती से फिल्माए गए हिंसक दृश्य को देखते हैं, तो हम वास्तव में किस चीज से आकर्षित हो रहे होते हैं—कला से, जोखिम से, शक्ति से, या किसी और की पीड़ा से?भारतीय दर्शक के लिए यह सवाल नया नहीं है। हमारे यहां भी परंपरा और नैतिकता का टकराव कई रूपों में दिखाई देता है। चाहे वह पशु-आधारित मेलों पर बहस हो, त्योहारों में कुछ पुरानी प्रथाओं की समीक्षा हो, या फिर खेल और प्रदर्शन के नाम पर क्रूरता की सीमाएं तय करने की बात—समाज बार-बार यह विचार करता है कि क्या हर पुरानी चीज केवल इसलिए बची रहनी चाहिए क्योंकि वह परंपरा है। ‘गोधूलि का एकांत’ इस बहस को स्पेन के अखाड़े से उठाकर वैश्विक सांस्कृतिक विमर्श का हिस्सा बना देती है, और यही वजह है कि कोरिया में भी यह मनोरंजन खबर से आगे बढ़कर एक गंभीर सांस्कृतिक चर्चा का विषय बनी है।भारतीय पाठकों के लिए इस फिल्म की अहमियत इसलिए भी है क्योंकि हम ऐसे समय में जी रहे हैं जब दृश्य संस्कृति बहुत तेज हो चुकी है। सोशल मीडिया के छोटे वीडियो, स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म, लाइव प्रदर्शन और ग्लोबल कंटेंट—सब मिलकर हमें बहुत जल्दी आकर्षित करते हैं, लेकिन हर आकर्षण के भीतर छिपे नैतिक प्रश्नों पर ठहरकर सोचना अब भी कठिन काम है। यह फिल्म उसी ठहराव की मांग करती दिखती है।बुलफाइटिंग क्या है, और इसे लेकर इतना विवाद क्यों है?स्पेन की बुलफाइटिंग, जिसे वहां सांस्कृतिक विरासत, साहस और प्रदर्शन-कला के मिश्रण के रूप में भी पेश किया जाता रहा है, एक ऐसी परंपरा है जिसमें एक प्रशिक्षित योद्धा—मटाडोर—अखाड़े में एक सांड का सामना करता है। दर्शक दीर्घा में बैठी भीड़ इसे सिर्फ मुकाबला नहीं, बल्कि एक शैलीबद्ध सार्वजनिक अनुष्ठान के रूप में देखती है। विशेष पोशाक, तय क्रम, नियंत्रित मुद्राएं, और भीड़ की सामूहिक प्रतिक्रिया इसे नाटकीय बनाती है। लेकिन इस नाटकीयता की बुनियाद में वही तथ्य मौजूद है जिससे विवाद जन्म लेता है: इस प्रदर्शन का अंत आमतौर पर सांड की मृत्यु में होता है।भारतीय संदर्भ में समझें तो यह कुछ वैसा है जैसे किसी परंपरा को उसके समर्थक वीरता, संस्कृति और पहचान का प्रतीक मानें, जबकि विरोधी उसी परंपरा को क्रूर, अमानवीय और अप्रासंगिक बताएं। अंतर सिर्फ इतना है कि बुलफाइटिंग में यह टकराव बेहद दृश्यात्मक है। यहां खून दिखाई देता है, जानवर का डर दिखाई देता है, और भीड़ का उत्साह भी सामने रहता है। इसलिए इसे लेकर भावनाएं अधिक तीखी हो जाती हैं।फिल्म की चर्चा का कारण यही है कि वह बुलफाइटिंग को सिर्फ ‘अच्छा’ या ‘बुरा’ कहकर नहीं छोड़ती। वह यह दिखाती है कि क्यों कुछ लोगों के लिए यह गर्व और कौशल का मंच है, जबकि दूसरों के लिए यह पशु-उत्पीड़न का संस्थागत रूप। आज दुनिया भर में पशु-अधिकार की चेतना बढ़ी है। भारत में भी अदालतों, राज्य सरकारों और नागरिक समाज ने समय-समय पर यह सवाल उठाया है कि सांस्कृतिक छूट की सीमा क्या होनी चाहिए। ऐसे में यह फिल्म भारतीय दर्शक के लिए बिल्कुल अप्रासंगिक नहीं, बल्कि बहुत परिचित बहस को दूसरे भूगोल में देखने का अवसर है।महत्वपूर्ण यह भी है कि यह फिल्म दर्शक को निर्णय थमाती नहीं, बल्कि निर्णय के पहले की असहजता से गुजरने पर मजबूर करती है। कोई भी जिम्मेदार कला-कृति शायद यही करती है। वह हमें यह सुविधा नहीं देती कि हम दो मिनट में तय कर लें कि हम किस पक्ष में हैं। बल्कि वह यह पूछती है कि क्या हम उस आकर्षण को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं जो हिंसा से पैदा होता है, और अगर नहीं, तो फिर हम उसे देखते क्यों हैं?एक सितारा, एक शरीर, एक जोखिम: आंद्रेस रोका रे की छविइस डॉक्यूमेंट्री के केंद्र में विश्वप्रसिद्ध बुलफाइटर आंद्रेस रोका रे हैं। फिल्म उनका पीछा सिर्फ एक सार्वजनिक व्यक्तित्व के रूप में नहीं करती, बल्कि एक ऐसे मनुष्य के रूप में भी करती है जो अखाड़े में जाने से पहले तैयारी करता है, तनाव झेलता है, भीड़ का सामना करता है और अंततः उस हिंसक अनुष्ठान का चेहरा बन जाता है। यही फोकस फिल्म को खास बनाता है। वह अपने केंद्रीय पात्र को देवत्व नहीं देती, लेकिन उसे पूरी जटिलता के साथ प्रस्तुत करती है।भारतीय पाठक इसे समझने के लिए खेल और स्टार-संस्कृति के मेल की कल्पना कर सकते हैं। जैसे क्रिकेटर मैदान पर सिर्फ खिलाड़ी नहीं रहता, वह ब्रांड भी होता है; जैसे किसी बड़े फिल्म सितारे की चाल, कपड़े और मंच पर उपस्थिति भी एक प्रदर्शन बन जाती है; वैसे ही रोका रे यहां केवल पेशेवर नहीं, एक सार्वजनिक प्रतीक के रूप में उभरते हैं। फर्क यह है कि उनकी लोकप्रियता एक ऐसे पेशे से आती है जिसमें मौत, रक्त और दर्शकीय रोमांच साथ चलते हैं। यही विरोधाभास फिल्म के नैतिक केंद्र को और तीखा कर देता है।रिपोर्टों के अनुसार फिल्म उन क्षणों पर खास ध्यान देती है जब रोका रे अखाड़े में प्रवेश करने से पहले अपनी वेशभूषा पहनते हैं। बुलफाइटर की पोशाक साधारण कपड़े नहीं होती; वह अनुष्ठानिक और प्रतीकात्मक दोनों होती है। उसे पहनने में सहायकों की जरूरत पड़ना केवल व्यावहारिक बात नहीं, बल्कि यह दिखाता है कि यह पेशा व्यक्तिगत कौशल से आगे बढ़कर एक सामाजिक रूप से निर्मित प्रदर्शन है। एक तरह से जैसे किसी शास्त्रीय मंच-प्रदर्शन से पहले कलाकार का श्रृंगार, वेश और मानसिक तैयारी प्रस्तुति का ही हिस्सा होते हैं।लेकिन फिल्म यहीं रुकती नहीं। वह रोका रे के चेहरे पर तनाव, प्रशंसकों के साथ उनकी मुलाकात, और अखाड़े में पहुंचने के पहले की घनी बेचैनी को पकड़ती है। इससे एक अहम बात खुलती है: हिंसा के इस सार्वजनिक आयोजन में भी स्टारडम मौजूद है। दर्शक न केवल परंपरा देखने आते हैं, वे व्यक्ति को देखने आते हैं। हमारे समय की सेलिब्रिटी संस्कृति यहां भी वैसी ही सक्रिय है जैसी संगीत, सिनेमा या खेल में दिखती है। इसी कारण फिल्म का प्रश्न और जटिल हो जाता है—क्या भीड़ व्यक्ति के साहस की प्रशंसा कर रही है, या उस हिंसक प्रदर्शन के तमाशे की जिसमें वह व्यक्ति केंद्र में है?यह प्रस्तुति रोका रे को नायक और अपराधी के किसी सरल खांचे में नहीं रखती। वह उन्हें जोखिम उठाने वाला, अनुशासित, लोकप्रिय और साथ ही हिंसा के केंद्र में खड़ा इंसान दिखाती है। यही संतुलन फिल्म की बौद्धिक ईमानदारी का संकेत माना जा सकता है।कैमरे की नजदीकी और आवाज की बेचैनी: फिल्म की शैली क्यों असर करती हैडॉक्यूमेंट्री का प्रभाव सिर्फ विषय से नहीं, उसके फिल्मांकन से भी बनता है। ‘गोधूलि का एकांत’ की शैली को लेकर जो बातें सामने आई हैं, उनमें सबसे उल्लेखनीय है उसका बहुत नजदीक जाना। कैमरा दूर खड़ा होकर दृश्य का निरपेक्ष रिकॉर्ड नहीं बनाता, बल्कि शरीर, सांस, चेहरे, कपड़े, धूल, आवाज और टकराव के बीच घुस आता है। इससे जो अनुभव बनता है, वह दर्शक को सुरक्षित दूरी का आराम नहीं देता।फिल्म में वायरलेस माइक्रोफोन और घनी ध्वनि-रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल इस अनुभव को और तीखा बनाता है। जब किसी प्रदर्शन में सिर्फ दृश्य नहीं, सांस की गति, कदमों की रगड़, फुसफुसाहट, हांफना और भीड़ की लय भी सुनाई देने लगे, तो दर्शक केवल देख नहीं रहा होता—वह भीतर खिंचता है। भारतीय सिनेमा प्रेमियों के लिए यह समझना आसान है कि कभी-कभी बैकग्राउंड स्कोर से ज्यादा असर किसी पात्र की चुप्पी या सांस की आवाज करती है। यहां भी वैसा ही लगता है।बुलफाइटिंग को यदि दूर से देखा जाए तो वह एक कोरियोग्राफ की गई रंगीन गतिविधि लग सकती है—लाल कपड़ा, रेत का मैदान, सजधज, शारीरिक नियंत्रण। लेकिन कैमरा जब बहुत पास जाता है, तो वही दृश्य असुविधाजनक हो उठता है। तब पता चलता है कि इस आकर्षक नाटकीयता के भीतर भय भी है, तनाव भी है, और एक जीवित प्राणी के घायल होने की ठोस वास्तविकता भी। यही नजदीकी फिल्म को महज ‘स्पेक्टेकल’ बनने से रोकती है।यहां एक महत्वपूर्ण बात और है। आधुनिक दृश्य संस्कृति में हिंसा को अक्सर चमकदार बना दिया जाता है। विज्ञापन, एक्शन सिनेमा, खेल-प्रसारण, वायरल क्लिप—सबमें संपादन और फ्रेमिंग के जरिए अनुभव को रोमांचक रूप दिया जाता है। ‘गोधूलि का एकांत’ इसी दृश्य आकर्षण की शक्ति को समझते हुए भी उससे आलोचनात्मक दूरी बनाए रखती प्रतीत होती है। वह दर्शक को मोहित करती है, लेकिन तुरंत ही उस मोह के भीतर छिपी क्रूरता का सामना भी कराती है। यह बहुत कठिन संतुलन है, और शायद इसी कारण यह फिल्म गंभीर चर्चा का विषय बन रही है।भारतीय दर्शक, जिन्हें अब विश्व सिनेमा तक पहले से कहीं अधिक पहुंच है, ऐसी फिल्मों से एक नई देखने की संस्कृति सीख सकते हैं—जहां तकनीक सिर्फ सुंदरता पैदा करने के लिए नहीं, बल्कि नैतिक असुविधा को अधिक स्पष्ट करने के लिए भी काम करती है।जब फिल्म खून से नजर नहीं चुरातीइस डॉक्यूमेंट्री का सबसे बेचैन करने वाला पक्ष यह है कि वह बुलफाइटिंग के हिंसक परिणामों को ढकती नहीं। सांड को उकसाने, उसे घायल करने और अंततः मृत्यु तक पहुंचाने वाले दृश्यों को यदि फिल्म सचमुच सामने रखती है, तो यह निर्णय केवल सनसनी पैदा करने के लिए नहीं माना जाना चाहिए। यह उस सच को छिपाने से इनकार है जिस पर पूरा प्रदर्शन टिका हुआ है।यहीं से फिल्म का नैतिक वजन पैदा होता है। अगर बुलफाइटिंग को केवल परिधान, मुद्रा, साहस और भीड़ की तालियों तक सीमित कर दिया जाए, तो वह सुंदरता का अधूरा और भ्रामक संस्करण होगी। लेकिन जब कैमरा रक्त, दर्द और जानवर की पराजित देह को भी दर्ज करता है, तब दर्शक को सुविधा नहीं मिलती कि वह इसे केवल कला, केवल खेल, या केवल परंपरा कहकर आगे बढ़ जाए।भारतीय समाज में भी हमने कई बार देखा है कि किसी परंपरा की रक्षा का तर्क उसके परिणामों की असुविधाजनक सच्चाइयों को पीछे धकेल देता है। लेकिन नई पीढ़ियां अधिक प्रश्न पूछ रही हैं। वे जानना चाहती हैं कि सौंदर्य किस कीमत पर पैदा हो रहा है, मनोरंजन किसकी पीड़ा पर टिका है, और क्या दर्शक होने का मतलब केवल उपभोग करना है या नैतिक जिम्मेदारी लेना भी। यह फिल्म इसी समकालीन संवेदना से संवाद करती दिखती है।फिल्म में रोका रे के खून से सने दृश्य का उल्लेख विशेष रूप से अर्थपूर्ण है। यहां खून सिर्फ सांड का नहीं, जोखिम उठाने वाले मनुष्य का भी है। यही वह बिंदु है जहां फिल्म किसी आसान प्रचार-रेखा से हट जाती है। वह यह नहीं कहती कि केवल एक पक्ष पीड़ित है और दूसरा पक्ष सिर्फ क्रूर है। वह दिखाती है कि हिंसक व्यवस्था में शामिल मनुष्य भी शरीर, भय और आघात के साथ मौजूद होता है। लेकिन इससे व्यवस्था की क्रूरता कम नहीं हो जाती। बल्कि प्रश्न और कठिन हो जाता है: क्या किसी परंपरा में शामिल प्रतिभागी का व्यक्तिगत साहस उस परंपरा की नैतिक आलोचना को निष्प्रभावी कर देता है? शायद नहीं।और शायद इसी वजह से फिल्म लंबे समय तक दिमाग में रहती है—क्योंकि वह दर्शक को दोनों सच एक साथ देखने के लिए बाध्य करती है: प्रदर्शन की सम्मोहक शक्ति और उसके रक्तरंजित परिणाम।निर्देशक की दृष्टि: फैसला नहीं, अवलोकन की जिदफिल्म के निर्देशक अल्बेर सेरा का नाम यूरोपीय कला-सिनेमा में अपनी विशिष्ट शैली के लिए जाना जाता है। उनकी पहचान ऐसे फिल्मकार की रही है जो समय, मौन, चेहरों और वातावरण के जरिए अर्थ रचते हैं। इस पृष्ठभूमि को देखते हुए बुलफाइटिंग जैसे विषय की ओर उनका झुकाव स्वतः दिलचस्प हो जाता है। यह चुनाव बताता है कि वह केवल घटना रिकॉर्ड करने नहीं, बल्कि उसकी परतों को टटोलने आए हैं।रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने दो वर्षों तक रोका रे का पीछा करते हुए इस फिल्म को आकार दिया। यह जानकारी महत्वपूर्ण है, क्योंकि लंबे समय तक साथ रहने से कैमरे और विषय के बीच जो विश्वास, थकान, दोहराव और अनायास सत्य खुलते हैं, वे किसी तात्कालिक शूटिंग से संभव नहीं होते। भारतीय वृत्तचित्र परंपरा में भी यह बात मान्य रही है कि समय ही अक्सर सबसे बड़ा सह-निर्देशक होता है। जितना लंबा अवलोकन, उतनी गहरी परतें।सेरा का तरीका यह संकेत देता है कि फिल्म किसी समाचार पैकेज की तरह त्वरित निष्कर्ष नहीं देती। वह न्यायाधीश की भाषा नहीं, साक्षी की भाषा में काम करती है। लेकिन यह भी स्पष्ट रहना चाहिए कि ‘साक्षी’ होना निष्पक्ष या निरर्थक होना नहीं है। जब आप किसी हिंसक परंपरा को बारीकी से दिखाते हैं, तो आप दर्शक को एक नैतिक स्थिति में खड़ा कर रहे होते हैं। आप कह रहे होते हैं—अब देखिए, और तय कीजिए कि यह दृश्य आपको क्यों आकर्षित कर रहा है।यही कला की शक्ति है। वह कभी-कभी नारे से अधिक असरदार होती है, क्योंकि वह देखना सिखाती है। एक समाज तभी परिपक्व होता है जब वह केवल समर्थन और विरोध की भाषा में नहीं, बल्कि जटिल अनुभवों की भाषा में भी सोच सके। ‘गोधूलि का एकांत’ को इसी कारण गंभीर डॉक्यूमेंट्री कहा जा सकता है: वह मुद्दे को सरल नहीं बनाती, बल्कि उसकी उलझन को संरक्षित रखती है।भारतीय दर्शक के लिए यह फिल्म क्यों मायने रखती हैपहली नजर में यह पूछा जा सकता है कि स्पेन की बुलफाइटिंग और कोरियाई मनोरंजन पत्रकारिता से निकली किसी फिल्म चर्चा का भारत से क्या संबंध। लेकिन आज सांस्कृतिक प्रश्न सीमाओं में बंधे नहीं रहते। जैसे भारतीय दर्शक कोरियाई ड्रामा देखते हैं, जापानी एनीमे पर बहस करते हैं, ऑस्कर की फिल्मों पर राय बनाते हैं, वैसे ही दुनिया के किसी भी हिस्से की कला यहां की सामाजिक संवेदना को छू सकती है।भारत में इस फिल्म की प्रासंगिकता कम से कम तीन स्तरों पर है। पहला, परंपरा बनाम नैतिकता का प्रश्न। दूसरा, दृश्य मनोरंजन में हिंसा की भूमिका। तीसरा, स्टार-संस्कृति और जन-उत्साह के बीच व्यक्ति की नैतिक जिम्मेदारी। ये तीनों प्रश्न यहां भी उतने ही जीवित हैं जितने यूरोप या कोरिया में।हमारे यहां अक्सर यह कहा जाता है कि संस्कृति को उसके अपने संदर्भ में समझना चाहिए। यह बात सही है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि आलोचना की गुंजाइश समाप्त हो जाए। जैसे भारतीय परंपराओं पर प्रश्न उठाना भारतीयता-विरोध नहीं होता, वैसे ही स्पेनिश बुलफाइटिंग पर नैतिक बहस करना स्पेनिश संस्कृति का अपमान नहीं है। परिपक्व समाज वही है जो अपनी परंपराओं को सम्मान के साथ, लेकिन अंधस्वीकार के बिना देख सके।कोरिया में इस फिल्म पर हो रही चर्चा भी इसी बात का संकेत है कि वहां का सांस्कृतिक विमर्श वैश्विक हो चुका है। के-कल्चर की सफलता के साथ कोरियाई दर्शक अब केवल अपने सितारों की खबरें नहीं, बल्कि दुनिया के कठिन सांस्कृतिक प्रश्नों को भी मनोरंजन पत्रकारिता के दायरे में शामिल कर रहे हैं। भारतीय मीडिया के लिए यह एक संकेत हो सकता है कि संस्कृति-कवरेज को सिर्फ प्रमोशनल लेखन तक सीमित न रखकर उसे सामाजिक और नैतिक बहस से जोड़ा जाए।अंततः ‘गोधूलि का एकांत’ ऐसी फिल्म प्रतीत होती है जो निष्कर्ष से अधिक प्रश्न छोड़ती है। और शायद आज के समय में यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। क्योंकि हम ऐसे दौर में हैं जहां हर मुद्दे पर तुरंत फैसला सुनाने की हड़बड़ी है। इस फिल्म का महत्व इस बात में है कि वह कहती है—पहले देखो, फिर असहज होओ, फिर सोचो कि तुम्हारी नजर किस चीज से बनी है। अगर कोई डॉक्यूमेंट्री यह काम कर पाती है, तो वह केवल फिल्म नहीं रहती, समाज के लिए आईना बन जाती है।अंतिम बात: तमाशे के युग में देखने की जिम्मेदारीयह फिल्म हमें एक असुविधाजनक लेकिन जरूरी बात याद दिलाती है: दर्शक होना भी एक नैतिक क्रिया है। हम क्या देखते हैं, किसे सराहते हैं, किस पर ताली बजाते हैं, किस दर्द को नजरअंदाज करते हैं—ये सब केवल निजी पसंद के प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदना के प्रश्न भी हैं। बुलफाइटिंग का अखाड़ा स्पेन में है, फिल्म पर चर्चा कोरिया में हो रही है, लेकिन उसका सवाल दिल्ली, लखनऊ, पटना, भोपाल और जयपुर के दर्शक तक सीधा पहुंचता है।कला का काम हमेशा उत्तर देना नहीं होता। कई बार उसका काम यह याद दिलाना होता है कि उत्तर देने से पहले हम देखने की अपनी आदतों की जांच करें। ‘गोधूलि का एकांत’ अगर वास्तव में यही करती है—हिंसा और आकर्षण को एक ही फ्रेम में रखकर—तो यह उस दुर्लभ श्रेणी की डॉक्यूमेंट्री है जो अपने विषय से आगे जाकर दर्शक की आत्मा से सवाल करती है।भारतीय संदर्भ में यह शायद वही क्षण है जब हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि वैश्विक संस्कृति का उपभोग करना सिर्फ मनोरंजन नहीं, बौद्धिक जिम्मेदारी भी है। जिस तरह हम कोरियाई पॉप संस्कृति से फैशन, संगीत और कहानी कहने के नए रूप सीखते हैं, उसी तरह हमें वहां के सांस्कृतिक विमर्श से यह भी सीखना चाहिए कि कला पर बहस कैसे की जाती है—बिना शोर, बिना जल्दबाजी, लेकिन पूरी गंभीरता के साथ। इस अर्थ में ‘गोधूलि का एकांत’ केवल एक फिल्म नहीं, समकालीन दर्शक के विवेक की परीक्षा है।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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